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Tuesday, August 26, 2014

Vibudh Shridhar - विबुद्ध श्रीधर


Vibudh Shridhar or Vibudha Shridhara (विबुध श्रीधर) (wrote during Vikram Samvat 1189-1230) was an accomplished Apabhramshawriter and poet in North India. He is the first known Agrawal author.His Pasanaha Chariu provides the first reference to the Agrawal community and the first historical reference to the legend of the origin of the name Dhilli for Delhi.

हरियाणए देसे असंखगाम, गामियण जणि अणवरथ काम|

परचक्क विहट्टणु सिरिसंघट्टणु, जो सुरव इणा परिगणियं|

रिउ रुहिरावट्टणु बिउलु पवट्टणु, ढिल्ली नामेण जि भणियं|

Translation: There are countless villages in Haryana country. The villagers there work hard. They don't accept domination of others, and are experts in making the blood of their enemies flow. Indra himself praises this country. The capital of this country is Dhilli.

जहिं असिवर तोडिय रिउ कवालु, णरणाहु पसिद्धउ अणंगवालु ||

वलभर कम्पाविउ णायरायु, माणिणियण मणसंजनीय ||

The ruler Anangapal is famous, he can slay his enemies with his sword. The weight (of the Iron pillar) caused the Nagaraj to shake.

Four of his books have been found in Jain libraries,

Pasanaha Chariu (Parshvanatha Charit) (VS 1189)

Vaddhamana Chariu (Vardhamana Charit) (VS 1190)

Sukumala Chariu (Sukumala Charit)(VS 1208)

Bhavisayatta Kahaa (Bhavishyadatta Katha)(VS 1230)

साभार: विकिपीडिया 

Saturday, August 23, 2014

Abhijeet Gupta - अभिजित गुप्ता


Abhijeet Gupta (born October 16, 1989) is an Indian chess player with the title Grandmaster.

On August 15, 2008, he won the World Junior Chess Championship at Gaziantep, Turkey, ahead of many other strong players, including Maxim Rodshtein, David Howell and Hou Yifan. He is the third Indian to win this prestigious championship, which carries with it the FIDE Grandmaster title. He also made GM norms at the Andorra Open 2006, New Delhi (Parswnath) 2007 and Balaguer 2007 tournaments. In 2008, he won the 6th Parsvnath Open in New Delhi. In 2011 he came first in the 13th Dubai Open Chess Championship and tied for 2nd-4th with Tigran L. Petrosian and Magesh Panchanathan in the 3rd Orissa International GM Open Chess Tournament.

Thursday, August 14, 2014

CHOUSAINI VAISHYA - चौसैनी वैश्य

CHOUSAINI VAISHYA - चौसैनी  वैश्य 



हम और हमारा समाज

आदि काल में हमारे पूर्वजों ने हमारी वैश्य उपजाति को चौसेनी वैश्य नाम से पहचान दी तथा हमारी वैश्य उपजाति को सभी समुदायों में चौसेनी वैश्य नाम से जाना जाता है।

चौसेनी वैश्य, वैश्य समाज की एक प्रख्यात प्रमुख वैश्य उप जाति है। ऐसा माना जाता है कि हमारी चौसेनी वैश्य उपजाति चार श्रेणियों गौपालक, कृषक, व्यवसायी (क्रेता-विक्रेता) एवम् वैद्यक (चिकित्सक) के योग से बनी है। सम्भवत: श्रेणी बल बढ़ाने तथा व्यवसायिक सुविधा प्राप्त करने के लिए चारों श्रेणियाँ संयुक्त हो गयी और कालान्तर में उन्होंने चौसेनी नाम की वैश्य उपजाति का रूप ग्रहण कर लिया।

चौसेन वैश्य भृगुनन्दन महर्षि च्यवन को अपना आदि पिता व आराध्य देव मानते है। इस तथ्य को मानने की परिपुष्टि इस आधार पर हे। श्रेणी शासन काल में कृषक, गौपालक, वणिक तथा वैद्यकर्मी च्यवन वंशजों ने मिल कर एक प्रथम श्रेणी बना ली जो चौसेनी वैश्यों के नाम से आज तक अपना असततित्व बनाये हुए है और महर्षि च्यवन को अपना आदि पिता व आराध्य देव माना जो तर्क संगत है।

यजुर्वेद, ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में वैश्य वर्ण के निर्माण की चर्चा की गई है। उरू तदस्य यदवैश्य (ऋग्वेद) एवम् यजुर्वेद में बताया गया है कि वैश्य जाति ब्रह्मा की जंघा से उत्पन्न हुई है तथा अथर्वेद में इसे मध्य स्तदस्य यद् वैश्य बताया गया है

वैदिक साहित्य में वैश्यों के लिए औरव्य अरूज, अर्य (व्यापारी)चौसन भूमि स्प्रक, विद, ट्विज, भूमि जीवी, व्यवहर्त्ता, वार्तिक (व्यवसायी, कृषक, वैद्य) श्रेष्ठी, अर्थवाह, वणिक व पणि आदि नामों का प्रयोग किया गया है।

चौसन और्व का साहित्यक अर्थ है- भूमि से सम्बन्ध रखने वाला। संस्कृत के तत्सम और्व शब्द की व्युतपत्ति के अनुसार भी वैश्य और्व अथवा और्व चौसन वंशज हैं क्योंकि वैदिक काल से ही इनका सम्बंध भूमि कर्षण द्वारा अन्न उत्पन्न करना और समाज के भरण पोषण का प्रबन्ध करना था। इसलिए समस्त वैश्य चौसन और्व वंशज अथवा आर्व थे।

आदिपिता महर्षि च्यवन

च्यवन ऋषि महान भूगु ऋषि एवम् माता पुलोमा के पुत्र थे। ऋषि च्यवन को महान ऋषियों की श्रेणी में माना जाता है। इनेक विचारों एवम् सिद्धांतों द्वारा ज्योतिष मं अनेक महत्वपूर्ण बातों का आगमन हुआ। इस कारण च्यवन ऋषि ज्योतिष गुरू के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। इनके द्वारा रचित ग्रन्थों से ज्योतिष तथा जीवन के सही मार्ग दर्शन का बोध होता है।
च्यवन ऋषि जन्म कथा

पुराणों में महर्षि च्यवन का जन्म कौतूहलों से भरा दर्शाया है। महर्षि च्यवन, महर्षि भूगु और पुलोमा के पुत्र थे. माता पुलोमा के अनुपम सौंदर्य पर आसक्त हो उनके विवाह के पूर्व ही पुलोम नामक राक्षस उनका अपहरण करना चाहता था. वह कई बार प्रयत्त करके असफल रहा. माता पुलोमा एवमृ महर्षि भूगु के विवाह के बाद एक दिन भृगु महर्षि को आश्रम में न पाकर राक्षस पुलोम ने भूगु पत्ती का अपहरण करना चाहा. उस समय अग्निदेव भूगु ऋषि के आदेश से माता पुलोमा की रक्षा करने के उद्देश्य से आश्रम का पहरा दे रहे थे. राक्षस पुलोम ने अग्नि देव के समीप जाकर पूछा कि महाराज यह बताईये कि क्या महर्षि भूगु और पुलोमा का विवाह वेद विधि और शास्त्रोंक्त पद्धिति से सम्पन्न हुआ है. अग्निदेव ने उत्तर दिया कि नहीं, मैं कभी असत्य वचन नहीं कह सकता. इस पर राक्षस, पुलोमा सूअर पर रूप धारण कर भृगु पत्नी पुलोमा को उठा ले गया. उस समय भृगु पत्नी पुलोमा गर्भवती थी. मार्ग के मध्य में ही माता पुलोमा का अर्ध प्रसव हुआ और शिशु, पुलोमा के गर्भ से च्युत हो कर जमीन पर गिर पड़ा. इसलिए गर्भ च्युत होने के कारण वह च्यवन नाम से प्रसिद्ध हुआ. शिशु के जन्म के समय जो तेज प्रकट हुआ, उसके ताप से राक्षस पुलोम जलकर भस्म हो गया.

सुंदर कटि प्रदेश वाली माता पुलोमा दुख से मूच्छित हो गई और किसी तरह संभलकर भूगुकल को आनन्दित करने वाले अपने पुत्र भार्गव च्यवन क गोद में लेकर ब्रह्मा जी के पास चली गई। ब्रह्मा जी ने भूगु की पतिब्रता पत्नी को रोती और नेत्रों से आँसू बहाते देखा तथा पुत्रवधु पुलोमा को सान्त्वना दी तथा धीरज बधाया। अन्ततः माता पुलोमा विलाप करते हुए तेजस्वी भूगुनदन च्यवन को लेकर भूगु आश्रम लौटकर आ गईं। तपस्वी भृगु ने माता पुलोमा से पूछा कि तुम्हें हर लेने की इच्छा से आये राक्षस को किसने तुम्हारा परिचय दिया। माता पुलोमा ने कहा अग्निदेव ने मेरा परिचय दिया तब वह राक्षस मुझे उठा ले गया। आपके इस तेजस्वी पुत्र च्यवन के तेज से, मैं उस राक्षस के चंगल से छूट सकी। पुत्र च्यवन के तेज के कारण राक्षस मुझे छोड़ कर गिर गया और जलकर भस्म हो गया। यह सुन कर तपस्वी भूगु ने अग्निदेव को शाप दिया कि तुम सर्वभक्षी हो जाओ। इस प्रकार भृगु पुत्र प्रतापी, तेजस्वी च्यवन का जन्म हुआ।

च्यवन से सम्बंधित मुख्य घटनायें

च्यवन ऋषि के जीवन में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ जुड़ी हुई हैं, जिनमें से मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं:

१) च्यवन और सुकन्या का विवाह

बचपन से ही बालक च्यवन, विद्वान, ज्ञानी तथा भक्तिभाव में लीन रहते थे। उन्होंने सोचा कि तपस्या करके कोई महान कार्य करना चाहिए। इस विचार से उन्होंने निश्वल भाव से, अन्न जल त्यागकर तप करना आरम्भ कर दिया। तप आरम्भ करने पर सालों-साल तप में लीन रहने पर परिणाम स्वरूप कालान्तर में उनके शरीर के चारों तरफ बाम्बिया निकल आई, बाम्बियों के कोटरों में पक्षियों, चीटी व दीमन ने घोंसले बना लिए। प्राचीन काल की बात है उस समय भारत में राजा शर्याति का शासन था। वे अत्यन्त न्यायप्रिय, प्रजासेवक एवम् कुशल प्रशासक थे। सद्गुणों का प्रभाव राजा की कमल नयनी सुन्दर पुत्री एवम् पुत्रों पर भी पड़ा उनके पुत्र व पुत्री उनके पद चिन्हों पर चल रहे थे। राजा शर्याति अपनी सर्वगुण सम्पन्न सन्तानों को देखकर स्वयं बहुत प्रसन्न रहा करते थे। उचित समय देखकर एक दिन शर्याति अपने पुत्रों तथा कमल नयनी सुन्दर पुत्री व उस की सहेलियों सहित वन विहार के लिए निकले। बन में भ्रमण करते हुए उस वन में पहुँचे जहाँ ऋषिवर च्यवन का आश्रम अवस्थित था। राजा शर्याति और उनकी धर्मपत्नी एक सरोवर के निकट विश्राम के लिए रूक गये। लेकिन अपनी सखियों के साथ सुकन्या बन में यत्र तत्र विचरने लगी। वृक्षों, लताओं तथा पुष्पों की बहार उनको लुभा रही थी। अक्समात एक स्थान पर सुकन्या ने एक मिट्टी के टीले पर बाम्बी से जुगनुओं की भाँति चमकते हुए दो मणियाँ देखी। वह कोतुहल से भर उठी तथा उन मणियों के निकट आयी। नजदीक देखने पर भी चमकती वस्तु को समझ न पाई। कौतुहल वश तब उसने सूखी लकड़ी की सहायता से दोनों चमकदार मणियों को निकालने का यत्न किया परन्तु मणि नहीं निकली, अपितु वहाँ से खून बहने लगा। मणि से खून टपकते देख सुकन्या व सखियों सहित भय से पीली पड़ गई और भय से काँपती हुई अपने डेरे में आ गई। तक्षण ही

राजा के साथ आये हुए सैनिकों और कर्मचारियों का बुरा हाल हो गया, उनका मलमूत्र बन्द हो गया। इस अनहोनी घटना पर राजा शर्याति को बड़ा आश्चर्य हुआ और बोले अरे तुम लोगों ने भार्गव च्यवन के प्रति कोई दुरव्यवहार तो नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि हममें से किसी के द्वारा कोई अनर्थ अवश्य हुआ है। अपने पिता की वाणी सुनकर सुकन्या ने डरते डरते पिता से कहा कि मुझसे अनजाने में अपराध अवश्य हुआ है। मैंने अनजाने में मिट्टी के टीले से दो मणियों को निकालने की कोशिश की जिस कारण से दो मणिरूपी ज्योतियों को जा काटे से छेद दिया और दोनों ज्योतियों से रक्त बहने लगा तब हम सभी घबरा गए तथा अपने डेरे में वापसआ गए।

अपनी प्रिय पुत्री की बात सुनकर राजा शर्याति घबरा गये। वह तुरंत सुकन्या को लेकर उस स्थान पर पहुँचे और देखते हुए दुःखी मन से बोले-बेटी तुमने बहुत बड़ा पाप कर डाला। यह च्यवन ऋषि है। जिनकी तुमने आँख फोड़ दी है। सुनते ही सुकन्या रो पड़ी और टूटते हुए स्वर में कहा - मेरी जानकारी में नहीं था कि यहाँ महर्षि च्यवन बैठे हुए है। मैंने बड़ा अनर्थ कर डाला। यह कह कर सुकन्या फूट फूट कर रो पड़ी। हाँ पुत्री तुमसे अपराध हो गया है महर्षि च्यवन यहाँ पर तपस्या कर रहे थे। आंधी तूफान और वर्षा के कारण इनके चारों तरफ मिट्टी का टीला बन गया है। इसी कारण तुम्हारी दृष्टि को दोष हो गया। मात्र दो आँखें मणियों के रूप में दिखाई दी। राजा और सुकन्या आपस में बात ही कर रहे थे तभी महर्षि च्यवन के कराहने का स्वर सुनाई दिया।

महर्षि च्यवन के कातर स्वय सुनकर सुकन्या ने तय किया कि-मैं इस पाप का प्रायश्चित करके इस हानि की क्षति पूर्ति करूँगी। राजा शर्याति ने कहा तुम्हारे प्रायश्चित से महर्षि च्यवन की आँखें तो वापिस नहीं आयेगी। सुकन्या ने कहा - मैं इनकी आँखें बनूँगी। राजा अचम्भित होकर कहने लगे बेटी यह क्या कह रही हो।

सुकन्या बोली मैं उचित कर रही हूँ पिता जी। मैं ऋषिदेव की आँखें बनूँगी। मैं मात्र भूल व क्षमा का बहाना बनाकर अपराध मुक्त नहीं होना चाहती। न्याय नीति के समान अधिकार को स्वीकार कर चलने में ही मेरा व विश्व का कल्याण है। मैंने आप से यही सब तो सीखा है। मैं महर्षि च्यवन से विवाह करूँगी और अपने जीवन पर्यन्त उनकी आँख बन कर सेवा करूँगी। लेकिन बेटी यह तो अत्यन्त जर्जर कृशकाय शरीर के है और तू युवा। सुकन्या बोली - यहाँ पात्रता और योग्यता का प्रश्न नहीं है। मुझे तो सहर्ष प्रायश्चित करना है। मैं इस कार्य को धर्म समझकर तपस्या के माध्यम से आनन्दपूर्वक पूर्ण करके रहूँगी। मुझे अपना आर्शीवाद प्रदान करे। सुकन्या के दृढ़ निश्चय को देखते हुए राजा शर्याति तुरन्त सुकन्या को साथ लेकर ऋषिवर के पास आये। उनकी स्तुति की तथा हाथ जोड़ पैरों में 'पड़कर क्षमा माँगी। राजा शर्याति व सुकन्या की स्तुति से ऋषिवर प्रसन्न हुए। तदउपरान्त राजा ने अपनी कन्या को सेवार्थ अर्पण करने का प्रस्ताव किया। ऋषिवर ने राजा के अनुग्रह को स्वीकार कर सुकन्या को भार्या के रूप में अगींकार किया। उसी क्षण राजा की सेना व कर्मचारियों का कष्ट दूर हो गया। इस प्रकार महर्षि च्यवन व सुकन्या का विवाह सम्पन्न हुआ। बार-बार क्षमा याचना कर तथा ऋषिवर की अनुमति लेकर राजा अपनी राजधानी को लौट गये

च्यवन बड़े क्रोधी स्वभाव के थे। सुकन्या का उन्हीं से पाला पड़ा था। वह भी घोर अपराध करने के बाद वह निष्ठावान पत्नी की भाँति अपने पतिदेव की तन मन से सेवा करने लगीं। ऋषिवर की प्रत्येक इच्छा की पूर्ति में वह हरदम तत्पर रहने लगी। पतिब्रता धर्म का पालन करते हुए अपनी निस्वार्थ सेवा में सुकन्या ने ऋषिवर को प्रसन्न कर लिया तथा दोनों तप करते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने लगे।

चाओसेनी वैश्यों के आदि पिता ऋषि च्यवन से इनका उदगम/उत्थान हुआ है। चतुर्श्रेणी वंश मे 48 ( अड़तालीस) गोत्र है जोकी निमान पारकर से है। 1. वैध 2. चंदोसिया 3. रतलीबार 4. होसेला 5. निमचानिया 6. मुंडेला 7. ठगेले 8. बजेरिया 9. निम्बाला 10. काशेपु 11. डोडुआ 12. पल्लीवाल 13. धनोरिया 14. वर्दानिया 15. झाझरिया 16. कादरपुरिया 17. भिरुकटिया 18.पल्लारवाल 19. बम्मोरिया 20. बुडेश्वर 21. बनवारिया 22.गंगलेश 23. भमोरिया 24. लथोरिया 25. चोधरिया 26. मायनिया 27. अहीरिया 28. बामटे 29. बबोरिया 30. मनसा 31. चंदिरिया 32. जासल 33. गौतम 34. आर्य 35. श्रृंगारिया 36. झमेया 37. कनकपुरिया 38.तुसिया 39. बामनसुल्तानिया 40. वनसारिया 41. रावो 42. भोजेश्वर 43. पिसवाड़ा 44. पांडिया 45. डयोडिया 46. आमिया 47. बटचलेश्वर 48. अंगिरा, 49. मोतिहार। उपरोकत सभी गोत्र से समंधित वर्ग अधिकार उत्तर भारत के छेत्रो में रहता है।

साभार : श्री आर के गुप्ता जी..

Wednesday, August 13, 2014

ओसवाल समाज की कुलदेवियाँ

ओसवाल समाज की कुलदेवियों के बारे में अनेक लेखकों की पुस्तकें उपलब्ध है। इन लेखकों में श्री चंचलमल लोढा, डॉ. महावीरमल लोढा, श्री मांगीलाल भूतोडिय़ा आदि की प्रकाशित पुस्तकें उपलब्ध है। इनके द्वारा कुलदेवियों का निम्नानुसार विवरण दिया गया है।

कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र

1. अधर माता - अरणोदा, अलंजडा, अलावत, अहकासा, आलावात, उपट,
कक्का, कपासिया, करणिया, करणाणी, कायेल, काला परमार, कावा, कूंकड़,
केनिया, केलण, कोकलिया, खीर, खुरदा, गडिय़ा, गपालिया, गांग, गादवाना,
गांधी सहस्रगुणा, गिडिया, गेढवाड़, गोड, गोडवाल, गोडवालिया, गोडी, गोप,
गोसलिया, गंग, गांगरिया, घुरिया, चापड़, चोभावत, चौहाणा, चौधानी, छाहड़,
जपाला, जागा, झोडोलिया, टोगिया, टोडरवाल, डीडू, डोड, डांगी, थरावट, दरड़ा,
दुगसा, दुगविया, दुधेडिय़ा, दुधोडिय़ा, देवानंद साका, देशलाणी, धाधु,
धारिया वलाह,धुरिया, नपाणी, निवणिया, निवेणिया, पटवा गांग, परमार,
पालावत, पूर्ण,बंब, बरड़, बरडिय़ा, बड़दिया, बड़ोदिया, बलदोटा, बाबेल, बीजल,
बिसलाणी, बुरड़, बौरड़, बांभी, भड़, भाटिया, भाटी, भावराणी, भूवाणी, मरड़ोचा,
मरूथलिया, मालदे, मुलाणी, मोहिवाल, मोनानी, वरदिया, वीजल, विरावत,
सहस्त्रगुणा, सुघड़ा, हरिगा, हिराणी।

2. अम्बा माता - अजमेरा, अथगोता, अम्बागोत्र अम्बिका, आच्छा (बागरेेचा),
उदेश, ऊपरगोठा,कछीनागड़ा, कडक़, कड़बड़ा, कबदी, कावेडिय़ा, कूकड़सांड, कोठिया,
कोरा, खांपडिय़ा, खाबडिया, खारा, खारिवाल, गोतम गोता, गोपाल गोता,
घरवेला, जागरवाल, जालोरा बागरेचा, जिरावला, जोगड़ेचा, जोधावत, सालेचा,
झामड़, झावड़, टड्डा, ठाकुर, डागलिया, डोसी, ढड्ढा, ढेढिया, तिलोरा, तेलहरा,
ददा, दट्टा, दातीवाडिय़ा, दिखल, दोषी, धरकट, धर्म, धोखा, नागदार सोलंक,
नागसेठिया, नागौतरा, नाणगोता, निवाणी, नेनगोता, पामेचा, पाटणिया सालेचा,
पिथलिया डोसी, पूनमिया सालेचा, पोलावट, पंचलोढा, फितुरिया, बग, बनावत,
बडेरा, बागड़ेचा, बालुकिया, मांडोत, लुक्कड़, लुकद, सियाल, सबिया,
संचेती, सालेचा, साव, सियाल सांड, सिरोहिया, सुभद्रा, सोनाड़ा, सोनी बागरेचा,
सोलंकी लुंकड़, संघी बागरेचा, संघी मेहता, सांड, सालेचा, सुडाला, हरखावत
पामेचा, हंस, श्रीपति।

3. आशापूरा माता - अग्नीगोत्र, अरडक़, अलमेची, आईडी, आंचलिया,
आपागोत, आयट, आबेड़ा,आशद, आशापुरा, ईसरा, कछोल, कटारिया, कणीवत,
कपूर, कमाणी,कमेडिया, कयाणी, करणा, कवाड़, कागोत, कांठेड, काठेलवाल,
कावलेचा, काशरिया, कूदणेचा, कूलामोर, कूकल, कूकूरोल कवाड़, कुवाडिया,
कोंच, कोटेचा, कोंद, खखड़, खड़बड़, खटबड़, खटोल, खटोर, खाटेड, खांटोड,
खाबिया, खुटोल, खेतलाणी, खेतसी दुग्गड़, गांधीराय, गांधी मेहता, गुजराणी,
गेलड़ा, गोगड़ पीपाड़ा, गोंद, गोदा, गोरवाल, चहुआण, चंडालिया लूंगा,
चापरवाल, चालूका, चिरडकिया,चीपा, चौहान, चौवडिय़ा, चिंप, छाजोड़,
छावड़ा, जैसलमेरिया, जिन्नाणी, जिलाणी, टापडिय़ा, टिमरेचा, डफरिया,
डागा, डीया, डोडियालेचा, ताला, तालेरा, तालेड़ा, तुला, तुंड, दुग्गड़, दुदचैना,
देवड़ा, नारायण गौत्र, नाहटा कटारिया, पारखविंद, पावेचा कटारिया, पूजाणी,
फलौदिया तुंड, बलिया, बलाहा, बाबेल, बाबेला, बालौत, बीहल, बेडा,
बोलिया, भटावीर, भलभला, भालडिय़ा, भाभु, राजाणी, रामसेण, रायभंडारी,
रिहड़, लेरखा, वागेटा, संकलेचा, संकवाल, सफला, सांचा संगी, सांचौरा,
सामरिया, सुखलेचा, सुखाणी, सुगड़, सुगड़ा,, सेमरा, सोनगरा, संडासिया,
सांडिया, सापद्राह, हरसोरा, हाडा कटारिया, हाला खंडी।

4. केलपूज माता - बंड, बरमेचा, बांठिया, मलावत, मोदी बरमेचा, ललवाणी, हरखावत बाठिया।

5. खींवज माता - तलेसरा, पगारिया, मेड़तवाल, कास्टिया, गिरिया, चिरपुरा, चूड़ावत।

6. गाजर (रोहिणी) माता - करल, गगोलिया, गुंदेचा, डाबड़ा, बागाणी।

7. जमवाय माता - गांगोलिया, जाभरी।

8. झंकार माता - जलवाणी, पांच सौ बोहरा।

9. नागणेशी (नागणेच्या) माता - ईशपगोत्र, उहावता, ओटावत, खोखड़, गोगादे, गोलिया,
घाघरिया, घुलुंडिया,घियानक्षत्र, घिया गलुंडिया, घेमावत घोघल, जोधा, धवेचा, धोधड़,
नसोलिया नक्षत्र, पड़ाइया, पुष्करणा, बिदायी, मोहनोत, राठौड़, राणावत, रातडिय़ा,
संघोई, हथुंडिया, हथुंडिया राठौड़,

10. पद्मावती माता - पल्लीवाल।

11. पाडलमाता - टाक।

12. बड़वासन माता - लोढ़ा।

13. ब्रह्माणी माता - आडवाणी,ओडाणी,करड़, करोलीवाल,कलसोणिया,कांदली,गुर्जरगोता,गुर्जर,
गेवाल,नागरिक,बैंगाणी,लुणिया।

14. बाण माता - एणिया,कपोल,काकोल,काजोत,केलवा,खेतसी नीसर,गहलोत,गुगलिया,
गेलतर,गौत्तम,गोदारा,गोराणा,टिबाणी तिवड़किया,निसक,पीपाणा।

15. बीसल माता - आढ़ा।

16. बीसहत्थ माता - कोचर,कोचरमूथा,जालोरी कोचर,जिवाणी,रूपाणी।

17. भवानी माता - नाहर।

18. भंवाल माता - काजलोत,काजल,चामड़,चावा,छाजेड़,नखा,रूठिया।

19. रुद्र माता - आछरिया,आगरिया,खरभंसाली,खजांची मुगड़ी,चंडालिया भंसाली,चील
मेहता,चील।

20. लेकेक्षण (लीकासण) माता - खमेसरा,खींवसरा।

21. लोदरमाता - आघडिण,आघरिया,कछवाह,कांधल,जडिया तेलवाणी,पावेचा राखेचा,
बद्धाणी,भूरा भंसाली,भंसाली,भंसाली खड़,भंसाली राय,भंसाली ईसरा,
राखेचा,राय भंसाली,सोलंकी,सोलंकी सेठिया।

22. सच्चियाय (संचाय) माता - अछूणता-अघूणता,अटकलिया,अनबिंध (पारख),
अब्बाणी,अभ्राणी,अरडक सोनी, आईचियाण, आकतरा, आच्छा (कर्णावट), आडेचा,
आदित्यनाग, आभड़, आमड, आर्य, आववाडिया, आसाणी, इडलिया, इरोढा,
इलदिया, इसराणी, ऊजोत, ऊएश, ऊकेश, ऊडक़ भूरि, उदेचा, उदावत, उणावत,
उधावत, ओस्तवाल, ओसवाला।
ककड़,ककोल,कजारा,कटारा,कर्पदशाखा,कठोतिया,कठोरिया,कान्यकुब्ज,
कनौजिया,ककरेचा,कपूरिया,कमटिया,कर्पद,करचू,कर्णी,कर्णाट,करणोत,
कर्णावट,करमोत,करवा,करेलिया,कलटोदी,कटरोही,काला,कवाडिय़ा,
कस्तुरिया,काकेचा,कागड़ा,कागला,कांच,काजलिया,काजाणी,काटी,कातरेला,
कानूंगा-भटनेरा,कापूरित,कावरिया,काविया,काम,कामसा,कामाणी,काला,
कावडिय़ा,कावसा,काश्यप,कात्ररैला,कांकरिया,कांकरेचा,कागलोत,कांगसिया,
कांच,किलोल,किस्तुरिया,कूकड़ (चौपड़ा),कूकम,कुचेरिया,कुंडिया,कूपावत,
कूबडिय़ा,कूबडिय़ा आमड़,कूबडिय़ा बाफना,कूबेरिया,कूमट,कूमकूम,कुरकुचिया,
कूरा,कूलधर,कूलधरा,कूलहट,कुशलोत,कूहाड़,कूकड़सांड,कूकड़ा,कूकूरोलचौपड़ा,
कुंपावत,कुमटिया,केकडिय़ा,केदार,केदारा,केलाणी,केशरिया,केशरिया सामसुखा,
कोकड़ा,कोटडिय़ा,कोटी,कोटीचा,कोटरिया,कोस्टागार,कोणेजा,कोनेरा,कोलोरा,
कोसिया।
खरभंडारी,खजांची श्री श्रीमाल,खजांची चोराडिय़ा,खजांची लघुश्रेष्ठी,खंडेलवाल,
खंडिया,खपाटिया,खरभंडारी,खारड़,खालिया,खेड़वाड़,खींचा,खीलोला,खुमणिया,
खुमाणा,खेतपालिया,खोखरा,खोका,खोड़वाड़,खोडिया,खोडीवाल,खोना,खोपर।
गज्जा,गज्जा पटवा,गटाघट,गटिया,गड़वाणी,गणधर चौपड़ा,गणधर गांधी,
गड़वाली,गरूड़,गलाणी,गलूंडिया,गसणिया,गहियाला,गागा,गादिया,गांधी संचेती,
गांधी दुदिया,गांधी श्रेष्ठी,गांधी बाफना,गिंगा,गुजराणी नागड़ा,गुगलिया चोरडिय़ा,
गुगलेचा,गुलगुलिया,गुडक़ा,गुणिया,गुमलेचा,गुंदिया,गहलोत,गोखरू,गोगड़भद्र,
गोरीवाल,गोरेचा,गोलेछा,गोसलाणी,घरघटा,घीया गुगलिया,घुणिया,घेवरिया,
घोगड़,घोड़ावत,घंटेलिया।
चगलाणी,चतर,चतुर,चतुर मूथा,चन्द्रावत,चपलोत,चमकिया,चम्म,चरड़,
चवला,चवहेरा,चंद्रावत,चंडालेचा,चंदावत,चित्तोड़ा,चित्तोड़ा बलाह,
चित्तोड़ा श्रेष्ठी,चित्तौड़ा,गोलछा,चित्तौड़ा लघुश्रेष्ठी,चिंचट,चिचड़ा,
चितोडिय़ा,चिपड़,चुंगा,चैनावत,चोखा,चौपड़ा कंकुं,चौपड़ा गणधर,
चोमोला,चोरडिय़ा,चोरवाडिय़ा,चोरबेडिय़ा,चौववहेरा,चौमोला,चौसरिया,
चौधरी तातेड़,चौधरी बाफना,चौधरी बलाह,चौधरी मोरख,चौधरी कुलहट,
चौधरी वीरहट,चौधरी भूरी,चौधरी संचेती,चौधरी गुलेछा,चौधरी श्रेष्ठी,
चौधरी भद्र,चिंपड़।
छाछा,छाडौत,छगलाणी,छजलाणी,छजलाणी,छतीसा,छलाणी,छतरिया,
छरिया,छाड़ोत,छालिया,छावत,छोरिया,जगावत,जडिय़ा,जमघोटा,जलघड़,
जस्साणी,जागड़ा,जाटा,जाडेचा,जबक,जालोत,जालोरा कन्नोजिया,
जालोरी कुलहट,जावलिया चौपड़ा,जिंद,जिंदल,जिनोत,जिमणिया भटनेेंरा,
जिमणिया चौरडिय़ा,जूनीवाल,जेनावत,जोखेला,जोगड़,जोटा,जोधावत श्रेष्ठी,
जोहरी चोरडिय़ा,जोगड़ बाफना,जोगड़ा सिंघी,झाबक,झाटा।
टाटिया बाफना,टाटिया धारीवाल,टिकायत,टिकोरा,टोडियानी,टगा,टाकलिया,
टांक,टिवाणी,टिहुयाण,डूंगराणी,ढाकलिया,ढाबरिया,ढेलडिया।
तप्तभट्ट,तरवेचा,तल्लाणी,तलोवड़ा,ताकलिया,तातेड़,तातहड़,तारावल,तुंड,
तुलाहा,तुहियाण,तेजाणी संचेती,तेजाणी पारख,तोलिया,तोसटिया,तोडिय़ानी,
तोलावत,तोलरिया,तोडिय़ान,तुलावत,थनावट,थम्बोरा,थामरेचा,थुला,दक,
दफतरी-चोरडिय़ा,दफतरी बाफना,दस्सानी,दसोरा,दाखा,दातारा,दादलिया,
दानेसरा,दालिया,दुद्धाणी,दुधिया,देदाणी,देपारा,देलणिया,देवराजोत,देवसयाणी,
देसरला,देशलहरा,दोलताणी,दोसाखा,धतुरिया,धनन्तरी,धंदाणी,धनेचा,धाकड़,
धारीवाल,धातुरिया,धाधलिया,धानेवा,धाया,धापिया,धारिया,विरहट,धारोडिय़ा,
धारोला,धावड़ा,धीरौत,धुगोता,धुपिया,धांधल।
नखरा,नंनक,नरसिंगा,नक्षत्रगोत्रा,नागडोला,नागड़ा,नागड़ा तातेड़,नागड़ा गुलेछा,
नागर,नागौरी कुम्भट,नागौरी चोरडिय़ा,नागौरी श्रेष्ठी,नाचाणी,नाणीश,नाथावत,
नानघाणी,नानेचा,नापड़ा,नामाणी,नार,नारेलिया,नावटा,नाबरिया,नावसरा,
नाहटा बाफना,नाहरलाणी,निबोलिया,निलडिय़ा,निवाटा,निशानिया,नेरा,
नोपता विरहट,नोपता गदेहिया,नोपोला,नांदेशा।
पंचाणीस,पंचवया,पंचीसा,पछोलिया,पटलिया,पटवा,बाफना,पटवा श्रेष्ठी,
पटवा लघुश्रेष्ठी,पटवा कनौजिया,पटवा धारीवाल,पटवा गजा,पटवा वढेर,
पटवारी,पटौत,पारडिय़ा,पहाडिय़ा,पाटणिया,पातावत,पानगडिया,पानौत,
पारख अणविद,पालखिया,पाखा,पालगौता,पालकिया,पालावत,
पाटणिया चोरडिय़ा,पाटणिया भद्र,पालणेचा,पाटोलिया,पाटौत,पारणिया,
पालडिय़ा,पालणिया,पालणी,पालेचा,पिथलिया चौरडिय़ा,पुकारा,पुंगलिया,पुजारा,
पूनमिया वीरहट,पूनोत गोधरा,पूरणिया,पैथाड़ी,पैपसरा,पैतिसा,पोखरणा,
पौपाणी,पौपावत,पोलडिय़ा,पोसालिया,पंचविशा,पांचौरा,पांचौली,पंसारी,
पांचावत,पांडुगोता,फौफलिया,फूलगरा,बाघचार,बडज़ात्या,बपनाग,बड़बड़ा,
बड़भट्टा,बच्छावत,वनावल,बनावत,बलवरा,बलिया,बलाई,बलोटा,बहुल,
बहुफना,बाकुलिया,बांका,बागडिय़ा बाखेटा,बाखोटा,बाघमार,बाघ,बातोकड़ा,
बादलिया,बादौला,बायना,बाफना,बापावत,बालड़ा,बाला,बालोटा,बालिया,
बालौत,बाबरिया,बाहतिया,बिनायकिया,विषपहरा,बीजाणी,बीजोत,बुच्चा,
बुच्चाणी,बूबकिया,बैगलिया,बैताला,बैद,बैदमेहता,बौक,बोकडिय़ा,बौराना,
बांदोलिया।
भक्कड़,भडग़तिया,भटारखिया,भटनेरा,भटनेरा चौधरी,भटेवरा,भद्र,भमराणी,
भलगट,भलमेचा,भलल,भाद्रगोता,भानावत,भाभू पारख,भाभू बाफना,भाला,
भावड़ा,भावसरा,भिन्नमाला कर्णावट,भिन्नमाला श्री श्रीमाल,भिणटिया,
भिमावट,भुवाता,भूरंट,भूराश्रेष्ठी,भूरी,भूषण,भूरट,भूतिया,भूतेड़ा,भोजाणी,
भोजावत,भोपावत,भोपाला,भंडलिया,भंडारा,भंडारी डीडू,भांडावत भद्र,
भूगरवाल,मक्कड़,मखेलवाल,मखाणा,मकाणा,मगदिया,मच्छा,मणियार,मन्नी,
मंदिरवाला,ममहिया,मरडिय़ा,मलेचा,मखाणी,मल्ल,मरुवा,मरोथिया,
मसाडिय़ा कुल्हट,मसाणिया चोरडिय़ा,महतियाण,महाजन,महाजनिया,महिवाल,
माडलिया,मांडोत,मादरेचा,मारू,मालखा,मालकस,मालतिया,माला,मालावत,
मालौत,माहलाणी,मीठा,मीणीयार,मीनाग्राह,मीनारा,मीठडिय़ा,बाफना,
मीठडिय़ा सोनी,मुकिम,मुगड़ी,मुमडिय़ा,मुर्गीपाल,मुर्दिया,मुसलिया,मेघाणी,
मेड़तिया,मेहजावत,मोतिया विरहट,मोतिया संचेती,मोदी गणधर,मौरख,
मोरचिया,मौराक्ष,मौल्लाणी,मंडोवरा,मंत्री,मांडलेचा मुगडिय़ा।
यौद्धा बाफना,यौद्धा डीडू,रणजीत,रणछोड़,रणधीरा बाफना,रणधीरा श्रेष्ठी,
रणधीरोत,रणसोत,रणशौभा,रत्ताणी,रतनपुत्र,रतनपुरा बुच्चा,रतनसुरा,राक्यान,
राकावाल,राखडिय़ा,राठी,राडा,राज बोहरा,राज कोष्ठागार,राज सदा,राजौत,
राणौत,रामपुरिया,रामाणी,रायजादा,राय सोनी,राय चौरडिय़ा,राय तातेड़,
राय सच्ची,रावत,रिहड़,रिकब,रूणवाल,रूपावत,रूपछरा,रूह,रेड़,रांका,
लखावत,लघु कम्भट,लघु खंडेलवाल,लघु चमकिया,लघु चिंचट,लघु चुंगा,
लघु नाहटा,लघु चौधरी,लघु पारख,लघु पोकरणा,लघु भूरट,लघु रांका,
लघु राठी,लघु समदडिय़ा,लघु संचेती,लघु सुखा,लघु सोढ़ती,लघु संचेती,
लघु हिंगण,लघु श्रेष्ठी,लहरिया,लाखाणी,लाडवा,लाडलखा,लाभाणी,लालन,
लाला,लालौत,लाहौरा,लिंगा,लुटंकण,लुणा,लुणावत गधैया,लुणेचा,लेहरिया,
लोकड़ी,वसहा वडेर,वद्र्धमान,वलाह,वर्षाणी,विद्याधर,विरहट,वितरागा,वैद्य,
वैद्य गांधी,वैद्य मेहता।
शाह बोथरा,शुरुलिया,शिगाल,शूरमा,शूरवा,सेठ,सिसोदिया,संकवालेचा,श्रृंखला,
सेखाणी,सगरावत,संचौपा,सदावत,सदाणी,सम्भूआता,सरा,सराफ चोरडिय़ा,
सराफ नाबरिया,सलघणा,सहजाणी,सहलोत चौरडिय़ा,सहलोत बाफणा,
साखेचा,साघाणी,साढा,साढेराव,सादावत,सानी,सामड़ा,समुरिया,सारूलिया,
सालीपुरा,सावा,सावनसुखा,सामसुखा,सावरिया,साहिब गोता,साहिला,
सिखरिया,सिंघी भूरी,सिंघी डीडू,सिंघी लघुश्रेष्ठी,सिंघी भद्र,सिंघूड़ा,सिपाणी,
सिलरेचा,सुखिया,सुचली,सुधा,सुधेचा,सुरती,सुरपुरिया,सुराणिया,सुसाणी,
सुरिया,सुखा,सेठिया रांका,सेठिया वैद्य,सेणा,सेमलाणी,सेवदिया,सेजावत,
सोजतवाल,सोजतिया,सोढ़ाणी,सोबारा,सोजावत,सोनी चोरडिय़ा,सोनी संचेती,
सोनी श्री श्रीमाल,सोनी बाफना,सोनी घर,सोनेचा,सुमारिया,सोसलाणी,
संघवी,सांभर,सांभरिया,सिंघड़,सिहावट,सिहावत,श्रवणी,श्राफ,श्रीधर,श्रेष्ठी,
हरसोत,हरिया,हाकड़ा,हाकम,हागा,हाडा लघुश्रेष्ठी,हाडेरा,हिरणा,हिराणी,
हीरावत,हुकमिया,हूना,हुब्बड़,हुल्ला,हंसा,हिंगड़,हिंडिया।

23. सुषमा माता - उस्तवाल।

24. सुसवाणी माता - भणवट सुराणा,भालावत,राय सुराणा,सुराणा,सांखला सुराणा।

25. सुंधा माता - आडपावत,आचू,आयडिय़ा,काग,कामटाणी,कूलेरिया,कूलहण,चोयल,
नागल,नागा,पिछोलिया,बरहुडिया,बूहड़,लुणावत आयरिया।

26. हिंगलाज माता - अघोडिय़ा,कीरी,कोकूपोत्रा,गाला,गंगवाल,घंदे,छछा,छोगाला,जाड़ेचा,
जेजटोटिया,ठीकरिया,डोडेचा,भाखरिया,भुगड़ी,महीपाल,पुनहानी,मेहर,
लूंग,लूंगावत,राणोत।

साभार : http://kuldevirajasthan.blogspot.in

Tuesday, August 12, 2014

JUSTICE RAJENDRA MAL LODHA - न्यायमूर्ति राजेन्द्र मल लोढ़ा


राजेन्द्र मल लोढ़ा (जन्म :28 सितंबर 1949)भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं। श्री लोढ़ा का जन्म जोधपुर के ओसवाल वैश्य परिवार में हुआ था. उन्होने 27 अप्रैल 2014 को उच्चतम न्यायालय के 41 वे मुख्य न्यायाधीश के रूप मे पदभार ग्रहण किया। 17 दिसम्बर 2008 को भारत का उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने।

परिचय

वे राजस्थान के जोधपुर निवासी हैं। उन के पिता श्री एस के मल लोढ़ा राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे । उन्होने विज्ञान स्नातक, विधिस्नातक की शिक्षा जोधपुर विश्वविद्यालय से प्राप्त की।

करियर

एक वकील के रूप में वे फरवरी 1973 बार काऊंसिल ऑफ राजस्थान से जुड़े। 31 जनवरी 1994 को उन्हें राजस्थान उच्च न्यायालय में न्ययाधीश नियुक्त किया गया। फरवरी 16, 1994 को उनका स्थानांतरण मुंबई उच्च न्यायालय में तथा 2 फरवरी 2007 वापिस राजस्थान उच्च न्यायालय में हो गया. 13 मई 2008 को आपकी नियुक्ति पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में हुई तथा 17 दिसंबर 2008 से भारत का उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बने। वर्तमान मेँ भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर 27 अप्रैल 2014 को पदभार सम्भाला।

साभार : विकिपीडिया 

Monday, August 11, 2014

KASHI PRASAD JAYSWAL - काशीप्रसाद जायसवाल



काशीप्रसाद जायसवाल (१८८१ - १९३७ ) , भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार एवं हिन्दी साहित्यकार थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में एक धनी वैश्य व्यापारी परिवार में हुआ था। उन्होने मिर्जापुर के लंदन मिशन स्कूल से एंट्रेंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। इसके उपरान्त उच्च शिक्षा के लिये वे आक्सफोर्ड गये जहाँ इतिहास में एम ए किया। उन्होने 'बार' के लिये परीक्षा में भी सफलता प्राप्त की। भारत लौटने पर उन्होने कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रवक्ता (लेक्चरर) बनने की कोशिश की किन्तु राजनैतिक आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। अन्तत: उन्होने वकालत करने का निश्चय किया और सन् १९११ में कोलकाता में वकालत आरम्भ की। कुछ समय बाद वे पटना उच्च न्यायालय में आ गये।



वे सन् १८९९ में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपमंत्री बने। उनके शोधपरक लेख 'कौशाम्बी', 'लॉर्ड कर्जन की वक्तृता' और 'बक्सर' आदि लेख नागरी प्रचारिणी पत्रिका में छपे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के 'सरस्वती' का सम्पादक बनते ही सन् १९०३ में काशीप्रसाद जायसवाल के चार लेख, एक कविता और 'उपन्यास' नाम से एक सचित्र व्यंग्य सरस्वती में छपे। काशीप्रसाद जी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के समकालीन थे ; दोनो कभी सहपाठी और मित्र रहे किन्तु बाद में दोनो में किंचिद कारणवश अमैत्री पनप गयी थी।

सन् १९०९ में काशीप्रसाद जायसवाल को चीनी भाषा सीखने के लिये आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से छात्रवृत्ति मिली।

Friday, August 8, 2014

खण्डेलवाल समाज (वैश्य) की कुलदेवियाँ

खण्डेलवाल वैश्य तीर्थस्थान पत्रिका एवं श्री मोतीलाल गुप्त की पुस्तक खण्डेलवाल जाति का प्रारम्भिक इतिहास में खण्डेलवाल वैश्य समाज की कुलदेवियों का विवरण निम्नानुसार प्रकाशित है-

कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र

1. अमरल (नोसल) माता - मेठी।

2. अमवासन (ढकवासन) माता - मांगोलिया (मंगोडिया)।

3. आमण माता - आमेरिया, भुकमारिया।

4. आंतेलमाता - कट्टा, टौडवाल, नेनीवाल।

5. ओरलमाता - रावत (राज)।

6. कनकसमाता - कौडिया।

7. कपासनमाता - खुंटेटा।

8. कुरसड़माता - नैनामा, भुगा, सोंखिया।

9. कोलाइनमाता - बाजरगान।

10. खींवजमाता - खटरावत।

11. नीमवासिनीमाता - बीमवाल (खाडिय़ा सोनी)।

12. चामुंडामाता - महरवाल, सामरिया, सींगोदिया।

13. जमवायमाता - बढेरा।

14. जीणमाता - कायथवाल, कासलीवाल, खारवाल, टटार, तमोलिया, दुसाद, नखरिया, नाटाणी, पाटोदिया, मंडारिया, लाभी, सांखूनिया, सोनी, शरहरा।

15. डावरिमाता - धोकरिया।

16. तिलीधेहड़ माता - आकड़।

17. नागनमाता - ताम्बी, बुढवारिया।

18. धावड़माता - झालानी।

19. नन्दभगोनी माता - किलकिलिया।

20. नावड़माता - ओढ़, केदावत।

21. बड़वासनमाता - पीतलिया।

22. बतवीरमाता - माठा।

23. बमूरीमाता - घीया, चावरिया, जसोरिया, ठाकुरिया, निरायणवाल, फरसोहिया, बनावरी।

24. बिनजिलमाता - डांस।

25. बिरहिलमाता - गोल्या।

26. भंवरकठेर माता - खटोरिया।

27. मंडेरमाता - पाबूवाल।

28. माखदमाता - बैद, सेठी।

29. मितरमाता - काठ।

30. वक्रमाता - नैनावा, बटवाड़ा।

31. सकराय माता - डंगायच।

32. समगरामाता - बसोंदरिया, सिरोहिया।

33. सरसामाता - बड़ाया, बावरिया, बूसर, माली।

34. सारमाता - बनाउड़ी, माचीवार।

35. सावरदेमाता - बम्ब।

36. सारंगदेमाता - मानिक बोहरा।

37. सरूंडमाता - अटोलिया, कूलवाल, गोंदराजिया, जंघीनिया, पचलोरा(बडग़ोती),मामोडिय़ा, हल्दिया।

38. सेंतलवास माता - धामानी, भांगला, राजोरिया।


खण्डेलवाल वैश्य तीर्थस्थान पत्रिका एवं श्री मोतीलाल गुप्त की पुस्तक खण्डेलवाल जाति का प्रारम्भिक इतिहास में खण्डेलवाल वैश्य समाज की कुलदेवियों का विवरण निम्नानुसार प्रकाशित है-

कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र

1. अमरल (नोसल) माता - मेठी।

2. अमवासन (ढकवासन) माता - मांगोलिया (मंगोडिया)।

3. आमण माता - आमेरिया, भुकमारिया।

4. आंतेलमाता - कट्टा, टौडवाल, नेनीवाल।

5. ओरलमाता - रावत (राज)।

6. कनकसमाता - कौडिया।

7. कपासनमाता - खुंटेटा।

8. कुरसड़माता - नैनामा, भुगा, सोंखिया।

9. कोलाइनमाता - बाजरगान।

10. खींवजमाता - खटरावत।

11. नीमवासिनीमाता - बीमवाल (खाडिय़ा सोनी)।

12. चामुंडामाता - महरवाल, सामरिया, सींगोदिया।

13. जमवायमाता - बढेरा।

14. जीणमाता - कायथवाल, कासलीवाल, खारवाल, टटार, तमोलिया, दुसाद, नखरिया, नाटाणी, पाटोदिया, मंडारिया, लाभी, सांखूनिया, सोनी, शरहरा।

15. डावरिमाता - धोकरिया।

16. तिलीधेहड़ माता - आकड़।

17. नागनमाता - ताम्बी, बुढवारिया।

18. धावड़माता - झालानी।

19. नन्दभगोनी माता - किलकिलिया।

20. नावड़माता - ओढ़, केदावत।

21. बड़वासनमाता - पीतलिया।

22. बतवीरमाता - माठा।

23. बमूरीमाता - घीया, चावरिया, जसोरिया, ठाकुरिया, निरायणवाल, फरसोहिया, बनावरी।

24. बिनजिलमाता - डांस।

25. बिरहिलमाता - गोल्या।

26. भंवरकठेर माता - खटोरिया।

27. मंडेरमाता - पाबूवाल।

28. माखदमाता - बैद, सेठी।

29. मितरमाता - काठ।

30. वक्रमाता - नैनावा, बटवाड़ा।

31. सकराय माता - डंगायच।

32. समगरामाता - बसोंदरिया, सिरोहिया।

33. सरसामाता - बड़ाया, बावरिया, बूसर, माली।

34. सारमाता - बनाउड़ी, माचीवार।

35. सावरदेमाता - बम्ब।

36. सारंगदेमाता - मानिक बोहरा।

37. सरूंडमाता - अटोलिया, कूलवाल, गोंदराजिया, जंघीनिया, पचलोरा(बडग़ोती),मामोडिय़ा, हल्दिया।

38. सेंतलवास माता - धामानी, भांगला, राजोरिया।

साभार : http://kuldevirajasthan.blogspot.in

ABHISHEK ROONGTA - अभिषेक रुंगटा - 50 रुपये से शुरू हुआ बिजनस आज 40 करोड़ का


अभिषेक रुंगटा कोलकाता की बिजनस फैमिली से आते हैं। शुरुआत में उन्होंने खुद का ई-मेल सर्विस सेंटर खोलने का फैसला लिया। उन्हें इसमें परिवार से पूरा सपोर्ट मिला। यह 1997 की बात है। उस वक्त इंटरनेट नया कॉन्सेप्ट था। ई-मेल सर्विस सेंटर का काम बिजनस और उसके कस्टमर के बीच कम्युनिकेशन का था।

बिजनस शुरू करने के लिए मैंने फैमिली से 46,000 रुपये का लोन लिया। इसमें से 30,000 मैंने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को दिए। बाकी पैसे से मैंने मॉडम खरीदा। मुझे इसके लिए कंप्यूटर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि मेरे पास पहले से एक कंप्यूटर था। दुर्भाग्यवश सर्विस प्रोवाइडर बिजनस बंद कर मेरे पैसे लेकर फरार हो गया। हालांकि इसके बाद भी मैंने हार नहीं मानी। मैंने ऐसा नया बिजनस शुरुआत करने की सोची, जिसमें ज्यादा पैसे की जरूरत न हो। मैंने टेक एक्सपो में जाना शुरू कर दिया, जिससे मैं लोगों के साथ संपर्क बना सकूं। मैंने महसूस किया कि एक्सपो में लोग आउटलेट खोलकर अच्छा बिजनस कर रहे हैं।

मुझे वेबसाइट डिजाइनिंग के बारे में पता था। इसलिए मैंने ऐसे ही एक एक्सपो में किराए पर स्टॉल लेने का फैसला लिया। एक स्टॉल को तीन दिन किराए पर लेने का खर्च 6000 रुपये था। मेरे पास उतने पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं इस स्टॉल मैं छोटा सा हिस्सा लूंगा और बाकी का एरिया किसी दूसरे व्यक्ति को दूंगा, जो उसमें मॉडम बेचेगा। मैंने वेबसाइट डिजाइनिंग की एडवरटाइजिंग हैंडबिल्स से करने का फैसला किया। इसकी कॉस्ट 50 रुपये पड़ी। कंपनी का नाम भी वहीं पर ही तय हुआ। इस तरह इंडस नेट टेक्नॉलजी की शुरुआत हुई।

एक्सपो में मेरे अलावा एक और कंपनी वेबसाइट डिजाइनिंग के लिए आई थी, लेकिन उसकी सर्विसेज काफी महंगी थी। इसलिए ज्यादा लोग मेरे स्टॉल पर आ रहे थे। तीन दिन के एक्सपो में मुझे 20,000 रुपये के 2 प्रोजेक्ट मिल चुके थे। दोनों क्लाइंट ने 50 पर्सेंट अडवांस पेमेंट किया। मैं कॉमर्स ग्रेजुएट था। इसलिए मुझे काफी रिसर्च और कंप्यूटर बुक्स पढ़ने की जरूरत थी, जिससे मैं बिजनस को अच्छी तरह संभाल सकूं। इस दौरान मैंने वेब हॉस्टिंग सर्विसिज पर अपनी खोज शुरू कर दी। मैंने पाया कि इस सेक्टर में कई ऐसी कंपनियां हैं, जो सर्विस के लिए ज्यादा पैसे चार्ज कर रही हैं। मैंने एक इटैलियन कंपनी से कॉन्ट्रैक्ट किया, जो भारतीय कंपनियों को वेब हॉस्टिंग सर्विस 20 पर्सेंट कम प्राइस पर देने को मान गई।

मैंने उस कंपनी को इस बात पर भी राजी कर लिया कि वह तीन महीने के क्रेडिट पर मुझे भारत में सर्विस प्रोवाइड करने का मौका दे। नई सर्विस ने मेरा बिजनस बढ़ा दिया। 1997-98 के अंत तक फर्म का टर्नओवर 1 लाख रुपये तक पहुंच गया था। इसके बाद मैंने एंप्लॉयीज को हायर करना शुरू किया।

कोलकाता के डलहौजी स्क्वेयर में मैंने ऑफिस के लिए छोटी सी जगह किराए पर ली। इसी साल कॉमर्स से मैं ग्रेजुएट भी हुआ। मैंने इसके बाद अमेरिका से एक साल का मल्टीमीडिया प्रोग्राम करने का प्लान किया। तब मैंने पूरा बिजनस अपनी बहन को सौंप दिया। जब मैं 2000 में वापस लौटा तो देखा कि एयरपोर्ट के बाहर काफी संख्या में डॉटकॉम कंपनियों के होर्डिंग्स लगे थे। मेरे आने के बाद कई महीने तक मेरी फर्म ने कोई नया बिजनस जेनरेट नहीं किया। इसके बाद मैंने सोशल मीडिया साइट्स के जरिये बिजनस को दुनिया भर में बढ़ाने की कोशिश शुरू की। साल 2000 के अंत तक फिर से मेरे पास काम आना शुरू हो गया। 2002 तक कंपनी का टर्नओवर 15 लाख से ज्यादा हो गया था।

2007 में यह बढ़कर लगभग 6 करोड़ हो गया। इसी साल हमने डिजिटल मार्केटिंग डिवीजन शुरू की। आज हम डिजिटिल मार्केटिंग, वेब एप्लिकेशन सहित कई सर्विसेज दे रहे हैं। पिछले साल कंपनी का टर्नओवर 40 करोड़ तक पहुंच गया। इस समय कंपनी के सर्विस स्पेक्ट्रम में 200 से ज्यादा क्लाइंट्स हैं और 500 लोग कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। अगले फाइनैशल ईयर में हमारा प्लान 60 करोड़ टर्नओवर हासिल करने का है।

साभार : इकनॉमिक टाइम्स | Aug 7, 2014

Wednesday, August 6, 2014

ARJIT KANSAL - अर्जित कंसल ने जीती माइक्रोसॉफ्ट पावरपॉइंट 2010 वर्ल्ड चैंपियनशिप





भारतीय छात्र अर्जित कंसल माइक्रोसॉफ्ट पावरपॉइंट 2010 वर्ल्ड चैंपियन बने हैं। उन्होंने 2014 माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस स्पेशलिस्ट (MOS) वर्ल्ड चैंपियनशिप में यह जीत हासिल की, जिसमें 130 देशों के 4 लाख छात्र शामिल थे।

कंसल फाइनल में पहुंचने वाले 123 प्रतिभागियों में शामिल थे। आखिरी राउंड में पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन पर उनकी क्षमता देखने के लिए यूनीक प्रॉजेक्ट आधारित टेस्ट लिए गए।

इस कॉम्पिटिशन को करवाने वाले पियर्सन वीयूई (गवर्निंग बॉडी ऑफ सर्टिपॉर्ट) के सीईओ और प्रेज़िडेंट बॉब वेलन ने कहा, 'कॉम्पिटिशन में 7,40,000 से ज्यादा एग्जाम्स अपलोड किए गए थे और उन MOS वर्ल्ड चैंपियंस ने इसमें टॉप किया, जो माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस टूल्स को अच्छे से इस्तेमाल करना जानते हैं।'

अवॉर्ड सेरिमनी में अर्जित कंसल को 5000 डॉलर (भारतीय मुद्रा में करीब 3 लाख रुपए) की स्कॉलरशिप दी गई।

16 साल के कंसल को कॉम्पिटिशन के लिए साइबरलर्निंग ने स्पॉन्सर किया था।

साभार : नवभारत टाइम्स 

Monday, July 28, 2014

Shaheed Major Vivek Gupta - शहीद मेजर विवेक गुप्ता





Maj Gupta and six others from his team captured the Pt 4950 peak at Tuloling before they were killed in fierce combat. 


The bodies of the soldiers from the 2nd Rajputana Rifles, who were killed on the icy heights on the intervening night of June 12 and 13, were flown to Delhi and accorded a ceremonial farewell. 


Among those to bid farewell were several retired officers from the same unit including Lt Gen O P Kaushik, former Colonel of the regiment. “Vivek was an extremely endearing young man. Exceptionally tall and handsome, he had a certain dynamism. He has done the regiment proud and his sacrifice is in line with our tradition. The Second is the first regiment in the Indian Army to be awarded the Victoria Cross. In the 1965 conflict, we snatched Dera Baba Nanak. Exceptionally difficult tasks have been entrusted to our boys and we have always proved our mettle,” said Lt Gen Kaushik. The 2nd Rajputana Rifles is the sixth highly decorated unit of Indian Army.



FAREWELL HERO: Capt Jayashree saluting the mortal remains of her husband, Major Vivek Gupta, who was killed in the Army operations in the Kargil sector. Photo: Subhendu Ghosh


While a grief stricken Capt Jayshree barely contained her sorrow, it was left to Maj Gupta’s relatives to remember him. “Vivek had last come on leave in May. His unit was in the Valley but it was only after he returned that they were asked to move to Kargil. Only one word can describe him: he was a dynamite,” said his cousins Ravi and Shailendra Singhal. 

After all the ceremonies, she came forward slowly, saluted him in an immaculate drill, laid a wreath, said a silent goodbye and was gone. Her personal moments with him would be reserved for later.

What was going on in the mind of Captain (Dr) Rajshree Gupta as she paid respects to her husband Major Vivek Gupta of Rajputana Rifles who laid down his life fighting in Kargil on June 14 can be well imagined, but she never let her composure desert her.


Shaheed Major Vivek Gupta's wife paying tearful tributes to her husband

MAJOR VIVEK GUPTA

2 Rajputana Rifles

Doon Devil

MISSION: Like so many company commanders, Gupta was leading a dangerous uphill assault against entrenched intruders. He captured two bunkers before being cut down. 

Only a few days ago Major Vivek Gupta was having the time of his life in Drass. He said as much in a letter of June 8 to his father, Lt-Colonel (retd) B.R.S. Gupta. "You should feel proud of me ... I am contributing something for the nation in this uniform I have worn ... being a company commander at this time is the greatest experience one can have." Ironically, the elder Gupta was to receive the letter in his Dehradun house only at noon on June 17. By then the Army band had played out Dead Body Slow March. And his son's last rites had been completed, just half an hour before.

Vivek died on June 12 after capturing two difficult posts the same day on the wind-swept, icy slopes of the Drass sector. He perished on the battlefront when a fusillade of bullets from the Pakistanis tore open his torso, but not before he and his company men had slain seven members in the enemy camp. Death came swiftly, said a colleague, who saw Vivek mowed down by that first burst from a bunker and from the hills. Death can be very lonely in Kargil. The major lay in the snow alongside dead colleagues for two days. It was only on June 15 that a team could keep the enemy fire at bay and secure his body from the slopes. It ended, literally, exactly seven years of army life for "Vicky" who was commissioned in the 2nd Rajputana Rifles on June 13, 1992.

Vivek Gupta hadn't made up his mind about joining the army until he was settled in Dehradun after his father retired from the forces. He would chat up cadets and go swimming at the Indian Military Academy and soon made up his mind about which way his future would go. Says Anup Kumar, a close friend who edits a Dehradun-based monthly: "It was during those days in Dehradun when he had just entered college that we talked a lot about his joining the army. He knew that was the life for him."

In his hometown Dehradun, friends, relatives and armymen gathered to pay their last respects to a man they admired in life and death. Even his estranged doctor wife, Captain Rajshree Bisht, was there, sobbing quietly and saluting the man she had married in June 1997.

A National Defence Academy graduate, Vivek once told his father that he wasn't just interested in "counting socks and trousers" in the army. That was in response to his father's attempts to get him a posting in one of the safer divisions like Ordnance. "I am proud of my son, in my eyes he died a hero," wept the senior Gupta. Vivek would have liked that

Sayantan Chakravarty 

Courtesy: INDIA TODAY

Nation's second highest wartime gallantry award MAHA VIR CHAKRA was awarded to Major Vivek Gupta on 15th August 1999. 



SAABHAAR : Kargil War Heroes  http://ikashmir.net/