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Wednesday, April 15, 2020

Radhakishan damani of dmart can supercede ril's chairman mukesh ambani

दौलत बनाने में मुकेश अंबानी को भी पछाड़ सकते हैं राधाकिशन दमानी 


डीमार्ट के प्रमोटर राधाकिशन दमानी की दौलत लगातार बढ़ रही है। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब लॉकडाउन में सबको नुकसान हुआ है तो दमानी को फायदा हुआ है। अगर दौलत बढ़ने की यह रफ्तार बरकरार रहती है तो वह दिन दूर नहीं जब वे मुकेश अंबानी को पछाड़कर देश के सबसे अमीर शख्स बन जाएंगे।


राधाकिशन दमानी भारत के शायद एकमात्र दौलतमंद हैं, जिनकी संपत्ति कोरोना वायरस लॉकडाउन के बाद शेयर बाजार में आए भारी भूचाल में बढ़ी है। इस भूचाल से जहां देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी की दौलत एक तिहाई घट गई, वहीं शिव नाडर, उदय कोटक और गौतम अडाणी जैसे अरबपतियों को फोर्ब्स की दुनिया के 100 सबसे अमीरों की सूची से बाहर कर दिया। शेयर बाजार के एक निवेशक के रूप में कारोबार की शुरुआत करने वाले दमानी आज अरबपतियों की लिस्ट में हैं और यही रफ्तार बरकरार रही तो जल्द ही मुकेश अंबानी को पछाड़ भी सकते हैं।



दुनिया के 65वें सबसे अमीर दमानी



रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मुकेश अंबानी फोर्ब्स के अरबपतियों की सूची में 44.3 अरब डॉलर (3.32 लाख करोड़ रुपये) की संपत्ति के साथ 17वें पायदान पह हैं तो वहीं 16.6 अरब डॉलर (1.24 लाख करोड़ रुपये) की संपत्ति के साथ दमानी 65वें स्थान पर हैं।


संपत्ति में 2,900 करोड़ का इजाफा



शुक्रवार को बाजार बंद होने पर उनकी कुल संपत्ति 10.10 अरब डॉलर की थी। पिछले एक साल में उनकी संपत्ति में 416 मिलियन डॉलर (करीब 2,900 करोड़) का इजाफा हुआ है। राधाकिशन दमानी की कंपनी डी-मार्ट के शेयर में अभी भी उछाल बरकरार है। 13 मार्च 2019 के मुकाबले शेयर में 8.64 पर्सेंट की तेजी है। आज भी इसके शेयर में 4.81 फीसदी (96.50 रुपये) की तेजी आई है।


अंबानी को 19 अरब डॉलर का नुकसान



देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी की संपत्ति में 19 अरब डॉलर की गिरावट आई है। वह अब एशिया के सबसे अमीर शख्स भी नहीं रह गए। यह तमगा अब अलीबाबा के जैक मा के पास चला गया है। संपत्ति को हुए नुकसान के मामले में मुकेश अंबानी विश्व में पांचवें पायदान पर हैं।


कोरोना से जंग में 155 करोड़ का दान



राधाकिशन दमानी ने पीएम-केयर्स और अन्य राज्य के राहत कोषों को कुल 155 करोड़ रुपये का दान दिया है। डी-मार्ट पर मालिकाना हक रखने वाली कंपनी एवेन्यू सुपरमार्ट्स के मुताबिक, इसमें से 100 करोड़ रुपये पीएम-केयर्स कोष और 55 करोड़ रुपये 11 राज्य सरकारों के राहत कोष में जाएंगे।


कौन हैं राधाकिशन दमानी



राधाकिशन दमानी ने शेयर बाजार में अपनी शुरुआत 1980 के दशक में की थी। उनकी कंपनी डी-मार्ट का आईपीओ 2017 में आया था। 20 मार्च 2017 तक राधाकिशन दमानी सिर्फ एक रिटेल कंपनी के मालिक थे, लेकिन 21 मार्च की सुबह जैसे उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) की घंटी बजाई, वैसे ही उनकी संपत्ति 100 फीसदी तक बढ़ गई।


कैसे हुआ चमत्कार



21 मार्च, 2017 की सुबह जब राधाकिशन दमानी की कंपनी का आईपीओ शेयर बाजार में लिस्ट हुआ तो उनकी संपत्ति, कई अमीर घरानों से ज्यादा हो गई। डी-मार्ट का शेयर 604.40 रुपये पर लिस्ट हुआ, जबकि इश्यू प्राइस 299 रुपये रखा गया था। यह 102% का रिटर्न है। पिछले 13 साल में लिस्टिंग के दिन किसी शेयर की कीमत में इतनी बढ़ोतरी नहीं हुई थी।

साभार: नवभारत टाइम्स 

गुप्त वंश के अग्रवाल वैश्य उत्पत्ति का ऐतिहासिक प्रमाण






लेख साभार: डॉ. स्वराज्यमनी अग्रवाल, अशोक गुप्ता जी.

Tuesday, April 14, 2020

VAISHYA GUPTA RAJVANSH - वैश्य गुप्त राजवंश

अपने चरमोत्कर्ष के समय गुप्त साम्राज्य 

गुप्त राज्य लगभग ५०० ई

इस काल की अजन्ता चित्रकला

गुप्त राजवंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था।

मौर्य वंश के पतन के बाद दीर्घकाल में हर्ष तक भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही। कुषाण एवं सातवाहनों ने राजनीतिक एकता लाने का प्रयास किया। मौर्योत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी ईस्वी में तीन राजवंशो का उदय हुआ जिसमें मध्य भारत में नाग शक्‍ति, दक्षिण में वाकाटक तथा पूर्वी में गुप्त वंश प्रमुख हैं। मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है।

गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था।

गुप्त वंश की उत्पत्ति

गुप्त वंश धारण है जो कि वैश्य समाज में पाया जाता है इसके लिए “अन्धकारयुगीन भारत” पृ० 252 पर लेखक काशीप्रसाद जायसवाल ने लिखा है कि : “गुप्त लोग वैश्य थे, जो पंजाब से चलकर आए थे। । इसके लिए एपीग्राफिका इण्डीका, खण्ड 15, पृ० 41-42 पर लिखा है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती जिसका विवाह नागराज वाकाटक् वंशज रुद्रसेन द्वितीय से हुआ तब प्रभावती गुप्ता ने अपने पिता का गोत्र शिलालेख पर धारण ही लिखा है। अग्रवालों और नागों के मध्य वैवाहिक संबंध पौराणिक काल से ही होते आ रहे हैं। स्वयं महाराजा अग्रसेन के पूर्वोत्तर भारत में नागराज वासुकी की 17 नागकन्याओं से विवाह हुए थे। धारण अग्रवालों का एक गोत्र है।

इस बात का समर्थन कौमुदी महोत्सव नाटक और चन्द्रव्याकरण से भी होता है।” स्कन्दगुप्त के द्वारा हूणों की पराजय का "अजयात् अग्रो हुणान्" चन्द्रगोमिन् की व्याकरण से स्पष्ट गुप्तवंश का अग्रवाल होना सिद्ध करता है।[4] डा० जायसवाल की इस बात को दशरथ शर्मा तथा दूसरों ने भी प्रमाणित माना है। डा० जायसवाल के इस मत कि गुप्त वंश अग्रवाल के पक्ष में लेख्य प्रमाण हैं जो कि ‘आर्य मंजूसरी मूला कल्पा’ नामक भारत का इतिहास, जो संस्कृत एवं तिब्बती भाषा में आठवीं शताब्दी ई० से पहले लिखा गया, उस पुस्तक के श्लोक 759 में लिखा है कि सम्राट् जो मथुरा वैैैैश्य परिवार का था और जिसकी माता एक वैशाली कन्या थी, वह मगध देश का सम्राट् बना।[5][6] यह हवाला समुद्रगुप्त का है जिसकी माता एक वैशाली राज्य की राजकुमारी थी। उस सम्राट् समुद्रगुप्त ने अपने सिक्कों पर “लिच्छवि दौहित्र” बड़े गर्व से प्रकाशित करवाया था। चन्द्रगुप्त प्रथम मथुरा का अग्रवाल था जिसका विवाह लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से हुआ था। उस सम्राट् के सिक्कों पर उन दोनों की मूर्तियां थीं। गुुुुप्त शासकों की कुल देवी महालक्ष्मी थीं, जो कि वैश्यों की कुलदेवी कही जाती हैं। गुप्त सम्राट शाकाहार के परम प्ररचारक थे, महाराजा अग्रसेन की प्रतिज्ञा के बाद से समूची अग्रवाल जाति शाकाहारी है। गुप्त सम्राटों ने परम भागवत् की उपाधि प्राप्त की थी, अग्रवाल जाति प्राचीन काल से ही वैष्णव है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त ने पूना अभिलेख में अपने वंश को स्पष्टतः धारण गोत्रीय बताया हैं. अग्रवालो के १८ गोत्र में से एक गोत्र धारण हैं. गुप्त वैश्यों की उपाधि हैं. आज भी धार्मिक कर्म व संकल्प करते हुए वैश्य पुरोहित नाम व गोत्र के साथ गुप्त उपनाम का उल्लेख करते है. गुप्त शासको के नाम श्री, चन्द्र, समुद्र, स्कन्द आदि थे. जबकि गुप्त उनका उपनाम था. जो की उनके वर्ण व जाति को उद्घोषित करता हैं. गुप्त उपनाम केवल और केवल वैश्य समुदाय के व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता हैं.इतिहास में व पुरानो में गुप्त सम्राटो को वैश्य बताया गया है. बोद्ध धर्मग्रन्थ आर्यमंजुश्री कल्प में गुप्त वंश को वैश्य बताया गया है. इतिहासकार अल्तेकर, आयंगर, रोमिल्ला थापर, रामचरण शर्मा आदि ने गुप्त वंश को वैश्य बताया है.गुप्त सम्राटो ने यज्ञोपवित धारण किया था. व अश्वमेध यज्ञ कराये थे. केवल द्विज ही यह कार्या कर सकते थे. अग्रवाल द्विज जाति है. और प्राचीन क्षत्रिय जाति है. जिसने बाद में वैश्य कर्म अपनाया. गुप्त वंश के शासक अग्रवाल थे. प्रख्यात इतिहासकार राहुल संस्क्रतायन ने भी गुप्त वंश को अग्रवाल वैश्य बताया हैं. अग्रवालो की कुलदेवी माता लक्ष्मी है. गुप्त सम्राटो की कुलदेवी भी माता लक्ष्मी है. अग्रवाल मुख्यतः वैष्णव होते है. और शद्ध शाकाहारी भी. गुप्त वंश के शासक भी वैष्णव और शाकाहारी थे. गुप्त वंश के समय में भारत सोने की चिड़िया कहलाया था. एक विशुद्ध वैश्य शासक ही व्यापार को बढ़ावा दे सकता है. गुप्त सम्राट समुद्र गुप्त की शादी भी अग्रोहा नगर की एक योधेय अग्रवाल राजकुमारी से हुई थी. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का बचपन अपने ननिहाल अग्रोहा में ही बिता था.अग्रोहा अग्रवालो का नगर था और योधेय जनपद की राजधानी थी. उस समय अग्रवालो को योधेय कहा जाता था.

साम्राज्य की स्थापना: श्रीगुप्त

गुप्‍त सामाज्‍य का उदय तीसरी शताब्‍दी के अन्‍त में प्रयाग के निकट [[[कौशाम्‍बी]] में हुआ था। जिस प्राचीनतम गुप्त राजा के बारे में पता चला है वो है श्रीगुप्त। हालांकि प्रभावती गुप्त के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में इसे 'आदिराज' कहकर सम्बोधित किया गया है। श्रीगुप्त ने गया में चीनी यात्रियों के लिए एक मंदिर बनवाया था जिसका उल्लेख चीनी यात्री इत्सिंग ने ५०० वर्षों बाद सन् ६७१ से सन् ६९५ के बीच में किया। पुराणों में ये कहा गया है कि आरंभिक गुप्त राजाओं का साम्राज्य गंगा द्रोणी, प्रयाग, साकेत (अयोध्या) तथा मगध में फैला था। श्रीगुप्त के समय में महाराजा की उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी के अधीन शासक था। प्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारशिवों के अधीन छोटे से राज्य प्रयाग का शासक था। चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार मगध के मृग शिखावन में एक मन्दिर का निर्माण करवाया था। तथा मन्दिर के व्यय में २४ गाँव को दान दिये थे।

घटोत्कच गुप्त 

श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गद्दी पर बैठा। 280 ई. से 320 ई. तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा। इसने भी महाराजा की उपाधि धारण की थी।प्रभावती गुप्ता के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश का प्रथम राजा बताया गया है,इसका राज्य सम्भवतः मगध के आस-पास तक ही सीमित था।

चंद्रगुप्त प्रथम

सन् ३२० में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद राजा बना। चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में पहला स्वतन्त्र शासक था। इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। बाद में लिच्छवि को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। इसका शासन काल (320 ई. से 335 ई. तक) था।

पुराणों तथा हरिषेण लिखित प्रयाग प्रशस्ति से चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्य के विस्तार के विषय में जानकारी मिलती है। चन्द्रगुप्त ने [ [लिच्छवि]] के सहयोग और समर्थन पाने के लिए उनकी राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया। स्मिथ के अनुसार इस वैवाहिक सम्बन्ध के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त ने लिच्छवियों का राज्य प्राप्त कर लिया तथा मगध उसके सीमावर्ती क्षेत्र में आ गया। कुमार देवी के साथ विवाह-सम्बन्ध करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया। चन्द्रगुप्त ने जो सिक्के चलाए उसमें चन्द्रगुप्त और कुमारदेवी के चित्र अंकित होते थे। लिच्छवियों के दूसरे राज्य नेपाल के राज्य को उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने मिलाया।

हेमचन्द्र राय चौधरी के अनुसार अपने महान पूर्ववर्ती शासक बिम्बिसार की भाँति चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह कर द्वितीय मगध साम्राज्य की स्थापना की। उसने विवाह की स्मृति में राजा-रानी प्रकार के सिक्‍कों का चलन करवाया। इस प्रकार स्पष्ट है कि लिच्छवियों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्य को राजनैतिक दृष्टि से सुदृढ़ तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध बना दिया। राय चौधरी के अनुसार चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौशाम्बी तथा कौशल के महाराजाओं को जीतकर अपने राज्य में मिलाया तथा साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित की। चन्द्रगुप्त ने महाराजाधिराज की उपाधि प्राप्त की थी।

समुद्रगुप्त

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद 335 ई. में उसका तथा कुमारदेवी का पुत्र समुद्रगुप्त राजगद्दी पर बैठा। सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास में महानतम शासकों के रूप में वह नामित किया जाता है। इन्हें परक्रमांक कहा गया है। समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है। इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। समुद्रगुप्त ने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की।

समुद्रगुप्त एक असाधारण सैनिक योग्यता वाला महान विजित सम्राट था। विन्सेट स्मिथ ने इन्हें नेपोलियन की उपाधि दी। उसका सबसे महत्वपूर्ण अभियान दक्षिण की तरफ़ (दक्षिणापथ) था। इसमें उसके बारह विजयों का उल्लेख मिलता है।

समुद्रगुप्त एक अच्छा राजा होने के अतिरिक्त एक अच्छा कवि तथा संगीतज्ञ भी था। उसे कला मर्मज्ञ भी माना जाता है। उसका देहान्त 380 ई. में हुआ जिसके बाद उसका पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय राजा बना। यह उच्चकोटि का विद्वान तथा विद्या का उदार संरक्षक था। उसे कविराज भी कहा गया है। वह महान संगीतज्ञ था जिसे वीणा वादन का शौक था। इसने प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुबन्धु को अपना मन्त्री नियुक्‍त किया था।

हरिषेण, समुद्रगुप्त का मन्त्री एवं दरबारी कवि था। हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति से समुद्रगुप्त के राज्यारोहण, विजय, साम्राज्य विस्तार के सम्बन्ध में सटीक जानकारी प्राप्त होती है।

काव्यालंकार सूत्र में समुद्रगुप्त का नाम 'चन्द्रप्रकाश' मिलता है। उसने उदार, दानशील, असहायी तथा अनाथों को अपना आश्रय दिया। वैदिक धर्म के अनुसार इन्हें धर्म व प्राचीर बन्ध यानी धर्म की प्राचीर कहा गया है।

समुद्रगुप्त का साम्राज्य- समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्‍चिम में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था। कश्मीर, पश्‍चिमी पंजाब, पश्‍चिमी राजस्थान, सिन्ध तथा गुजरात को छोड़कर समस्त उत्तर भारत इसमें सम्मिलित थे। दक्षिणापथ के शासक तथा पश्‍चिमोत्तर भारत की विदेशी शक्‍तियाँ उसकी अधीनता स्वीकार करती थीं।

समुद्रगुप्त के काल में सदियों के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण तथा विदेशी शक्‍तियों के आधिपत्य के बाद आर्यावर्त पुनः नैतिक, बौद्धिक तथा भौतिक उन्‍नति की चोटी पर जा पहुँचा था।

रामगुप्त

समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त सम्राट बना, लेकिन इसके राजा बनने में विभिन्‍न विद्वानों में मतभेद है।

विभिन्‍न साक्ष्यों के आधार पर पता चलता है कि समुद्रगुप्त के दो पुत्र थे- रामगुप्त तथा चन्द्रगुप्त। रामगुप्त बड़ा होने के कारण पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा, लेकिन वह निर्बल एवं कायर था। वह शकों द्वारा पराजित हुआ और अत्यन्त अपमानजनक सन्धि कर अपनी पत्‍नी ध्रुवस्वामिनी को शकराज को भेंट में दे दिया था, लेकिन उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय बड़ा ही वीर एवं स्वाभिमानी व्यक्‍ति था। वह छद्‍म भेष में ध्रुवस्वामिनी के वेश में शकराज के पास गया। फलतः रामगुप्त निन्दनीय होता गया। तत्पश्‍चात् ‌चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने बड़े भाई रामगुप्त की हत्या कर दी। उसकी पत्‍नी से विवाह कर लिया और गुप्त वंश का शासक बन बैठा।

चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की मुद्रा

चन्द्रगुप्त द्वितीय ३७५ ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ। वह समुद्रगुप्त की प्रधान महिषी दत्तदेवी से हुआ था। वह विक्रमादित्य के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुआ। उसने ३७५ से ४१५ ई. तक (४० वर्ष) शासन किया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर अपनी विजय हासिल की जिसके बाद गुप्त साम्राज्य एक शक्तिशाली राज्य बन गया। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक विस्तार हुआ।

हालांकि चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देव, देवगुप्त, देवराज, देवश्री आदि हैं। उसने विक्रमांक, विक्रमादित्य, परम भागवत आदि उपाधियाँ धारण की। उसने नागवंश, वाकाटक और कदम्ब राजवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया जिससे एक कन्या प्रभावती गुप्त पैदा हुई। वाकाटकों का सहयोग पाने के लिए चन्द्रगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया। उसने ऐसा संभवतः इसलिए किया कि शकों पर आक्रमण करने से पहले दक्कन में उसको समर्थन हासिल हो जाए। उसने प्रभावती गुप्त के सहयोग से गुजरात और काठियावाड़ की विजय प्राप्त की। वाकाटकों और गुप्तों की सम्मिलित शक्‍ति से शकों का उन्मूलन किया।

कदम्ब राजवंश का शासन कुंतल (कर्नाटक) में था। चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश में हुआ।

शक उस समय गुजरात तथा मालवा के प्रदेशों पर राज कर रहे थे। शकों पर विजय के बाद उसका साम्राज्य न केवल मजबूत बना बल्कि उसका पश्चिमी समुद्र पत्तनों पर अधिपत्य भी स्थापित हुआ। इस विजय के पश्चात उज्जैन गुप्त साम्राज्य की राजधानी बना।

विद्वानों को इसमें संदेह है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा विक्रमादित्य एक ही व्यक्ति थे। उसके शासनकाल में चीनी बौद्ध यात्री फाहियान ने 399 ईस्वी से 414 ईस्वी तक भारत की यात्रा की। उसने भारत का वर्णन एक सुखी और समृद्ध देश के रूप में किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल को स्वर्ण युग भी कहा गया है।

चन्द्रगुप्त एक महान प्रतापी सम्राट था। उसने अपने साम्राज्य का और विस्तार किया। 

शक विजय- पश्‍चिम में शक क्षत्रप शक्‍तिशाली साम्राज्य था। ये गुप्त राजाओं को हमेशा परेशान करते थे। शक गुजरात के काठियावाड़ तथा पश्‍चिमी मालवा पर राज्य करते थे। ३८९ ई. ४१२ ई. के मध्य चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा शकों पर आक्रमण कर विजित किया। 
वाहीक विजय- महाशैली स्तम्भ लेख के अनुसार चन्द्र गुप्त द्वितीय ने सिन्धु के पाँच मुखों को पार कर वाहिकों पर विजय प्राप्त की थी। वाहिकों का समीकरण कुषाणों से किया गया है, पंजाब का वह भाग जो व्यास का निकटवर्ती भाग है। 

बंगाल विजय- महाशैली स्तम्भ लेख के अनुसार यह ज्ञात होता है कि चन्द्र गुप्त द्वितीय ने बंगाल के शासकों के संघ को परास्त किया था। 

गणराज्यों पर विजय- पश्‍चिमोत्तर भारत के अनेक गणराज्यों द्वारा समुद्रगुप्त की मृत्यु के पश्‍चात्‌अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी गई थी। 

परिणामतः चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा इन गणरज्यों को पुनः विजित कर गुप्त साम्राज्य में विलीन किया गया। अपनी विजयों के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त द्वितीय ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसका साम्राज्य पश्‍चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय की तापघटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में उसकी प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र और द्वितीय राजधानी उज्जयिनी थी।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल कला-साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। उसके दरबार में विद्वानों एवं कलाकारों को आश्रय प्राप्त था। उसके दरबार में नौ रत्‍न थे- कालिदास, धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, बेताल भट्ट, घटकर्पर, वाराहमिहिर, वररुचि, आर्यभट्ट, विशाखदत्त, शूद्रक, ब्रम्हगुप्त, विष्णुशर्मा और भास्कराचार्य उल्लेखनीय थे। ब्रह्मगुप्त ने ब्राह्मसिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे बाद में न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के नाम से प्रतिपादित किया।

कुमारगुप्त प्रथम

कुमारगुप्त प्रथम, चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद सन् 415 में सत्तारूढ़ हुआ। अपने दादा समुद्रगुप्त की तरह उसने भी अश्वमेघ यज्ञ के सिक्के जारी किये। कुमारगुप्त ने चालीस वर्षों तक शासन किया।

कुमारगुप्त प्रथम (४१५ ई. से ४५५ ई.)- चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्‍चात्‌ ४१५ ई. में उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम सिंहासन पर बैठा। वह चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्‍नी ध्रुवदेवी से उत्पन्‍न सबसे बड़ा पुत्र था, जबकि गोविन्दगुप्त उसका छोटा भाई था। यह कुमारगुप्त के बसाठ (वैशाली) का राज्यपाल था।

कुमारगुप्त प्रथम का शासन शान्ति और सुव्यवस्था का काल था। साम्राज्य की उन्‍नति के पराकाष्ठा पर था। इसने अपने साम्राज्य का अधिक संगठित और सुशोभित बनाये रखा। गुप्त सेना ने पुष्यमित्रों को बुरी तरह परास्त किया था। कुमारगुप्त ने अपने विशाल साम्राज्य की पूरी तरह रक्षा की जो उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्‍चिम में अरब सागर तक विस्तृत था।

कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेखों या मुद्राओं से ज्ञात होता है कि उसने अनेक उपाधियाँ धारण कीं। उसने महेन्द्र कुमार, श्री महेन्द्र, श्री महेन्द्र सिंह, महेन्द्रा दिव्य आदि उपाधि धारण की थी। मिलरक्द अभिलेख से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त के साम्राज्य में चतुर्दिक सुख एवं शान्ति का वातावरण विद्यमान था। कुमारगुप्त प्रथम स्वयं वैष्णव धर्मानुयायी था, किन्तु उसने धर्म सहिष्णुता की नीति का पालन किया। गुप्त शासकों में सर्वाधिक अभिलेख कुमारगुप्त के ही प्राप्त हुए हैं। उसने अधिकाधिक संक्या में मयूर आकृति की रजत मुद्राएं प्रचलित की थीं। उसी के शासनकाल में नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की गई थी।

कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल की प्रमुख घटनओं का निम्न विवरण है- 

पुष्यमित्र से युद्ध- भीतरी अभिलेख से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त के शासनकाल के अन्तिम क्षण में शान्ति नहीं थी। इस काल में पुष्यमित्र ने गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किया। इस युद्ध का संचालन कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने किया था। उसने पुष्यमित्र को युद्ध में परास्त किया। 

दक्षिणी विजय अभियान- कुछ इतिहास के विद्वानों के मतानुसार कुमारगुप्त ने भी समुद्रगुप्त के समान दक्षिण भारत का विजय अभियान चलाया था, लेकिन सतारा जिले से प्राप्त अभिलेखों से यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। 

अश्‍वमेध यज्ञ- सतारा जिले से प्राप्त १,३९५ मुद्राओं व लेकर पुर से १३ मुद्राओं के सहारे से अश्‍वमेध यज्ञ करने की पुष्टि होती है। 

स्कन्दगुप्त

पुष्यमित्र के आक्रमण के समय ही गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम की ४५५ ई. में मृत्यु हो गयी थी। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र स्कन्दगुप्त सिंहासन पर बैठा। उसने सर्वप्रथम पुष्यमित्र को पराजित किया और उस पर विजय प्राप्त की। हालाँकि सैन्य अभियानों में वो पहले से ही शामिल रहता था। मन्दसौर शिलालेख से ज्ञात होता है कि स्कन्दगुप्त की प्रारम्भिक कठिनाइयों का फायदा उठाते हुए वाकाटक शासक नरेन्द्र सेन ने मालवा पर अधिकार कर लिया परन्तु स्कन्दगुप्त ने वाकाटक शासक नरेन्द्र सेन को पराजित कर दिया।

स्कंदगुप्त ने 12 वर्ष तक शासन किया। स्कन्दगुप्त ने विक्रमादित्य, क्रमादित्य आदि उपाधियाँ धारण कीं। कहोम अभिलेख में स्कन्दगुप्त को शक्रोपन कहा गया है।

स्कन्दगुप्त का शासन बड़ा उदार था जिसमें प्रजा पूर्णरूपेण सुखी और समृद्ध थी। स्कन्दगुप्त एक अत्यन्त लोकोपकारी शासक था जिसे अपनी प्रजा के सुख-दुःख की निरन्तर चिन्ता बनी रहती थी। जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि स्कन्दगुप्त के शासन काल में भारी वर्षा के कारण सुदर्शन झील का बाँध टूट गया था उसने दो माह के भीतर अतुल धन का व्यय करके पत्थरों की जड़ाई द्वारा उस झील के बाँध का पुनर्निर्माण करवा दिया।

उसके शासनकाल में संघर्षों की भरमार लगी रही। उसको सबसे अधिक परेशान मध्य एशियाई हूण लोगो ने किया। हूण एक बहुत ही दुर्दांत कबीले थे तथा उनके साम्राज्य से पश्चिम में रोमन साम्राज्य को भी खतरा बना हुआ था। श्वेत हूणों के नाम से पुकारे जाने वाली उनकी एक शाखा ने हिंदुकुश पर्वत को पार करके फ़ारस तथा भारत की ओर रुख किया। उन्होंने पहले गांधार पर कब्जा कर लिया और फिर गुप्त साम्राज्य को चुनौती दी। पर स्कंदगुप्त ने उन्हे करारी शिकस्त दी और हूणों ने अगले 50 वर्षों तक अपने को भारत से दूर रखा। स्कंदगुप्त ने मौर्यकाल में बनी सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार भी करवाया।

गोविन्दगुप्त स्कन्दगुप्त का छोटा चाचा था, जो मालवा के गवर्नर पद पर नियुक्‍त था। इसने स्कन्दगुप्त के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। स्कन्दगुप्त ने इस विद्रोह का दमन किया।

स्कन्दगुप्त राजवंश का आखिरी शक्‍तिशाली सम्राट था। ४६७ ई. उसका निधन हो गया।

इण्डोनेशिया के जावा में स्थित बोरोबुदुर ; इस भवन की डिजाइन पर गुप्त स्थापत्य कला का प्रभाव देखा जा सकता है।

स्कन्दगुप्त के बाद इस साम्राज्य में निम्नलिखित प्रमुख राजा हुए:

पुरुगुप्त

यह कुमारगुप्त का पुत्र था और स्कन्दगुप्त का सौतेला भाई था। स्कन्दगुप्त का कोई अपना पुत्र नहीं था। पुरुगुप्त बुढ़ापा अवस्था में राजसिंहासन पर बैठा था फलतः वह सुचारु रूप से शासन को नहीं चला पाया और साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया।

कुमारगुप्त द्वितीय

पुरुगुप्त का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त द्वितीय हुआ। सारनाथ लेख में इसका समय ४४५ ई. अंकित है।

बुधगुप्त

कुमारगुप्त द्वितीय के बाद बुधगुप्त शासक बना जो नालन्दा से प्राप्त मुहर के अनुसार पुरुगुप्त का पुत्र था। उसकी माँ चन्द्रदेवी था। उसने ४७५ ई. से ४९५ ई. तक शासन किया। ह्वेनसांग के अनुसार वह बौद्ध मत अनुयायी था। उसने नालन्दा बौद्ध महाविहार को काफी धन दिया था।

नरसिंहगुप्त बालादित्य

बुधगुप्त की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई नरसिंहगुप्त शासक बना। इस समय गुप्त साम्राज्य तीन भागों क्रमशः मगध, मालवा तथा बंगाल में बँट गया। मगध में नरसिंहगुप्त, मालवा में भानुगुप्त, बिहार में तथा बंगाल क्षेत्र में वैन्यगुप्त ने अपना स्वतन्त्र शसन स्थापित किया। नरसिंहगुप्त तीनों में सबसे अधिक शक्‍तिशाली राजा था। हूणों का कुरु एवं अत्याचारी आक्रमण मिहिरकुल को पराजित कर दिया था। नालन्दा मुद्रा लेख में नरसिंहगुप्त को परम भागवत कहा गया है।

कुमारगुप्त तृतीय

नरसिंहगुप्त के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध के सिंहासन पर बैठा। वह २४ वाँ शासक बना। कुमारगुप्त तृतीय गुप्त वंश का अन्तिम शासक था।

दामोदरगुप्त

कुमरगुप्त के निधन के बाद उसका पुत्र दामोदरगुप्त राजा बना। ईशान वर्मा का पुत्र सर्ववर्मा उसका प्रमुख प्रतिद्वन्दी मौखरि शासक था। सर्ववर्मा ने अपने पिता की पराजय का बदला लेने हेतु युद्ध किया। इस युद्ध में दामोदरगुप्त की हार हुई। यह युद्ध ५८२ ई. के आस-पस हुआ था।

महासेनगुप्त

दामोदरगुप्त के बाद उसका पुत्र महासेनगुप्त शासक बना था। उसने मौखरि नरेश अवन्ति वर्मा की अधीनता स्वीकार कर ली। महासेनगुप्त ने असम नरेश सुस्थित वर्मन को ब्राह्मण नदी के तट पर पराजित किया। अफसढ़ लेख के अनुसार महासेनगुप्त बहुत पराक्रमी था।

देवगुप्त

महासेनगुप्त के बाद उसका पुत्र देवगुप्त मलवा का शासक बना। उसके दो सौतेले भाई कुमारगुप्त और माधवगुप्त थे। देवगुप्त ने गौड़ शासक शशांक के सहयोग से कन्‍नौज के मौखरि राज्य पर आक्रमण किया और गृह वर्मा की हत्या कर दी। प्रभाकर वर्धन के बड़े पुत्र राज्यवर्धन ने शीघ्र ही देवगुप्त पर आक्रमण करके उसे मार डाल्श।

माधवगुप्त

हर्षवर्धन के समय में माधवगुप्त मगध के सामन्त के रूप में शासन करता था। वह हर्ष का घनिष्ठ मित्र और विश्‍वासपात्र था। हर्ष जब शशांक को दण्डित करने हेतु गया तो माधवगुप्त साथ गया था। उसने ६५० ई. तक शासन किया। हर्ष की मृत्यु के उपरान्त उत्तर भारत में अराजकता फैली तो माधवगुप्त ने भी अपने को स्वतन्त्र शासक घोषित किया।

गुप्त साम्राज्य का ५५० ई. में पतन हो गया। बुद्धगुप्त के उत्तराधिकारी अयोग्य निकले और हूणों के आक्रमण का सामना नहीं कर सके। हूणों ने सन् 512 में तोरमाण के नेतृत्व में फिर हमला किया और ग्वालियर तथा मालवा तक के एक बड़े क्षेत्र पर अधिपत्य कायम कर लिया। इसके बाद सन् 606 में हर्ष का शासन आने के पहले तक आराजकता छाई रही। हूण ज्यादा समय तक शासन न कर सके।

उत्तर गुप्त राजवंश

गुप्त वंश के पतन के बाद भारतीय राजनीति में विकेन्द्रीकरण एवं अनिश्‍चितता का माहौल उत्पन्‍न हो गया। अनेक स्थानीय सामन्तों एवं शासकों ने साम्राज्य के विस्तृत क्षेत्रों में अलग-अलग छोटे-छोटे राजवंशों की स्थापना कर ली। इसमें एक था- उत्तर गुप्त राजवंश। इस राजवंश ने करीब दो शताब्दियों तक शासन किया। इस वंश के लेखों में चक्रवर्ती गुप्त राजाओं का उल्लेख नहीं है।

परवर्ती गुप्त वंश के संस्थापक कृष्णगुप्त ने (५१० ई. ५२१ ई.) स्थापना की। अफसढ़ लेख के अनुसार मगध उसका मूल स्थान था, जबकि विद्वानों ने उनका मूल स्थान मालवा कहा गया है। उसका उत्तराधिकारी हर्षगुप्त हुआ है। उत्तर गुप्त वंश के तीन शासकों ने शासन किया। तीनों शासकों ने मौखरि वंश से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम रहा।

कुमारगुप्त उत्तर गुप्त वंश का चौथा राजा था जो जीवित गुप्त का पुत्र था। यह शासक अत्यन्त शक्‍तिशाली एवं महत्वाकांक्षी था। इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। उसका प्रतिद्वन्दी मौखरि नरेश ईशान वर्मा समान रूप से महत्वाकांक्षी शासक था। इस समय प्रयाग में पुण्यार्जन हेतु प्राणान्त करने की प्रथा प्रचलित थी। हांग गांगेय देव जैसे शसकों का अनुसरण करते हुए कुमार गुप्त ने प्रयाग जाकर स्वर्ग प्राप्ति की लालसा से अपने जीवन का त्याग किया।
गुप्तकालीन स्थापत्य

गुप्त काल में कला, विज्ञान और साहित्य ने अत्यधिक समृद्धि प्राप्त की। इस काल के साथ ही भारत ने मंदिर वास्तुकला एवं मूर्तिकला के उत्कृष्ट काल में प्रवेश किया। शताब्दियों के प्रयास से कला की तकनीकों को संपूर्णता मिली। गुप्त काल के पूर्व मन्दिर स्थायी सामग्रियों से नहीं बनते थे। ईंट एवं पत्थर जैसी स्थायी सामग्रियों पर मंदिरों का निर्माण इसी काल की घटना है। इस काल के प्रमुख मंदिर हैं- तिगवा का विष्णु मंदिर (जबलपुर, मध्य प्रदेश), भूमरा का शिव मंदिर (नागोद, मध्य प्रदेश), नचना कुठार का पार्वती मंदिर (मध्य प्रदेश), देवगढ़ का दशवतार मंदिर (झाँसी, उत्तर प्रदेश) तथा ईंटों से निर्मित भीतरगाँव का लक्ष्मण मंदिर (कानपुर, उत्तर प्रदेश) आदि।

गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषताएँ

गुप्तकालीन मंदिरों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया जाता था जिनमें ईंट तथा पत्थर जैसी स्थायी सामग्रियों का प्रयोग किया जाता था। आरंभिक गुप्तकालीन मंदिरों में शिखर नहीं मिलते हैं। इस काल में मदिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरे पर किया जाता था जिस पर चढ़ने के लिये चारों ओर से सीढि़याँ बनीं होती थी तथा मन्दिरों की छत सपाट होती थी। मन्दिरों का गर्भगृह बहुत साधारण होता था। गर्भगृह में देवताओं को स्थापित किया जाता था। प्रारंभिक गुप्त मंदिरों में अलंकरण नहीं मिलता है, लेकिन बाद में स्तम्भों, मन्दिर के दीवार के बाहरी भागों, चौखट आदि पर मूर्तियों द्वारा अलंकरण किया गया है। भीतरगाँव (कानपुर) स्थित विष्णु मंदिर नक्काशीदार है। गुप्तकालीन मन्दिरों के प्रवेशद्वार पर मकरवाहिनी गंगा, यमुना, शंख व पद्म की आकृतियाँ बनी हैं। गुप्तकालीन मंदिरकला का सर्वोत्तम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मंदिर है जिसमें गुप्त स्थापत्य कला अपनी परिपक्व अवस्था में है। यह मंदिर सुंदर मूर्तियों, उड़ते हुए पक्षियों, पवित्र वृक्ष, स्वास्तिक एवं फूल-पत्तियों द्वारा अलंकृत है। गुप्तकालीन मंदिरों की विषय-वस्तु रामायण, महाभारत और पुराणों से ली गई है।

मुख्य शासक

नरसिंहगुप्त 'बालादित्य' 495-530 

VIJAYVARGIYA - विजयवर्गीय वैश्य जाति







साभार: वैश भारती पत्रिका 

भारतीय वैश्यों का देश में अकाल के समय किया गया राहत कार्य.


"तुलसी पंछी के पिये सरिता घटे न नीर,
दान दिया धन न घटे जो सहाय रघुवीर।"

भारत के वैश्य व्यापारी तुलसीदास जी की इस सूक्ति में विश्वास रखते थे. उनका मानना था की जो दूसरों की की मदद करते हैं सिर्फ वही सार्थक जीवन जी रहे हैं.

D. K. Taknet जी ने अपनी पुस्तक 'थ मारवाड़ी हेरिटेज' में लिखा है की- भारत में 18वीं सदी के अंत में से 19वीं सदी तक अकाल और दुर्भिक्ष पुनवर्ती थे और उसमे लगभग 6 करोड़ लोगों की जान गयी थी। आखिरी सबसे बड़ा अकाल बंगाल का 1943 में पढ़ा था. इतिहास में दर्ज है की वैश्य व्यापारियों ने इस दुर्भिक्ष अकालों में बहुत दान-धर्म किया था। जबकि ऐसा कोई तत्कालीन नियम भी नहीं था। भारत के वैश्य महामारी और अकाल के समय अपने खाद्य भंडार और तिजोरी जनता के लिए खोल दिया करते थे और कई धर्मशालाएं, घाट, जोहड़, कुएं, बावड़ी और सड़कों के किनारे छाया वाले प्यायु बनवाते थे अकाल पीड़ित और प्यासे यात्रियों के लिए.

गीता के परम प्रचारक पुस्तक में गीता प्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयनका जी के 1943 के बंगाल अकाल में किये गए कार्य का वर्णन है-
सेठजी बाँकुड़ा (बंगाल) में रहते थे। 1943 वहाँ भीषण अकाल पड़ा। सेठजी ने लगभग एक सौ चालीस सेवा केन्द्र खोल दिये, कोई आये, दो घंटा कीर्तन करके एक निश्चित मात्रामें अन्न ले जाय। इसमें काफी धन लगने लगा। एक दिन उनके छोटे भाईने पूछा—भाईजी! यह काम कबतक चलेगा? उन्होंने उत्तर दिया—जबतक हमलोग इनकी स्थितिमें न आ जायँ तबतक। अकालकी स्थिति लगभग छ: महीने रही तबतक सेवाकार्य चला। अकाल समाप्त होनेके बाद स्थानीय लोगोंने अभिनन्दन समारोह किया। अन्य वक्ताओंके बोलनेके बाद सेठजीने कहा—हमने तो आपसे अर्जित धन भी पूरा आपकी सेवामें नहीं लगाया। आपसे अर्जित पूरा धन लगानेके बाद यदि हम मारवाड़से धन लाकर आपकी सेवामें लगाते तो कहा जा सकता था कि हमने कुछ किया। हमने तो आपकी चीज भी पूरी आपको नहीं दी।

सेठानी का जोहड़ा(तालाब)

संवत 1956 (सन् 1899-90) में देश मे भयानक अकाल पड़ा था जिसे छपन्निया अकाल के नाम से भी जाना जाता है.. उस अकाल में लोगों को राहत देने के लिए अग्रवाल सेठ भगवान दास बागला जी की पत्नी द्वारा संवत 1856 में चुरू (शेखावटी, राजस्थान) में करवाया गया था। ये राजस्थान टूरिज्म में प्रमुख स्मारकों में से एक है.

लेख साभार: प्रखर अग्रवाल 



MINAKSHI DEVI TEMPLE MADURAI - मदुरै की देवी मिनाक्षी अम्मा जी


MINAKSHI DEVI TEMPLE MADURAI - मदुरै की देवी मिनाक्षी अम्मा जी 



आइए जानें मदुरै की देवी मिनाक्षी अम्मा 
जी के बारे में, जिनका जन्म मदुरै के पांड्य (वानियार- तेली वैश्य ) वंश के राजा मलयध्वज जी की पुत्री के रूप में हुआ था।

हिन्दू आलेखों के अनुसार, भगवान शिव पृथ्वी पर सुन्दरेश्वरर रूप में मीनाक्षी से, जो स्वयं देवी पार्वती का अवतार थीं; उनसे विवाह रचाने आये (अवतरित हुए)। देवी पार्वती ने पूर्व में पाँड्य राजा मलयध्वज, मदुरई के राजा की घोर तपस्या के फलस्वरूप उनके घर में एक पुत्री के रूप में अवतार लिया था। वयस्क होने पर उसने नगर का शासन संभाला। तब भगवान आये और उनसे विवाह प्रस्ताव रखा, जो उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस विवाह को विश्व की सबसे बडी़ घटना माना गया, जिसमें लगभग पूरी पृथ्वी के लोग मदुरई में एकत्रित हुए थे। भगवान विष्णु स्वयं, अपने निवास बैकुण्ठ से इस विवाह का संचालन करने आये। ईश्वरीय लीला अनुसार इन्द्र के कारण उनको रास्ते में विलम्ब हो गया। इस बीच विवाह कार्य स्थानीय देवता कूडल अझघ्अर द्वारा संचालित किया गया। बाद में क्रोधित भगवान विष्णु आये और उन्होंने मदुरई शहर में कदापि ना आने की प्रतिज्ञा की। और वे नगर की सीम से लगे एक सुन्दर पर्वत अलगार कोइल में बस गये। बाद में उन्हें अन्य देवताओं द्वारा मनाया गया, एवं उन्होंने मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरर का पाणिग्रहण कराया।

यह विवाह एवं भगवान विष्णु को शांत कर मनाना, दोनों को ही मदुरई के सबसे बडे़ त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसे चितिरई तिरुविझा या अझकर तिरुविझा, यानि सुन्दर ईश्वर का त्यौहार ।

इस दिव्य युगल द्वारा नगर पर बहुत समय तक शासन किया गया। यह वर्णित नहीं है, कि उस स्थान का उनके जाने के बाद्, क्या हुआ? यह भी मना जाता है, कि इन्द्र को भगवान शिव की मूर्ति शिवलिंग रूप में मिली और उन्होंने मूल मन्दिर बनवाया। इस प्रथा को आज भी मन्दिर में पालन किया जाता है ― त्यौहार की शोभायात्रा में इन्द्र के वाहन को भी स्थान मिलता है।

✓आधुनिक इतिहास

आधुनिक ढांचे का इतिहास सही सही अभी ज्ञात नहीं है, किन्तु तमिल साहित्य के अनुसार, कुछ शताब्दियों पहले का बताया जाता है। तिरुज्ञानसंबन्दर, प्रसिद्ध हिन्दु शैव मतावलम्बी संत ने इस मन्दिर को आरम्भिक सातवीं शती का बताया है औरिन भगवान को आलवइ इरैवान कह है। इस मन्दिर में मुस्लिम शासक मलिक कफूर ने 1310 में खूब लूटपाट की थी। और इसके प्राचीन घटकों को नष्ट कर दिया। फिर इसके पुनर्निर्माण का उत्तरदायित्व आर्य नाथ मुदलियार (1559-1600 A.D.), मदुरई के प्रथम नायक के प्रधानमन्त्री, ने उठाया। वे ही 'पोलिगर प्रणाली' के संस्थापक थे। फिर तिरुमलय नायक, लगभग 1623 से 1659 का सर्वाधिक मूल्यवान योगदान हुआ। उन्होंने मन्दिर के वसंत मण्डप के निर्माण में उल्लेखनीय उत्साह दिखाया।

✓मन्दिर का ढाँचा

इस मन्दिर का गर्भगृह 3500 वर्ष पुराना है, इसकी बाहरी दीवारें और अन्य बाहरी निर्माण लगभग 1500-2000 वर्ष पुराने हैं। इस पूरे मन्दिर का भवन समूह लगभग 45 एकड़ भूमि में बना है, जिसमें मुख्य मन्दिर भारी भरकम निर्माण है और उसकी लम्बाई 254मी एवं चौडा़ई 237 मी है। मन्दिर बारह विशाल गोपुरमों से घिरा है, जो कि उसकी दो परिसीमा भीत (चार दीवारी) में बने हैं। इनमें दक्षिण द्वार का गोपुरम सर्वोच्च है।

SUB CASTE IN VAISHYA VARNA - वैश्य वर्ण में उपजातियो का सृजन


साभार: वैशभारती पत्रिका 

अग्रवाल समाज और जैन धर्म

अग्रवाल समाज और जैन धर्म 


जब हम जैन समाज के इतिहास को पलट कर देखते हैं तो पाते हैं दिगम्बर जैन संस्कृति के उत्थान में अग्रवाल बंधुओं का अग्रणी स्थान रहा। इन्होंने जैन धर्म और जैन संस्कृति को बहुत सींचा है। कोलकाता के जितने भी पुराने मंदिर हैं चाहे बड़ा मंदिर हो, चाहे नया मंदिर हो, चाहे पुराने बाडी मन्दिर होता उत्तर पाड़ी मंदिर हो, या बेलगछिया का मंदिर हो ये सब अग्रवालों ने बनवाये हैं । ~ जैनाचार्य प्रमाण सागर जी महाराज

अग्रवाल उत्तर भारत की सम्पन्न व शिक्षित जाति है इसने भारत देश के उत्थान में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है, इस जाति के अनुयायी आमतौर पर हिंदू व जैन दोनो धर्मो के पालक रहे है, अग्रवाल जाति का इतिहास राजा अग्रसेन से शुरु होता है, और उनका राज्य महाभारत काल में हरियाणा प्रदेश के हिसार-रोहतक क्षेत्र में विस्तृत था । दिल्ली के मंदिरों की लाइब्रेरियों में रखे हुए मुग़ल काल के रिकॉर्ड से पता चलता है की अग्रवालों में जैन धर्म की शरुवात लोहचार्य और काष्ठ संघ ने की थी। जैन गुरु लोहाचार्य पहली सदी में अग्रोहा आये थे। स्थानीय लोगों ने उनको खाना दिया था। लोहचार्य ने एक लकड़ी की मूर्ति की स्थापना करके काष्ठ संघ की शुरुवात की थी। काष्ठ संघ धार्मिक व्यवस्था इसीलिए अग्रवाल समाज में काफी नजदीक से संबंधित है। हिंदी आधुनिक साहित्य के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने अपनी पुस्तक अग्रवालों की उत्पत्ति में लिखा है की अग्रोहा का तत्कालीन राजा दिवाकर लोहचार्य जी के संपर्क में आने से जैन हो गए थे। राजा दिवाकर एक धर्मनिष्ठ जैन थे। आज अग्रवालों की 14% जनसंख्या जैन है बाकी वैष्णव धर्मी।

अग्रवालों में जैन धर्म की तरह ही मांसाहार वर्जित है। महाराज अग्रसेन ने स्वयं ही पशुबलि आदि का विरोध किया था और अपने राज्य में पूर्ण शाकाहार का नियम बनाया था। अग्रवालों के18 गोत्रों में से 3 गोत्र आज भी परवार जैनो में व अग्रवालो में समान है( गोयल,कांसल,बांसल) इससे भी इनकी जैन धर्म से साम्यता ज्ञात होती है।

राजपूत_शासन_में_अग्रवाल_जैन

काफी अग्रवाल शेखावटी चले गए। शेखावटी की ज्यादातर व्यापारी जनसंख्या अग्रवालों की है। अग्रवाल सेठ सेठ चतुर्भुज पोद्दार ने शेखावटी में ही व्यापारियों का राज्य रामगढ़ सेठान को बसाया था।

नट्टल साहू सबसे पहले ज्ञात अग्रवाल मंत्री हैं जिनका अग्रवाल इतिहास में उल्लेख मिलता है। दिल्ली के जैन वणिकों में अग्रणी थे। इनका व्यापार पूरे भारत वर्ष में फैला था. ये सम्राट अनंगपाल तोमर के दरबार में मंत्री भी थे। इन्होंने भगवान आदिनाथ का एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इन्ही के आश्रय में अग्रवाल जैन कवि विबुद्ध श्रीधर रहते थे जिन्होंने सन् 1132 में पार्श्वनाथ चरित्र लिखा जिसमें योगिनिपुर(दिल्ली) का ऐतिहासिक वर्णन है।

15वीं शताब्दी में ग्वालियर के तोमर राजाओं के समय अग्रवालों ने खूब तरक्की की। इतिहासकार के. सी. जैन लिखतें हैं - "ग्वालियर में दिगंबर जैन चर्च का स्वर्णिम काल तोमर राजाओं के समय का था। वे काष्ठ भट्टारक और उनके अग्रवाल जैन भक्तों से प्रेरित थे। अग्रवाल जैन ग्वालियर के तोमर राजाओं के दरबार में मंत्रियों और खजांची पर शुशोभित थे। हिसार से निकले हुए अग्रवाल जैन भट्टारकों ने ग्वालियर राज्य को दिगंबर जैन केंद्र बना दिया था जो की बड़े बड़े अरबपति अग्रवालों द्वारा पोषित था "

15वीं शताब्दी में काफी अग्रवाल आमेर राज्य जयपुर चले गए थे। इस पलायन में अग्रवाल अपने साथ अपनी धार्मिक पुस्तकें भी ले गए थे। संवत 1535 में अग्रवाल नेनासी ने सांगनेर में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा समारोह मनाया।

दिल्ली_के_अग्रवाल_जैन

सम्राट अकबर के काल में साहू टोडर अग्रवाल ने मथुरा में 500 से अधिक जैन स्तूप बनवाए थे। साहू टोडर आगरा के शाही खजाने का सुपरवाइजर था। अग्रवाल समाज से आने वाले राजा हरसुख राय ने सन् 1810 में जैन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भव्य दिल्ली रथ यात्रा निकाली थी। राजा हरसुख राय ने मुगल काल में सोने के छत्र वाले जैन मंदिर का निर्माण करवाया था। इन्होंने और इनके बेटे शगुन चंद ने भारत वर्ष में 51 जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था। अब तक चंपापुर(बिहार),ग्वालियर,तिजारा(राजस्थान) आदि कई स्थानो से खुदाई में अग्रवाल,अग्रोतक आदि प्रशस्ति लिखी जैन मूर्तियाँ प्राप्त हुई है।

अकबर के ही समय शाह रणवीर सिंह शाही खजांची था। उसने सहारनपुर शहर स्थापित किया था। उसने और उसके परिवार ने दिल्ली में कई भव्य जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था।

राजा शगुनचंद के बेटे सेठ गिरधारी लाल ने हिसार पानीपत में अग्रवाल जैन पंचायत की स्थापना की। इसे आजकल प्राचीन अग्रवाल दिगंबर जैन पंचायत के नाम से जाना जाता है। यह सबसे प्राचीन जैन संघठन है। यह संघठन ही प्राचीन जैन मंदिर नया मंदिर और लाल मंदिर का संचालन करता है। जैन समाज में एकता को बढ़ावा देने वाली ये पंचायत आज भी सक्रिय है।

1857 के क्रांतिकारी लाला हुकुमचंद जैन और फकीरचंद जैन हिसार के अग्रवाल जैन परिवार से थे । अग्रवाल नवरत्न लाला लाजपत राय जी का परिवार भी दिगंबर जैन मतावलंबी था जो बाद में आर्य समाजी हो गए थे। देश के बड़े मीडिया समूह टाइम्स ऑफ इंडिया की मालिक इंदु जैन अग्रवाल जैन परिवार से हैं । कोलकाता के प्रसिद्ध बेलगछिया जैन मंदिर के निर्माता अग्रवाल श्रेष्ठी थे ऐसे कई विशाल मंदिरो का निर्माण अग्रवाल जैन बंधूओ ने करवाया था । जैन समाज की कई साधु और साध्वियां अग्रवाल समाज से आते हैं।

जय जिनेन्द्र जय महाराज अग्रसेन

लेख साभार: Prakhar Agrawal


Monday, April 13, 2020

DAU KALYAN SINGH AGRAWAL - अग्रकुल के महादानी..

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ये है छत्तीसगढ़ की पावन धरा के महादानी दाऊ कल्याण सिंह जी रायपुर शहर का प्रतिष्ठित डी के हॉस्पिटल इन्ही के नाम पर है
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जी का जन्म 04/04/1876 को हुआ था
दाऊ जी को लोग सिर्फ डी के अस्पताल की जमीन के दानदाता के रूप में जानते हैं, पर ये परिचय इस महान दानदाता के लिए काफी नहीं है।
आज का एम्स अस्पताल भी दाऊ जी की दान की हुई जमीन पर ही बना है।
दाऊ जी ने 1944 में डी के अस्पताल वाली जमीन के साथ में भवन निर्माण के लिये 1,25,000/- नगद (वर्तमान की गणना में लगभग 70 करोड़) भी दिये थे, लभान्डी की जमीन के साथ कृषि महाविद्यालय और गरीब छात्रों के हास्टल निर्माण के लिए 112000/- (वर्तमान के लगभग 62 करोड़ रूपये), टी.बी.अस्पताल के लिए 323 एकड़ जमीन, रायपुर जगन्नाथ मंदिर के खर्चे के लिये संपूर्ण खैरा ग्राम का दान,कृषि पर रिसर्च के लिये बरोंडा ग्राम में जमीन, भाटापारा में कृषि विज्ञान हेतू विशाल जमीन, भाटापारा में अकाल के समय कल्याण सागर जलाशय का निर्माण, भाटापारा में विशाल मवेशी अस्पताल,गरीबों के लिये पुस्तकालय का निर्माण जैसे अनेकों पुण्य कार्य इस महादानी ने छत्तीसगढ़ में किये।
छत्तीसगढ़ के बाहर भी इस पुण्यात्मा ने अनेकों महादान किये जिसमें प्रमुख हैं नागपुर के लेडी ईरविन हास्पिटल के निर्माण में सहयोग, सेन्ट्रल महिला कॉलेज के निर्माण में मुख्य दान, बिहार के भूकंप में महादान,वर्धा की भयंकर बाढ़ में दिल खोलकर दान दिया।
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल आज के बड़े उद्योपतियों से कई गुना ज्यादा धनवान थे।उन्होंने 1937 में लगभग 70000/- राजस्व पटाया था।(आज की गणना में लगभग 39 करोड़ से अधिक)
आज इस महादानी,छत्तीसगढ़ के गौरव का नाम कहीं खो गया है खुद छत्तीसगढ़ के वासी भी इस महान माटीपुत्र के बारे में ज्यादा या कुछ भी नहीं जानते।
Prakhar Agrawal
 to राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा

VAISHYA SAMRAT SKANDGUPTA - सम्राट स्कन्दगुप्त का इतिहास..


#आचार्य_वासुदेव_शरण_अग्रवाल" "#सम्राट_स्कन्दगुप्त" की वीरता का बखान करते हुए लिखते हैं, ‘’मध्य एशिया से चींटियों की तरह असंख्य दल बांधकर जंगली और बर्बर हूण चीन से फ्रांस और यूनान तक समस्त भूभाग में फैल गए थे। डैन्यूब से वोल्गा तक तथा थ्यूरिंजिया और रोमन साम्राज्य तक इनकी लपलपाती हुई तलवारों ने अनगिनत मनुष्यों को चाट लिया था। हूणों के कंधे बड़े बड़े और नाक बैठी हुई थी, माथे का हिस्सा छोटा था और जैसे उनकी आंखें काली-काली उनके उठे सिरों में ही घुसी रहती थीं, क्रोध के समय पुतलियां इधर से उधर डोलने और नाचने लगती थीं, होठों के दोनों किनारों से पतली मूंछें खड़ी फड़कती थीं और मृत्यु को गेंद की तरह ठुकराते हुए ये बलशाली वेग से सम्पन्न घोड़ों पर सवार होकर समस्त जन-धन, नगर और देशों को रौंदते हुए ऐसे चलते थे जैसे कि खेतों को नष्टकर झुंड में चलने वाला असंख्य टिड्डी दलों का झनझन सुर में उड़ता समूह। इन हूणों के अत्याचारों से यूरोप कांप उठा, इनकी लगातार टक्कर और ठोकर से यूनान-मिस्र और रोम धरती के धूल में मिल गए। ऐसे विश्व को कंपा देने वाले प्रलयंकारी हूणों से समरांगण में लोहा लेने जब स्कन्दगुप्त अपने सैन्यबल के साथ दो दो हाथ करने उतर पड़ा तो जैसे बाजी ही पलट गई। उस विकट कालखंड (453 ईस्वी से 467 ईस्वी) में #भारत को जैसे सेनानी की आवश्यकता थी, वैसा ही नायक #स्कन्दगुप्त के रूप में देश को मिल गया। वह अकेला न होता तो आज यह भारत ही ​कहां होता। रोम आदि साम्राज्यों की तरह भारत भी हूणों की बाढ़ में बह गया होता। हूणों को हम न पचा पाते, #हूण ही हमें समाप्त कर जाते।" - आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल

#हूणों की भयानक दुर्भेद्य शक्ति से टक्कर लेने और भारत को बचाने के लिये उस महायोद्धा युवक #स्कंदगुप्त_विक्रमादित्य ने अपना जीवन ही दांव पर लगा दिया। महलों का सुख त्याग दिया, सैनिकों के साथ जमीन पर जीवन व्यतीत करने लगा।

आज से 1600 साल पहले औड़िहार (हौणिहार या हुणा-अरि) से #गुजरात और #कश्मीर तक उसने भारत भूमि को हूणों से मुक्त करा डाला।

#रीवां का #सुपिय_अभिलेख प्रमाण है कि भारत ने स्कन्दगुप्त को इस कार्य के लिए इतना जनसमर्थन दिया कि उसे धर्मपालन में #श्री_राम के तुल्य और सदाचार और सुनीति में #सम्राट_युधिष्ठिर के तुल्य बताया।

स्कन्दगुप्त के रणकौशल, बाहुबल और पराक्रम को देखकर हूणों की सेनाएं थर्रा उठीं, उसकी अद्वितीय वीरता देखकर जन-मन के भीतर पसरा डर जाता रहा, ऐसे महान सेनानी स्कन्दगुप्त को भारत का महान रक्षक या महात्राता अर्थात The Saviour of India नहीं कहें तो फिर कौन है इतिहास में जिसे भारत-रक्षा-केसरी की उपाधि से नवाजा जा

साभार: प्रखर अग्रवाल की फेसबुक वाल से 

अग्रवाल समाज का महावाक्य हैं - "अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च"


अग्रवाल समाज का महावाक्य हैं - "अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च"

महाराज अग्रसेन ने "अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च" का महामंत्र दिया था. #महाभारत काल मे यज्ञों में पशुबलि दी जाने लगी थी. इससे द्रवित होकर महाराज अग्रसेन ने #पशुबलि का विरोध किया और #क्षत्रिय वर्ण का त्याग करके #वैश्य धर्म अपनाया. वो निर्दोष पशुओं के तारणहार बने. उन्होंने #आग्रेय_गणराज्य में पशुबलि हिंसा समाप्त की थी और संपूर्ण शाकाहार का नियम लागू किया था. महाराज अग्रसेन करुणा और वात्सल्य से भरे हुए सम्राट थे. उन्होंने अपने गणराज्य में आने वाले हर व्यक्ति को आग्रेय के हर निवासी द्वारा एक मुद्रा और एक ईंट देने का नियम बनाया था. उस समय आग्रेय गणराज्य की कुल जनसंख्या सवा लाख थी. इस तरह आने वाले नावंतुक को सवा लाख मुद्रायें और ईंटे मिल जाती थीं जिससे वो नया व्यापार शुरू कर सके और अपना घर बना सके।

लेकिन उनकी अहिंसा में कायरता के लिए कोई स्थान नहीं था. जहां निर्दोष पशुओं की निर्मम हत्या को बंद करवाया वहीं अपने राज्य में सबको शस्त्र शिक्षा लेने का भी अनिवार्य नियम बनाया था. जहाँ तक युद्धों की बात है तो महाराज अग्रसेन ने स्वयं कुलदेवी #महालक्ष्मी के आशीर्वाद से #देवराज_इंद्र को हराया था. उन्होंने अपनी बाल्यावस्था में ही अपने पिता श्री #वल्लभसेन के साथ महाभारत के युद्ध मे #पांडवों की तरफ से भाग लिया था। #अग्रभागवत के अनुसार जब उन्होंने क्षत्रिय धर्म को त्याग कर वैश्य धर्म अपनाया था तब आस पास के लालची नरेशों ने इसे क्षत्रिय धर्म का अपमान और आग्रेय गणराज्य की प्रचुर संपत्ति हथियाने का स्वर्णिम अवसर समझ कर आग्रेय पर चढ़ाई कर दी थी. लेकिन महाराज अग्रसेन की ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार #विभुसेन ने रणभूमि में अपने अतुलित शौर्य का प्रदर्शन कर सारे राजाओं को अकेले ही परास्त कर और बंदी बनाकर महाराज अग्रसेन के दरबार मे प्रस्तुत किया था. आग्रेय गणराज्य को #चाणक्य ने अपने ग्रंथो में आयुद्धजीवी संघ लिखा है जो अपने अप्रतिम शौर्य के लिए जाना जाता था. महापंडित #राहुल_सांस्कृत्यायन ने अपनी पुस्तक #जय_यौधेय में लिखा है कि आग्रेय गणराज्य के निवासियों को #अग्र और #यौधेय कहा जाता था. यौधेय गणराज्यों ने लंबे समय तक भारत की सीमाओं की रक्षा की थी। आग्रेय गणराज्य के निवासियों ने विश्वविजेता #सिकंदर से भी युद्ध लड़ा था और उसे और उसकी सेना कोयुद्ध मे गम्भीर चोट पहुंचाई थी. लेकिन उस युद्ध के बाद आग्रेय गणराज्य भी छिन्न भिन्न हो गया था और आग्रेय के निवासी अग्रोहा से निकल कर पूरे भारत वर्ष में फैले और व्यापार करने लगे और आज भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं (जैसे #पारसी_समुदाय अपने गृहराज्य के नष्ट होने पर भारत आया और आज इस समाज से कई सफल उद्योगपति हैं)। ऐतिहासिक ग्रंथो में उल्लेख है कि 18वीं सदी तक अग्रवालों के घर मे शस्त्र प्रतिष्ठा रही थी. खुद #राणी_सती_दादी जी इस बात का उदाहरण है जिनको बचपन मे ही उनके पिता नगरसेठ #गुरसामल_गोयल जी द्वारा अस्त्र और शस्त्र की दीक्षा दी गयी थी. भारत के #स्वतंत्रता_संग्राम(1857-1947) में अग्रवालों की अतुलनीय भूमिका था.. उन्होंने सशस्त्र विरोध भी किया और क्रांतिकारियों के #भामाशाह भी बने.. अग्रवाल क्रांतिकारियों में हांसी के #लाला_हुकुम_चंद_जैन और #लाल_बाल_पाल तिगड़ी के #लाला_लाजपत_राय जी प्रमुख थे..

लेख साभार: ~ प्रखर अग्रवाल

Sunday, April 12, 2020

नगरश्रेष्ठ नट्टल साहू और महाकवि विबुद्ध श्रीधर

नगरश्रेष्ठ नट्टल साहू और महाकवि विबुद्ध श्रीधर

नट्टल साहू की बनवाये नाभये मंदिर परिसर को तोड़ के बनाये गए कुतुब्बुल इस्लाम मस्जिद के स्तम्भ..

12वीं सदी के ही #हरियाणा के महाकवि #विबुध_श्रीधर में अपूर्व कवित्व शक्ति तो थी ही, वह कुछ घुमक्कड़ प्रकृति का भी था किन्तुं उसकी वह घुमक्कड़ प्रकृति रचनात्मक एवं सुक्ष्मेक्षिका दृष्टि सम्पन्न थी। विबुद्ध श्रीधर का जन्म संवत 1189 में हरयाणा के #अग्रवाल_जैन परिवार में हुआ था.

एक दिन जब अपनी एक अपभ्रंश भाषात्मक चंदप्पहचरिउ (चन्द्रप्रभ-चरित) को लिखते-लिखते कुछ थकावट का अनुभव करने लगा, तो उसकी कुछ घूमने की इच्छा हुई। अत: वह पैदल ही #युमनानगर होता हुआ #ढिल्ली (तेरहवीं सदी में यही नाम प्रसिद्ध था) आ गया।

ढिल्ली (दिल्ली) में सुन्दर-सुन्दर चिकनी चुपड़ी चौड़ी-चौड़ी सड़को पर चलते-चलते तथा विशाल ऊँची-ऊँची #अट्टालिकाओं को देखकर प्रमुदित मन जब वह आगे बढ़ा जा रहा था तभी मार्ग में एक व्यक्ति ने उसके हाव-भाव देखकर उसे परदेशी और (अजनवी) समझा अत: जिज्ञासावश उससे पूछा कि तुम कौन हो और कहाँ जा रहे हो? तब उसने (अजनवी) यही कहा मैं हरयाणा निवासी विबुध श्रीधर नाम का कवि हूँ। एक ग्रन्थ लिखते-लिखते कुछ थक गया था, अत: मन को ऊर्जास्वित करने हेतु यहाँ घूमने आया हूँ। यह प्रश्नकर्ता था अल्हण साहू, जो समकालीन दिल्ली के शासक #अनंगपाल_तोमर (तृतीय) की राज्यसभा का सम्मानित सदस्य था। उसने कवि को सलाह दी कि "वह ढिल्ली के नगरसेठ #नट्टल से अवश्य भेंट करे। वो #अग्रवाल_श्रेष्ठि #साहू_जेजा की तीसरी संतान हैं। नट्टल ढिल्ली के वणिकों में अग्रणी हैं और अनंगपाल तोमर के दरबार में मंत्री हैं। उनका व्यापार पूरे देश में फैला है।" साहू नट्ठल की ‘‘नगरसेठ’’ की उपाधि सुनते ही कवि अपने मन में रुष्ट हो गया। उसने अल्हण साहू से स्पष्ट कहा कि धनवान् सेठ लोग कवियों को सम्मान नहीं देते। वे कुद्ध होकर नाक-भौंह सिकोड़ कर धक्का-मुक्की कर उसे घर से निकाल बाहर करते हैं।

यथा-

अमरिस—धरणीधर—सिर विलग्ग णर सरूव तिक्खमुह कण्ण लग्ग।

असहिय—पर—णर—गुण—गुरूअ—रिद्धि दुव्वयण हणिय पर—कज्ज सिद्धि।

कय णासा—मोडण मत्थरिल्ल भू—भिउडि—भंडि णिंदिय गुणिल्ल।।

आदि कहकर महाकवि ने नट्टल साहू के यहाँ जाना अस्वीकार कर दिया। फिर अल्हण साहू ने कहा की क्या तुम नट्टल को नहीं जानते ? वो बहुत ही उदार और सहृदय हैं। अल्हण साहू के बार-बार समझाने पर वह नट्टल के घर पहुँचा तो नट्टल की सज्जनता और उदारता से वह अत्यन्त प्रभावित हुआ। भोजनादि कराकर नट्टल ने महाकवि से कहा- "मैंने यहाँ एक विशाल #नाभेय (आदिनाथ का) मन्दिर बनवाकर उसके विशाल प्रांगण में #मानस्तंम्भ बनवाया है। मन्दिर—शिखर के ऊपर #पंचरंगी झण्डा भी फहराया है।" यह कहने के बाद नट्टल साहू ने महाकवि से निवेदन कियाकि मेरे दैनिक स्वाघ्याय के लिये पासणाहचरिउ (पार्श्वनाथ चरित) की रचना करने की कृपा करें। कवि ने उक्त नाभेय—मन्दिर में बैठकर उक्त ग्रन्थ की रचना कर दी जिसके लिये नट्टल ने कवि का आभार मानकर उसे सम्मानित किया। श्रीधर ने पासणाहचरिउ में अपना परिचय देते हुए कहा है-

"सिरि #अगरवाल_कुल कमल मित्तु,

सुधम्म कम्म पवियण्य-वित्तु"

यह सब कुछ तो राजा #अनंगपाल_तोमर (तृतीय) के शासन—काल में हो गया था। किन्तु बाद में #मुहम्मद_गोरी का शासन हुआ और उसकी मृत्यु के बाद उसका परम विश्वस्त गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक (वि. स. १२५०) जब ढिल्ली का शासक बना तब उसने #नाभेय मन्दिर तथा अन्य मंदिरों को ध्वस्त करा कर उनकी सामग्री से #कुतुबमीनार का निर्माण करा दिया तथा #नाभेय_मंदिर के प्रांगण मे कुछ परिवर्तन कराकर उसे #कुतुब्बुल_इस्लाम_मस्जिद का निर्माण करा दिया।

लेख साभार: प्रखर अग्रवाल की फेस्बूक् वाल से, राष्ट्रीय अग्रवाल सभा 


Thursday, April 2, 2020

महाराज अग्रसेन का वंश, अग्रवाल समाज और रामजन्मभूमि आंदोलन

महाराज अग्रसेन का वंश, अग्रवाल समाज और रामजन्मभूमि आंदोलन


"जिस दिन राम जन्मियो काटण पृथ्वी कलंक,

वंश छत्तीसों उपरे, कुल इक्षवाकु निकलंक।"



#अग्रोपाख्यान ग्रन्थ के अनुसार महाराज इक्ष्वाकु के परम शुद्ध कुल में #मान्धाता, #दिलीप, #भगीरथ, #रघु, #राम आदि अनेक राजा हुए। उसी कुल में राजा वल्लभसेन हुए। उन्होंने प्रतापपुर में शासन किया। वल्लभसेन के प्रतापी पुत्र महाराज अग्रसेन ने राज्य का विस्तार किया तथा आग्रेय गणराज्य की स्थापना की।

पं रामकुमार दाधीच जी द्वारा रचित #श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस में भी #अग्रवाल कुल के प्रवर्तक महाराज अग्रसेन के पिता प्रतापपुर नरेश #वल्लभसेन को भगवान् राम का वंशज माना गया है श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस की कथावस्तु 9 सोपानों में विभक्त है। प्रथम सोपान आदिकाण्ड की कथावस्तु के अनुसार #विदर्भ देश की राजकुमारी #भगवती नित्य रामायणपाठ करती थी। #रामायणपाठ के प्रभाव से उसके ह्रदय में यह अभिलाषा जगी कि मेरा विवाह भगवान #राम के वंशज से ही हो –

राजकुमारी भगवती नामा। गुणशालिनी तारुण्य ललामा ।।

अरुणिम किरण मनहुं सविता की। सरस उक्ति अथवा कविता की ।।

शरच्चन्द्र की चन्द्रिका स्वर्गंगोद्भव पद्म।

रूपोदधिमथनोद्भवा सुधा मधुरतासद्म ।।

सहज सौम्य करुणामयी धीरोदात्त स्वभाव।

नित #रामायणपाठ से मन में उपजा भाव ।।

#सूर्यवंशमणि राम के कुल में करूँ विवाह।

जननी को संकल्प यह कहा सहित उत्साह ।।

राजकुमारी भगवती को स्वप्न में एक राजकुमार दिखाई पड़ा। उसने राजकुमार का चित्र बनाकर अपनी माँ को दिखाया। यह वृत्तान्त सुनकर विदर्भनरेश ने मंत्री को चित्र दिखाकर सारी बात बताई। मंत्री ने कहा – यह चित्र #सूर्यकुलभूषण भगवान् राम के वंशज #वल्लभसेन का है –

मंत्री बोला चित्रगत है #प्रतापपुरभूप।

#सूर्यवंशमणि #वल्लभभट गुणराशि अनूप ।।

#क्षत्रियवर्ण #सूर्यकुलख्याता। तहँ नृप हुए प्रथित बहु ताता ।।

#इक्ष्वाकू #दिलीप #रघु #दशरथ। श्री भगवान #राम सब समरथ ।।

महिमा अमित न जाय बखानी। सूर प्रजावत्सल भट दानी ।।

परम्परा में राम की राजा वल्लभसेन।

हुआ प्रजावत्सल यह राखे प्रजा सुखेन ।।

विदर्भनरेश ने राजकुमारी भगवती का विवाह राजा वल्लभसेन से कर दिया। राजा वल्लभसेन और रानी भगवती के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में #अग्रसेन का जन्म हुआ। उनके गुण और कर्म वैश्यवर्ण के अनुरूप थे। इसलिये उनके #आग्रेय गण ने राष्ट्र के आर्थिक विकास में महनीय योगदान दिया। आग्रेय गण की राजधानी अग्रोहा की गणना भारत के श्रेष्ठ नगरों में होती थी। अग्रभागवत के अनुसार महाराज अग्रसेन के #राष्ट्रध्वज पर #सूर्यभगवान अंकित थे ये भी उनके सूर्यवंशी होने को दर्शाता है।

शिखरे राजभवने महोचछायध्वजोत्कटे।

अलक्ष्यत ध्वजं पीतवर्णं #भानुसुलक्षणं ।। अग्रभागवत 10:31

#राम_जन्मभूमि_आंदोलन_और_अग्रवाल समाज

रामजन्मभूमि आंदोलन में अग्रवाल समाज ने अग्रणी भूमिका निभाई। अग्रवाल समाज के वीर सपूत श्री #अशोक_सिंहल जीवन भर विश्व हिन्दू परिषद् के माध्यम से रामजन्मभूमि के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने परम पूज्य शंकराचार्यों, नाथ सम्प्रदाय, व अनेकों साधु-संतों, महात्माओं का आशीर्वाद लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन खड़ा किया। रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज में वो चोटिल हुए।

हिन्दू हृदय सम्राट ब्रह्मलीन श्री अशोक सिंहल भगवान् राम के वंशज थे। उनका जन्म अग्रोहानरेश महाराज अग्रसेन की कुलपरम्परा में हुआ था। बाबरी मस्जिद तोड़ने की बात नेशनल मीडिया पर सबसे पहले कबूल करने वाले #शिव_सेना के #जय_भगवान_गोयल भी अग्रवाल समाज से आते हैं। #राम_लला विराजमान को मुख्य पार्टी बनवाने का केस लड़ने वाले श्री #देवकीनंदन_अग्रवाल थे। रामलला के लिए वैश्य #कोठारी_बंधुओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया। अग्रकुल भूषण #हनुमान_प्रसाद_पोद्दार जी ने अपनी कल्याण पत्रिका में रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए कलम चलाई और जन जन तक इस आंदोलन को पहुंचाया। विहिप के #चंपत_राय_बंसल जी जिन्होंने रामजन्मभूमि के लिए कोर्ट में साक्ष्य प्रस्तुत किये जिन्हें अभी रामजन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव बनाये गए वो भी अग्रवाल समाज से आते हैं। अनेकों अग्रवाल उद्योगपति और व्यापारियों ने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए दान दिया श्री #विष्णु_हरि_डालमिया जी तो रामजन्मभूमि आंदोलन से आजीवन कोषाध्यक्ष बने रहे। इस तरह अनेकों अग्रवालों ने श्री राम का वंशज होना चरितार्थ किया।

अग्रवाल भगवान् राम के पुत्र #कुश के वंशज हैं। महाराज अग्रसेन को समाजवाद का प्रथम पुरुष कहा जाता है। उन्होंने अपने राज्य में बसने वाले हर नए शख्स के लिए नियम बनाया था की उन्हें आग्रेय गणराज्य के प्रत्येक घर से एक रुपये और एक ईंट मिले। जिससे नवंतुक परिवार के पास पर्याप्त धन हो नया व्यापार शरू करने के लिए। महाराज अग्रसेन के वंशजों ने भी वैश्यवर्ण के गुण-कर्म अपनाकर राष्ट्र का आर्थिक उत्कर्ष किया। महाराज अग्रसेन के ही संस्कारों के कारण अग्रवाल समाज में शुद्ध शाकाहार और दान की परंपरा पड़ी। अग्रवाल समाज में लाला लाजपत राय, जमनालाल बजाज, भारतेंदु हरिश्चन्द्र, हनुमान प्रसाद पोद्दार, सर गंगाराम, राम मनोहर लोहिया, भारत रत्न डॉ भगवान दास जैसी कई महान विभूतियों हुईं जिन्होंने राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

जय श्री राम जय महाराज अग्रसेन

साभार: प्रखर अग्रवाल की फेस बुक वाल से