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Monday, January 18, 2021

KAMAL MORARKA - कमल मोरारकाः भामाशाह निर्भीक!

कमल मोरारकाः भामाशाह निर्भीक!


मन उदास है। उस पीढ़ी का एक ओर हंस उड़ चला जो सत्य के साक्ष्य में विचारती थी, निर्भीक उड़ती थी और जिनकी बैठक की गपशप में मन रमता था। उस पीढ़ी की कमल मोरारका बैठक में मैंने अनेकों बार सोचा कि आजाद भारत के इतिहास में डॉ. राममनोहर लोहिया, रामनाथ गोयनका के अलावा यदि तीसरा विचारवान, निर्भीक, स्वतंत्रमिजाजी, देशचिंतक वणिक कोई है तो वह कमल मोरारका हैं! हां, कमल मोरारका धनवान, उद्योगपति थे लेकिन धन के पीछे भागते हुए, धन के संचय, कंजूसी की प्रवृत्ति के संस्कारों से शून्य! वे धनवान होते हुए भी समाजवादी थे लेकिन समाजवादियों की तरह छोटी-छोटी बातों पर लड़ने, अहंकार और अंहमन्यता में जीने वाले नहीं। वे सनातनी हिंदू परंपरा के ऐसे सच्चे शेखावटी सेठ थे जो मेवाड़ के भामाशाह की तरह हमेशा अपने नेता चंद्रशेखर के प्रति, उनके समाजवादी विचारों के प्रति समर्पित रहे। धन का भरपूर वैभव था और उससे जीवन का पूर्ण आनंद लेते हुए भी उन्होने वैभव को कभी हावी नहीं होने दिया। मेरा कमल मोरारका से कोई 1984 से संपर्क था। मैंने तब से लेकर पिछले साल की मुलाकात तक में उन्हें हमेशा कुर्ते-पाजामे-शॉल-चप्पल की सादगी में देखा। कांग्रेस का वक्त हो या अपनी सत्ता-तीसरे मोर्चे (वीपी सिंह-चंद्रशेखर-देवगौड़ा) का वक्त या नरसिंह राव से शुरू उदारवाद के वक्त में देश के तमाम धनपतियों को बदलता देखा। इनकी कारोबार-उद्योग में दो दूनी चार, चार दूनी चालीस, चालीस दूनी चार सौ बनाने की क्रोनी भूख में भारत को भ्रष्ट्र होते देखा लेकिन कमल मोरारका वितरागी सहजता में रमे रहे। वे अपने अंदाज में जीये और वाजपेयी-मनमोहन सिंह आदि तमाम सरकारों में अंतरंगताओं (जसवंत सिंह से ले कर मुरली देवड़ा आदि) के बावजूद कभी इन कोशिशों में वक्त खपाते नहीं मिले कि सरकार की क्रोनी कृपा से वे धंधा और चमकाएं!

हां, भारत में ऐसे उद्योगपति दो-चार ही होंगे, जिन्होंने अपनी कंपनी प्रोफेशनल टीम को छोड़ कर अपना जीवन राजनीति, क्रिकेट, समाजसेवा, ऑर्गेनिक खेती, नवलगढ़ के अपने गांव को आदर्श गांव बनाने या वन्य जीवन की फोटोग्राफी जैसे शगलों में खपाया हो।

सच्चाई है मैं शुरू में वीपी सिंह की ईमानदार इमेज के चक्कर में चंद्रशेखर का घोर विरोधी था। कमल मोरारका, दयानंद सहाय की पूरी चंद्रशेखर टीम से अपनी एलर्जी थी। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और कमल मोरारका उनके प्रधानमंत्री दफ्तर में राज्य मंत्री थे तो मुझे उनसे पहला काम तब पड़ा जब दिल्ली में जनसत्ता का एक स्ट्रिंगर तीस हजारी कोर्ट में हुए धमाके में घायल हुआ था। उसे एम्स ले जाया गया लेकिन वहां कुछ ढिलाई समझ आई तो मैंने दयानंद सहाय से मोरारका का नंबर ले कर सीधे बात की और तब जिस फुर्ती से मुझसे ब्योरा लेकर उन्होंने फोन किए तो कमल मोरारका को मैं चंद्रशेखर टोली में अलग, बिरला मानने लगा। लेकिन वे क्योंकि चंद्रशेखर के अनन्य भरोसेमंद थे और मैं जनसत्ता में उनकी टोली को चिरकुट करार देने वाला घनघोर आलोचक था तो मै दूर ही रहा। मैं चंद्रशेखर टोली की अंदरूनी राजनीति में दयानंद सहाय, काल्वी आदि के खेमे से गपशप ज्यादा करता था तो कमल मोरारका से मेरी लंबे समय तक दूरी रही। बाद में नरसिंह राव के वक्त में सेंट्रल हॉल में चंद्रशेखर से गपशप का मेरा खूब मौका बना और रामबहादुर राय, प्रभाष जोशी आदि की चंद्रशेखर में आस्था बनी तो कमल मोरारका की तीन मूर्ति लेन की अड्डेबाजी में मेरा भी जाना आना हुआ और मैं उनकी बेबाकी, सरलता, वैचारिक प्रतिबद्धता का कायल होता गया।

दिल्ली में कमल मोरारका के तीन मूर्ति लेन आवास, फिर पृथ्वीराज रोड के मौजूदा भव्य आवास व गांव नवलगढ़ के घर की तीनों बैठकों का पारदर्शी शीशों से भरपूर रोशनी वाले परिवेश, एक बड़े टीवी, लंबे सोफे पर लेटे या बैठे हुए फोन व रिमोट से फ्री मूड में वक्त का उपयोग, लोगों के साथ मोरारका की गपबाजी के क्षणों में कई बार मेरा भाव बना कि सहज जिंदादिल व्यक्ति का नाम है कमल बाबू। एक तरफ क्रिकेट के खेल पर नजर तो साथ ही एनजीओ विशेष के या बेमतलब पार्टी के पुराने लोगों की मदद में बेखटके फोन करते हुए।

तभी मुझे बाद में रंज हुआ कि मैंने अपने मीडिया शगल में खूब हाथ-पांव मारे लेकिन मैं कमल मोरारका को अपना प्रायोजक, प्रोत्साहक, निवेशक, भामशाह नहीं बना पाया। मैंने ‘नया इंडिया’ प्रारंभ करने से पहले सन् 2010 में कमल बाबू से कहा था कि मैं अखबार शुरू कर रहा हूं आप जुड़िए, साझेदार बनिए। उन्होंने सुना और खेद से संतोष भारतीय के जरिए कहलाया कि वे क्योंकि ‘चौथी दुनिया’ में पहले से कमिटेड है इसलिए संभव नहीं हो सकेगा।

संयोग कि बाद के सालों में वे मेरे लिखे और ‘नया इंडिया’ की बेबाकी के बहुत मुरीद हुए और जैसे मैंने नोटंबदी के बाद फील किया वह उन्होंने भी फील किया कि क्या सोचा था और क्या हुआ! देश का क्या बनेगा?

ध्यान रहे सन् 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कमल मोरारका के कई लेख ‘नया इंडिया’ में छपे थे। उनका बेधड़क सोचना-विचारना और फक्कड़ी में रईसी को जीना मेरे लिए हमेशा विचारणीय रहा। कह सकता हूं मैं पत्रकारीय जीवन में प्रारंभ से ले कर अब तक जितने विचारमना मगर प्रतिबद्ध नेताओं (कमलापति, अर्जुन सिंह, चंद्रशेखर, नरसिंह राव, वाजपेयी से लेकर गोविंदाचार्य, देवेंद्र द्विवेदी, डीपीटी, कमल मोरारका आदि की बहुत लंबी सूची) ऑब्जर्व किया है उनमें पूंजीपति मोरारका इसलिए बिरले थे क्योंकि कभी भी, एक क्षण के लिए भी वे अपने नेता याकि चंद्रशेखर की छाया से बाहर नहीं हुए। जसवंत सिंह, भेरौसिंह शेखावत ने कमल मोरारका को कई बार भाजपा का न्योता दिया और मुझे पता है कि उनकी वाजपेयीकालीन नेताओं से कैसी अंतरंगता थी लेकिन वे ताउम्र समाजवादी जनता पार्टी का झंडा उठाए रहे। उस पार्टी की जिसकी शायद अब मान्यता भी खत्म हो गई होगी। कमल मोरारका की बैठक में सौ फूल खिले मिलते थे। संघ के प्रचारक भी उनकी बैठक में होते थे तो वामपंथी एनजीओ नेता और कांग्रेस के लोग भी!

एक बात और। वे सच्चे सनातनी हिंदू थे। इसकी अनुभूति उनके गृह कस्बे राजस्थान के नवलगढ़ में नवरात्रि में सहस्त्रचंडी पाठ के प्रतिवर्ष के आयोजनों में 2019 के पाठ के वक्त हुई। उनका आग्रह था कि मैं नवलगढ़ में ऑर्गेनिक फार्मिग के उनके प्रोजेक्ट को देखूं, उन्होंने नवलगढ़ के लिए क्या कुछ किया है वह जानूं-समझूं। और मैंने जो देखा व सहस्त्रचंडी पाठ का अनुभव किया तो हतप्रभ हुआ देख कर कि पुरखों व जन्मभूमि की शाश्वतता के लिए क्या इतना कुछ भी किया जा सकता है! नगरपालिका की इमारत से लेकर क्रिकेट मैदान, ऑर्गेनिक खेती आदि न जाने क्या-क्या! पूरे गांव के लिए नवरात्रि पाठ का आयोजन। स्थायी तौर पर सौ से ज्यादा पंडितों का निवास, व्यवस्थाएं, और संस्कृत उच्चारण की शुद्धता के आग्रह में जो हुआ देखा तो दिमाग ने सोचा कि कमल मोरारका ने जीवन में इन कामों का दस-बीस प्रतिशत समय भी शायद ही उद्योग-कारोबार को दिया होगा।

तो बतौर व्यक्ति कमल मोरारका का अपने अंदाज में जीवन जीना पहले था और धनोपार्जन बाद में। उन्होंने मुंबई-दिल्ली में मीडिया कंपनी, अखबार चलवाने के प्रयोग किए। देश की राजनीति, समाजवादी राजनीति, चंद्रशेखर की विरासत को संभालने से ले कर क्रिकेट राजनीति और ग्रामोत्थान, खेती के असंख्य प्रोजेक्ट चलवाए। लेकिन न कोई ढिंढोरा और न दर्प। विनीत नारायण ने ठीक लिखा है कि नेकी कर कुएं में डाल के पर्याय थे मोरारका। वे दिल्ली में जितने सक्रिय थे उतने ही मुंबई और नवलगढ़ में। मुझे कई बार उन्होंने मुंबई का, अपने ऋषिकेश, गोवा के घर में छुट्टी का आग्रह किया लेकिन अपनी असामाजिकता से संयोग नहीं बना। नए साल के बाद फोन पर हुई बात में उन्होंने चिर-परिचित अंदाज में कहा था- सब ठीक है और जल्द बनाऊंगा दिल्ली आने का प्रोग्राम! तभी शुक्रवार शाम विनीत-रजनीश से जब शोक समाचार सुना तो दिमाग अवाक और मन उदास! अच्छे लोगों की पीढ़ी का एक और हंस उड़ चला! श्रदांजलि मेरी और उन सबकी और से भी जो सचमुच यह भाव रखते है कि सार्वजनिक जीवन में अच्छेपन का जीवंतता से अहसास कराने वाला अब नहीं रहा!

लेख साभार: हरिशंकर व्यास,नया इंडिया

NAVYA SINGLA IAS

NAVYA SINGLA IAS

IAS Success Story: पहले ही अटेम्प्ट में 23 साल की नव्या ने पास की UPSC परीक्षा, जानें क्या थी उनकी तैयारी की खास बातें

नव्या सिंग्ला ने साल 2016 में पहले ही प्रयास में यूपीएससी सीएसई परीक्षा पास कर ली थी. अपने पहले ही प्रयास को आखिरी मानने वाली नव्या ने कैसे किया यह कारनामा? जानते हैं.



Success Story Of IAS Topper Navya Singla: चंडीगढ़ की नव्या सिंग्ला यूपीएससी की फील्ड में हाथ आजमाने के पहले ही तय करके आयी थी कि पहले प्रयास में ही परीक्षा पास करनी है. हालांकि इस विचार के साथ कई कैंडिडेट्स आते हैं लेकिन हर कोई अपने इरादों में सफल नहीं होता. लेकिन नव्या उन गिने-चुने कैंडिडेट्स में से हैं जो जैसा सोचते हैं वैसा कर भी लेते हैं. साल 2016 में नव्या ने पहली बार यूपीएससी सीएसई परीक्षा दी और 102 रैंक के साथ टॉप किया. दरअसल नव्या मानती हैं कि पहले प्रयास में आपके अंदर जो जोश, जो जील होती है वह बाद में कितनी भी कोशिश करें बरकरार नहीं रह पाता. इस बड़ी परीक्षा को नव्या ने छोटे से समय में कैसे पास किया इस बारे में उन्होंने दिल्ली नॉलेज ट्रैक से बात की. जानते हैं विस्तार से.

इकोनॉमिक्स की स्टूडेंट रही हैं नव्या –



नव्या बेसिकली चंडीगढ़ की रहने वाली हैं और उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई भी यहीं हुई. क्लास 12 के बाद आगे की पढ़ाई के लिए नव्या दिल्ली चली गईं और यहां के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से उन्होंने इकोनॉमिक्स ऑनर्स में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद ही तुरंत नव्या ने यूपीएससी का मन बनाया और पूरी तरह से तैयारी में जुट गईं. हालांकि नव्या साथ में इसी विषय से मास्टर्स भी कर रही थी.

नव्या ने अपनी तैयारी में कोचिंग का सपोर्ट लिया और जहां जब जैसी जरूरत महसूस हुई वहां से गाइडेंस लिया और एंड में दो संस्थानों की टेस्ट सीरीज भी ज्वॉइन की. हालांकि कोई भी सलाह देने से पहले नव्या यह जरूर कहती हैं कि हर किसी की जरूरतें अलग होती हैं और उसे अपनी स्ट्रेटजी और प्लानिंग अपने अनुसार करनी चाहिए न कि किसी और के अनुसार. हो सकता है जो उनके लिए काम किया वह आपके लिए काम न करे.

न्यूज पेपर है बहुत जरूरी –

नव्या तैयारी के पहले चरण में न्यूज पेपर पढ़ने की सलाह देती हैं. वे कहती हैं कि करेंट अफेयर्स के लिए यह एक ऐसा स्टेप है जिसे रोज फॉलो करें और चाहे जो हो जाए न्यूज पेपर स्किप न करें. जरूरी हिस्सों के नोट्स बनाएं और सुबह पढ़े गए पेपर से बने नोट्स रात में रिवाइज करके ही सोएं. नव्या वैसे भी इस परीक्षा की तैयारी के लिए सीमित किताबों से बार-बार रिवाइज करने पर जोर देती हैं. वे कहती हैं कि प्री परीक्षा के लिए खासतौर पर कम किताबें रखें और उन्हें पढ़ने के साथ ही बार-बार रिवाइज करें. प्री में सफलता का यही मूल-मंत्र है. जब तैयारी थोड़ा आगे बढ़ जाए जो टेस्ट पेपर सॉल्व करें और इनमें जो गलतियां हों उन्हें दूर करते चलें.

नव्या की सलाह –

नव्या कहती हैं कि मेन्स में आंसर राइटिंग का बहुत महत्व है इसलिए तैयारी होने के बाद खूब आंसर लिखें. अपने शेड्यूल को टाइम-टेबल के हिसाब से बांध लें कि हफ्ते में क्या खत्म करना है, महीने में क्या आदि, उसके हिसाब से पढ़ाई करें. नव्या बताती हैं कि यूं तो इस परीक्षा के लिए साल भर ही या जितने समय भी आप तैयारी करते हैं लगकर पढ़ाई करनी होती है पर प्री होने और मेन्स के आने के पहले का समय अत्यंत कड़ी मेहनत का होता है.


इसके साथ ही नव्या पिछले साल के पेपर देखने और रिवीजन करने पर काफी जोर देती हैं. वे कहती हैं पिछले साल के जितने अधिक से अधिक पेपर देख सकें देखें, यह बहुत हेल्प करता है. अगला जरूरी बिंदु है जमकर रिवीजन करने का. वे कहती हैं तैयारी समय से पूरा करके उसे बार-बार पढ़ें. पूरी तैयारी के दौरान पेपर पढ़ना कभी बंद न करें और साक्षात्कार के पहले तक भी इसे पढ़ते रहें क्योंकि जब आप अपने आसपास हो रही चीजों से अवेयर होते हैं जो आपके आंसर्स में वैल्यु एडिशन हो जाता है. सिलेबस पास रखकर पेपर पढ़ें और केवल काम की चीजों पर फोकस करें. यही बात वे करेंट अफेयर्स के लिए भी मानती हैं कि इनका प्रयोग आपके उत्तर को वजन देता है. अंत में इतना ही कि टॉपर्स के इंटरव्यू देखें ये भी बहुत मदद करते हैं और यह याद रखें कि एक-डेढ़ साल की तैयारी में यह परीक्षा पास की जा सकती है अगर आप अपनी पूरी जान लगा दें और कंसिसटेंसी का साथ पढ़ाई करें. पहले प्रयास की बात बाकी प्रयासों में नहीं आती इसलिए जमकर मेहनत करें और पहले प्रयास को आखिरी मानकर आगे बढ़ें.

Saturday, January 16, 2021

SAMEER AGRAWAL -MEMBER OF ISE



SAMEER AGRAWAL -MEMBER OF ISE 


साभार: अग्रवाल टुडे आगरा

ANIL AGRAWAL THE GREAT DONOR

 ANIL AGRAWAL THE GREAT DONOR


साभार: अग्रवाल टुडे आगरा 

SHVETA AGRAWAL



SHVETA AGRAWAL 





साभार : अग्रवाल टुडे आगरा

AGRAWALS IN TRADE & INDUSTRY -1

 AGRAWALS IN TRADE & INDUSTRY -1

साभार: अग्रवाल टुडे आगरा 

VINEET AGARWAL - ASSOCHAM NEW PRESIDENT

 VINEET AGARWAL - ASSOCHAM NEW PRESIDENT

साभार: अग्रवाल टुडे, आगरा 

Wednesday, January 13, 2021

वैश्य दानवीर

 वैश्य दानवीर 



साभार: दैनिक भास्कर 

Tuesday, January 12, 2021

SUNNY GARG - 18 साल की उम्र में शुरू किया स्टार्टअप, तीन साल में 20 करोड़ पहुंचा टर्न ओवर

SUNNY GARG - 18 साल की उम्र में शुरू किया स्टार्टअप, तीन साल में 20 करोड़ पहुंचा टर्न ओवर


स्टूडेंट्स को व्यवस्थित पीजी उपलब्ध कराने के लिए सनी ने अपनी दोस्त शेफाली के साथ मिलकर योरशेल की स्थापना की। जिसे स्टैंजा लिविंग ने एक्वायर कर लिया।

आज की पॉजिटिव खबर दिल्ली के रहने वाले 23 साल के सनी गर्ग की। जिन्होंने ग्रेजुएशन सेकंड ईयर में पढ़ते हुए स्टूडेंट्स की प्रॉब्लम को देखा और समझा। 2018 में महज 18 साल की उम्र में ‘योरशेल’ नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया। जहां वो स्टूडेंट्स को एक व्यवस्थित पीजी की सुविधा उपलब्ध कराते थे। तीन साल में ही उनकी कंपनी का टर्नओवर 20 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

कोरोना की शुरुआत से पहले नवंबर 2019 में इसी सेक्टर में काम करने वाली एक बड़ी कंपनी स्टैंजा लिविंग ने उनकी कंपनी को खरीद लिया। इससे मिले पैसों से लॉकडाउन के दौरान ही साल 2020 में सनी ने अपनी दोस्त शेफाली जैन के साथ मिलकर एक नए स्टार्टअप ‘एई सर्किल’ की शुरुआत की ​है, जिसके जरिए वो स्टार्टअप शुरू करने वालों की मदद करते हैं।


पारंपरिक बिजनेस फैमिली से ताल्लुक रखने वाले सनी हमेशा से ही नए बिजनेस आइडिया की तलाश में रहते थे।

सनी कहते हैं, ‘स्टार्टअप का मतलब है, एक प्रॉब्लम को पहचानना, उसे सॉल्व करना और उसको मॉनिटर करना। मैंने कॉलेज के कई लोगों से उनकी परेशानियां पूछी तो एक कॉमन प्रॉब्लम सामने आई, वो थी पीजी की प्रॉब्लम। जब कोई बाहर का स्टूडेंट दिल्ली यूनिवर्सिटी आता है तो उसे सबसे पहले रहने का इंतजाम करना होता है और पीजी ढूंढना इतना आसान नहीं है। मैंने सोचा ये प्रॉब्लम तो हम लोग सॉल्व कर सकते हैं, लेकिन उस वक्त एडमिशन सीजन में सिर्फ 15 दिन बचे थे। अगर मैं ऐप, वेबसाइट बनाने में समय गंवाता तो ये मौका मेरे हाथ से निकल जाता।'

वो बताते हैं कि मैंने कुछ दोस्तों की मदद ली, कुछ इंटर्न ​हायर किए। फिर कुछ पीजी से टाई अप किया और कुछ पोस्टर्स छपवाकर सभी कॉलेज के बाहर ​लगवा दिए। हमने तय किया कि हम स्टूडेंट्स की एडमिशन में मदद करेंगे फिर वो अपने आप पूछेगा कि पीजी कहां ​लेना सही होगा। हमने स्ट्रैटजी बनाकर 20 से 25 दिनों तक ये काम किया, इस दौरान हमने 2500 से ज्यादा स्टूडेंट्स की मदद की। इनमें से करीब 300 लोगों को पीजी दिलाए। इन 20 दिनों में हमारा नेट प्रॉफिट था 7.5 लाख रुपए।

जिन बच्चों को पीजी दिलाया, उन्होंने खरी-खोटी सुनाई तो आया योरशेल का आइडिया

सनी बताते हैं, ‘जुलाई 2017 की बात है, मुझे बच्चों के फोन आने लगे कि पीजी दिलाते वक्त जो वादे किए गए थे, वो पूरे नहीं किए गए। इसके लिए लोगों ने मुझे बहुत खरी-खोटी सुनाई, तब मुझे अहसास हुआ कि पीजी ढूंढना प्रॉब्लम नहीं है, अच्छे पीजी का ना होना समस्या है। इसी समय पर मुझे योरशेल का आइडिया आया। इस बिजनेस के लिए मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘स्टैंडअप इंडिया-स्टार्टअप इंडिया’ स्कीम के तहत 35 लाख रुपए का लोन लिया। कुछ पैसा मार्केट से ब्याज पर उठाया और 150 बेड से योरशेल की शुरुआत की थी। पहले साल में बहुत अच्छा रिस्पांस रहा था। बिजनेस शुरू करने के ​15 दिन के अंदर ही हमारे सभी सीटें फुल हो गई थीं।'

अपने बिजनेस मॉडल के बारे में सनी बताते हैं कि इसके लिए हम लीज पर बिल्डिंग और फ्लैट लिया करते थे। फिर उसे फर्निश्ड कराते थे, उसमें सर्विस प्रोवाइड करते थे और वो प्रति बेड के हिसाब से किराए पर देते थे। योरशेल में सनी के साथ शेफाली जैन, विशेष कु्ंगर और गौरव वर्मा भी फाउंडर थे। जब सनी ने अपना स्टार्टअप शुरू किया था, तब उनका एडमिशन इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस, हैदराबाद में हुआ था, लेकिन अपने स्टार्टअप की वजह से उन्होंने एडमिशन नहीं लिया। इस वजह से परिवार के लोग काफी नाराज भी हुए।


योरशेल बेचने के बाद सनी गर्ग अब नए स्टार्ट अप्स को फाइनेंशियल और लीगल प्रॉब्लम का सॉल्यूशन देते हैं।

‘लॉकडाउन में हम बहुत खुश थे कि हम बच गए’

सनी बताते हैं, ‘नवंबर 2019 की बात है, स्टैंजा लिविंग ने हमें कॉन्टैक्ट किया और कहा कि आप लोग अच्छा काम कर रहे हो। हम चाहते हैं आप हमारे साथ मिलकर काम करें। उस समय हम किसी के साथ काम तो नहीं करना चाहते थे, बस ये था कि हमारे खड़े किए वेंचर को प्रॉपर इज्जत और केयर मिलेगी और वो कंपनी हमसे बेहतर उसकी केयर कर सकते थे। जब हमने अपना स्टार्टअप बेचा था, तब हम खुश नहीं थे, लेकिन कहते हैं ना जब कोई काम अच्छी नीयत से करो तो भगवान भी आपको सपोर्ट करता है। लॉकडाउन में हम बहुत खुश थे कि हम बच गए। क्योंकि, स्टूडेंट हाउसिंग इंडस्ट्री, रियल इस्टेट और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के लिए 2020 बहुत खराब गया।

अब AE सर्किल के जरिए देते हैं स्टार्टअप में आने वाली हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन

अपने मौजूदा स्टार्टअप ‘AE सर्किल’ के बारे में सनी बताते हैं कि इसके जरिए वो एक सर्किल बना रहे हैं। AE का मतलब है एनीथिंग एंड एवरीथिंग। यानी एक स्टार्टअप शुरू करने में जो भी दिक्कत आती है मसलन, फाइनेंशियल और लीगल से जुड़ी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन देते हैं। इसके अलावा उन्होंने मार्केटिंग, प्रोडक्शन और प्रिंटिंग बिजनेस में भी इंवेस्टमेंट किया है।

साभार:  दैनिक भास्कर 

Saturday, January 9, 2021

आर्य और आर्येतर वैश्यों की गाथा

आर्य और आर्येतर वैश्यों की गाथा 

मुझे अपनी पूर्वलिखित कुछ बातों को दुहराते हुए अपनी बात कहनी होगी। जैसे आज धनाढ्य वैश्यों के लिए श्रेष्ठ (सेठ), श्रेष्ठिन् (सेठी) का प्रयोग होता है और कुछ वंश-परंपराओं में सेठ और सेठी उपनाम बन चुके हैं, ठीक इसी तरह, हड़प्पा काल में अन्य वरिष्ठों के अतिरिक्त धनाढ़्य बनियों के लिए भी 'आर्य' का प्रयोग होता था। ऋग्वेद में जिनकी चिन्ताएं सबसे मुखर रूप में व्यक्त हुई हैं, वे वणिक् वर्ग की और विशेषत: सुदूर व्यापार में अग्रणी इन व्यापारियों के ही सरोकार हैं इसलिए ऋग्वेद को वैश्यों का वेद माना गया है। कहते हैं वैश्य वर्ण की उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई: 'ऋग्भ्यः जातं वैश्यं वर्णं आहु:'। 

ऋग्वेद में सौ शरद् जीने की जो आकांक्षा है - जीवेम शरद: शतम् .... अदीना: स्याम शरद: शतम्, उसकी विचित्र व्याख्यायें करके यथार्थ से धयान हटाने के प्रयत्न होते रहे। यह कि सर्दी के कारण जाड़े में मौतें बहुत होती थीं, इसलिए वे कामना करते थे कि जाड़े के मौसम से पार पा जाएं। शरद् ऋतु की इससे अनूठी समझ हो नहीं सकती। खैर, यह व्यापारिक यात्राओं और उनसे मालामाल होने का यही उत्साह था जिसके कारण वे सौ शरद जीने और आजीवन आत्मावलंबी रहने की कामना करते थे। बरसात बीतते ही, सबके देना पावना का हिसाब करके वे व्यापार के लिए या खनिज संपदा के दोहन के लिए निकलते थे, इसलिए शरद ऋतु को वैश्यों की ऋतु कहा जाता था - शरद् ऋतु: वै वैश्य ऋतु:। 
सुदूर यात्रा पर जाने वाले व्यापारियों की चिन्ता क्या थी? चिन्ता एक हो तो कहें, घर छोड़ते ही चिन्ता के पहाड़:
१. सभी देव प्रसन्न रहें और अनिष्ट से बचाएं - शं नो मित्र:, शं वरुण:, शं नो भवतु अर्यमा ....
२. मौसम ठीक रहे, आंधी, तूफान न आए, जल धाराएं प्रखर न मिलें, राह में पेट भरने के लिए मधर फल-कन्द मिलें ...- मधु वाता ऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धव: । माध्वी: न: सन्तु ओषधी:।.....
३. मेरी जान न चली जाय, लुटेरे या शत्रु हमें बन्दी न बना लें, खाने के लाले न पड. जांय - मा नो वधी: इन्द्र मा परा दा मा नो प्रिया भोजनानि प्रमोषी: ।...
४. हमें भ्रांति न हो, थकान न लगे, तन्द्रा न सताए- न मा तमन् नो श्रमन् न उत तन्द्रन् न वोचाम मा सुनेतेति सोमम् ,
५. हे इन्द्र तुम्हारे सख्य के बूते हमे डर न सताए, सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते ।
६. हे देवताओ, अपने उपासकों को इन निर्मम प्राणघाती हिंसकों से बचाना - त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदं यजत्राः ।।
७. कदाशयी बटमार हमारे ऊपर हावी न हो जाएं- मा नः स्तेन ईषत मा अघशंस: ।
८. इंद्र तुम अकूत धन देने वाले, हमें भी मालामाल कर देना -भूरिदा भूरि देहि नो मा दभ्रं भूर्या भर । भूरि घेदिन्द्र दित्ससि ।।
९. हमें किसी दूसरे के असाधारण करतब का लाभ न तो स्वयं लेना पड़े न हमारी आद-औलाद को - मा कस्याद्भुतक्रतू यक्षं भुजेमा तनूभिः । मा शेषसा मा तनसा ।।
१०. आने वाली भोर हमारी रक्षा करे, उफनती हुई नदिया हमारी रक्षा करें - अवन्तु मामुषसो जायमाना अवन्तु मा सिन्धवः पिन्वमानाः ।
११. हमें भूखा न रहना पड़े, दुष्टों के अधीन न होना पड़े, हम देश में रहें या जंगल में, कहीं हमें हिंसा का शिकार न होना पड़े - मा नः क्षुधे मा रक्षसे ऋतावः मा नः दमे मा वन आ जुहूर्थाःहिंसीः ।।
१२. दूसरे के कुकर्म का दंड हमें न भोगना पड़े - मा वो भुजेमान्यजातमेनो मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वे ।।
१३. एक पाप होने पर, दो पाप होने पर, तीन पाप होने पर, या कई पाप हो जायं तो भी, हमारे प्राण न लेना - मा न एकस्मिन्नागसि मा द्वयोरुत त्रिषु । वधीर्मा षूर भूरिषु ।।
१४. सब कुछ देखने, सुनने वाले हे देव तुमसे बिनती करता हूं कि मेरे सेवको और सहायकों को किसी तरह की क्षति न पहुंचने पाए - चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरिषः मोत वीरान् ।। 

ये ही लोग थे जो सन्मार्ग पर उसी तरह निरुपद्रव चलते हुए जैसे सूर्य और चन्द्रमा अपने मार्ग पर चलते है, कल्याण सहित चलते, किसी को चोट पहुंचाए बिना अादान प्रदान करते हुए, जान पहचान बढ़ाते हुए मेले ठेले लगाते हुए विचरण करते थे - स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि ।। 
और इन्होंने ही दूर पराए देशों में अपने प्रताप से वे प्राचीरवेष्ठित बस्तियां बसाई थीं जिनको वे आर्यों की बस्ती (आर्यस्थान) कहते थे और जिनकी संज्ञा उनकी गतिविधि के पूरे क्षेत्र से जुड़ गई थी - आर्याना (अफगानिस्तान), ईरान, ऐरनवेजो और इन्हीं की नकल पर इनके संपर्क में आने वाले जन भी अपने को आर्य कहने लगे थे - आरी (जर्मन), आर्मीनिया, आयरलैंड में जिनका रहस्य छिपा है। इस तरह एक खास अर्थ में इनको छोड़ कर दूसरे आर्येतर थे।
सहोभिर्विश्वं परि चक्रमू रजः पूर्वा धामानि अमिमिमानाः।
तनूषु विश्वा भुवना नि येमिरे प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु।। 
और इसी के बल पर कहते थे कि हमने समस्त संसार में आर्यव्रत का प्रसार किया है - आर्या व्रता विसृजन्त: अधि क्षमि । पर क्या था यह आर्यव्रत ? यह था जल की उपलब्धता का तरीका निकालना, पशुपालन, उद्यानिकी या बागबानी, कृषि, खनिज पदार्थों की खोज में भागीदारी पर साथ ही था प्रथमत: भाषा और संस्कृति का संचार या ज्ञान का प्रसार - ब्रह्म॒ गामश्वं॑ ज॒नय॑न्त॒ ओष॑धी॒र्वन॒स्पती॑न्पृथि॒वीं पर्व॑ताँ अ॒पः । सूर्यं॑ दि॒वि रो॒हय॑न्तः सु॒दान॑व॒ आर्या॑ व्र॒ता वि॑सृ॒जन्तो॒ अधि॒ क्षमि॑ ॥ 
संस्कृत का तो नहीं पर वैदिक संपर्क भाषा का प्रसार भारोपीय क्षेत्र में कैसे हुआ था इसे इस सिरे से ही समझा जा सकता है।

लेख साभार: भगवान् सिंह 

Friday, January 8, 2021

ANJALI BIRLA - अंजली बिरला ने IAS में सफलता हासिल की

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की बेटी अंजलि ने UPSC की परीक्षा में हासिल की सफलता, घर पर यूं मना जश्न



लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Lok Sabha Speaker Om Birla) की छोटी बेटी अंजलि बिरला ने UPSC की ओर से आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की है, इससे परिवार में खुशी का माहौल है। आपको बता दें कि अंजलि ने पहले ही प्रयास में सफलता हासिल की। उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2019 की ओर से सोमवार को 89 उम्मीदवारों की जारी सूची में अपना नाम दर्ज करवाया है।


लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की बेटी अंजलि ने UPSC की परीक्षा में हासिल की सफलता, घर पर यूं मना जश्न

एक पिता के लिए उसकी संतान की सफलता शायद सबसे ज्यादा मायने रखती है। यही वजह है कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के घर भी इन दिनों उत्सव वाला माहौल बना हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी बेटी अंजली बिरला ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की ओर से आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की है। आपको बता दें कि अंजली लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला व डॉ. अमिता बिरला की छोटी बेटी हैं। यूपीएससी की ओर से सोमवार को जारी सूची में नाम आने के बाद उनके शक्ति नगर स्थित निवास पर अजंली को बधाई देने वालों का तांता लग गया।


आर्ट्स सब्जेक्ट में ही थी रूचि



पत्रकारों से चर्चा करते हुए अंजली बिरला ने बताया कि उन्होंने कोटा के सोफिया स्कूल से आर्ट्स में 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दिल्ली के रामजस कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) में डिग्री हासिल की है। इसके बाद उन्होंने एक वर्ष दिल्ली में रहकर ही यूपीएससी परीक्षा की तैयारी की।

​बहन आकांक्षा और माता-पिता को बताया प्रेरणास्त्रोत


पहले ही प्रयास में सफलता मिलने का श्रेय बड़ी बहन आकांक्षा बिरला को देते हुए अंजली ने कहा कि तैयारी के दौरान बड़ी बहन मोटिवेशन खास रहा। वे न सिर्फ उनका उत्साहवर्धन करती रहीं, बल्कि पढ़ाई और परीक्षा से लेकर इंटरव्यू तक की रणनीति बनाने में पूरा योगदान दिया। इस दौरान मां डा. अमिता बिरला और पिता लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी स्वयं पर विश्वास बनाए रखने को प्रेरित किया।

​युवाओ और पैरेंट्स की नए विषय के लिए प्रेरित करने की कोशिश

अंजली ने कहा कि भले ही परीक्षा की तैयारी वह कर रही थीं । लेकिन पूरा परिवार हर समय उनकी सहायता व सहयोग के लिए तैयार खड़ा रहता था। उन्होंने आगे कहा कि कोटा में अभिभावक आमतौर पर बच्चों को बायोलॉजी या मैथ्स लेने के लिए ही प्रेरित करते हैं। जबकि इन दोनों विषयों के इतर भी बहुत बड़ी दुनिया है। उनका प्रयास रहेगा कि यहां भी न सिर्फं युवाओं बल्कि उनके अभिभावकों को भी अन्य विषयों का चयन कर एक नई दुनिया की खोज करने को प्रेरित कर सकें।

10 से 12 घंटे की पढ़ाई, नए क्षेत्र में परिवार का नाम करना है रोशन


अंजली ने बताया कि उन्होंने प्रतिदिन 10 से 12 घंटे परीक्षा की तैयारी की। परीक्षा के लिए भी उन्होंने पॉलिटिकल साइंस और इंटरनेशनल रिलेशन्स विषय चुने थे। परिवार में राजनीतिक माहौल होने के बाद भी प्रशासनिक सेवाओं के क्षेत्र में जाने के सवाल पर अंजली ने कहा कि पिता राजनीतिज्ञ हैं, मां चिकित्सक हैं । परिवार के सभी अन्य सदस्य भी किसी न किसी रूप में सामाजिक सेवा के क्षेत्र से जुड़े हैं। वे भी अपनी मेहनत से स्वयं के पैरों पर खड़ा होकर एक अलग दृष्टिकोण से परिवार से अलग एक नए क्षेत्र में समाज की सेवा करना चाहती थीं। लिहाजा यूपीएससी परीक्षाओं की ओर रूख किया।

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र करना है काम

अंजली ने कहा कि वे किसी भी विभाग से जुड़कर सेवा देने को तैयार हैं, लेकिन महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलने पर उन्हें विशेष खुशी मिलेगी।

VANITA GUPTA - वनिता गुप्ता अमेरिका में एसोसिएट अटॉर्नी जनरल नामित

अलीगढ़ की वनिता गुप्ता अमेरिका में एसोसिएट अटॉर्नी जनरल नामित


अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने 46 वर्षीय वनिता गुप्ता को एसोसिएट अटॉर्नी जनरल के पद के लिए नामित किया है। अलीगढ़ में खबर पहुंचने के बाद महावीरगंज एवं मानिक चौक क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है। वनिता का संबंध महानगर के महावीरगंज के कोठीवाल परिवार से है।वनिता के दादा फूल प्रकाश गुप्ता (वार्ष्णेय) और पिता राजीव लोचन महावीरगंज के निवासी हैं। महावीरगंज का दाऊजी मंदिर कोठीवाल परिवार से संबंधित है। फूल प्रकाश उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता के रूप में सेवानिवृत्त हुए। राजीव के जन्म के समय उनके पिता फूल प्रकाश मुजफ्फरनगर में तैनात थे। मां कमला गुप्ता हैं। वनिता गुप्ता अमेरिका की सम्मानित मानवाधिकार वकीलों में से हैं। वनिता गुप्ता सिविल राइट्स वकील और अमेरिकी सिविल लिबर्टी यूनियन की सर्वोच्च वकील हैं।

CAPT. JOYA AGRAWAL - जोया अग्रवाल A SUPER PILOT

 CAPT. JOYA AGRAWAL - जोया अग्रवाल A SUPER PILOT


साभार: दैनिक भास्कर

Wednesday, January 6, 2021

ASHIMA GOYAL IAS

 ASHIMA GOYAL IAS 




साभार: वैश भारती  

RAHUL KESARWANI - A NEW ENTREPRENEUR

6 महीने पहले टिकटॉक जैसा ऐप लॉन्च किया, 50 लाख डाउनलोड्स भी हुए; हर महीने 4 लाख रु. कमाई

प्रयागराज के रहने वाले राहुल केसरवानी ने हाल ही में एक ऑनलाइन ऐप लॉन्च किया है जिसे काफी पसंद किया जा रहा है।

आज की कहानी प्रयागराज के रहने वाले राहुल केसरवानी की। राहुल ने इंजीनियरिंग करने के बाद कई कंपनियों में अच्छी सैलरी पर काम किया। लेकिन, वो कुछ कुछ इनोवेटिव करना चाहते थे, जिससे उनकी पहचान बने। पिछले साल मई-जून में उन्होंने एक ऑनलाइन ऐप लॉन्च किया। यह ऐप टिकटॉक जैसा ही है, जो अब काफी पॉपुलर हो चुका है। 50 लाख से ज्यादा लोग इसे डाउनलोड कर चुके हैं। राहुल अब इससे हर महीने 3 से 4 लाख रुपए कमा रहे हैं।

राहुल बताते हैं- मेरी इंजीनियरिंग तक की पढ़ाई प्रयागराज से ही हुई है। 2016 में मेरा कैंपस सेलेक्शन हो गया और गुडगांव में मेरी नौकरी लग गई। वह बड़ी कंपनी थी और मुझे काम सीखना था, इसलिए मैंने वह नौकरी छोड़कर नोएडा में एक स्टार्टअप ज्वाइन किया, हॉटस्टार की तर्ज पर फुटबाल मैचों की लाइव स्ट्रीमिंग करता था। इसके बाद एक सोशल ऐप में काम करने लगा, जो गुमशुदा लोगों को ढूंढने का काम करता था। लगभग 150 लोगों को हमने इस ऐप के जरिए ढूंढा था।

राहुल बताते हैं कि जब ऐप लॉन्च किया तो 25 लाख रुपए का कर्ज लेना पड़ा था। अब 50 लाख लोग इसे डाउनलोड कर चुके हैं।

2018 में छोड़ी 13 लाख सालाना की नौकरी

राहुल बताते हैं कि चूंकि मन में अपना कुछ करने का सपना था, इसलिए मैंने 2018 में यह नौकरी भी छोड़ दी। कॉलेज टाइम से ही मैं अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर वेबसाइट और सॉफ्टवेयर बनाने का काम करता था। आज भी प्रयागराज में कई स्कूल हमारे क्लाइंट हैं। ऐसे में मेरा एक काम चल रहा था। इसी बीच कोरोना आ गया, तो हमें सोचने का वक्त मिल गया।

वो कहते हैं कि इस ऐप को लॉन्च करने से पहले कुछ चाइनीज ऐप बैन हो चुके थे। टिकटॉक के मुकाबले जो ऐप मार्केट में मौजूद थे, वो उतना बेहतर नहीं कर पा रहे थे। इसी दौरान मैंने तय किया कि एक ऐसा ऐप लॉन्च किया जाए, जो टिकटॉक को टक्कर दे सके। वो कहते हैं कि किस्मत ने भी मेरा साथ दिया और कुछ दिनों बाद ही टिकटॉक बैन हो गया। इसका फायदा ये हुआ कि जो ट्रैफिक टिकटॉक को मिलता था, उसका एक बड़ा हिस्सा हमारी तरफ शिफ्ट हो गया।

राहुल की पढ़ाई-लिखाई प्रयागराज में ही हुई। यहीं पर उन्होंने इंजीनियरिंग भी की। वो अपना बिजनेस भी यहीं से कर रहे हैं।

20 से 25 लाख का कर्ज था
राहुल बताते हैं कि जब हमने इसे लॉन्च किया, तो सर्वर के लिए बहुत सारा पैसा मार्केट से उठाना पड़ा। लगभग 20 से 25 लाख का कर्ज था। हम सोच नहीं पा रहे थे कि इसे कैसे उबरेंगे। क्योंकि टिकटॉक को हराना आसान नहीं था। एक वक्त तो ऐसा भी आया कि हमारा सर्वर ही बैठ गया, लेकिन हमने समस्या सुलझाई और आगे बढ गए। आज 6 महीने के अंदर ही हमारा ऐप लोगों के बीच लोकप्रिय हो चुका है। हम इसे और बेहतर करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। हमने एक कंपनी भी बनाई है जिसमें 25 लोग काम कर रहे हैं।

राहुल केसरवानी ने एक कंपनी भी बनाई है। जिसमें उन्होंने युवाओं को रोजगार दिया है। यहां अभी 25 लोग काम कर रहे हैं।

पिता ने विरोध किया लेकिन मां ने साथ दिया

प्रयागराज में ही राहुल के पिता किराना की दुकान चलाते हैं। मध्यमवर्गीय परिवार होने के नाते पिता गुरु प्रसाद केसरवानी चाहते थे कि उनका बेटा अच्छी तरह से सेटल्ड हो जाए। बार-बार अच्छी नौकरी बदलना और फिर नौकरी छोड़ देना उन्हें पसंद नहीं था। राहुल बताते हैं कि पिता चाहते थे कि मैं एक स्थायी काम करूं, जबकि मां चाहती थी कि जो मेरा मन है वह करूं। इस बात को लेकर पापा कुछ दिनों तक नाराज भी रहे। लेकिन, अब जब अच्छी कमाई हो रही है तो वे काफी खुश हैं।

साभार: दैनिक भास्कर 

PAKAJ MITTAL - पंकज मित्थल बने जम्मू-कश्मीर के चीफ जस्टिस

मेरठ कालेज के इस पुरातन छात्र ने बढाया जिले का गौरव, पंकज मित्थल बने जम्मू-कश्मीर के चीफ जस्टिस


इलाहाबार हाईकोर्ट के जज पंकज मित्तल ने एक बार फिर से मेरठ का नाम चमका दिया। मेरठ में पले और पढे पंकज मित्तल को जम्मू-कश्मीर का चीफ जस्टिस बनाया गया है। इससे न केवल मेरठ का बल्कि मेरठ कॉलेज का गौरव एक बार फिर बढ़ गया है। न्यायमूर्ति पंकज मित्थल को जम्मू-कश्मीर का चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया है। न्यायमूर्ति पंकज मित्तल इस कालेज के पुरातन छात्रों में से एक हैं। पंकज मित्तल की इस नियुक्ति पर शिक्षकों और पुरातन छात्रों में खुशी की लहर है। इससे पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के रहने वाले सत्यपाल मलिक जम्मू कश्मीर के नए राज्यपाल बनाए गए थे। सत्यपाल मलिक भी मेरठ कालेज के पुरातन छात्रों में एक रहे हैं।

ईस्टर्न कचहरी रोड निवासी न्यायमूर्ति पंकज मित्थल ने 12वीं तक की पढ़ाई सेंट मैरीज से की। इसके बाद वे स्नातक करने इलाहाबाद चले गए। उन्होंने सन 1985 में मेरठ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई की। वर्ष 2006 में उनका चयन एडिशनल डिस्ट्रिक जज के पद पर हुआ। वे अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में सीनियर जज के पद पर थे। न्यायमूर्ति पंकज मित्थल के पिता नरेंद्र नाथ मित्तल भी हाईकोर्ट में जज रहे। मेरठ कॉलेज का बीएनएम हॉस्टल उनके दादा ब्रजनाथ मित्तल के नाम पर है। बेटे विनायक मित्थल इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं।

मेरठ कॉलेज के प्राचार्य डॉ. युद्धवीर सिंह, डॉ. राजकुमार सांगवान, एडवोकेट नागेंद्र सिंह, एडवोकेट रमन गुप्ता, नितिन मित्तल ने कहा कि यह मेरठ के लिए गर्व की बात है। न्यायमूर्ति पंकज मित्तल ने हाईकोर्ट प्रयागराज से बिदाई समारोह में मेरठ और प्रयागराज के लोगों का हार्दिक अभार जताया। उन्होंने मेरठ की अपनी बचपन की यादों को ताजा करते हुए कहा कि उनका बचपन मेरठ की गलियों में बीता है। जिसे वो कभी भूल नहीं पाएंगे। पश्चिम उप्र हाईकोर्ट बेंच संघर्ष समिति मेरठ के पूर्व अध्यक्ष अधिवक्ता प्रबोध कुमार शर्मा का कहना है कि यह मेरठ के लिए एक गौरव की बात है कि मेरठ में पढ़े और पले एक जज जम्मू और कश्मीर के चीफ जस्टिस बने हैं। उन्होंने कहा कि हम लोगों के लिए खुशी का अवसर है।

Monday, January 4, 2021

VISHESH GARG - CAT TOPPER 2020

हिमाचल के विशेष गर्ग ने CAT में हासिल किए 99.99 फीसद अंक, सुंदर पिचाई से हुए प्रेरित


हिमाचल के छात्र विशेष गर्ग ने कैट की परीक्षा में 99.99 फीसद अंक हासिल कर न केवल शहर बल्कि हिमाचल प्रदेश का नाम रोशन किया है। विशेष गर्ग सोलन के सेंटलुक्स स्कूल से पढ़े हैं। इसके बाद एनआइटी हमीरपुर से बीटेक इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में किया।

हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन के छात्र विशेष गर्ग ने कैट की परीक्षा में 99.99 फीसद अंक हासिल कर न केवल शहर, बल्कि हिमाचल प्रदेश का नाम रोशन किया है। विशेष की इस उपलब्धि से प्रदेश के लोगों में खुशी का माहौल है। विशेष गर्ग सोलन के सेंटलुक्स स्कूल से पढ़े हैं। इसके बाद एनआइटी हमीरपुर से बीटेक इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में किया। यहां डॉक्‍टर अशोक इनके शिक्षक रहे थे। वर्तमान में बेंगलुरु में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं। विशेष गर्ग ने बताया वह पढ़ाई का दिमाग पर प्रेशर नहीं आने देते थे।

गर्ग का कहना है कि कैट परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होंने केवल उन्हीं टॉपिक पर अपना ध्यान केंद्रित किया जिनमें वह कमजोर थे। नौकरी के साथ साथ पढ़ाई करना बेहद मुश्किल था, लेकिन इसका बेहतर प्रबंधन किया और रात के समय शांत माहौल में पढ़ाई की आदत बनाई। अवकाश के दिन वह पढ़ाई के साथ साथ कसरत पर पूरा ध्यान देते।

गर्ग ने कहा अध्ययन सामग्री आसानी से उपलब्ध है, लेकिन कोचिंग मेरे लिए मददगार थी। उनका कहना है कि देश के टॉप आइआइएम में एडमिशन लेकर एमबीए उत्‍तीर्ण कर एक अच्छा उद्यमी बनना उनका लक्ष्य है। पिता नरेश गर्ग बेटे की उपलब्धि से काफी उत्साहित हैं। (CAT यानी Common Admission Test) कैट परीक्षा में देश भर में अव्वल रहना बड़ी उपलब्धि है।

विशेष गर्ग ने बताया कि वह हमेशा एक प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहते थे, लेकिन सत्या नडेला और सुंदर पिचाई की सफलता की कहानियों ने उन्हें करियर की पसंद के रूप में मैनेजमेंट करने के लिए प्रेरित किया। कैट में 99.99 प्रतिशत के साथ परीक्षा पास करने के बाद उन्हें अब एहसास हुआ है कि मेहनत और लगन से पढ़ाई और काम करने पर कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। विशेष गर्ग ने बताया कि वह पढ़ाई, नौकरी व कोचिंग के साथ साथ खुद को रिलैक्स रखना नहीं भूले। इसके लिए वह म्यूजिक सुनते और सवेरे व शाम को पैदल लंबी वाक पर निकलते थे। ऐसा करने से वह मानसिक दबाव नहीं आने देते थे।

लेख साभार: दैनिक जागरण 

Thursday, December 24, 2020

ऋतू राठी बनी गुजरात वैश्य महासम्मेलन गुजरात की प्रभारी

 

ऋतू राठी बनी गुजरात वैश्य महासम्मेलन गुजरात की प्रभारी 


Friday, December 18, 2020

DR. AMIT MAHESHWARI

DR. AMIT MAHESHWARI - जिसके पास फीस भरने के पैसे नहीं थे, आज 200 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक हैं


अमित ने महज 19 साल की उम्र से काम करना शुरू कर दिया था। अभी 42 साल के हैं और 200 करोड़ से ज्यादा टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक हैं।

कभी होम ट्यूटर थे, फिर खुद का कोचिंग इंस्टीट्यूट शुरू किया, मोबाइल सुधारना भी सीखा, अब मेटास ओवरसीज लिमिटेड के CEO हैं

जब कोचिंग पढ़ाते थे, तब महीने का 15 हजार रुपए कमाते थे फिर इंस्टीट्यूट शुरू किया तो कमाई 4 लाख तक पहुंची, फिर अपनी कंपनी बनाई

बचपन से ही मुझे लगता था कि मैं एक रईस परिवार से हूं, क्योंकि हम भाई-बहनों के पास पहनने को दो-दो, तीन-तीन शूज होते थे। तीन-तीन यूनिफॉर्म होती थीं, लेकिन जब मैंने 12वीं पास की और कॉलेज में एडमिशन लेने का वक्त आया, तब पता चला कि हम रईस नहीं हैं, बल्कि हमें जरूरत की सब चीजें मां-बाप ने उपलब्ध करवाई हैं। सच्चाई ये थी कि हमारे पास बीकॉम फर्स्ट ईयर में 12 हजार रुपए फीस भरने को नहीं थे और हम जेजे कॉलोनी में रहते थे। उस दिन लगा कि दुनिया हम से बहुत आगे है और अब हमें भी अपने पैरेंट्स को सपोर्ट करने के लिए कुछ करना होगा।

ये कहानी है दिल्ली के डॉ. अमित माहेश्वरी की। वो कहते हैं, 'मुझे कॉलेज की फीस भरनी थी और मैं सोचने लगा था कि क्या किया जाए, जिससे पैसे आएं। मैं अकाउंट में अच्छा था। मैंने सोचा अकाउंट की कोचिंग लेता हूं। उससे जो पैसा आएगा, वो कॉलेज में जमा कर दूंगा। कई कोचिंग इंस्टीट्यूट में गया, लेकिन किसी ने काम नहीं दिया। उनका कहना था कि तुम खुद ही अभी 12वीं पास हुए हो, ऐसे में तुम्हें टीचर की नौकरी कैसे दे सकते हैं। कई दिनों घूमने के बाद मैंने दीवारों पर होम ट्यूटर के पोस्टर लगे देखे। उन्हें देखकर मैंने भी अपने नाम के पोस्टर और नंबर इधर-उधर चिपका दिए।'


अमित कहते हैं कि किसी भी काम को शुरू करने की क्लोजिंग डेट पहले डिसाइड होना जरूरी है।

1200 रुपए की फीस में पढ़ाना शुरू किया

वो बताते हैं कि पोस्टर चिपकाने के कुछ दिन बाद कॉल आना शुरू हुए। एक पैरेंट ने बुलाया। उन्हें मेरे पढ़ाने का तरीका अच्छा लगा तो उन्होंने 1200 रुपए फीस में अपने बच्चे को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी। फिर और भी कॉल आए। मैं कई घरों में जाकर बच्चों को पढ़ाने लगा। 1200 की जगह 1500 रुपए फीस लेने लगा। जब काम बढ़ा तो कोचिंग वालों का लगा कि ये लड़का कॉम्पीटिशन दे रहा है तो उन्होंने उनकी कोचिंग में मुझे टीचिंग के लिए ऑफर दिया, लेकिन फिर मैं उन इंस्टीट्यूट में नहीं गया, जिन्होंने मुझे पहले रिजेक्ट किया था। एक दूसरे इंस्टीट्यूट में गया। वहां 40 बच्चों के बैच को पढ़ाने का मौका मिला। इसके बाद मुझे आइडिया आया कि क्यों न खुद का ही कोचिंग इंस्टीट्यूट खोल लिया जाए।

अमित कहते हैं, 'फिर घर के फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरा था, उसमें कोचिंग पढ़ानी शुरू कर दी। काम अच्छा चल पड़ा। महीने का 15 से 20 हजार रुपए कमा लेता था। दो साल बाद बहन ने भी 12वीं पास कर ली तो वो इंग्लिश पढ़ाने लगी। जो बच्चे मेरे पास अकाउंट और इंग्लिश पढ़ने आते थे, वो फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स के लिए दूसरी जगह जाते थे। तो मैंने अपने दोस्तों से बात की। उन्हें अपने यहां पढ़ाने के लिए कहा। कुछ तैयार हो गए और हम सभी सब्जेक्ट्स अपने इंस्टीट्यूट में ही पढ़ाने लगा। फिर दो साल बाद सबसे छोटी बहन भी हमारे साथ आ गई।'

वो कहते हैं कि मेरे एग्जाम थे तो मैंने दूसरे टीचर्स को इंस्टीट्यूट संभालने का कहा। उन्होंने बढ़िया काम किया तो लगा कि जब ये संभाल ही सकते हैं तो क्यों न कोचिंग की और ब्रांच बढ़ाई जाएं। मैंने एक ब्रांच और खोल दी। फाइनल ईयर में आते-आते मेरे इंस्टीट्यूट की आठ ब्रांच हो गई थीं। 350 से 400 स्टूडेंट्स आ रहे थे। मंथली अर्निंग करीब 4 लाख रुपए हो गई थी।

उन्होंने कहा, 'इंस्टीट्यूट्स को मैनेज करने के लिए मैंने नोकिया का एक सेकंड हैंड फोन खरीदा। उसमें कुछ दिक्कत आई तो रिपेयर करवाने ले गया। टेक्नीशियन ने 10 मिनट में फोन ठीक कर दिया और 2 हजार रुपए लिए। मुझे लगा मैं महीनेभर एक बच्चे को पढ़ाकर दो हजार कमा पाता हूं और इसने 10 मिनट में 2 हजार कमा लिए। उस समय मोबाइल मार्केट में बूम भी आ रहा था। मैंने उस टेक्नीशियन से पूछा कि तुम महीने का कितना कमा लेते हो तो उसने कहा 25 से 30 हजार हो जाता है। मैंने कहा मैं 30 हजार और दूंगा, तुम मुझे मोबाइल रिपेयर करना सिखाओ।'

वो बताते हैं कि टेक्नीशियन ने कई चीजें मुझे सिखाईं। फिर मैंने इसके टेक्निकल पार्ट की ऑनलाइन स्टडी की। सबकुछ समझने के बाद मोबाइल रिपेयरिंग कोर्स का सिलेबस तैयार किया और अपनी कोचिंग में इसे लॉन्च कर दिया। पहली ही बैच में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला। 40 बच्चों का बैच था और एक से हम 15 हजार रुपए फीस ले रहे थे। हमारा प्रॉफिट पांच गुना बढ़ गया। कुछ ही महीनों में मैंने अपनी सभी ब्रांच पर ये कोर्स शुरू करवा दिया।

अमित ने कहा, 'काम अच्छा मिलने लगा तो हमने फ्रेंचाइजी देने का प्लान किया। एक न्यूज चैनल में 22 हजार रुपए का स्लॉट बुक किया और फ्रेंचाइजी का विज्ञापन दिया। इससे पूरे दिल्ली से मेरे पास इंक्वायरी आईं और कई फ्रेंचाइजी शुरू हो गईं। इससे करीब 8 लाख रुपए मुझे मिले। जिससे मैंने अपनी कंपनी में कॉरपोरेट सिस्टम शुरू किया। ऑफिस का रिनोवेशन किया। बहुत सी नई चीजें शुरू कर दीं। इस दौरान मेरी पढ़ाई भी चल रही थी। एमकॉम, एमफिल, पीएचडी की और फिर एमबीए भी किया। ये सब होते-होते 2012 आ गया। ये वो दौर था, जब फोन की टेक्नोलॉजी का मार्केट डाउन होने लगा था तो हम लैपटॉप, टेबलेट, डिजिटल कैमरा रिपेयरिंग में एंटर हुए। इसकी फीस 50 हजार रुपए थी यानी मोबाइल रिपेयरिंग कोर्स से भी ज्यादा।'

अमित मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं। उनका लक्ष्य 2025 तक कंपनी का आईपीओ लॉन्च करने का है।

स्टील को समझने जर्मनी गए
उन्होंने बताया कि इन सबके बीच मेरे मन में हमेशा ये चलता रहता था कि हम और क्या कर सकते हैं। कैसे और आगे बढ़ सकते हैं। मैंने ऑब्जर्व किया कि इंडिया में स्टील का यूज बहुत तेजी से बढ़ रहा है। स्टील मार्केट की स्टडी की तो पता चला कि स्टील किंग तो जर्मनी है। वहीं से सब जगह फैला है। मैं जर्मनी गया और देखा कि वहां काम कैसे होता है। पूरी प्रॉसेस समझी। वहीं मैं डिसाइड कर चुका था कि इस फील्ड में काम करना है। वापस लौटकर स्टील मैन्यूफैक्चरिंग का काम शुरू कर दिया। 2014 में मेरी बन कंपनी Mettas ओवरसीज लिमिटेड बन चुकी थी।

'हमने स्टेनलेस स्टील मॉड्यूलर किचन, वार्डरोब, बाथरूम वैनिटी, और स्टील इंटीरियर का काम शुरू किया। मुझे फ्रेंचाइजी का एक्सपीरियंस था। प्रोडक्ट भले ही अलग हो, लेकिन ये पता था कि बेचना कैसे है। इसके बाद मैंने फ्रेंचाइजी मॉडल पर काम शुरू किया और 25 लाख रुपए के विज्ञापनों के जरिए कई जगह फ्रेंचाइजी दी। 2014 में हमारी कंपनी के 22 शोरूम हो गए थे। 2020 आते-आते 33 एक्सक्लूसिव शोरूम, 150 डीलरशिप शोरूम, 16 हजार से ज्यादा बिजनेस एसोसिएट पार्टनर और 126 इम्प्लॉई हो गए। पिछले फाइनेंशियल ईयर में कंपनी का टर्नओवर 220 करोड़ रुपए था। अब मेरा विजन 2025 तक कंपनी का आईपीओ लॉन्च करने का है।'

अमित कहते हैं कि लोग अक्सर पूछते थे कि फ्रेंचाइजी कैसे देते हैं, तो मैंने इसका भी एक कोर्स शुरू किया और कंसल्टिंग करने लगा। जिंदगी से मैंने यही सीखा है कि, हर काम की ओपनिंग नहीं, बल्कि क्लोजिंग डेट तय करो। कब किस काम को पूरा करना है, ये आपको पता होना चाहिए। जिस भी काम में आप अपना सौ प्रतिशत देंगे, उसमें आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। जब हम नया काम शुरू करते हैं तो शुरूआत में थोड़ा पीछे भी जाते हैं, कठिनाइयां भी आती हैं, लेकिन सफलता भी मिलती है। यहां मेरी सिर्फ ऊपर जाने की कहानी है, इन सबके बीच में कई दिक्कतें आईं, लेकिन हर दिक्कत ने एक नई राह मुझे दिखाई।

साभार: दैनिक भास्कर 

Thursday, December 17, 2020

ABHIJITA GUPTA - अभिजिता गुप्ता - देश की सबसे छोटी उम्र की लेखिका

ABHIJITA GUPTA - अभिजिता गुप्ता 

मिलिए देश की सबसे छोटी लेखिका अभिजिता गुप्ता से,महज़ 7 साल की उम्र में अपने नाम दर्ज़ किये कई रिकॉर्ड


 कहते है उम्र आपकी काबिलियत की पहचान नहीं होती महज़ 7 साल की इस बच्ची ने इस बात को साबित कर दिया। जिस उम्र में आप और हम माटी में सने रहते थे और मोहल्ले भर की खाक छानते फिरते थे उस उम्र में अभिजिता ने पूरी किताब लिख दी। जी हाँ आप भी हैरान रह गए न ये कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है।


दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस के ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर में सबसे युवा लेखिका अभिजीता की किताब “हेप्पीनेस आल अराउंड ” का विमोचन हुआ। इस किताब को महज़ 7 साल की नन्ही लेखिका अभिजिता गुप्ता ने लिखी है। इस किताब में कहानियो और कविताओं का संग्रह है। अभिजिता को इस किताब के लिए कई सारे अवार्ड्स मिल चुके है। अभिजिता अपने नाम कई रिकार्ड्स भी कर चुकी है। एशिया बुक ऑफ़ रेकॉर्डस,इंटरनेशनल बुक ऑफ़ रेकॉर्डस में अपना नाम दर्ज़ करवा चुकी है। अभिजीता ने इस किताब को महज़ 3 महीनो में लिखी है। अभिजिता की किताब बच्चो के बिच में काफी पसंद की जा रही है।


अभिजीता ने बातचीत में बताया उन्होंने ये किताब 3 महीने में पूरी की जिसमे उनके मम्मी पापा ने उनकी खूब मदद की। आगे वह एक नोबल लिखना चाहती है जिसमे वह यह बताना चाहती है की लॉकडाउन के समय बच्चो के जीवन में क्या बदलाव आये।

वही जब उनकी मम्मी अनुप्रिया जी से बातचीत की तो उन्होंने बताया की अभिजिता जब 5 साल की थी तभी पहली बार उसने मुझे कहा की मुझे कहानी लिखनी है उसके बाद इस पेन्डामिक के समय हमें काफी समय मिला तो अभिजिता ने अपनी किताब को लिखा। वही पिता आशीष जी ने बताया की हमारे समय में हमारे पेरेंट्स हमें बताते थे हमें क्या करना है लेकिन आज की पीढ़ी अपने माता पिता को बताती है। इस किताब के नाम के लिए हम काफी परेशान थे इसका नाम भी अभिजीता ने हमें सुझाया। वही किताब के पब्लिशर ने बातचीत में बताया की ये काफी चैलेंजिंग था लेकिन हम लकी है की हमें अभिजिता की किताब पब्लिश करने का मौका मिला

जश्न इवेंट के डायरेक्टर सिमा सक्सेना जी ने बातचीत में बताया की जब पहली बार हमें पता चला तो हमें यकीं नहीं हुआ लेकिन जब मै अभिजिता से मिली तो मैं हैरान थी की कैसे महज़ 7 साल की उम्र में कोई किताब लिख सकता है।

सभी लोगो ने अभिजीता को बधाई सन्देश भेजे। आपको बता दे अभिजिता राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त और संत कवी श्री सियाराम शरण गुप्त की तीसरी पीढ़ी है।

AGASTYA JAYSWAL - अगस्त्य जयसवाल

 अगस्त्य जयसवाल 


14 साल की उम्र में।
बी.ए जनरलिज्म की परीक्षा।
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है।
अगस्त्य जयसवाल।14 साल में। स्नातक। प्राप्त करने वाला हिंदुस्तान का यह पहला लड़का बना जो कि कम उम्र में। journalism में। स्नातक किया।

Sunday, December 6, 2020

SOUMYA AGRAWAL IAS

SOUMYA AGRAWAL IAS वतन की मोहब्बत ने आसान कर दिया जिंदगी का सफर, साॅफ्टवेयर इंजीनियरिंग छोड़ बनीं IAS


पावर कॉरपोरेशन की एमडी आइएएस सौम्या अग्रवाल ने लंदन से नौकरी छोड़कर शुरू की थी यूपीएससी की तैयारी। प्रथम बार में ही पास की थी यूपीएससी की परीक्षा दो जिलों में रह चुकीं हैं जिलाधिकारी। 2008 बैच की हैं आइएएस ऑफीसर।

 वतन की मोहब्बत और मेरा पहला इम्तिहान। जिसे मैंने गंभीरता से लिया। उसने मेरी जिंदगी के सफर को इतना आसान बना दिया कि मैंंने पिताजी के भरोसे को फतह किया और दादाजी की ख्वाहिश पूरी कर दी। नौकरी को अलविदा कहने के दो वर्ष बाद नई पारी की शुरुआत हुई और मैं करियर में एसडीएम, सीडीओ, डीएम से लेकर एमडी तक की ऊंचाई पर सुखद अहसास के साथ चढ़ गई।

यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि आइएएस व दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (डीवीवीएनएल) की प्रबंध निदेशक (एमडी) सौम्या अग्रवाल की है। उन्होंने दैनिक जागरण से साथ बचपन से लेकर एमडी की कुर्सी तक पहुंचने के सफर की दांस्ता बयां की है। सौम्या की प्राथमिक शिक्षा नवाबों के शहर लखनऊ में पूरी हुई। पिता ज्ञानचंद अग्रवाल रेलवे में सिविल इंजीनियर थे। उनका परिवार आलमबाग की रेलवे कालोनी में रहता है। वह हमेशा साइकिल से स्कूल जाती थीं।


सेंट मैरी कांवेंट स्कूल से इंटरमीडिएट पास करने वाली अग्रवाल परिवार की बेटी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया, लेकिन दिल्ली पहुंचने तक भी पढ़ाई की अहमियत को गंभीरता से नहीं समझा। दोस्तों के साथ रहते-रहते दिल्ली में ही साफ्टवेयर इंजीनियर बन गईंं और वर्ष 2004 में पुणे की एक निजी कंपनी में नौकरी मिल गई। कुछ दिन पुणे में रहना हुआ। फिर कंपनी ने ही लंदन भेज दिया। पढ़ाई पूरी हुई और नौकरी मिली जरूर, पर सौम्या के मन को संतुष्टि नहीं मिली। उन्हें लंदन में हमेशा अपने देश की याद सताती रही और देश की वह अवाम याद आती रही, जिसके लिए वह कुछ करना चाहती थीं। इसके अलावा मां-बाप से इतना दूर चला जाना भी उन्हें भड़का रहा था। दो वर्ष की नौकरी में ही कीबोर्ड पर ऊंगलियां कतराने लगीं और सौम्या उसकी टपटप से ऊब चुकी थीं। उन्होंने सारा माजरा पिता को बताते हुए पूछ लिया कि भारत में सबसे उच्च स्तर की नौकरी कौन सी है तो उनके पिता ने आइएएस का जिक्र कर दिया। सौम्या ने उसी वक्त ठान ली, कि आइएएस बनना है। उन्होंने पिता को आश्वास्त किया और वर्ष 2006 में नौकरी छोड़ भारत लौट आईं। लखनऊ में ही सौम्या ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तैयारी शुरू कर दी। हालांकि तीन माह दिल्ली के बाजीराव संस्थान में जरूर कोचिंग की थी। उन्होंने एक वर्ष की कड़ी मेहनत से पहली बार में ही यूूपीएससी का इम्तिहान को समेट कर रख दिया। परीक्षा के परिणाम की सूची में 24वें नंबर पर उनका नाम था और वर्ष 2008 में नवनियुक्त आइएएस सौम्या अग्रवाल ने कानपुर मेंं एसडीएम का कार्यभार संभाल लिया।

सिविल सर्विस में नहीं था परिवार का दूसरा सदस्य

सौम्या की बड़ी बहन पूजा अग्रवाल ने एमटेक करके निजी कंपनी में नौकरी शुरू कर दी। उनकी छोटी बहन जया अग्रवाल ने बिजनेस इकोनोमिक्स में पढ़ाई पूरी की और वह भी प्राइवेट नौकरी करने लगीं। सौम्या बताती हैं कि उनके दादाजी पीसी अग्रवाल पीडब्ल्यूडी में नौकरी करते थे। वे हमेशा कहते थे कि एक बार यूपीएससी की परीक्षा जरूर देनी चाहिए। मैने उनकी ख्वाहिश पूरी की है।

ये है एमडी तक का सफर

सौम्या की नौकरी की शुरुआत कानपुर से हुई। सर्वप्रथम वह कानपुर में उप जिलाधिकारी (एसडीएम) के पद पर तैनात हुईं। महाराजगंज में मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) और जिलाधिकारी (डीएम) रहीं। फिर उन्नाव में डीएम रहीं। फिर से उनकी तैनाती कानपुर में केस्को में बतौर एमडी हो गईंं और अब वह डीवीवीएनएल की प्रबंध निदेशक (एमडी) हैं। 

लेख साभार: दैनिक जागरण 

Saturday, December 5, 2020

Arham Om Talsania - youngest computer programmer

Arham Om Talsania - worlds youngest computer programmer


अहमदाबाद के छह साल के अरहम ओम तलसानिया ने दुनियाभर के सॉफ्टवेयर इंजीनियर को चौंका दिया है। उसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे युवा कंप्यूटर प्रोग्रामर के रूप में दर्ज हो गया है। उसने कम उम्र में पायथन प्रोग्रामिंग भाषा की परीक्षा को उत्तीर्ण कर गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज कराया है। उसने पहले से दर्ज पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश छात्र सात वर्षीय मुहम्मद हमजा शहजाद के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है। कक्षा 2 के छात्र अरहम ओम तल्सानिया ने पियर्सन वीयूई परीक्षण केंद्र में Microsoft प्रमाणन परीक्षा को मंजूरी दे दी है। तलसानिया ने बताया, “मेरे पिता ने मुझे कोडिंग सिखाई। जब मैंने 2 साल की थी तब मैंने उपयोग शुरू कर दिया था। 3 साल की उम्र में, मैंने iOS और विंडोज के साथ गैजेट्स खरीदे। बाद में, मुझे पता चला कि मेरे पिता पायथन में काम कर रहे थे। जब मुझे पायथन से मेरा प्रमाण पत्र मिला, तो मैं छोटे खेल बना रहा था। कुछ समय बाद, उन्होंने मुझे काम के कुछ सबूत भेजने के लिए कहा। कुछ महीने बाद, उन्होंने मुझे मंजूरी दी और मुझे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट मिला। तल्सानिया ने कहा, “मैं एक उद्यमी बनना चाहता हूं और सभी की मदद करना चाहता हूं। मैं कोडिंग के लिए ऐप, गेम और सिस्टम बनाना चाहता हूं।

मैं जरूरतमंदों की मदद करना चाहता हूं।अरहम तल्सानिया के पिता ओम तल्सानिया जो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, ने कहा कि उनके बेटे ने कोडिंग में रुचि विकसित की थी और उन्होंने उसे प्रोग्रामिंग की मूल बातें सिखाईं। “जब वह बहुत छोटा था तब से उसे गैजेट्स में बहुत दिलचस्पी थी। वह टैबलेट डिवाइस पर गेम खेलता था। वह पहेलियों को भी हल करता था।

जब उन्होंने वीडियो गेम खेलने में रुचि विकसित की, तो उन्होंने इसे बनाने के लिए सोचा। वह मुझे कोडिंग करते देखते थे, ”उन्होंने कहा। “मैंने उसे प्रोग्रामिंग की मूल बातें सिखाईं और उसने अपने छोटे खेल बनाने शुरू कर दिए। उन्हें Microsoft प्रौद्योगिकी सहयोगी के रूप में भी पहचान मिली। हमने गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए भी आवेदन किया था। यह परीक्षा 23 जनवरी 2020 को माइक्रोसाफ्ट द्वारा अधिकृत पियर्सन व्यू टेस्ट सेंटर में आयोजित की गई थी। यह परीक्षा बहुत ही कठिन होती है।

इसे बड़े-बड़े इंजीनियर भी उत्तीर्ण नहीं कर पाते। लेकिन अरहम ने इसे कर दिखाया। इस परीक्षा में अरहम ने 900 अंक हासिल किए और उसे माइक्रोसफ्ट टेक्नोलॉजी एसोसिएट के रूप में मान्यता मिली है। उसके पिता ओम तलसानिया पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और माता तृप्ति तलसानिया शिक्षक हैं। अरहम ने कहा कि पिता ने कोडिंग सिखाई।

Friday, December 4, 2020

Thursday, December 3, 2020

GOUTAM ADANI - बिल गेट्स को भी पीछे छोड़ा अडाणी ने

बिल गेट्स को भी पीछे छोड़ा अडाणी ने:कमाई के मामले में अंबानी हुए पीछे, गौतम अडाणी ने हर रोज कमाया 456 करोड़ रुपए


दुनिया के सबसे अमीरों की लिस्ट में मुकेश अंबानी 11वें स्थान पर पहुंचे
ब्लूमबर्ग बिलियनर्स इंडेक्स में गौतम अडाणी इंडेक्स में 40वें स्थान पर काबिज

महामारी के दौरान देश में प्रतिदिन सबसे ज्यादा कमाई करने वाले शख्स गौतम अडाणी हैं। उन्होंने प्रतिदिन कमाई के लिहाज से कई दिग्गजों के पछाड़ दिया है। इसमें रिलायंस ग्रुप के ओनर मुकेश अंबानी और माइक्रोसॉफ्ट के ओनर बिल गेट्स समेत कई अन्य शीर्ष कारोबारी शामिल हैं। ब्लूमबर्ग बिलियनर्स इंडेक्स के मुताबिक 2020 में गौतम अडाणी ने अबतक प्रतिदिन 456 करोड़ रुपए कमाए। इस लिस्ट में एलन मस्क टॉप पर हैं। मस्क ने प्रतिदिन 2.12 हजार करोड़ रुपए कमाए।

सबसे आगे एलन मस्क

इंडेक्स के मुताबिक जनवरी 2020 से 21 नवंबर तक एलन मस्क की संपत्ति 69 लाख करोड़ रुपए बढ़ी है। वहीं, गौतम अडाणी की नेटवर्थ में 1.48 लाख करोड़ रुपए की बढ़त दर्ज की गई। मुकेश अंबानी और बिल गेट्स की संपत्ति में भी 1 से 1.07 लाख करोड़ रुपए की बढ़त हुई है। दुनिया के सबसे अमीरों की लिस्ट में मुकेश अंबानी कुल नेटवर्थ 5.35 लाख करोड़ नेटवर्थ के साथ 11वें स्थान पर आ गए हैं, जो 8 अगस्त को चौथे स्थान पर थे। दूसरी ओर, गौतम अडाणी इंडेक्स में 40वें स्थान पर काबिज हैं।


नेटवर्थ में बढ़ोतरी
कंपनियों में प्रमोटर्स की हिस्सेदार अधिक होती है, तो मुनाफे में भी भागीदारी अधिक होती है। इससे कंपनी के मुनाफे से प्रमोटर्स यानी ओनर की नेटवर्थ भी बढ़ती है। इस लिहाज से गौतम अडाणी की कंपनियों ने शानदार मुनाफा कमाया है।

अडाणी की नेटवर्थ में बढ़त क्यों?

बाजार में अडाणी ग्रुप की 6 कंपनियां लिस्ट हैं। दूसरी तिमाही में अडाणी ग्रीन और अडाणी ट्रांसमिशन को छोड़ अन्य चार को अच्छा मुनाफा हुआ है। इसमें अडाणी गैस, अडाणी इंटरप्राइजेज, अडाणी पोर्ट और अडाणी पावर शामिल है।
ग्रुप की कंपनियों के शेयरों ने जनवरी से अबतक शानदार बढ़त दर्ज किया है। अडाणी ग्रीन का शेयर 550% तक ऊपर चढ़ा है। अडाणी गैस और अडाणी इंटरप्राइजेज के शेयरों में भी शानदार बढ़त देखने को मिली।
फोर्ब्स के मुताबिक अडाणी ग्रुप की आय 13 बिलियन डॉलर है, जो डिफेंस, पावर जनरेशन और ट्रांसमिशन, एडिबल ऑयल और रियल एस्टेट से आता है।

क्यों पिछड़े अंबानी?

पिछले साल की तुलना में सितंबर तिमाही में RIL का मुनाफा 15%घटा है।
16 सितंबर को RIL का शेयर 2,324.55 रुपए के भाव से ट्रेड कर रहा था, जो 20 नवंबर को 18% फिसलकर 1,899.50 पर बंद हुआ था।
NSE में 45 दिनों में रिलायंस ग्रुप का मार्केट कैप भी 15.68 लाख करोड़ रुपए से 2.97 लाख करोड़ रुपए घटकर 12.71 लाख करोड़ रुपए हो गया है।
फोर्ब्स के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज का रेवेन्यू 88 बिलियन डॉलर का है। कंपनी का मुख्य कारोबार पेट्रोकेमिकल, ऑयल एंड गैस, टेलीकॉम एंड रिटेल का है।

देश के सबसे अमीर अंबानी के सामने कहा टिकते हैं अडाणी -

ब्लूमबर्ग बिलियनर्स इंडेक्स के ताजा आंकड़ों के मुताबिक मुकेश अंबानी का टोटल नेटवर्थ 5.35 लाख करोड़ रुपए है। मुकेश एशिया के सबसे अमीर और दुनिया के 11वे सबसे अमीर शख्स हैं। वहीं, गौतम अडाणी का नेटवर्थ 2.32 लाख करोड़ रुपए है। दुनिया के सबसे अमीरों की लिस्ट में 40वें स्थान पर हैं।


कंपनियों का मार्केट कैप

रिलायंस ग्रुप के तहत 6 कंपनियां शेयर मार्केट में लिस्ट हैं। इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, डेन नेटवर्क, हैथवे केबल, नेटवर्क 18 मीडिया नेटवर्क, RIL इंडस्ट्रीयल इंफ्रा, हैथवे भवानी केबल शामिल हैं। BSE में केवल रिलायंस इंडस्ट्रीज का मार्केट कैप 12.84 लाख करोड़ रुपए है।
RIL में ऑयल, रिटेल, जियो और पेट्रोकेमिकल सहित अन्य प्रमुख कारोबार शामिल हैं।
अडाणी ग्रुप की कुल 6 कंपनियां शेयर बाजार में लिस्ट हैं। BSE में अडाणी ग्रुप की इन कंपनियों का टोटल मार्केट कैप 3.89 लाख करोड़ रुपए है। इसमें अडाणी ग्रीन का मार्केट कैप 1.77 लाख करोड़ रुपए है।


अन्य प्रमुख कारोबार

रिलायंस ग्रुप का प्रमुख कारोबार एनर्जी क्षेत्र का है। 2016 में कंपनी ने टेलीकॉम सेक्टर में इंट्री ली। वर्तमान में 35% हिस्सेदारी के साथ मार्केट लीडर है। इसके अलावा RIL रिटेल कारोबार में भी कारोबार को तेजी से बढ़ा रहा है। इसके तहत उसने फ्यूचर ग्रुप के रिटेल बिजनेस का 24 हजार करोड़ रुपए में अधिग्रहण किया है, जिसे CCI ने हाल ही मंजूरी दी है।

गौतम अडाणी को पोर्ट टायकून कहा जाता है। अडाणी गुजरात के सबसे बड़े और देश के सबसे व्यस्त मुंद्रा पोर्ट को ऑपरेट करते हैं। साथ ही कोल माइनिंग और अन्य नेचुरल रिसोर्सेस के क्षेत्र में अडाणी का कारोबार फैला हुआ है। गैस और बिजली वितरण, थर्मल पावर, रियल एस्टेट, ग्रॉसरी, एयरपोर्ट और एडिबल ऑयल सेगमेंट में भी ग्रुप की बड़ी हिस्सेदारी है। देश के सबसे व्यस्त मुंबई एयरपोर्ट में 74% हिस्सेदारी अडाणी के पास है।


अडाणी ग्रुप का फोकस

अडाणी ग्रुप आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम शहर में डेटा सेंटर के लिए अगले 20 सालों में 70 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेगी।
अडाणी इंटरप्राइजेज एयरपोर्ट बिजनेस के विस्तार में अगले 5 सालों में 50 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेगा।
लगभग एक दशक के बाद 2019 में अडाणी ग्रुप को ऑस्ट्रेलिया के 16 बिलियन डॉलर के कोल प्रोजेक्ट मामले में जीत हुई है। इससे सालाना लगभग 6 करोड़ टन कोयला उत्पादन का अनुमान है।
अडाणी ग्रुप केरल के त्रिवेंद्रम इंटरनेशनल एयरपोर्ट के अधिग्रहण पर काम कर रही है। यह अभी राज्य सरकार के साथ विवाद के चलते रुका हुआ है।
अडाणी ग्रीन एनर्जी ने इसी साल जून में 6 बिलियन डॉलर (44.50 हजार करोड़ रुपए) के पावर प्रोजेक्ट की घोषणा किया है।

रिलायंस ग्रुप का फोकस

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने अमेरिका की ब्रेकथ्रू एनर्जी वेंचर्स लिमिटेड II LP (BEV) में 50 मिलियन डॉलर यानी करीब 372 करोड़ रुपए का निवेश करेगी। RIL ने कहा है कि इस निवेश को लेकर दोनों कंपनियों के बीच समझौता हो गया है। ब्रेकथ्रू एनर्जी ग्रुप को माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स लीड करते हैं।
हाल ही में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने रिलायंस और फ्यूचर ग्रुप के डील को मंजूरी मिली है। इसके तहत रिलायंस, फ्यूचर ग्रुप के रिटेल, होलसेल, लॉजिस्टिक्स और वेयर हाउसिंग कारोबार का अधिग्रहण करेगी।
25 सितंबर से 9 नवंबर के बीच RIL ने रिटेल वेंचर में 10% हिस्सेदारी बेचकर 47 हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम जुटाई है।

साभार: दैनिक भास्कर 

HARSHIT BANSAL - हर्षित बंसल ने बनाया विश्व कीर्तिमान

 

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Wednesday, December 2, 2020

SANJEEV GOYAL - वैश्य गौरव

 SANJEEV GOYAL - वैश्य गौरव 

SANJEEV GOYAL - IITINS - VAISHYA GOURAV


साभार: अमर उजाला