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Wednesday, March 27, 2024

UTTARGUPTA VAISHYA RAJVANSH - उत्तर गुप्त वैश्य राजवंश

#UTTARGUPTA VAISHYA RAJVANSH - उत्तर गुप्त वैश्य राजवंश

सुप्रसिद्ध गुप्त राजवंश का अवसान 550-51 ईस्वी में हुआ और इसके साथ ही उत्तर भारतीय राजनीति में रिक्तता के साथ-साथ अस्थिरता एवं अराजकता का वातावरण भी उत्पन्न हुआ। गुप्त सम्राटों के अधीन उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले अनेक स्थानीय राजवंश इस रिक्तता को भरने के लिए अपनी शक्ति के संवर्धन में लग गये। परिणामतः उनमें प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुयी, जिसने पारस्परिक संघर्षों को जन्म दिया। कतिपय सामन्त राजवंश मगध और उसके पार्श्ववर्ती क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर साम्राज्यवादी शक्ति बनने का स्वप्न देखने लगे. ये सभी वैश्य कुल के राजवंश थे. इनमें उत्तर गुप्त, मौखरि एवं थानेश्वर के पुष्यभूति राजवंश का नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में उत्तर भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सभी राजवंशों के सन्दर्भ में प्रचुर सूचनाएं उपलब्ध नहीं हैं तथापि आभिलेखिक एवं साहित्यिक स्रोतों से उत्तर गुप्त, मौखरी एवं पुष्यभूति राजवंश के सन्दर्भ में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएं उपलब्ध हैं। अतएव इतिहासकारों ने इन राजवंशों का इतिहास उपलब्ध साक्ष्यों के समवेत विवेचन के आधार पर प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। गुप्तोत्तरकालीन इतिहास का विवरण प्रस्तुत करते हुए इस आलेख में भी क्रमशः उत्तरगुप्त राजवंश का इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं।

उत्तर गुप्त राजवंश के इतिहास को प्रकाशित करने वाले अभिलेखों में आदित्यसेन का अफसढ़ अभिलेख तथा जीवित गुप्त द्वितीय का देववर्णाक अभिलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त आदित्यसेन के समय के दो अभिलेख शाहपुर और मन्दार नामक स्थानों तथा विष्णुगुप्त के काल का एक अभिलेख मंगराव नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से ये विशेष सूचना प्रदायी नहीं हैं। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ये सभी लेख बिहार प्रान्त से प्राप्त हुए हैं। उदाहणार्थ अफसढ़ अभिलेख गया जिले में स्थित अफसढ़ नामक स्थान में मिला है, जो इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त से लेकर आदिसेन तक के काल के ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करता है। इससे हमें आदित्यसेन तक उत्तरगुप्त राजवंशावली का ज्ञान तो होता ही है साथ ही इससे उत्तरगुप्त मौखरी सम्बन्धों पर भी रोचक प्रकाश पड़ता है। देववर्णाक अभिलेख बिहार प्रान्त के शाहाबाद (आरा) जिले के देववर्णाक नामक स्थान से मिला है।

इस अभिलेख को प्रकाश में लाने का श्रेय कनिंघम महोदय को है। उन्होंने 1880 ईस्वी में इसे प्राप्त किया था। इस अभिलेख से उत्तरगुप्त राजवंश के अंतिम तीन शासकों देव गुप्त, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के काल के इतिहास के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं। इस प्रकार अफसढ़ एवं देववर्णाक से प्राप्त अभिलेख एक साथ दृष्टि में रखने पर हमें इस वंश के ग्यारह शासकों का अविच्छिन्न इतिहास ज्ञात हो जाता है। चूँकि कृष्ण गुप्त इस वंश का प्रथम शासक तथा जीवित गुप्त द्वितीय इस वंश का अन्तिम शासक था। अतः सम्प्रति इस राजवंश का सम्पूर्ण इतिहास न्यूनाधिक रूप से ज्ञात है, तथापि इस वंश के इतिहास के सम्बन्ध में अभी भी अनेक ऐसी सूचनाएँ हैं जो विवादस्पद बनी हुई हैं। जिनके सम्बन्ध में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर कोई निर्णायक मत व्यक्त करना दुष्कर है।

उत्पत्ति एवं आदि राज्य

उत्तर गुप्त राजवंश का संस्थापक कृष्ण गुप्त को अफसढ़ अभिलेख में ‘सदवंश’ में उत्पन्न बताया गया है। इससे केवल इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह किसी उच्चकुल से सम्बद्ध था। इससे अधिक उत्तर गुप्तों की उत्पत्ति के संबंध में हमें कोई सूचना नहीं मिलती। इस वंश के अधिकांश शासकों के नाम के साथ ‘गुप्त’ शब्द जुड़ा हुआ है। इससे इनके वैश्य होना सिद्ध होता हैं. अतः कतिपय विद्वानों के द्वारा यह सम्भावना व्यक्त की गई है कि ये चक्रवर्ती वैश्य गुप्त राजवंश से सम्बन्धित रहे होंगे।

ध्यातव्य है कि इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक का नाम आदित्यसेन मिलता है। सम्भवतः उत्तर गुप्त राजवंश, सम्राट गुप्तों के आधीन शासन करने वाला एक सामन्त राजवंश था। क्योंकि इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त को केवल नृप उपाधि प्रदान की गई है तथा इसके उत्तराधिकारी हर्ष गुप्त के नाम के साथ केवल आदर सूचक ‘श्री’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि चक्रवर्ती वैश्य गुप्तों से पृथक करने के लिए ही इतिहासकारों ने इस वंश को परवर्ती गुप्त वंश अथवा उत्तर गुप्त वंश कह कर सम्बोधित किया है। कुछ इतिहासकारों ने इस नामकरण पर आपत्ति भी की है। सुधाकर चट्टोपाध्याय का सुझाव था कि इस वंश का नामकरण उनके संस्थापक कृष्ण गुप्त के नाम पर करना चाहिए तथा इसे ‘कृष्ण गुप्तवंश’ कहा जाना चाहिए।

गुप्त राजवंश अथवा उत्तर गुप्त राजवंश अब इतिहासकारों के बीच अधिकांशतः स्वीकृत और बहुमान्य हो चुका है। उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र कौन सा था ? यह विषय आज भी विवादास्पद बना हुआ है। इस राजवंश के पश्चात्वर्ती शासकों आदित्यसेन, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के अभिलेख मगध क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। जिनसे यह इंगित है कि इन तीन शासकों का शासन मगध क्षेत्र पर व्याप्त था। अतः फ्लीट आदि विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि इस राज्यवंश का मूल क्षेत्र भी मगध ही रहा होगा।1 इसके विपरीत डी. सी. गांगुली, आर. के. मुकर्जी, सी. बी. वैद्य, हार्नले एवं रायचौधरी आदि अनेक विद्वानों का यह विचार है कि इस वंश के लोग मूलतः मलवा के निवासी थे जो हर्षोत्तर काल में मगध के शासक बने। मालवा को उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानने वाले विद्वान का मुख्य तर्क यह है कि हर्षचरित में माधव गुप्त का उल्लेख मालवराज पुत्र के रूप में हुआ है। जबकि अफसढ़ अभिलेख में माधव गुप्त को महासेन गुप्त का पुत्र कहा गया है। दोनों को ही स्रोतों में माधव गुप्त को हर्ष का मित्र कहा गया है।

हर्षचरित के अनुसार वह हर्ष का बाल सखा था जबकि अफसढ़ अभिलेख के अनुसार वह हर्ष देव के निरन्तर साहचर्य का आकांक्षी था। इन दोनों स्रोतों को साथ-साथ देखने से हर्षचरित के मालवराज और आदित्यसेन के पितामह महासेन गुप्त की एकरूपता प्रमाणित होती है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि जीवित गुप्त द्वितीय के देववर्णाक अभिलेख के अनुसार मगध पर पहले मौखरी सर्ववर्मा और अवन्तिवर्मा का अधिकार था, जो उत्तर गुप्त वंश के शासक दामोदर गुप्त और महासेन गुप्त के समकालीन थे। इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि मगध का क्षेत्र सर्ववर्मा के पिता ईशानवर्मा के भी आधीन रहा हो, जो उत्तर गुप्त वंशी शासक कुमार गुप्त का समकालीन था। क्योंकि ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख में ईशानवर्मा को आन्ध्रों, शूलिकों तथा गौड़ों का विजेता कहा गया है और गौड़ की विजय मगध क्षेत्र पर अधिकार के बिना सम्भव नहीं प्रतीत होती। इन सभी तथ्यों को दृष्टि में रखने पर पूर्वी मालवा के क्षेत्र को ही उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानना युक्ति संगत लगता है।

कृष्ण गुप्त

असफढ़ अभिलेख के अनुसार उत्तर गुप्त वंश का प्रथम शासक कृष्ण गुप्त था। अभिलेख के अतैथिक होने के कारण कृष्ण गुप्त का शासनकाल सुनिश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता तथापि इस दिशा में हमें ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख से सहायता मिलती है, जिसकी तिथि 554 ईस्वी है। ईशानवर्मा उत्तर गुप्त वंशी नरेश कुमार गुप्त का शासनकाल स्थूलतः 540 ईस्वी और 560 ईस्वी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि कुमार गुप्त के पूर्व जीवित गुप्त प्रथम, हर्ष गुप्त और कृष्ण गुप्त इन तीन शासकों ने राज्य किया और यदि प्रत्येक शासक के लिए औसत बीस वर्ष का शासनकाल निर्धारित किया जाय तो कृष्ण गुप्त का शासन काल लगभग 480 ईस्वी से 500 ईस्वी के बीच रखा जा सकता है।

अफसढ़ अभिलेख में कृष्ण गुप्त को ‘नृप’ उपाधि से विभूषित किया गया है।1 इस समय गुप्त साम्राट बुध गुप्त शासन कर रहा था जिसका राजनैतिक प्रभाव मालवा क्षेत्र तक निश्चित रूप से व्याप्त था। बुध गुप्त के शासनकाल में ही हूण नरेश तोरमाण का पश्चिमी भारत पर आक्रमण हुआ। तोरमाण के शासन का प्रथम वर्ष का अभिलेख एरण से प्राप्त हुआ है। इससे यह विदित होता है कि 490 ईस्वी और 510 ईस्वी के बीच किसी समय तोरमाण का अधिकार मालवा क्षेत्र पर स्थापित हुआ। उसने बुध गुप्त के एरण क्षेत्र पर शासन करने वाले सामन्त मातृविष्णु के अनुज धान्यविष्णु को अपनी ओर से इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया। किंतु मालवा क्षेत्र में हूणों की यह सत्ता निर्विध्न नहीं रही। क्योंकि एरण से ही प्राप्त 510 ईस्वी के भानु गुप्त के अभिलेख से ज्ञात होता है कि भानु गुप्त ने, जो एक महान योद्धा था एरण में एक भीषण युद्ध किया, जिसमें उसका मित्र गोपराज वीरगति को प्राप्त हुआ था और उसकी पत्नी अपने पति के शव के साथ सती हो गई थी।

समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भानु गुप्त और गोपराज ने यह युद्ध हूण नरेश तोरमाण के विरूद्ध ही किया होगा। स्पष्टतः मालवा क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में तेजी के साथ परिवर्तन हो रहा था जिससे मध्य भारत के परिव्राजक, उच्चकुल तथा एरण क्षेत्र के धान्यविष्णु जैसे सामन्त कुलों की गुप्त सम्राटों के प्रति स्वामिभक्ति शिथिल और संदिग्ध होती जा रही थी। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए कृष्ण गुप्त ने पूर्वी मालवा में अपना छोटा सा राज्य स्थापित किया। यद्यपि अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि उसकी सेना में सहस्रों की संख्या में हाथी थे तथा वह असंख्य युद्धों का विजेता था एवं विद्वानों से सदैव वह घिरा रहता था, किन्तु इसे औपचारिक प्रशंसा मात्र ही समझना चाहिए।

हर्ष गुप्त

कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था। इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था। अफसढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त किया था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरूद्ध संघर्षरत था।

अफसढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थित एक सामान्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोधर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसकी बहन हर्ष गुप्ता का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

जीवित गुप्त प्रथम

हर्ष गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जीवित गुप्त प्रथम था। इसने लगभग 520 ईस्वी से 540 ईस्वी तक शासन किया। अफसढ़ अभिलेख से उपलब्ध सूचनओं से यह संकेत मिलता है कि यह अपने पिता एवं पितामाह की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। इसे अभिलेख में ‘क्षितीशचूड़ामणि’1 उपाधि से विभूषित किया गया है। अफसढ़ अभिलेख में इसके राजनीतिक प्रभावों की चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि ‘वह समुद्रतटवर्ती हरित प्रदेश तथा हिमालय के पार्शववर्ती शीत प्रदेश के शत्रुओं के लिए दाहक ज्वर के सदृश था।’1 ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त-साम्राज्य पर हूणों के आक्रमण एवं मालवा शासक यशोवर्धन के दिग्विजय के परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में राजनीतिक अव्यवस्था की भयावह स्थिति उतपन्न हो चुकी थी।

गुप्त सम्राटों का प्रताप-सूर्य अस्त हो रहा था और हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित उत्तरी बंगाल के क्षेत्रों से गुप्त सत्ता का प्रभाव समाप्त हो चला था। असम्भव नहीं है कि जीवित गुप्त प्रथम ने समकालीन गुप्त सम्राट, जो सम्भवतः कुमार गुप्त तृतीय था, के सामन्त के रूप में पूर्वी भारत में विद्रोहों का दमन करने के लिए यह अभियान किया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अभियान में समकालीन मौखरी नरेश ईश्वर वर्मा ने भी उसका सहयोग किया। क्योंकि जौनपुर शिलालेख में यह कहा गया है कि ईश्वर वर्मा ने उत्तर की दिशा में हिमालय तक के क्षेत्रों (प्रालेयाद्रि) पर विजय प्राप्त की थी। इन विजयों के परिणाम स्वरूप जीवित गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्तों के राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि हुई। इसलिए अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि ‘उसका पराक्रम पवन पुत्र हनुमान द्वारा समुद्र लंघन के समान अमानुषिक था।

कुमार गुप्तः

जीवित गुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कुमार गुप्त हुआ। इसका शासनकाल लगभग 540 ईस्वी से से 560 ईस्वी तक माना गया है। इसके शासन के प्रायः मध्यकाल में (550-51ईस्वी) गुप्त सम्राट विष्णु गुप्त की मृत्यु हुई एवं गुप्त राजवंश का पूर्णतः अंत हो गया। गुप्त राजवंश के पतन का लाभ उठाने की दिशा में उत्तर गुप्त और मौखरी दोनों ही राजवंश सक्रिय हो उठे। परिणामतः इन दोनों राजकुलों का पारस्परिक मैत्री सम्बन्ध समाप्त हो गया। अफसढ़ अभिलेख से दोनों कुलों के बीच शत्रुता एवं संघर्ष की स्पष्ट सूचना मिलती है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त एवं उसके समकालीन मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच भीषण संघर्ष हुआ। कदाचित इस संघर्ष का उद्देश्य मगध के क्षेत्र पर, जो साम्राज्य सत्ता का प्रतीक था, अधिकार स्थापित करना था।

उत्तर गुप्त नरेश कुमार गुप्त एवं मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच संघर्ष की सूचना देने वाला एकमात्र स्रोत अफसढ़ अभिलेख है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त ने ‘राजाओं में चन्द्रमा के समान शक्तिशाली ईशानवर्मा के सेना रूपी क्षीरसागर का, जो लक्ष्मी की सम्प्राप्ति का साधन था, मन्दराचल पर्वत की भाँति मंथन किया। इस श्लोक में निहित अर्थ को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। रायचौधरी का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त की विजय हुई तथा ईशानवर्मा पराजित हुआ। क्योंकि मौखरियों द्वारा इस युद्ध में विजय का कोई दावा नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि ईशानवर्मा के 554 ईस्वी के हड़हा अभिलेख में इस युद्ध का कोई वर्णन नहीं है। अतः इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यह युद्ध 554 ईस्वी के बाद किसी समय हुआ होगा। अफसढ़ अभिलेख के आगे के श्लोक में यह कहा गया है कि इस युद्ध के बाद कुमार गुप्त ने प्रयाग में अग्निप्रवेश कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।1 निहाररंजन राय और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वानों का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त पराजित हुआ था और उसने पराजय जनित ग्लानि के कारण प्रयाग में आत्महत्या की थी।

KIRTI STAMBH CHITTODGARH - A VAISHYA HERITAGE

#KIRTI STAMBH CHITTODGARH - A VAISHYA HERITAGE


चित्तौड़गढ़ स्थित कीर्ति स्तम्भ

कीर्ति स्तम्भ एक स्तम्भ या मीनार है जो राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है। इसे भगेरवाल जैन वैश्य व्यापारी जीजाजी कथोड़ ने तेरहवीं शताब्दी में बनवाया था। यह 122 फिट ऊँची है। यह 7 मंजिला है। इसमें 157 सीढ़ी है। इसमें जैन पन्थ से सम्बन्धित चित्र भरे पड़े हैं।

कीर्ति शब्द का अर्थ प्राचीन भारतीय संस्कृत साहित्य में यश के अतिरिक्त निर्माण कार्य के लिए भी हुआ है। अमरकोश के टीकाकार भानुजी दीक्षित ने कीर्ति शब्द की व्याख्या ‘कीर्ति: प्रसाद यशसेर्विस्तारे कर्दमेऽपि च’ किया है। हेमचंद्र के अनेकार्थसंग्रह में भी ‘कीर्ति: यशसि विस्तारे प्रासादे कर्दमेऽपि च’ दिया गया है। इस प्रकार कीर्ति शब्द का प्रयोग यश तथा यश को विस्तृत करनेवाले किसी भी निर्माण कार्य के लिए हुआ है। अभिलेखों में भी वापी, बौद्ध, अथवा हिंदू मंदिर, तड़ाग, चैत्य और बौद्ध मट तथा मूर्तियों आदि के लिए कीर्ति शब्द का प्रयोग पाया जाता है। कीर्तिस्तंभ शब्द कीर्ति शब्द से जुड़ा हुआ है; इसका अर्थ विजयस्तंभ बनावाने की परिपाटी प्राचीन है। मिस्र, बाबुल, असूरिया तथा ईरान की प्राचीन सभ्यताओं के सम्राटों ने अपनी विजयों की प्रशस्तियाँ सदा स्तंभों पर उत्कीर्ण कराई थीं। भारत में यह प्रथा संभवत: गुप्त सम्राटों ने प्रचलित की। इनसे पूर्व के अशोक के जो स्तंभ है वे कीर्तिस्तंभ न होकर उसके धर्मदेशों के उद्घोष हैं।

कीर्ति स्तंभ राजस्थान राज्य के चित्तौड़गढ़ जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल में से एक है जिसका निर्माण 12 वीं शताब्दी के दौरान किया गया था। आपको बता दें कि यह स्तंभ 220 मीटर लंबा है जो जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा प्रमुख तीर्थ माना जाता है। बता दें कि इस टॉवर का निर्माण एक जैन व्यापारी “बघेर वंशीय शाह जीजा” द्वारा राजा रावल कुमार सिंह के शासनकाल के दौरान किया गया था। ताकि जैन धर्म का महिमामंडन किया जा सके। बता दे कि कीर्ति स्तम्भ को टावर ऑफ फेम के नाम से भी जाना जाता है जो प्रथम तीर्थ कर ऋषभ को समर्पित है। यह स्तंभ दिगंबर संप्रदाय की जटिल नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इस मंजिला टावर में आदित्यनाथ की प्रतिमा बनी हुई है। इसके साथ ही विभिन्न जैन संतों के चित्रों को स्तंभ के चारों कोनों पर उकेरा गया है जो इस स्तंभ को और भी ज्यादा आकर्षक बनाते हैं।

अगर आप चित्तौड़गढ़ की यात्रा करने के लिए जा रहे हैं, तो आपको कीर्ति स्तंभ देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। क्योंकि यह स्तंभ ना केवल आपको इतिहास के पन्नों को पढ़ने का मौका देता है बल्कि यह देखने में भी बेहद आकर्षक नजर आता है। अगर आप कीर्ति स्तम्भ देखने जाने की योजना बना रहे हैं या इसके बारे में अन्य जानकारी चाहते हैं तो हमारे इस लेख को अवश्य पढ़ें जिसमे हम आपको कीर्ति स्तंभ के बारे में पूरी जानकारी देने जा रहे हैं –

कीर्ति स्तम्भ का इतिहास – Kirti Stambh History In Hindi

Image Credit: Sameer Joshi

कीर्ति स्तम्भ चित्तौड़गढ़ किले की सबसे प्रमुख संरचनाओं में से एक है। चित्तौड़गढ़ किले को अलाउद्दीन खिलजी द्वारा घेर लेने के बाद रानी पद्मिनी ने जौहर किया था। कीर्ति स्तम्भ चित्तौड़गढ़ किले का ही एक भाग है जिसका निर्माण जैन धर्म के प्रथम तीर्थ कर श्री आदित्यनाथ के समर्थन में किया गया था। इस टावर में तीन शिलालेख हैं जो इसके बारे में जानकारी देते हैं। इस स्तम्भ के ऊपर बनी हुई तीर्थ कार की नग्न कृतियां से पता चलता है कि यह दिगंबर संप्रदाय की है। इसके अलावा एक शिलालेख में धर्म कीर्ति, शुभ कीर्ति के शिष्य का उल्लेख है। यहां उपस्थित अभिलेखों से यह पता चलता है कि इस संरचना का निर्माण तेरहवीं शताब्दी के दौरान हुआ था।

कीर्ति स्तम्भ की वास्तुकला – Kirti Stambh Architecture In Hindi


बता दें कि कीर्ति स्तम्भ टावर ऑफ फ्रेम का निर्माण सोलंकी वास्तुकला की शैली में कई बालकनी यू और जटिल धनुष आकार के साथ किया गया है। यह टावर आपने 30 मीटर चौड़े बेस के साथ 72 मीटर ऊंचा है और नीचे 15 फीट तक फैला है। इस टावर के ऊपर एक अवलोकन कक्ष हे जो पर्यटक को नीचे के निवास स्थान का सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता। इस कक्ष तक पर्यटक एक सीढ़ी के माध्यम से पहुंच सकते हैं और आसपास के शानदार प्राकृतिक दृश्य का आनंद ले सकते हैं।

3. चित्तौड़गढ़ के कीर्ति स्तम्भ का प्रवेश शुल्क – Kirti Pillar Entry Fee In Hindi

यहां के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है।

4. कीर्ति स्तम्भ के खुलने और बंद होने का समय – Kirti Stambh Timings In Hindi

सुबह 10:00 से शाम के 5:00 बजे तक

Tuesday, March 26, 2024

LAD SHAKYA VANI VAISHYA MAHARASHTRA

#LAD SHAKYA VANI VAISHYA MAHARASHTRA

महाभारत काल से ज्ञात लाड शक (लाड शाखिया) समुदाय अपने आप को "शक/शक/सीथियन" पूर्वजों, "ऋषिका" जनजाति के "देव" वंश से जुड़ा हुआ मानता हैं. पूर्वजों, "ऋषिका" जनजाति, "देवा" के कुछ गांव (पिलखोद, हरेश्वर पिंपलगांव, टाकली आदि) ये कबीले जलगांव जिले के चालीसगांव तालुका में हैं।

लाड साका (लाड शाखिया) वाणी समुदाय के कुलग्राम के पास दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की पीतलखोरा जैन गुफाएं (दिगंबर जैन स्वामी भावसागर महाराज का स्थान), "देव" कुलबांधव, पटना देवी का हेमाडपंथी महादेव मंदिर, सीता घाटी झरना, सीता का स्नान, हट्टी महल, धवलतीर्थ झरना, केदारकुंड झरना, भास्कराचार्य संग्रहालय, मद्रासी बाबा का मठ, तरवाड्या में साईं बाबा मंदिर, तितुर नदी पर मुदई देवी मंदिर, शेंदुर्नी में सिंधुरासुर मंदिर, पारोला में रानी लक्ष्मीबाई किला, धडगांव में अक्रानी महल, वाघली में हेमाडपंथी मुदलादेवी मंदिर, पद्मालय एरंडोल, फरकंडा हैंगिंग टावर्स, चोपड्या के पास अनपदेव गर्म झरने, प्रताप कॉलेज अमलनेर में संग्रहीत साने गुरुजी का साहित्य, विश्व प्रसिद्ध फोटोग्राफर केकी मुस की आर्ट गैलरी, असोड्या की कवयित्री बहिनाबाई चौधरी का घर जैसे कई दर्शनीय स्थल हैं।

लाड साका (लाड सखिया) वाणी समुदाय के "देव" कुल के लोगों को इन दर्शनीय स्थलों का दौरा अवश्य करना चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें अपने मूल कुलग्राम का दौरा करना भी नहीं भूलना चाहिए।

BHATIA VAISHYA KSHATRIYA CASTE

#BHATIA VAISHYA KSHATRIYA CASTE

भाटिया लोगों का एक समूह और एक जाति है जो पंजाब, सिंध और गुजरात में पाई जाती है। परंपरागत रूप से, वे एक व्यापारिक और व्यापारी समुदाय रहे हैं। भाटिया मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में रहते हैं। भाटिया, लोहाना और खत्री, महाजन और सूद एक जैसे समुदाय है और आपस में विवाह करने के लिए जाने जाते है । सारस्वत ब्राह्मण भाटियाओ के पुजारी होते हैं.

भाटिया एक व्यापारिक समुदाय हैं - परंपरागत रूप से वे व्यापारी और व्यापारी थे। भाटिया मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत में रहते हैं।

व्यापारियों के अपने पारंपरिक व्यवसाय से पहले, लोहाना और भाटिया दोनों कृषि के पेशे में शामिल थे। इतिहासकार गोस्वामी कहते हैं कि उनकी अनुष्ठान स्थिति "अस्पष्ट" थी, और, "उन्हें न तो उच्च और न ही निम्न जाति माना जाता था"। वह आगे कहती हैं कि ब्रिटिश राज काल के मेजर जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार, "भाटिया" शब्द "भट" शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ योद्धा होता है। भाटिया दावा करते हैं कि वे राजपूत मूल के हैं। गोस्वामी के अनुसार, वे और लोहाना एक "पारंपरिक बनिया जाति" हैं। इतिहासकार द्विजेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि भाटिया वैष्णव बनिया की तरह वैश्यों से जुड़े हुए हैं और समाजशास्त्री ए.एम.शाह भी भाटिया को लोहाना और बनिया  की तरह वैश्य वर्ण से संबंधित मानते हैं।

भाटिया जाति की भौगोलिक उत्पत्ति अनिश्चित है। आंद्रे विंक के एक हालिया अध्ययन में जैसलमेर के भाटिया और गुजरात के चालुक्यो के बीच 12वीं शताब्दी के संबंध का पता चलता है, जबकि एंथोनी ओ'ब्रायन ने अपनी मातृभूमि की खोज करने के लगभग-समसामयिक प्रयास के कारण उन्हें 7वीं शताब्दी से सिंध के आसपास बसाया था। विंक, जो मध्यकालीन और प्रारंभिक आधुनिक भारतीय इतिहास में रुचि रखने वाले प्रोफेसर हैं, रिकॉर्ड करते हैं कि फ़िरोज़ शाह तुगलक के शासनकाल के दौरान सिंध में कई समुदाय इस्लाम में परिवर्तित हो गए।

भाटिया, जो विशेष रूप से सिंध में मुल्तान क्षेत्र से जुड़े थे, ऐतिहासिक रूप से वैश्य व्यापारी थे और वे संभवतः बोहरा और लोहाना वैश्य समुदायों के साथ मिलकर मध्य एशिया में पाए जाने वाले शुरुआती भारतीय प्रवासी का हिस्सा थे। उनका उद्भव एक समुदाय के रूप में हुआ। महत्वपूर्ण व्यापारी समूह 17वीं शताब्दी से पहले का है और निश्चित रूप से उस समय तक जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन हो गया था, भाटिया और अन्य दो प्रारंभिक प्रवासी समुदायों ने व्यापार और साहूकारी नेटवर्क स्थापित कर लिया था, स्कॉट लेवी के अनुसार, जो इतिहास में विशेषज्ञ हैं मध्य एशिया, "...अफगानिस्तान, मध्य एशिया तक फैला हुआ है, और अंततः अरब प्रायद्वीप और पूर्वी अफ्रीका से भी आगे बढ़कर पश्चिम में कैरेबियाई द्वीपों और पूर्व में दक्षिण पूर्व एशिया और चीन तक पहुंच गया।"

खत्री और लोहाना के साथ भाटिया प्रमुख व्यापारी थे, जिनका वोल्गा नदी (रूस) से लेकर कोलकाता (भारत) तक संपर्क था। भाटिया, जो विशेष रूप से सिंध में मुल्तान क्षेत्र से जुड़े थे, ऐतिहासिक रूप से व्यापारी थे और वे संभवतः इसका हिस्सा थे। बोहरा और लोहाना समुदायों के साथ मध्य एशिया में सबसे पहले भारतीय प्रवासी पाए गए। एक महत्वपूर्ण व्यापारी समूह के रूप में उनका उद्भव 17वीं शताब्दी से पहले का है और निश्चित रूप से उस समय तक जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन हो गया, भाटिया और अन्य दो शुरुआती प्रवासी समुदायों ने व्यापार और साहूकारी नेटवर्क स्थापित किए थे, जो स्कॉट लेवी के अनुसार, जो मध्य एशिया के इतिहास में विशेषज्ञ थे, "... पूरे अफगानिस्तान, मध्य एशिया तक फैला हुआ था, और अंततः अरब प्रायद्वीप और पूर्वी अफ्रीका से भी आगे तक पहुंच गया।" पश्चिम में कैरेबियाई द्वीप, और पूर्व में दक्षिण पूर्व एशिया और चीन।" थट्टा (सिंध) के भाटिया ने मस्कट (ओमान) में एक उपनिवेश स्थापित किया जहां उन्होंने अरब प्रायद्वीप और भारत के बीच अंतर्राष्ट्रीय व्यापार किया।

चमकौर की लड़ाई के दौरान, 40 पंजाबी सैनिकों में से 5 सिख भाटिया थे। उन्होंने मुगलों की एक बड़ी सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मुक्स्टार की लड़ाई के दौरान, 40 पंजाबियों ने मुगलों के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान दे दी। जिन 25 सैनिकों की जाति दर्ज है, उनमें से 3 सैनिक सिख भाटिया परिवारों के थे। 

पूर्व में भाटिया मांसाहारी थे। लेकिन अब अधिकतर शाकाहारी हैं

धर्म

खाड़ी के सबसे पुराने मंदिर का निर्माण 1817 में थट्टा, सिंध के भाटियाओं द्वारा किया गया था।

हिंदू भाटिया वैष्णव धर्म का पालन करते हैं। वे राम और कृष्ण सहित विष्णु के अवतारों का सम्मान करते हैं। वे हिंगलाज माता के साथ-साथ दरिया सागर (समुद्र) की भी पूजा करते हैं। इसके अलावा, कुछ भाटिया जैन हैं। खाड़ी का सबसे पुराना मंदिर, बहरीन में श्रीनाथजी मंदिर का निर्माण 1814 में थथाई भाटिया समुदाय द्वारा किया गया था और अभी भी उनके द्वारा प्रबंधित किया जाता है। यह कृष्ण के एक रूप, भगवान श्रीनाथजी को समर्पित है।द्वारका मंदिरों को बड़े पैमाने पर भाटियाओं द्वारा वित्त पोषित किया गया था।

कई भाटिया सिख धर्म का पालन करते थे। भाई बन्नो पंजाब (अब आधुनिक पाकिस्तान में) जिले गुजरात के मंगत गाँव के बिशन चंद भाटिया के पुत्र थे। वह गुरु अर्जन के वफादार अनुयायी बन गए जिन्होंने उन्हें आदि ग्रंथ की तैयारी में शामिल किया। महाराजा रणजीत सिंह के पूर्वजों को भाई बन्नो भाटिया के प्रयासों से सिख धर्म में दीक्षित किया गया था।

उप समूहों

भाटियाओं में, विभिन्न उपजातियाँ हैं, जैसे जाखड़, कच्छी, वेहा, हलाई, कांथी, पवराई, नवगाम, पचीसगाम, थट्टाई और पंजाबी। कच्छ के भाटिया कच्छी भाटिया हैं, जामनगर जिले के आसपास के भाटिया हलाई भाटिया के रूप में जाने जाते हैं, वर्तमान पाकिस्तान के सिंध के लोग सिंधी भाटिया के रूप में जाने जाते हैं और वर्तमान भारत और पाकिस्तान के पंजाब के लोग पंजाबी भाटिया के रूप में जाने जाते हैं। 1947 में बड़ी संख्या में पंजाबी भाटिया हिन्दुस्तानी पंजाब में बस गए थे.

भाटियो का इतिहास

पश्चिमी सीमा पर स्थित तनोट गढ़ के भट्टी महाराज केहर के छठे पुत्र का नाम ‘जाम’ था । मुसलमानों के प्रबल आक्रमणों के फलस्वरूप जाम के वंशज भाटिया वैश्य जाति में परिणित हो गये । तनोट के साके के समय बहुत सारे भाटी वीर गति को प्राप्त हो गये थे । बाकी बचे भाटी राजपूतों को बलात् मुसलमान बनाने की प्रक्रिया मुस्लिम शासकों द्वारा हुई । उस समय कई राजपूतों ने वैश्य जातियों में विवाह कर राजपूत न होने का विश्वास दिलाया । इस समय भाटिया, माहेश्वरी, डागा, आदि अनेक जातियों की उप-शाखाओं की उत्पत्ति भाटियों से हुई ।....मोहम्मद गौरी के आक्रमण के समय क्षात्रधर्म परिभ्रष्ट भाटी जाति का अधिक समुदाय वैश्य ‘भाटिया’ जाति में परिणित हो गया और भावलपुर, मुलतान, नगरथट्टा और पुजाब के सिंध क्षेत्रों में रहने लगा । कालान्तर में भाटिया जाति के लोग अपने प्रदेश को ही अपना जन्म स्थान समझने लगे । भटिया जाति के बड़ी संख्या में लोग अपना देश छोड़कर विदेशों में व्यापार हेतु घुमते थे । अरब प्रदेशों में समुद्र के मार्ग से आया-जाया करते थे । जहाजों में हथियार रखते थे । बसरा, अबूशहर, मस्कत, बगदाद, अदन, शहरकला, हूण्डा, मशवह आदि बंदरगाहों पर इनके व्यापारिक प्रतिष्ठान थे । बसरे में गोविंदरामजी का मंदिर भाटिया समाज के लोगों द्वारा बनवाया गया था । जब यहां मुसलमानों का अत्याचार बढ़ने लगा तब बसरे के मंदिर की मूर्ति लाकर मस्कत में रखी गई । तीन-चार सौ वर्षों से यहां रखी हुई है । अरब और अफ्रीका के प्रदेशों मेें भी भाटिया जाति का विस्तार हुआ । जगन्नाथजी के समय में आसोज सुदि पंचम संवत् 1803 में सम्मिलित हुए तथा पैदा हुए भाटिया संप्रदाय में यह नियम कर रखा था कि पच्चास वर्ष से कम उम्र की स्त्री दर्शन को नहीं जावे । जैसलमेर के भाटिये पुष्टिकर गुरुओं की आज्ञानुसार पच्चास पीढ़ी के अंतर से विवाह कर सकते हैं । जैसलमेर के भाटिये सिंध, पंजाब की ओर पश्चिमोत्तर प्रदेश वालों से विवाह कर सकते हैं । कच्छ, हालाई, पुरीजा, काठियावाड़ी, गुजराती और धरन गांव बाले आपस में विवाह कर सकते हैं ।

भाटिया महाजन की की गोत्र

पंडित हरिदत के अनुसार भाटिया महाजन के 7 गोत्र जो अनेक उपसखाये रही जो निमं प्रकार है

1 परासर गोत्र

1 राय गाजरिया 2 राय पञ्चलोडिया 3 राय पलिजा 4 राय गगला 5 राय सराकी 6 राय सोनी 7 राय सुफला 8 राय जीया 9 राय मोगला 10 राय घघा 11 राय रीका 12 राय जयधन 13 राय कोढ़िया 14 राय कोवा 15 राय रडिया 16 राय कजराया 17 राय सीजवाला 18 राय जियाला 19 राय मलन 20 राय धवा 21 राय धिरण 22 राय जगता 23 राय निशात

2 साणस गोत्र

राय दुत्या 2 राय जब्बा 3 राय बबला 4 राय सुअडा 5 राय धावन 6 राय डंडा 7 राय ठगा 8 राय कंधिया 9 राय उदेसी 10 राय बधुच 11 राय बलाए

3 भारद्वाज गोत्र

राय हरिया 2 राय पदमसी 3 राय मेद्या 4 राय चान्दन 5 राय खियारा 6 राय थुल 7 राय सोढिया 8 राय बोडा 9 राय मोछा 10 राय तम्बोल 11 राय लाख्वंता 12 राय ढककर 13 राय भुद्रिया 14 राय मोटा 15 राय अनगढ़ 16 राय ढ़ढाल 17 राय देग्चंदा 18 राय आसर

4 सुधर वंश गोत्र

1 राय सपटा 2 राय छाछेया 3 राय नगड़ 4 राय बावला 5 राय परमला 6 राय पोथा 7 राय पोणढग्गा 8 राय मथुरा
5 मधुवाधास गोत्र

1 राय वैद 2 राय सुरया 3 राय गूगल गाँधी 4 राय नए गाँधी 5 राय पंचाल 6 राय फुरास गाँधी 7 राय परे गाँधी 8 राय जुजर गाँधी 9 राय प्रेमा 10 राय बीबल 11 राय पोवर

6 देवदास गोत्र

1 राय रमैया 2 राय पवार 3 राय राजा 4 राय परिजिया 5 राय कपूर 6 राय गुरु गुलाब 7 राय ढाढार 8 राय करतारी 9 राय कुकण

7 ऋषी वंशी

1 राय मुल्तानी 2 राय चमुजा 3 राय करण गोना 4 राय देप्पा

भाटिया जाति के नखों के आगे ‘राय’ लगता था, जैसे राय गजराज । इससे लगता है कि इनकी उत्पत्ति रावल देवराज से पहले हुई । जैसल के भट्टी शासकों की देवराज से पहले की उपाधि ‘राय’ थी । देवराज के बाद भट्टी लोग ‘रावल’ या ‘राऊल’ कहलाये ।.. ...भटिया लोगों ने ‘भाटियासर’ नामक सरोवर बनवाया जो जोसीसर के पास स्थित है । इनकी देवी कुलेरियों का स्थान लौद्र्रवा से आगे बना है । -पं. हरिदत्त के जैसलमेर के इतिहास से उल्लेखित, -21/75-7.

भाटिया साहूकारी और महाजनी के लिए जहा प्रसिद्ध रहे है वही धर्मात्मा के रूप में प्रख्यात होने का गौरव उन्हें प्राप्त है । वे जिस क्षत्र में रहे उन्होंने धर्मशालाये , पाठशालाये , मंदिर , ज लाशय आदि का निर्माण करवाकर जनहित का परिचय दिया । ये भाटी वंश से उत्पन होने के कारण गौरव को अभी तक संजोये हुए है । भाटिया व्यापारी भारत तक ही नहीं सीमित रहे बल्कि समुन्द्र पार कर अरब और अफ्रीका देशो में भी गए । और वहा अपना नाम कमाया । ये जब समुन्द्र पार करते तब माल असबाब की सुरक्षा के लिए जहाजो पर 18 से 24 टोपे लगाते ।

300 वर्ष पूर्व इन्होने बसरेमें गोविन्द्रय का मंदिर बनवाया । सत्रु जब उसको ध्वस्त करने लगे तो गोविन्द्रय की मूर्ती मस्कट में लाकर स्थापित की । मुख्यतः ये हाथी दांत , महिदान , कोड़ा , कोड़ी , गेंडे का चमड़ा , और सीप आदी वस्तुओ का का व्यापार करते थे । अनेक भाटिया वल्लभाचार्य सम्प्रदाई के अनुयायी है ।

मांडवी के मानजी जीवा ( कच्छ के दीवान ) सेठ मुरारजी गोकुलदास ( मुंबई की कोंसिल के सदस्य )सेठ मुलजि ( द्वारका के मंदिर बनवाया ) सेठ विसरा माउजी , सेठ मानजी , सेठ तेजपाल , सेठ जीवराज , बालुके आदि भाटिया के नाम उलेखनीय है ।

Monday, March 25, 2024

JAIN VAISHYA KULDEVI - जैन कुलदेवियों की सूची

#JAIN VAISHYA KULDEVI - जैन कुलदेवियों की सूची

लगभग समस्त जैन गोत्रो की कुलदेवियाँ होती है,यहां तक कि दिगम्बर जैनियो की कुलदेवियाँ होती है,पर जैन साधुओ द्वारा फैलाई गई विकृतियों के कारण वर्तमान पीढियां इस महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित हो गयी है,यहां तक कि इन धर्म गुरुओं के कारण जैनियो ने कुल गुरु(अपने वंश के कुलगुरुओ) को भी भुला दिया,जिसकी वजह से किसी2 परिवार में जीवनभर संघर्ष व कष्ट, और कहीं2 युवा सदस्यों की अकाल मौतों को भी झेलना पड़ रहा है।
जैन गोत्रो की संख्या 3500 से भी अधिक बताई जाती है,जिनकी कुलदेवियों के विवरण उपलब्ध नही हो पा रहे है।संकलन भी बहुत दुष्कर कार्य है।

3500 में से 498 तो मूल ओसवाल जैनियो के है,जो राजस्थानी क्षत्रिय को जैन पंथ में दीक्षित कर जैन बनाया गया था।

सबसे पहले अपनी सही कुलदेवी की खोज करे, इसके लिए आपके गोत्र/कुल/वंश के कुलगुरु जिन्हें भाट जी भी बोलते है,उनकी खोज करे, उनसे समस्त प्रकार की जानकारी,परंपरा आदि का ज्ञान हो जाएगा।उन्ही से स्थापना विधि,पूजा विधि भी मिल जाएगी।

यहां काफी कुलदेवियों की सूची जानकारी के लिए दी जा रही है,हालांकि ये सूची भी पूर्ण नही है।

1-श्री सच्चियाय माता
2-श्री अर्बुदा देवी या अधरदेवी
3-श्री अम्बा देवी या अम्बा जी
4-श्री आशापुरा देवी
5-श्री नागणेशी देवी
6-श्री सुसवाणी देवी
7-श्री बीस हत्थ देवी
8-श्री सुंधा देवी
9-श्री खीमज देवी
10-श्री बड़वासन देवी
11-श्री हिंगलाज देवी
12-श्री लोदर देवी
13-श्री भुवाल देवी
14-श्री लेकेक्षण देवी
15-श्री भवानी देवी
16-श्री बाणेश्वरी देवी
17-श्री केलपूज्य देवी
18-श्री झमकार देवी
19-श्री ब्रम्हाणी देवी
20-श्री नागदेवता व नागिन देवी
21-श्री रोहणी देवी
22-श्री बाण देवी
23-श्री गाजर देवी
24-श्री रुद्र देवी
25- श्री आशा देवी
26-श्री सुषमा देवी
27-श्री कुँवारीदेवी
28-श्री बीसल देवी
29-श्री मामरा देवी
30-श्री गंजेश्वरी देवी
31-श्री गोत्र देवी
32-श्री वाराही देवी
33-श्री काहनी देवी
34-श्री पदमावती देवी
35-श्री बाकलदेवी
36-श्री मुण्डारा देवी
37-श्री पाडल देवी
38-श्री पुनागर देवी
39-श्री पतंगा देवी
40-श्री जसवाय देवी
41-श्री चित्तोड़ी देवी
42-श्री मात्र देवी
43-श्री कुलेटी देवी
44-श्री शेषन देवी
45-श्री गाता देवी
46-श्री जीण चामुंडा देवी
47-श्री वीरवाडा देवी
48-श्री जमवाय देवी
49-श्री प्रेमीदेवी
50-श्री नारायण देवी
51-श्री सेढल देवी
52-श्री मोदरा देवी
53-श्री धना देवी
54-श्री नागोरी देवी
55-श्री निम्बज देवी
56-श्री डिडवाना देवी
57-श्री कंठन देवी
58-श्री डिदेसी देवी
59-श्री ललेची देवी
60-श्री चामुंडा देवी
61-श्री जीण देवी
62-श्री घुमडा चामुंडा या घुमडा देवी
63-श्री मादाजुन देवी
64-श्री खंडवा देवी
65-श्री कालन देवी
66-श्री मम्बा देवी
67-श्री शंखेश्वरी देवी
68-श्री किंचरिया देवी
69-श्री चौदरा देवी
70-श्री वारेसरी देवी
71-श्री साचौरी देवी
72-श्री मोदरा देवी
73-श्री सेतरावा दादी माँ
74-श्री करणी देवी
75- श्री माजी सा
76 - श्री जागरूप देवी (सती ),(ग्राम-सकोसाना,राजस्थान)

उक्त सभी देवियां विविध जैन गोत्रो की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित है। माजी सा किसी की कुलदेवी न होने के बाद भी अनेक जैन परिवारों में इष्ट देवी के रूप में प्रतिष्ठित है। गोलेछा गोत्र में 4 कुलदेवियाँ पाई गई,जो कि कुल परंपरा के कारण अलग2 प्रतिष्ठित हुई है।

कुलदेवी जांने हेतु अपने2 धर्म गुरु से पूछे य्गुया राजस्थान में अपने कुलगुरुओ की खोज करें

GANERIWAL GAMILY - गनेरीवाल परिवार के द्वारा बनवाये मंदिर व दुसरे संसथान

#GANERIWAL GAMILY - गनेरीवाल परिवार के द्वारा बनवाये मंदिर व दुसरे संसथान


यह दक्षिण भारतीय मंदिर नहीं है? या हमारे उत्तर भारत (पुष्कर, राजस्थान) का श्रीवैष्णव संप्रदाय का मंदिर है जिसका निर्माण 1823 में सेठ पूरणमल गणेड़ीवाल ने करवाया था.. गणेड़ीवाल घराना सिंघल गोत्रिय मारवाड़ी अग्रवाल घराना है.. जिनकी चार चौक की हवेली पूरे राजस्थान की सबसे विशाल हवेली मानी जाती है.. शिवाजी महाराज की भी अक्सर इस परिवार के मुखिया से मुलाकात होती रहती थी.

इस परिवार ने भारत वर्ष में अनेकों मंदिरों का निर्माण करवाया है.. जिसमें हैदराबाद का सीताराम बाघ मंदिर प्रसिद्ध है..

सीताराम बाग मंदिर या सीतारामबाग मंदिर, गनेरीवाला परिवार के सदस्य, सेठ पूरनमल गणेरीवाला द्वारा निर्मित, एक पुराना मंदिर है जो मंगलहाट, हैदराबाद, तेलंगाना, भारत के एक उपनगर में स्थित है। [1] [2] यह 25 एकड़ में फैला हुआ है। सीताराम बाग मंदिर को INTACH द्वारा विरासत भवन के रूप में वर्गीकृत किया गया है


लक्ष्मणगढ़, जयपुर, रतनगढ़, मुकुंदगढ़, फतेहपुर, सिरसा, गणेड़ी आदि जगहों पर इनके भव्य मंदिर और हवेलियां हैं... नाशिक का श्री रघुनाथ मंदिर सेठ राम दत्त गणेड़ीवाल की माताजी द्वारा दान की हुई जमीन पर बना है, लक्ष्मणगढ़ की मोदी यूनिवर्सिटी और गोरखपुर की गीता वाटिका के लिए भी इसी परिवार ने अपनी जमीन दान की थी...

मारवाड़ी इतिहास में जिन तीन फर्म्स को ग्रेट का दर्जा हासिल है वह हैं - ग्रेट गणेड़ीवाल, ग्रेट ताराचंद घनश्याम दास पोद्दार, ग्रेट सेवाराम रामसिखदास... बिड़ला वगेरह तो बहुत बाद में आए.. यहां तक की बलदेव दास बिड़ला के दादा शोभाराम बिड़ला ने गणेड़ीवालो के साथ ही कार्य करके बाद में अपने स्वतंत्र व्यापार की नींव डाली थी.. इस परिवार की लिगेसी अभी है...

बर्मा, कोलकाता, हैदराबाद के गनेरीवाल के पूर्वजों की विभिन्न प्रसिद्ध विरासत के अलावा, गनेरीवाल की नई पीढ़ी भी बहुत पीछे नहीं है। इस अद्भुत विरासत की नई पीढ़ी गणेरीवाला परिवार के नाम के तरकश में तीर जोड़ना जारी रखे हुए है। इस कुल के कुछ उल्लेखनीय ट्रेलब्लेज़र सेलिब्रिटी डाइटीशियन मुमुन गनेरीवाल हैं। रितेश गनेरीवाल, सीफे में निवेश सलाहकार प्रमुख, फूड दर्जी के अनिरुद्ध गनेरीवाल, डॉ. सिमरन गनेरीवाल क्लीवलैंड। हांगकांग की सबसे कम उम्र की जलवायु कार्यकर्ता बहनों धान्या और रेहा गनेरीवाल को नहीं भूलना चाहिए। वे केवल 9 साल और 11 साल की बहनें हैं जो अपना पहला TEDx टॉक देने वाली हैं।

साभार : प्रखर अग्रवाल

GANERIWAL FAMILY - गनेरीवाल मारवाड़ी परिवार

#GANERIWAL FAMILY - गनेरीवाल मारवाड़ी परिवार

गनेरीवाला परिवार एक सिंघल गोत्रीय अग्रवाल मारवाड़ी परिवार है, जो राजस्थान के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा हुआ है। 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में, परिवार के सदस्य रियासत में फाइनेंसर और साहूकार थे, और उन्होंने राज्य के शाही परिवारों के लिए कोषाध्यक्ष के रूप में काम किया। राजस्थान के पारंपरिक बैंकिंग परिवारों के बीच एक सामान्य विशेषता, गणेरीवाला परिवार के सदस्यों को राजस्थान में विभिन्न हिंदू मंदिरों और हवेली के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। राजा बलदेव दास बिड़ला के दादा शोभाराम बिड़ला ने गणेरीवाला परिवार के साथ काम किया, इससे पहले कि बिड़ला भारत के अग्रणी उद्योगपति के रूप में उभरे। शिवाजी को गनेरीवाला हवेली में लगातार आने-जाने के लिए जाना जाता था और उनके परिवार के कुलपति के साथ घनिष्ठ संबंध थे। 1800 के दशक में, सेठ पूरनमल गनेरीवाला की परिवार की शाखा हैदराबाद के निज़ामों के कोषाध्यक्ष और बैंकर बनने के लिए अलग हो गई, अर्थात् उस्मान अली खान, आसफ जाह VII, जो एक बिंदु पर दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति थे। यह परिवार के बाकी लोगों को स्वीकार्य नहीं था, जो मानते थे कि उनका पारिवारिक कर्तव्य एक हिंदू शासक की सेवा करना है।

हालाँकि, सेठ पूरनमल गनेरीवाला अपनी हिंदू जड़ों से जुड़े रहे और हैदराबाद के सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक - सीताराम बाग मंदिर (अब डॉ. अरविंद कुमार गनेरीवाल और उनके परिवार द्वारा प्रबंधित किया जा रहा है) का निर्माण किया।

ग्रेट प्रीफिक्स ग्रेट फर्म थ्योरी का परिणाम था जिसे मारवाड़ी परिवार के व्यवसायों पर लागू किया गया था जैसे गीत गनेरीवाला फर्म, ग्रेट ताराचंद (अंबुजा सीमेंट लिमिटेड के संरक्षक नियोतिया द्वारा प्रवर्तित) और ग्रेट सेवाराम रामनिखदास नियोटिया के अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड के गठन से पहले बर्मा शेल के प्रमुख एजेंट बन गए। गनेरीवाला परिवार के ट्रस्ट में 1800 के दशक से मंदिर, स्कूल, कुएं और धर्मशालाएं शामिल हैं। हैदराबाद में सीताराम बाग मंदिर 1830 के दशक में सेठ पूरणमल गनेरीवाला द्वारा बनाया गया था, जिन्होंने 1850 में पुष्कर में प्रसिद्ध रंगजी मंदिर भी बनाया था।  लक्ष्मणगढ़ का मोदी विश्वविद्यालय गणेरीवाला परिवार द्वारा दान की गई भूमि पर बनाया गया है। सीताराम बाग मंदिर 25 एकड़ में फैला हुआ है और एक विरासत संपत्ति के रूप में वर्गीकृत है। नासिक में श्री रघुनाथजी मंदिर को सेठ राम दत्त गनेरीवाला की मां ने 120 एकड़ जमीन दान में दी थी। गीता वाटिका को गोरखापुर में गीता गार्डन के रूप में भी जाना जाता है, जिसे सेठ जयदयाल गणेरीवाला द्वारा दान की गई भूमि पर बनाया गया था। हवेली के वंशजों में फतेहपुर, मुकुंदगढ़, लक्ष्मणगढ़, रत्नागढ़ शामिल हैं। चार चौक की हवेली शेखावाटी की सबसे बड़ी हवेली है, जिसका स्वामित्व गनेरीवाला परिवार की कई शाखाओं के पास है और अब इसका प्रबंधन और नेतृत्व श्री गिरधारीलालजी गनेरीवाला करते हैं। जयपुर के पास अन्य मंदिरों में रत्नागढ़, मुकुंदगढ़, फतेहपुर, सिरसा, गनेरी आदि शामिल हैं।

बर्मा, कोलकाता, हैदराबाद के गनेरीवाल के पूर्वजों की विभिन्न प्रसिद्ध विरासत के अलावा, गनेरीवाल की नई पीढ़ी भी बहुत पीछे नहीं है। इस अद्भुत विरासत की नई पीढ़ी गणेरीवाला परिवार के नाम के तरकश में तीर जोड़ना जारी रखे हुए है। इस कबीले के कुछ उल्लेखनीय ट्रेलब्लेज़र सेलिब्रिटी डाइटीशियन मुमुन गनेरीवाल हैं। रितेश गनेरीवाल, सीफे में निवेश सलाहकार प्रमुख, फूड दर्जी के अनिरुद्ध गनेरीवाल, डॉ. सिमरन गनेरीवाल क्लीवलैंड। हांगकांग की सबसे कम उम्र की जलवायु कार्यकर्ता बहनों धान्या और रेहा गनेरीवाल को नहीं भूलना चाहिए। वे केवल 9 साल और 11 साल की बहनें हैं जो अपना पहला TEDx टॉक देने वाली हैं।

MARWADI VAISHYA COMMUNITY - भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका

#MARWADI COMMUNITY - भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका

स्वतंत्रता की भावना संस्कृति से ही प्रसारित होती है ‘पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं’- इस भावना के मूल में देश प्रेम की भावना कार्य करती है जिसका आधार मज़बूत सांस्कृतिक धरोहर होती है। वैश्य भी देशप्रेम की इस पवित्र भावना से अछूते नहीं थे। मारवाड़ी के बारे में देश में प्रचलित धारणा कि ये सिर्फ व्यापारी हैं, यह एक भ्रान्ति के अलावा कुछ नहीं ।(Bharat ke swatantrata sangram mein marwadi samaj ki bhumika)

संस्कृति, साहित्य और राष्ट्रीयता के उत्थान में मारवाड़ी वैश्यों का तन-मन-धन का भरपूर सहयोग रहा। कोलकाता के राजस्थानी कवि और शायर चम्पालाल मोहता ’अनोखा’ के अभिनन्दन पर वरिष्ठ कवि श्री ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’ ने मारवाड़ी वैश्य समाज का साहित्य और संस्कृति के विकास में अहम योगदान स्वीकार करते हुए अध्यक्षीय व्यक्तव्य में कहा कि वैश्य समाज देश का कवच और अस्त्र है । वर्तमान में यह याद करना समीचीन होगा कि भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में मारवाड़ी समाज की क्या भूमिका रही ?

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका (Bharat ke swatantrata sangram mein marwadi samaj ki bhumika)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका

उन्नीसवीं शताब्दी में वैश्य पूरे अंग्रेजी भारत, दक्षिण और मध्य भारत में अपना कारोबार फैला चुके थे । इस समय तक सामान्य रूप से इस वर्ग का अंग्रेज सरकार या अंग्रेज व्यापारियों की नीति से कोई मतभेद नहीं था, परन्तु जो व्यापारी अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह ‘जफ़र’ और मध्य भारत की देशी रियासतों के शाषकों के संपर्क में थे उनका अंग्रेज सरकार से मोह भंग होने लगा था। सन 1857 तक यह रोष बढ़ गया । देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में इन व्यापारियों ने अपनी जान माल की परवाह किये बगैर स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की। यह मदद मुख्य रूप से आंदोलन के लिए धन देकर की गई थी। इस आर्थिक मदद से अंग्रेज सरकार इतनी घबरा गई कि इन व्यापारियों को मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया।


सन 1857 में दिल्ली में मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ‘जफ़र’ की खुल्लमखुल्ला आर्थिक मदद करने वाले रामजीदास गुड़वाला का खजाना जब्त कर अंग्रेजो ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। सेठ रामजीदास गुड़वाला ने बादशाह को 3 करोड़ रुपये दान दिए थे। रामजीदास गुड़वाला मूलतः हरयाणा के अग्रवाल परिवार से थे और दिल्ली के नगरसेठ थे। सन 1857 में ग्वालियर राज्य का खजाना वहाँ के नामचीन व्यापारी सेठ अमरचंद बांठिया की देख रेख में था । सेठ बांठिया मूल रूप से बीकानेर रियासत का मारवाड़ी व्यापारी था जब ग्वालियर पर रानी लक्ष्मी बाई , नाना साहेब और तांत्या टोपे का हमला हुआ तब सेठ बांठिया ने ग्वालियर का खज़ाना इनकी सेना के खर्च पूर्ति हेतु इन्हें ही सौंप दिया । अंग्रेज सरकार ने इस घटना को राजद्रोह मानकर #सेठ_अमरचंद_बांठिया ’#बीकानेर_वाला’ को फांसी पर चढा दिया।



इसी तरह जब तांत्या टोपे भागकर जयपुर से लालसोट होते हुए सीकर पहुंचे तो सेठ रामप्रकाश अग्रवाल ने गहने और धन देकर उनकी मदद की। शोलापुर के कृष्णदास_सारडा और सतारा के सेठ सेवाराम मोर, हरयाणा के लाला_हुकुमचंद (अग्रवाल जैन) भी अपनी उग्र कारवाइयों के चलते फांसी पर झूला दिए गये । 1857 के क्रांतिकारियों के बीच समनव्यय का कार्य मारवाड़ी वैश्य वर्ग ने किया। सन्देश-समाचार पहुंचाना, सन्देश वाहकों को अपने घर में आश्रय देना, क्रांतिकारियों और उनके रिश्तेदारों को अपने यहाँ छुपाकर रखना आदि अनेक कार्य मारवाड़ी व्यापारियों द्वारा किये जाते रहे। 1857 की क्रांति की असफलता के बाद नाना साहब पेशवा का भतीजा मार्च 1862 में दक्षिण भारत के हैदराबाद में #सेठ_मोहन_लाल_पित्ती और #सेठ_शरण_मल के यहाँ गुप्त रूप से रह रहा था, पता चलने पर अंग्रेज सरकार ने दोनों पर भारी जुर्माना ठोक कर उन्हें सजा दी।


सन 1857 की क्रांति के बाद से सन 1900 तक वैश्यों और अंग्रेजों में सीधा टकराव नहीं हुआ विद्रोह के बाद दोनों पक्ष अपनी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में लगे हुए थे। इस समय तक प्रशाष्निक सुधारों के नाम पर देश की लगभग सभी रियासतों में परंपरागत कानून की जगह अंग्रेजी कानून लागू हो चूका था। इसका असर दूसरे वर्गों के साथ साथ व्यापारी वर्ग के परंपरागत विशेषाधिकारों पर भी पड़ा इस कारण रियासतों के व्यापारी और उनके प्रवासी भाई-बंधू , दोनों में अंग्रेजों के प्रति कटुता बढती गई। उदयपुर राज्य के लगभग 2000 व्यापारी 30 मार्च 1864 को नगरसेठ चम्पालाल के नेतृत्व में कर्नल ईडन के घर विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंचे और सात दिनों की हड़ताल के बाद समझौता हुआ ।

कालांतर में मारवाड़ी व्यापारी अंग्रेज व्यापारियों के एकाधिकार को हर जगह चुनौती देने लगे। शीघ्र ही मारवाड़ी व्यापारिओं की समझ में आ गया की राजनितिक दबाव और समर्थन के बगैर केंद्रीय सत्ता से जुड़े अंग्रेज व्यापारियों से व्यावसायिक टक्कर लेना मुश्किल है अंतः 1898 में बंगाल के मारवाड़ी व्यापारियों ने ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’ नाम की संस्था बनायीं ।

इस संस्था की स्थापना के साथ उनकी घोषणा थी-‘ राजनीति का सम्बन्ध व्यापार से रहता है और यह प्रत्यक्ष रूप से व्यापार को प्रभावित करती है, इसलिए ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’ भारत की राजनीति से परहेज़ नहीं रखेगी’ । इसके साथ ही मारवाड़ियों से सम्बंधित पत्र-पत्रिकाओं में , जिसमे ‘मारवाड़ी’ और ‘अग्रवाल’ पत्रिकाएं उल्लेखनीय है, मारवाड़ी व्यापारियों से राजनीति में सक्रिय योगदान का आह्वान किया गया देखते ही देखते ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’, ‘वैश्य सभा’ और ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ के माध्यम से सैकड़ों प्रगतिशील मारवाड़ी युवक तत्कालीन भारतीय राजनीति में रूचि लेने लगे।


‘मारवाड़ी एसोसियेशन’, ‘वैश्य सभा’ और ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ के माध्यम से सैकड़ों प्रगतिशील मारवाड़ी युवक तत्कालीन भारतीय राजनीति में रूचि लेने लगे थे । सन 1905 के आते-आते ये मारवाड़ी युवा राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ने शुरू हो गये बंग भंग के विरोध में बंगाल के जन आंदोलन में, विरोध सभाओं में और बाद में बंगाल के क्रन्तिकारी आंदोलन में ये युवक सक्रिय भूमिकाओं में नज़र आने लगे। बंगाल के मारवाड़ी व्यापारियों ने इंग्लैण्ड स्थित मैंनचेस्टर के ‘चेंबर ऑफ कामर्स’ से अनुरोध किया की वे ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालें और बंग भंग को रुकवाने में मदद करें । विदेशी माल के बहिष्कार आंदोलन को मारवाड़ी व्यापारियों के सहयोग से बल मिला। सितम्बर 1904 में बंगाल में जहाँ 77000 रुपये का विदेशी कपडा बिका वहीँ सितम्बर 1905 में मात्र 10000 रुपये का। 21 अक्टूबर 1905 को ‘भारतमित्र’ में ‘बंगविच्छेद’ शीर्षक लेख में लार्ड कर्जन को उग्र मुद्रा में बाल मुकुन्द गुप्त ने संबोधित किया,

‘आपके शाषन काल में बंगाविच्छेद इस देश के लिए अंतिम विषाद और आपके लिए अंतिम हर्ष है……दुर्बल की अंग्रेज नहीं सुनते”

मारवाड़ियों में आक्रोश की लहर उठी ‘जणनी जने तो दोय जण, के दाता के सूर’ की परंपरा के मारवाड़ी अग्रवाल युवा #हनुमान_प्रसाद_पोद्दार ‘स्वदेश बांधव’ और ‘अनुशीलन समिति’ जैसी क्रन्तिकारी संस्थाओं के सक्रिय सदस्य बने। पोद्दार जी ने मुंबई में अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की। सन 1914 में प्रसिद्ध ‘रोड़ा कांड’ में अनुशीलन समिति से जुड़े हुए फूलचंद चौधरी, ज्वालाप्रसाद कानोडिया, प्रभु दयाल हिम्मतसिंहका, घनश्यामदास बिडला, कन्हैयालाल चित्तलान्गिया, ओंकारमल सर्राफ, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की गिरफ्तारी के वारंट जारी किये गये। घनश्यामदास बिडला को छोड़ सभी को लंबी अवधी तक जेल में रखा गया।


ब्यावर के माहेश्वरी वंशी सेठ_दामोदरदास_राठी का बंगाल के क्रन्तिकारी अरविन्द घोष, रासबिहारी बोस और सचेतन गांगुली के साथ ही श्यामजीकृष्ण वर्मा, राजा महेंद्रप्रताप और राजस्थान के दूसरे क्रांतिकारियों से भी गहरा संपर्क रहा । कलकत्ता और काशी के क्रांतिकारियों के सहयोग से राजस्थान में भी अर्जुनलाल_सेठी के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियां बढ़ा ली थी । उनको जयपुर के सेठ छोटेलाल और मोतीलाल ने काफी आर्थिक मदद की तब तक महात्मा गांधी का प्रवेश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नहीं हुआ था।

सन 1915 में महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति में पदार्पण के साथ ही मारवाड़ी व्यापारियों का झुकाव उनकी तरफ हुआ। महात्मा गांधी की भावुक राजनीति ने मारवाड़ी वैश्यों को आकर्षित किया । सेठ_जमनालाल_बजाज जी इनमे अग्रणी थे । एनी बेसेंट के होम रुल आंदोलन में सेठ फूलचंद चौधरी और सेठ कन्हैलाल चित्तलान्गीया गिरफ्तार हुए। जलियांवाला बाग की घटना में मारवाड़ी युवक भी मारे गये थे। जमनालाल बजाज ही शेखावाटी के अग्रवाल परिवार से थे। उस समय तक कांग्रेस मारवाड़ियों का महत्व समझ चुकी थी । इसलिए सन 1920 में जमना लाल बजाज को कांग्रेस पार्टी का कोषाध्यक्ष बना दिया गया।



कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में ‘तिलक स्वराज फंड’ में ज्यादा से ज्यादा कोष जमा करवाने का आव्हान महात्मा गांधी ने किया। इसके जबाब में जमनालाल बजाज, आनंदीलाल पोद्दार, रामकृष्ण मोहता, घनश्यामदास बिडला, केशोराम पोद्दार, रामकृष्ण डालमिया और सुखलाल करनानी ने लाखों रुपये स्वराज फंड में जमा करवाए । अकेले कलकत्ता के बडाबाजार से उस समय दस लाख रुपये एकत्रित हुए। महात्मा गांधी के विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन का नेतृत्व जमनालाल बजाज और कृष्णदास जाजू ने किया । शेखावटी के हर बड़े कसबे में घनश्याम_दास_बिडला ने खादी भण्डार खुलवा दिये थे।

जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिडला, कृष्णदास जाजू, सिद्धराज ढढा, ब्रजलाल बियानी दूसरे मारवाड़ी व्यापारियों के साथ खादी प्रचार-प्रसार, हरिजन उद्धार के कार्यक्रमों में महात्मा गांधी के सक्रिय सहयोगी रहे । घनश्याम दास बिडला हरिजन-सेवक संघ के अध्यक्ष थे। जमना लाल बजाज और सिद्धराज ढढा ने राजस्थान की रियासतों में घूम घूम कर खादी और हरिजन-उद्धार का बहुत प्रचार किया। नमक सत्याग्रह में मारवाड़ियों ने खुलकर भाग लिया, असहयोग आंदोलन की रीढ़ ही मारवाड़ी व्यापारी थे त। त्कालीन बंगाल सरकार के अधिकारी ए. एच. गज़नवी ने वायसराय के प्रतिनिधि कनिंघम को 27 अगस्त 1930 को पत्र लिखा –“ महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से मारवाड़ियों को अलग कर दिया जाये तो 90 फीसदी आंदोलन यूं ही खत्म हो जायेगा ”

अंग्रेज सरकार ने बंगाल के मारवाडी व्यापारियों को आन्दोलन से अलग करने के लिए राजस्थान की रियासतों के शाषकों पर दबाव दिया लेकिन लगभग सभी रियासतों ने इसमें अपनी असमर्थता जता दी । उस समय मारवाड़ियों की संस्थाओं ने मारवाड़ियों से भारतीय राजनीति में और ज्यादा सक्रिय होने का आह्वान किया । अखिल भारतीय मारवाड़ी अग्रवाल सभा के सन 1926 में हुए सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सेठ_जमनालाल_बजाज ने आव्हान किया –‘अग्रवाल समाज ने आन्दोलनों में धन दिया,जेल भुगती लेकिन अब समय आ गया है की समाज का बच्चा-बच्चा देश पर बलिदान होने के लिए तैयार रहे”


इसी तरह अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन के भागलपुर में आयोजित चौथे सम्मेलन में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले मारवाड़ियों की प्रसंशा में प्रस्ताव पास किया गया । सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ को सहयोग करने के लिए शेखावाटी के अग्रवाल सेठ भगवान दास बागला ने वर्मा में रंगून स्थित अपनी ‘नेशनल बेंक ऑफ इण्डिया’ ही सुभाष बाबु को सौंप दी ।

सन 1942 के ‘करो या मरो’ आंदोलन में डॉ.राम मनोहर लोहिया और मगनलाल बागड़ी का योगदान अविष्मर्णीय है। मालचंद हिसारिया और नेमीचंद आंचलिया गिरफ्तार हुए । भारत छोड़ो आंदोलन में 483 मारवाड़ियों को सजा सुनाई गई ।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान वैचारिक क्रांति में जो अखबार अपना योगदान दे रहे थे वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मारवाड़ी व्यापारियों के आर्थिक सहयोग से ही निकाल रहे थे । हिंद केसरी, हरिजन, कर्मवीर, प्रताप, लीडर,त्याग-भूमि, भारतमित्र आदि अखबार इसकी मिशाल हैं । इस क्षेत्र में भागीरथ कानोडिया का योगदान महत्वपूर्ण है । चिडावा के ताराचंद डालमिया और मंडावे के देव किशन सर्राफ का नाम इस क्षेत्र के किसानो कि समस्या समाधान हेतु संघर्ष में अग्रणी है।

सीकर के किसानो की समस्याओं का समाधान करने के लिए सीताराम सेक्सरिया ने जमना लाल बजाज के साथ मिलकर सफल परिश्रम किया । अन्य राज्यों के किसान आंदोलनों को आर्थिक सहयोग देने में भी मारवाड़ी व्यापारी पीछे नहीं रहे।।


पंजाब केसरी और अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे तीव्र स्वर में आंदोलन चलाने वाले लाल-बाल-पाल तिगड़ी के लाला लाजपत राय जी को कौन भूल सकता है। सन् 1928 में लाला जी साइमन कमिसन के विरोध में अंग्रेजों के क्रूर लाठीचार्ज का शिकार हुए और अपने प्राणों का त्याग कर दिया। बंगाल के लाल-बाल-पाल कही जाने वाली तिगड़ी के बिनोय बसु, बादल गुप्त और दिनेश गुप्त तिगड़ी ने भारतीयों से क्रूर व्यहवार करने वाले अंग्रेज़ अधिकारी सिम्पसन की गोली मारकर हत्या कर दी थी।


इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का गौरव शाली अध्याय लिखने वाले मारवाड़ी वैश्य व्यापारियों ने पूरे देश के लोगों के साथ मिलकर तन,मन और धन से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका दर्ज की ।

MARWADI COMMUNITY -मारवाड़ी समाज : एक तथ्यात्मक विवेचन

#MARWADI COMMUNITY -मारवाड़ी समाज : एक तथ्यात्मक विवेचन

आस्ट्रेलिया की मीडियाकास्ट कम्पनी को मारवाड़ी समाज पर एक टेलीचित्र तैयार करना था। इस सिलसिले में शोधकर्ता एवं लेखक श्री कीथ एडम भारत आये हुए थे। टेलीचित्र के प्रोड्यूसर डायरेक्टर श्री बिथवन सिरो एवं उनकी कैमरा टीम भी साथ थी। जो टेलीचित्र उन्होंने तैयार किया, वह आजकल डिस्कवरी चैनल पर दिखाया जा रहा है। चूंकि टेलीचित्र मारवाड़ी समाज पर तैयार होना था- उन्होंने मेरे साथ कई बैठकें कीं। उन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालयों से प्रकाशित कुछ शोधपत्रों को पढ़ा था। टिमबर्ग की पुस्तक 'मारवाड़ी समाज-व्यवसाय से उद्योग में` का भी अध्ययन किया था। पर कहने लगे कि बातें स्पष्ट नहीं हो पा रही हैं। मारवाड़ी शब्द का आशय किसी समाज से है या समूह से, यह जाति है या मात्र एक वर्ग है! कोई व्यक्ति मारवाड़ी है, यह कैसे पहचाना जाता है? उसके कर्म से या उस क्षेत्र से, जहां से वह आया है, या उसकी भाषा और संस्कृति से! मारवाड़ी समाज द्वारा व्यापार एवं उद्योग के क्षेत्र में की गई उल्लेखनीय प्रगति के कारणों की व्याख्या करते हुए टिमबर्ग तथा टकनेत आदि लेखकों ने साहसिकता, संयुक्त परिवार प्रणाली, नैतिकता, मितव्ययिता, व्यावहारिकता और व्यापारिक प्रशिक्षण, धार्मिक और जाति भावना सरीखे गुणों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है। परंतु श्री कीथ का प्रश्न था कि ये सभी गुण इसी जाति में क्यों आये- इसके पीछे क्या कारण रहे हैं- क्या इस पर कोई शोध हुआ है? मैंने कहा- प्रथम कारण था, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सहोदरा गणेश्वरी सभ्यता जो कि शेखावाटी तथा मारवाड़ की धरती पर फली-फूली थी। सिंधु घाटी के नगरों में तांबे के जो बर्तन और औजार मिले हैं, वे खेतड़ी तथा सिंघाना स्थित खानों से निकाले गये तांबे से बनाये जाते थे। भारतीय इतिहास की सोवियत विशेषज्ञ ए. कोरोत्सकाया लिखती हैं कि प्राचीन काल से ही अनेक सार्थ मार्ग राजस्थान से होकर गुजरते थे और ऊंटों की लम्बी कतारें लम्बी दूरियां तय करती थीं। इनसे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण कारण रहा था राजस्थानी भाषा का साहित्य। पौ फटने से बहुत पहले ही घर की औरतों को चक्की पीसने, दही बिलौने, कुएं से पानी निकालने जैसे कई श्रम-साध्य कार्य करने पड़ते थे। श्रम की थकान का पता नहीं चले, इसलिये वे राजस्थानी लोक-काव्य को सरस धुनों में गाती थीं। यह सब सोये हुए बच्चों के कानों में स्वत: जाता रहता था। वह सब उसके खून में रच-बस जाता था। इसी तरह रात में बच्चों को सुलाने के लिए भी मां और दादी लोरियां सुनाती थीं- 'जणणी जणै तो दोय जण, कै दाता के शूर।` बच्चों को साहसिकता का पाठ अलग से पढ़ाने की जरूरत नहीं होती थी। यह उनको घूंटी में ही मिलते थे। ये ही बातें उनके जीवन की प्रवृत्ति बन जाती थी। इसी कारण युद्ध और व्यापार के क्षेत्र में वहां के लोगों ने नये कीर्तिमान स्थापित किये। श्री कीथ ने पूछा- क्या आज के मारवाड़ी परिवारों में भी बच्चों को इस तरह की लोरियां सुनाई जाती हैं? यदि नहीं तो आगामी सदी के व्यापार और उद्योग क्षेत्र में इनका वर्चस्व कायम रह सकेगा? मुझे संदेह है, पर चाहता हूं कि मेरा संदेह गलत हो। चूंकि हम बीसवीं सदी पार कर चुके हैं, मारवाड़ियों से सम्बन्धित यह विषय गंभीर चर्चा की अपेक्षा रखता है।

मारवाड़ी समाज और भ्रान्तियां :

सही है कि मारवाड़ी समाज के इतिहास में औद्योगिक घरानों और कोलकाता शहर का अहम् स्थान है। पर सही यह भी है कि जिस किसी ने भी मारवाड़ी समाज पर लिखने की कोशिश की, ये दोनों मुद्दे उसके लेखन पर इस कदर हावी हो गये कि वह विस्तार से अन्य कुछ देख भी नहीं पाया। वरना यह भी तो लिखा जाना चाहिये था कि कोलकाता के महाजाति सदन की दीवारों पर लगे हुए क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्रामियों के सौ से भी अधिक तैल-चित्रों में बीस-बाईस चित्र मारवाड़ी समाज के लोगों के भी हैं। ये वे लोग थे, जिन्होंने शचीन्द्र सान्याल से लेकर रासबिहारी बोस तक को गोला-बारूद उपलब्ध कराया था, रोडा हथियार कांड में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और सन १९४७ तक हर आंदोलन में जेल के सींखचों के भीतर रह कर भी आजादी की जंग लड़ी थी। सुप्रसिद्ध विचारक राममनोहर लोहिया को इसी समाज ने पैदा किया था और इसी समाज की साहसिक पुत्री थी इन्दु जैन, जिन्होंने कोलकाता की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गिरताराी दी थी। मारवाड़ी समाज के इतिहास में कानून विशेषज्ञ हरबिलास शाारदा, सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ एवं संपादक पंडित झाबरमल्ल शर्मा, प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. दौलतसिंह कोठारी का जिक्र भी आना चाहिये। नोबल पुरस्कार की तैयारी करने वाले डॉ. सी.वी. रमन को वैज्ञानिक उपकरणों के लिए और शांति निकेतन हेतु धन इकट्ठा करने के लिए स्वयं मंच पर उतरते को उद्धत कविगुरु टैगोर को जरूरी धनराशि मुहैया कराने वाले घनश्याम दास बिड़ला मारवाड़ी थे। शांतिनिकेतन का हिन्दी भवन, वनस्थली का महिला विद्यापीठ, कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद मारवाड़ी समाज के लोगों की ही देन हैं। रूपकंवर सतीी कांड के विरुद्ध बंगाल का पहला प्रतिवाद जुलूस मारवाड़ी समाज के युवकों ने ही निकाला था। मात्र बड़ाबाजार में ही नहीं, धर्मतल्ला तक की सड़कों पर खुद की भाषा राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता के लिए मारवाड़ियों ने सड़क पर जुलूस निकाले हैं।

ये सब तथ्य जब लेखों में उभरकर नहीं आते हैं, तो मारवाड़ी समाज मात्र औद्योगिक समूह बनकर रह जाता है। इतर समाज के लोग मानने लगते हैं कि इस समाज के पास भाषा, साहित्य, संस्कृति ओर कला के स्तर पर कुछ भी नहीं है। पैसा कमाना ही इसका कर्म है, धर्म है।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार निशीध रंजन रे इकोनोमिक टाइम्स के किसी विशेषांक के लिए एक लेख भेज रहे थे, जिसमें इसी तरह की अवधारणा थी। परंतु एक निजी मुलाकात में जब उनसे मारवाड़ी समाज के ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भों में बात हुई तो उन्होंने खुद के पास उपलब्ध जानकारियों को अधूरा माना। उन्होंने लेख का अन्त इस वाक्य से किया- It will be absorbing interest to know and ascertain the origin & nature of the forces of physical, environmental and otherwise, which marked out the Marwari as an uncommon community in India.

टिमबर्ग के शोध का एक विशेष विषय था। इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम From Traders to Industrialist दिया। पर मारवाड़ी को मात्र व्यापारी मानने की भ्रांति को इससे अनजाने में ही सहारा मिला। मारवाड़ नाम से प्रकाशित बहुत मंहगी, चिकने कागजों पर परिवारों तथा व्यक्तियों के बहुरंगी चित्रों के साथ छपने वाली पत्रिका ने अपने प्रवेशांक में मारवाड़ी की परिभाषा देते हुए मारवाड़ी समाज की प्रगति यात्रा को किसान से उद्योगपति होने का करिश्मा बता दिया ाहै। गलती पुख्ता होती गई, जब अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में मारवाड़ी समाज की औद्योगिक प्रगति पर तैयार किये गये मोनोग्रास् को ही मारवाड़ी समाज का इतिहास माने जाने लगा। खुद मारवाड़ी समाज के कुछ लोगों ने कर्म की समानता को मारवाड़ी होने की पहचान बताना चालू कर दिया। रही सही कमी पांचवें दशक के रूसी विचारक डाइकोव ने कर दी, जिसने पूरे मारवाड़ी समाज को बुर्जुवा की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। श्री द्विजेन्द्र त्रिपाठी ने लिखा- मारवाड़ी समुदाय नहीं, समूह है। अन्य किसी के लिए क्या कहें, अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन इसको सम्पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं कर पाया था। सन् १९५८ में छपे नये संविधान में इसे ठीक ढंग से परिभाषित किया गया। 'राजस्थान, हरियाणा, मालवा तथा उसके निकटवर्ती भू-भागों के रहन-सहन, भाषा तथा संस्कृति वाले सभी लोग जो स्वयं अथवा उनके पूर्वज देश या विदेश के किसी भू-भाग में बसे हों, मारवाड़ी हैं। यह परिभाषा आज तक मानक रूप में स्वीकार्य है।

मारवाड़ी शब्द को लेकर भी अजीब उलझन पैदा की जाती है। किसी से आप पूछते हैं कि आप कहां से आये हैं, तो स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने शहर या प्रांत का नाम बतायेगा। पर आप पूछें कि आप कौन हैं, तो वह अपनी भाषा के आधार पर खुद का परिचय देगा। मसलन कर्नाटक का व्यक्ति कहेंगा, वह कन्नड़ हैं। आन्ध्र का कहेगा, वह तेलगु है। इसी तरह राजपूताने के विभिन्न इलाकों से आने वाले व्यक्ति मारवाड़ी इसलिए कहलाये कि उनकी भाषा मारवाड़ी थी। वे अपने आप को मारवाड़ी कहते थे। जहां तक मारवाड़ और मारवाड़ी शब्द के सम्बन्ध का प्रश्न है, यह सही है कि मारवाड़ से आने वाले लोग मारवाड़ी कहलाने के अधिकारी हैं। कहा जाता है कि बंगाल में पहले-पहल मारवाड़ के लोग ही आये थे। वे चाहे सन् १५६४ में सुलेमान किरानी की सहायता के लिए भेजी गई अकबर की फौज के राजपूती सिपाही हों, चाहे टोडरमल और राजा मानसिंह के साथ सन् १५८५ से सन् १६०५ तक आई मुगल फौज की रसद व्यवस्था करने वाले कारिन्दें। बंगाल के संदर्भ में कहा जाता है कि ये लोग मारवाड़ से आये थ, सो मारवाड़ी कहलाये। पर देश का कोई ऐसा प्रान्त नहीं हैं, जहां मारवाड़ी नहीं गया हो या आज भी नहीं बसा हो। इन बसे हुए लोगों में एक बहुत बड़ी संख्या ऐसी है, जिसका मारवाड़ से कोई ताल्लुक नहीं है। प्रश्न उठता है कि वे मारवाड़ी क्यों कहलाये? उत्तर बहुत स्पष्ट है। वे सभी लोग मारवाड़ी बोलते थे। और जहां भी गये,, उन्होंने अपना परिचय मारवाड़ी के नाम से दिया। इसीलिए राजस्थान से आने वाला हर व्यक्ति मारवाड़ी कहलाया। चार सौ वर्ष पहले राजस्थान और राजस्थानी शब्द नहीं बने थे। अत: खुद के परिचय के लिए राजस्थानी शब्द की जगह मारवाड़ी शब्द का प्रयोग किया गया। सन् १९६१ की जनगणना का आकड़ा देखने पर हैरानी होती है। इसके अनुसार राजस्थानी बोलने वालों की संख्या केवल १.४९ करोड़ आंकी गई, जिसमें आन्ध्र में ५.७ लाख, मध्य-प्रदेश में १६.११ लाख, महाराष्ट्र में ६.२९ लाख, कर्नाटक में ३.०५ लाख, बंगाल में ३.७२ लाख और दिल्ली में २.९२ लाख हैं। संख्या निश्चित रूप से कम है। पर कुछ बातें काफी स्पष्ट हैं। चूंकि आन्ध्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश में बसे लाखों व्यक्ति केवल व्यवसायी नहीं हैं, वे जीवन के हर क्षेत्र में कार्यरत हैं। ये लोग केवल मारवाड़ से नहीं, बल्कि राजस्थान के अन्य जनपद से भी आये हैं।

उद्यमशीलता की पृष्ठभूमि

इन बातों को ध्यान में रखते हुए मारवाड़ी समाज की विभिन्न प्रवृत्तियां एवं आर्थिक समृद्धि के इतिहास का अध्ययन किया जाये तो कुछ नये तथ्य सामने आते हैं। हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि अंग्रेजी राज के पहले तक भारतवर्ष बहुत ही समृद्ध देश रहा है। यहां पाई जाने वाली विभिन्न तरह की जलवायु, उर्वरा मिट्टी, नदी और पहाड़, सपाट मैदान इसके प्रमुख कारण थे। ग्रीक, कुशाण, हूण, मंगोल सभी लोग समृद्धि के कारण यहां आये थे और इसीलिए पुर्तगीज डच, फ्रेंच तथा अंग्रेज लोगों ने यहां कोठियां बना कर व्यापार करने की मंजूरी ली थी। जाहिर है, केवल राजसत्ता ही नहीं, यहां के व्यापारियों के व्यापारिक मार्गों का इतिहास भी बहुत रोमांचक रहा है, महत्त्वपूर्ण रहा है। यह अलग बात है कि इस पर अधिक लिखा नहीं गया है। सही है कि व्यापार के बड़े केन्द्र बंदरगाह हुआ करते थे। परन्तु चीन, काबुल, कश्मीर, कंधार आदि का माल गुजरात के बंदरगाहों तक पहुंचाने के लिए जो महत्त्वपूर्ण मार्ग थे, वे राजस्थान से होकर गुजरते थे। इसीलिए यहां के निवासियों की व्यापार-पटुता आज भी शोध-कर्त्ताओं के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है। मुगल शासन के प्रारम्भ काल मंे जब इन मार्गों पर सुरक्षा की अच्छी व्यवस्था थी, तो उत्तर में कश्मीर और काबुल तथा दक्षिण में मालाबार तक इन्होंने अपनी शाखायें खोली। पंजाब और बिहार में तो इनका व्यापार पहले से ही था। स्वयं सेठ लोग शेखावाटी में रहेू ओर वहीं से लाखों रुपये की हुंडिया भुनाते रहे, लाखों रुपये की इंश्योरेंश भी लेते रहे, ताकि छोटे व्यापारियों को कार्य करने में ज्यादा नुकसान का डर नहीं रहे।

शायद यह पहली जाती है, जिसने व्यापार को गति प्रदान करने के लिए व्यापारिक लिपि मुड़िया ईजाद ही नहीं की, उसका व्यापारिक स्तर पर प्रयोग भी किया। पढ़ने के लिए बारहखड़ी सिखाते थे तो व्यापार-पटु होने के लिए स्कूल में रोजमर्रा की महारणी संख्याओं की गिनती एवं जोड़-भाग कंठस्थ करवाया जाता था। महाजनी की पुस्तक उस समय कम्प्यूटर थी। मात्र अंगुलियों पर मुश्किल से मुश्किल व्यापारिक सौदे का हिसाब कर दिया जाता था। अफीम का बहुत बड़ा व्यापार होता था। रोजमर्रा के भाव की जानकरी जरूरी थी और डाक व्यवस्था नहीं थी तो इन लोगों ने चिलका डाक ईजाद की थी- बड़ी पहाड़ियों पर शीशा का प्रयोग कर के सही भाव पहुंचा दिये जाते थे। इन बातों का प्रभाव वहां की कला-संस्कृति, भाषा-वास्तुशिल्प पर भी पड़ा। श्रीमती कोरोत्सकारया लिखती हैं कि राजस्थान जैसे नगर भारत में कहीं नहीं मिले। ये नगर जिनमें अधिकांशत: वैदेशिक व्यापार से मालामाल हुए व्यापारी और महाजन रहते थे, बहुत बातों में इटली के पुनर्जागरण कालीन नगरों की याद दिलाते हैं। जर्मन विद्वान रायटर आस्कर लिखते हैं कि भारत के और सभी नगरों की अपेक्षा संभवत: वे ही अपनी संरचना में और आवासीय भवनों की भव्यता में इतालवी नगरों से सबसे ज्यादा साम्य रखते हैं। कहने का तात्पर्य है कि राजस्थान के बाहर जो मारवाड़ी समाज गया, उसकी यह पृष्ठभूमि रही है। ऐसा ही नहीं है कि यहां के सभी लोग समृद्ध थे, परन्तु मध्यम वर्ग के लोगों में भी विकास की गहरी संभावनाएं थी और जब उनको १८२० के बाद व्यापार के अवसर मिले तो समाज के कुछ समृद्ध लोगों की तरह वे खुद भी बड़ी संख्या में समृद्ध बनने में सफल सिद्ध रहे।
मारवाड़ से आए हुए जगत सेठ की समृद्धि से बहुत लोग परिचित हैं। बंगाल के वस्त्र उद्योग एवं समुद्री व्यापार से होने वाली आय, सिक्के ढालने का मिला हुआ एकाधिकार उनकी आर्थिक प्रगति के प्रमुख कारण थे। धन इतना था कि डच सरकार समझ नहीं पाई कि इतने पैमाने पर रुपयों का लेन-देन उस समय की डच कम्पनी किस सरकार या बैंक के साथ कर रही है! कोई एक घराना इतना धनाढ्य हो सकता है, यह विश्वास के बाहर की चीज थी। इसीलिए तो दिल्ली के बादशाह ने उन्हें जगत सेठ का खिताब दिया था।

गुजरात तो बंगाल से भी बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। प्रश्न यह उठता है कि उस समय दिल्ली एवं बंगाल में दोनों जगह शासन नवाबी-मुगलों का था, फिर सहूलियत ओर अधिकार एक मारवाड़ी को क्यों दिये गये? उस समय दक्षिणी प्रदेशों का सारा धन गोलकुंडा में आकर इकट्ठा होता था। सूरत मंडी में खोजा एवं बोरा लोगों को अधिकार दिये गये थे। बीरजी बोरा दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति माना जाता था। गोलकुंडा में यह अधिकार मोहम्मद सईद आर्दितानी को था, जो बाद में हीरों की खानों का मालिक भी बन गया था। गोलकुंडा का ही नहीं,, वह दिल्ली का भी मीर जुमला बना। इस तथ्य का जिक्र मात्र इसलिए किया गया है कि मारवाड़ी जाति के लोग ही हैं, जो उस समय से आज तक व्यापार में कामयाबी प्राप्त करते रहे हैं। कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व सभापति चिरंजीलाल झुंझुनवाला कहते थे- हम लोगों में 'सिक्स्थ सेंस` था। अफीम की तेजी-मंदी का अंदाज जितनी जल्दी मारवाड़ी व्यावसायियों को हुआ, उसकी कोई मिसाल नहीं है। बहुत धन कमाया अफीम के व्यापार में। बलदेवदास दूधवेवाला बताते थे कि जब वे स्टॉक एक्सचेंज में घुसते थे तो उन्हें गंध-सी आती थी कि ये शेयर घटेंगे और ये शेयर बढ़ेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रथम महायुद्ध के समय शेयर बाजार में सेना की जरूरतों को पूरा करने के व्यापार में मारवाड़ी समाज ने अकूत दौलत कमाई। सुप्रसिद्ध अमेरिकी लेखक सेलिंग एस हरीसन ने अपनी पुस्तक 'इंडियाज मोस्ट डेंजरस डिकेड्स` में इसका कारण मारवाड़ी के सर्वदेशीय फैलाव को माना है। अन्य लोगों को व्यापारिक कार्यों में भुगतान के लिए सम्पर्क सूत्र खोजने पड़ते थे। पर इस जाति के लोग छोटे-छोटे गांव में भी मिल जाते थे, जिससे व्यापार करने में सहूलियत होती थी।

सर्वदेशीय फैलाव

एक प्रश्न यह भी उठता है कि यह जाति अपना स्थान छोड़ कर पूरे भारत में क्यों फैली? रण और व्यापार के मैदान इस जाति के कार्य के प्रमुख केन्द्र रहे हैं। बहुत पहले से ही ये लोग नदी के किनारे के शहरों एवं इससे सटे दूर-दराज के गांवों-कस्बों में सीमित संख्या में बाहर जाते रहते थे। खुर्जा, मिर्जापुर, भागलपुर, इंदौर आदि की व्यापारिक मंडियों में लोगों ने अपनी पहचान बना रखी थी। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मराठा और पिंडारियों की लूटपाट के कारण राजस्थान के व्यापारिक मार्ग सुरक्षित नहीं रहे, इसलिए इन लोगों को दूसरे स्थानों पर जाना पड़ा। सबसे बड़ा कारण १८२० में देशी रियासतों और ब्रिटिश सरकार के बीच हुई संधि थी, जिसके तहत वहां टैक्स की दरों में बढ़ोतरी और कोलकाता जैसी अंग्रेजी बस्तियों में व्यापार को ज्यादा सहज बना दिया गया था। सैंकड़ों और हजारों की संख्या में शेखावाटी से व्यापारियों के प्रवसन का यह सबसे बड़ा कारण था।

१८१३ में इंग्लैण्ड में पारित किये गये एक्ट के अंतर्गत वहां की प्राइवेट कंपनियों को अधिकार मिल गये कि वे भारत में व्यापार कर सकती हैं। अत: बड़ी संख्या में वहां की कम्पनियों ने कोलकाता में ऑफिस खोला। इन लोगों को एजेण्ट एवं बनियनों की जरूरत थी। इस तरह ये दोनों संयोग मिले और मारवाड़ी समाज के लोगों ने अपना कारोबार बढ़ाया। उस समय आई हुई अंग्रेजी कम्पनियों ने बंगाली और खत्री समाज के लोगों को प्रारम्भ में एजेण्ट तथा बनियन बनाया था। परन्तु व्यापार कुशल नहीं होने के कारण वे लोग संतोषजनक कार्य नहीं कर सके। जबकि मारवाड़भ् समाज के लोगों ने इसे बहुत सफलता के साथ सम्पन्न किया। यदि वे इसमें खरे नहीं उतरते तो निश्चित रूप से ब्रिटिश कम्पनियां मद्रास या सूरत को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाती और बंगाल राष्ट्र के आर्थिक मानचित्र में प्रथम स्थान प्राप्त नहीं कर सकता था। बंगाल को मारवाड़ी समाज की यह बहुत बड़ी देन है, जिसका सही मूल्यांकन नहीं किया गया। यह मूल्यांकन इसलिए नहीं हुआ कि व्यापारिक गतिविधियों में यह समाज जरूरत से ज्यादा खोया रहा और खुद की भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला और इतिहास के प्रति उदासीनता की नींद में सोया रहा। इस स्थिति में भी शिक्षा-साहित्य सेवाओं तथा जन-कल्याण के कार्यों में जितना काम इस समाज ने किया है, वह अपने आप में शोध का कार्य है। उसे भी अब तक लिपिबद्ध कर के इतर समाज के समक्ष नहीं लाया गया है। इसीलिए आज इस समाज का युवा वर्ग अपने गौरवपूर्ण इतिहास के बारे में बहुत कुछ अनभिज्ञ है।

स्पष्ट है, मारवाड़ी समूह नहीं, समाज है। दो शताब्दी तक राष्ट्र के आर्थिक जगत में इसका सर्वोपरि स्थान रहा है। डॉ. हजारी की मोनोपाली रिपोर्ट से ले कर गीता पीरामल द्वारा तैयार की गई विभिन्न पुस्तकों और लेखों के अनुसार सन १९९० तक के प्रथम दस शीर्षस्थ व्यापारिक घरानों की पूंजी के ७० प्रतिशत भाग का मालिक मारवाड़ी समाज था। पर अब ऐसा नहीं है। सन् १९९८ में बिजनेस इंडिया ने देश के प्रथम ५० औद्योगिक घरानों का अध्ययन किया, यह देखने के लिए कि इनमें से कितने घराने इक्कीसवीं सदी में अपना वजूद कायम रख सकेंगे। इन पचास लोगों की सूची में मुश्किल से ८-१० नाम मारवाड़ी घरानों के हैं। इक्कीसवीं सदी में वजूद रख सकेंगे, ऐसे मात्र दस घराने हैं और मारवाड़ी समाज का तो केवल एक घराना! ध्यान में रखने की बात यह है कि यह सूची छ: वर्ष पुरानी हो चुकी है, जिसमें इन्फॉरमेशन टेक्नोलोजी उद्योग प्राय: शामिल ही नहीं है। आज यह सूची बने तो आठ-दस आई.टी. उद्योगों को शामिल करना पड़ेगा। तब निश्चित रूप से मारवाड़ी समाज का अनुपात और कम हो जायेगा। मारवाड़ी समाज के लिए यह चिंता का विषय है। अफसोस हे कि सामूहिक स्तर पर न कोई चिंतन है और नही चिंता। प्रसिद्ध विचारक एवं लेखक विल ड्यूरेट ने प्रव्रजनशील या प्रवासी जाति की विशेषताओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि ऐसी जातियों या समुदायों में पतन के लक्षण कोई डेढ़ सौ वर्षों में दिखलाई पड़ने लगते है और दो से ढाई सौ वर्षों में उनका पूर्ण पतन हो जाता है।

क्या मारवाड़ी समाज पतनोन्मुख है?

प्रोक्टर एंड गेंबल के पूर्व अधिकर्त्ता गुरुचरण दास ने मारवाड़ी समाज के संदर्भ में नोबल पुरस्कार प्राप्त जर्मन लेखक टॉमस मान की पुस्तक के हवाले से केनेडी और रॉकफेलर परिवार का उदाहरण दे कर कहा है कि किस तरह चार-पांच पीढ़ियों के बाद व्यापारिक घरानों का हा्रस होता है। शादियों-उत्सवों के खर्च, दिखावा, आरामतलब की जिंदगी उकने जीवन के अंग बन जाते हैं। मारवाड़ी समाज के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है। टैक्नीकल एवं वैज्ञानिक शिक्षा के अभाव की कमियां साफ नजर आने लगी हैं। समय रहते कुछ निर्णायक कदम नहीं उठाये गये, सोच और कर्म के स्तर पर कुछ बुनियादी तब्दीलियां नहीं हुई तो संभव है कि इतिहास ग्रंथों में दर्ज किया जाये कि बीसवीं सदी के ढलते-ढलते मारवाड़ी समाज की आर्थिक समृद्धि का सूरज भी ढलने लगा था।

KHADAYAT VAISHYA - खडायता बनिया समाज के गोत्र व कुलदेवियाँ

 #KHADAYAT VAISHYA - खडायता बनिया समाज के गोत्र व कुलदेवियाँ

अठारह ब्राह्मण भगवान् कोट्यर्क की आराधना कर रहे थे। उस समय प्रत्येक ब्राह्मण की सेवा सुश्रूषा के लिए दो दो वैश्य लगे हुए थे। वे अठारह ब्राह्मण खड़ायता ब्राह्मण और सेवारत वैश्य खड़ायता वैश्य कहलाए।

खड़ायता वैश्यों के गोत्रों और कुलदेवियों का ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड में निम्नानुसार वर्णन है-

वणिजां च प्रवक्ष्यामि गोत्राणि विविधानि च | 
गुन्दानुगोत्रं नान्दोलु मिंदियाणु तृतीयकं || 
नानु नरसाणु वैश्याणु मेवाणु सप्तमं तथा | 
भटस्याणु साचेलाणु सालिस्याणु तथैव च || 
कागराणु तथा गोत्रंमिथ्यं च प्रकीर्तितम् ||

कुलदेवियों का वर्णन-

देव्यश्च द्वादश प्रोक्तास्तत्राद्या नेषुसंज्ञाका | 
ततो गुणमयी प्रोक्ता नरेश्वरी तृतीयका || 
तुर्या नित्यानन्दिनी तु नरसिंही च पञ्चमी | 
षष्ठी विश्वेश्वरी प्रोक्ता सप्तमी महिपालिनी || 
भण्डोदर्यष्टमी देवी शङ्करी नवमी तथा | 
सुरेश्वरी च कामाक्षी देव्यो ह्येकादश स्मृताः || 
तया कल्याणिनीयं वै द्वादशी तु प्रकीर्तिता ||

खडायता वैश्य / बनिया समाज की गोत्र अनुसार कुलदेवी-सारणी (Khadayata Vaishya / Baniya Samaj Gotra Kuldevi List)

गोत्र कुलदेवी
गुंदाणु नेषु देवी
नांदोलु गुणमयी
मिंदियाणु नरेश्वरी
नानु नित्यानन्दिनी
नरसाणु नरसिंही
वैश्याणु विश्वेश्वरी
मेवाणु महिपालिनी
भटस्याणु भण्डोदरी
साचेलाणु शङ्करी
सालिस्याणु सुरेश्वरी
कागराणु कामाक्षी
कल्याण कल्याणिनी

THE GREAT VAISHYA COMMUNITY

THE GREAT VAISHYA COMMUNITY

महापंडित आचार्य कौटिल्य ने कहा था

 "धर्मस्य मूलमर्थ: | अर्थस्य मूलं राज्यं |"

- धर्मस्य मूलमर्थ: - धर्म का मूल अर्थ है तो बनिये कुछ करते क्यों नहीं ? बनिया ही धर्म संभाल सकता है..
 
अबे भाई चाणक्य की quote लेनी है तो पूरी लो ना..

 "धर्मस्य मूलमर्थ: | अर्थस्य मूलं राज्यं |" - धर्म का मूल अर्थ है लेकिन अर्थ का मूल राज है.. तो भैया बनियों पर पैसा है ठीक बात.. उस पैसे से बनिये धर्म के लिए करते भी रहते हैं लेकिन जब उस अर्थ में राज यानी पावर का सुमेल होगा तभी तो शुद्ध सनातनी चमत्कार होगा..

बनियों ने राज संभाला जब तो उस गुप्त वंश को भारत का और सनातन धर्म का स्वर्णयुग कहा गया.. ये था "धर्मस्य मूलमर्थ: | अर्थस्य मूलं राज्यं |" का चमत्कार

भीष्म पितामह ने महाभारत में युधिष्टर को राज्यधर्म का उपदेश समझाते हुए कहा की मंत्रिमंडल में - 4 ब्राह्मण, 8 क्षत्रिय, 18 वैश्य और 4 शुद्र होने चाहिए..


वैश्यों की जो इतनी बड़ी संख्या है उसका मूल ही यही है -

 "धर्मस्य मूलमर्थ: | अर्थस्य मूलं राज्यं |" वैश्यों को पावर दोगे तो सनातन का और राष्ट्र का उत्थान अपने आप होगा

एक वैश्य सम्राट हर्षवर्धन ने विदेशी शको और हूणों को जबरदस्त मार लगाई थी.
 
महाराणा भामाशाह जैसा उदाहरण हमारे सामने है। जब महाराणा लाचार थे तब उनके तारणहार बने थे "भामाशाह"। राजपूत रजवाड़ों में वैश्य उच्च पदों पर होते ही थे और ये एक आम बात थी.. राज्य का दूसरा सबसे बड़ा पद दीवान था जो वैश्यों के लिए आरक्षित था और जो राज्यों के लिए युद्ध में अहम भूमिका निभाते थे.. गांधी जी के पिता काबा गांधी भी पोरबंदर स्टेट के दीवान थे।
 
उसके बाद जब जब गोयनका जी और पोद्दार जी ने गीताप्रेस की स्थापना की... तब उस वक़्त ब्राह्मण लॉबी से उन्हें खूब पावर मिली उसी पावर का इस्तेमाल करके पोद्दार जी ने रामजन्मभूमि मंदिर परिसर में भगवान का प्राकट्य करवा दिया था..
 
उसके बाद जब गांधी जैसे वैश्य पावर में थे तब बिड़ला और बजाज ने धर्म ग्रंथ को फिर एक नए सूत्र में पिरोया . बिड़ला परिवार ने पूरे भारतवर्ष में सनातन के भव्यमन्दिर, धर्मशालाएं, पवित्र नदियों पर घाट आदि बनवाएं.. मालवीय जी के साथ मिलकर कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और bhu का निर्माण करवाया।
 
उसके बाद जब विहिप का गठन हुआ और अशोक सिंघल जी आये पावर में तब उन्होंने हिंदुओं के ऊपर लगा सदियों का कलंक धोकर फेंक दिया। कोठारी बंधुओं ने शहादत दी।

जब नरेन्द्र मोदी नामक एक वैश्य इस देश की शीर्ष पद पर विराजमान हुए तो देश ने ताकत और तरक्की का मार्ग पकड़ा.
 
और अब जब कुलीन वैश्य अमित शाह बना था गृहमंत्री तब सबने देखा कश्मीर उद्धार, caa, जैसे मुद्दे हल हुए। तो जब जब अर्थ के साथ राज्य का सपोर्ट रहेगा तो अर्थ अपना चमत्कार दिखायेगा ही ।।

वैश्यों ने अर्थ अपने दम पर अर्जित किया अब लोकतंत्र है तो पावर तो आप लोग ही दे सकते हो.. दो तो एकबार फिर चमत्कार देखो नहीं तो बनिये तो मस्त है ही..
- प्रखर अग्रवाल