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Sunday, February 11, 2024

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में #मारवाड़ी समाज की भूमिका

स्वतंत्रता की भावना संस्कृति से ही प्रसारित होती है ‘पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं’- इस भावना के मूल में देश प्रेम की भावना कार्य करती है जिसका आधार मज़बूत सांस्कृतिक धरोहर होती है। वैश्य भी देशप्रेम की इस पवित्र भावना से अछूते नहीं थे। मारवाड़ी के बारे में देश में प्रचलित धारणा कि ये सिर्फ व्यापारी हैं, यह एक भ्रान्ति के अलावा कुछ नहीं ।(Bharat ke swatantrata sangram mein marwadi samaj ki bhumika)

संस्कृति, साहित्य और राष्ट्रीयता के उत्थान में मारवाड़ी वैश्यों का तन-मन-धन का भरपूर सहयोग रहा। कोलकाता के राजस्थानी कवि और शायर चम्पालाल मोहता ’अनोखा’ के अभिनन्दन पर वरिष्ठ कवि श्री ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’ ने मारवाड़ी वैश्य समाज का साहित्य और संस्कृति के विकास में अहम योगदान स्वीकार करते हुए अध्यक्षीय व्यक्तव्य में कहा कि वैश्य समाज देश का कवच और अस्त्र है । वर्तमान में यह याद करना समीचीन होगा कि भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में मारवाड़ी समाज की क्या भूमिका रही ?

उन्नीसवीं शताब्दी में वैश्य पूरे अंग्रेजी भारत, दक्षिण और मध्य भारत में अपना कारोबार फैला चुके थे । इस समय तक सामान्य रूप से इस वर्ग का अंग्रेज सरकार या अंग्रेज व्यापारियों की नीति से कोई मतभेद नहीं था, परन्तु जो व्यापारी अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह ‘जफ़र’ और मध्य भारत की देशी रियासतों के शाषकों के संपर्क में थे उनका अंग्रेज सरकार से मोह भंग होने लगा था। सन 1857 तक यह रोष बढ़ गया । देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में इन व्यापारियों ने अपनी जान माल की परवाह किये बगैर स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की। यह मदद मुख्य रूप से आंदोलन के लिए धन देकर की गई थी। इस आर्थिक मदद से अंग्रेज सरकार इतनी घबरा गई कि इन व्यापारियों को मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया।

सन 1857 में दिल्ली में मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ‘जफ़र’ की खुल्लमखुल्ला आर्थिक मदद करने वाले रामजीदास गुड़वाला का खजाना जब्त कर अंग्रेजो ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। सेठ रामजीदास गुड़वाला ने बादशाह को 3 करोड़ रुपये दान दिए थे। रामजीदास गुड़वाला मूलतः हरयाणा के अग्रवाल परिवार से थे और दिल्ली के नगरसेठ थे। सन 1857 में ग्वालियर राज्य का खजाना वहाँ के नामचीन व्यापारी सेठ अमरचंद बांठिया की देख रेख में था । सेठ बांठिया मूल रूप से बीकानेर रियासत का मारवाड़ी व्यापारी था जब ग्वालियर पर रानी लक्ष्मी बाई , नाना साहेब और तांत्या टोपे का हमला हुआ तब सेठ बांठिया ने ग्वालियर का खज़ाना इनकी सेना के खर्च पूर्ति हेतु इन्हें ही सौंप दिया । अंग्रेज सरकार ने इस घटना को राजद्रोह मानकर #सेठ_अमरचंद_बांठिया ’#बीकानेर_वाला’ को फांसी पर चढा दिया।
इसी तरह जब तांत्या टोपे भागकर जयपुर से लालसोट होते हुए सीकर पहुंचे तो सेठ रामप्रकाश अग्रवाल ने गहने और धन देकर उनकी मदद की। शोलापुर के कृष्णदास_सारडा और सतारा के सेठ सेवाराम मोर, हरयाणा के लाला_हुकुमचंद (अग्रवाल जैन) भी अपनी उग्र कारवाइयों के चलते फांसी पर झूला दिए गये । 1857 के क्रांतिकारियों के बीच समनव्यय का कार्य मारवाड़ी वैश्य वर्ग ने किया। सन्देश-समाचार पहुंचाना, सन्देश वाहकों को अपने घर में आश्रय देना, क्रांतिकारियों और उनके रिश्तेदारों को अपने यहाँ छुपाकर रखना आदि अनेक कार्य मारवाड़ी व्यापारियों द्वारा किये जाते रहे। 1857 की क्रांति की असफलता के बाद नाना साहब पेशवा का भतीजा मार्च 1862 में दक्षिण भारत के हैदराबाद में #सेठ_मोहन_लाल_पित्ती और #सेठ_शरण_मल के यहाँ गुप्त रूप से रह रहा था, पता चलने पर अंग्रेज सरकार ने दोनों पर भारी जुर्माना ठोक कर उन्हें सजा दी।

सन 1857 की क्रांति के बाद से सन 1900 तक वैश्यों और अंग्रेजों में सीधा टकराव नहीं हुआ विद्रोह के बाद दोनों पक्ष अपनी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में लगे हुए थे। इस समय तक प्रशाष्निक सुधारों के नाम पर देश की लगभग सभी रियासतों में परंपरागत कानून की जगह अंग्रेजी कानून लागू हो चूका था। इसका असर दूसरे वर्गों के साथ साथ व्यापारी वर्ग के परंपरागत विशेषाधिकारों पर भी पड़ा इस कारण रियासतों के व्यापारी और उनके प्रवासी भाई-बंधू , दोनों में अंग्रेजों के प्रति कटुता बढती गई। उदयपुर राज्य के लगभग 2000 व्यापारी 30 मार्च 1864 को नगरसेठ चम्पालाल के नेतृत्व में कर्नल ईडन के घर विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंचे और सात दिनों की हड़ताल के बाद समझौता हुआ ।
कालांतर में मारवाड़ी व्यापारी अंग्रेज व्यापारियों के एकाधिकार को हर जगह चुनौती देने लगे। शीघ्र ही मारवाड़ी व्यापारिओं की समझ में आ गया की राजनितिक दबाव और समर्थन के बगैर केंद्रीय सत्ता से जुड़े अंग्रेज व्यापारियों से व्यावसायिक टक्कर लेना मुश्किल है अंतः 1898 में बंगाल के मारवाड़ी व्यापारियों ने ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’ नाम की संस्था बनायीं ।

इस संस्था की स्थापना के साथ उनकी घोषणा थी-‘ राजनीति का सम्बन्ध व्यापार से रहता है और यह प्रत्यक्ष रूप से व्यापार को प्रभावित करती है, इसलिए ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’ भारत की राजनीति से परहेज़ नहीं रखेगी’ । इसके साथ ही मारवाड़ियों से सम्बंधित पत्र-पत्रिकाओं में , जिसमे ‘मारवाड़ी’ और ‘अग्रवाल’ पत्रिकाएं उल्लेखनीय है, मारवाड़ी व्यापारियों से राजनीति में सक्रिय योगदान का आह्वान किया गया देखते ही देखते ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’, ‘वैश्य सभा’ और ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ के माध्यम से सैकड़ों प्रगतिशील मारवाड़ी युवक तत्कालीन भारतीय राजनीति में रूचि लेने लगे।

‘मारवाड़ी एसोसियेशन’, ‘वैश्य सभा’ और ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ के माध्यम से सैकड़ों प्रगतिशील मारवाड़ी युवक तत्कालीन भारतीय राजनीति में रूचि लेने लगे थे । सन 1905 के आते-आते ये मारवाड़ी युवा राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ने शुरू हो गये बंग भंग के विरोध में बंगाल के जन आंदोलन में, विरोध सभाओं में और बाद में बंगाल के क्रन्तिकारी आंदोलन में ये युवक सक्रिय भूमिकाओं में नज़र आने लगे। बंगाल के मारवाड़ी व्यापारियों ने इंग्लैण्ड स्थित मैंनचेस्टर के ‘चेंबर ऑफ कामर्स’ से अनुरोध किया की वे ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालें और बंग भंग को रुकवाने में मदद करें । विदेशी माल के बहिष्कार आंदोलन को मारवाड़ी व्यापारियों के सहयोग से बल मिला। सितम्बर 1904 में बंगाल में जहाँ 77000 रुपये का विदेशी कपडा बिका वहीँ सितम्बर 1905 में मात्र 10000 रुपये का। 21 अक्टूबर 1905 को ‘भारतमित्र’ में ‘बंगविच्छेद’ शीर्षक लेख में लार्ड कर्जन को उग्र मुद्रा में बाल मुकुन्द गुप्त ने संबोधित किया,

‘आपके शाषन काल में बंगाविच्छेद इस देश के लिए अंतिम विषाद और आपके लिए अंतिम हर्ष है……दुर्बल की अंग्रेज नहीं सुनते”

मारवाड़ियों में आक्रोश की लहर उठी ‘जणनी जने तो दोय जण, के दाता के सूर’ की परंपरा के मारवाड़ी अग्रवाल युवा #हनुमान_प्रसाद_पोद्दार ‘स्वदेश बांधव’ और ‘अनुशीलन समिति’ जैसी क्रन्तिकारी संस्थाओं के सक्रिय सदस्य बने। पोद्दार जी ने मुंबई में अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की। सन 1914 में प्रसिद्ध ‘रोड़ा कांड’ में अनुशीलन समिति से जुड़े हुए फूलचंद चौधरी, ज्वालाप्रसाद कानोडिया, प्रभु दयाल हिम्मतसिंहका, घनश्यामदास बिडला, कन्हैयालाल चित्तलान्गिया, ओंकारमल सर्राफ, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की गिरफ्तारी के वारंट जारी किये गये। घनश्यामदास बिडला को छोड़ सभी को लंबी अवधी तक जेल में रखा गया।

ब्यावर के माहेश्वरी वंशी सेठ_दामोदरदास_राठी का बंगाल के क्रन्तिकारी अरविन्द घोष, रासबिहारी बोस और सचेतन गांगुली के साथ ही श्यामजीकृष्ण वर्मा, राजा महेंद्रप्रताप और राजस्थान के दूसरे क्रांतिकारियों से भी गहरा संपर्क रहा । कलकत्ता और काशी के क्रांतिकारियों के सहयोग से राजस्थान में भी अर्जुनलाल_सेठी के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियां बढ़ा ली थी । उनको जयपुर के सेठ छोटेलाल और मोतीलाल ने काफी आर्थिक मदद की तब तक महात्मा गांधी का प्रवेश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नहीं हुआ था।

सन 1915 में महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति में पदार्पण के साथ ही मारवाड़ी व्यापारियों का झुकाव उनकी तरफ हुआ। महात्मा गांधी की भावुक राजनीति ने मारवाड़ी वैश्यों को आकर्षित किया । सेठ_जमनालाल_बजाज जी इनमे अग्रणी थे । एनी बेसेंट के होम रुल आंदोलन में सेठ फूलचंद चौधरी और सेठ कन्हैलाल चित्तलान्गीया गिरफ्तार हुए। जलियांवाला बाग की घटना में मारवाड़ी युवक भी मारे गये थे। जमनालाल बजाज ही शेखावाटी के अग्रवाल परिवार से थे। उस समय तक कांग्रेस मारवाड़ियों का महत्व समझ चुकी थी । इसलिए सन 1920 में जमना लाल बजाज को कांग्रेस पार्टी का कोषाध्यक्ष बना दिया गया।

कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में ‘तिलक स्वराज फंड’ में ज्यादा से ज्यादा कोष जमा करवाने का आव्हान महात्मा गांधी ने किया। इसके जबाब में जमनालाल बजाज, आनंदीलाल पोद्दार, रामकृष्ण मोहता, घनश्यामदास बिडला, केशोराम पोद्दार, रामकृष्ण डालमिया और सुखलाल करनानी ने लाखों रुपये स्वराज फंड में जमा करवाए । अकेले कलकत्ता के बडाबाजार से उस समय दस लाख रुपये एकत्रित हुए। महात्मा गांधी के विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन का नेतृत्व जमनालाल बजाज और कृष्णदास जाजू ने किया । शेखावटी के हर बड़े कसबे में घनश्याम_दास_बिडला ने खादी भण्डार खुलवा दिये थे।

जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिडला, कृष्णदास जाजू, सिद्धराज ढढा, ब्रजलाल बियानी दूसरे मारवाड़ी व्यापारियों के साथ खादी प्रचार-प्रसार, हरिजन उद्धार के कार्यक्रमों में महात्मा गांधी के सक्रिय सहयोगी रहे । घनश्याम दास बिडला हरिजन-सेवक संघ के अध्यक्ष थे। जमना लाल बजाज और सिद्धराज ढढा ने राजस्थान की रियासतों में घूम घूम कर खादी और हरिजन-उद्धार का बहुत प्रचार किया। नमक सत्याग्रह में मारवाड़ियों ने खुलकर भाग लिया, असहयोग आंदोलन की रीढ़ ही मारवाड़ी व्यापारी थे त। त्कालीन बंगाल सरकार के अधिकारी ए. एच. गज़नवी ने वायसराय के प्रतिनिधि कनिंघम को 27 अगस्त 1930 को पत्र लिखा –“ महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से मारवाड़ियों को अलग कर दिया जाये तो 90 फीसदी आंदोलन यूं ही खत्म हो जायेगा ”

अंग्रेज सरकार ने बंगाल के मारवाडी व्यापारियों को आन्दोलन से अलग करने के लिए राजस्थान की रियासतों के शाषकों पर दबाव दिया लेकिन लगभग सभी रियासतों ने इसमें अपनी असमर्थता जता दी । उस समय मारवाड़ियों की संस्थाओं ने मारवाड़ियों से भारतीय राजनीति में और ज्यादा सक्रिय होने का आह्वान किया । अखिल भारतीय मारवाड़ी अग्रवाल सभा के सन 1926 में हुए सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सेठ_जमनालाल_बजाज ने आव्हान किया –‘अग्रवाल समाज ने आन्दोलनों में धन दिया,जेल भुगती लेकिन अब समय आ गया है की समाज का बच्चा-बच्चा देश पर बलिदान होने के लिए तैयार रहे”


इसी तरह अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन के भागलपुर में आयोजित चौथे सम्मेलन में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले मारवाड़ियों की प्रसंशा में प्रस्ताव पास किया गया । सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ को सहयोग करने के लिए शेखावाटी के अग्रवाल सेठ भगवान दास बागला ने वर्मा में रंगून स्थित अपनी ‘नेशनल बेंक ऑफ इण्डिया’ ही सुभाष बाबु को सौंप दी ।

सन 1942 के ‘करो या मरो’ आंदोलन में डॉ.राम मनोहर लोहिया और मगनलाल बागड़ी का योगदान अविष्मर्णीय है। मालचंद हिसारिया और नेमीचंद आंचलिया गिरफ्तार हुए । भारत छोड़ो आंदोलन में 483 मारवाड़ियों को सजा सुनाई गई ।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान वैचारिक क्रांति में जो अखबार अपना योगदान दे रहे थे वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मारवाड़ी व्यापारियों के आर्थिक सहयोग से ही निकाल रहे थे । हिंद केसरी, हरिजन, कर्मवीर, प्रताप, लीडर,त्याग-भूमि, भारतमित्र आदि अखबार इसकी मिशाल हैं । इस क्षेत्र में भागीरथ कानोडिया का योगदान महत्वपूर्ण है । चिडावा के ताराचंद डालमिया और मंडावे के देव किशन सर्राफ का नाम इस क्षेत्र के किसानो कि समस्या समाधान हेतु संघर्ष में अग्रणी है।

सीकर के किसानो की समस्याओं का समाधान करने के लिए सीताराम सेक्सरिया ने जमना लाल बजाज के साथ मिलकर सफल परिश्रम किया । अन्य राज्यों के किसान आंदोलनों को आर्थिक सहयोग देने में भी मारवाड़ी व्यापारी पीछे नहीं रहे।।

पंजाब केसरी और अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे तीव्र स्वर में आंदोलन चलाने वाले लाल-बाल-पाल तिगड़ी के लाला लाजपत राय जी को कौन भूल सकता है। सन् 1928 में लाला जी साइमन कमिसन के विरोध में अंग्रेजों के क्रूर लाठीचार्ज का शिकार हुए और अपने प्राणों का त्याग कर दिया। बंगाल के लाल-बाल-पाल कही जाने वाली तिगड़ी के बिनोय बसु, बादल गुप्त और दिनेश गुप्त तिगड़ी ने भारतीयों से क्रूर व्यहवार करने वाले अंग्रेज़ अधिकारी सिम्पसन की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का गौरव शाली अध्याय लिखने वाले मारवाड़ी वैश्य व्यापारियों ने पूरे देश के लोगों के साथ मिलकर तन,मन और धन से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका दर्ज की ।

Know about Baniyas handle their own money

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बनिये अपना पैसा कैसे संभालते हैं, इसके बारे में 10 बातें जो आप नहीं जानते होंगे

बनिये अपना पैसा कैसे संभालते हैं?

बनिये पैसे के मामले में बेहद विवेकपूर्ण कौशल के लिए जाने जाते हैं। वे उन अवसरों से पैसा बनाने के लिए भी जाने जाते हैं जिनके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।

परंपरागत रूप से इस समुदाय की जड़ें गुजरात और राजस्थान में हैं, लेकिन अब यह दुनिया भर में अमीर व्यापारियों और निवेशकों के समुदाय में फैल गया है। तो बनिये का दिमाग का राज़ क्या है? 

आम धारणा के विपरीत, वे अपने पैसे को लेकर भावुक नहीं हैं

बनिया और मारवाड़ी मितव्ययी या कंजूस माने जाते हैं। इससे उनकी छवि अधिक खर्च को लेकर क्रोधित होने वाले और अपना पैसा अपने पास रखने वाले लोगों की बनती है। हालाँकि, वे अपने पैसे के प्रति उदासीन होते हैं और अपने धन की बड़ी रकम ऐसे अवसरों में निवेश करते हैं जिन्हें अधिकांश लोग जोखिम भरा मानते हैं। वे किसी व्यवसाय के उतार-चढ़ाव से बिना घबराए एक पेशेवर खिलाड़ी की तरह उबर सकते हैं।
उनका बैंक बैलेंस बहुत कम है

क्या? हाँ, हम जो सुनते हैं, वह बिल्कुल विपरीत लगता है। हाँ, वे ज़्यादा ख़र्च नहीं करते हैं, और हाँ अपने पैसे का बड़ा हिस्सा बचा लेते हैं। लेकिन वे बैंक से नफरत करते हैं। बैंक में पैसा होने का मतलब है कि उन्हें कोई रिटर्न नहीं मिल रहा है। अधिकांश बनिये अपनी बचत यथाशीघ्र निवेश कर देंगे। वे अपना पैसा लिक्विड फंड (कम जोखिम वाले म्यूचुअल फंड ) में तब तक रखना पसंद करते हैं जब तक उन्हें इसे निवेश करने (या खर्च करने) का बेहतर अवसर नहीं मिल जाता। 

बनिये विलासिता पर खर्च करते हैं

यदि आप कभी अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर जाने का निर्णय लेते हैं, यूरोप के सबसे महंगे स्थानों या प्रशांत महासागर के सबसे महंगे द्वीपों पर, तो आप एक बनिया परिवार को पापड़ खाते हुए देखेंगे।

भारत में ज्यादातर जगुआर और रोल्स रॉयस बनियों को बेची जाती हैं। इससे यह साबित होता है कि वे अपने धन का आनंद लेते हैं, भले ही वे अपने दैनिक जीवन को सरल रखना पसंद करते हों।

वे कर्ज कम ही लेते हैं

वे सरल विचारधारा के साथ रहते हैं -  कमाई खर्च से पहले आती है ।

लोन पर कोई वस्तु खरीदने का मतलब है कि आपको उत्पाद की एमआरपी से अधिक कीमत चुकानी होगी। उदाहरण के लिए, यदि आप एक विज्ञापन देखते हैं कि एक कार की कीमत 5 लाख है, जब आप 3 साल के लिए ईएमआई लेते हैं तो आपको इसके लिए लगभग 6 लाख का भुगतान करना पड़ता है! बनियों के लिए यह बड़ी 'नहीं' है।

कोई ऋण नहीं
वे लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं

अंत में सबसे बड़ी बनिया जादू की चाल - वे कंपाउंडिंग को समझते हैं।

कंपाउंडिंग की शक्ति दुनिया का आठवां आश्चर्य है। जो इसे समझता है, वह इसे अर्जित करता है। जो नहीं करता, वह भुगतान करता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन

सच तो यह है कि बनिए इसे आइंस्टीन से पहले जानते थे और इसका पूरी तरह से अभ्यास करते थे। ऋण पर चक्रवृद्धि ब्याज की गणना के लिए आपने अपने 10वीं बोर्ड में जो फॉर्मूला इस्तेमाल किया था, वही निवेश के लिए भी काम करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप छोटी शुरुआत करते हैं, 10 साल तक 5000 प्रति माह पर 12% रिटर्न के साथ आप 6 लाख का निवेश करते हैं और 5.6 लाख का लाभ कमाते हैं। बेहतर क्या हो सकता था?
वे छोटी-छोटी खरीदारी में भी जोखिम और लाभ देखने की आदत बना लेते हैं

वे मूल्यांकन करते हैं, मेरा मतलब वास्तव में मूल्यांकन करते हैं कि क्या उन्हें कोई नया उत्पाद खरीदना चाहिए। हर चीज़ को लाभ और जोखिम के चश्मे से देखा जाता है। उदाहरण के लिए, रेफ्रिजरेटर खरीदते समय, वे सावधानीपूर्वक अपनी आवश्यकताओं का मूल्यांकन करेंगे और देखेंगे कि रेफ्रिजरेटर खरीदने के लिए कौन सी कीमत उपयुक्त है। यदि यह लागत को उचित नहीं ठहराता है, तो दुनिया का कोई भी विक्रेता उन्हें इसे खरीदने के लिए मना नहीं सकता है।
वे अपने अधिकांश खर्चों की योजना बनाते हैं

बच्चों की शिक्षा, घर खरीदना और यहां तक ​​कि छुट्टियों पर जाना जैसे सभी बड़े खर्च एक नियोजित व्यय है।

वे कर्ज लेने के बजाय अपने सपनों को पूरा करने के लिए छोटी-छोटी रकम निवेश करके संपत्ति बनाते हैं।
उनके पास आय के कई स्रोत हैं

वे किसी दिन अमीर बनने के लिए केवल अपनी नौकरी पर निर्भर नहीं रहते। वे छोटे पूरक स्रोत स्थापित करके अपनी आय में विविधता लाते हैं। कुछ के पास पारंपरिक स्रोत हैं जैसे शेयर बाजार से रिटर्न या किराया, अन्य के पास अधिक सहस्राब्दी तरीके हैं जैसे अंशकालिक रनिंग कोच या फूड ब्लॉगर होना।

वे टैक्स प्लानिंग को बहुत गंभीरता से लेते हैं

टैक्स आपकी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ले लेता है। इसके लिए योजना बनाने से उस काटने के आकार को कम करने में मदद मिल सकती है। आपको ऐसा कोई बनिया कभी नहीं मिलेगा जो टैक्स सेविंग फंड में ईमानदारी से निवेश न करता हो।

उनमें से सभी शेयर बाज़ार में नहीं खेलते

हालाँकि उनमें से अधिकांश की शेयर बाज़ार में रुचि है, लेकिन उनमें से सभी अपनी संपत्ति को शेयरों के पीछे लगाने में रुचि नहीं रखते हैं। कुछ लोग म्यूचुअल फंड या एफडी जैसे सुरक्षित विकल्प चुनते हैं।

अम्बानी और बंसल का राज अब आपका है.

मनीष कोठारी द्वारा लिखित, सीईओ ज़ेडफंड्स

पितृ-पक्ष और मारवाड़ी अग्रवाल सेठ

पितृ-पक्ष और मारवाड़ी अग्रवाल सेठ

इस जमाने में भी जो समझदार हैं एवं उनकी श्राद्धक्रिया नहीं होती वे पितृलोक में नहीं, प्रेतलोक में जाते हैं। वे प्रेतलोक में गये हुए समझदार लोग समय लेकर अपने समझदार संबंधियों अथवा धार्मिक लोगों को आकर प्रेरणा देते हैं किः "हमारा श्राद्ध करो ताकि हमारी सदगति हो।"

राजस्थान में कस्तूरचंद गड़ोदिया एक बड़े मारवाड़ी अग्रवाल सेठ थे । उनकी गणना बड़े-बड़े धनाढयों में होती है। उनके कुटुम्बियों में किसी का स्वर्गवास हो गया। गड़ोदिया फर्म के कन्हैयालालजी गया जी में उनका श्राद्ध करने गये, तब उन्हे वहाँ एक प्रेतात्मा दिखी। उस प्रेतात्मा ने कहाः "मैं राजस्थान में आपके ही गाँव का हूँ, लेकिन मेरे कुटुम्बियों ने मेरी उत्तरक्रिया नहीं की है, इसलिए मैं भटक रहा हूँ। आप कन्हैयालाल गड़ोदिया सेठ !अपने कुटुम्बों का श्राद्ध करने के लिए आये हैं तो कृपा करके मेरे निमित्त भी आप श्राद्ध कर दीजिए। मैं आपके गाँव का हूँ, मेरा हजाम का धंधा था और मोहन नाई मेरा नाम है।"

कन्हैयालाल जी को तो पता नहीं था कि उनके गाँव का कौन सा नाई था लेकिन उन्होंने उस नाई के निमित्त श्राद्ध कर दिया। राजस्थान वापस आये तो उन्होंने जाँच करवायी तब उन्हें पता चला कि थोड़े से वर्ष पूर्व ही कोई जवान मर गया था वह मोहन नाई था।

ऐसे ही एक बार एक पारसी प्रेतात्मा ने आकर हनुमान प्रसाद पोद्दार से प्रार्थना की किः "हमारे धर्म में तो श्राद्ध को नहीं मानते परन्तु मेरी जीवात्मा प्रेत के रूप में भटक रही है। आप कृपा करके हमारे उद्धार के लिए कुछ करें।"
हनुमान प्रसाद पोद्दार ने उस प्रेतात्मा के निमित्त श्राद्ध किया तो उसका उद्धार हो गया एवं उसने प्रभात काल में प्रसन्नवदन उनका अभिवादन किया कि मेरी सदगति हुई।

श्राद्धकर्म करने वालों में कृतज्ञता के संस्कार सहज में दृढ़ होते हैं जो शरीर की मौत के बाद भी कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं। श्राद्धकर्म से देवता और पितर तृप्त होते हैं और श्राद्ध करनेवाले का अंतःकरण भी तृप्ति-संतुष्टि का अनुभव करता है। बूढ़े-बुजुर्गों ने आपकी उन्नति के लिए बहुत कुछ किया है तो उनकी सदगति के लिए आप भी कुछ करेंगे तो आपके हृदय में भी तृप्ति-संतुष्टि का अनुभव होगा।

औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर दिया था तब शाहजहाँ ने अपने बेटे को लिख भेजाः "धन्य हैं हिन्दू जो अपने मृतक माता-पिता को भी खीर और हलुए-पूरी से तृप्त करते हैं और तू जिन्दे बाप को भी एक पानी की मटकी तक नहीं दे सकता? तुझसे तो वे हिन्दू अच्छे, जो मृतक माता-पिता की भी सेवा कर लेते हैं।"
भारतीय संस्कृति अपने माता-पिता या कुटुम्ब-परिवार का ही हित नहीं, अपने समाज और देश का ही हित नहीं वरन् पूरे विश्व का हित चाहती है।

साभार : prakhar agrawal

क्यों मारवाड़ी बनिया एक सफल व्यापारी बन जाता है?

क्यों मारवाड़ी बनिया एक सफल व्यापारी बन जाता है?

परिवर्तन संसार का नियम है और इसका कोई अपवाद नहीं है. हर अगली पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी पुरानी, दकियानूसी, पुरातनपंथी और अविकसित नजर आती है और इसी कारण हर अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की व्यवस्थाओं को बदल देती है और नयी व्यवस्थाएं स्थापित करने का प्रयास करती है. इसी प्रक्रिया में कई परम्पराएं लुप्त हो जाती है और फिर हम चाह कर भी उनको नहीं सहेज सकते हैं. ऐसी ही एक व्यवस्था है मारवाड़ी प्रबंधन शैली. नयी पीढ़ी ने पाश्चात्य शिक्षा को अपना लिया है और वे अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी संकोच करते हैं. जो मारवाड़ी प्रबंध शैली अनेक वर्षों की गुलामी के बाद भी सलामत रह गयी वो आजादी के बाद उपेक्षा का शिकार हुई और कुछ ही दशकों में लुप्त हो गयी. सरकार या किसी भी प्रबंध संस्थान की तरफ से इस अद्भुत प्रबंध शैली को लिपिबद्ध करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए. भारतीय प्रबंध संस्थानों ने विदेशों की प्रबंध शैलियों को सीखने और समझने में अपना सारा समय लगा दिया और उन्ही प्रबंध शैलियों को आगे बढ़ावा दिया लेकिन इस अद्भुत प्रबंध शैली को हीन दृष्टि से देखा और उस उपहास के कारण ये व्यवस्था आज लुप्त हो चुकी है. आज का ये फैशन बन गया है की प्रबंध सीखना है तो अमेरिका की कुछ प्रबंध संस्थाओं में जाओ (वो संस्थाएं वाकई महान है) लेकिन अफ़सोस तो ये है की अद्भुत प्रबंध दक्षता रखने वाले मारवाड़ी अपनी नयी पीढ़ी को अपनी प्रबंध दक्षता सिखाने की बजाय इसी फैशन में बह कर विदेश से प्रशिक्षित करवा रहे हैं. आधुनिक शिक्षित लोगों ने ऐसा चश्मा पहना है की उनको भारतीय व्यवस्थाओं में अच्छाइयां ढूंढने से भी नहीं मिलती हैं - शायद उनको मेरे इस लेख में भी कुछ भी कम का न मिले. लेकिन १०० साल बाद पश्चिम से किसी ने भारत पर अध्ययन किया और फिर किसी ने पूछा की अद्भुत भारतीय व्यवस्थाओं को समूल नष्ट करने के लिए कौन जिम्मेदार है तो क्या जवाब देंगे ?

एक समय मारवाड़ी व्यावसायिक दक्षता पूरी दुनिया में अपनी अद्भुत पहचान स्थापित कर चुकी थी लेकिन आज ये कला लुप्त होने के कगार पर है. मारवाड़ी प्रबंध शैली दुनिया में कहीं पर भी पूरी तरह से लिखी हुई नहीं है और ये उन लोगों के साथ ही विदा हो गयी है जो लोग इस कला में मर्मज्ञ थे. लेकिन जैसे ही ये पूरी तरह लुप्त हो जायेगी - वैसे ही हमें अहसास होगा की एक बहुत ही शानदार प्रबंध व्यवस्था हमने खो दी है.

लुप्त हुई मारवाड़ी व्यवस्था का आज कोई जिक्र बेमानी है लेकिन फिर भी उनकी कुछ व्यवस्थाओं के बारे में मैं अवश्य जिक्र करना चाहूँगा: -

१. मौद्रिक प्रबंधन और ब्याज गणना की अद्भुत व्यवस्था : - मारवाड़ी प्रबंध व्यवस्था का आधार मौद्रिक गणना है और इसी कारण ब्याज को नियमित रूप से गिना जाता है जो की पैसे के समुचित सदुपयोग के लिए जरुरी है. फिल्मों में मारवाड़ी ब्याज पर बहुत ही उपहास और व्यंग्य नजर आते हैं लेकिन आज ये ही व्यवस्थाएं आधुनिक बैंकिंग संस्थाएं अपना रही है. बाल्यकाल से ही गणना (गणित) का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और इसी कारण बिना केलकुलेटर के भी कोई भी व्यक्ति दशमलव अंकों की गुना-भाग भी आसानी से कर लिया करते थे और गणना में छोटी से छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी.

२. जीवन पर्यन्त की प्रबंध कारिणी - यानी मुनीम व्यवस्था: मारवाड़ी व्यवस्था में मुनीम को बहुत ही अधिक महत्त्व दिया जाता था. मुनीम को आधुनिक व्यवस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के सामान इज्जत और सम्मान दिया जाता था और उसके ऊपर पूरा विश्वास किया जाता था. उसको पारिवारिक सदस्य की तरह सम्मान मिलता था. उसको जीवन पर्यन्त के लिए व्यवसाय का प्रबंधक नियुक्त कर दिया जाता था. उसके परिवार की जिम्मेदारियां भी उठाई जाती थी ताकि उसके परिवार को कोई परेशानी न हो.

३. पड़ता व्यवस्था : मारवाड़ी निर्णय का आधार पड़ता यानी शुद्ध लाभ. शुद्ध लाभ की गणना का ये तरीका अद्भुत था. इसमें सिर्फ अस्थायी आय और अस्थायी खर्चों के आधार पर हर निर्णय से मिलने वाले शुद्ध लाभ या हानि पर चिंतन कर के ये निर्णय लिया जाता था की मूल्य क्या रखा जाए.

४. संसाधन बचत : मारवाड़ी अपने हर निर्णय में संसाधनों का कमसे कम इस्तेमाल कर के अधिक से अधिक बचत करने का प्रयास करते थे और इस प्रकार पर्यावरण की बचत में योगदान देते थे. मारवाड़ी एक दूसरे को चिठ्ठी भी लिखते थे तो उसमे कम से कम कागजों का इस्तेमाल करते हुए अधिक से अधिक जानकारियां प्रेषित करते थे.

५. बदला व्यवस्था: मारवाड़ी अपने सौदों को भविष्य में स्थानांतरित करने के लिए बदला व्यवस्था काम में लेते थे जिसके तहत सौदों को आगे की तारीख पर करने के लिए निश्चित दर से ब्याज की गणना होती थी. (ऐसी ही कुछ व्यवस्था विकसित करने के लिए दो अर्थशास्त्रियों को हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया लेकिन मारवाड़ियों की इस व्यवस्था को रोक दिया गया था)

६. हुंडी व्यवस्था: आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के शुरू होने से भी अनेक वर्ष पहले से मारवाड़ी व्यापारी हुंडी व्यवस्था को चलाते आ रहे हैं जिसको अंग्रेजों ने पूरी तरह से रोक दिया और फिर आजादी के बाद आधुनिक सरकार ने पूरी तरह से ख़तम कर दिया था. ये हुंडी व्यवस्था आज की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से कम लागत पर मुद्रा के स्थानांतरण का माध्यम था जिसमे बिना तकनीक या बिना इंटरनेट के भी आज की तरह ही एक जगह से दूसरी जगह पर मुद्रा का आदान प्रदान होता था.

७. पर्यावरण अनुकूल निर्णय: मारवाड़ी हमेशा पर्यावरण अनुकूल निर्णय लिया करते थे - जिसमे वे स्थानीय पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए बिना ही व्यापार और व्यवसाय को बढ़ावा देने का प्रयास करते थे.

८. धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना : व्यापार शुरू करने से पहले वे मंदिर बनाते थे और शुभ - लाभ लिखते थे. शुभ यानी हर व्यक्ति का कल्याण लाभ से पहले लिखते थे ताकि हर निर्णय को सबके कल्याण के लिए ले सकें. हर निर्णय को धर्म - और अध्यात्म के आधार पर जांचा जाता था. तकनीक के देवता विश्वकर्मा की पूजा की जाती थी तो धन के देवता गणेश और लक्ष्मी को आराध्य माना जाता था. सभी निर्णय सिद्धांतों पर आधारित होते थे और सबसे बड़ा सिद्धांत ये था की जो भी निर्णय हो वो जीवन को जन-कल्याण और आत्मकल्याण की तरफ ले जाए. जीवन का मकसद था केवलयज्ञान की तरफ जाना और इसी लिए हर निर्णय को पुण्य का अवसर के रूप में देखा जाता था और पाप से बचने के प्रयास किये जाते थे. ऐसी तकनीक नहीं अपनायी जाती थी जिससे जीवों का नाश हो. शुरुआत करते समय से ही सकल भ्रमांड के कल्याण को आदर्श के रूप में रखा जाता था.

९. देवों को अर्पण : - हर व्यापारिक निर्णय श्री गणेश और रिद्धि सिद्धी की आराधना के बाद किया जाता है. श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है. आय का कुछ हिस्सा देवों को अर्पित कर दिया जाता था जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण के काम में आता था. व्यापार की आम्दानी का कुछ भाग गोशाला या ऐसी ही अन्य किसी संस्था को देने से ये माना जाता था की देवताओं का हिस्सा उनको अर्पित कर दिया गया है. प्राचीन भारत में इसी कारण मंदिरों में प्रचुर संपति दान में आती थी जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण हेतु अर्पित की जाती थी.

१०. गद्दियों की व्यवस्था: आधुनिक तड़क भड़क की जगह मारवाड़ी अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों में गद्दियों की व्यस्था रखते थे जो बहुत ही आरामदायक, आत्मीयता पूर्ण और स्वच्छता पर आधारित माहौल बनाती थी. ये मेहमानों के ढहरने के लिए भी काम आती थी. किसी मेहमान को जरुरत के समय इन्हीं गद्दियों में रुकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाती थी ताकि अनावश्यक होटल का खर्च भी नहीं होता था. आधुनिक एयर कंडीशन ऑफिसों से तुलना करके पर्यावरण के ज्यादा अनुकूल क्या है ये आप स्वयं तय कर सकते हैं.

११. बचत और उत्पादकता पर जोर : मारवाड़ी व्यवस्था में बचत और उत्पादकता पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था और इसी कारण विषम परिस्थितियों में भी मारवाड़ियों ने व्यापार कर के अपने आप को सफल बनाया. आधुनिक कंपनियों की जगह पर मारवाड़ियों ने बचत और उत्पादकता के क्षेत्र में शानदार कार्य किया और वैश्विक व्यापार स्थापित किया. रविवार की जगह पर अमावस्या की छुट्टी होती थी (यानि महीने में सिर्फ एक दिन की छुट्टी) - लेकिन सामान्य दिनों में भी कार्य के घंटे बहुत ज्यादा होते थे - लेकिन हर कर्मचारी को साल में एक महीने अपने गांव जाने की छुट्टी दी जाती थी.

१२. जरुरत पड़ने पर राज्य की मदद: - मारवाड़ी व्यवसायी उस समय के राजा की जरुरत के समय आर्थिक मदद किया करते थे और इसी कारन अनेक शहरों में मारवाड़ी व्यापारियों को नगर-शेठ की उपाधि दी जाती थी. कई बार देश हित में व्यापार और उद्यम की बलि भी चढ़ा दी जाती थी.

१३. स्थानीय लोगों की भागीदारी: मारवाड़ी जहाँ पर भी व्यापार करने के लिए जाते थे वहां के स्थानीय लोगों को अपने व्यापार और उद्योगों से लाभान्वित करने का प्रयास करते थे और इसी कारण उनको स्थानीय लोगों से पर्याप्त सहयोग और सम्मान मिलता था.

१४. शांतिपूर्ण ढंग से विरोध को सहना : मारवाड़ियों को अन्य भारतियों की तरह सत्ता पक्ष से विरोध का समना करना पड़ा. डाकुओं, लुटेरों और अनेक अधिकारियों को मारवाड़ी सरल लक्ष्य नजर आते थे जिन पर वे अपने अत्याचार आसानी से कर लेते थे. सत्ताधारी उनसे मनमाना टैक्स वसूलते थे. ब्याज की सूक्ष्म गणना किसी को भी अच्छी नहीं लगती थी. लोग मारवाड़ियों से पैसे तो उधार लेना चाहते थे लेकिन ब्याज नहीं देना चाहते थे लेकिन मारवाड़ियों की सफलता का आधार ही उनकी सूक्ष्म गणना थी जिस के कारण वे पैसे के सही इस्तेमाल पर जोर देते थे. अंग्रेजों और उनके इतिहासकारों ने मारवाड़ियों को सूदखोर के रूप में स्थापित किया क्योंकि अंग्रेजों को मारवाड़ियों की व्यवस्था बैंकिंग व्यवस्था से बेहतर नजर आयी और वे आधुनिक बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए मारवाड़ियों को हटाना चाहते थे - जबकि मारवाड़ी खुद बैंकिंग व्यवस्था के समर्थक थे और बैंकें भी मारवाड़ियों की तरह चक्रवर्ती ब्याज लेती थी. मारवाड़ी किसानों को जरुरत के समय पर ऋण प्रदान करदेते थे और इसी कारण अनेक वर्षों से मारवाड़ियों ने किसानों के साथ मिल कर हर जगह पर कृषि को सफल बनाने में योगदान दिया था लेकिन ये आधुनिक व्यवस्था में नकारात्मकता के माहौल में तब्दील हो गया. अंग्रेजों के बाद में आधुनिक भारत में मारवाड़ियों के योगदान और उद्यमिता को पूरी तरह से विरोध का सामना करना पड़ा और उसी के कारण मारवाड़ियों ने परम्परागत व्यवस्थाओं को बदल दिया और नयी प्रोफेशनल प्रबंधन पर आधारित व्यवस्थाओं को अपना लिया ताकि उनका विरोध न हो. आधुनिक मीडिया द्वारा मारवाड़ियों का पूरी तरह से नकारात्मक चित्रण हुआ और इस प्रकार उनकी उद्यमिता को लगाम लग गयी. मारवाड़ियों की नयी पीढ़ी अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी हिचकिचाने लगी.

१५. सामाजिक उद्यमिता : मारवाड़ी उद्यमी अपनी आय में से कुछ राशि बचा कर के समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी क्रम में उन्होंने प्याऊ, गोशालाएं, मंदिर, शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल और धर्मशालाओं का निर्माण किया. उनके प्रयासों से राजस्थान में विकट परिस्थितियों में भी लोगों को रहने में दिक्कत नहीं आयी. आजादी से पहले अनेक शिक्षण संस्थाएं मारवाड़ियों ने इस प्रकार स्थापित की ताकि भारतीय संस्कृति भी सलामत रहे और युवा पीढ़ी भी शिक्षित हो सके.

१६. विपणन की व्यक्तिगत शैली: - आधुनिक विज्ञापन आधारित व्यवस्था की जगह पर मारवाड़ी व्यवसायी व्यक्तिगत संपर्क और व्यक्तिगत सेवा पर आधारित विपणन व्यवस्था अपनाते थे जिसमे एक व्यक्ति को ग्राहक बनाने के बाद पूरी जिंदगी उसकी जरूरतों के अनुसार उत्पाद उसको प्रदान करते थे. व्यापारिक रिश्तों को पूरी जिंदगी निभाया जाता था और व्यापारिक सम्बन्ध मधुर व्यवहार, वैयक्तिक संबंधों और आपसी विश्वास पर आधारित होते थे. "अच्छी नियत" के आधार पर ही सारे निर्णय लिए जाते थे ताकि पूरी जिंदगी व्यापारिक सम्बन्ध बना रहे और इसी लिए आपसे मेलजोल, जमाखर्च, लेनदेन और आपसी खातों के मिलान पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था.

१७ दीर्धजीवी उत्पाद : मारवाड़ी ऐसे उत्पाद विकसित करते थे जो दीर्ध समय तक सलामत रह सके और इस प्रकार निवेश करते थे ताकि दीर्ध काल तक कोई दिक्कत न आये. आधुनिक कम्पनियाँ ऐसे उत्पाद बनाती है जो अलप काल में ही नष्ट हो जाएं. वे पैकेजिंग और विज्ञापन पर अत्यधिक अपव्यय करती है लेकिन मारवाड़ी लोग इस प्रकार के अपव्यय को बचाते थे.

१८. साख पर बल: मारवाड़ी अपने व्यापर में साख बनाने पर सबसे अधिक जोर देते थे और साख पर किसी भी हालत में आंच नहीं आने देते थे. इसी कारण "गुडविल" शब्द के आने से बहुत पहले से साख और "नाम" जैसे शब्द मारवाड़ी व्यापारिक जगत में काम आते थे.

१९. कार्य विभाजन व् युवाओं को मार्गदर्शन : मारवाड़ी व्यापर में बुजुर्ग लोग नीतिगत निर्णय लेते हैं लेकिन युवा रोज का काम देखते हैं - अतः इस प्रकार सभी लोगों में काम बंटे रहते थे और आपसी तालमेल भी बना रहता था. सबसे बड़ा पुरुष व्यक्ति करता कहलता था और वो सभी नीतिगत निर्णय लेता था. परिवार के युवा उससे मार्गदर्शन ले कर रोजमर्रा के निर्णय लेते थे और उसको एक एक पैसे का हिसाब देते थे. पुरे घर में एक ही रसोई होती थी और अन्न का एक दाना भी व्यर्थ में नहीं बहाया जाता था. अन्न का सबसे पहला टुकड़ा गाय, फिर अन्य प्रमुख जानवरों जैसे कुत्तों आदि के लिए निकला जाता था और फिर घर के लोग खाना कहते थे. भोजन सामान्य लेकिन होता था लेकिन बड़े प्यार से मिल कर खाने में अलग ही आनंद होता था. थाली में एक भी दाना व्यर्थ नहीं छोड़ा जाता था. थाली में सबसे पहले कर्ता भोजन की शुरुआत कर्ता था और आखिर में भी वो ये ही देखता की कोई भी भूखा नहीं रह गया है और सबसे आखिरी दाना (अगर कुछ बच जाए) गृह स्वामिनी उठाती थी. आज की बड़ी कंपनियों की पांच सितारा संस्कृति की तुलना में बहुत कम भोजन व्यर्थ जाता था. भोजन के समय ही अच्छे उद्यमियों और अच्छे सामाजिक आदर्शों का वृत्तांत सुनाया जाता था जो युवाओं को श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए प्रेरित करता था. ऐसा माना जाता था की साथ में भोजन करने से आपसी प्रेम बढ़ता है. साल में कम से कम एक बार पूरा परिवार तीर्थयात्रा के लिए या सत्संग के लिए जाता था जो परिवार के लोगों को जीवन मूल्यों से जोड़ देता था. व्यवसाय का केंद्र परिवार था - परिवार का आपसी प्रेम व्यापारिक संबंधों में भी परिलक्षित होता था.

२०. प्रेम भरा संवाद : मारवाड़ी लोगों ने अनेक व्यवस्थाएं की थी जिनमे आपसी मधुर संवाद हो सके. सब पुरुष लोग एक साथ एक ही थाली में भोजन करते थे और सब महिलायें एक साथ एक ही थाली में भोजन करती थी. इस प्रकार भोजन के दौरान आपस में मधुर संवाद स्थापित हो जाता था. रात्रि में युवा वर्ग बुजुर्गों के पैर दबाता था और उसी दौरान बुजुर्ग लोग युवाओं को व्यापारिक सीख भी दिया करते थे और दिन भर के समाचार भी पूछ लेते थे. उसी समय वे उनको व्यावसायिक नीतियों और परम्पराओं की शिक्षा भी प्रदान करते थे. इसी प्रकार मारवाड़ी उद्यमी अपने कर्मचारियों से भी प्रेम से बात करते थे और इस प्रकार एक सौहार्द-पूर्ण माहौल बनाया करते थे.

२१. सुव्यवस्थित खाते और सुव्यवस्थित वार्षिक विवरण : - मारवाड़ी उद्यमी दिवाली से दिवाली अपने व्यापार के बही - खाते रखते थे. बहीखाते बहुत ही सुन्दर अक्षरों में लिखे जाते थे जिनमे कभी भी कोई त्रुटि नहीं होती थी. हर विवरण बहुत ही सहेज कर रखा जाता था. हर दिवाली को नयी पुस्तकों में खाते - बही की पूजा कर के शुरुआत की जाती थी. हर खाता पूरी तरह से व्यवस्थित होता था. उस जमाने में कम्प्यूटर नहीं था अतः सारे खाते वर्षों तक सुरक्षित रखे जाते थे.

पूरी दुनिया जानती है किस प्रकार बजाज, बिरला, सिंघानिया, पीरामल, लोहिया, दुगड़, गोलछा, संघवी, मित्तल, पोद्दार, रुइया, और बियानी आदि घराने अपने व्यापारिक कौशल से आगे बढे हैं. बिरला समूह तो इस बात के लिए जाना जाता है की वो फैक्ट्री बाद में लगाता है - पहले वहां लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनाता है, लोगों को रहने के लिए मकान देता है और फिर फैक्ट्री लगाता है. है न अद्भुत बात. भामाशाह ने राणा प्रताप को दिल खोल कर मदद की तो जमनालाल बजाज ने गाँधी जी को दिल खोल कर मदद की. इन्हीं नीतियों के कारण अंग्रेजों के आने से पहले भारत में लाखों गुरुकुल, उपासरे, पोशालाएँ, धर्मशालाएं, भोजनशलायें कार्यरत थी और उस समय की शिक्षा मूल्य परक थी. उस समय में हर घर में श्रवण कुमार जैसे पुत्र होते थे जो अपने व्यापार से ज्यादा अपने माँ - बाप और देश की सेवा को तबज्जु देते थे. मारवाड़ी व्यवस्था में कमियां निकालना बहुत आसान है लेकिन उसकी जो अच्छाइयां हैं उनको अगर आज का उद्यमी अपनाता है तो वो निश्चित रूप से पर्यावरण के अनुकूल प्रबंध व्यवस्था स्थापित कर पायेगा और इससे उसका और इस दुनिया का दोनों का भला ही होगा. लेकिन लुप्त हो रही इस व्यवस्था से सीखना और इसको आगे बचाना अब तो मुश्किल ही है. अमेरिका की आधुनिक प्रबंध शिक्षा हो सकता है अधिक आर्थिक सफलता प्रदान कर दे लेकिन जो सुकून और पर्यावरण से जो जुड़ाव भारतीय व्यवस्थाओं ने स्थापित किया था वो तो अब लुप्त ही हो गया है और इसके लिए वर्तमान पीढ़ी ही जिम्मेदार है.

Friday, February 9, 2024

KULDEVI MATAJI OF MAHESHWARI VAISHYA

KULDEVI MATA JI  OF #MAHESHWARI VAISHYA

1. Nausar Mata(Ajmera Kaner),Dist.Chittodgad, 5 kms from Ajmer in Pushkar valley.

2. Asavari Mata(Asava, Kalya)New large temple in Ossia, 10 kms from Jaisalmer, at Didwanna, 12 kms from Kiradu Barmer

3. Sachhiyay Mata(Mantri ,Attal, Karva, Kasat, Surjan, Daga, Damani, Karnani, Dhurya, Kela, Partani, Birla, Randar, Gandhi, Raiwal, Malu, Sarda, Kothari, Kanugo, Rathi, Ragdani, Dammani, Malani, Mutha, Lakhani, Phafat, Modi, Mohata, Sikchi, Lakotia, Biyani)At Ossia, 61 kms by bus and 61 kms by train from Jodhpur, on Jodhpur – Jaisalmer broad guage Railway line. Can also be reached from Bikaner via Faloudi

4. Bhaisad mata(Agiwal)At Pada Mata Didwana

5. Aamal Mata (Kakani) Mandesar Udaipur, village Riched, Tehsil Kumbhalgad, Dist. Rajsamand. Can be reached from Ajmer to Udaipur road via Charbhuja. From Jodhpur on road to Kumbhlagad

6. Likasan Mata (Kahalya, Dhoot) At Choti Khatu, Village Likasan, Dist. Nagaur (abt 6-7 Kms far from Nagaur) From Didwana 18 kms, from Choti Khatu 4 miles east)
7. Chavada Mata(Kalantri, Kalani, Gattani, Tavri, Pallod, Bhansali, Modani, Lahoti, Bhattad)In between Medta City and Medta Road. Also in Chamunda village, Dist Jodhpur near Keru. Also in between Pushkar – Ajmer. A temple is also in Jodhpur fort.

8. Pattaya Mata(Kachaulya, Gagrani, Devpura, Naulakha, Bidada)At Didwana

9. Susmaad Mata(Kabra)At Ganpat Singh, Madan Singh Sisodiya, Peula marg, KUCHERA (Nagaur) abt 1.5 kms near kuchera in a field own by a rajput

10. Bandhar Mata (Gadeiya, Chapparwal, Somani, Marda) Located on the hillock at tanagaon, which is 10 kms from Mogargaon, on left hand side on the road leading to Aakola on Udaipur to Chitor Road . About 70 kms from Udaipur

11. Bhadrakali Mata (Daad, Porwal, Boob) Located in Mahakali Mandir at Hanumangadh (Bikaner), Gujarat

Hanumangarh was the kingdom of Bhati Rajputs and hence its earlier name was Bhatner. Later it was named Shardulgarh, when Raja Shardul Singh won it. Since it was won on Tuesday, which is the ominous day for Hindu God Hanuman, it was rechristened as 'Hanumangarh' - the Fort of Hanuman the Monkey-god. A 900-year-old Bhatner fort is situated in the middle of Hanumangarh Town, the description of which can be found in Aaine-Akbari. A famous Bhadrakali temple is situated near the town on the banks of Ghaggar river.
The area around Hanumangarh appears to be quite old. It has yielded a number of terracotta decorative tiles in the late Kushana Empire style along with a number of coins. Two terracotta capitals at the depth of 15' from the top of the mound with stepped pyramids along their edges have been discovered.

Bhadrakali Mela: The historical temple of Maa Bhadrakali is situated 7 km from the district headquarters. The sixth king of Bikaner, Maharaja Ram Singh, is said to have constructed this temple on Badshah Akbar's desire. Pilgrims visit the temple throughout the year, but during the Mela days on Chaitra Sudi 8 and 9, thousands of pilgrims from Punjab, Haryana, and Rajasthan visit the temple to worship Maa Bhadrakali.

12. Ashapura Mata (Taparia, Chandak, Patwa, Bhaiya) Located near the lake in Peepal gaon which is abt 4 miles awayPerlaad, which is turn is 14 mils from Ashapur (Uadipur). There is a temple in Nadol, Pali District. An ancient temple is near Asani Fort
13. Daghvant Mata(Chechani, Dayma, Bharadia)Located in Kirna Saria village, near Manglore village in Nagaur district, about 6 miles from Rolegaon

14. Falodhi Mata(Jaju, Dhupad, Heda)Located in Medta Road (Naguar) inside Shri Falaudi Brahmani Maneshwari Temple, west of Ramganj Station

15. Sisnay Mata(Jakhotia)Mandalgaon (Bhilwada)

16. Khunkhar Mata(Toshniwal, Totla, Modi)Village. Toshni, Dist. Nagaur. Khokhari mata temple located in Tivari, about 22 kms norty of Jodhpur

17. Naganechi Mata(Dargad, Bhandari)At Negadia, Nathara, Udapura, Bikaner

18. Shamal Mata(Lohia)Located at Petaran Patti. Can be reached via Byawar

19. Dharjal Mata (Navdhar) At Pokharan, Dist. Jaisalmer

20. Gayal Mata (Bajaj, Lahoti (Sanvad), Jhavar) Located at Aasop, abt 40 kms from Medata city via Goran on Jodhpur Road. The diety was found in Paldhi near Jalgaon
21. Mundal Mata(Mundada)At Mundiyad village, in Mundhiwad, 28 miles from Nagaur

22. Sandal Mata, Dhut Mata (Baheti)At Ramgad, Kiralsariya

23. Jasal Mata (Jasol Mata) (Innani, Indani, Inani)At Jasol on the way to Jodhpur to Osian and before Khimsar (Jakhan) Khivsar.(4 Kms from Nakoda ji) Jasol S.O Post Office - Pin code 344024

VAISHYA KUMAR SKANDGUPTA - वैश्य कुमार स्कन्दगुप्त का भारत

#VAISHYA KUMAR SKANDGUPTA - वैश्य कुमार स्कन्दगुप्त का भारत

हूण जाति की नृशंसता इतनी थी कि चीन से लेकर महान रोमन साम्राज्य तक काँप उठे थे। इस अकेली बर्बर जाति का आतंक इतना था कि उसने उस समय के किसी भी बड़े साम्राज्य को रौंदे बिना नहीं छोड़ा।

चीन का विशाल साम्राज्य तो इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने हूणों से लड़ने का विचार ही छोड़ दिया और रक्षात्मक होकर खुद को ऊँचे ऊँचे सैकड़ों किलोमीटर की दीवार से घेर लिया। जब चीन आत्मसमर्पित हुआ तो ये हूण अपनी एक टुकड़ी के साथ यूरोप की ओर दौड़ पड़ा। "आटिला" नाम के उसके सेनापति ने पोलैंड को मिट्टी में मिला दिया फिर एक एक कर यूरोप के बाकी देशों में खून की नदियाँ बहा दी। इन हूणों के कारण विशाल रोमन साम्राज्य मिट्टी में मिल गया तो इस विजयोन्माद में उन हूणों की टुकड़ी ने भारत का भी रुख किया और गांधार प्रदेश पहुँच गये।

वहां विजय प्राप्त कर जब वो सिंध को निगलने आगे बढ़े तो वहां उसे रोकने के लिए वैदिक सूर्य कुमारगुप्त का महान प्रतापी राज्य खड़ा था। कुमारगुप्त ने इन बर्बर हूणों के समूल नाश के लिए किसी और सेनापति को न भेजकर अपने पुत्र राजकुमार स्कंद को भेजा। हूणों की विशाल और बर्बर टोली को स्कंद ने रौंद दिया और जन वो हूणजयी होकर पाटलिपुत्र लौटे तो वहां उनके स्वागत में वृद्ध पिता कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया। फिर कुमारगुप्त के स्वर्गवासी होने के बाद स्कंद भारत के सम्राट बने।

स्कंद के शासन के उत्तरार्ध में हूणों ने फिर से अपनी शक्ति संकलित की और "खिंखिल" नाम के सेनापति के नेतृत्व में फिर से भारत पर हमलावर हो गया। भारत की सेना शुरुआत में जब परास्त होने लगी तो स्कंद स्वयं ही सेना का संचालन करने पश्चिम भारत की ओर चल पड़े। उधर वो युद्ध में हूणों से जूझ रहे थे और इधर उनके धूर्त भाई पुरुगुप्त ने सत्ता पर छल से कब्जा कर लिया।

सत्ता हड़पे जाने की सूचना महाराज स्कंद को पहुँचा तो उनके सामने दो रास्ते थे। एक था कि वापस जाकर अपने सौतेले भाई से वापस सत्ता छीन लें और दूसरा ये कि हूणों को युद्ध में धूल चटाये। महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद ने दूसरा विकल्प चुना और युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुये।

दूसरा विकल्प इसलिये चुना क्योंकि अगर वो सत्ता की सोचते और लौट जाते तो बर्बर हूणों के कारण न जाने कितने लोगों को अपनी जान देनी पड़ती, न जाने कितनी ललनाओं की इज़्ज़त लूटी जाती और न जाने कितने देवालय टूटते।
 
पहले अपनी सत्ता और फिर अपने प्राण की बलि देकर स्कंद ने सबको बचा लिया और मृत्यु पाकर अमर हो गये। पाटलिपुत्र का महान वैभवशाली सम्राट अपनी राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर पंजाब में बलिदान हुये पर बलिदान होने से पहले उन्होंने हूण सेनापति "खिंखिल" को भारत की सीमा से मीलों दूर खदेड़ दिया और धर्म तथा राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की।

स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र उन सबके लिए पाथेय है जो सत्ता को सब कुछ समझते हुये राष्ट्र और धर्म की सुरक्षा से मुँह मोड़ लेते हैं पर दुर्भाग्य कि भारत में किसी ने इतिहास से न तो कभी कुछ सीखा और न सीखेंगे। और ये हो भी क्यों न क्योंकि आज भारत में कितने हैं जिन्हें महान सम्राट स्कंद की ये गाथा याद है और अगर नहीं है तो फिर किसी और से ये उम्मीद करना कि उनका चरित्र स्कंद के चरित्र का अनुगमन करेगा हास्यास्पद ही हैं।

Wednesday, February 7, 2024

VAISHYA SAMAJ एक विशेष बात.....आपके साथ!

#VAISHYA SAMAJ एक  विशेष बात.....आपके साथ!

दानवीर भामाशाह के बारे में हम सभी लोग जानते हैं.... राष्ट्र के निर्माण में और देश की व्यवस्था के संचालन में वैश्य समाज की एक बड़ी भूमिका रही है... आज भी है!

* वैश्य समाज सबसे ज्यादा.... सरकार को राजस्व देता है!

* वैश्य समाज सबसे ज्यादा राजनीति और सामाजिक कार्य में आर्थिक योगदान करता है!

* वैश्य समाज सबसे ज्यादा धार्मिक क्रियाकलाप ( मंदिर निर्माण से लेकर भंडारा का आयोजन तक) और कार्यक्रम में आर्थिक सहयोग करता है!

* वैश्य समाज ब्लड डोनेशन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है!

* वैश्य समाज प्राकृतिक आपदा हो या सामाजिक समस्या इसमें भी तन- मन -धन से सहयोग करता है!

*लेकिन.... सरकार( सत्ता) में वैश्य समाज की हिस्सेदारी क्या

है?

* वैश्य समाज के प्रति समाज में सोच क्या है?

* वैश्य समाज सबसे ज्यादा अपराध का शिकार होता है!

* वैश्य समाज सबसे ज्यादा उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार होता है....

SATYAM SURANA A BRAVE INDIAN

#SATYAM SURANA A BRAVE INDIAN - WHO SAVED TRICOLOR FROM KHALISTANI

गोमूत्र छिड़के तिरंगे को उठाया और चूम लिया... खालिस्‍तानियों से झंडे की लाज बचाने वाले भारतीय ने बताई कहानी

who saved tricolour from khalistan supporter who poured cow urine at high commission of india in uk

लंदन: ब्रिटेन में 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती वाले दिन खालिस्तानी चरमपंथियों ने भारतीय दूतावास पर हमला किया था। इस दौरान उन्होंने तिरंगे का अपमान किया और उसमें आग लगा दी। इससे पहले प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन दल खालसा के नेता गुरुचरण सिंह ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज के ऊपर गाय का पेशाब डाला और उसे अपने पैरों तले रौंदने की कोशिश की। इस दौरान किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए बड़ी संख्या में ब्रिटिश पुलिस भी तैनात थी, लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। इस घटना का विरोध करने के लिए एख भारतीय नौजवान खड़ा हुआ और उसने हिंसक खालिस्तानियों से न सिर्फ तिरंगे को छीना, बल्कि उसकी लाज भी बचाई। इस घटना का एक वीडियो भी काफी वायरल हुआ था। अब उस बहादुर लड़के ने उस दिन की घटना को विस्तार से बताया है।


खालिस्तानियों से तिरंगे को किसने छीना

खालिस्तानी चरमपंथियों के कब्जे से तिरंगे को छीनने वाले लड़के का नाम सत्यम सुराणा है। महाराष्ट्र के पुणे का रहने वाला यह लड़का लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स का छात्र है। यह वही संस्था है, जो हाल में ही छात्रसंघ चुनावों में एक अन्य भारतीय छात्र करण कटारिया के साथ भेदभाव को लेकर सुर्खियों में आया था। कटारिया को उनके बीजेपी समर्थक झुकाव के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अब बात करते हैं, सत्यम सुराणा का, जो इस घटना के मात्र 17 दिन पहले ही लंदन पहुंचे थे। लेकिन, उन्होंने भारतीय दूतावास के सामने जो वीरता दिखाई, उसकी चर्चा अब पूरे हिंदुस्तान में हो रही है।

सत्यम ने 2 अक्टूबर वाली घटना पर क्या कहा
फर्स्टपोस्ट को दिए इंटरव्यू में सत्यम सुराणा ने कबा कि मुझे सचमुच खुशी है कि लोगों को मुझ पर गर्व है। यह तिरंगा ही है जो हम सबको, पूरे भारत को एक साथ लाता है। मैंने बस अपना कर्तव्य निभाया। मैंने बस झंडा उठाया और चला गया। मुझे यहां जो मैसेज मिल रहे हैं और जो प्रतिक्रिया मिल रही है वह अभिभूत करने वाली है। मैं ऐसा करके बहुत खुश हूं। उन्होंने बताया कि उस दिन मुझे मैसेज मिला कि भारतीय उच्चायोग के बाहर किसी तरह का विरोध प्रदर्शन हो रहा है। बात यह थी कि भारतीय उच्चायोग ने एक छात्र पंजीकरण अभियान आयोजित किया था और मैं अपने कॉलेज में इस आउटरीच में उनकी मदद कर रहा था। मैं कॉलेज में लेक्चर खत्म होने के बाद वहां गया। मैंने लगभग 500 लोगों की भीड़ देखी।

तिरंगे का अपमान कर रहे थे खालिस्तानी

सत्यम ने बताया कि भारतीय दूतावास के सामने लगभग 50-16 लोग नकाब पहने हुए थे। खालिस्तानी हमारे प्रधानमंत्री और उच्चायुक्त दोरईस्वामी के पुतले का अपमान कर रहे थे। वे सिर्फ खालिस्तान समर्थक नारे लगा रहे थे और हिंदू विरोधी नफरत फैला रहे थे। उन्होंने कहा कि जब वे खालिस्तान के लिए चिल्ला रहे थे, तो यह स्पष्ट था कि वे एक विशेष पार्टी और विचारधारा को निशाना बना रहे थे। वे हिंदुत्व के खिलाफ हल्ला मचा रहे थे। पूरे विरोध प्रदर्शन के दौरान तिरंगे का अपमान किया जा रहा था। मैंने देखा कि लोगों ने हमारे राष्ट्रीय ध्वज को अपने पैरों में बांध रखा है। अपनी कारों में विरोध प्रदर्शन के लिए आने वाले लोगों ने तिरंगे को वाहनों की मिट्टी के फ्लैप पर बांध दिया था ताकि वह गंदा हो जाए और सड़क पर घसीटा जाए।

चुपचाप तिरंगा उठाया और पीछे लौट गया

उन्होंने बताया कि इस दौरान लगभग 8-10 लोगों का एक समूह था जो पुलिस घेरे के पीछे से चुपचाप दूतावास के सामने आ गया। उन्होंने तिरंगे को अपने पैरों तले रौंदा और बोतल में लाया हुआ गोमूत्र उस पर उड़ेल दिया। इसके बाद मैंने पीछे से झपट्टा मारा और उनसे तिरंगा खींच लिया। उस क्षण मुझे कोई डर नहीं लगा। मैं भूल गया कि वहां तीस चरमपंथियों की पूरी भीड़ थी। मुझे लगा कि यह तिरंगा नहीं, बल्कि मैं ही हूं जो उनके पैरों के नीचे वह अपमान सह रहा हूं।

पुलिस ने तिरंगे को सबूत के तौर पर कब्जे में लिया

सत्यम ने बताया कि मैंने इसकी बिल्कुल भी योजना नहीं बनाई थी। मुझे बस यह महसूस हुआ कि एक भारतीय होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि मैं अपने झंडे को अपनी सुरक्षा करूं और उसे संरक्षण में लूं। सत्यम ने कहा कि मैंने तिरंगे के मोड़ा, उसे अपने माथे से लगाया और वहां से चला गया। पुलिस ने मुझे भी भागने को कहा। ये खालिस्तानी उस वक्त समझ नहीं पाए कि क्या हुआ था। झंडा अब सबूत के तौर पर पुलिस की हिरासत में है।

THE GREAT AGRAWALS - क्या यहूदी ही एकमात्र प्रेरणा पुरुष हैं?

#THE GREAT #AGRAWALS - क्या यहूदी ही एकमात्र प्रेरणा पुरुष हैं? 

महाराजा अग्रसेन की राजधानी अग्रोहा (आधुनिक हिसार) का सेल्फी प्वाइंट.... हिसार के अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भी महाराजा अग्रसेन के नाम पर है... यहां अग्रसेन की मूर्ति, मंदिर चौक सब स्थापित हैं...

क्या यहूदी ही एकमात्र प्रेरणा पुरुष हैं?
 
'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'

ये बात उस ईश्वर ने कही थी जो लाखों साल पहले मानव रूप में इस धरती पर आया जिसने रावण की सोने की लंका को जीतने के बाद त्याग दिया और जन्मभूमि अयोध्या लौट आये। आज हमारे भारत साहित्यकार यहूदी जाती की तारीफ में कसीदें गाते हैं कि उन्होंने अपनी जन्मभूमि को कभी भूल नहीं उसके गीत गाते रहे - (यहूदियों ने चाहे वो देश के किसी भी कोने में रहे अपने पूर्वज डेविड की बसाई राजधानी येरुशलम को नहीं भूले।)
"यदि हम तुम्हें भूल जाएँ, ओ येरुशेलम, तो मेरा यह दाहिना हाथ मर जाये
यदि हम तुम्हें भूल जाएँ, तो मेरी यह जिह्वा झड़ जाये" (साम)
लेकिन सिर्फ यहूदी ही ऐसे नहीं थे बल्कि हमारे भारत के अग्रवाल समाज की भी यही व्यथा रही लेकिन अफसोस भारत के साहित्यकारों का ना तो इस ओर ध्यान है ना उन्होंने इसे पढ़ने की कोशिश की। उन्हें मल्लेछ यहूदियों के महिमामंडन स्वीकार है लेकिन अपने सनातनियों का नहीं..

अगर विश्व के शीर्ष उद्योगपतियों में यहूदी हैं तो भारत मे भी शीर्ष 10 उद्योगों में जिंदल और मित्तल अग्रवाल कुल से हैं। एशिया की सबसे अमीर महिला सावित्री जिंदल भी अग्रवाल हैं। भारत के तमाम आद्योगिक घराने बजाज, सिंघानिया, डालमिया, साहू जैन, गोयनका, मोदी, रुइया आदि से लेकर वर्तमान में ओला, जोमाटो, ओयो, फ्लिपकार्ट, लेंसकार्ट आदि स्टार्टअप्स अग्रवालों ने शुरू किए हैं.. यहूदियों की टेक्नोलॉजी और हथियारों की बात करने वालों ने भारत की सर्वश्रेष्ठ मिसाइल (अग्नि सीरीज) के जनक जयपुर के वैज्ञानिक राम नारायण अग्रवाल के बारे में जानने की कोशिश की क्या? भारत में भारतवंशियों द्वारा संचालित सर्वप्रथम बैंक बनाने का श्रेय लाला लाजपत राय अग्रवाल को जाता है। विश्व के सबसे बड़े स्टील एक्सपोर्टर भी मारवाड़ के लक्ष्मी निवास मित्तल हैं जिसके लिए उन्हें स्टील किंग कहा जाता है। यहूदियों को अगर अपना धर्म प्रिय हैं तो अग्रवालों ने भी मुस्लिम लीग के विरोध में हिन्दू महासभा बनाई, हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी प्रेस बनाई, रामजन्मभूमि को मुक्त कराया अशोक सिंघल ने या गौ माता और माँ गंगा के लिए बलिदान देने वाले रामकृष्ण डालमिया और स्वामी सानंद (प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल)
 
अग्रवाल जाती का इतिहास महाभारत कालीन आग्रेय गणराज्य से शुरू होता है। आग्रेय गणराज्य भारत की पश्चिमी सीमा में था जो भारत का मुख्य प्रवेश द्वार हैं जिसपर सदियों से विदेशी आक्रमण होते आये हैं। आग्रेय गणराज्य पर सिकंदर के आक्रमण की बात ग्रीक इतिहासकार M. C. Crindle ने दर्ज की है। भारतीय इतिहासकार महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने आग्रेय निवासियों को वीर यौद्धेयों का वंशज बताया है जिन्होंने सदियों तक विदेशी शकों, हुणों, यवनों और मल्लेछों से भारत भूमि की रक्षा की है। इतिहासकार स्वराजमणि अग्रवाल के अनुसार अग्रोहा पर शकों, हुणों, कुषाणों, सिकंदर, गौरी और अंतिम फ़िरोज़ शाह तुगलक का आक्रमण हुआ था। ASI के अनुसार अग्रोहा का अंतिम विध्वंस फ़िरोज़ शाह तुगलक ने किया था जिसने अग्रोहा के भग्नावशेषों से हिसार के फ़िरोजा का निर्माण किया।
 
शक, हूण, कुषाण, सिकंदर, गौरी, तुगलक से हमने वीरता पूर्वक कई युद्ध लड़े। कई बार उन्हें भारत भूमि से खदेड़ दिया कई बार खुद भी उजड़े। लेकिन बार बार उजड़ने के बाद भी हम अपनी मातृभूमि जिसे हमारे पूर्वज राजा अग्रसेन ने बसाया था कभी भूले नहीं। अग्रोहा कई बार उजड़ा लेकिन हमने उसे बार बार बसाया। अग्रोहा को पुनः बसाकर लोककथाओं में सेठ हरभज शाह अमर हो गए। अग्रोहा को अंतिम बार बसने का प्रयास पटियाला रियासत के यशस्वी दीवान नानूमल अग्रवाल ने किया था। दीवान नानूमल ने अपने सैन्य बल से दिल्ली के मुगल सम्राट के अधीनस्थ फतेहाबाद, सिरसा, हांसी और हिसार जैसे महत्वपूर्ण नगरों को पटियाला राज्य में सम्मिलित कर लिया l जब हिसार उनके आधिपत्य में आ गया तो उन्होंने अग्रोहा में एक किले का निर्माण कराया।
 
देश के मध्य भाग मध्यप्रदेश बैठे हुए अग्रवाल जैन श्रेष्ठियों के कई शिलालेख हैं जिन्होंने अपने नाम से पूर्व अग्रोतकान्वेय लिखा तो पूर्वांचल में बैठे हुए आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने भी अपनी उत्पत्ति अग्रोहा से बताई। दिल्ली के सरबान शिलालेख हों या गवालियर के किले पर लगे शिलालेख या ग्वालियर के जैन मंदिर या राजा हरसुख राय द्वारा बनवाये हुए जैन मंदिर या सुदूर पूर्व मेंकोलकाता का बेलगछिया मंदिर बनवाने वाले जैन श्रेष्ठि उन्होंने अपना परिचय अगरोताकांवय अमुक गोत्र करके दिया।
हमें भी यहूदियों की तरह कई बार अपनी मातृभूमि से उजाड़ना पड़ा लेकिन हम कभी अपनी जन्मभूमि अग्रोहा को भूले नहीं जो साम्यता हममें और यहूदियों दोनों में है। आधुनिक हिसार में जिंदल परिवार और लाला लाजपत राय जी के प्रयासों से बहुत विकास कार्य हुए हैं। वहाँ के मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल्स, धर्मशालाएं, मंदिर आदि बनाकर अग्रवालों ने हिसार को हरयाणा की स्टील सिटी और सबसे विकसित शहरों में से एक बना दिया है। वहाँ अग्रोहाधाम मंदिर और अग्रविभूति स्मारक आज भी अग्रयवंशीओं की अपनी मातृभूमि के आरती तड़प दिखाते हैं... अग्रवंशिओं ने पूरे भारत में जहाँ भी गए अग्रोहा नरेश महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा स्थापित की है ... उत्तर में जम्मू और उत्तराखंड के ऋषिकेश से लेकर दक्षिण के हैदराबाद और तमिल नाडु तक पश्चिम में हरायणा राजस्थान से लेकर पूर्व में असम और कोलकाता तक.. महाराजा अग्रसेन की प्रतिमाएं स्थापित हैं..
 
साभार - प्रखर अग्रवाल

BIRLA MANDIR BALIGANJ

#BIRLA MANDIR BALIGANJ

बालीगंज बिड़ला मंदिर भारत के कोलकाता में, उद्योगपति बिड़ला परिवार द्वारा निर्मित, आशुतोष चौधरी एवेन्यू, बालीगंज में स्थित एक हिन्दू मंदिर है । यह मंदिर भगवान राम और भगवान कृष्ण को समर्पित है।




मंदिर का निर्माण 1970 में शुरू हुआ था। पूरी संरचना को पूरा करने में 26 साल लगे। निर्माण की देखरेख सोमपुरस द्वारा की गई थी।

बुधवार, 21 फरवरी 1996 को प्रातः स्वामी चिदानन्दजी महाराज द्वारा प्राण प्रतिष्ठा की गयी। डॉ. कर्ण सिंह ने उसी दिन मंदिर का उद्घाटन किया।

बनियों_की_जैसी_दिलेरी_कहाँ

#बनियों_की_जैसी_दिलेरी_कहाँ

दिल्ली मे 'चाँदनी चौक' प्रसिद्ध गौरी शंकर मन्दिर है। ये लगभग 800 साल पुराना मन्दिर है। इसके बारे में कहते हैं जब क्रूर, बेरहम, औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का आदेश अपने सिपाहियों को दिया तो, ये बात वैश्य शिरोमणि सेठ #लाला_भागमल जी को पता चली, जो बहुत बड़े व्यापारी थे।



उन्होंने औरंगजेब की आंखों में आंखे डालकर ये कह दिया था कि तू अपना मुह खोल जितना खोल सकता है, बता तुझे कितना जजिया कर चाहिए?

औरंगजेब तू बस आवाज़ कर, लेकिन मन्दिर को कोई हाथ नही लगाएगा, मन्दिर की घण्टी बजनी बन्द नही होगी।

कहते है उस वक़्त औरंगजेब ने औसत जजिया कर से 100 गुना ज्यादा जजिया कर हर महीने मांगा था, ओर लाला भागमल जी ने हर महीने, बिना माथे पर शिकन आये जजिया कर औरंगजेब को भीख के रूप में दिया था, लेकिन लाला जी ने किसी भी आततायी को मन्दिर को छूने नही दिया।

आजतक मन्दिर की घण्टियाँ ज्यों की त्यों बजती है।

मैने कन्वर्ट मुस्लिमो में लगभग हर जाति को हिन्दू से मुस्लिम कन्वर्ट पाया है, लेकिन मुझे बनिया समाज के लोग कन्वर्ट आजतक नही मिले।

मैने देखा है, #वैश्य_समाज जहां भी जाकर बसते है, सबसे पहले वहां आसपास जितना जल्दी हो सके, एक भव्य मंदिर का निर्माण दिल खोलकर करते है।

महाराणा प्रताप जी भी जब महल छोड़कर जंगल चले गए थे, तो उन्हें नई सेना बनाने के लिए, हथियारों घोड़ो, हाथियों के लिए, अकबर से युद्ध के लिए नई सेना का गठन करना था, उस समय भी #वैश्य_समाज ने #हम सबके आदरणीय रहे, स्वर्गीय श्री भामाशाह जी ने अकूत धनराशि से महाराणा प्रताप जी को भरपूर सहयोग किया था।
ऐसे ये दो नही अनगिनत... अनगिनत... अनगिनत... किस्से है मेरे पास, जहां बनियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर करके अपने धर्म की रक्षा की हैं।

ओर बहुत से लोग इन्हें कंजूस कहकर इनका उपहास उड़ाते है, जो उपहास उड़ाते है, वो लोग उपहास उड़ाने से पहले, अपने गिरेबाँ में झांक कर, अपने त्याग और बनियों के त्याग में अंतर कर लेना।

सोशल मीडिया पर भी ओर मेरे घर के आसपास भी मै जब भी किसी धार्मिक अनुष्ठान के कार्य को होता देखता हूँ, तो पूरे श्रद्धा भाव से सबसे पहले बनिया, जैन लोगो का हाथ अपनी जेब मे जाता है।

सनातन धर्म की नींव बचाने के लिए बनिया समाज का समस्त हिन्दू धर्म सदैव ऋणी रहेगा।

कल गौरी शंकर मन्दिर को लेकर यूँही एक चर्चा चल रही थी, तब ये बातें सामने आयी, तो सोचा बनियों की कंजूसी की असलियत लिख दूँ। जो लोगो को पता नही है।

SHEKHAWATI - शेखावाटी - भारत की औद्योगिक राजधानी

 #SHEKHAWATI - शेखावाटी - भारत की औद्योगिक राजधानी

#शेखावाटी को आमेर राजघराने के कुंवर महाराव #शेखाजी ने बसाया था. शेखा जी कच्छवाह राजपूत थे. कछवाहा अर्थात श्री राम के पुत्र कुछ के वंशज. इन्हीं राव शेखा जी के नाम पर शेखावत वंश चला. शेखाजी का जन्म आज की विजय दशमी के दिन राजा राम के पावन कुल में हुआ था। 

महाराव शेखाजी की शासनावधि में विदेशी तुर्क आक्रान्ताओं की मार आज का समूचा राजस्थान झेल रहा था. शेखाजी गजनी, गौरी जैसों से कई बार भिड़े ऐसा माना जाता हैं. शेखावाटी को तुर्कों से साफ करके सबसे समृद्ध राज्य बनाने का श्रेय राव शेखाजी को जाता है। एक गौरक्षक के रूप में इन्होने गायो की सेवा की, उनके लिए गौशाला और चारे का प्रबंध किया. इनकी स्पष्ट घोषणा थी कि अगर कोई उनके रहते गाय पर अत्याचार करेगा तो उसकी गर्दन उडा दी जाएगी. जैसी छवि इनकी गौरक्षा के प्रति थी वैसे ही नारी सुरक्षा और सम्मान के रक्षक भी थे. गोड राजा रिडमल के साथ घाटवा के युद्ध में तीर लगने से अक्षय तृतीया के दिन इनका देहांत हो गया था. 

शेखावटी में वैसे तो राजपूतो का वर्चस्व रहा है और है लेकिन यहां अग्रवाल जिन्हें *मारवाड़ी* भी कहते है, इन्होंने दुनिया भर में अपने व्यापारिक कला के दम पर राज किया। इनको व्यापारिक कार्य कुशलता से ज्यादा कुछ कर दिखाने की ललक ने इन्हें विश्वपटल पर पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। भारत के टॉप 10 सबसे अमीर आद्योगिक घरानों में 2 (मित्तल, बिड़ला) तो अकेले शेखावटी अंचल से हैं। 

आज शेखावाटी विश्व के बड़े धनी क्षेत्रो में से एक आता है, यहां गरीबी ना के बराबर है, आज से 200-300 साल पहले यहां की सम्रद्धि क्या थी, यह यहां के मारवाड़ी अग्रवालो की हवेलियां ही बता देती हैं। शेखावाटी को भारत की औद्योगिक राजधानी माना जाता है क्योंकि बजाज,सिंघानिया, बिड़ला, डालमिया, रुइया, मित्तल, पोद्दार, खेतान, वेदांता, गोयनका, पिरामल, मोरारका, जालान आदि तमाम औद्योगिक घराने शेखावाटी से निकले हैं। 

#अग्रवालों की जन्मभूमि #अग्रोहा जरूर थी लेकिन शेखावटी के अग्रवालों ने देश-धर्म और भारत की अर्थव्यवस्था के लिए जो किया वो मिसाल है. अग्रवालों के पूर्वज महाराजा #अग्रसेन का जन्म भी इन्हीं रामपुत्र कुश की ३४वीं पीढ़ी में हुआ था। अग्रवाल भी शेखावतों की तरह भगवान राम के पुत्र कुश के ही वंशज हैं। 

 #गीता_प्रेस जो हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी धार्मिक प्रेस के उसके संस्थापक #जयदयाल_गोयनका जी और #हनुमान_प्रसाद_पोद्दार जी दोनों शेखावटी के लाल थे.
 
 इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ सबसे तीव्र स्वर में आंदोलन चलाने वाले और प्रेस के आजादी के पुरोधा इंडियन एक्सप्रेस के मालिक #रामनाथ_गोयनका जी हों,
 
भारत के कॉटन किंग कहे जाने वाले #गोविंदराम_सेकसरिया,
विश्व के स्टील किंग #लक्ष्मी_निवास_मित्तल, या
महान प्रखर गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी #जमनालाल_बजाज हों,
भारत की सर्वश्रेष्ठ मिसाइल अग्नि सीरीज के जनक "राम नारायण अग्रवाल" भी शेखावाटी अंचल के हैं।
गौमाता के लिए अपने प्राणों का त्याग करने वाले करपात्री जी के भामाशाह #रामकृष्ण_डालमिया हों..
सेठों की नगरी रामगढ़ बसाने वाले सेठ चतुर्भुज पोद्दार भी शेखावाटी हों

सभी शेखावटी के अग्रवाल हैं. शेखावटी का रामगढ़ जिला जो अपने समय का सबसे बड़ा आद्योगिक जोन था उसके संस्थापक पोद्दार और रुइया भी बंसल गोत्र के अग्रवाल थे। भारत की पहली रजिस्टर्ड कंपनी रामगढ़ शेखावाटी के क्षेत्र ताराश्याम घनश्याम दास पोद्दार की थी जिसमें लक्ष्मी निवास मित्तल और घनश्याम दास बिड़ला दोनो के दादा ने काम किया था। 

#माहेश्वरीयों का #बिड़ला_घराना भी शेखावटी के झुंझुनू जिले के हैं. जिन्होंजे भारत वर्ष में भव्य सनातन धर्म के मंदिर बनवाए इसी झुंझुनू में अग्रवाल कुलावतंस #राणी_सती_दादी जी का भव्य मंदिर है. सिंघानिया से लेकर डालमिया घराने तक तमाम आद्योगिक घराने शेखावटी से ही निकले हैं जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी। 

सिर्फ व्यापार जगत में ही नहीं बल्कि वीरता में भी शेखावटी ने अपना लोहा मनवाया है. इसके बाद इस शेखावाटी क्षेत्र को फ़ौज की फैक्ट्री भी माना जाता है । राजस्थान में अब तक सभी जिलों में मिलाकर 1550 जवान वीरगति को प्राप्त हुए है, उसमें से 760 जवान तो मात्र शेखावाटी के है. राजस्थान का हर दूसरा शहीद शेखावाटी से होता है. राजस्थान का पहला परमवीर चक्र शेखावटी अंचल के मेजर पिंटू सिंह शेखावत को मिला था। 

शेखावटी के वीर शेखावत राजपूतो ने जहाँ देश के माटी की रक्षा की वही यहां के अग्रवाल व्यापारियों ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपना अमूल्य योगदान दिया... 

साभार - प्रखर अग्रवाल

Tuesday, February 6, 2024

SUNDHI VAISHYA CASTE

#SUNDHI VAISHYA CASTE 

ऐसा कहा जाता है कि सुंधी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शौंडिक शब्द से हुई है जिसका अर्थ है आश्वान  बेचने वाला।

सुंधी भारतीय राज्यों आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में एक मुख्य वैश्य बनिया जाति है। इस जाति की विभिन्न वंशावलियाँ हैं जिनमें सम्मान की अलग-अलग डिग्री हैं, जो सार्वजनिक सेवा के कारण ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों से पैदा हुई अन्य जातियों के बीच गठजोड़ से अपनी उत्पत्ति का पता लगाती हैं। उनके पारंपरिक पेशे की प्रकृति.

हमारी जाति की उत्पत्ति कैसे हुई?

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण अपनी जादुई सिद्धियों के लिए प्रसिद्ध था। एक दिन उस देश के राजा ने उसे बुलवाया और उससे एक तालाब में पानी जलाने को कहा। ब्राह्मण को ऐसा करने का कोई रास्ता नहीं दिखा, और वह मन में बेचैनी के साथ घर लौट आया। रास्ते में उसकी मुलाकात एक डिस्टिलर से हुई जिसने उससे पूछा कि उसे क्या परेशानी है। जब ब्राह्मण ने अपनी कहानी बताई तो शराब बनाने वाले ने पानी जलाने का वादा किया, बशर्ते कि ब्राह्मण उससे अपनी बेटी की शादी करेगा। ब्राह्मण ऐसा करने के लिए सहमत हो गया, और डिस्टिलर ने, टैंक में बड़ी मात्रा में शराब डालने के बाद, राजा की उपस्थिति में आग लगा दी। समझौते के अनुसार उन्होंने ब्राह्मण की बेटी से विवाह किया और यह जोड़ा सुंडी जाति का पूर्वज बन गया। कहानी की पुष्टि में यह आरोप लगाया गया है कि आज तक जाति की महिलाएं पक्षियों या अपने पतियों के भोजन के अवशेषों को खाने से इनकार करके अपने ब्राह्मण पूर्वजों की स्मृति को बनाए रखती हैं। न ही वे किसी दूसरी जाति के हाथ से खाना लेंगी. साथ ही इस जाति की महिलाएं चिकन, मटन और अंडा भी नहीं खा रही हैं.

आधुनिक समय में, कई लोग "शराब के आसवक" का नेतृत्व कर रहे हैं और बड़े व्यापारिक घरानों का स्वामित्व रखते हैं। अब सॉफ्टवेयर उद्योग, सेवा उद्योग में भी उनकी संख्या बढ़ रही है और उन्हें सरकार की सेवा में भी देखा जा सकता है।

वे मूल रूप से उड़ीसा के रहने वाले हैं। अंगुल, बेरहामपुर, भुवनेश्वर, डेनकनाल, गंजम, जाजपुर, कोरापुट और रायगडा जैसे जिले सुंधी परिवार को खोजने के लिए सबसे आम जगह हैं। कुछ अच्छी तरह से शिक्षित हैं, अच्छी तरह से स्थापित हैं और कुछ बहुत उच्च समाज परिवार में हैं।

कई आधुनिक सुंधी प्रमुख अल्कोहल डिस्टिलर हैं, जबकि अन्य सॉफ्टवेयर और सेवा उद्योगों के साथ-साथ सरकारी भूमिकाओं में भी शामिल हैं।


यह जाति आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम, विजयनगरम और विशाखापत्तनम के पूर्वोत्तर जिलों में भी पाई जाती है, जहां उन्हें सोंडी और शेष भारत में बनिया या सुदी के नाम से भी जाना जाता है। वे पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों और देश के अन्य हिस्सों में भी रहते हैं। बंगाल में, पश्चिमी बंगाल और बिहार के साथ-साथ उड़ीसा में छह लाख से अधिक सुंधी निवासी हैं।

जाति को ऊपरी सुंधी (दक्षिणी सुंधी) और निचली सुंधी (जिसे गजभाटिया सुंधी या किरा सुंधी के नाम से भी जाना जाता है) में विभाजित किया गया है। आंध्र प्रदेश में इस सुंधी जाति को अक्सर कम्मा जाति समझ लिया जाता है। कम्मा सुंधियों से अलग है। यह धारणा इस रूप में मौजूद है दोनों जातियों की एक समान उपाधि 'चौधरी' है। अधिकांश सुंधी अच्छी तरह से शिक्षित हैं, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश और उड़ीसा से, वे आंध्र प्रदेश के ऊपरी तटीय जिलों के समृद्ध संप्रदायों में से एक हैं, जो ज्यादातर श्रीकाकुलम जिले (इचापुरम से श्रीकाकुलम) में पाए जाते हैं। कुछ आप्रवासियों को हैदराबाद सहित अन्य स्थानों पर देखा जाता है जहां गतिविधि के कई क्षेत्रों में लगभग 200 परिवार वितरित हैं।

BHARAT BHUSHAN - INDIAS FIRST SUPERSTAR

#BHARAT BHUSHAN - INDIAS FIRST SUPERSTAR


अपने अभिनय के रंगों से कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्जा गालिब जैसे चरित्रों को नया रूप देने वाले अभिनेता भारत भूषण का सितारा भी कभी इतनी गर्दिश में पड़ गया था कि उन्हें अपना गुजारा चलाने के वास्ते दोयम दर्जे की फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं करने को मजबूर होना पड़ा था। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 1920 में जमींदार वैश्य परिवार में जन्मे भारत भूषण गायक बनने का ख्वाब लिए मुंबई की फिल्म नगरी में पहुंचे थे, लेकिन जब इस क्षेत्र में उन्हें मौका नहीं मिला तो उन्होंने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1941 में निर्मित फिल्म चित्रलेखा में एक छोटी भूमिका से अपने अभिनय की शुरुआत कर दी। 1951 तक अभिनेता के रूप में उनकी खास पहचान नहीं बन पाई। इस दौरान उन्होंने भक्त कबीर (1942), भाईचारा (1943), सुहागरात (1948), उधार (1949), रंगीला राजस्थान (1949), एक थी लड़की (1949), राम दर्शन (1950), किसी की याद (1950), भाई-बहन (1950), आंखें (1950), सागर (1951), हमारी शान (1951), आनंदमठ और मां (1952) फिल्मों में काम किया। भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फिल्म बैजू बावरा से चमका।

बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने न सिर्फ विजय भट्ट के प्रकाश स्टूडियो को ही डूबने से बचाया, बल्कि भारत भूषण और फिल्म की नायिका मीना कुमारी को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। आज भी इस फिल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ओ दुनिया के रखवाले.., मन तड़पत हरि दर्शन को आज.., तू गंगा की मौज में जमुना का धारा.., बचपन की मुहब्बत को.., इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम.., झूले में पवन के आई बहार.., और दूर कोई गाए.. धुन ये सुनाए जैसे फिल्म के इन मधुर गीतों की तासीर आज भी बरकरार है। इस फिल्म से जुडे़ कई रोचक पहलू हैं। निर्माता विजय भट्ट फिल्म के लिए दिलीप कुमार और नर्गिस के नाम पर विचार कर रहे थे, लेकिन संगीतकार नौशाद ने उन्हें अपेक्षाकृत नए अभिनेता-अभिनेत्री को फिल्म में लेने पर जोर दिया। इसी फिल्म के लिए नौशाद ने तानसेन और बैजू के बीच प्रतियोगिता का गाना शास्त्रीय गायन के धुरंधर उस्ताद आमिर खान और पंडि़त डी.वी. पलुस्कर से गवाया। फिल्म की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसके संगीतकार, गीतकार, शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफी तीनों ही मुसलमान थे और उन्होंने मिलकर भक्ति गीत मन तपड़त हरिदर्शन को आज..जैसी उत्कृष्ट रचना का सृजन किया था। बैजू बावरा की सफलता से उत्साहित यही टीम एक बार फिर श्री चैतन्य महाप्रभु फिल्म के लिए जुड़ी और इसमें सशक्त अभिनय के लिए भारत भूषण को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, भक्तों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को अपने सहज स्वाभाविक अभिनय के रंगों से परदे पर जीवंत करने का भारत भूषण का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। ठनमें प्रमुख हैं भक्त कबीर (1942), श्री चैतन्य महाप्रभु (1954), मिर्जा गालिब (1954), रानी रूपमती (1957), सोहनी महीवाल (1958), सम्राट्चंद्रगुप्त (1958), कवि कालिदास (1959), संगीत सम्राट तानसेन (1962), नवाब सिराजुद्दौला (1967) आदि।

भारत भूषण के फिल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फिल्म मिर्जा गालिब का अहम स्थान है। इस फिल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्जा गालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि गालिब ही परदे पर उतर आए हों। बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फिल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस फिल्म के लिए गजलों के बादशाह तलत महमूद की मखमली और गायिका, अभिनेत्री सुरैया की मिठास भरी आवाजों में गाई गई गजलें और गीत बेहद मकबूल हुए .., आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक.., फिर मुझे दीदए तर याद आया.., दिले नादां तुझे हुआ क्या है.., मेरे बांके बलम कोतवाल.., कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां कुछ और भारत भूषण ने लगभग 143 फिल्मों में अपने अभिनय की विविधरंगी छटा बिखेरी और अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर तथा देवानंद जैसे कलाकारों की मौजूदगी में अपना एक अलग मुकाम बनाया। बाद में उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा, लेकिन उनकी कोई भी फिल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं रही। उन्होंने 1964 में अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म दूज का चांद का निर्माण किया, लेकिन इस फिल्म के भी बॉक्स आफिस पर बुरी तरह पिट जाने के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण से तौबा कर ली। वर्ष 1967 में प्रदर्शित फिल्म तकदीर नायक के रूप में भारत भूषण की अंतिम फिल्म थी। 

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