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Monday, September 10, 2012

वैश्य वर्ण का इतिहास-HISTORY OF VAISHYA VARNA

वैश्य वर्ण(वर्ण शब्द का अर्थे है-"जिसको वरण किया जाय" वो समुदाय ) का इतिहास जानना के पहले हमे यह जानना होगा की वैश्य शब्द कहा से आया है। वैश्य शब्द विश से आया है,विश का अर्थे है प्रजा,प्राचीन काल मे प्रजा(समाज) को विश नाम से पुकारा जाता था। विश के प्रधान सरक्षक को विशपति (राजा) कहते थे,जो निरवचन से चुना जता था। विश शब्द से भगवान विष्णु (" विश प्रवेशने " तथा " वि+अश " ) नाम कि सिद्धि होती है। विष्णु सृष्टि के संचालक हैं, वे हमारी हर आवश्यकता की पूर्ति करते हैं,वैश्य भी समाज मे व्यापार से रोजगार के अवसर प्रदान करता है, तथा अन्य सामाजिक कार्य मे दान के से समाज कि अवाशाकता कि पुर्ती कर्ता है। विष्णु भगवान दुनियादारी या गृहस्थी के भगवान हैं,वैश्य वर्ण को गृहस्थी का वर्ण कहाँ जता है। इस सृष्टि के तीन प्रमुख भगवान हैं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं,विष्णु उसका संचालन और पालन और शिव संहार। वास्तव मे सृष्टि के तीन प्रमुख भगवान हैं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक हि परमेश्वर का विभिन्न नाम है, तथा उनके कार्य है रचनाकरना,संचालन और पालन करना,और संहार करना। अब हम वैश्य वर्ण पर आते है,सिन्धु- घटी की सभ्यता का निर्माण तथा प्रशार दुर के देशो तक वैश्यो से हुआ है। सिन्धु- घटीकी सभ्यता मे जो विशालकाय बन्दरगाह थे वे उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका,युरोप के अलग-अलग भाग तथा एशिया (जम्बोदीप) आदि से जहाज़ दवरा व्यापार तथाआगमन का केन्द्र थे। 

विशेष—'वैश्य' शब्द वैदिक विश् से निकला है । वैदिक काल में प्रजा मात्र को विश् कहतेथे । पर बाद में जब वर्णव्यवस्था हुई, तब वाणिज्य व्यसाय और गोपालन आदि करनेवालेलोग वैश्य कहलाने लगे । इनका धर्म यजन, अध्ययन और पशुपालन तथा वृति कृषि औरवाणिज्य है । आजकल अधिकांश वैश्य प्रायः वाणिज्यव्यवसाय करके ही जीविकानिर्वाहकरते हैं ।अर्थ की दृष्टि से इस "वैश्य" शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका मूलअर्थ "बसना" होता है।

Saturday, August 11, 2012

आचार्य तरुण सागर जी-ACHARYA SRI TARUN SAGAR JI

Tarun Sagarji Maharaj, Muni Tarun Sagar Ji, Jain Muni


पूज्य श्री क्रन्तिकारी राष्ट्रसंत मुनिश्री तरुणसागरजी महाराज

आचार्य कुंद कुंद और आचार्य जिनसेन के पशचात दो हज़ार वर्षो के इतिहास में पहली बार १३ वर्ष की सुंकुमार वे में दीक्षा लेने वाले देश के प्रथम मुनि हैं

दिल्ली के एतिहासिक लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करने वाले देश के प्रथम मुनि.

जी टीवी सहित अन्य टीवी चेनलो के माध्यम से "महावीर वाणी" को भारत सहित १२२ देशो में पहुचाने वाले देश के प्रथम मुनि.

भारतीय सेना को संबोधित करने वाले व् सेना द्वारा "गोर्ड - ऑफ़ - आनर" पाने वाले देश के प्रथम मुनि.

हर जिले के पुलिस मुख्यालय पर पुलिस अधिकारियो और जवानों को संबोधित करने वाले देश के प्रथम मुनि.
गुरुमंत्र दीक्षा देकर जैन परंपरा में विधिवत गुरुदीक्षा की शुरुआत करने वाले देश के प्रथम मुनि.

जिनकी बहुचर्चित पुस्तक "कड़वे प्रवचन" की देश की छह भाषाओ में पॉँच लाख पुस्तकों का प्रकाशन जैन इतिहास में विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले देश के प्रथा मुनि.

म.प्र. गुजरात, कर्णाटक, और महाराष्ट्र सर्कार द्वारा "राजकीय अतिथि" का सम्मान पाने वाले और अब "जेड़ प्लस" जैसी सुरक्षा पाने वाले देश के प्रथम मुनि.

अपने कड़वे प्रवचनों और सत्संगों के हर जगह, हर रोज़ ५०-५० हज़ार श्रोताओ को सम्बोथित करने वाले देश के प्रथम मुनि.

देश के सर्वाधिक चर्चित, ख्याति प्राप्त और दिगंबर मुनि की पहचान बन चुके देश के प्रथम मुनि.

राजभवन (बंगलोर) जाकर वहां अतिविषिस्ट लोगो को संबोधित करने वाले व् राजभवन में आहारचर्या करने वाले देश के प्रथम मुनि.

भगवन महावीर के मंदिरों और जैनियो से मुक्त करने वाले तथा जन-जन के बनाने वाले देश के प्रथम मुनि.

दिगंबर जैन और श्वेताम्बर जैन जिनके नाम मात्र एक हो जाते हैं और जिनके कार्यक्रम सकल जैन समाज के बेनर टेल होते हैं ऐसे देश के प्रथम मुनि.

जिनके कड़वे प्रवचनों की मिठास की चर्चा देश भर में होती हैं और कड़वे बोल पसंद किये जाते हैं, देश के प्रथम मुनि.

"आनंद यात्रा" कार्यक्रम की शुरुआत करने वाले व् इस कार्यक्रम में लोगो को ठहाके लगाने के लिए मजबूर कर देने वाले देश के प्रथम मुनि.


तरुण सागर जी महाराज परिचय
पूर्व नाम           :        श्री पवन कुमार जैन
जन्म तिथि      :        २६ जून, १९६७, ग्राम गुहजी
                               (जि.दमोह ) म. प्र.
माता-पिता       :         महिलारत्न श्रीमती शांतिबाई जैन एव
                              श्रेष्ठ श्रावक श्री प्रताप चन्द्र जी जैन
लौकिक शिक्षा    :      माध्यमिक शाला तक
गृह - त्याग        :      ८ मार्च , १९८१
शुल्लक दीक्षा     :      १८ जनवरी , १९८२, अकलतरा  ( छत्तीसगढ़) में
मुनि- दीक्षा        :      २० जुलाई, १९८८, बागीदौरा (राज.)
दीक्षा - गुरु                यूगसंत आचार्य पुष्पदंत सागर जी मुनि
लेखन                :     हिन्दी
बहुचर्चित कृति   :      मृत्यु- बोध


मानद-उपाधि :    'प्रज्ञा-श्रमण आचार्यश्री पुष्पदंत सागरजी द्वारा    प्रदत

                         क्रांतिकारी संत 
                                                                                                                                               
कीर्तिमान :          आचार्य भगवंत कुन्दकुन्द के पश्चात गत दो हज़ार
                          वर्षो के इतिहास मैं मात्र १३ वर्स की वय में जैन
                          सन्यास  धारण करने वाले प्रथम योगी |    
                         : रास्ट्र के प्रथम मुनि जिन्होंने लाल किले (दिल्ली)
                           से सम्बोधा |


                         : जी.टी.वी. के माध्यम से भारत सहित १२२ देशों में
                          ' महावीर - वाणी ' के विश्व -व्यापी प्रसारण की
                           ऐतिहासिक सुरुआत करने का प्रथम श्रेय |


मुख्य - पत्र  :          अहिंसा - महाकुम्भ (मासिक)



आन्दोलन  :          कत्लखानों और मांस -निर्यात के विरोध में निरंतर
                            अहिंसात्मक  रास्ट्रीय आन्दोलन |


सम्मान   :     ६ फरवरी ,२००२ को म.प्र. शासन द्वारा' राजकीय अतिथि '                    का दर्जा |
                

२ मार्च , २००३ को गुजरात सरकार द्वारा ' राजकीय अतिथि 'का सम्मान |
साहित्य :                    तिन दर्जन से अधिक पुस्तके उपलब्ध और उनका हर वर्स लगभग दो लाख प्रतियों का प्रकाशन |


रास्ट्रसंत :                   म. प्र. सरकार द्वारा २६ जनवरी , २००३ को दशहरा मैदान , इन्दोर में


संगठन :                    तरुण क्रांति मंच .केन्द्रीय कार्यालय दिल्ली में देश भर में इकाईया


प्रणेता :                     तनाव मुक्ति का अभिनव प्रयोग ' आंनंद- यात्रा ' कार्यक्रम के प्रणेता 


पहचान :                    देश में सार्वाधिक सुने और पढ़े जाने वाले तथा दिल और दिमाग को जकजोर देने वाले अधभुत      प्रवचन | अपनी नायाब प्रवचन शैली के लिए देसभर में विखाय्त जैन मुनि के रूप में पहचान |

मिशन :                    भगवान महावीर और उनके सन्देश " जियो और जीने दो " का विश्व व्यापी प्रचार -प्रसार एवम   जीवन जीने की कला प्रशिक्षण |
     

Monday, July 30, 2012

GANIGA GANDLA TELI VAISHYA , गनिगा तेली वैश्य

GANIGA TELI VAISHYA , गनिगा तेली वैश्य

Ganiga or Gandla is not caste it is kulakasubu(profession)of some people of India.And it has nothing subcaste, community like shivajyothi, nagarajyothi, lingayutha, somakshathriya, etc doing in this profession for money. If another communities like okkaliga, lambani, bramhana would did this profession then people would have called them as okkaliga ganiga,lambani ganiga,bramhana ganiga.

Person drives gana(oil press) is a ganiga(oil monger) who form any community.

Social and Government mentioned ganiga as a caste by mistakely.

Ganiga's are basically oil merchants. Ganiga is a vaishya bania teli caste. Hundreds of very small villages in andhra and karnataka which have only Gandla people.

Origin

From ancient time in India, vegetable oils were obtained by crushing oil seeds in village, using an oil-press - or Ghana. A ganiga is a person who extracts oil using a ghana.

In Sanskrit literature of about 500 BC there is a specific reference to an oil-press, or Ghanis, although it was never described (by Monier-Williams, M. 1899. A Sanskrit-English dictionary, Delhi, India, Motilal Banarsidass. Reprinted 1963).

As per Manu dharma sastra there are four varnas - Brahmana, Kshatriya, Vysya & Shudra. The brahmins were priests in temples and interpreters of vedas, sashtras and puranas. There were acting as advisers to rulers and people on dharma, astrology etc. and also as record keepers in villages (Karnams). Kshatriyas were the rulers and aristocrats, land lords. The vysya were the merchants and business people. All the other people engaged in various vocations i.e., carpenters, potters, gold smiths, iron smiths, washer men, barbers etc. and who did not belong to other three varnas like Reddy, kapus, Kamma, Balija were also called Shudra. The schedule castes who were considered untouchables in olden times and the schedule tribes also fall in the broad varna of Sudra.

Ganiga is a profession known in Karnataka State of South India. They are some communities involve in this profession and they were called with profession name ganiga such as Somakshatriya Ganiga, Ganiga Shetty,Jyothinagara Ganiga, Jyothipana Ganiga, Ontettu Ganiga, Jodettu Ganiga, Veerashaiva Ganiga, Vijayanagara Ganiga etc. The name Ganiga is derived of Gana the traditional oil press used by them. In Sanskrit literature of about 500 BC there is a specific reference to an oil-press, or Ganis, although it was never described (by Monier-Williams, M. 1899. A Sanskrit-English dictionary by Motilal Bnarasidas of Delhi, India, Reprinted in1963).

This community of oil extractors is known by different names in different States in India. They are known as Gandla (deva gandla, sajjana gandla), in A.P; as Vaniya Chettiar or Vaaniga vysya in Tamil Nadu ; as Teli in Maharashtra and in North India.

All castes in Sudra varna were not considered as equals. Castes enjoyed different status and privileges in the society depending on their profession. Gandla community were extracting oil from ground nut, gingley, castor seeds and also preparing ghee (oil with preservatives made by melting butter). They were not only extracting oil but also selling it. They were economically better compared to other castes like carpenters, barbers, washer men potters, etc. As producers and sellers of oil they enjoyed higher status in society.

In olden times oil was extracted by crushing and grinding oil seeds in a wooden drum usually of 1 meter diameter on which a heavy cylindrical wooden log is placed for rotation. This log is attached through a shaft to which an ox was harnessed. The ox moves in circles and rotates the heavy log in the drum. In this process the oil seeds are crushed and ground and the oil oozes from the seeds and gets collected at the bottom of the wooden drum. This extracted oil comes out of the wooden drum through a wooden canal which is fixed to the hole at the bottom of the drum. Some were using one ox and some two oxen for harnessing the mill.

There are sub castes within Gandla. People using one ox (yedhu) were called one ox (yedhu) gandla and those using two ox (yedhu) were called the double ox (yedhu) gandla. Among the gandla some are known as Deva (pious) Gandla and others were Sajjana (commoners) gandla. There is no definite criteria for this classification. However gandla in Punganur village of Chittor district, A.P. were called as Deva Gandla. Gandlas of Bellary, Krishnagiri (Tamil Nadu) , Venkatagiri, Rompicherla, Vayalpadu and other parts of Chittor are known as Sajjana gandla.

At present In A.P. Gandla community is officially recognized as a Backward community. They are entitled to reservations in government educational institutions and government jobs.

Traditionally for gandlas in Andhra Pradesh, Tamil Nadu and Karnataka Sri.Panditaaradhya Samba Murthy of Nellore, A.P.was the Kula guru. He was a brahmin. He and his ancestors were maintaining genealogy table of many gandla families. Sri.S.P. Balasubramanyam and Smt.S.P.Sailaja, famous playback singers are his children. In olden times people were seeking blessings of this Kula guru on important occasions like naming ceremonies, Aksharabhyasam ( ceremony of initiation of education), marriages, gruha pravesham (ceremony of entering a new house). After the death of Sri.Panithaaradhya Samba Murthy, Sri.Mallikarjuna Sharma of Tenali, Guntur District of A.P. is considered as Kula Guru.

In Andhra Pradesh, a society called as Akhila Gandla Sabha was formed for the welfare of the poor and economically weak gandlas of Andhra Pradesh. Late Sri.Kothapalli Ramakrishna Chetty, Late Sri.Bachala Venkatasubbaiah, Late Bachala Balaiah, Sri.Obulampalli Gopalakrshnan, Sri.Avula Chengappa, Dr.I.L.Narasaiah, Sri.Prof. Nanjappa were the founding members of this society. At present Sri. Grosu Gopalaiah(MK group) of Nellore, Mr.V.Muniratnam, Mr.Umapathi, Mr.A.Chengappa are some of the important persons who are working for the society. Currently Mr.Paluri Ramakrishnaiah is the President A.P.Gandla Telikula Sangham.

All Ganigas does not come under Shudras: Ganigas (Jyothi Nagaras) in Karnataka, Andhra, Tamil Nadu have Rushi Gothram and can be considered as Vaishyas. They wear Janivar the sacred thread and are eligible for recitation of Gayathri and have rituals of Vysyas and Brahmins. The Noted persons of this community is Sree Doddanna Shetty in Bangalore who have built SLN Charities (Sree Lakshmi Narasimha Swamy Charities) which is opposite to Fort Bangalore(Market) and has Famous Kote Anjaneya Temple in front premises. The Other Institute is in Mulbagal Sree Sharadha Vidya Peeta built by Shapoor Krishnayya Shetty.

The Ganiga Caste today

Ganiga People speak Kannada, Telugu, Tulu as their mother tongue. Ganigas worship Lord Venugopalakrishna and the ancient temple which was installed during 12th century is there in Barkur village near Udupi. This temple is managed by the Ganiga Community and has a Marriage hall is also available at Barkur temple premises.

Ganiga people mainly live in different parts of Karnataka. In South Karnataka Ganiga people mainly speak Kannada Language. Ganiga people are living the following districts of Karnataka, India - Bijapur, Bagalkot, Belgaum, Bangalore, Mangalore, Bhadravati, Chikamagalur, Kurboor,Chintamani, Gulbarga, Hassan, Haveri, KGF, Kolar, Mulbagal, Mandya, Mysore, Shimoga, Tumkur, Tiptur Udupi, Uttara Kannada,Punganur punganur. also live in AP (all dists) and Tamil Nadu (dharmapuri,krisnagiri,salem)

Besides Karnataka, Ganiga community settled in some parts of Mumbai, Chennai, Delhi, Goa, Hyderabad and many other cities in India.

In overseas countries members of Ganiga Community have settled in the USA, Canada, Japan and UAE.

A majority of Ganiga community continue to remain backward economically due to mechanisation of oil crushing which slowly took away their livelihood in the 1950s. Deprived of this age old profession continued for generations, Ganiga community found their way in business such as setting up of shops, hotels etc. Enterprising Ganiga entrepreneurs set up many Udupi Hotels in Bangalore and other prominent cities in Karnataka. Others took up odd jobs to meet both the ends. Having been remained economically backward even after 60 years of independence due representations were made from time to time to the successive Governments.

The ganiga community people can marry any subcastes of chettiars.

Govt.of Karnataka, Social Welfare Department, on 30 March 2002 issued Order No. SWD 225 BCA 2000 dated notifying Ganiga community as an Economically Backward Class under Category - II (A) Sl. No. 78. Castes listed under this category are (a) Ganiga, (b) Teli.

In Maharashtra Ganiga community has been granted OBC (Other Backward Caste) Certification by the Govt. of Maharashtra in 2005.

In the different states of India, they are called in different names -

In Andhra, Ganigas are known as Gandla, and in which they are called devagandla or Sajjanagandla.

In Kerala, Ganigas are known as Chekkala nair and Vaniya Chettiar

In Tamil Nadu, They are known as Vaniya Chettiar. There is no relation between Reddy gandla and ganiga, as reddy gndla is a sub caste of reddy group

In Gujarat, They are known as Gaanchi. Mr Narendra Modi CM of Gujrath is member of this community.

Ganiga Associations at other locations in Karnataka, India

South Kanara District (Udupi) Somakshathriya Samaj, Moodukeri,Barkur President: K. Gopal * Hassan Ganiga Sangha - President: H.L.RangaShetty. Owner of SreeGopalKrishna Oil Mill, President of ShivaJyothi(Ganiga) Kalyana Mantapa, AdLee-maney, Hassan * Somakshathriya Ganiga Samaj, Kundapur - President: Ramesh Ganiga Kollur * Shimoga District Ganiga Sangha, Shimoga - President: H. Subbiah * Ganiga Samaj, Bhadravati - President: U. Govind * Dr. T.A. Prasanna ,Phd.Economics, Prof. Kuvempu University, Shimoga-Bhadravati.India * Gopalakrishna Yuvaka Sangha Bhadravati (Youth Wing) * Somakshathriya Yuvaka Sangha,(Youth Wing) Gangoli (Udupi Dist.) * Utttara Kannada District Ganiga Seva Sangha, Sirsi - President: S.P. Shetty (Previously headed by Mr. Madhav Narayan Shetty, Honnavar for more than a decade). * karnataka ganigara sangha bangalorekolar,tumkur,chittur(Ap)president:Amarnath * sln students union bangalore * D B Kalashetty, State Bank of Hyderabad, Secretary, SBH staff Association, Gulbarga 

Somakshathriya Vaishnava Samaja, Bangalore-India

President: B.N. Narasinhamurthy In Bangalore Ganigas are also known as 'Somakshatriyas' and are very actively performing tasks of developing the community, the 'Samparka' challenge cup has recently celebrateed the decennial celebrations and Prathiba Sambhrama is organised in November and December where the children from the Ganiga community of Udupi district and those who have settled in Bangalore actively participated in the sports and cultural events. * Leaders in Community Development Initiatives at Bangalore:. * Mr.Rajashekhar Birthi * Vyasa Rao (Kamat Group of Hotels) * B.A. Narasimha Moorthy (Abhinaya Group of Hotels) * Shankar N. Rao (President: Shree Venugopalakrishna Co-op. Credit Society) * Neelavar Sanjeev Rao (Hotel Hallimane) * Janardhana Rao (SeaRock Hotel) * U. Sundar Rao* * Janardhana Rao (Roti Ghar) * G. Ananda Rao * T.K. Ramakrishna 

Ganiga Samaj, Mumbai-India

In Mumbai Ganiga Samaj was formed in 1996 to bring together Ganiga community living in and around Mumbai under the leadership of N.S. Balimane (Founder President). The Ganiga Samaj Mumbai has completed 10 years in September 2006. Office Bearers of Ganiga Samaj Mumbai: Past Presidents - Ganiga Samaj

N.S. Balimane * Krishna Ganiga 

current Office Bearers * Jagannath Ganiga - President * M. Bhaskar Ganiga - Vice President * B. Vasudeva Rao - Vice President * Shankar H - Secretary * Madhav Ganiga - Jt. Secretary * Chandrashekhar Ganiga - Treasurer 

Members, Managing Committee: * K. Ramachandra * Smt. Tara Bhatkal * Vijayendra Ganiga * Anant N. Ganiga * Sanjeev R. Ganiga * P.N. Ganiga * Balakrishna Ganiga Tonse * Vasudeva U.B. * Harish Tonse * Sadanand Kallianpur * Chandrashekar R.Ganiga (Panvel) * Narasimha Ganiga (Kalamboli) * Gangadhar N. Ganiga * Sitaram M.R. * Mohan N. Rao 

Office address: Ganiga Samaja Mumbai 34/668 Adarsh Nagar Prahadevi Worli Mumbai 400 030

KALABURGI ZILLA GANIGA SAMAJ, GULBARGA

SRI. Apparao M Patil, HON'LE PRESIDENT SRI.Sursh Sajjan, PRESIDENT SRI.R B Malipatil, GENERAL SECRETARY SRI.D B Kalashetty, SECRETARY SRI.Siddaanna Sajjan, TREASURER SRI Shivayogeappakalashetty, ASST.TRESURER SRI MANGAL JYOTI SHARAN GANADA KANNAPPA USTAV SAMITI, GULBARGA

PRESIDENT - Sri.Suresh Sajjan VICE PRESIDENT - Rajeshekhar Yankanchi SECRETARY - Sri.D B Kalahetty ASST.SECRETARY - Sri. Mallanna Manga TREASURER - Siddanna Sajjan Well known Ganigas

Yakshagana Actors:

Mr. Haradi Rama Ganiga * Mr. Haradi Krishna Ganiga, * Mr. Haradi Narayana Ganiga * Mr. K. Ananda Ganiga from Udupi region. * Mr. Birthi Balakrishna * Mr. Gopala Ganiga, Heranjal * Mr. Vishwanatha Ganiga, Kodi-Kundapura * Mr. Sarva Ganiga, Haradi 

Leading Maddale player Late Suragikatte Basava Ganiga.

Engineers/IT Professionals:

Mr. Raghavendra Gangia , Solution Architect, HCL Technologies. * Mr. Ananth Prasad Gangia , Consultant , Singapore * Mr. Prakash Gangia , Consultant , Bangalore * Mr. Raghavendra U Gangia , Software Engineer , Capgemini Consulting India Pvt Ltd, Bangalore * Mr. Naveen Gangia , Software Engineer , Bangalore * Mr. Venkngouda. A.Patil.Software Engineer , Bluestar HP Ltd, Bangalore * Mr. Ravi C Hangargi, Senior Software Engineer , SRA India Pvt Ltd, Bangalore. * Mr. Y J Patil Senior Verification Engineer, Genesisi Microchip, Canada * Mr. Ravichandra.A.Patil Software Engineer , SASKEN Technologies, Bangalore * Mr. Satish Yearva. Software Engineer , SASKEN Technologies, Bangalore 

Mr.Sanjay D.Hortikar-Project Analyst,TATA CMC Limited,bangalore belongs to Umadi,Tal-Jath,District Sangli[Maharashtra], * Mr. Kallappa.M. Kadimani Horti (Tq-Indi Dist-Bijapur), Software Engineer, IBM India Pvt Ltd, * Mr. Prasad Gandla Thogarcheedu, (Kurnool Dist-AP), Software Engineer, IBM, Bangalore India Pvt Ltd, * Mr. Jagadish Bomma Vempenta, (Kurnool Dist-AP), Software Consultant, Daimler AG, Stuttgart, Germany * Mr. Sateesh.M. Pasodi Shirashyad, Who belongs to the Ganiga, * Mr. Praveen Adavesh Ghaniger, Software Engineer 

Politicians: 

* Mr.V.R. Sudarshan, a three-time MLC, belongs to an OBC (Ganiga). He is currently Chairman of the Legislative Council, Karnataka Govt, hailing from Vemgal, KOLAR Dist. * Mr. N.S. Vishwanath, Karnataka State 

Government 

Mr. B.J. Puttaswamy who belongs to the Ganiga caste had been nominated to the Council in 1982 by then the Chief Minister, R.Gundu Rao. also Mr. B.J.Puttaswamy was MLA. 

* Mr. Busnur and Mr. Anjutagi belong to the predominant Ganiga community from Bijapur, District Karnataka. Mr. Anjutagi was defeated in the 1994 Assembly Election. 

* Mr. P.C. Gaddigoudar, MP from Bagalkot(LS), Karnataka. also he was a former MLC and the chief of party's Bagalkot district unit. He belongs to Ganiga Caste. 


* Mr. S.B. Nyamagouda, MLC, Karnataka. also he was a former MP & Central Minister and the chief of party's Bagalkot district unit. He belongs to Ganiga Caste. 

* Mr. G.S. Nyamagouda, Well know person in jamkhandi taluk. He belongs to Ganiga Caste. 

* Mr. B.G. Patil Halasangi, MLC who belong to the Ganiga sub-sect of the Lingayats, 2003. * Mr. Ganapa Ganiga, Contestant for Legislative Assembly of Karnataka from Baindur, Near Mangalore udupi, in June 1998, Bye-elections. * Mr.Apparao.M.Patil (Atnoor), Youngest APMC CHAIRMAN in INDIA.Hails from gulbarga district's Atnoor village. He is one who organised GANIGA samaj in Gulbarga and north karnataka. 

Bussiness: 

* Mr. Venu Vaishya, Executive Vice President, Covansys Corporation, USA, IIT Kanpur Alumni 

Banking: * D B Kala shetty,Sate Bank of HYderabad,Gulbarga (Karnataka) 

Geology: * Dr. J V Subbaraman , Ex Chief Geologist, BGML 

Education: 

* Mrs. Rama Mani Vaishya , Directress, Montessori School, Michigan, USA * Dr. T.A. Prasanna , Prof. Kuvempu University, Shimoga-Bhadravati.India 

Medicine:

 * Dr. Gundmi Praveena Kumara MD General Medicine, Asst Prof. KMC MANIPAL * Dr. Pradeep Ganiga,Asst. Prof, K V G Medical College, Sullia, Obstetrics & Gynaecology * Dr. Manohar Babu KV, MS ortho, MRCSEd Edinburg UK. * Mohan Ganiga, Respiratory Technician, C/o. Kapadia F N. MD, FRCP Consultant Physician & Intensivist, Hinduja National Hospital, Mahim, Mumbai * Dr Arun G Patil, MD General Physician Nizamabada(Andhrapradesh) 

* Mr. Birthi Radhakrishna, was the Registrar and chief protocol officer of Delhi High Court 

* Mr. Pundalika Ganiga . recipient of National Best Teacher Award 

Clinical Researcher / Pharmacist: 

* Mr. Sathya Prakash R J, Master of Pharmacy (Pharmacology). Rank holder in M.Pharm, Clinical Research Associate, ICON Clinical Research Limited, Bangalore 

Hotel and Restaurant: * Mr. R.Prabhakar Ganiga, is rightly called the Darshini Brahma. He started the concept of Darshini and made the cost of food affordable to the general public. He started with Upahara Darshini, later on Dosa camp, Pavithra, Rotigar, cool joint, nammoora hotel, Hallimane and the list keeps growing. Now he has formed an organisation for fighting against adulteration of food in hotels under the banner Hotel Grahakara Sangha 

* Mr. B.S.Manjunath , is proprietor of "Hotel Vaibhav " * Mr. B.A.Narasimhamurthy , is proprietor of "Abhinaya Group of Hotels"

saabhaar : wikipedia 

Wednesday, June 27, 2012

पटवा वैश्य-PATWA VAISHYA

पटवा वैश्य-PATWA VAISHYA

पटवा एक हिंदू वैश्य समुदाय है, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत में पाया जाता है, जो पारंपरिक बुनकर, आभूषण व्यवसायी और धागा कारीगर हैं।

इतिहास

पटवा की परंपराओं के अनुसार, वे एक देवता (एक हिंदू भगवान) के वंशज हैं। पटवा के कई उप-समूह हैं, देववंशी, देवल, रघुवंशी और कनौजिया। वे वैश्य (बनिया) श्रेणी में आते हैं। पटवा एक अंतर्विवाही समुदाय है, और गोत्र बहिर्विवाह के सिद्धांत का पालन करते हैं। माहेश्वरी भी पटवा हैं जो बनिया श्रेणी में आते हैं। वे हिंदू हैं, और देवी भगवती की पूजा करते हैं। अन्य हिंदू कारीगर जातियों की तरह, पटवा के पास एक पारंपरिक जाति परिषद है, जो तलाक, छोटे विवादों और व्यभिचार के मामलों को निपटाने में शामिल है।

वर्तमान परिस्थितियाँ

पटवा महिलाओं के सजावटी सामान जैसे झुमके, हार और सौंदर्य प्रसाधन बेचने में शामिल हैं। वे छोटे घरेलू सामान जैसे कि ताड़ के बने हाथ के पंखे भी बेचते हैं। यह समुदाय पारंपरिक रूप से मोतियों को पिरोने और चांदी और सोने को एक साथ जोड़ने के व्यवसाय से जुड़ा हुआ था, जबकि अन्य ने अन्य व्यवसायों में विस्तार किया है। वे पूरे भारत में पाए जाते हैं, मुख्य रूप से दिल्ली, मध्य प्रदेश, मध्य प्रदेश में पटवा और लखेरा भी एक नहीं हैं लखेरा एक अलग जाति है वे पटवा जाति से संबंधित नहीं हैं। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बरेली, बदायूं, लखनऊ, गोरखपुर, हरदोई, जालौन, शाहजहांपुर, सीतापुर, लखीमपुर-खीरी, लखनऊ, झांसी और ललितपुर जिलों में। एक अखिल भारतीय पटवा महासभा भी पटवा समाज के लिए काम करती है।

बिहार में, समुदाय को पटवा और टंटू पटवा के रूप में विभाजित किया गया है। टंटू पटवा एक और जाति है, वे पटवा जाति से संबंधित नहीं हैं। पटवा मुख्य रूप से बुनकर और चोटी बनाने वाले होते हैं। टंटू पटवा के तीन उप-समूह हैं, गौरिया, रेवाड़ और जुरिहार। टंटू पटवा मुख्य रूप से नालंदा, गया, भागलपुर, नवादा और पटना जिलों में पाए जाते हैं। उनके मुख्य गोत्रों में गोरहिया, चेरो, घटवार, चकटा, सुपैत, भोर, पंचोहिया, दरगोही, लहेड़ा और रंकुट शामिल हैं और पटवा पूरे बिहार में पाए जाते हैं। बिहार के पटवा अब मुख्य रूप से पावरलूम ऑपरेटर हैं, जबकि अन्य ने अन्य व्यवसायों में विस्तार किया है। वे काफी सफल समुदाय हैं, और कई लोगों ने आधुनिक शिक्षा अपनाई है। बिहार के पटवाओं का एक राज्यव्यापी जाति संघ है, पटवा जाति सुधार समिति।साभार : सुरेश चंद्र पटवा जी।

The Patwa are a Hindu Vaishya community, found mainly in North India, who are traditional weavers and jewellery business and thread workers.


History

According to the traditions of the Patwa, they descend from a deota (a Hindu god). The Patwa have many sub-groups, the Deovanshi,Deval, Raghuvanshi and Kanaujia. They fall under vaish (Baniya) category. The Patwa are an endogamous community, and follow the principle of gotra exogamy.Maheshvari is also patwa falled in baniya category They are Hindu, and worship the goddess Bhagwati. Like other Hindu artisan castes, the Patwa have a traditional caste council, which is involved in settling issues of divorce, minor disputes and cases of adultery.

Present Circumstances

The Patwa are involved in selling women's decorative articles like earrings, necklaces and cosmetics. They also deal in small household items, such as hand fans made of palm. The community was traditionally associated with threading of beads and binding together of silver and gold occupation, while others have expanded into other businesses. They are found ALL OVER INDIA, mainly in delhi, M.P,in madhya predesh patwa and lakhera is also not same lakhera is a other cast they not belong to patwa cast. Maharastra, Uttar Pradesh, in the districts of Bareilly, Badaun, Lucknow, Gorakhpur, Hardoi, Jalaun, Shahjahanpur, Sitapur, Lakhimpur-kheri, Lucknow, Jhansi and Lalitpur. a all india patwa mahasabha is also work for patwa samaj.

In Bihar, the community is sub-divided as Patwa and Tantu Patwa. Tantu patwa is another caste they do not belong to Patwa caste. The Patwas are mainly weavers and braid makers. The Tantu Patwa have three sub-groups, the Gouria, Rewar and Jurihar. The Tantu patwa are found mainly in the districts of Nalanda, Gaya, Bhagalpur, Nawada and Patna districts. There main gotras include the Gorahia, Chero, Ghatwar, Chakata, Supait, Bhor, Pancohia, Dargohi, Laheda and Rankut and the patwa are found all over Bihar. The Patwa of Bihar are now mainly power loom operators, while others have expanded into other businesses. They are a fairly successful community, and many have taken to modern education. The Patwa of Bihar have a state wide caste association, the Patwa Jati Sudhar Samiti.

साभार : सुरेश चन्द्र पटवा जी.

पटुआ मुख्य रूप से हिंदी बेल्ट के मूल निवासी हिंदू समुदाय हैं । परंपरागत रूप से, वे हिंदू बनिया थे।

पटुआ की परम्परा के अनुसार, जो लोग पट यानी धागा बांधने का काम करते थे, उन्हें पटुआ कहा जाता था। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में लोग लखेरा में विवाह करते हैं और मानते हैं कि जो लाख का काम करता है, उसे लखेरा कहते हैं। लेकिन लखेरा एक अलग समुदाय है, जो क्षत्रिय है और पिछड़ा वर्ग सूची में अलग जाति के रूप में पंजीकृत है। पटुआ एक अंतर्विवाही समुदाय है और गोत्र बहिर्विवाह के सिद्धांत का पालन करता है। वे हिंदू हैं और देवी भगवती और जगदंबा की पूजा करते हैं।

वर्तमान परिस्थितियाँ

पटुआ समुदाय के लोग महिलाओं के सजावटी सामान जैसे झुमके, हार और सौंदर्य प्रसाधन बेचते हैं। वे छोटे घरेलू सामान भी बेचते हैं, जैसे कि ताड़ के बने हाथ के पंखे। यह समुदाय पारंपरिक रूप से मोतियों को पिरोने और चांदी और सोने के धागों को एक साथ बांधने से जुड़ा हुआ था, जबकि अन्य ने अन्य व्यवसायों में भी अपना विस्तार किया है। वे पूरे भारत में पाए जाते हैं, मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गोवा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत (अखिल भारतीय श्री पटवा महासभा (1953) में।

बिहार में तांती और पटुआ समुदाय एक समान जाति है। वे पटुआ जाति से संबंधित हैं। तांती के गोत्र हैं - नाग, साल, चंदन, कश्यप। पटुआ और तांतो मुख्य रूप से नालंदा , गया , भागलपुर , नवादा और पटना जिलों में पाए जाते हैं । उनके मुख्य गोत्रों में गोरहिया, चेरो, घटवार, चकता, सुपैत, भोर, पंचोहिया, दरगोही, लहेड़ा और रंकुट शामिल हैं और पटुआ पूरे बिहार में पाए जाते हैं। बिहार के पटुआ अब मुख्य रूप से विद्युत करघा संचालक हैं, जबकि अन्य लोगों ने अन्य व्यवसायों में भी अपना विस्तार किया है। बिहार के पटुआ लोगों का एक राज्यव्यापी जाति संघ है, जिसे पटुआ जाति सुधार समिति कहा जाता है। 

अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मान सिंह ने पटुआ को राजस्थान से गया, बिहार स्थानांतरित कर दिया और उन्हें दूसरी ओर फल्गू (निरंजना नदी) के विष्णु पद मंदिर में बसाया। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, पिंड दान (पूर्वजों की पूजा के लिए समर्पित एक प्रथा) में पूजा में कपड़े का एक टुकड़ा चढ़ाना अनिवार्य है। इस मांग को पूरा करने के लिए राजा मानसिंह ने उन्हें स्थानांतरित कर दिया और इस तरह पटवा की बस्ती को मानपुर के रूप में जाना जाता है, जो राजा मानसिंह को समर्पित है। आभूषण और मंदिरों की शैली कुछ ऐसे प्रमाण हैं जो गया के पटवा संबंध को राजस्थान से जोड़ सकते हैं। वर्तमान समय में पटवा समुदाय का वंश मुंबई में रह रहा है। मुंबई में पटुआ समुदाय की गिनती 5 लाख से अधिक है, लेकिन वर्तमान समय में अधिक लोग अपने पारंपरिक काम कर रहे हैं, कई लोग अच्छी तरह से बस गए हैं। पटवा बनिया समुदाय का हिस्सा हैं

साभार : विकिपीडिया 

Monday, June 25, 2012

कर्मा माता की जीवन गाथा-MAA KARMA

कर्मा माता की जीवन गाथा-MAA KARMA

झांसी की पावन धरती में आज लगभग 1000 वर्ष पहले, बहुत ही सम्पन्न तैलकार वैश्य रामशाह के यहां सम्वत् 1073 के चैत्र कृष्ण पक्ष 11 को एक सुकन्या ने जन्म लिया। नामकरण की शुभ बेला में पिता रामशाह ने अपना निर्णय सुनाया कि मेरे सत्कार्यों से मुझे बेटी मिली है, इसलिए मैं उनका नाम कर्माबाई रखूंगा। चंद्रमा की सोलह कलाओं की तरह कर्मा बाई उम्र की सीढ़ियां पार कर गई। परिवार से धार्मिक संस्कार तो मिला ही था, इसलिए बचपन से भगवान श्रीकृष्ण के भजन-पूजन आराधना में ही विशेष आनंद मिलता था।

समय के साथ नरवर के एक समृध्द तैलकार वैश्य के परिवार में कर्माबाई की शादी हुई। पति महोदय के अत्यधिक आमोद प्रियता से किंचित कर्माबाई दुखी रहती थी, परंतु पति व्यवहार को शालीनतापूर्वक निभाते हुए यही कोशिश कर रही थी कि पति महोदय भी ईश्वर चिंतन की ओर आकृष्ट हो जाए। एक दिन पूजा-पाठ से रुष्ट होकर पति महोदय ने पूछा, मैं साफ-साफ कहना चाहता हूं, तुम्हें किससे सुख मिलता है, पति सेवा में या ईश्वर सेवा में। बड़े ही शांति स्वर में कर्माबाई ने कहा- मुझे वही कार्य करने में सुख मिलता है, जिसमें आप प्रसन्न रहें। यही पत्नी का धर्म है। इस प्रकार अपने शांत, धार्मिक प्रवृत्ति, पत्निव्रता धर्म से अपने पति के हृदय में भगवान के प्रति अनुराग पैदा करने में सफल रही। समय के साथ सुखी जीवन में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।

इसी समय कर्मा माता की परीक्षा की दूसरी घड़ी आई। नरवर के नरेश के प्रिय सवारी हाथी को असाध्य खुजली का रोग हो गया। बड़े-बड़े राजवैद्यों की नाड़ी ठंडी हो गई। इसी बीच किसी दुष्ट ने राजा को सुझाव दिया कि कुण्डभर तेल में हाथी को नहलाया जाए तो हाथी पूर्णरूप से ठीक हो जाएगा। फिर क्या था, राजा का आदेश तुरंत प्रसारित किया गया। महीना भर कुण्ड भरा न जा सका। नरवर के जागरूक सामाजिक नेता होने के कारण, पति महोदय का चिंतित होना स्वाभाविक था। पति को चिंतित एवं कारण जानकर कर्मा माता भी चिंतित हो गई।

सारे तैलिक वैश्य समाज की इात को बचाने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण को अंतरात्मा की पूरी आवाज लगा दी। सचमुच ही भगवान की लीला से कुण्ड भर गया, सारा आकाश भक्त कर्मा की जय-जयकारों से गूंजने लगा। उसी समय भक्त कर्मा ने पतिदेव से निवेदन किया कि अब हम इस नर निशाचर राजा के राज में नहीं रहेंगे और सारा तैलिक वैश्य समाज, नरवर से झांसी चला गया। आज भी नरवर में एक भी तैलिक नहीं मिलेगा, परंतु झांसी में हजारों तैलिक परिवार मिलेंगे। समय चक्र से कोई नहीं बचा है, अचानक अस्वस्थता से पति का निधन हो गया, पति के चिता के साथ सती होने का संकल्प कर लिया। इसी समय आकाशवाणी हुई। यह ठीक नहीं है, बेटी तुम्हारे गर्भ में एक शिशु पल रहा है, समय का इंतजार करो मैं तुम्हें जगन्नाथपुरी में दर्शन दूंगा। समय के साथ घाव भी भर जाते हैं, कुछ समय बाद दूसरे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तीन चार वर्ष बीतते-बीतते बार-बार मन कहता था, मुझे भगवान के दर्शन कब होंगे। निदान एक भयानक रात के सन्नाटे में भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ खिचड़ी लेकर पुरी के लिए निकल पड़ी। चलते-चलते थककर एक छांव में विश्राम करने लग गई, आंख लग गई, आंख खुली तो माता कर्मा अपने आपको जगन्नाथपुरी में पाई।

आश्चर्य से खुशी में भक्तिरस में डूबी, खिचड़ी का प्रथम भोग लगाने सीढ़ियों की ओर बढ़ी। उसी समय पूजा हो रही थी। पुजारी ने माता कर्मा को धकेल दिया इससे माता कर्मा गिर पड़ी। रोते हुए माता कर्मा पुकारती है- हे! जगदीश आप पुजारियों की मरजी से कैद क्यों है? आपको सुनहरे कुर्सी ही पसंद है, क्यों? तुरंत आकाशवाणी हुई, कर्मा मैं प्रेम का भूखा हूं। मैं मंदिर से निकल कर आ रहा हूं। भगवान श्रीकृष्ण कर्मा के पास आए और बोले- कर्मादेवी, मुझे खिचड़ी खिलाइए। माता कर्मा भाव विभोर होकर खिचड़ी खिलाने लगी भक्त माता को भगवान ने कहा- हम तुम्हारे भक्ति से प्रसन्न हो गए हैं कुछ भी वरदान मांगो। माता ने कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आप मेरी खिचड़ी का भोग लगाया करें। मैं बहुत थक चुकी हूं मुझे आपके चरणों में जगह दे दीजिए। इस प्रकार भगवान के चरणों में गिरकर परमधाम को प्राप्त हो गई। तब से भगवान जगन्नाथ को नित्य प्रतिदिन खिचड़ी का भोग आज तक लग रहा है। वही खिचड़ी जो महाप्रसाद कहलाती है।

Friday, June 22, 2012

माहेश्वरी इतिहास, उत्पत्ति-MAHESHWARI HISTORY & ORIGIN

आज माहेश्वरी समाज में बहुत से लोग है जो नहीं जानते की माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई……? हम सभी को पता होना चाहिए की माहेश्वरी का इतिहास क्या हैं…..? क्यों माहेश्वरीयों में विवाह परंपरा को बहुत महत्वपूर्ण विधि माना जाता है? क्यों विवाह की विधि में लड़का मोड़ और कट्यार धारण करता है? क्यों माहेश्वरियों मैं महेश नवमी को विवाह की सर्वश्रेष्ठ तिथि मानते है? 


माहेश्वरी वंशउत्पत्ति : 

खंडेला नगर में सूर्यवंशी राजाओं में चौव्हान जाती का राजा खड्गल सेन राज्य करता था. इसके राज्य में सारी प्रजा सुख और शांती से रहती थी. राजा धर्मावतार और प्रजाप्रेमी था, परन्तु राजा का कोई पुत्र नहीं था. राजा ने मंत्रियो से परामर्श कर पुत्रेस्ठी यज्ञ कराया. ऋषियों ने आशीवाद दिया और साथ-साथ यह भी कहा की तुम्हारा पुत्र बहुत पराक्रमी और चक्रवर्ती होगा पर उसे 16 साल की उम्र तक उत्तर दिशा की ओर न जाने देना. राजा ने पुत्र जन्म उत्सव बहुत ही हर्ष उल्लास से मनाया. ज्योतिषियों ने उसका नाम सुजानसेन रखा. सुजानसेन बहुत ही प्रखर बुद्धि का व समझदार निकला, थोड़े ही समय में वह विद्या और शस्त्र विद्या में आगे बढ़ने लगा. देवयोग से एक जैन मुनि खड़ेला नगर आए और सुजान कुवर ने जैन धर्म की शिक्षा लेकर उसका प्रचार प्रसार शुरू कर दिया. शिव व वैष्णव मंदिर तुडवा कर जैन मंदिर बनवाए, इससे सारे राज्य में जैन धर्मं का बोलबाला हो गया.

एक दिन राजकुवर 72 उमरावो को लेकर शिकार करने जंगल में उत्तर दिशा की और ही गया. सूर्य कुंड के पास जाकर देखा की वहाँ 6 ऋषि यज्ञ कर रहे थे ,वेद ध्वनि बोल रहे थे ,यह देख वह आग बबुला हो गया और क्रोधित होकर बोला इस दिशा में मुनि यज्ञ करते हे इसलिए पिताजी मुझे इधर आने से रोकते थे. उसी समय उमरावों को आदेश दिया की यज्ञ विध्वंस कर दो और यज्ञ सामग्री नष्ट कर दो.

इससे ऋषि भी क्रोध में आ गए और उन्होंने श्राप दिया की सब पत्थर बन जाओ l श्राप देते ही राजकुवर सहित 72 उमराव पत्थर बन गए. जब यह समाचार राजा खड्गल सेन ने सुना तो अपने प्राण तज दिए. राजा के साथ 16 रानिया सती हुई.

राजकुवर की कुवरानी चन्द्रावती उमरावों की स्त्रियों को साथ लेकर ऋषियो की शरण में गई और श्राप वापस लेने की विनती की तब ऋषियो ने उन्हें बताया की हम श्राप दे चुके हे तुम भगवान गोरीशंकर की आराधना करो. यहाँ निकट ही एक गुफा है जहा जाकर भगवान महेश का अष्टाक्षर मंत्र का जाप करो. भगवान की कृपा से वह पुनः शुद्ध बुद्धि व चेतन्य हो जायेंगे. राजकुवरानी सारी स्त्रियों सहित गुफा में गई और तपस्या में लीन हो गई.

भगवान महेशजी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वहा आये, पार्वती जी ने इन जडत्व मूर्तियों के बारे में भगवान से चर्चा आरम्भ की तो राजकुवरानी ने आकर पार्वतीजी के चरणों में प्रणाम किया. पार्वतीजी ने आशीर्वाद दिया की सौभाग्यवती हो, इस पर राजकुवरानी ने कहा हमारे पति तो ऋषियों के श्राप से पत्थरवत हो गए है अतः आप इनका श्राप मोचन करो. पार्वतीजी ने भगवान महेशजी से प्रार्थना की और फिर भगवान महेशजी ने उन्हें चेतन में ला दिया. चेतन अवस्था में आते ही उन्होंने पार्वती-महेश को घेर लिया. इसपर भगवान महेश ने कहा अपनी शक्ति पर गर्व मत करो और छत्रियत्व छोड़ कर वैश्य वर्ण धारण करो. 72 उमरावों ने इसे स्वीकार किया पर उनके हाथो से हथिहार नहीं छुटे. इस पर भगवान महेशजी ने कहा की सूर्यकुंड में स्नान करो ऐसा करते ही उनके हथिहार पानी में गल गए उसी दिन से लोहा गल (लोहागर) हो गया (लोहागर- सीकर के पास, राजस्थान). सभी स्नान कर भगवान महेश की प्रार्थ्रना करने लगे. 

फिर भगवान महेशजी ने कहा की आज से तुम्हारे वंशपर (धर्मपर) हमारी छाप रहेगी यानि तुम वंश (धर्म) से “माहेश्वरी’’ और वर्ण से वैश्य कहलाओगे और अब तुम अपने जीवनयापन (उदर निर्वाह) के लिए व्यापार करो तुम इसमें खूब फुलोगे-फलोगे. 

अब राजकुवर और उमरावों ने स्त्रियों (पत्नियोंको) को स्वीकार करनेसे मना किया, कहा की हम तो धर्म से “माहेश्वरी’’ और वर्ण से वैश्य बन गए है पर ये अभी क्षत्रानिया (राजपुतनियाँ) है. हमारा पुनर्जन्म हो चूका हे, हम इन्हें कैसे स्वीकार करे. तब माता पार्वती ने कहा तुम सभी स्त्री-पुरुष हमारी चार बार परिक्रमा करो जो जिसकी पत्नी है अपने आप गठबंधन हो जायेगा. इसपर राजकुवरानी ने पार्वति से कहा की पहले तो हमारे पति राजपूत-क्षत्रिय थे, हथियारबन्द थे तो हमारी और हमारे मान की रक्षा करते थे अब हमारी और हमारे मान की रक्षा ये कैसे करेंगे तब पार्वति ने सभी को दिव्य कट्यार (कटार) दी और कहाँ की अब आपका पेशा युद्ध करना नहीं बल्कि व्यापार करना है लेकिन अपने स्त्रियों की और मान की रक्षा के लिए 'कट्यार' (कटार) को हमेशा धारण करेंगे. मे शक्ति स्वयं इसमे बिराजमान रहूंगी. तब सब ने महेश-पार्वति की चार बार परिक्रमा की तो जो जिसकी पत्नी है उनका अपने आप गठबंधन हो गया (एक-दो जगह उल्लेख मिलता है की 13 स्त्रियों ने भी कट्यार धारण करके गठबंधन की परिक्रमा की). इस गठबंधन को 'मंगल कारज' कहा गया. [उस दिन से मंगल कारज (विवाह) में बिन्दराजा मोड़ (मान) और कट्यार (कटार) धारण करके, 'महेश - पार्वती' की तस्बीर को विधिपूर्वक स्थापन करके उनकी चार बार परिक्रमा करता है इसे 'बारला फेरा' (बाहर के फेरे) कहा जाता है.) ये बात याद रहे इसलिए चार फेरे बाहर के लिए जाते है. सगाई में लड़की का पिता लडके को मोड़ और कट्यार भेंट देता है इसलिए की ये बात याद रहे - अब मेरे बेटीकी और उसके मान की रक्षा तुम्हे करनी है. जिस दिन महेश-पार्वति ने वरदान दिया उस दिन युधिष्टिर संवत 9 (विक्रम संवत ८) जेष्ट शुक्ल नवमी थी. तभी से माहेश्वरी समाज आज तक “महेश नवमी ’’ का त्यौहार बहुत धूम धाम से मनाता आ रहा है…..]

ऋषियों ने आकर भगवान से अनुग्रह किया की प्रभु इन्होने हमारे यज्ञ को विध्वंस किया और आपने इन्हें श्राप मोचन (श्राप से मुक्त) कर दिया इस पर भगवान महेशजी ने कहा - आजसे आप इनके (माहेश्वरीयोंके) गुरु है. ये तुम्हे गुरु मानेंगे. तुम्हे 'गुरुमहाराज' के नाम से जाना जायेगा. भगवान महेशजी ने कुवरानी चन्द्रावती को भी गुरु पद दिया. इन सबको दायित्व सौपा गया की, वह माहेश्वरियों को सत्य, प्रेम और न्यायके मार्गपर चलनेका मार्गदर्शन करते रहेंगे [माहेश्वरी स्वयं को भगवान महेश-पार्वती की संतान मानते है. माहेश्वरीयों में 'शिवलिंग' स्वरुप में पूजा का विधान नहीं है; माहेश्वरीयों में 'भगवान महेश-पार्वती-गणेशजी' की एकत्रित प्रतिमा / तसबीर के पूजा का विधान (रिवाज/परंपरा) है. कई शतकों तक गुरु मार्गदर्शित व्यवस्था बनी रही. तथ्य बताते है की प्रारंभ में 'गुरुमहाराज' द्वारा बताई गयी नित्य प्रार्थना, वंदना (महेश वंदना), नित्य अन्नदान, करसेवा, गो-ग्रास आदि नियमोंका समाज कड़ाई से पालन करता था. फिर मध्यकाल में भारत के शासन व्यवस्था में भारी उथल-पुथल तथा बदलाओंका दौर चला. दुर्भाग्यसे जिसका असर माहेश्वरियों की सामाजिक व्यवस्थापर भी पड़ा और जाने-अनजाने में माहेश्वरी अपने गुरूओंको भूलते चले गए. जिससे समाज की बड़ी क्षति हुई है और आज भी हो रही है.].


फिर भगवान महेशजी ने सुजान कुवर को कहा की तुम इनकी वंशावली रखो, ये तुम्हे अपना जागा मानेंगे. तुम इनके वंश की जानकारी रखोंगे, विवाह-संबन्ध जोड़ने में मदत करोगे और ये हर समय, यथा शक्ति द्रव्य देकर तुम्हारी मदत करेंगे. 

जो 72 उमराव थे उनके नाम पर एक-एक जाती बनी जो 72 खाप (गोत्र ) कहलाई. फिर एक-एक खाप में कई नख हो गए जो काम के कारण गाव व बुजुर्गो के नाम बन गए है.

कहा जाता है की आज से लगभग 2500-2600 वर्ष पूर्व (इसवीसन पूर्व 600 साल) 72 खापो के माहेश्वरी मारवाड़ (डीडवाना) राजस्थान में निवास करते थे. इन्ही 72 खापो में से 20 खाप के माहेश्वरी परिवार धकगड़ (गुजरात) में जाकर बस गए. वहा का राजा दयालु, प्रजापालक और व्यापारियों के प्रति सम्मान रखने वाला था. इन्ही गुणों से प्रभावित हो कर और 12 खापो के माहेश्वरी भी वहा आकर बस गए. इस प्रकार 32 खापो के माहेश्वरी धकगड़ (गुजरात) में बस गए और व्यापर करने लगे. तो वे धाकड़ माहेश्वरी के नामसे पहचाने जाने लगे. समय व परिस्थिति के वशीभूत होकर धकगड़ के कुछ माहेश्वरियो को धकगड़ भी छोडना पड़ा और मध्य भारत में आष्टा के पास अवन्तिपुर बडोदिया ग्राम में विक्रम संवत 1200 के आस-पास आज से लगभग 810 वर्ष पूर्व, आकर बस गए. वहाँ उनके द्वारा निर्मित भगवान महेशजी का मंदिर जिसका निर्माण संवत 1262 में हुआ जो आज भी विद्यमान है एवं अतीत की यादो को ताज़ा करता है. माहेश्वरियो के 72 गोत्र में से 15 खाप (गोत्र ) के माहेश्वरी परिवार अलग होकर ग्राम काकरोली राजिस्थान में बस गए तो वे काकड़ माहेश्वरी के नामसे पहचाने जाने लगे (इन्होने घर त्याग करने के पहले संकल्प किया की वे हाथी दांत का चुडा व मोतीचूर की चुन्धरी काम में नहीं लावेंगे अतः आज भी काकड़ वाल्या माहेश्वरी मंगल कारज (विवाह) में इन चीजो का व्यवहार नहीं करते है.) पुनः माहेश्वरी मध्य भारत और भारत के कई स्थानों पर जाकर व्यवसाय करने लगे.........

जन्म-मरण विहीन एक ईश्वर (महेश) में आस्था और मानव मात्र के कल्याण की कामना माहेश्वरी धर्म के प्रमुख सिद्धान्त हैं. माहेश्वरी समाज सत्य, प्रेम और न्याय के पथ पर चलता है. कर्म करना, बांट कर खाना और प्रभु का नाम जाप करना इसके आधार हैं. माहेश्वरी अपने धर्माचरण का पूरी निष्ठा के साथ पालन करते है तथा वह जिस स्थान / प्रदेश में रहते है वहां की स्थानिक संस्कृति का पूरा आदर-सन्मान करते है, इस बात का ध्यान रखते है; यह माहेश्वरी समाज की विशेष बात है. आज तकरीबन भारत के हर राज्य, हर शहर में माहेश्वरीज बसे हुए है और अपने अच्छे व्यवहार के लिए पहचाने जाते है.



माहेश्वरी वंशउत्पत्ति




Mahesh parivar (Bhagvan Mahesh ji, sarvakulmata Aadishakti maa Bhavani & sukhakarta-dukhharta Ganesh ji)

बनियागिरी और बंजारापन

बनियागिरी और बंजारापन

किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।

उत्तर वैदिक काल में पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, औरपणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था।

उत्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणिजैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ। पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है।पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है। आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है। वैदिक साहित्य में पणियों को पशु चोर बताया गया है। गौरतलब है कि आर्य पशुपालक समाज के थे जहां पशु ही सम्पत्ति थे। सामान्य व्यापारी जिस तरह तोलने में गड़बड़ी कर लाभ कमाना चाहता है, संभव है प्राचीनकाल में वस्तु-विनिमय के दौरान पणियों द्वारा आर्यजनों से पशुओं की ऐसी ही ठगी सामान्य बात रही हो। इसीलिए वैदिक संदर्भों में पणियों को पशु चोर बताया गया हो। कृषि-संस्कृति से जुड़े आर्यों को पणियों का वाणिज्यजीवी होना, ब्याज की धन राशि लेना और लाभ कमाना निम्नकर्म लगता था और वे उन्हें अपने से हेय समझते थे।

हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है। वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है। इससे ही बना है वाणिज्य औरवणिक जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है। पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा-वणिक>बणिक>बनिअ>बनिया। इससे हिन्दी में कुछ नए शब्द रूप भी सामने आए मसलन वणिकवृत्ति के लिए बनियागीरी या बनियापन। इन शब्दों में मुहावरों की अर्थवत्ता समायी है और सामान्य कारोबारी प्रवृत्ति का संकेत न होकर इसमें ज़रूरत से ज्यादा हिसाब-किताब करना , नापतौल की वृत्ति अथवा कंजूसी भी शामिल है।

यायावरी, डगर-डगर घूमना, आवारगी आदि भावों को प्रकट करने के लिए हिन्दी-उर्दू में बंजारा शब्द है। इसकी रिश्तेदारी भी पण् से है। पण् से बना वाणिज्य अर्थात व्यापार। इस तरह व्यापार करनेवाले के अर्थ में वणिक के अलावा एक नया शब्द और बना वाणिज्यकारक इस शब्द के बंजारा में ढलने का क्रम कुछ यूं रहा -वाणिज्यकारक > वाणिजारक > वाणिजारा > बणिजारा > बंजारा। प्राचीनकाल में इन वाणिज्यकारकों की भूमिका वणिको से भिन्न थी। वणिक श्रेष्ठिवर्ग में आते थे और वाणिज्यकारक मूलत फुटकर या खेरची कारोबारी थे। रिटेलर की तरह। वाणिज्यकारक भी घूम घूम कर लोगों को उनकी ज़रूरतों का सामान उपलब्ध कराते थे। स्वभाव की भटकन को व्यक्त करने के लिए बंजारापन जैसा शब्द हिन्दी को इसी घुमक्कड़ी वृत्ति ने दिया है। यह परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में फेरीवालों के रूप में प्रचलित है। सामाजिक परिवर्तनों के तहत धीरे धीरे वाणिज्यकारकों की हैसियत में बदलाव आया। क्रय-विक्रय से हटकर उन्होंने कुछ विशिष्ट कुटीर-कर्मों और कलाओं को अपनाया मगर शैली वही रही घुमक्कड़ी की। इस रूप में बंजारा शब्द को जातिसूचक दर्जा मिल गया। ये बंजारे घूम-घूम कर जादूगरी, नट-नटी के तमाशे(नट-बंजारा), जड़ी-बूटी, झाड-फूंक आदि के कामों लग गए। कहीं कहीं रोज़गार की उपलब्धता में कमी के चलते बंजारों का नैतिक पतन भी हुआ। कुल मिलाकर किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।

 

 

पणिक से वणिक और बनिया बनते-बनते हिन्दी को कुछ नए शब्द भी मिले जैसे बनियागीरी या बनियापन।वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि, पणम, फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर कोपणिक्कर भी लिखा जाता है। प्रख्यात विद्वान डॉ सम्पूर्णानंद पणियों(फिनीशी/प्यूनिक) को पूर्वी भारत का एक जाति समूह बताते हैं जो बाद में पश्चिम के सागर तट से होता हुआ ईरान तक फैल गया। हड़प्पा और सिन्धु घाटी की सभ्यता पर गौर करें तो यह धारणा ज्यादा सटीक लगती है क्योंकि इस सभ्यता का विस्तार सिन्ध के समुद्रतट से लेकर दक्षिण गुजरात के समुद्र तट तक होने के प्रमाण मिले हैं। डॉ भगवतशरण उपाध्याय भी भारतीय संस्कृति के स्रोत पुस्तक में फिनीशियाई लोगों अर्थात फणियों के भारत भूमि पर बसे होने का उल्लेख करते हैं हालांकि वे ये स्पष्ट संकेत नहीं करते कि ये लोग कहां के मूल निवासी थे। आर्य संस्कृति से पश्चिमी जगत को परिचित कराने का श्रेय फिनिशियों को ही दिया जाता है। ये लोग अपने लंबं-चौड़े व्यापारिक कारवां(सार्थवाह) एशियाई देशों से योरप तक ले जाते थे। वाणिज्यकर्म के साथ ही ये लोग विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति के बीज भी अनायास ही छोड़ आते थे।

जो भी हो, पश्चिमी एशिया में और यूरोप के मूमध्यसागरीय क्षेत्र में किसी ज़माने में फिनिशियों (पणियों) की अनेक बस्तियां थीं। कार्थेज उनका केंद्र बन चुका था। यहां के फिनिशियों के लिए प्यूनिक नाम भी प्रचलित रहा है। रोमन साम्राज्य के साथ सदियों तक इन प्यूनिकों का युद्ध चला और अंततः यह समुदाय इतिहास में अपने उद्गम की कई गुत्थियां और अस्तित्व के स्पष्ट संकेत छोड़ते हुए ईसा से एक सदी पहले तक विलीन हो चुका था। इसके बावजूद इन्हें खोजने का काम पुरातत्ववेत्ता आज भी जारी रखे हुए हैं। जीनोग्राफिक तकनीक के जरिये हाल ही में यह पता चला है कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में कई स्थानों पर पर प्राचीन फिनीशियों के कई वंशज विभिन्न समाजों में घुले-मिले हैं। मगर फिनिशियों का भारतीय पणियों से रिश्ता स्थापित करने के लिए इस शोध का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है। फिलहाल तो प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के आधार पर देशी-विदेशी विद्वान भारतीय पणियों, प्रकारांतर से फिनिशियों के रिश्ते स्थापित कर ही चुके हैं। इतिहास-पुरातत्व के साथ प्रामाणिकता का द्वन्द्व हमेशा रहा है और इस क्षेत्र में अंतिम सत्य कुछ नहीं होता।

Posted by Badshah Naik साभार : गोरमती

हिंसा छोड़ कर्म का संदेश देती है - महेश नवमी

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२० जून यानि ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को महेश नवमी या महेश जयंती का उत्सव माहेश्वरी समाज द्वारा मनाया जाता है। यह उत्सव महेश यानि शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। महेश यानि शंकर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से एक हैं। ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के नवें दिन भगवान शंकर की कृपा से माहेश्वरी समाज की उत्त्पत्ति हुई। 



धर्मग्रंथों के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज पूर्वकाल में क्षत्रिय वंश के थे, शिकार के दौरान वह ऋषियों के शाप से ग्रसित हुए। किंतु इस दिन भगवान शंकर ने उन्हें शाप से मुक्त कर न केवल पूर्वजों की रक्षा की बल्कि इस समाज को अपना नाम भी दिया। इसलिए यह समुदाय माहेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिसमें महेश यानि शंकर और वारि यानि समुदाय या वंश। भगवान शंकर की आज्ञा से ही इस समाज के पूर्वजों ने क्षत्रिय कर्म छोड़कर वैश्य या व्यापारिक कार्य को अपनाया। इसलिए आज भी माहेश्वरी समाज वैश्य या व्यापारिक समुदाय के रुप में पहचाना जाता है। माहेश्वरी समाज के ७२ उपनामों या गोत्र का संबंध भी इसी प्रसंग से है। 

माहेश्वरी समाज के लिए यह दिन बहुत धार्मिक महत्व का होता है। इस उत्सव की तैयारी करीब तीन दिन पूर्व ही शुरु हो जाती है। जिनमें धार्मिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन उमंग और उत्साह के साथ होता है। जय महेश के जयकारों की गूंज के साथ चल समारोह निकाले जाते हैं। महेश नवमी के दिन भगवान शंकर और पार्वती की विशेष आराधना की जाती है। समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन भगवान शंकर और पार्वती के प्रति पूर्ण भक्ति और आस्था प्रगट करता है। 

जगत कल्याण करने वाले भगवान शंकर ने जिस तरह क्षत्रिय राजपूतों को शिकार छोड़कर व्यापार या वैश्य कर्म अपनाने की आज्ञा दी। यानि हिंसा को छोड़कर अहिंसा के साथ कर्म का मार्ग बताया। इससे महेश नवमी का यह उत्सव यही संदेश देता है कि मानव को यथासंभव हर प्रकार की हिंसा का त्याग कर जगत कल्याण, परोपकार और स्वार्थ से परे होकर कर्म करना चाहिए।

साभार : दैनिक भास्कर 

यह है माहेश्वरी समाज के ७२ उप कुल या नाम-MAHESHWARI GOTRA

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यह है माहेश्वरी समाज के ७२ उप कुल या नाम-MAHESHWARI GOTRA 


हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार शिव कृपा से शापग्रस्त ७२ क्षत्रियों को मिले जीवनदान से माहेश्वरी समाज के साथ ही उसके ७२ उप कुल, गोत्र या नाम की उत्पत्ति भी हुई। वह उपनाम, गोत्र या कुल इस प्रकार है- 

आगीवाल, अगसूर, अजमेरा, असावा, अटल

बाहेती, बिरला, बजाज, बदली, बागरी, बलदेवा, बांदर, बंग, बांगड़, भैय्या, भंडारी, भंसाली, भट्टड़, भट्टानी, भूतरा, भूतड़ा, भूतारिया, बिदाड़ा, बिहानी, बियानी 

चाण्डक, चौखारा, चेचानी, छप्परवाल, चितलंगिया, दाल्या, दलिया, दाद, डागा, दम्मानी, डांगरा, दारक, दरगर, देवपूरा, धूपर, धूत, दूधानी, 

फलोद, गादिया, गट्टानी, गांधी, गिलदा, गोदानी, 

हेडा, हुरकत,ईनानी, 

जाजू, जखोतिया, झंवर, 

काबरा, कचौलिया, काहल्या, कालानी, कलंत्री, कंकानी, करमानी, करवा, कसत, खटोड़, कोठरी, 

लड्ढा, लाहोटी, लखोटिया, लोहिया, 

मालानी, माल, मालपानी, मालू, मंधाना, मंडोवरा, मनियान, मंत्री, मरदा, मारु, मारू, मिमानी, मोडानी, मोहता, मोहाता, मुंदड़ा, 

नागरानी, ननवाधर, नथानी, नवलखाम, नवल या नुवल, नोवल, न्याती

पचीसिया, परतानी, पलोड़, पटवा, पनपालिया, पेडि़वाल, परमाल, फूमरा, राठी, 

साबू, सनवाल, सारड़ा, शाह, सिकाची, सिंघई, सोडानी, सोमानी, सोनी, 

तपरिया, ताओरी, तेला, तेनानी, थिरानी, तोशनीवाल, तोतला, तुवानी, जवर 



साभार : दैनिक भास्कर 

महेश यानि शंकर का समुदाय है माहेश्वरी

पौराणिक कथा अनुसार राजस्थान के खण्डेला राज्य में राजपूत राजा खण्डेलसेन शासन करता था। वह और उसकी दो रानियों सूर्यकुंवर और इंद्र कुंवर की कोई संतान न थी। तब नि:संतान होने से दु:खी राजा को महर्षि याज्ञवल्क्य ने शिव आराधना करने को कहा। शिवकृपा से राजा को पुत्र प्राप्ति हुई। जिसका नाम सुजनसेन रखा गया।

सुजनसेन के बारे में राज पुरोहितों ने भविष्यवाणी की कि यह बहुत शक्तिशाली और चक्रवर्ती होगा। किंतु इसके जीवन में एक छोटी सी घटना दु:ख का कारण बनेगी। किंतु उस घटना का अंत बहुत सुखद होगा।

एक बार राजा सुजनसेन जंगल में शिकार के दौरान अपने ७२ सैनिकों के साथ रास्ता भटक गए और भूख से पीडि़त होने लगे। वह भटकते हुए एक आश्रम के करीब पहुंचे। वहां कुछ ऋषि शिव यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने भूखे और प्यासे होने से आश्रम में जाकर यज्ञ के लिए बने प्रसाद को खा लिया, जल भी पी लिया, यहां तक कि अपने शिकार में उपयोग किए गए गंदे हथियारों को भी उस सरोवर में धो लिया। जिसका जल यज्ञ के लिए उपयोग में लिया जाता था। उनके इस तरह के कार्यों से ऋषियों का यज्ञ और तपस्या भंग हो गई। जिससे ऋषियों ने क्रोधित होकर राजा सुजनसेन और ७२ सैनिकों को पत्थर बन जाने का शाप दिया।

राजा और सैनिकों के घर न लौटने पर उनकी पत्नीयां महर्षि जाबाली के पास गई। महर्षि ने सारी घटना बताई और शाप से मुक्ति के लिए उसी सरोवर के पास जाकर शिव आराधना करने का उपाय बताया। रानी और सैनिकों की शिव आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव और पार्वती प्रगट हुए। उन्होनें राजा और सैनिकों से कहा कि पापकर्मों, शक्ति के गलत उपयोग और देव अपराध के कारण तुम्हारा यह हाल हुआ।

तुम्हारी पत्नियों की आराधना से प्रसन्न होकर मैं तुम सभी को शाप मुक्त कर नया जीवन देता हूं। लेकिन अब से तुम क्षत्रिय धर्म और हिंसक वृत्ति छोड़कर वैश्य धर्म और कर्म से जीवन व्यतीत करोगे। तुम सभी अब मेरे नाम यानि माहेश्वरी नाम से पहचाने जाओगे।

इससे राजा और सैनिक तो वैश्य बन गए। किंतु रानी और सैनिक पत्नी क्षत्रिय ही रहीं। इस धर्म संकट से मुक्ति का उपाय माता पार्वती ने बताया। उन्होंने राजा, रानी और सैनिक पत्नियों से कहा कि वह सभी अपनी-अपनी पत्नियों के साथ गठबंधन कर मेरे चार फेरे लगाएं। इससे रानी और सैनिकों की पत्नियां भी वैश्य धर्म के योग्य हो जाएंगी। इसलिए आज भी माहेश्वरी समाज के विवाह में चार फेरे लेने की परंपरा है।इस प्रकार शंकर और पार्वती की कृपा से माहेश्वरी समुदाय और उसके ७२ उप कुलों का उत्त्पत्ति युधिष्ठिर संवत के नवें वर्ष में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के नवें दिन मानी जाती है।


साभार : दैनिक भास्कर

चोरसिया वैश्य समुदाय का इतिहास(CHOURASIA)

चौरसिया प्राचीन भारतीय वेदों से उत्पन्न शब्द है जो मूलतः एक वैदिक शब्द 'chaturashiitah' जो sansakrita में चौरासी उल्लेख से भारत, चौरसिया शब्द संभालते में एक ब्राह्मण समुदाय संदर्भित करता है. प्राचीन भारत के बाद से, यह हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है वहाँ चौरासी Yonis इस ब्रह्मांड में मौजूदा देवताओं के हजारों (नस्लों, प्रकार) हैं. हर प्रजाति है जो पृथ्वी पर मौजूद किसी खास योनि के हैं. बाद में मंच पर और आसान उच्चारण यह चौरसिया '(एक हिंदी बराबर भी चौरासी संदर्भित करता है) के रूप में बदल के लिए

इस शब्द राज्यों के जन्म कि एक बार सभी देव Gans (Devtas, परमेश्वर) नामक जगह पर धरती पर इकट्ठा पीछे एक प्रसिद्ध कहानी के लिए कुछ शुभ रस्म है, और जब वे वापस करने के लिए 'Bakunthya धाम' (स्वर्ग आ रहे थे 'Naumi Sharayan' ) वे सब महसूस कारण पृथ्वी पर अत्यधिक गर्मी जब एक विशेष समुदाय आगे आए और उन्हें Beatle छोड़ देता है. उनके आतिथ्य से प्रभावित की सेवा करके अपनी प्यास quenched को प्यासा, Devtas उन्हें न केवल धन्य बल्कि उन्हें शीर्षक chaturashiitah यानी उपहार देने के द्वारा सम्मानित शुरू कर दिया ' चौरसिया '. के अनुसार Baudhâyanas'rauta-सूत्र है Kashyapa के हैं चौरसिया, कुछ का मानना है कि वे [भार m ाज] के हैं, तो वहाँ Gotras के बारे में कई मान्यताओं रहे हैं.

इस समुदाय के लोगों को हाल के दिनों में व्यवसायों की एक किस्म में काम कर रहे हैं (कुछ भी खुद के रूप में 'वैश्य' यानी व्यापारियों संदर्भित करता है) और उनकी धार्मिक परंपराओं और संस्कृति दैनिक जीवन में एक कारक के कम होते जा रहे हैं.

CHOURASIA का इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मोहिनी विभिन्न देवताओं के बीच Amrut (अमृत) वितरित की. Amrut के शेष के साथ कलश है इन्द्र हाथी «Nagraja» के पास रखा गया था. कलश के अंदर बढ़ते एक अजीब जीव संयंत्र था और देवताओं उन्मादपूर्ण हो गया. विष्णु Dhanvantari करने का आदेश दिया संयंत्र की जांच. वह इस प्रकार अपने उत्तेजक गुणवत्ता की खोज की. तब से, विष्णु को इसकी पत्तियों प्यार और स्नेह का एक संकेत के रूप में, की पेशकश करना शुरू किया. के बाद से, यह कहा जाता है कि पान trine पैदा हुआ था. यह करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ट्रिनिटी के साथ जुड़े होने लगे. सुपारी ब्रह्मा, Tambool (पान) विष्णु और महेश पत्ती के लिए चूने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. एक अन्य कथा के अनुसार, हस्तिनापुर पर 'पांडवों जीत के बाद, वे Tambool के लिए एक उत्कट इच्छा है शुरू किया. एक दूत तत्काल साँपों की रानी के भूमिगत निवास करने के लिए भेजा गया था. रानी, केवल भी खुश उपकृत करने के लिए उसकी छोटी उंगली का चरम अऋगुली की पोर में कटौती और पांडवों के लिए भेजा. अऋगुली की पोर महान समारोह के साथ लगाया गया था और जल्द ही पान संयंत्र अऋगुली की पोर से बाहर हो गया. लता है तब से «Nagveli» के रूप में साँप संयंत्र के लिए भेजा. पत्तियों का समारोह इस मूल और इस अवसर पर साँप की Barais प्रस्ताव भगवान से प्रार्थना स्मारक है.

GOTRAS और उप डाले

* Kashyapa


* भारद्वाज


* शांडिल्य


* ऋषि


* ब्रह्मचारी


* Gaurhar


* चौरसिया


* Barai


* Tamoli


* भगत


* Chaurishi


* चौधरी

उप डाले

निम्नलिखित क्षेत्रीय वरीयताएँ द्वारा चौरसिया उपनाम के पर्यायवाची शब्द हैं:


* चौरसिया (Belarampur, पट्टी, प्रतापगढ़) (उप्र)


* चौरसिया (भारत भर में)


* Chourasia (उत्तर पूर्व भारत के कुछ भाग)


Chaurishi * (उत्तर भारत के पार्ट्स)


जायसवाल (उत्तर भारत) *


भारद्वाज * (भारत भर में)


* कश्यप (उत्तर भारत)


* नाग (उत्तर / पूर्वी भारत)


* भगत (उत्तर / पूर्व भारत)


* Barai (पश्चिम बिहार / पूर्वी उत्तर प्रदेश)


* Tamoli (पश्चिम बिहार / पूर्वी उत्तर प्रदेश)


* ऋषि (मध्य भारत)


* ब्रह्मचारी (उत्तर भारत)


* Gaurhar (उत्तर भारत)


* मोदी (उत्तर भारत)


* राउत (बिहार मधुबनी)


* चौधरी (हाजीपुर बिहार)


* मुंशी (धनबाद झारखंड)

साभार : चोरसिया संघ महा कौसल