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Wednesday, March 19, 2025

JAIN TEERTH PARASNATH

JAIN TEERTH PARASNATH 


पारसनाथ पहाडी झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पहाड़ियों की एक श्रृंखला है। उच्चतम चोटी 1350 मीटर है। यह जैन के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल केंद्र में से एक है। वे इसे सम्मेद शिखर कहते हैं। 23 वें तीर्थंकर के नाम पर पहाड़ी का नाम पारसनाथ रखा गया है। चौबीस जैन तीर्थंकरों ने इस पहाड़ी पर मोक्ष प्राप्त किया। कुछ के अनुसार, नौ तीर्थकारों ने इस पहाड़ी पर मोक्ष प्राप्त किया। उनमें से प्रत्येक के लिए पहाड़ी पर एक मंदिर (गुमटी या तुक) है। पहाड़ी पर कुछ मंदिर 2,000 साल से अधिक पुराने माना जाता है। हालांकि यह जगह प्राचीन काल से बनी हुई है, मंदिरों की हालिया उत्पत्ति हो सकती है। संथाल इस देवता की पहाड़ी की मारंग बुरु कहते हैं। वे बैसाख (मध्य अप्रैल) में पूर्णिमा दिवस पर एक शिकार त्यौहार मनाते हैं।


पारसनाथ मंदिर

शीर्ष से पारसनाथ मंदिर देखें


KALYAN SINGH AGRAWAL - दानवीर दीवान बहादुर दाऊ कल्याणसिंह अग्रवाल जी*

KALYAN SINGH AGRAWAL - दानवीर दीवान बहादुर दाऊ कल्याणसिंह अग्रवाल जी


अगर ये ना होते तो, राजधानी रायपुर का नक्शा कुछ बदला सा होता। कथा उनकी जिनके सामने आज के उद्योगपति कुछ भी नही।

सन 1828 जिला बिलासपुर के ग्राम तरेंगा में उदय हुआ तहुतदारी का, और तहुतदारी के इस जन्म के 48 वर्ष बाद,
4 अप्रैल 1876 को जन्म हुआ दाऊ कल्याण सिंह का। पिता बिसेसरनाथ व माता पार्वती देवी थी। पिता एक छोटे तहुतदार थे। ताहुतदारी को बढ़ाने व राजस्व आय को दृष्टिगत रखते हुए निर्जन स्थानों पर नए गांव बसाकर अपने ताहुतदारी गांवों में वृद्धि की, पर साथ मे कर्ज का बोझ भी बढ़ा लिया। कारोबार ठीक चल ही रहा था कि बिसेसरनाथ की मृत्यु हो गई, सन 1903 जब पिता की मृत्यु हुई दाऊ तब 27 वर्ष के थे।

अब कथा शुरू होती है हमारे नायक “दाऊ कल्याण सिंह” की। 27 वर्ष की आयु में सारे कारोबार का भार दाऊ के कंधे पर आया और साथ मे आया 2 लाख 12 हज़ार का कर्ज भी। इस कर्ज के एवज में तरेंगा की उनकी संपत्ति जबलपुर के सेठ गोकुलदास के पास गिरवी थी। दाउ की पढाई तरेंगा ग्राम में ही हुई पर प्रबन्ध कौशल किसी शहर वाले से भी तेज था। कारोबार हाथ मे लेते ही अपने सूझ बूझ और प्रबंध कौशल से सारा कर्ज जल्द ही उतार फेका और अपने क्षेत्र में ऐसा विकास किया कि ताहुतदारी की वार्षिक आय तीन लाख तक पहुच गई। कारोबार में बढ़ोतरी अब ऐसी थी कि सन 1937 में “दाऊ कल्याण सिंह” ने 70 हज़ार रुपय से अधिक का राजस्व पटाया। इन आकड़ो से उनका परिश्रम और प्रबंधन कौशल दोनो झलकता है। दाऊ के मुकाबले आज के उद्योगपति कुछ भी नही।

दाऊ केवल कमाने के लिए मशहूर नही थे, दाऊ प्रेमभाव से अपनी संपत्ति लोगो मे बाटने के लिए भी मशहूर थे। छत्तीसगढ़ के इतिहास में इनसे बड़ा दानी शायद ही आपको कोई और मिलेगा। राज्य का पुराना मंत्रालय भवन याद होगा ना आपको ? घड़ी चौक के समीप जहाँ पहले पूरा प्रशानिक अमला उस भवन की छाव में रहा करता था। छत्‍तीसगढ शासन का मंत्रालय जिस भवन में स्‍थापित था, वह पहले चिकित्‍सा सुविधाओं से परिपूर्ण भव्‍य डीके अस्पताल (दाऊ कल्‍याण सिंह चिकित्सालय) हुआ करता था। अस्पताल के निर्माण के लिए दाउ कल्‍याण सिंह नें सन् 1944 में एक लाख पच्‍चीस हजार रूपये दान में दिया था। उस समय की उस राशि का वर्तमान समय में यदि आकलन किया जाए तो लगभग सत्‍तर करोड रूपये होते है। वह छत्‍तीसगढ में एकमात्र आधुनिक चिकित्‍सा का केन्‍द्र था। प्रदेश के दूर दूर गांव व शहर से लोग निःशुल्क चिकित्सा के लिए इस अस्पताल में आया करते थे।
दान के रूप में दाऊ के कल्याणकारी कार्यो की लंबी सूची है, रायपुर के लाभांडी में कृषि महाविद्यालय हेतु कृषि प्रायोगिक फार्म के लिये 1729 एकड़ भूमि तथा 1 लाख 12 हज़ार रुपए नगद उन्होंनो दान किया था। रायपुर में ही 323 एकड़ भूमि क्षयग्रस्त रोगियों के आयोग्य धाम निर्माण हेतु दान। रायपुर स्थित एक प्रसूत चिकित्सालय में कई कमरो का निर्माण। रायपुर के पुरानी बस्ती स्थित टुरी हटरी में जग्गनाथ के प्राचीन मंदिर को खैरा नामक पूरा गांव दान में चढ़ा दिया था। ये सारे कुछ ही उदाहरण थे उनकी दानवीरता के। इसलिए दाऊ नही होते तो रायपुर का नक्शा ही कुछ और होता।

उन्होंने केवल रायपुर ही नही बल्कि प्रदेश व देश के अनेक स्थानों पर अपनी महानता की छाप छोड़ी है, सन 1921 के भयंकर अकाल के समय, पीड़ितों की सहायता के लिए भाटापारा में लाखों रुपय खर्च कर एक बड़े जलाशय का निर्माण करवाया, जिसे आज लोग कल्याण सागर जलाशय के नाम से पहचानते है। भाटापारा में ही उनके द्वारा मवेशी अस्पताल, धर्मशाला तथा पुस्तकालय का निर्माण भी करवाया गया था। दाऊ की उदारता प्रदेश की सीमा में कैद नही रही, नागपुर स्थित लेडी डफरिन अस्पताल तथा सेंट्रल महिला महाविद्यालय का निर्माण नही हो पाता अगर दाऊ कल्याण सिंह प्रचुर मात्रा में दान राशि उपलब्ध ना कराते। बिहार के भूकंप का समय हो या वर्धा में बाढ़ का, या उनके पहुँच वाले क्षेत्र में कोई अकाल इन सभी प्राकृतिक आपदाओं के समय मे दाऊ अपने कोष का मुँह खोल दिया करते थे।

दाऊ को लोग कट्टर हिन्दू माना करते थे, लेकिन जब दाऊ दान करते, तब दानधर्म ही उनके लिए सबसे बड़ा धर्म बन जाता था, उन्होंने धर्म, जाति, या वर्ण से कभी कोई भेदभाव नही किया। उन्होंने मंदिर, मस्जिद, चर्च सभी के लिए भूमि उपलब्ध कराई। बाजार, कांजीहाउस, शासकीय कार्यालय भवन, स्कूल, गौशाला, शमशान, सड़क, पुस्तकालय, तालाब आदि अनेक कार्यो के लिये न केवल भूमि मुहैया कराई वरन नगद राशि भी दान की। दाऊ के दान के कई किस्से है, सारे किस्से पिरोने बैठे तो ना जाने कितने शब्द ढूढने पड़े।

दाऊ का छत्तीसगढ़ के लिये जितना प्यार था, हम उन्हें उसका आधा भी नही दे पाए, आज दाऊ को लोग भूल चुके है। ना किसी मंच से उनका नाम सुनाई देता है, ना कोई उनकी कहानिया सुनता है। बाहरी किस्सों की भीड़ में अपने नायक के किस्से लोगो को पता ही नही।

Birla Ganesh Mandir ALIBAG

Birla Ganesh Mandir ALIBAG

बिड़ला गणेश मंदिर अलीबाग

अलीबाग से 20 किलोमीटर दूर रेवदंडा के बाद अलीबाग-रोहा मार्ग पर 'सालव' नाम का एक छोटा सा गांव है। सालव गांव के पास एक पहाड़ी की चोटी पर एक मंदिर है। बिड़ला उद्योग समूह की एक इकाई विक्रम इस्पात कंपनी ने 'बिड़ला मंदिर' नामक इस मंदिर का निर्माण कराया है। यह मंदिर विक्रम इस्पात कंपनी और इसकी खूबसूरत आवासीय कॉलोनी के बीच में है। यह शुद्ध दूधिया सफेद संगमरमर से बना एक मंदिर है और इसका गुंबद काफी दूर से भी देखा जा सकता है। यहां सड़क मार्ग से या सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जा सकता है। मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय हमेशा परिदृश्य से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सीढ़ियों के दोनों ओर घास और खूबसूरत फूलों की हरी मखमली कालीन है जो आपको एक मिनट के लिए मंत्रमुग्ध कर देगी।


मंदिर में संगमरमर का फर्श है और मंदिर का हॉल चारों तरफ से खुला है। मंदिर की छत पारदर्शी है जो हवा और पर्याप्त रोशनी को अंदर आने देती है। मंदिर में प्रवेश करने पर एक चौकोर आकार का गुफ़ा है। मंदिर का गुफ़ा भी संगमरमर से बना है और बहुत ही सुंदर नक्काशीदार है। मंदिर के गुफ़ा में 'गणपति' की सुंदर नक्काशीदार मूर्ति रखी गई है। मूर्ति के दोनों ओर 'ऋद्धि और सिद्धि' की मूर्तियाँ रखी गई हैं। गुफ़ा के चारों ओर 'राधा-कृष्ण', 'शिव-पार्वती', 'भवानीदेवी' और 'सूर्यदेव' के छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंदिर के बगल के बगीचे में "स्वर्गीय आदित्य बिड़ला" की मूर्ति है।

प्रतिदिन सुबह 9 बजे और शाम 7 बजे पूजा और आरती की जाती है। मंदिर आम जनता के लिए सुबह 6 बजे से 11.30 बजे और शाम 4.30 बजे से 9 बजे तक खुला रहता है।

20 Kms. away from Alibag after revdanda is a small village named 'Salav' on the alibaug – roha route. There is a temple on a hill top near Salav village. Vikram Ispat company, a part of Birla udyog group has built this temple called 'Birla Mandir'. This temple is between the Vikram Ispat company and its beautifully located residential colony. It is a temple built in pure milk white marble and its dome can be seen from a long distance also. It can be reached by road or by climbing the steps. While climbing the temple steps one is always mesmerized by the landscape. On both sides of the steps is green velvet carpet of grass and beautiful flowers which will keep you spell bound for a minute.

The temple has marble floors and the hall of the temple is open from all sides. The ceiling of the temple is transparent which allows free flow of air and ample of light to come in. On entering the temple there is a square shaped nave. The nave is also made of marble and is very beautifully carved. The beautifully carved idol of 'Ganapati' is placed the nave. The idols of 'Riddhi and Siddhi' are placed on both sides of idol. Around the nave are small temples of 'Radha-Krishna', 'Shiv-Parvati', 'Bhavanidevi' and 'Suryadeva'. In the garden next to the temple there is a statue of "Late Aditya Birla".

Worship and Aarti is done at 9.00 a. m. and 7.00 p. m. everyday.The temple is open for the public from 6.00 a. m. to 11.30 a. m. and 4.30 p. m. to 9.00 p. m.

Birla Mandir (Vishnu Temple) (Nagda)

Birla Mandir (Vishnu Temple) (Nagda)

यह मंदिर जी डी बिड़ला द्वारा बनाया गया था। बिड़ला मंदिर (बिड़ला मंदिर) अलग-अलग शहरों में बिड़ला परिवार द्वारा बनाए गए अलग-अलग हिंदू मंदिरों या मंदिरों को संदर्भित करता है। ये सभी मंदिर शानदार ढंग से सफेद संगमरमर से बने हैं। कुछ स्थानों पर निर्माण कार्य लगातार चल रहा है। परिवार का मानना ​​है कि अगर वे मंदिरों का निर्माण रोक देते हैं, तो इससे बुरा भाग्य आएगा। यही कारण है कि कुछ मंदिर 100% पूरे नहीं हुए हैं, और निर्माण कार्य धीमी गति से चल रहा है।


This Temple made by G D Birla.

Birla Mandir (Birla Temple) refers to different Hindu temples or Mandirs built by the Birla family, in different cities. All these temples are magnificently built in white marble.Construction is continuously going on at some location. The family believes that if they stop the construction of temples, it will bring bad fate. This is the reason why some of the temples are not 100% finished, and construction is on-going, albeit at a slow pace.

BIRLA MANDIR AKOLA

BIRLA MANDIR AKOLA

अकोला के शहर के केंद्र से 3 किमी से अधिक की दूरी पर स्थित, बिरला राम मंदिर अकोला के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इसे श्री राम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर अकोला रेलवे स्टेशन के बहुत करीब है और सताव चौक से पैदल दूरी पर है। यह बिरला परिवार के तत्कालीन मेसर्स बरार ऑयल इंडस्ट्रीज द्वारा निर्मित एक प्राचीन मंदिर है। मंदिर परिसर अपने आप में बहुत ही शांत और सुंदर है। यहाँ दो मंदिर हैं। एक भगवान राम, देवी सीता और भगवान लक्ष्मण का है। मुख्य मंदिर के बगल में दूसरा मंदिर भगवान शिव का है। मंदिर अपनी सुंदर और आकर्षक वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। एक छोटे से लॉन क्षेत्र में प्रवेश द्वार पर मंदिर के सामने भगवान शिव की एक मूर्ति भी रखी गई है। प्रवेश द्वार के शीर्ष पर भगवान कृष्ण की एक मूर्ति है जिसके दोनों ओर दो गाय हैं वेदों और उपनिषदों से चुने गए प्रसिद्ध भजन (मंत्र या श्लोक), कुछ तस्वीरों के साथ, भक्तों का मार्गदर्शन करने के लिए दीवारों पर खूबसूरती से लगाए गए हैं। मंदिर पूरे परिवेश को शांत, शांत और दिव्य बनाता है।

दशहरा के दौरान बिरला राम मंदिर में 50,000 से अधिक भक्त भगवान राम से आशीर्वाद लेने आते हैं। जन्माष्टमी (भगवान राम की जयंती) का त्यौहार यहाँ बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है और इस दिन मंदिर को रोशनी और फूलों से सजाया जाता है। इसी तरह, दिवाली और ऐसे अन्य शुभ अवसरों पर, मंदिर में भक्तों की भीड़ होती है।

इस जगह पर जाने का सबसे अच्छा समय सर्दी और बरसात का मौसम है। मंदिर में सुबह 6:00 बजे से रात 10:00 बजे के बीच जाया जा सकता है। मंदिर शनिवार और रविवार के साथ-साथ सार्वजनिक छुट्टियों पर भी खुला रहता है।


अकोला को कपास शहर के रूप में जाना जाता है; यह मध्य भारत में सबसे बड़े कपास उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। यह शहर ऊर्जावान वरहदी बोली के लिए भी जाना जाता है। अकोला शहर महाराष्ट्र राज्य के उत्तरी मध्य भाग में, पश्चिमी भारत में, मोरना नदी के तट पर स्थित है और यह महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ जिले का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है


इस तथ्य के बावजूद कि यह एक पर्यटक स्थल है, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण प्रामाणिक, सामाजिक, राजनीतिक, कृषि प्रधान शहर है। यह स्थान ताप्ती नदी घाटी में एक प्रमुख सड़क और रेल चौराहा है; जो मुख्य रूप से कपास में व्यापार का केंद्र है। यह मध्य भारत में महाराष्ट्र प्रांत के विदर्भ क्षेत्र का एक शहर है।


अकोला में स्थित बिड़ला मंदिर को श्री राम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह महाराष्ट्र का एक शहर है। अकोला में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिड़ला मंदिर के साथ-साथ अन्य प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भी बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।


BIRLA MANDIR JAYPUR - बिडला मंदिर जयपुर

BIRLA MANDIR JAYPUR - बिडला मंदिर जयपुर

सबसे खूबसूरत मंदिर- म़ात्र एक रुपए की जमीन पर बना है यह विशाल लक्ष्मीनारायण मंदिर

Laxmi Narayan Birla Mandir Jaipur

विश्व धरोहर सिटी के रूप में जाने जाते जयपुर में ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक स्थलों की कोई कमी नहीं है। यहां दर्जनों महल, किले, मंदिर हैं जिनका अपना अलग—अलग महत्व है। यूं तो जयपुर के ज्यादातर पुराने मंदिरों की ख्याति देश—विदेश में है लेकिन इनमें बिड़ला मंदिर का नाम खासतौर पर लिया जाता है। देश में कई जगहों पर बिड़ला मंदिर बनाए गए हैं जहां श्रदृधालुओं की गहमागहमी बनी रहती है पर जयपुर के बिड़ला मंदिर की ऐसी अनेक विशेषताएं हैं जिनके कारण देशभर के अन्य मंदिरों में इसे अनूठा स्थान प्राप्त हो गया है।

जयपुर का बिड़ला मंदिर 1988 में बनाया गया था। बिड़ला मंदिर दरअसल भगवान श्री नारायण तथा माँ श्री लक्ष्मी को समर्पित है। यही कारण है कि इसे लक्ष्मीनारायण मंदिर भी कहा जाता है। यह प्रसिदृध मंदिर जयपुर के मोती डुंगरी इलाके के समीप बना है। यह मंदिर सफ़ेद संमरमर का बना हुआ है। शुभ्र संगमरमर की चमक से आंखें चौंघियां जाती है। सफ़ेद संगमरमर में की गई सूक्ष्म नक़्क़ाशी देखते ही बनती है। मंदिर परिसर भी अत्यंत सुन्दर है। हरे—भरे परिसर के बीच स्थित सफेद संगमरमर का यह मंदिर अलग ही दमकता है। मंदिर के पास ही पहाड़ी पर मोती डूंगरी फोर्ट भी स्थित है जो स्कॉटिश शैली से बना एक मशहूर क़िला है।

बिड़ला मंदिर में स्थापित मूर्तियों का भी अदृभुत सौंदर्य है। मूर्तिकला को राजमिस्त्रियों व मूर्तिकारों की कल्पनाशीलता का अनूठा उदाहरण माना जाता है। मंदिर में विष्णुजी और लक्ष्मीजी के साथ ही अन्य कई देवी-देवताओं की सुन्दर-सुन्दर मूर्तियाँ हैं। इतना ही नहीं, मंदिर की बाहरी दीवारों पर भी अनेक महान् ऐतिहासिक विभूतियाँ और धार्मिक व्यक्तित्व चित्रित किए गए हैं। इनमें गौतम बुद्ध से लेकर सुकरात, जरथुस्त्र, ईसा मसीह और कंफ्यूशियस आदि भी शामिल हैं। इस मंदिर का निर्माण 1988 में बिरला ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज द्वारा करवाया गया था। बिड़ला मंदिर से संबंधित सबसे रोचक तथ्य यह है कि जिस जगह मंदिर बनवाया गया है उस जमीन को बिड़ला प्रतिष्ठान ने जयपुर के तत्कालीन महाराजा से एक रुपये की नाममात्र की राशि देकर ख़रीदा था।

BIRLA MANDIR KOLKATA - बिरला मंदिर (कोलकाता)

BIRLA MANDIR KOLKATA - बिरला मंदिर (कोलकाता)


बिरला मंदिर भारत के राज्य पश्चिम बंगाल की राजधानी दक्षिण कोलकाता के आशुतोष चौधरी रोड, बालीगंज में स्थित हैा  यह मंदिर कोलकाता के संस्कृतिक से जुड़ा एक हिन्दू मंदिर है

इतिहास

कोलकाता में बिरला मंदिर का निर्माण 1970 में शुरू हुआ था, जिसे पूरा करने 26 साल लगे। इसका डिजाइन नोमी बोस द्वरा निर्मित किया गया था। सोमपुरा ब्राह्मण समुदाय ने इस मंदिर के देखरेख कीया। इस मंदरी का निर्माण कार्य एक प्रसिध्द उधोगपति बिड़ला परिवार द्वारा किया गया था। मंदिर का उद्घाटन 21 फ़रवरी 1996 को डॉ0 कर्ण सिंह ने तथा मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्य स्वामी चिदानंदजी महाराज द्वारा किया गाया था।

मंदिर

कोलकाता का बिरला मंदिर बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर निर्मित 20 वीं सदी की संरचना को दर्शता हैा इस मंदिर की शैली आधुनिक और समकालिन दोनों का मिश्रण हैा यह मंदिर 160 फीट की ऊँचाई और लगभग 2,940 वर्ग मीटर में फैला भुवनेश्वर के प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर का मिलता जुलता रूप हैा बिरला मंदिर अपने पत्थर की नक्काशी और कुछ राजस्थानी मंदिर वास्तुकला से भगवदगीता के धर्मग्रंथों के चित्रण को दर्शता हैा कोलकाता का बिरला मंदिर भगवान श्री कृष्ण और राधा को समर्पित हैा इसके अलावा बाईं ओर माँ दुर्गा दस अवतार तथा दाहिने ओर शिव ध्यानमग्न की प्रतिमा हैा यहाँ जन्मष्ट्रमी के दिन हजारों दर्शनार्थी पूजा-अर्चना के लिए आते है।

अवस्थिति

बिरला मंदिर कोलकाता के आशुतोष चौधरी एवेन्यू, बालीगंज में स्थित हैं जिसे लक्ष्मीनारायण मंदिर के रूप में भी जाना जाता हैा बिरला मंदिर कोलकाता के निकटतम् मेट्रे स्ट्रेशन, रविंद्र सदन, मैदान, कालीघाट आदि हैा यह कोलकाता के केन्द्र हवाई अड्डा से 16 किमी, ट्रेन से 5 किमी हैा तथा इसके आलावा यहाँ शहर के विभिन्न हिस्सो से बस, ट्राम, ट्रेक्सी आदि की उपलब्धता है

प्रवेश

बिरला मंदिर प्रवेश के लिए कोई भी शुल्क नहीं चुकाना पड़ता हैा मंदिर सप्ताह में सातों दिन खुला रहता हैा मंदिर सुबह में 5.30 से दोपहर 11.00 बजे तक और शाम को 4.30 से 9.30 के बीच खुला रहता हैा मंदिर परिसर के अन्दर किसी भी तरह की फोटोग्राफी या विडियोग्राफी पूरी तरह से प्रतिबंधित हैा

BIRLA MANDIR RENUKOOT - RENUKESHWAR MAHADEV MANDIR

BIRLA MANDIR RENUKOOT - RENUKESHWAR MAHADEV MANDIR 

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रेणुकेश्वर महादेव मंदिर जिसे बिड़ला मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के सोनभ्रद जिले के रेणुकूट में स्थित है। इस मंदिर का नाम बिड़ला गुप मंदिरों में आता है। बिड़ला गुप ने कई शहरों में मंदिरों का निर्माण किया है जिनमें से यह एक मंदिर है। मंदिर का निर्माण बिड़ला समूह द्वारा वर्ष 1972 में किया गया था। जो कि पुर्णतः देव के देव महादेव को समर्पित है। यह मंदिर रेनुकूट का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है इस क्षेत्र के आस पास के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु मंदिर में महादेव के दर्शन हेतु आते है। मुख्य मंदिर के सामने महादेव के प्रिय भक्त नंदी की विशाल मूर्ति स्थिापित है।

रेणुकेश्वर महादेव मंदिर बहुत सुन्दर और अद्भुत है। ऐसा कहा जाये कि मंदिर की सुन्दराता आश्चर्यजनक है। मुख्य प्रवेश द्वार आपको अविश्वसनीय नक्काशी के साथ स्वागत करता है जो सूर्य देव को रथ पर प्रस्तुत करता है। दूसरा द्वार दोनों ओर हाथियों की पत्थर की नक्काशी प्रस्तुत करता है। मंदिर में स्थापित मूर्तियां अद्भुत कारीगरी का नमूना प्रस्तुत करता है। मंदिर का वातावरण व इसका प्राकृतिक सौन्दर्य देखने वाले की आत्मा का अद्भुत नई ऊचाई तक ले जाता है। बगीचे के फव्वारे के साथ समृद्ध परिदृश्य इस जगह को आंतरिक शांति महसूस करने के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं। यह मंदिर बगीचे के बीचों बीच बना हुआ है।

Tuesday, March 18, 2025

ORIGIN OF GUPTA DYNESTY - गुप्त वंश की उत्पत्ति

ORIGIN OF GUPTA DYNESTY - गुप्त वंश की उत्पत्ति

चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त ने पूना अभिलेख में अपने वंश को स्पष्टतः धारण गोत्रीय बताया हैं. अग्रवालो के १८ गोत्र में से एक गोत्र धारण हैं. गुप्त वैश्यों की उपाधि हैं. आज भी धार्मिक कर्म व संकल्प करते हुए वैश्य पुरोहित नाम व गोत्र के साथ गुप्त उपनाम का उल्लेख करते है. 

गुप्त शासको के नाम श्री, चन्द्र, समुद्र, स्कन्द आदि थे. जबकि गुप्त उनका उपनाम था. जो की उनके वर्ण व जाति को उद्घोषित करता हैं. गुप्त उपनाम केवल और केवल वैश्य समुदाय के व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता हैं.इतिहास में व पुरानो में गुप्त सम्राटो को वैश्य बताया गया है. 

बोद्ध धर्मग्रन्थ आर्यमंजुश्री कल्प में गुप्त वंश को वैश्य बताया गया है. इतिहासकार अल्तेकर, आयंगर, रोमिल्ला थापर, रामचरण शर्मा आदि ने गुप्त वंश को वैश्य बताया है.गुप्त सम्राटो ने यज्ञोपवित धारण किया था. व अश्वमेध यज्ञ कराये थे. केवल द्विज ही यह कार्या कर सकते थे. अग्रवाल द्विज जाति है. और प्राचीन क्षत्रिय जाति है. जिसने बाद में वैश्य कर्म अपनाया. गुप्त वंश के शासक अग्रवाल थे. 

प्रख्यात इतिहासकार राहुल संस्क्रतायन ने भी गुप्त वंश को अग्रवाल वैश्य बताया हैं. अग्रवालो की कुलदेवी माता लक्ष्मी है. गुप्त सम्राटो की कुलदेवी भी माता लक्ष्मी है. अग्रवाल मुख्यतः वैष्णव होते है. और शद्ध शाकाहारी भी. गुप्त वंश के शासक भी वैष्णव और शाकाहारी थे. 

गुप्त वंश के समय में भारत सोने की चिड़िया कहलाया था. एक विशुद्ध वैश्य शासक ही व्यापार को बढ़ावा दे सकता है. गुप्त सम्राट समुद्र गुप्त की शादी भी अग्रोहा नगर की एक योधेय अग्रवाल राजकुमारी से हुई थी. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का बचपन अपने ननिहाल अग्रोहा में ही बिता था.अग्रोहा अग्रवालो का नगर था और योधेय जनपद की राजधानी थी. उस समय अग्रवालो को योधेय कहा जाता था.

BAGLA HAWELI CHURU - राय बहादुर सेठ भगवानदास बागला

BAGLA HAWELI CHURU - राय बहादुर सेठ भगवानदास बागला

चूरू में भी राय बहादुर सेठ भगवानदास बागला की हवेली में तत्कालीन समय में अदालत लगा करती थी, जहां पर बीकानेर के तत्कालीन शासक आकर लोगों की फरियाद सुनकर फैसला किया करते थे।


कभी चूरू की इस हवेली में लगता था न्याय का दरबार

वर्तमान समय में लोगों को न्याय दिलाने के लिए सरकार की ओर से न्याय आपके द्वार, प्रशासन आपके द्वार जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। ताकि लोगों को न्याय व अटके कामों के लिए शहरों व कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पडे। लेकिन तत्कालीन राजा-महाराजों ने यह व्यवस्था काफी सालों पहले ही शुरू कर दी थी। तत्कालीन शासक समय-समय पर गांव-ढाणियों में पहुंचकर आमजन की फरियादों को सुना करते थे। चूरू में भी राय बहादुर सेठ भगवानदास बागला की हवेली में तत्कालीन समय में अदालत लगा करती थी, जहां पर बीकानेर के तत्कालीन शासक आकर लोगों की फरियाद सुनकर फैसला किया करते थे।

इतिहासविद् प्रो. केसी सोनी ने बताया कि ठाकुर श्याम सिंह के पांच हुए थे, जिनमें तीन छोटी उम्र में ही देवलोक चले गए। शेष दो चैन सिंह व हमीर सिंह में पिता के देहावसन के बाद बिसाऊ राज्य का दो बराबर भागों में बंटवारा हुआ था। हमीर सिंह को विक्रम संवत 1890 को बिसाऊ की गद्दी पर बैठे थे।

हमीर सिंह के पिता के शासनकाल में शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना की गई थी, इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य शेखावाटी तथा व इसके निकटवर्ती क्षेत्रों में होने वाली लूटपाट को रोकने का था। बीकाने व चूरू के शासक शेखावाटी के शासक व शेखावाटी के शासक चूरू व बीदासर के शासकों पर पर लूटपाट का आरोप लगाते थे।

राजाजी के कोठी में लगा था दरबार इतिहास विद सोनी ने बताया कि आरोप व प्रत्यारोप का निराकरण करने के लिए विक्रम संवत 1891 में तत्कालीन गर्वनर जनरल के एजेंट कर्नल एलविस चूरू आए हुए थे। चूरू के राजाजी की कोठी में इनका दरबार लगा था। बीकानेर राज्य के कई सरदार, सेठ , साहूकार सहित सेठ नंदराम केडिया भी इसमें शामिल हुए थे। चलते हुए दरबार में बिसाऊ के हमीर सिंह भी इसमें शामिल हुए थे।

समय-समय पर दरबार में होती थी जनसुनवाई
सोनी ने बताया कि बीकानेर के तत्कालीन शासक जनसुनवाई व अदालत सेठ भगवानदास बागला की कोठी में लगाया करते थे। उन्होंने बताया कि इस दरबार में चूरू, बीकानेर व गंगानगर के लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचते थे। यहां पर बीकानेर के शासक पक्षों की सुनवाई के बाद में फैसला सुनाया करते थे। उन्होंने बताया कि जब भी शासक का चूरू आना होता था, तब-तब हवेली में समय-समय पर दरबार लगाया जाता था। यहां पर लोग राजा के सामने अपनी समस्याओं व फरियाद को रखा करते थे। इतिहासविद बताते है कि सेठ भगवानदास बागला को आस-पास के क्षेत्र में विशेष सम्मान था। इस हवेली में कई प्रकार के भित्ती चित्र है जो कि लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन हुए हैं।

Monday, March 17, 2025

VAISHYA HERITAGE - चुरू के बनियों की हवेलिया

VAISHYA HERITAGE - चुरू के बनियों की हवेलिया


दिल्ली से मात्र पाँच घंटे की दूरी पर, राजस्थान का शेखावाटी शहर चुरू आपको 17वीं शताब्दी की शानदार राजपुताना वास्तुकला की एक शानदार झलक प्रदान करता है। भित्तिचित्रों से लदी इन पुरानी संरचनाओं को देखना अद्भुत था, जो समय के साथ और भी सुंदर होती गई हैं।











चुरू, राजस्थान की पैदल यात्रा

राजस्थान के चुरू में संकरी गलियों में स्थित हर दूसरा घर आपके समय और प्रशंसा के लायक है। हालाँकि, कुछ लोकप्रिय हवेलियाँ हैं जिन्हें निश्चित रूप से आपकी चेकलिस्ट में होना चाहिए:

#1. सुराना हवेली {सुराना और कोठारी व्यापारी वंशों द्वारा निर्मित कई इमारतों में से एक}

#2. मालजी का कमरा {कोठारी हवेली अब एक होटल में बदल गई है, इतालवी और राजपूत वास्तुकला का मिश्रण प्रदर्शित करती है}

#3. कन्हैया लाल बागला हवेली {इसमें लगभग 100 छोटी खिड़कियाँ हैं}

#4. मंत्री हवेली {चुरू की सबसे पुरानी हवेलियों में से एक, जो पूरी तरह से जटिल चित्रकला से आच्छादित है}

VAISHYA HERITAGE - चूरू के इस हवेली में रहते थे रहीश सेठ - CHURU

VAISHYA HERITAGE - चूरू के इस हवेली में रहते थे रहीश सेठ - CHURU 


चूरू के इस हवेली में रहते थे रहीश बनिया सेठ, दूसरी मंजिल पर खड़ी होती थी कार, अजीब है हवेली की कहानी

राजस्थान के चूरू में स्थित दूधवाखारा गांव ना सिर्फ आंदोलनकारी किसानों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जाना जाता है, बल्कि सालों पहले बनी ऐतिहासिक हवेलियों के लिए भी ये गांव काफी विख्यात है

राजस्थान की पहचान सिर्फ यहां के धोरे और खान-पान से ही नहीं, बल्कि गगनचुंबी हवेलियों से भी होती है. ऊंची इमारतें और उन पर उकेरे चित्र भारतवासी के साथ विदेशी पर्यटक को भी अपना दीवाना बनाते हैं. खासतौर पर शेखावाटी की हवेलियां, जिन्हें निहारने लोग सात समंदर पार से भी आते हैं. सालों पहले बनी ये हवेलियां आज भी अपनी भव्यता और सुंदरता बिखेर रही हैं. धनाढ्य परिवारों से ताल्लुक रखने वाली ये हवेलियां उस वक्त के सेठ-साहूकारों की रहीशी को भी बयां करती हैं.

103 साल पहले बनी ये हवेली
राजस्थान के चूरू में स्थित दूधवाखारा गांव ना सिर्फ आंदोलनकारी किसानों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जाना जाता है, बल्कि सालों पहले बनी ऐतिहासिक हवेलियों के लिए भी ये गांव काफी विख्यात है. गांव में ही 103 साल पहले बनी सेठ रामेश्वरदास नाथानी की हवेली अपनी विशेषताओं और सेठ जी की रहीशी के लिए काफी प्रसिद्ध है. गांव के ही रिटायर्ड सूबेदार गोविंद सिंह राठौड़ बताते हैं कि एक बीघा में बनी इस भव्य हवेली के नीचे करीब साढ़े सात बीघा जमीन है.

दूसरी मंजिल पर होती थी सेठ जी की कार पार्क
रिटायर्ड सूबेदार गोविंद सिंह राठौड़ बताते हैं कि यह हवेली तीन मंजिला है. हवेली की दूसरी मंजिल पर सेठ जी की कार पार्क होती थी. सेठ जी जब बाहर से हवेली में आते थे, तो कार दूसरी मंजिल तक बने रैम्प की सहायता से सीधे सेठ जी के कमरे के आगे आकर रुकती थी. हवेली की पहली मंजिल पर हवेली में काम-काज करने वाले कर्मचारी रहते थे. वहीं दूसरी मंजिल पर सेठ जी और तीसरी मंजिल पर सेठानी जी रहती थी. राठौड़ बताते है कि इस हवेली में 60 कमरे थे और हवेली के अंदर दो चौक थे, जो आज भी इसकी भव्यता बयां करते हैं. इस हवेली के बिकने के बाद से वर्तमान में करीब डेढ़ सालों से इस हवेली को हैरिटेज होटल के रूप में विकसित करने का कार्य चल रहा है.

VAISHYA HERITAGE - भव्यता का अनुभव: सुराना हवेली, CHURU

VAISHYA HERITAGE - भव्यता का अनुभव: सुराना हवेली, CHURU 

राजस्थान के चुरू शहर के बीचों-बीच रेगिस्तानी परिदृश्य और चहल-पहल भरी सड़कों के बीच स्थित, वास्तुकला की शानदार कृति - सुराना हवेली। इतिहास से भरपूर, बेहतरीन भित्तिचित्रों से सजी और सुराना परिवार की विरासत से भरपूर यह हवेली राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की भव्यता और वैभव का प्रमाण है। 


राजस्थान के चुरू शहर के बीचों-बीच रेगिस्तानी परिदृश्य और चहल-पहल भरी सड़कों के बीच स्थित, वास्तुकला की शानदार कृति है - सुराना हवेली। इतिहास से भरपूर, बेहतरीन भित्तिचित्रों से सजी और सुराना परिवार की विरासत से भरपूर यह हवेली राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की भव्यता और वैभव का प्रमाण है।

ये तस्वीर चूरू सुराणा हवेली की है ।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राजस्थान में एक नहीं दो हवा महल हैं। पहले हवा महल को पूरी दुनिया जानती है। राजधानी पिंकसिटी जयपुर में, लेकिन आश्चर्य की बात है कि दूसरा हवा महल, जिसे सुराणा हवेली कहा जाता है, उसमें विश्व प्रसिद्ध हवा महल से करीब दो गुना खिडकियां हैं। सभी जानते हैं कि जयपुर का हवा महल उसमें मौजूद खिड़कियों की वजह से ही वर्ल्ड फेमस है।

चूरू के सुराणा हवेली में भी इतनी खिड़कियां और दरवाजे हैं कि जयपुर की शान हवा महल भी पीछे हो जाता है। जयपुर के हवामहल में 365 खिड़कियां हैं वहीं चूरू के इस महल में 700 से ज्यादा खिडकियां हैं। जयपुर का हवा महल 5 मंजिला है, जबकि चूरू की यह हवेली 6 मंजिला है। इसका निर्माण हवा महल बनने के सालों बाद हुआ था। साल 1870 में बने इस सुराना की हवेली की दीवारों पर चित्र हैं जो आज भी उस वक्त के इतिहास को सहज ही बयां करते हैं। हवेली की रखवाली करने वालों का कहना है कि इस महल के सभी खिड़की और दरवाजों को खोला और बंद किया जाए तो सुबह से शाम हो जाती है। इसमें कुल खिड़की और दरवाजों की संख्या 1111 है।

इसलिए इसके अधिकांश दरवाजों को बंद ही रखा जाता है। कहा जाता है कि कहीं न कहीं इस हवेली को बनवाने के पीछे हवा महल का ही कॉन्सेप्ट था। स्थानीय लोग इसे चूरू की हवेली कहते हैं। यहां आने वाले सैलानी इस हवेली को देखकर चौंक जाते हैं और कन्फ्यूज होकर पूछते हैं कि आखिर हवा महल है कहां।

कहते हैं सुराणा ने इसे बनवाने में ज्यादा मजदूरी नहीं खर्च की। उस वक्त राजस्थान में अकाल पड़ा हुआ था। लोग दाने-दाने को तरस रहे थे। तब मजदूर और उनके परिवार को दोनों जून का भोजन मुहैया कराकर इस हवेली का निर्माण करा लिया गया था।

अतीत की एक झलक
सुराना हवेली की कहानी 19वीं सदी की है, जब चूरू राजस्थान के प्राचीन कारवां मार्गों के साथ एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। समृद्ध सुराना वैश्य बनिया परिवार द्वारा निर्मित, जो प्रसिद्ध व्यापारी और कला के संरक्षक थे, हवेली न केवल एक निवास के रूप में बल्कि उनके धन, प्रभाव और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रतीक के रूप में भी काम करती थी।

वास्तुकला के चमत्कार
जैसे ही कोई सुराना हवेली में कदम रखता है, वह कालातीत भव्यता और वास्तुकला की चमक की दुनिया में पहुँच जाता है। हवेली में राजपूत और मुगल वास्तुकला शैलियों का एक शानदार मिश्रण है, जिसमें जटिल नक्काशी, अलंकृत झरोखे (बालकनी) और इसकी दीवारों और छतों पर विस्तृत रूप से चित्रित भित्तिचित्र हैं। सुराना हवेली का हर कोना एक कहानी बयां करता है - पौराणिक महाकाव्यों और दिव्य प्राणियों के दृश्यों से लेकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी और सांस्कृतिक उत्सवों के चित्रण तक। भित्तिचित्रों की बेहतरीन बारीकियाँ और जीवंत रंग उन कारीगरों के कौशल और शिल्प कौशल का प्रमाण हैं जिन्होंने इन उत्कृष्ट कृतियों को बनाने के लिए अथक परिश्रम किया।

विरासत का संरक्षण
हाल के वर्षों में, चूरू की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने और पुनर्स्थापित करने के लिए नए सिरे से प्रयास किए गए हैं, जिसमें इसकी प्रतिष्ठित हवेलियाँ भी शामिल हैं। अपने ऐतिहासिक महत्व और स्थापत्य कला की भव्यता के साथ, सुराना हवेली इन संरक्षण प्रयासों में सबसे आगे रही है।

सावधानीपूर्वक जीर्णोद्धार कार्य के माध्यम से, विशेषज्ञों ने सुराना हवेली के फीके पड़ चुके भित्तिचित्रों और ढहते हुए अग्रभागों को पुनर्जीवित करने में कामयाबी हासिल की है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसकी सुंदरता और वैभव भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रशंसा और सराहना के लिए बना रहे। आज, हवेली एक जीवंत संग्रहालय के रूप में कार्य करती है, जो आगंतुकों को राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाती है।

सांस्कृतिक विरासत
अपने वास्तुशिल्प महत्व से परे, सुराना हवेली एक सांस्कृतिक विरासत रखती है जो चुरू के इतिहास के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। यह इस क्षेत्र में एक समय में फलने-फूलने वाले व्यापार और वाणिज्य के प्रतीक के रूप में कार्य करता है, साथ ही कला और शिल्प के संरक्षण के रूप में भी कार्य करता है जो व्यापारी अभिजात वर्ग की जीवन शैली को परिभाषित करता है।

सुराना हवेली में आने वाले आगंतुकों को पारंपरिक संगीत और नृत्य प्रदर्शनों से लेकर कलात्मक शिल्प और व्यंजनों तक, राजस्थान की जीवंत संस्कृति में डूबने का अवसर मिलता है। हवेली एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में कार्य करती है, जहाँ स्थानीय लोग और पर्यटक समान रूप से राजस्थानी विरासत की समृद्ध ताने-बाने का जश्न मनाने के लिए एक साथ आते हैं।

लचीलेपन का प्रतीक
समय बीतने और आधुनिकीकरण की चुनौतियों के बावजूद, सुराना हवेली लचीलेपन के प्रतीक के रूप में खड़ी है - राजस्थान की स्थापत्य विरासत की स्थायी विरासत का एक प्रमाण। यह चुरू के ताने-बाने में बुने इतिहास के समृद्ध ताने-बाने की याद दिलाता है, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए इसे संजोने और सराहने के लिए इसे संरक्षित करने के महत्व को दर्शाता है।

चूरू के बीचों-बीच, रेत के टीलों और चहल-पहल भरी सड़कों के बीच, राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की भव्यता और वैभव का स्मारक है - सुराना हवेली। अपनी कालातीत सुंदरता, वास्तुकला के चमत्कारों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ, यह हवेली आने वाले सभी लोगों की कल्पना को मोहित करती है, और वैभव और विलासिता के बीते युग की झलक पेश करती है।

जैसे ही सूर्य रेगिस्तानी परिदृश्य पर डूबता है, इसकी दीवारों पर सुनहरा रंग छा जाता है, सुराना हवेली इतिहास का एक प्रकाश स्तंभ बनी हुई है, जो यात्रियों को समय के माध्यम से यात्रा करने और राजस्थान के गौरवशाली अतीत की भव्यता में डूबने के लिए आमंत्रित करती है।

VAISHYA HERITAGE - मालजी का कमरा - CHURU

VAISHYA HERITAGE - मालजी का कमरा - CHURU
 

इस शहर के बारे में कुछ खास बात है। कुछ हद तक भयावह, कुछ हद तक सांसारिक, जैसे ही आप सोने के रंग की चूरू बस्ती में कदम रखते हैं, आपको हर उस चीज की लहर का सामना करना पड़ता है जो राजस्थान के ढांचे में या 21वीं सदी में नहीं आती। सौ से ज़्यादा हवेलियों से भरा हुआ , जो कभी भारत के अभिजात वर्ग की शानदार शानो-शौकत का घर हुआ करता था, चूरू को अनौपचारिक रूप से थार रेगिस्तान का प्रवेश द्वार कहा जाता है। और इस अज्ञात भूमि पर, धूल भरे शहर को रंगों से सराबोर करते हुए, मनमोहक मालजी का कमरा है , जो फ़िरोज़ा और हाथीदांत सफ़ेद तामचीनी से भरी 110 साल पुरानी हवेली है , जिसे जिज्ञासु यात्रियों और अजीबोगरीब पर्यटकों दोनों के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।


उत्तरी राजस्थान के सुदूर छोर पर बसा चुरू, बबलगम गुलाबी और पिस्ता हरे रंग के घरों, संकरी गलियों में दौड़ते वाहनों, बहुरंगी, यद्यपि बंद दरवाजों की कतारें और घुमावदार रेत के टीलों का एक मिश्रण है। और इन सबके बीच, मालजी का कमरा राजस्थान के आसमान के नीचे एक अलौकिक, भव्य आश्चर्य की तरह खड़ा है।


1920 ई. में, एक धनी, मारवाड़ी व्यापारी, माल चंद कोठारी ने बीकानेर के महाराजा, गंगा सिंह के लिए एक आलीशान गेस्टहाउस बनवाया। उसके बाद, मालजी का कमरा अब मौज-मस्ती का केंद्र बन गया है, जहाँ सालों से दुनिया भर के गणमान्य व्यक्तियों, कलाकारों और व्यापारियों के लिए भव्य बॉलरूम वाल्ट्ज और प्रदर्शन कला के अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।


17 वर्षों तक अथक परिश्रम करते हुए, धन को कलात्मक अभिव्यक्ति में बदलने के लिए काम करते हुए, हवेली को धीरे-धीरे वेनिस के खंभों, इतालवी और शेखावाटी वास्तुकला के प्रभावों के एक मादक मिश्रण और नृत्य की विभिन्न मुद्राओं को प्रदर्शित करते हुए पुरुषों और महिलाओं की शानदार प्लास्टर मूर्तियों से सजाया गया। अगर कोई बारीकी से देखे, तो हवेली के अन्य आकर्षक तौर-तरीकों में मुगल शैली के कुछ अंश देखे जा सकते हैं, जैसे कि पुरानी भित्तिचित्र जो कि जर्जर दीवारों पर बने हैं, जिन पर फूल और लताएँ, पक्षी और तितलियाँ उकेरी गई हैं, कलाकार मुगलों की 'स्वर्ग' की धारणा पर खेलते हैं। 19वीं सदी के एक बड़े हिस्से में महाभारत और रामायण के हिंदू महाकाव्यों के पौराणिक दृश्य भी दीवारों पर उकेरे गए हैं।


चूरू में शाम ढलते ही, आस-पास के बाज़ार की आवाज़ें कम हो जाती हैं और आस-पास की हवेलियाँ, अगर संभव हो तो, थोड़ी और आकर्षक हो जाती हैं। 18वीं शताब्दी में बनी हवेलियों की लाल और नीली खिड़कियाँ ढलते सूरज की रोशनी में चमकती हैं, और अगर आप खुद को दूर से लोकगीत सारंगी की धुन सुनने दें, तो आप हवेलियों की महिलाओं के कदमों की आवाज़ , दौड़ते हुए, उनके घुंघरूओं की झंकार को बलुआ पत्थर के मेहराबों से गूंजते हुए देख सकते हैं।


मालजी का कमरा में 12 कमरों की सूची है। इन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया गया है - आराम कक्ष, भूतल पर, हवेली कक्ष, जो संपत्ति की पहली और दूसरी मंजिल पर स्थित हैं, जिसमें एक संलग्न बालकनी है। हेरिटेज कमरे पहली मंजिल पर स्थित हैं और मूल भित्तिचित्रों के साथ आते हैं। इनमें से अधिकांश कमरों में लॉन और आस-पास की हवेलियों के नज़ारे देखने के लिए निजी बैठने की जगह है।


संपत्ति का भूतपूर्व बॉलरूम, मुख्य भोजन कक्ष के रूप में कार्य करता है। जबकि आप बाजरे की रोटी , कैर सांगेरी (रेगिस्तानी बीन्स), मूली काचरा , गट्टे की सब्जी , लाल मास (एक मसालेदार मटन व्यंजन) जैसे प्रामाणिक राजस्थानी व्यंजनों की अपेक्षा कर सकते हैं, शेफ कभी-कभी इसे ऐसे व्यंजनों के साथ मिलाते हैं जो परंपरा और सरल आधुनिक खाना पकाने को शामिल करते हैं।



VAISHYA - HERITAGE - Havelis in Jhunjhunu

VAISHYA - HERITAGE - Havelis in Jhunjhunu


यह बात आपको हैरान कर सकती है; लेकिन झुंझुनू में, शहर के कुछ अमीर बनिया व्यापारियों के निजी आवास अब पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण स्थान बन गए हैं। हवेलियों के नाम से जानी जाने वाली ये हवेलियाँ अपने खूबसूरत भित्तिचित्रों और भित्तिचित्रों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं।

पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में हवेली शब्द का इस्तेमाल निजी हवेलियों के लिए किया जाता है। यह शब्द फ़ारसी हवेली से लिया गया है, जिसका मतलब है बंद जगह। हालाँकि, अगर हम इतिहास पर नज़र डालें, तो हम पाएँगे कि इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले राजस्थान में वैष्णव संप्रदाय द्वारा किया गया था। गुजरात में भगवान कृष्ण को समर्पित विशाल मंदिरों को शुरू में हवेलियाँ कहा जाता था। ये मंदिर न केवल आकार में बड़े थे, बल्कि उनकी दीवारें भगवान कृष्ण के जीवन इतिहास को दर्शाती खूबसूरत भित्तिचित्रों से सजी थीं। बाद में इन मंदिरों में भित्तिचित्रों के माध्यम से अन्य देवी-देवताओं को भी दर्शाया गया।

हमें ठीक से पता नहीं है कि निजी हवेलियों में इस तरह की मंदिर वास्तुकला का पालन कब शुरू हुआ। हालाँकि, झुंझुनू में, यह चलन 1730 में सरदूल सिंह के राज्य की कमान संभालने के बाद शुरू हुआ। उन्होंने दूर-दूर से व्यापारियों को इस शहर में अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया। जैसे-जैसे उनका व्यवसाय फलने-फूलने लगा, उन्होंने अपने इस्तेमाल के लिए हवेलियाँ बनवानी शुरू कर दीं। कुछ हवेलियाँ शाही कर्मचारियों द्वारा भी बनाई गई हैं। आज ये हवेलियाँ इस शहर में पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गई हैं।

झुंझुनू हवेलियों की वास्तुकला


हालाँकि यह विचार गुजरात के मंदिर वास्तुकला से लिया गया हो सकता है, लेकिन झुंझुनू की हवेलियों पर इस्लामी वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वास्तव में, हम कह सकते हैं कि झुंझुनू की हवेलियाँ भारतीय, फ़ारसी और इस्लामी वास्तुकला का मिश्रण हैं। उनकी दीवारों पर भित्तिचित्र भी विविध प्रकृति के हैं। वे न केवल देवी-देवताओं को दर्शाते हैं, बल्कि जानवरों, पक्षियों, भौगोलिक रूपों आदि को भी दर्शाते हैं। बाद के समय में, हवेलियों के मालिकों के चित्र भी दीवारों पर बनाए गए थे, जो एक अलग यूरोपीय प्रवृत्ति को दर्शाता है।

झुंझुनू हवेलियों में भित्तिचित्र


हालांकि, उनमें एक बात समान है। इन सभी हवेलियों में भित्तिचित्र बहुत रंगीन हैं और उनमें से कुछ में, ये भित्तिचित्र दीवारों के हर इंच को कवर करते हैं। यह याद रखना चाहिए कि झुंझुनू एक अर्ध शुष्क भूमि पर स्थित है, जो कि काफी नीरस और रंगहीन है। शायद इस रंग की कमी को दूर करने के लिए, वहाँ के लोग न केवल रंगीन पोशाक पहनते थे, बल्कि अपने घरों को भी रंगीन भित्तिचित्रों और भित्तिचित्रों से रंगते थे। इस शहर के अमीर व्यापारियों द्वारा बनाई गई झुंझुनू की हवेलियाँ इस तथ्य की ओर इशारा करती हैं। कुछ हवेलियों में तो छतें भी ऐसे भित्तिचित्रों से ढकी हुई हैं। सेठ ईश्वरदास मोहन दास मोदी की मोदी हवेली, शहर के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है।

Ishwardas Mohan Das Modi Haveli in Jhunjhunu


यह हवेली लंबे समय से मोदी परिवार का घर रही है। झुनझुनवाला की कई अन्य हवेलियों की तरह, इस हवेली का निर्माण भी एक आंगन के चारों ओर किया गया है। आंगन गलियारों से घिरा हुआ है, जो इसके कई कमरों तक ले जाता है। इस हवेली की दीवारें रंगों के दंगल से जगमगाती हैं। लाल, हरे और सुनहरे रंग के जटिल भित्तिचित्र वास्तव में आंखों को लुभाते हैं और इसी तरह जटिल रूप से डिजाइन किए गए झोरोके भी हैं।

इन झरोखों से महिलाएं बिना किसी की नजर पड़े बाहरी दुनिया को देख पाती थीं।

मोदी हवेली के भित्तिचित्रों में विभिन्न देवी-देवताओं को दर्शाया गया है। श्री कृष्ण के जीवन की घटनाएँ इन भित्तिचित्रों में पसंदीदा विषय हैं। इसके अलावा, हवेली में भित्तिचित्रों के माध्यम से विभिन्न जानवरों, पक्षियों, फूलों के साथ-साथ भौगोलिक रूपों को भी काफी स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। बाद के काल में, इन भित्तिचित्रों में यूरोपीय कला का प्रभाव दिखाई देता है और हम दीवारों पर मालिकों के चित्र पाते हैं।

झुंझुनू में कनीराम नरसिंह दास टिबरेवाला हवेलीकनीराम नरसिंह दास टिबरेवाला हवेली झुंझुनू में पर्यटकों के लिए एक और आकर्षण का केंद्र है। इसे उक्त सज्जन ने 1883 में बनवाया था। इस हवेली में मौजूद भित्तिचित्र उस समय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को दर्शाते हैं। कई बेहतरीन भित्तिचित्रों में से एक में खेत के जानवरों से भरी एक ट्रेन को मानव यात्रियों वाली दूसरी ट्रेन को पार करते हुए दिखाया गया है। इनमें से कई भित्तिचित्रों में सोने का भरपूर इस्तेमाल किया गया है।

झुंझुनू में कुछ अन्य हवेलियाँ


इन तीनों के अलावा शहर में कई अन्य हवेलियाँ भी हैं। इनमें टिबरेवालों द्वारा निर्मित हवेलियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। टिबरेवाले झुंझुनू के व्यापारियों के एक बड़े घराने से संबंधित थे। कनीराम नरसिंह दास टिबरेवाला हवेली के अलावा, इस घराने द्वारा निर्मित सात अन्य हवेलियाँ भी हैं। इन सातों में से श्री राम जैत राम टिबरेवाल हवेली का भी विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए।

टिबरेवाला हवेलियों के अलावा, हमें खेतान हवेली और बाला बक्स तुलसन हवेली का भी उल्लेख करना चाहिए। झुंझुनू की ये सभी हवेलियाँ अन्य पहलुओं से भी महत्वपूर्ण हैं। वे न केवल उस युग के व्यापार और अर्थव्यवस्था की स्थिति को इंगित करती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि कैसे अमीर व्यापारियों के संरक्षण में कला और वास्तुकला का विकास हुआ। इसलिए, हम सुरक्षित रूप से कह सकते हैं कि झुंझुनू की ये हवेलियाँ केवल अमीरों के घर या केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं। वे शहर की विरासत हैं और समृद्धि के लिए इनका संरक्षण किया जाना चाहिए।

VAISHYA HERITAGE - MANDAWA - मंडावा : ये है हवेलियों से भरा छोटा सा मनोरम कस्बा

VAISHYA HERITAGE - MANDAWA - मंडावा : ये है हवेलियों से भरा छोटा सा मनोरम कस्बा


राजस्थान के शेखावटी इलाके में हवेलियों से भरा एक छोटा मगर मनोरम कस्बा है यह जिसे कलाप्रेमी ‘ओपन आर्ट गैलरी’ की तरह देखते हैं। बारिश में और भी संवर-निखर जाती है इसकी सूरत।

राजस्थान की बात करते ही राजसी ठाट के दृश्य जेहन में उभर आते हैं। रजवाड़ों के ठाट देखने हों तो लोग जोधपुर, जयपुर और उदयपुर का रुख करते हैं, पर अगर आपको राजस्थान के कलाप्रेमी सेठों के जीवन से रूबरू होना है तो आपको मंडावा आना चाहिए। यहां आप मध्यकालीन भारत की तस्वीर को भी करीब से देख और समझ पाएंगे। यहां के हर दरो-दीवार में छुपी है उस जमाने की अनूठी तस्वीर। मंडावा एक छोटा मगर जीवंत कस्बा है। इस पूरे क्षेत्र को ‘शेखावटी’ भी कहा जाता है। राजस्थान के शूरवीर राजपूतों में शेखावत राजवंश का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। समूचे भारत में केवल शेखावटी ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जिस पर अंग्रेज कभी पूरी तरह हुकूमत नहीं कर सके।

लुभाती है फ्रेस्को पेंटिंग की जीवंतता: सेठसाहूकारों का इलाका मंडावा अपनी भित्ति चित्रकारी (जिसे ‘फ्रेस्को पेंटिंग’ भी कहा जाता है) के लिए दुनियाभर में मशहूर है। कहते हैं फ्रेस्को पेंटिंग्स 200 साल पुरानी है, लेकिन इनकी चमक आज भी नई जैसी लगती है। इन पेंटिंग्स को बनाने में जो रंग इस्तेमाल किए जाते थे, वे शुद्ध प्राकृतिक हुआ करते थे। इन पेंटिंग्स को ही नहीं, बल्कि रंगों को तैयार करने में भी चित्रकार जी-जान लगा दिया करते थे। इस संबंध में एक कहानी मशहूर है। किसी सेठ ने अपनी हवेली को रंगने का ठेका यहां के चित्रकार को दिया। सेठ कोलकाता में व्यापार करते थे। जब वह 4 महीने बाद लौटे तो देखा कि हवेली जस की तस है और चित्रकार वहां बैठकर रंग बना रहा है। सेठ जी ने नाराजगी दिखाते हुए उससे कहा कि इतना समय बीत गया और तुमने एक पत्थर तक नहीं रंगा। चित्रकार को भी गुस्सा आया और उसने रंग में घुला ब्रश दीवार पर फेंक दिया। आज भी पत्थर की दीवार पर उस रंग के निशान हैं। ये रंग बेहद पक्के होने के कारण सालों साल टिके रहते थे।


हवेलियों का बॉलीवुड कनेक्शन! : किसी फिल्म के सेट की तरह दिखता है हवेलियों से भरा यह नगर। यहां 100 से ज्यादा हवेलियां हैं। इन खूबसूरत हवेलियों में आज कोई नहीं रहता और ये वीरान पड़ी हैं। फिलहाल इनकी रखवाली के लिए कुछ चौकीदार ही मौजूद हैं। यहां आकर लगता है कि पिछले सौ साल से वक्त जैसे ठहर-सा गया है। इसीलिए यह जगह बॉलीवुड की पहली पसंद है। 1989 में आई फिल्म ‘बंटवारा’, फिर ‘गुलामी’ से लेकर पिछले कुछ सालों में आई फिल्मों ‘जब वी मेट’, ‘पहेली’, ‘लव-आजकल’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘पीके’, ‘जेड प्लस’, ‘मिर्जिया’, ‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ आदि की शूटिंग यहां हुई है। इस अनोखे गांव के हर निवासी ने किसी न किसी फिल्म में कोई न कोई काम किया है!

ओपन आर्ट गैलरी: मंडावा में घूमने का सबसे अच्छा तरीका है पैदल चलना, क्योंकि यहां हर गली में एक हवेली है और हर हवेली एक ‘ओपन आर्ट गैलरी’ की तरह आगंतुकों के लिए खुली रहती है। यहां के लोगों की मानें तो भारत की तरक्की में विशेष योगदान देने वाले मारवाड़ी व्यापारी घराने, जैसे-बिड़ला, मित्तल, बजाज, गोयनका, झुनझुनवाला, डालमिया, पोद्दार, चोखानी आदि के दादा-परदादाओं ने इस नगर को बसाया था और इन्हीं सेठों ने यहां एक से बढ़कर एक खूबसूरत हवेलियां भी बनवाई थीं। करीब सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी इन हवेलियों की दीवारों, मेहराबों, खंभों पर बने भित्ति-चित्रों की खूबसूरती हर किसी का मन् मोह लेती है। इन चित्रों में रामायण, महाभारत और कृष्ण-लीला के प्रसंग बहुत बारीकी से चित्रित किए गए हैं। कुछ हवेलियों में राजस्थानी लोक कथाओं, पशु-पक्षियों, मिथकों, धार्मिक रीति-रिवाजों, आधुनिक रेल, जहाज, मोटर, ईसा मसीह आदि का चित्रण रंगों के माध्यम से किया गया है।

होड़ में हुईं आलीशान: कहते हैं कि हवेलियां जिस दौर में तैयार हुईं, उस दौरान यहां आपस में प्रतिस्पर्धा थी कि किसकी हवेली कितनी शानदार होगी। कलाप्रेमी सेठों के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। अत: अपनी हवेलियों के सौंदर्यीकरण में वे कोई कसर नहीं रखना चाहते थे। ऐसा माना जाता है कि मंडावा पुराने सिल्क रूट पर पड़ने वाला मुख्य व्यापारिक केंद्र था, इसलिए यहां के व्यापारी खूब फलेफूले। कालांतर में उनके पास इतना पैसा आ गया कि उन्हें इस छोटे से कस्बे में रहना अप्रासंगिक लगने लगा और वे मुंबई, दिल्ली, सूरत, कोलकाता जैसे बड़े व्यापारिक नगरों की ओर चले गए। अब इन हवेलियों के मालिक किसी मांगलिक अवसर पर अपने कुलदेवता की पूजा-अर्चना करने हवेलियों में लौटते हैं, बाकी समय ये हवेलियां लगभग वीरान रहती हैं।


ये हैं कुछ मशहूर हवेलियां

हनुमान प्रसाद गोयनका हवेली: कहते हैं इस हवेली का संबंध प्रसिद्ध कारोबारी गोयनका घराने से है। इसमें भगवान विष्णु का मंदिर भी है। हवेली की चित्रकारी और नक्काशी का काम देखने लायक है। बाहर से देखकर आप इसकी गहराई की थाह नहीं लगा सकते। जब आप हवेली में प्रवेश करते हैं तो यह आपके सामने

किसी अनूठी किताब की तरह एक-एक करके खुलती चली जाती है।

गुलाब राय लाडिया हवेली: इसकी संरचना इतनी विशाल है कि इसकी छत से पूरा मंडावा नजर आता है। मंडावा में मोर बहुतायत में हैं। इन छतों पर टहलते हुए नाचते मोरों को निहारना आंखों को बड़ा सुकून देता है।

चोखानी डबल हवेली: यह हवेली स्थानीय चोखानी भाइयों ने अपने रहने के लिए 19वीं शताब्दी में बड़े दिल से बनवाई थी। यह हवेली बहुत से आधुनिक रंग समेटे हुए है। यह मंडावा के वार्ड नंबर 5 में पड़ती है।

बिंसिधर नवातिया हवेली: कहते हैं वर्ष 1920 में बनकर तैयार हुई यह हवेली उस समय की एक आधुनिक हवेली थी। इसे बनवाने वाले यूरोपीय वास्तुकला के कितने बड़े प्रेमी थे, इस बात का अंदाजा इस हवेली की वास्तुकला में प्रयोग में लाए गए विदेशी पैटर्न और नमूनों को देखकर लगता है। यहां इन बेल-बूटों के बीच कार चलाती हुई महिला और हवाई जहाज उड़ाते राइट ब्रदर्स की तस्वीरों को देखने लोग दूर-दूर से आते हैं।

मुरमुरिया हवेली : यह हवेली वर्ष 1930 के आसपास बनी थी। इस हवेली की दीवारों पर बनी फ्रेस्को आर्ट उस समय को दर्शाती है, जब भारत में रेलगाड़ी आई थी। इस हवेली में घोड़े पर तिरंगा लिए पंडित नेहरू की खूबसूरत पेंटिंग भी बनी हुई है। एक तरह से ये हवेलियां अपने समय के समाज से हमें मिलवाती हैं। मुरमुरिया हवेली से थोड़ी ही दूर स्थित है हरलालकर की बावड़ी। बड़े-से चबूतरे पर बनी मीनारें और गुंबद इस संरचना को आकर्षक बनाते हैं। इस बावड़ी का निर्माण सेठ हरलालकर ने 19वीं शताब्दी में यहां के लोगों की पानी की आपूर्ति के लिए करवाया था।

लक्ष्मी नारायण लडिया हवेली : कहते हैं यह हवेली यहां की सबसे सुंदर हवेली है। इसकी दीवारों पर कृष्णलीला, रामायण और महाभारत के प्रसंग बहुत खूबसूरती से उकेरे गए हैं। इसे देखने के लिए थोड़ा समय निकाल कर जाएं, क्योंकि यहां की खूबसूरत चित्रकारी को देखकर आप इसमें खो जाएंगे।

झुंझुनू में भी हैं दर्शनीय हवेलियां

झुंझुनू से मंडावा तकरीबन 30 किमी. दूर है। पर मंडावा में ही नहीं, झुंझुनू में स्थित हवेलियां भी दर्शनीय हैं। यहां भी पूरे क्षेत्र में हवेलियां ही हवेलियां हैं, जैसे मोदी हवेली। यह हवेली मोदी घराने की संपत्ति है। यहां एक ‘सोने चांदी की हवेली’ भी है। कहते हैं इस हवेली की फ्रेस्को पेंटिंग्स में सोने-चांदी का उपयोग किया गया है।


रानी सती माता का मंदिर
झुंझुनू जिले में चौबारी मंडी के पास रानी सती माता का मंदिर है। इसमें 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच सती हुई स्त्रियों के छोटे-छोटे मंदिर बनाए गए हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहां हर मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का निर्माण अमीर सेठों द्वारा करवाया गया, जबकि निर्माण कार्य को स्थानीय मुस्लिम कारीगरों ने अंजाम दिया।

SABHAR : DR. KAYNAT KAZI