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Wednesday, November 27, 2024

HISTORY OF PORWAL VAISHYA - पोरवाल समाज का इतिहास

HISTORY OF PORWAL VAISHYA - पोरवाल समाज का इतिहास

जांगडा पोरवाल समाज की उत्पत्ति

गौरी शंकर हीराचंद ओझा (इण्डियन एक्टीक्वेरी, जिल्द 40 पृष्ठ क्र.28) के अनुसार आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था।

जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। समय-समय पर उन्होंने अपने शौर्य गुण के आधार पर जंग में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था और मरते दम तक भी युद्ध भूमि में डटे रहते थे। अपने इसी गुण के कारण ये जांगडा पोरवाल (जंग में डटे रहने वाले पोरवाल) कहलाये। नौवीं और दसवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर हुए विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिये एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये। दिल्ली में रहनेवाले पोरवाल “पुरवाल”कहलाये जबकि अयोध्या के आस-पास रहने वाले “पुरवार”कहलाये। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गये। यहां ये पोरवाल व्यवसाय /व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा। और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाये। वर्तमान में इनकी कुल जनसंख्या 30 लाख (लगभग) है।

आमद पोरवाल कहलाने का कारण

इतिहासग्रंथो से ज्ञात होता है कि रामपुरा के आसपास का क्षेत्र और पठार आमदकहलाता था। 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में आमदगढ़ पर चन्द्रावतों का अधिकारथा। बाद में रामपुरा चन्द्रावतों का प्रमुखगढ़ बन गया। धीरे-धीरे न केवलचन्द्रावतों का राज्य ही समाप्त हो गया अपितु आमदगढ़ भी अपना वैभव खो बैठा।इसी आमदगढ़ किले में जांगडा पोरवालों के पूर्वज काफी अधिक संख्या में रहतेथे। जो आमदगढ़ का महत्व नष्ट होने के साथ ही दशपुर क्षेत्र के विभिन्नसुविधापूर्ण स्थानों में जाकर बसते रहे। कभी श्रेष्ठीवर्ग में प्रमुख मानाजाने वाला सुख सम्पन्न पोरवाल समाज कालांतर में पराभव (दरिद्रता) कीनिम्नतम् सीमा तक जा पहुंचा, अशिक्षा, धर्मभीरुता और प्राचीन रुढ़ियों कीइसके पराभव में प्रमुख भूमिका रही। कृषि और सामान्य व्यापार व्यवसाय केमाध्यम से इस समाज ने परिश्रमपूर्वक अपनी विशिष्ठ पहचान पुन: कायम की।किन्तु आमदगढ़ में रहने के कारण इस क्षेत्र के पोरवाल आज भी आमद पोरवालकहलाते है ।

गौत्रों का निर्माण

श्रीजांगडा पोरवाल समाज में उपनाम के रुप में लगायी जाने वाली 24 गोत्रें किसीन किसी कारण विशेष के द्वारा उत्पन्न हुई और प्रचलन में आ गई। जांगलप्रदेश छोड़ने के पश्चात् पोरवाल वैश्य अपने- अपने समूहों में अपनी मानमर्यादा और कुल परम्परा की पहचान को बनाये रखने के लिये इन्होंने अपनेउपनाम (अटके) रख लिये जो आगे चलकर गोत्र कहलाए। किसी समूह विशेष में जोपोरवाल लोग अगवानी करने लगे वे चौधरी नाम से सम्बोधित होने लगे। पोरवालसमाज के जो लोग हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, आदि व्यावसायिक कार्यों में दक्षथे वे मेहता कहलाने लगे। यात्रा आदि सामूहिक भ्रमण, कार्यक्रमों के अवसर परजो लोग अगुवाई (नेतृत्व) करते और अपने संघ-साथियों की सुख-सुविधा कापूरा-पूरा ध्यान रखते वे संघवी कहे जाने लगे। मुक्त हस्त से दान देने वालेपरिवार दानगढ़ कहलाये। असामियों से लेन-देन करनेवाले, वाणिज्य व्यवसाय मेंचतुर, धन उपार्जन और संचय में दक्ष परिवार सेठिया और धनवाले धनोतिया पुकारेजाने लगे। कलाकार्य में निपुण परिवार काला कहलाए, राजा पुरु के वंशज्पोरवाल और अर्थ व्यवस्थाओं को गोपनीय रखने वाले गुप्त या गुप्ता कहलाए। कुछगौत्रें अपने निवास स्थान (मूल) के आधार पर बनी जैसे उदिया-अंतरवेदउदिया(यमुना तट पर), भैसरोड़गढ़(भैसोदामण्डी) में रुकने वाले भैसोटा, मंडावलमें मण्डवारिया, मजावद में मुजावदिया, मांदल में मांदलिया, नभेपुर केनभेपुरिया, आदि।

श्री जांगडा पोरवाल समाज की 24 गोत्र

सेठिया, काला, मुजावदिया, चौधरी, मेहता, धनोतिया, संघवी, दानगढ़, मांदलिया, घाटिया, मुन्या, घरिया, रत्नावत, फरक्या, वेद, खरडिया, मण्डवारिया, उदिया, कामरिया, डबकरा, भैसोटा, भूत, नभेपुरिया, श्रीखंडिया

भेरुजी

प्रत्येकगोत्र के अलग- अलग भेरुजी होते हैं। जिनकी स्थापना उनके पूर्वजों द्वाराकभी किसी सुविधाजनक स्थान पर की गयी थी। स्थान का चयन पवित्र स्थान के रुपमें अधिकांश नदी के किनारे, बावड़ी में, कुआं किनारे, टेकरी या पहाड़ी परकिया गया। प्रत्येक परिवार अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित भेरुजी की वर्षमें कम से कम एक बार वैशाख मास की पूर्णिमा को सपरिवार पूजा करता है।मांगलिक अवसरों पर भी भेरुजी को बुलावा परिणय पाती के रुप में भेजा जाताहै, उनकी पूजा अर्चना करना आवश्यक समझा जाता है। भेरुजी के पूजन पर मालवाकी खास प्रसादी दाल-बाफले, लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।भेरुजी को भगवान शंकर का अंशावतार माना जाता है यह शंकरजी का रुद्रावतारहै इन्हें कुलदेवता भी कहा जाता है। जांगडा पोरवाल समाज की कुलदेवीअम्बिकाजी (महाशक्ति दुर्गा) को माना जाता है।

श्री जांगडा पोरवाल समाज के 24 गोत्रों के भेरुजी स्थान

श्री जांगडा पोरवाल समाज के 24 गोत्रों के भेरुजी स्थान

मांदलिया- अचारिया – कचारिया (आलोट-ताल के पास),कराड़िया (तहसील आलोट),रुनिजा,पीपल बाग, मेलखेड़ा

बरसी-करसी, मंडावल

सेठिया- आवर – पगारिया (झालावाड़),नाहरगढ़,घसोई जंगल में,विक्रमपुर (विक्रमगढ़ आलोट),चारभुजा मंदिर दलावदा (सीतामऊ लदूना रोड)

काला- रतनजी बाग नाहरगढ़,पचांयत भवन, खड़ावदा,बड़ावदा (खाचरौद)

मुजावदिया- जमुनियाशंकर (गुंदी आलोट),कराड़िया (आलोट),मेलखेड़ा,रामपुरा,अचारिया, कचारिया, मंडावल

चौधरी - खड़ावदा, गरोठ,रामपुरा, ताल के पास,डराड़े-बराड़े (खात्याखेड़ी),आवर पगारिया (झालावाड़)

मेहता- गरोठ बावड़ी में, रुनिजा

धनोतिया- घसोई जंगल में,कबीर बाड़ी रामपुरा,ताल बसई,खेजड़िया, मेलखेडा

संघवी- खड़ावदा (पंचायत भवन)

दानगढ़- आवरा (चंदवासा के पास),बुच बेचला (रामपुरा)

घाटिया- लदूना रोड़ सीतामऊ

मुन्या- गरोठ बावड़ी में

घरिया- बरसी-करसी (महिदपुर रोड़),मंडावल (आलोट)

रत्नावत - पंचपहाड़, भैसोदामंडी,सावन (भादवामाता रोड),बरखेड़ा पंथ

फ़रक्या- पड़दा (मनासा रोड),बरखेड़ा गंगासा (खड़ावदा रोड),घसोई जंगल में,बड़ागांव (नागदा)

वेद- जन्नोद (रामपुरा के पास),साठखेड़ा

खर्ड़िया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

मण्डवारिया- कबीर बाड़ी रामपुरा.तालाब के किनारे पावटी,दोवरे-पैवर (संजीत)

उदिया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

कामरिया- मंडावल (तह. आलोट),जन्नोद (रामपुरा के पास)

डबकरा- अराडे-बराडे (खात्याखेड़ी, सुवासरा रोड),सावन, चंदवासा, रुनिजा

भैसोटा- बरसी-करती (महिदपुर रोड के पास),मंडावल (तह. आलोट)

भूत- गरोठ बावड़ी में

रुनिजा – घसोई

नभेपुरिया - वानियाखेड़ी, (खड़ावदा के पास)

श्रीखंडिया- इन्दौर सेठजी का बाग

श्री जांगडा पोरवाल समाज में प्रचलित उपाधियाँ (पदवियाँ)

पदवी - वास्तविक गोत्र

चौधरी - मांदलिया, काला, धनोतिया, डबकरा, सेठिया, चौधरी या अन्य

मोदी - काला, धनोतिया, डबकरा, दानगढ़

मरच्या - उदिया

कोठारी - मांदलिया, सेठिया या अन्य

संघवी - काला, संघवी

बटवाल - वेद

मिठा - मांदलिया


पोरवाल समाज के महापुरुष

राजा टोडरमल पोरवाल (सन् 1601 से 1666 ई.)

टोडरमल का जन्म चैत्र सुदी नवमी बुधवार संवत् 1658 वि. (सन् 1601, मार्च 18) को बूँदी के एक पोरवाल वैश्य परिवार मे हुआ था। बाल्यकाल से वह हष्टपुष्ट, गौरवर्ण युक्त बालक अत्यन्त प्रतिभाशाली प्रतीत होता था। धर्म के प्रती उसका अनुराग प्रारंभ से ही था। मस्तक पर वह वैष्णव तिलक लगया करता था।

युवावस्था में टोडरमल ने अपने पिता के लेन-देन के कार्य एवं व्यवसाय में सहयोग देते हुए अपने बुद्धि चातुर्य एवं व्यावसायिक कुशलता का परिचय दिया । प्रतिभा सम्पन्न पुत्र को पिता ने बूँदी राज्य की सेवा में लगा दिया । अपनी योग्यता और परिश्रम से थोड़े ही दिनों में टोडरमल ने बूँदी राज्य के एक ईमानदार , परिश्रमी और कुशल कर्मचारी के रुप में तरक्की करते हुए अच्छा यश अर्जित कर लिया।

उस समय मुगल सम्राट जहाँगीर शासन कर रहा था। टोडरमल की योग्यता और प्रतिभा को देखकर मुगल शासन के अधिकारियों ने उसे पटवारी के पद पर नियुक्त कर दिया। थोड़े ही काल में टोडरमल की बुद्धिमत्ता , कार्यकुशलता, पराक्रम और ईमानदारी की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वह तेजी से उन्नति करने लगा।

सम्राट जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शाहजहाँ मुगल साम्राज्य का स्वामी बना। 1639 ई. में शाहजहाँ ने टोडरमल के श्रेष्ठ गुणों और उसकी स्वामी भक्ति से प्रभावित होकर उसे राय की उपाधि प्रदान की तथा सरकार सरहिंद की दीवानी, अमीरी और फौजदारी के कार्य पर उसे नियुक्त कर दिया। टोडरमल ने सरहिंद में अपनी प्रशासनिक कुशलता का अच्छा परिचय दिया जिसके कारण अगले ही वर्ष उसे लखी जंगल की फौजदारी भी प्रदान कर दी गई । अपने शासन के पन्द्रहवें वर्ष में शाहजहाँ ने राय टोडरमल पोरवाल को पुन: पुरस्कृत किया तथा खिलअत, घोड़ा और हाथी सहर्ष प्रदान किये । 16 वें वर्ष में राय टोडरमल एक हजारी का मनसबदार बन गया। मनसब के अनुरुप से जागीर भी प्राप्त हुई। 19वें वर्ष में उसके मनसब में पाँच सदी 200 सवारों की वृद्धि कर दी गई । 20वें वर्ष में उसके मनसब में पुन: वृद्धि हुई तथा उसे ताल्लुका सरकार दिपालपुर परगना जालन्धर और सुल्तानपुर का क्षेत्र मनसब की जागीर में प्राप्त हुए । उसने अपने मनसब के जागीरी क्षेत्र का अच्छा प्रबन्ध किया जिससे राजस्व प्राप्ति में काफी अभिवृद्धि हो गई ।

राय टोडरमल निरन्तर उन्नति करते हुए बादशाह शाहजहाँ का योग्य अधिकारी तथा अतिविश्वस्त मनसबदार बन चुका था । 21वें वर्ष में उसे राजा की उपाधि और 2 हजारी 2हजार सवार दो अस्पा, तीन अस्पा की मनसब में वृद्धि प्रदान की गई । राजा की पदवी और उच्च मनसब प्राप्त होने से राजा टोडरमल पोरवाल अब मुगल सेवा में प्रथम श्रेणी का अधिकारी बन गया था। 23वें वर्ष में राजा टोडरमल को डंका प्राप्त हुआ।

सन् 1655 में राजा टोडरमल गया। जहाँ उसका एक परममित्र बालसखा धन्नाशाह पोरवाल रहता था। धन्नाशाह एक प्रतिष्ठित व्यापारी था। आतिथ्य सेवा में वह सदैव अग्रणी रहता था। बूँदी पधारने वाले राजा एवं मुगल साम्राज्य के उच्च अधिकारी उसका आतिथ्य अवश्य ग्रहण करते थे। बूँदी नरेश धन्नाशाह की हवेली पधारते थे इससे उसके मानसम्मान में काफी वृद्धि हो चुकी थी। उसकी रत्ना नामक एक अत्यन्त रुपवती, गुणसम्पन्न सुशील कन्या थी। यही उसकी इकलौती संतान थी। विवाह योग्य हो जाने से धन्नाशाह ने अपने समान ही एक धनाढ्य पोरवाल श्रेष्ठि के पुत्र से उसकी सगाई कर दी।

भाग्य ने पलटा खाया और सगाई के थोड़े ही दिन पश्चात् धन्नाशाह की अकाल मृत्यु हो गई । दुर्भाग्य से धन्नाशाह की मृत्यु के बाद लक्ष्मी उसके घर से रुठ गई जिससे एक सुसम्पन्न, धनाढ्य प्रतिष्ठित परिवार विपन्नावस्था को प्राप्त हो गया। धन्नाशाह की विधवा के लिए यह अत्यन्त दु:खमय था। गरीबी की स्थिति और युवा पुत्री के विवाह की चिन्ता उसे रात दिन सताया करती थी । ऐसे ही समय अपने पति के बालसखा राजा टोडरमल पोरवाल के बूँदी आगमन का समाचार पाकर उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ।

एक व्यक्ति के साथ धन्नाशाह की विधवा ने एक थाली मे पानी का कलश रखकर राजा टोडरमल के स्वागत हेतू भिजवाया। अपने धनाढ्य मित्र की ओर से इस प्रकार के स्वागत से वह आश्चर्यचकित रह गया। पूछताछ करने पर टोडरमल को अपने मित्र धन्नाशाह की मृत्यु उसके परिवार के दुर्भाग्य और विपन्नता की बात ज्ञात हुई, इससे उसे अत्यन्त दु:ख हुआ । वह धन्नाशाह की हवेली गया और मित्र की विधवा से मिला। धन्नाशाह की विधवा ने अपनी करुण गाथा और पुत्री रत्ना के विवाह की चिन्ता से राजा टोडरमल को अवगत कराया।

अपने परममित्र सम्मानित धनाढ्य श्रेष्ठि धन्नाशाह की विधवा से सारी बातें सुनकर उसे अत्यन्त दु:ख हुआ। उसने उसी समय धन्नाशाह की पुत्री रत्ना का विवाह काफी धूमधाम से करने का निश्चय व्यक्त किया तथा तत्काल समुचित प्रबन्ध कर रत्ना के ससुराल शादी की तैयारी करने की सूचना भिजवा दी। मुगल साम्राज्य के उच्च सम्मानित मनसबदार राजा टोडरमल द्वारा अपने मित्र धन्नाशाह की पुत्री का विवाह करने की सूचना पाकर रत्ना के ससुराल वाले अत्यन्त प्रसन्न हुए ।

राजा टोडरमल ने एक माह पूर्व शान शौकत के साथ गणपतिपूजन करवा कर (चाक बंधवाकर) रत्ना के विवाहोत्सव का शुभारंभ कर दिया। निश्चित तिथि को रत्ना का विवाह शाही ठाटबाट से सम्पन्न हुआ। इस घटना से राजा टोडरमल की उदारता, सहृदयता और मित्रस्नेह की सारी पोरवाल जाति में प्रशंसा की गई और उसकी कीर्ति इतनी फैली की पोरवाल समाज की स्त्रियाँ आज भी उनकी प्रशंसा के गीत गाती है और पोरवाल समाज का एक वर्ग उन्हें अपना प्रातः स्मरणीय पूर्वज मानकर मांगलिक अवसरों पर सम्मान सहित उनका स्मरण करता है तथा उन्हें पूजता है। इस प्रकार राजा टोडरमल का यश अजर-अमर हो गया। हाड़ौती (कोटा-बूँदी क्षेत्र) तथा मालवा क्षेत्र में जहाँ भी पोरवाल वास करते है, वहाँ टोडरमल की कीर्ति के गीत गाये जाते हैं तथा उनका आदरसहित स्मरण किया जाता है। उनके प्रति श्रद्धा इतनी अधिक रही है कि पोरवाल व्यापारी की रोकड़ न मिलने पर टोडरमल का नाम लिखा पर्चा रोकड़ में रख देने से प्रातःकाल रोकड़ मिल जाने की मान्यता प्रचलित हो गई है।

सम्राट शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दाराशिकोह वेदान्त दर्शन से अत्यन्त प्रभावित उदार विचारों का व्यक्ति था। सन् 1658 से बादशाह शाहजहाँ के गम्भीर रुप से अस्वस्थ हो जाने की अफवाह सुनकर उसके बेटे मुराद और शुजा ने विद्रोह कर दिया। 16 अप्रैल 1658 ई. शुक्रवार को धरमाट (फतियाबाद) के मैदान में औरंगज़ेब की सेनाओं ने शाही सेना को करारी शिकस्त दी। सामूगढ़ के मैदान में पुनः दाराशिकोह के नेतृत्व में शाही सेना को औरंगज़ेब और मुराद की संयुक्त सेना से पराजय का सामना करना पड़ा। दारा युद्ध में पराजित होकर भागा। औरंगज़ेब ने आगरा पर अधिकार कर पिता को किले में कैद किया और फिर आगे बढ़ा। रास्ते में मुराद को समाप्त कर औरंगज़ेब ने पंजाब की ओर भागे दाराशिकोह का पीछा किया।

राजा टोडरमल की प्रारम्भ से ही दाराशिकोह के प्रति सहानुभूति थी। पराजित दारा के प्रति उसकी सहानुभूति में कोई अन्तर नहीं आया। अतः जब दारा लखी जंगल से गुजरा तो राजा टोडरमल ने जो लखी जंगल का फौजदार था, अपने कई मौजें में गड़े धन से 20 लाख रुपये गुप्त रुप से सहायतार्थ प्रदान किये थे।

इसी कारण पंजाब की ओर दारा का पीछा करने के बाद लाहौर से दिल्ली की तरफ लौटते हुए औरंगज़ेब ने अनेक सरदारों और मनसबदारों को खिलअते प्रदान की थी। तब लखी जंगल के फौजदार राजा टोडरमल को भी खिलअत प्राप्त हुई थी।

इटावा का फौजदार रहते हुए राजा टोडरमल ने अपनी पोरवाल जाति को उस क्षेत्र में बसाने तथा उन्हें व्यापार- व्यवसाय की अभिवृद्धि के लिये समुचित सुविधाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था। सम्भवतः इस कारण भी जांगड़ा पोरवाल समाज में इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के उद्देश्य से एक श्रद्धेय पूर्वज के रुप में राजा टोडरमल की पूजा की जाती है ।

राजा टोडरमल अपने अंतिम समय में अपने जन्मस्थल बूँदी में अपना शेष जीवन परोपकार और ईश्वर पूजन में व्यतीत करने लगे तथा समाज के सैकड़ों परिवार इटावा क्षेत्र त्यागकर बून्दी कोटा क्षेत्र में आ बसे। यहीं से ये परिवार बाद में धीरे-धीरे मालवा क्षेत्र में चले आए।

राजा टोडरमल की मृत्यु कहाँ और किस तिथि को हुई थी इस सम्बन्ध में निश्चित कुछ भी ज्ञात नहीं है । किन्तु अनुमान होता है कि सन् 1666 ई. में पोरवाल समाज के इस परोपकारी प्रातः स्मरणीय महापुरूष की मृत्यु बूँदी में ही हुई होगी । कोटा बूँदी क्षेत्र में आज भी न केवल पोरवाल समाज अपितु अन्य समाजों मे भी राजा टोडरमलजी के गीत बड़ी श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ – पोरवाल समाज का इतिहास.

Shrimal Vaishya SAMAJ

Shrimal Vaishya SAMAJ

श्रीमाल (वर्तमान में भिन्नमाल के नाम से प्रसिद्ध) मारवाड़ में आबू रोड से 50 मील की दूरी पर स्थित है। श्रीमाल भारत के राजस्थान राज्य में एक स्थान है। वर्तमान में भीनमाल के नाम से जाना जाता है। श्रीमाल "श्री" और "माल" का संयोजन है। "श्री" का लोकप्रिय अर्थ लक्ष्मी है, जो धन की देवी हैं। "श्री" का अर्थ सुंदरता और चमक भी है, "माल" का अर्थ है स्थान। इस प्रकार श्रीमाल लगभग 800 साल पहले एक सुंदर समृद्ध स्थान था जहाँ अन्य जातियों के साथ-साथ सुनार भी रहते थे, सोने से सुंदरता की कलाकृतियाँ बनाते थे और अन्य समुदायों के साथ समृद्ध होते थे। संस्कृत भाषा में, भिन्न शब्द का अर्थ टूटा हुआ या अलग होता है और इसलिए भीनमाल का अर्थ टूटा हुआ स्थान होता है। श्रीमाल पुराण (स्कंद पुराण का हिस्सा) के अनुसार ऋषि गौतम और देवी लक्ष्मी के श्राप के कारण श्रीमाली नगर का विकेंद्रीकरण हुआ और इसकी समृद्धि और जनसंख्या में कमी आई.

उनमें से अधिकांश गुजरात और मारवाड़ (राजस्थान) की ओर पलायन करने लगे। इसलिए वर्तमान में अधिकांश श्रीमाल इन दो राज्यों में रह रहे हैं, हालांकि वे अपने पारंपरिक और आधुनिक पेशे के साथ दुनिया भर में चले गए और स्थापित हो गए।

मध्यकाल में भीनमाल, गुर्जर साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी।[2] मध्यकाल में इस शहर का नाम भीलमाल (भीलमाल) था। ह्वेन त्सांग ने लगभग 641 ई. में भीलमाल (भीलमाल) का दौरा किया था। ह्वेन त्सांग के अनुसार भीलमाल, गुर्जर साम्राज्य की राजधानी थी। उन्होंने कहा कि गुर्जरों ने भीनमाल (पिलो-मो-लो) में राजधानी के साथ एक समृद्ध और आबादी वाले राज्य पर शासन किया।

आज श्री माल बीस हज़ार की आबादी वाला एक छोटा सा गाँव है जो मारवाड़ के भीलड़ी जंक्शन के पास है। भीलड़ी जंक्शन से भीलड़ी जंक्शन की दूरी सौ और तीन किलोमीटर है। शिरोही स्टेशन से वहाँ पहुँचा जा सकता है जहाँ सौ श्री माली ब्राह्मण हैं और चालीस श्री माली सोनी बनिया की दुकानें हैं। भारतीय पान क्षेत्र के इतिहास पर विचार करें तो - वीर भूमि - वरु भूमि जोधपुर और आबू के बीच है जहाँ श्री माली विशाल भूमि पर बसे थे। भीलड़ी खूबसूरत राज्य की राजधानी है जहाँ पहले बहुत ऊँचे महल और घनी आबादी थी जो हर विदेशी को आकर्षित करती थी।

यह व्यापार का मुख्य केंद्र था, गुजरात और मारवाड़ व्यापारिक गतिविधियों में योगदान दे रहे थे। यहाँ खूबसूरत झीलें और धार्मिक स्थल थे, ब्राह्मण, बनिया जैसे उच्च समाज के लोग थे जो नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित और धार्मिक स्वभाव के थे। समय के साथ सबसे लोकप्रिय और प्रचलित पर्याय भीनमाल आज वीरान हो गया है। एक खूबसूरत भीनमाल अब बंजर छोटा सा गाँव है। 1611 के वर्ष में एक ब्रिटिश व्यापारी श्री निकोलस उसेलेट ने 36 मील क्षेत्र वाले भीनमाल का दौरा किया और यहाँ बॉम्बे गजेटियर में छपा उनका संस्करण है “1611 ई. में आगरा से अहमदाबाद आए एक अंग्रेज यात्री निकोलस उसेलेट ने भीनमाल में 24 कोस (36 मील) की एक प्राचीन दीवार देखी, जिसके कई बेहतरीन तालाब बर्बाद हो रहे थे।”

आज भीनमाल के पुराने खंडहर और इतिहास आश्चर्यजनक है। अब शहर के पूर्वी भाग में भगवान वाराही मंदिर के साथ हाल ही में पुनर्निर्मित चार जैन पार्श्वनाथ मंदिर भीनमाल स्थित हैं।

मंदिर और इसकी मूर्तियाँ वास्तुकला का एक सुंदर नमूना हैं। यहाँ एक सुंदर नीलकंठ महादेव मंदिर भी है और यक्ष झील के दक्षिण में बाना झील के किनारे और झील के बीच में लखरा द्वीप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
श्रीमाल का नाम इस स्थान से लिया गया है जो ईसाई युग की 6ठी से 9वीं शताब्दी के बीच गुर्जरों की राजधानी थी। पुराने शहर का वर्तमान स्थल अपने पिछले वैभव के कई अवशेषों से भरा पड़ा है जो बड़े क्षेत्र में बिखरे हुए हैं- विस्मृत युग के मूक गवाह हैं। यह शहर जैन धर्म के आगमन से पहले स्थापित प्रतीत होता है। शहर के निर्माण की कथा श्रीमाल पुराण में मिलती है जो (13वीं शताब्दी) के अंत में लिखी गई थी जिसमें कहा गया है कि सत्य युग के स्वर्ण युग में भृगु नाम के एक ऋषि रहते थे जिनकी श्री (लक्ष्मी) नाम की एक पुत्री थी, नारद के अनुरोध पर विष्णु ने इस युवती से विवाह किया और विवाह देवताओं की उपस्थिति में मनाया गया जो इस शुभ अवसर को देखने के लिए हर तरफ से आये थे।

ब्रह्मा और देवताओं ने लक्ष्मी को आशीर्वाद दिया और कहा विष्णु ने विश्वकर्मन (दिव्य वास्तुकार) को उस स्थान पर एक बड़ा शहर बनाने का निर्देश दिया और अपने सेवकों को ऋषियों के सुंदर युवा पुत्रों को लाने के लिए भेजा ताकि वे वहाँ निवास कर सकें। सभी दिशाओं से 45,000 ब्राह्मण श्रीमाल में नई आबादी को इकट्ठा करने आए थे। ब्राह्मण, श्रीमाली बनिया, श्रीमाली सोनी के पोरवाड़ बनिया, धनोत्कट सभी दिशाओं से आए थे और वे श्रीमाल से आए थे। इसके बाद श्रीमाल में आने वाले सभी लोगों ने लक्ष्मी को अपनी देवी या संरक्षक संत के रूप में अपनाया।
बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गजेटियर ..., खंड 1, भाग 1 से एक और बात यह है कि जब लक्ष्मी का विवाह श्रीमाल में विष्णु से हो रहा था, तो उन्होंने अपने वक्षस्थल में देखा, जहाँ से जरिया (जड़िया) सुनार निकले थे: उन्होंने उत्तर की ओर देखा तो ओशवाल प्रकट हुए, उनके पूर्व की ओर से पोरवाल पैदा हुए। उनके फूलों के भाग्यशाली हार से श्रीमली ब्राह्मण उत्पन्न हुए।

श्रीमाल में आए ब्राह्मणों को श्रीमाली ब्राह्मण कहा जाता है और वे श्रीमाली बनियों, श्रीमाली सोनी के पोरवाड बनियों, धनोत्कट और श्रीमाल में आए अन्य समुदायों के कुलगुरु हैं।

Friday, November 8, 2024

भारत के शीर्ष 10 परोपकारी दानदाता में ६ वैश्य समाज से

भारत के शीर्ष 10 परोपकारी दानदाता में ६ वैश्य समाज से 

2024 में भारत के शीर्ष 10 परोपकारी दानदाता परिवार
की लिस्ट जारी हुई जिसमे 6 #दानवीर #वैश्य समाज से है


1- शिव नाडार (जायसवाल)
2- मुकेश अंबानी परिवार
3- बजाज परिवार
4- बिड़ला परिवार
5- अडानी परिवार
6- अनिल अग्रवाल (वेदांता परिवार )
#जय_वैश्य_समाज

Thursday, October 31, 2024

CA INTERMIDEATE TOPER GIRLS - ALL OF THREE ARE VAISHYA BANIYA

CA INTERMIDEATE TOPER GIRLS - ALL OF THREE ARE VAISHYA BANIYA

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI) ने आज सीए फाउंडेशन और इंटरमीडिएट परीक्षा 2024 का रिजल्ट जारी कर दिया है. इस साल की परीक्षा में टॉप थ्री में लड़कियों ने बाजी मारी है. इस साल सीए इंटरमीडिएट परीक्षा में शीर्ष रैंक पर महिलाएं हावी रहीं, जिसमें मुंबई की परमी उमेश पारेख पहले स्थान पर रहीं. इसके बाद तान्या गुप्ता और विधि जैन रहीं.


मुंबई की परमी उमेश पारेख को इस परीक्षा में 500 में से 484 अंक मिले हैं. उन्होंने 80.67 प्रतिशत अंक हासिल किए, जबकि चेन्नई की तान्या गुप्ता ने 76.50 प्रतिशत और दिल्ली की विधि जैन ने 73.50 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं.

CA Inter 2024 की टॉपर्स लिस्ट
परमी उमेश पारेख (Parami Umesh Parekh)
तान्या गुप्ता (Tanya Gupta)
विधि जैन (Vidhi Jain)


ICAI के सेंट्रल काउंसिल सदस्य धीरज खंडेलवाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर रिजल्ट शेयर करते हुए इस उपलब्धि को ऐतिहासिक बताया है. उन्होंने कहा कि यह मील का पत्थर है, क्योंकि टॉप 3 रैंक महिला उम्मीदवारों के पास गई हैं. खंडेलवाल ने बताया कि ICAI की महिला सदस्यों की संख्या वर्तमान में कुल सदस्यों का 30% है, जो अगले पांच वर्षों में 50% तक पहुंचने की उम्मीद है.

खंडेलवाल ने कहा कि अकाउंटेंसी का क्षेत्र अब महिलाओं के लिए एक प्रमुख करियर विकल्प बनता जा रहा है. यह केवल संख्या में वृद्धि का संकेत नहीं है, बल्कि इस बात का भी प्रतीक है कि कैसे यह क्षेत्र महिलाओं के लिए अवसरों से भरा हुआ है. वर्ष 2008 में ICAI में केवल 8,000 महिला सदस्य थीं, जो 2018 तक बढ़कर 80,000 हो गई, और अब यह संख्या 1,25,000 से अधिक हो चुकी है.

सितंबर सेशन में परीक्षा देने वाले उम्मीदवार ICAI की आधिकारिक वेबसाइट icai.org पर जाकर अपना स्कोरकार्ड देख सकते हैं. पास होने के लिए प्रत्येक पेपर में न्यूनतम 40% अंक और कुल 50% अंकों की आवश्यकता होती है.

Friday, October 25, 2024

KANIRAM NARSINGHDAS HAWELI JHUNJHNU - VAISHYA BANIYA HERITAGE

KANIRAM NARSINGHDAS HAWELI JHUNJHNU - VAISHYA BANIYA HERITAGE


हवेली : इतिहास और खूबसूरती

इस प्राचीन और भव्य हवेली का निर्माण झुंझनूं के एक प्रसिद्ध व्यापारी नृसिंहदास टीबरेवाल ने 1883 में करवाया था। झुंझनूं में टीबरेवाल क्षेत्र व्यापारियों की सघनता के कारण विख्यात था। उन्नीसवीं सदी के मध्य में शेखावाटी के ज्यादातर व्यापारी अपना कारोबार बढ़ाने के लिए कलकत्ता और पूर्वी क्षेत्रों में चले गए। वहां उन्होंने अपनी पहचान मारवाड़ी उद्योगपतियों के रूप में बनाई। पहचान के साथ साथ उनकी साख भी बढ़ी और वे स्थायी रूप से दूसरे राज्यों या विदेशों में बस गए। तब से ये हवेलियां सरकार के संरक्षण में आ गई।
झुंझनू की कनीराम नृसिंहदास टीबरेवाल हवेली सहित अन्य सभी हवेलियां इतिहास की शानदार कारीगरी और स्थापत्य का अद्भुत नमूना हैं। दूसरे स्थानों पर कारोबार बढ़ने के बाद या तो व्यापारियों ने इन्हें बेच दिया या फिर ताले जड़कर हमेशा के लिए चले गए। जिन हवेलियों का कोई दावेदार नहीं बचा उन्हें सरकार ने अपने अधीन ले लिया। कुछ हवेलियों को होटलों में तब्दील कर दिया गया।

टीबरेवाल हवेली की दीवारों पर उकेरित बेलबूटों पर सोने की पॉलिश की गई थी। यहां दीवारों पर हाथ में दर्पण लिए सुंदर स्त्री, पगड़ी पहने एक पुरूष और दंपत्ति के साथ बच्चों की मौजूदगी के भित्तिचित्र हैं जो इलाके की समृद्धि दर्शाते हैं। यह हवेली कई चौकों से युक्त है। चौक के चारों ओर सुंदर कक्ष बने हुए हैं। बरामदों के स्तंभों के बीच धनुषाकार आकृति बनी है। चौक से छत पर जाने के लिए जीने बने हुए हैं। चौक आम तौर पर खुले और बड़े हैं।

झुंझुनूं का महनसर गांव, जहां है सोने-चांदी से लिखी सचित्र रामायण, देखें तस्वीरें

झुंझुनूं का महनसर गांव, जहां है सोने-चांदी से लिखी सचित्र रामायण, देखें तस्वीरें

( झुंझुनूं में है सोने-चांदी से लिखी सचित्र रामायण)


शेखावाटी के सेठ साहुकारो ने अपनी गद्दी (पुराने जमाने का व्यापार करने का कार्यालय) सोने की दुकान में दुर दराज और देश विदेशों से आए व्यापारी महमानों के लिये कमरे में सोने-चांदी की रामायण बनवा रखी थी.


हम बात कर रहे हैं सेठ हरकन्ठ राय पोद्दार के द्वारा बनाये कमरे की. इसे सोने की दुकान कहा जाता है. जो लगभग 175 साल पहले जब इनका हीरे और जवाहरात का व्यापार जापान, चीन और अन्य कई देशों में था. व्यापारी ने लेन देन के लिये सोने की दुकान, कार्यालय (गद्दी) बना रखी थी. झुंझुनू जिले के महनसर गांव में कार्यालय बनवाया था.


महनसर एक छोटा सा गांव है लेकिन उसी गांव में प्रसिद्व सोने-चांदी की रामायण का कमरा है जिसे उस समय सोने की दूकान कहते थे. यह सोने की दुकान महनसर गांव के मुख्य बस स्टैंड पर पोद्दारो की हवेली में है. जिसे अब देखरेख के कारण ज्यादातर बंद ही रखा जाता है. इसे बाहर से आये पर्यटकों के लिये ही खोला जाता है.


इस सोने की दुकान की खास बात यह है कि इसमें राम जन्म से लेकर लव कुश तक पुरी रामायण, देवी देवताओं का सचित्र वर्णन है. ये सोने और चांदी से बनी हुई है. पुरे चित्रों को सोने और चांदी के घोल से बनाया गया है.


यहां के कमरे के खंबो पर रामायण लिखी है. वह भी सोने से पेंट की गई है. जिसमें संस्कृति में रामायण का पाठ लिखा गया है. आज भी यह उसी तरह अकर्षित और सुनहरी दिखाई देती है. किसी के देखेने पर यह नहीं लगता कि यह 175 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है.


यहां के सोने-चांदी की पेंटिंग की चमक आज भी बरकरार है. कुछ जगह रखरखाव के अभाव में दीवार में सीलन आ गई है लेकिन अभी भी इसकी चमक बरकरार है.


यह पुरी रामायण दुकान की छत पर बनायी गयी है. पहले समय में शेखावाटी के सभी मकान चुने के बने होते थे ओर इनकी खास बात यह होती थी की इनकी छत ढोले (गोल आकर) की होती थी जो शर्दीयो में गर्म और गर्मियों में ठंडी रहती थी.


175 वर्ष पहले इस सोने की दुकान को हीरे जवाहरात के देश विदेश से आने वाले व्यापारियों के विश्राम के लिए और व्यापारिक कार्य के बनाया गया था. इस सोने की दूकान (गद्दी) में व्यापारियों के विश्राम, आराम और थकान दूर करने के लिए इस कमरे में सम्पूर्ण रामायण सचित्र बनाई गई है. इसमें राम जन्म, राम विवाह से लेकर वनवास और रावण वध, लव कुश तक का चित्रण किया गया है.


इस दुकान के दूसरे और तीसरे भाग में शिव महिमा, कृष्ण लीला और कुछ महाभारत के दृश्य अंकित हैं. सोने की दुकान के पोद्दार परिवार के कुलदीप पोद्दार ने कहा कि पोद्दार परिवार के वंशज कुलदीप पोद्दार ने बताया कि यह सोने की दुकान को उनके बुजर्गो के द्वारा हीरे, जवाहरात के व्यापार करने आने वाले व्यापारियों के लिए बनाया गया था. इसी दुकान में सभी तरह के व्यापार होते थे.

पोद्दार ने आगे बताया कि इस दुकान में सोने-चांदी के घोल से रामायण, कृष्णलीला और महाभारत के सचित्र पेंटिंग अंकित की गई है. साथ ही हर दीवार पर खड़े ढ़ोलो पर भगवान के 52 अवतार के चित्र बने हुए हैं. रामायण में रामचन्द्र भगवान की बारात के दृश्य से लेकर सीता विवाह, सीता हरण, वनवास, रावण वध और लव कुश का चित्रों के द्वारा चित्रार्थ है. साथ ही कृष्णलीला के जन्म से लेकर कंश वध का चित्रण चित्रार्थ के साथ श्रवण कुमार के द्वारा अपने माता पिता को तीर्थ का दृश्य बने हुए हैं.


महनसर के निवासी प्रहलाद पोद्वार ने बताया कि यह सोने की दुकान लगभग 175 वर्ष पुरानी है. यह पूरी इमारत चुने पत्थर से निर्मित है. इस दुकान की खासियत यह है कि यह सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडी रहती है. आज भी इस सोने की दुकान को देखने की दीवानगी विदेशों तक देखी जाती है. आज देश ही नहीं विदेशों तक से आने वाले पर्यटकों की पहली पसंद सोने की दुकान देखने की रहती है. सैकड़ों की तादाद में इस दुकान को देखने के लिए पर्यटक आते हैं.



CHAR CHOWK HAWELI - LAXMANGARH - VAISHYA BANIYA HERITAGE

CHAR CHOWK HAWELI - LAXMANGARH - VAISHYA BANIYA HERITAGE

राजस्थान की सबसे खूबसूरत और अनोखी हवेलियों में से एक है चार चौक हवेली राजस्थान। ऊबड़-खाबड़ और हरी-भरी अरावली पहाड़ियों में बसी चार चौक हवेली चार आंगनों वाली हवेली है। राजस्थान भारत में खूबसूरती से डिजाइन किए गए स्मारकों में से एक, यह बीते दिनों की शान और वैभव को याद दिलाता है। चार चौक हवेली और राजस्थान और भारत के अन्य हिस्सों के अन्य पर्यटक आकर्षणों के बारे में ऑनलाइन जानकारी प्रदान करता है।

चार चौक की हवेली, लक्ष्मणगढ़ की सबसे बड़ी हवेली है, जिसका स्वामित्व पहले गनेरीवाला परिवार की कई शाखाओं के पास था. अब इसका प्रबंधन और नेतृत्व श्री गिरधारीलालजी गनेरीवाला करते हैं.

लक्ष्मणगढ़, सीकर में स्थित है और यहां की हवेलियां, उत्तार-मुगल और ब्रितानी दौर की स्थापत्य कला और हिन्दू-मुस्लिम शैली की चित्रकारी का बेहतरीन उदाहरण हैं. लक्ष्मणगढ़ की हवेलियों में बनाए गए भित्ति-चित्रों में ब्रिटिश दौर का आधुनिक-दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है.



लक्ष्मणगढ़ को शेखावाटी का छोटा जयपुर माना जाता था। 1862 में स्थापित, लक्ष्मणगढ़ सीकर के राव राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा नियोजित सुनियोजित शहरों में से एक था। किलों से लेकर घंटाघरों तक, लक्ष्मणगढ़ में कई पर्यटन स्थल हैं। 1840 में मुरलीधर गनेरीवाला द्वारा निर्मित, चार चौक हवेली राजस्थान की खूबसूरत हवेलियों में से एक है। राजस्थान की अपनी यात्रा पर इस सदियों पुराने स्मारक को देखना न भूलें जो बीते युग की कला और वास्तुकला के बारे में बहुत कुछ बताता है।

लक्ष्मणगढ़ जयपुर से लगभग 190 किलोमीटर दूर है। चार चौक हवेली आपको बीते हुए राजपूत युग की समृद्ध भव्यता और वैभव की याद दिलाती है। हवेली को राजस्थान के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक माना जाता है ।

चार चौक हवेली को चार आंगनों वाली हवेली के नाम से जाना जाता है। बड़ी-बड़ी पेंटिंग से लेकर जालीदार खिड़कियों तक, भव्य चार चौक हवेली वास्तव में राजपूती भव्यता और सुंदरता का एक सुंदर प्रतीक है। चार चौक हवेली में आपको एक हाथी पर खड़े एक पक्षी की एक सुंदर पेंटिंग देखने को मिलेगी, जिसके शिखर पर एक और हाथी है। पेंटिंग की विशिष्टता निश्चित रूप से इसे आगंतुकों की नज़र में यादगार बनाती है।

चार चौक हवेली के पूर्वी हिस्से में स्थित कमरों की दीवारें और छतें पूरी तरह से पेंटिंग से ढकी हुई हैं। चार चौक हवेली में मौजूद पेंटिंग्स ज़्यादातर नीले रंग से ढकी हुई हैं। विदेशी छवियों से लेकर खूबसूरत और अनोखे सिल्हूट तक, पेंटिंग्स बस एक अलग ही क्लास की हैं। लक्ष्मणगढ़ की सबसे पुरानी हवेलियों में से एक, चार चौक हवेली पर्यटकों के लिए एक आर्ट गैलरी साबित होती है।

फूलों की घुमावदार आकृतियों से लेकर हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्यों वाली छतों पर बनी आकृतियों तक, राजपूतों की उत्कृष्ट कलात्मकता चार चौक हवेली की कला और वास्तुकला में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। यह सदियों पुराना स्मारक आज भी बीते युग की यादें ताज़ा करता है। हालाँकि सामने का हिस्सा पूरी तरह से खराब हो चुका है और चार चौक हवेली के अंदर प्रवेश करने पर आपको मध्ययुगीन आभा और माहौल का एहसास हो सकता है।

Pansari Ki Haveli SHREE MADHOPUR - VAISHYA BANIYA HERITAGE

पंसारी की हवेली - Pansari Ki Haveli


राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र मुख्यतया अपनी हवेलियों, छतरियों एवं बावडियों के लिए सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। यहाँ की हवेलियों पर शोध करने के लिए विश्व के कई देशों के लोग नियमित शेखावाटी में आते रहते हैं।

यूँ तो हवेलियों के लिए रामगढ़, मण्डावा, पिलानी, सरदारशहर, रतनगढ़, नवलगढ़, फतेहपुर, मुकुंदगढ़, झुन्झुनू, महनसर, चूरू आदि शहर ही प्रसिद्ध है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सीकर जिले के श्रीमाधोपुर कस्बे में भी एक हवेली ऐसी है जिसका नाम शेखावाटी की प्रसिद्ध हवेलियों में शुमार है?

इस हवेली को पंसारी की हवेली के नाम से जाना जाता है। इस हवेली की प्रसिद्धि का आलम यह है कि राजस्थान सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान के प्रश्नों में इस हवेली के सम्बन्ध में कई बार प्रश्न पूछे जा चुके हैं।

अगर आप गूगल पर शेखावाटी की प्रमुख हवेलियों को सर्च करेंगे तो पाएँगे कि लगभग सभी जनरल नॉलेज सम्बन्धी वेबसाइटों ने पंसारी की हवेली को शेखावाटी की प्रमुख हवेलियों में जगह दे रखी है।

शेखावाटी की हवेलियों में इसका नाम प्रमुखता से लिया जाता है लेकिन श्रीमाधोपुर के अधिकतर लोगों को शायद ही इस हवेली के सम्बन्ध में पता हो।

यह हवेली श्रीमाधोपुर में रेलवे स्टेशन रोड पर सब्जी मंडी के पास स्थित है। इस हवेली का मुख्य द्वार मिट्टी का लेवल बढ़ने से थोडा नीचे चला गया है। अक्सर मुख्य द्वार पर मोटा सा ताला लगा हुआ रहता है।

इस हवेली के पास में रहने वाले लोगों को भी नहीं पता है कि वे लोग उस ऐतिहासिक धरोहर के सानिध्य में रह रहे हैं जिसकी वजह से सम्पूर्ण राजस्थान में श्रीमाधोपुर का नाम प्रसिद्ध है।

हवेली दो मंजिला है जिसकी बाहरी दीवारों पर सुन्दर भित्तिचित्र बने हुए हैं। उपरी मंजिल पर ग्यारह अर्ध चंद्राकार झरोखे बने हुए हैं।

इनके ऊपर पत्थर की बारीक जालियों के रोशनदान बने हुए प्रतीत होते हैं जिनमे रंग बिरंगे काँच लगे हुए हैं। इन झरोखों के ऊपर एक पूरा लम्बा छज्जा बना हुआ है। इन झरोखों से लेकर छज्जे के बीच में सुन्दर भित्तिचित्र बने हुए हैं।

इन भित्तिचित्रों में सुन्दर कलात्मक फूल पत्तियाँ, बेल-बूँटे आदि बने हुए है। साथ ही राधा के साथ कृष्ण, गोपियों के वस्त्र लेकर कदम्ब के पेड़ पर बैठे हुए कृष्ण, गणेश जी, सपेरे के साथ-साथ सामाजिक जन जीवन के चित्र शामिल हैं।

नीचे की मंजिल पर टोडों के नीचे सुन्दर चित्रकारी की हुई है। इनमें बेल बूँटों के साथ-साथ शिव पार्वती, मगरमच्छ से लड़ता हुआ पुरुष, चरखा चलाती महिला, दूसरी महिला की चोटी बनाती हुई महिला, हुक्का पान करता पुरुष, परिवार के साथ महिला की पेंटिंग है।

नीचे की दीवार पर मरम्मत होने के कारण अन्य चित्रकारियाँ समाप्त हो गई हैं। समय के साथ मुख्य दरवाजे का लेवल धरातल से कुछ नीचे चला गया है। अन्दर प्रवेश करने पर चौक बना हुआ है।

इस चौक के बीच में से चारों तरफ देखने पर ऊपरी मंजिल, बारादरी के एक तरफ के तीन प्रवेश द्वारों जैसी प्रतीत होती है।

ऊपर जाने के लिए दो जीने बने हुए हैं। ऊपरी मंजिल पर आगे की तरफ वाले कमरे थोड़े बड़े हैं। ये कमरे मुख्य कक्ष प्रतीत होते हैं जिनमे झरोखों की तरफ सुन्दर मेहराब बने हुए हैं।

अन्दर से झरोखों का नजारा अत्यंत सुन्दर लगता है। झरोखों के ऊपर रोशनदानों में लगे हुए रंग बिरंगे काँच, कमरे की भव्यता में चार चाँद लगाते हैं।

कमरों के दरवाजे लकड़ी के बने हुए हैं जो कि ऐतिहासिक प्रतीत होते हैं। दरवाजों के ऊपर पत्थर की जाली का कलात्मक रोशनदान लगा हुआ है।

कमरों के अन्दर दीवारों पर नीचे की तरफ कलात्मक चित्रकारी के फ्रेम से बने हुए हैं। दीवारों पर लकड़ी की कलात्मक खूँटियाँ लगी हुई है। कोने में सामान रखने के लिए दरवाजों युक्त जगह बनी हुई है।

यह हवेली कब बनी थी और किसने इसे बनवाया था, इसकी जानकारी हमें नहीं मिल पाई है परन्तु जैसा कि इसके नाम से विदित होता है, इसका ताल्लुक जरूर किसी पंसारी परिवार से रहा है।

जिस प्रकार पुरानी धरोहरों को तोड़कर उनकी जगह कमर्शियल या रेजिडेंशियल भवन बन रहे हैं, पता नहीं कब तक यह हवेली अपने इस मूल स्वरुप में रहकर श्रीमाधोपुर का नाम राजस्थान में रोशन करती रहेगी।

स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ प्रशासन को भी अपनी इन विरासतों को सहेजकर अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए।

GOENAKA HAWELI FATEHPUR - VAISHYA BANIYA HERITAGE

GOENAKA HAWELI FATEHPUR - VAISHYA BANIYA HERITAGE


1870 में स्थापित महावीर प्रसाद गोयनका हवेली फतेहपुर की सबसे अच्छी हवेलियों में से एक है। हवेली में भित्ति चित्र और भित्ति चित्र उस क्षेत्र में पनपे शिल्प कौशल को दर्शाते हैं। गोयनका समृद्ध व्यवसायी थे और अभी भी हैं। उनकी हवेली शेखावाटी क्षेत्र में देखी जाने वाली सबसे अच्छी हवेली में से एक है। सामान्य तौर पर राजस्थान की हवेलियाँ और विशेष रूप से शेखावाटी की हवेलियाँ अपने रंगीन भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन हवेलियों का स्वामित्व धनी व्यापारियों के पास था, जिनके लिए हवेलियों का अधिकांश भाग प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में कार्य करता था। हालाँकि, तब परिवार भी बहुत बड़े हुआ करते थे और आकार के मामले में हवेली से कम कुछ भी, एक परिवार को समायोजित करने के लिए कठिन होता। इसके अलावा, व्यवसाय भी आमतौर पर सामूहिक रूप से परिवार के सदस्यों- भाइयों या रिश्तेदारों के स्वामित्व में होता था। आय के स्रोतों के बंटवारे से एक ही छत और बहुत कुछ का बंटवारा हुआ।

भारत में महावीर प्रसाद गोयनका हवेली फतेहपुर की दीवारों पर बेहतरीन पेंटिंग हैं। कई पेंटिंग भगवान कृष्ण की लीलाओं को दर्शाती हैं- गोपिनियों के साथ उनकी इश्कबाज़ी, राधा के साथ उनका रोमांस, कुछ सबसे अधिक देखे जाने वाले हैं। इस क्षेत्र में भगवान की लोकप्रियता को देखते हुए, भगवान कृष्ण पूरे राजस्थान में भित्तिचित्रों के लिए एक दिलचस्प और सामान्य विषय बन गए।

फतेहपुर राजस्थान में महावीर प्रसाद गोयनका हवेली का मुख्य आकर्षण ऊपर के कमरे में चित्रित छत है। महावीर प्रसाद गोयनका हवेली फतेहपुर राजस्थान तक मुख्य सड़क को बस स्टैंड से उत्तर की ओर ले जाकर और फिर मुख्य चौराहे पर बाएं मुड़कर पहुंचा जा सकता है। महावीर प्रसाद गोयनका हवेली फतेहपुर के बाईं ओर के घर में भी अच्छा दर्पण काम है, जब राजस्थान में फ्रेस्को कला पर चर्चा करने की बात आती है।

फिर से, शेखावाटी की अधिकांश हवेलियों की तरह, महावीर प्रसाद गोयनका हवेली फतेहपुर एक विशाल नक्काशीदार लकड़ी के द्वार के साथ खुलती है। द्वार एक बाहरी आंगन में खुलता है। यह बाहरी प्रांगण फिर एक छोटे आंतरिक प्रांगण की ओर जाता है। राजस्थान में हवेलियों को आंगनों के विस्तृत नेटवर्क के चारों ओर बनाया गया है। हवेली जितनी बड़ी होगी, उसके आंगनों की संख्या उतनी ही अधिक होगी और वे परिवार की महिलाओं की पवित्रता को बनाए रखने के लिए उतनी ही विशिष्ट होंगी- उन्हें बाहरी दुनिया की एक नज़र रखने से रोकना।

बनिया की खासियत क्या है?

बनिया की खासियत क्या है?

सिन्धु घाटी सभ्यता के साथ भारत की पहचान जुड़ी हुई है। यह सभ्यता कौनसी भाषाएँ बोलती थी इस पर विवाद हो सकता है किन्तु इस सभ्यता की सम्पन्नता पर कोई विवाद नहीं है।

इस सम्पन्नता का एक महत्वपूर्ण कारक सिन्धु घाटी सभ्यता का अन्य प्राचीन सभ्यताओं से व्यापार रहा है। इस व्यापार में वे अपेक्षाकृत प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न अपने गृहक्षेत्र से अनेक उत्पाद अन्य स्थानों तक पहुँचा कर अच्छा लाभ पाते थे। इस लाभ का अंश इन वस्तुओं को उपजाने अथवा बनाने वाले व्यक्तियों तक भी पहुँचता रहा; अतः, सिन्धु घाटी सभ्यता एक साधन सम्पन्न सभ्यता रही है।

उदाहरणार्थ, प्राचीन काल में नीले वर्ण का एकमात्र ज्ञात प्राकृतिक स्रोत राजावर्त्त (लाजवर्त) रत्न था; यह पामीर की गाँठ के निकट अफ़ग़ानिस्तान ले आमू दरिया (वैदिक चक्षु नदी महाभारत वङ्क्षु नदी) के निकट शोर्तुगाय ( شورتوگای) के पर्वतीय क्षेत्र में पाया जाता था। लगभग ईसा पूर्व 3300–2800 के काल में हरियाणा के भिरड़ाना (अङ्ग्रेज़ी वर्तनी : Bhirrana) से पाए पुरातत्त्व महत्त्व के अवशेषों में राजावर्त्त भी मिला है। ध्यान दें कि यह स्थान लगभग आठवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व से सभ्यता का केन्द्र रहा है; और वैदिक सरस्वती के क्षेत्र में है

सिन्धु घाटी सभ्यता में राजावर्त अनेक स्थानों पर और सभी कालों के अवशेषों में मिला है। सिन्धु घाटी सभ्यता से इस रत्न को मेसोपोटेमिया और मिस्र की सभ्यता को निर्यात भी किया जाता रहा। मिस्र की गिरजा (جيزرة) काल की सभ्यता (ईसा पूर्व 3500—3200) के काल से वहाँ राजावर्त के अवशेष मिलते हैं।


किशोरावस्था में काल के गाल में समाने वाले मिस्र के फरोह तुतनखामुन (ईसा पूर्व 1341-1323) के मरणोत्तर मुखौटे में राजावर्त का प्रयोग हुआ है। इसका तात्पर्य यह है कि सिन्धु घाटी सभ्यता का न केवल अफ़ग़ानिस्तान से व्यापारिक सम्बन्ध रहा है; अपितु वहाँ के वणिज मिस्र तक अपने उत्पादों का व्यापार करने में समर्थ थे। यह सम्भवतः विश्व के सबसे प्राचीन सुचारु रूप से चलने वाले व्यापारिक मार्गों में एक है।


ताम्र के इन मणिभों के बीच रेशम के तन्तु मिले हैं।

वस्तुतः हड़प्पा और चान्हूदड़ो में ईसा पूर्व 2450–2000 के काल से घिया-पत्थर और ताम्र की मणियों के भीतर रेशम के तन्तु मिले हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता प्राचीन रेशम के नवीन प्रमाण (NEW EVIDENCE FOR EARLY SILK IN THE INDUS CIVILIZATION) में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के आयरीन एल गुड (I. L. GOOD), एवं विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के जेम्स एम केनोयर (J. M. KENOYER) तथा आर एच मीडो (R. H. MEADOW) ने नेवासा में ईसा पूर्व 1500 काल के रेशम के प्रमाण दिए हैं।

यह प्रमाण इस काल में रेशम व्यापारिक मार्गों की उपस्थिति का द्योतक हैं। नेवासा महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में है। यहाँ रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के भी प्रमाण मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण पथ; तथा उत्तर पथ से होते हुए यह स्थान प्राचीन रेशम मार्ग से जुड़ा हुआ था।

जिस प्रकार से भारतीय वणिजों का जाल फैला था यह अनुमान किया जाता है कि भारतीय सङ्गठित व्यापार करते थे; जिसमें नौकाओं और बैलगाड़ियों का परिवहन के लिए उपयोग होता रहा। सिन्धु घाटी की मृण्मुद्राओं तथा अन्य पदार्थों की मुद्राओ को सम्भवतः व्यापारिक सङ्घों तथा अन्य व्यावसायिक (यथा शिल्पी) सङ्घों के सदस्य एक सदस्यता की पहचान के चिह्न के रूप में काम लेते हों।


यह सम्भवतः गज (हाथी), वृषभ (बैल), तथा गण्ड (गैंडा) के प्रतीक चिह्नों वाले व्यावसायिक सङ्घों की मुद्राएँ हैं।

वैदिक काल में वणिज शब्द का प्रयोग उस समय में भी बनियों के होने का वर्णन करते हैं।

याभिः सुदानू औशिजाय वणिजे दीर्घश्रवसे मधु कोशो अक्षरत् ।
कक्षीवन्तं स्तोतारं याभिरावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम् ॥११॥ — ऋग्वेदः सूक्तं १.११२

[इस ऋचा का सन्दर्भ दीर्घतमा की पत्नी उशिज के पुत्र, दीर्घश्रवा ऋषि, अकाल-सूखे के समय आजीविका के लिए वाणिज्य में लगे हुए थे। उन्होंने वर्षा के लिए अश्विनीकुमारों की भी प्रशंसा की। और अश्विनी कुमार युगल ने बादलों को प्रेरित किया। हे सुदानव (शोभनदान करने वाले), उशिज के पुत्र औशिजा को, जो वणिज वृत्ति करता है, ऋषि दीर्घश्रवस को, उसकी प्रार्थना पर आपकी प्रेरणा से बादलों ने मधु जैसा जल बरसाया। कक्षिवन्त के स्तुति करने पर हे अश्विनी कुमारों आप उनके पास गए।]

यह ऋचा ऋग्वेद के रचना काल में वणिज (बनिया) के व्यवसाय का होना दर्शाती है। यही नहीं सूखे की स्थिति का भी विवरण देती है। इस कारण बहुधा ऋग्वेद का रचना काल सिन्धु सभ्यता के पतन काल से जोड़ा जाता है।

एता धियं कर्णवामा सखायो ऽप या मातां रणुत वरजं गोः ।
यया मनुर विशिशिप्रं जिगाय यया वणिग वङकुर आपा पुरीषम ॥ — ऋग्वेदः सूक्तं 5.45.6

[आओ, हे मित्रों, हम उस उद्देश्य को पूरा करें जिसके लिए माता रुपी उषा ने किरणों का समूह को प्रकाशित किया; जिसके लिए मनु ने विशिशिप्र पर विजय पाई को जीता था; जिसके लिए भटकते हुए बनिये ने स्वर्ग का जल प्राप्त किया था।]

संस्कृत ग्रन्थों में बनिया के लिए वैदेहक, सार्थवाह, नैगम, वाणिज, वणिज्, पण्याजीव, आपणिक, क्रयविक्रयक, आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।

गौतम बुद्ध के समय तक वणिज सङ्घ (जिन्हें श्रेणि कहा जाता था) प्रभावी हो चुके थे। इस समय चीन और भारत से मध्य एशिया से होते हुए भूमध्यसागर तक जाने वाले व्यापारिक मार्ग सुव्यवस्थित रूप से चलने लगे थे। यद्यपि इन मार्गों को उस समय प्रचलित इन क्षेत्रों के सभी धर्मों के वणिज उपयोग करते थे; बौद्ध धर्म के के व्यापक प्रचार और प्रसार के लिए यह मार्ग माध्यम बनें। अठारहवीं शताब्दी में इन मार्गों को सामूहिक रूप से रेशम मार्ग (सिल्क रूट) का नाम दिया गया। पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से ऐसी अनेक श्रेणियों के जैन अथवा बौद्ध मत अपनाने के उल्लेख मिलते हैं। प्राचीन भारत में वणिज ही नहीं; अन्य व्यवसायों की भी श्रेणियाँ थीं।

इस काल में भी यह मार्ग जोखिम से भरे थे। अतः इस मार्ग पर व्यापारी न केवल समूह में जाते थे; अपितु इस कार्य के लिए वे व्यावसायिक सङ्घ भी बनाते थे। इन सङ्घों के कर्ता-धर्ता गणतान्त्रिक विधि से चुने जाते और यह सङ्घ अपने सदस्यों के हितों की रक्षा के लिए अपनी सेनाएँ भी रखते थे। इस सङ्घ में अपने सदस्यों के हितों की रक्षा के सामर्थ्य ने प्राचीन भारत को समृद्ध बनाया। अपने अतिरिक्त आर्थिक संसाधनों को यह श्रेणियाँ ऋण देने का भी कार्य करती थीं; और जनसाधारण के धन को सुरक्षित रखने के भी विश्वसनीय संस्थान थीं। एक प्रकार से यह आधुनिक बैंकों की भूमिका भी निभाते थे। इन‌ श्रेणियों के अधिकारी ज्येष्ठ कहलाते थे।

भारतीय राज्यों को तथा इनके राजाओं को भी इन व्यवसायियों पर लगाए गए करों से बहुत आमदनी होती; तथा इसके प्रतिकार में यह सङ्घ सुरक्षित व्यापारिक मार्गों तथा व्यावसायिक सुरक्षा की अपेक्षा करते थे।

बुद्ध के कुछ समय उपरान्त शक्तिशाली नन्द वंश का मगध साम्राज्य उत्तर भारत के एक वृहद क्षेत्र में अपनी जड़ें जमा चुका था। किन्तु, नन्द साम्राज्य का अन्त एक साधारण लगभग साधनहीन वैश्य परिवार में जन्मे चन्द्रगुप्त मौर्य ने किया। इसमें आचार्य चाणक्य की भूमिका पर कोई भी प्रश्न नहीं है। किन्तु, क्या आपने विचार किया है कि चन्द्रगुप्त मौर्य तथा चाणक्य को अचानक ही इतनी बडी सेना और समृद्धि कहाँ से मिल गई। इसके लिए अनेक दन्तकथाएँ कही जाती हैं। किन्तु, इसका एक बहुत सहज कारण है। सम्राट घनानन्द को दिए करों का समुचित लाभ न पाकर व्यापारिक सङ्घों ने चन्द्रगुप्त मौर्य को न केवल धन अपितु अपनी सेनाएँ भी उपलब्ध करवाईं; और यही नहीं चन्द्रगुप्त मौर्य को भाड़े के यवन सैनिक भी उपलब्ध करवाने में सहायता दी। परस्पर लाभ के चलते ही मौर्य साम्राज्य का विस्तार भी हुआ। उत्तरापथ (ग्रांड ट्रंक रोड) तथा दक्षिणापथ का पूर्ण विकास भी इस काल से हुआ है।

भारत की नैतिकता और बुद्धिमत्ता का प्रचार-प्रसार भारत से ही विदेश-व्यापार करने वाले वणिकों ने किया; पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, कथासरित्सागर, बृहत्कथा, जैसी अनेक कथाएँ वाणिज्य के साथ ही मध्य एशिया से होते हुए फ़ारस, अरब प्रायःद्वीप, यूनान तक पहुँच गईं। पञ्चतन्त्र के मित्रभेद की बारहवीं कथा में ‘वणिजारकसार्थ’ का विवरण मिलता है; सार्थ वस्तुतः (सारथी वाले) वाहनों के समूह को कहा गया है; और वणिजारक वाणिज्य करने वाले को; जिससे बंजारा शब्द की व्युत्पत्ति हुई है।

श्रेणियाँ व्यवसाय पर आधारित थीं; इनमें सम्प्रदाय आधारित भेद नहीं किया जाता था। यह मुख्यतः बाजार के नियमन, मूल्य नियमन, गुणवत्ता नियमन, आधारभूत ढाँचे की व्यवस्था और प्रबन्धन, विवादों का समाधान, और कराधान का कार्य करती रहीं।

अर्थशास्त्र में वर्णित चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में हुए कुछ प्रशासनिक सुधार (समान कराधान की व्यवस्था) इन श्रेणियों को समानान्तर सत्ता केन्द्र न बनने देने के लिए किए गए।

यद्यपि इन श्रेणियों से सभी प्रकार के व्यवसायों को अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए अनुकूल वातावरण स्थापित करने में सहायता मिलती थी; किन्तु इनमें चार वर्णों से के इतर व्यवसाय पर आधारित अनेक जातियों के बीज भी इन श्रेणियों में हैं। क्योंकि यह व्यवसाय बहुधा पैतृक व्यवसाय ही हुआ करते थे। इन श्रेणियों में सौ से हजारों तक सदस्य होते थे। अर्थशास्त्र में वर्णित चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में हुए कुछ प्रशासनिक सुधार (समान कराधान की व्यवस्था) इन श्रेणियों को समानान्तर सत्ता केन्द्र न बनने देने के लिए किए गए।

वैश्य वंशज गुप्त साम्राज्य के काल में भी श्रेणियों की यह भूमिका रही। राज्य के विधि-विधान से इतर श्रेणियों के अपने विधि-विधान होते थे। तथा इनके सभी सदस्यों को इन्हें मानना करनी पड़ती थी। चीनी बौद्ध भिक्षुक मोक्षदेव को ह्सुइन त्सांग (玄奘; सरलीकरण : ह्वेन सांग) नाम से जाना जाता है। उन्होनें सम्राट हर्षवर्धन के राज्यकाल में भारत यात्रा की थी। उनकी पुस्तक दा तंग क्सी यू जी (大唐西域記; पश्चिमी साम्राज्यों के अभिलेख) में इस यात्रा का विस्तार से वर्णन है। इस पुस्तक में सम्राट हर्षवर्धन के पूर्वजों के वैश्य (बनिया) होने का वर्णन है; जिन्हें गुप्त साम्राज्य में सामन्त पद दिया गया। इस वंश के पुष्यभूति ने मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त लगभग 500 ईस्वी में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया था। इससे यह सङ्केत मिलता है कि कुछ श्रेणियाँ अत्यधिक प्रभावशाली थीं; और उनके वणिज प्रमुखों का राज्य के कार्य-कलापों तथा विधानों में हस्तक्षेप भी था।

हर्षवर्धन के काल में श्रेष्ठि (व्यापारियों के प्रमुख), सार्थवाह (व्यापारिक वाहनों के सङ्घ के सदस्य), कुलिक (विभिन्न प्रकार की वस्तुओं तथा कलाकृतियों को बनाने वाले तथा कायस्थ (लेखा-जोखा) रखने वाले साम्राज्य के अधिकारियों में सम्मिलित थे। इस काल में व्यापारिक गतिविधियों और श्रेणियों की सम्पन्नता में गिरावट हुई।

हर्षवर्धन के काल में ही भारत में इस्लाम का आगमन हुआ; यद्यपि, यह हर्षवर्धन के राज्यक्षेत्र में न होकर केरल में था। प्रायःद्वीपीय भारत के व्यापारिक न केवल अरब और मिस्र से थे; अपितु, वहाँ के पुरावशेषों में रोमन सिक्कों की अनेक निधियाँ भी मिली हैं। पूर्व में वे दक्षिण पूर्वी एशिया और चीन तक से अपने व्यापारिक सम्बन्ध बनाकर रखते थे। दक्षिण-भारत में इस प्रकार इस्लाम का प्रसार भी मित्रवत व्यापारियों के माध्यम से हुआ। वस्तुतः, इन अरब व्यापारियों के केरल में वैवाहिक सम्बन्धों से केरल के मपिल्ला (മാപ്പിള/ तमिळ மாப்பிள்ளை / माप्पिल्लै; जामाता) होने के कारण मोपला कहलाने वाले मुस्लिम समाज का आविर्भाव हुआ है।

दक्षिण भारत के व्यापारी चीन से पट्टु (பட்டு; संस्कृत पट्ट से रेशम) और दक्षिण-पूर्वी एशिया से मसाले लेकर आते थे; इस कारण दक्षिण के व्यापारी भी बहुत समृद्ध थे। इनसे हुए कराधान से दक्षिण में इस काल से सशक्त साम्राज्यों का युग यौवन पर आया। चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने सम्राट हर्षवर्धन को पराजित कर उनका साम्राज्य विस्तार विन्ध्य के उत्तर तक ही सीमित रखने को विवश कर दिया था।


इस काल के अजन्ता के गुहाचित्रों में ईरान के सासानी साम्राज्य से आए व्यापारियों का भी चित्रण है। जिनसे चालुक्य साम्राज्य के व्यापारियों की समृद्धि से उनकी सैन्यशक्ति का भी बढ़ना दृष्टिगोचर होता है।

इस्लाम के आगमन के उपरान्त भारत के अनेक पत्तनों के माध्यम से अरब विश्व और दक्षिणपूर्व से होते हुए चीन तक जलमार्ग से भी व्यापार बढ़ने लगा। अतः भारतीय वणिज श्रेणियाँ भी समृद्ध होने लगीं। सम्पन्न बनियों का वर्ग श्रेष्ठि कहलाता है; जिससे विभिन्न भाषाओं में शेट्टी (तेलुगु శెట్టి/ कन्नड़ ಶೆಟ್ಟಿ), चेट्टी / चेट्टियार (तमिळ செட்டி / செட்டியார்), सेठ, ह्क्यित्ती (बर्मी : ချစ်တီး) जैसे शब्दों की रचना हुई है। दक्षिण भारतीय बनियों में कुछ इतने प्रभावशाली थे कि उनकी मृत्यु होने पर राजा भी अनेक दिन यात्रा कर श्रद्धाञ्जलि देने जाते थे।

दक्षिण भारत से ही चोल (சோழ) साम्राज्य ने भारत से बाहर श्रीलङ्का, बर्मा, मलय प्रायःद्वीप, सुमात्रा, यावा, पर विजय पाई थी। किन्तु, यह अल्पज्ञात तथ्य है कि इस विजय के लिए आवश्यक जलसेना, जलपोतों, तथा धन को वणिजों ने उपलब्ध करवाया था। इस अभियान का मुख्य कारण दक्षिण-पूर्वी एशिया के श्रीविजय साम्राज्य का जल-दस्युओं को समर्थन देकर व्यापारिक गतिविधियों में भारी बाधा डालना था। तब दक्षिण भारत की व्यापारिक श्रेणियों विशेषकर मणिग्रामं श्रेणि ने चोल सम्राट राजराज चोल को आवश्यक संसाधन उपलब्ध करा कर श्रीविजय साम्राज्य को चोल नियन्त्रण में लाने में सहायता की। चोल साम्राज्य ने चीन तक मार्ग सुरक्षित करने की लिए आवश्यक प्रयास किये।

इनमें से एक केरल की अञ्जुवन्नं (അഞ്ചുവണ്ണം) श्रेणी के एक अरब व्यापारी द्वारा चोल साम्राज्य को लाखों स्वर्ण-मुद्राएँ उपलब्ध करवाने का विवरण मिलता है। अञ्जुवन्नं सम्भवतः मलयालयम അഞ്ചു - पञ्चम तथा संस्कृत वर्ण का मेल है; जो हिन्दू चतुर्वर्ण व्यवस्था के सदस्य नहीं थे; किन्तु, यह अधिक सम्भव है कि यह शब्द फ़ारसी अन्जुमन (انجمن; सङ्गठन) का मलयालयम में अपनाया गया रूप हो। यह सभी श्रेणियाँ वर्तमान कर्णाटक में ऐहोल (ಐಹೊಳೆ) के महासङ्घ ऐन्नूरवर् (तमिळ : ஐந்நூற்றுவர்; पाँचसौ श्रेष्ठ) से सम्बन्ध रखते थे। इन श्रेणियों के बारे में ज्ञात अभिलेख यह बताते हैं कि यह श्रेणियाँ अर्द्धसैनिक बलों के जैसे भी काम करती थीं; और इनमें भारतीय हिन्दू, जैन, बौद्ध, व्यापारियों के अतरिक्त मुस्लिम, सीरियाई कैथोलिक, पारसी (जरथ्रुष्ट के अनुयायियों), तथा यहूदी व्यापारियों के भी सदस्य होने का विवरण मिलता है। अतः बनिये और उनके सङ्घ अपनी व्यक्तिगत धार्मिक पहचान रखते हुए भी एक समूह के रूप में सामूहिक हितों के लिए काम करते रहे हैं।

यद्यपि उत्तर भारत में इस समय घमासान छिड़ा था। अतः व्यावसायिक गतिविधियों में जोखिम बढ़ने लगा था। अतः जहाँ तक सम्भव हो व्यापारी उस पक्ष के साथ रहते थे जो उनका संरक्षण कर पाए। दिल्ली पर मुहम्मद गौरी की विजय के उपरान्त वहाँ इस्लामिक शासन का आरम्भ हो गया था। इस परिस्थिति में अनेक व्यापारी दिल्ली की सल्तनत के निकट रहकर लाभान्वित भी हुए। 1276 ईस्वी के पालम बावड़ी के संस्कृत अभिलेख में एक जैन व्यवसायी उड्ढर ठक्कुर द्वारा लिखवाया है जिन्हें अभिलेख में योगिनीपुरा ढिल्ली का पुरपति कहा गया है। यह अभिलेख तत्कालीन सुल्तान ग़यासुद्दीन बलबन की प्रशस्ति में भी है। यह अभिलेख वणिजों द्वारा सहज रूप से शासन के विश्वासपात्र होकर उच्चपद पाने की क्षमता को दर्शाता है।

सोलहवीं शताब्दी में मुगलों का भारत पर आक्रमण हुआ; किन्तु, मुग़ल साम्राज्य को शेरशाह सूरी ने परास्त किया। इस काल में में जन्में हेमचन्द्र ने एक व्यापारी के रूप में अपना व्यावसायिक जीवन आरम्भ किया। वह अपने व्यापारिक, कूटनीतिक और सैन्य कौशल से शेरशाह के उत्तराधिकारी आदिलशाह के मुख्यमन्त्री बने। अन्ततः 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली पर विजय पाकर वह हेमचन्द्र विक्रमादित्य के रूप में सम्राट बने। यद्यपि, दुर्भाग्य से यह राज अधिक दिन नहीं चल पाया। किन्तु, यह भी एक बनिये के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने वाले व्यक्ति के चातुर्य कौशल को दर्शाता है।

[टिप्पणी : बचपन में हेमू बनिये का उल्लेख करते हुए "श्रीकृष्ण" का लिखा एक नाटक तोताराम पढ़ा था; यह स्मरण हो आया है।


हेमचन्द्र की भाँति भामाशाह का चरित्र भी बनियों के गुणों को दर्शाने के लिए उपयुक्त है। यह वही थे जिन्होंने अपनी सम्पत्ति महाराणा प्रताप के मेवाड़ को मुगलों के आधिपत्य से बचाए रखने के सङ्कल्प को बनाए रखने के लिए अर्पित कर दी। उनके भाई ताराचन्द ने तो महाराणा प्रताप के पक्ष में मुगलों से युद्ध भी किया। अधिक आवश्यकता होने पर यह दोनों भेई भी तलवार उठाकर मुगल शासित मालवा से और भी अधिक धन ले आए।

गुरु तेग बहादुर के पार्थिव को ससम्मान विदा करने वाले लक्खीशाह बंजारे का विवरण मैं पूर्व में दिए आलेख में कर चुका हूँ। उनके पास अफ़ग़ानिस्तान से मध्य भारत तक व्यापार करने के लिए लाखों व्यक्तियों और गाड़ियों के कारवाँ थे।

इससे पूर्व पुर्तगाली भी भारत में प्रवेश पा चुके थे। यह उपनिवेश बनाने, ईसाई धर्म का प्रसार करने और व्यापारिक सम्बन्ध से अपनी समृद्धि बढाने के उद्देश्य से आए थे। सत्रहवीं शताब्दी का आरम्भ होते ही डच और अङ्ग्रेज व्यापारिक कम्पनियाँ बनाकर भारत से व्यापार करने के लिए आए। इन कम्पनियों की अपनी सेनाएँ भी थीं। यह भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक स्थानों पर अपने उपनिवेश स्थापित करने में सफल रहे। फ्रांस के नीदरलैंड्स पर आधिपत्य के उपरान्त डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की भारत और श्रीलङ्का की सम्पत्तियों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी को हस्तान्तरित कर दिया गया।

भारतीय राजाओं के अतिरिक्त भारतीय वणिजों को भी ईस्ट इंडिया कम्पनी अपना प्रतिद्वन्द्वी मानती थी। अतः घुमक्कड़ व्यापारियों (विशेषकर बंजारा समुदाय को) आपराधिक जातियाँ घोषित कर दिया गया। व्यापारिक और व्यावसायिक श्रेणियाँ भी समाप्त हो चलीं। इससे भारतीय उपमहाद्वीप की समुदायों पर आधारित उद्योगों को भी हानि होने लगी। श्रेणियों का स्वरूप भी सङ्कुचित होने लगा। आज उनके अवशेष कुछ मुख्यतः व्यापार में लगे समुदायों (यथा, पारसी, बोहरा, जैन, आदि) के सामाजिक व्यवहार में देखने को मिलते हैं; जहाँ पारस्परिक सहयोग इन समुदायों को सम्पन्न बनाए रखने में सहायक है।

अंग्रेज़ों के काल में भी इनमें से अनेक वणिक समूहों ने प्रगति की और भारत का औद्योगीकरण भी किया। किन्तु, यह अन्य श्रेणियों के साथ न हो सका; उनके पारम्परिक व्यवसाय धीरे-धीरे अलाभकारी होते गए; और अन्य श्रेणियाँ (तथा उनसे जुड़ी जातियाँ) तेजी से विपन्न होने लगीं। लगभग 1750 तक विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति से अगले सौ वर्ष दूसरे स्थान पर रहते भारत की अर्थव्यवस्था का पतन भी व्यावसायिक श्रेणियों के पतन के साथ दृष्टिगोचर है।

भारत के प्रत्येक नगर-ग्राम में बनिये बसते हैं। वे अनेक संसाधनों की उपलब्धि का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी रहे हैं। बनिया होना एक व्यवसाय है; जोकि, जाति तथा धर्म की सीमाओं से परे रहा है। भारत में विभिन्न स्थानों पर प्रवास करते रहने वाले बनिये सांस्कृतिक एकता के भी ध्वजावाहक रहे हैं। गाँवों में बहुधा अधिक व्यक्ति शिक्षित नहीं होते थे; किन्तु, अपना लेखा-जोखा रखने वाले बनिये बहुधा शिक्षित होते थे; और इनमें से अनेक गाँवों में अपनी पण्यशालाओं में ही छोटी पाठशालाएँ भी चलाते थे। इस प्रकार, छोटे स्तर पर वे समाज तक शिक्षा पहुँचाने में सहायक भी रहे। गाँव के साहूकार (बैंकर) होने के कारण वे बहुधा ऊँची ब्याजदर पर ऋण भी देते रहे हैं। जिससे बनियों को बहुधा स्वार्थी जनों के रूप में देखा जाता है। एक-जुटता, व्यावसायिक बुद्धि, समय आने पर रक्षण करने का सामर्थ्य, जाति-धर्म से उठकर शान्ति से व्यवसाय कर पाने की क्षमता बनियों की विशेषताएँ कही जा सकती है; जोकि पूर्वोक्त विवरण से भी स्पष्ट है।

परम्परागत रूप से गुजरात के बनिये बहुधा अपना व्यवसाय वट-वृक्ष के नीचे करते थे। सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में सूरत में अपनी पहली व्यापारिक कोठी खोलने के उपरान्त अङ्ग्रेज़ व्यापारियों का इन बनियों से व्यापारिक व्यवहार स्थापित हुआ।


भारत के प्रभाव से दक्षिण पूर्व एशिया में भी बनिये वट-वृक्ष के नीचे व्यापार करते थे। यह चित्र इंडोनेशिया में वट-वृक्ष के नीचे पण्यशालाओं को दर्शाता है।

बनिया शब्द से अङ्ग्रेज़ी भाषा में वट-वृक्ष (बड़ के पेड़) के बनियों के व्यापारस्थल होने के कारण banyan (बैन्यान) शब्द प्रचलित हुआ।


अठारहवीं शताब्दी के मध्य की बनियान

यही नहीं; बनियों द्वारा पहनी जाने वाली सूती बण्डी को भी banyan कहा जाने लगा; जिसे हम अब बनियान कहते हैं।

यूरोप से आए व्यापारियों तथा भारत की व्यावसायिक श्रेणियों में कुछ समानता है; तो बहुत से अन्तर भी। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर विचार किसी अन्य आलेख में।

साभार : अरविन्द व्यास

बनिया समुदाय का व्यापार में कुशल होने का क्या कारण है?

बनिया समुदाय का व्यापार में कुशल होने का क्या कारण है?

बनिया समाज में अग्रवाल, माहेश्वरी और जैन (ओसवाल, पोरवाल आदि) लोगों को लिया जाता है - मैं यहाँ पर राजस्थान के इन लोगों के बारे में बताऊंगा जिनको मारवाड़ी भी कहा जाता है. ये एक अफ़सोस है की साम्यवादी लेखकों के निहित लक्ष्यों के कारण मारवाड़ी को हर साहित्य और हर फिल्म में एक लोभी लालची के रूप में दर्शाया जाता रहा है. कोई भी फिल्म देखिये या कोई भी काल्पनिक उपन्यास पढ़िए - कुछ पात्र इस प्रकार लिखे जाएंगे - एक मारवाड़ी होगा जो बहुत लोभी और निर्दयी होगा और एक पठान होगा जो बहुत सहयोगी होगा - ये जानबूझ कर इस समाज को हीनभावना से भरने का षड्यंत्र था. मारवाड़ी समाज के बारे में कुछ शोध-आधारित सामग्री प्रस्तुत है - अगर आप फिल्मों में दिए हुए इम्प्रैशन को एक बार के लिए हटाएंगे तो इसको पढ़ पाएंगे नहीं तो आप ये ही मान कर चलेंगे - मारवाड़ी यानी .... .परिवर्तन संसार का नियम है और इसका कोई अपवाद नहीं है. हर अगली पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी पुरानी, दकियानूसी, पुरातनपंथी और अविकसित नजर आती है और इसी कारण हर अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की व्यवस्थाओं को बदल देती है और नयी व्यवस्थाएं स्थापित करने का प्रयास करती है. इसी प्रक्रिया में कई परम्पराएं लुप्त हो जाती है और फिर हम चाह कर भी उनको नहीं सहेज सकते हैं. ऐसी ही एक व्यवस्था है मारवाड़ी प्रबंधन शैली. नयी पीढ़ी ने पाश्चात्य शिक्षा को अपना लिया है और वे अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी संकोच करते हैं. जो मारवाड़ी प्रबंध शैली अनेक वर्षों की गुलामी के बाद भी सलामत रह गयी वो आजादी के बाद उपेक्षा का शिकार हुई और कुछ ही दशकों में लुप्त हो गयी. सरकार या किसी भी प्रबंध संस्थान की तरफ से इस अद्भुत प्रबंध शैली को लिपिबद्ध करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए. भारतीय प्रबंध संस्थानों ने विदेशों की प्रबंध शैलियों को सीखने और समझने में अपना सारा समय लगा दिया और उन्ही प्रबंध शैलियों को आगे बढ़ावा दिया लेकिन इस अद्भुत प्रबंध शैली को हीन दृष्टि से देखा और उस उपहास के कारण ये व्यवस्था आज लुप्त हो चुकी है. आज का ये फैशन बन गया है की प्रबंध सीखना है तो अमेरिका की कुछ प्रबंध संस्थाओं में जाओ (वो संस्थाएं वाकई महान है) लेकिन अफ़सोस तो ये है की अद्भुत प्रबंध दक्षता रखने वाले मारवाड़ी अपनी नयी पीढ़ी को अपनी प्रबंध दक्षता सिखाने की बजाय इसी फैशन में बह कर विदेश से प्रशिक्षित करवा रहे हैं. आधुनिक शिक्षित लोगों ने ऐसा चश्मा पहना है की उनको भारतीय व्यवस्थाओं में अच्छाइयां ढूंढने से भी नहीं मिलती हैं - शायद उनको मेरे इस लेख में भी कुछ भी काम का न मिले. लेकिन १०० साल बाद पश्चिम से किसी ने भारत पर अध्ययन किया और फिर किसी ने पूछा की अद्भुत भारतीय व्यवस्थाओं को समूल नष्ट करने के लिए कौन जिम्मेदार है तो क्या जवाब देंगे ?

एक समय मारवाड़ी व्यावसायिक दक्षता पूरी दुनिया में अपनी अद्भुत पहचान स्थापित कर चुकी थी लेकिन आज ये कला लुप्त होने के कगार पर है. मारवाड़ी प्रबंध शैली दुनिया में कहीं पर भी पूरी तरह से लिखी हुई नहीं है और ये उन लोगों के साथ ही विदा हो गयी है जो लोग इस कला में मर्मज्ञ थे. लेकिन जैसे ही ये पूरी तरह लुप्त हो जायेगी - वैसे ही हमें अहसास होगा की एक बहुत ही शानदार प्रबंध व्यवस्था हमने खो दी है.

लुप्त हुई मारवाड़ी व्यवस्था का आज कोई जिक्र बेमानी है लेकिन फिर भी उनकी कुछ व्यवस्थाओं के बारे में मैं अवश्य जिक्र करना चाहूँगा: -

१. मौद्रिक प्रबंधन और ब्याज गणना की अद्भुत व्यवस्था : - मारवाड़ी प्रबंध व्यवस्था का आधार मौद्रिक गणना है और इसी कारण ब्याज को नियमित रूप से गिना जाता है जो की पैसे के समुचित सदुपयोग के लिए जरुरी है. फिल्मों में मारवाड़ी ब्याज पर बहुत ही उपहास और व्यंग्य नजर आते हैं लेकिन आज ये ही व्यवस्थाएं आधुनिक बैंकिंग संस्थाएं अपना रही है. बाल्यकाल से ही गणना (गणित) का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और इसी कारण बिना केलकुलेटर के भी कोई भी व्यक्ति दशमलव अंकों की गुना-भाग भी आसानी से कर लिया करते थे और गणना में छोटी से छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी. ब्याज जितना होता है उतना ही लेना सिखाया जाता है - एक पैसा भी हराम का लेना पाप है और इसी प्रशिक्षण के कारण मारवाड़ी ब्याज की गणना भी करता है लेकिन अपने धर्म का भी पालन करता है - लेकिन अफ़सोस ये है की आपने तो फिल्मों में उसको हमेशा लोभी और लालची के रूप में ही देखा है - आप जब तक मारवाड़ी परिवारों में रह कर ये सब नहीं देखोगे विश्वास नहीं करोगे - मैंने तो बचपन से ये सब देखा भी है और बार बार आजमाया भी है - कई बार जान बुझ कर ज्यादा भुगतान कर के भी देखा और एक एक पाई वापिस लेनी पड़ेगी क्योंकि हराम का नहीं लेना बचपन से सिखाया जाता है - बचपन से ये ही प्रशिक्षण मिलता है की सही नियत रखिये और सही गणना करिये

२. जीवन पर्यन्त की प्रबंध कारिणी - यानी मुनीम व्यवस्था: मारवाड़ी व्यवस्था में मुनीम को बहुत ही अधिक महत्त्व दिया जाता था. मुनीम को आधुनिक व्यवस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के सामान इज्जत और सम्मान दिया जाता था और उसके ऊपर पूरा विश्वास किया जाता था. उसको पारिवारिक सदस्य की तरह सम्मान मिलता था. उसको जीवन पर्यन्त के लिए व्यवसाय का प्रबंधक नियुक्त कर दिया जाता था. उसके परिवार की जिम्मेदारियां भी उठाई जाती थी ताकि उसके परिवार को कोई परेशानी न हो.

३. पड़ता व्यवस्था : मारवाड़ी निर्णय का आधार पड़ता यानी शुद्ध लाभ. शुद्ध लाभ की गणना का ये तरीका अद्भुत था. इसमें सिर्फ अस्थायी आय और अस्थायी खर्चों के आधार पर हर निर्णय से मिलने वाले शुद्ध लाभ या हानि पर चिंतन कर के ये निर्णय लिया जाता था की मूल्य क्या रखा जाए.

४. संसाधन बचत : मारवाड़ी अपने हर निर्णय में संसाधनों का कमसे कम इस्तेमाल कर के अधिक से अधिक बचत करने का प्रयास करते थे और इस प्रकार पर्यावरण की बचत में योगदान देते थे. मारवाड़ी एक दूसरे को चिठ्ठी भी लिखते थे तो उसमे कम से कम कागजों का इस्तेमाल करते हुए अधिक से अधिक जानकारियां प्रेषित करते थे.

५. बदला व्यवस्था: मारवाड़ी अपने सौदों को भविष्य में स्थानांतरित करने के लिए बदला व्यवस्था काम में लेते थे जिसके तहत सौदों को आगे की तारीख पर करने के लिए निश्चित दर से ब्याज की गणना होती थी. (ऐसी ही कुछ व्यवस्था विकसित करने के लिए दो अर्थशास्त्रियों को हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया लेकिन मारवाड़ियों की इस व्यवस्था को रोक दिया गया था)

६. हुंडी व्यवस्था: आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के शुरू होने से भी अनेक वर्ष पहले से मारवाड़ी व्यापारी हुंडी व्यवस्था को चलाते आ रहे हैं जिसको अंग्रेजों ने पूरी तरह से रोक दिया और फिर आजादी के बाद आधुनिक सरकार ने पूरी तरह से ख़तम कर दिया था. ये हुंडी व्यवस्था आज की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से कम लागत पर मुद्रा के स्थानांतरण का माध्यम था जिसमे बिना तकनीक या बिना इंटरनेट के भी आज की तरह ही एक जगह से दूसरी जगह पर मुद्रा का आदान प्रदान होता था.

७. पर्यावरण अनुकूल निर्णय: मारवाड़ी हमेशा पर्यावरण अनुकूल निर्णय लिया करते थे - जिसमे वे स्थानीय पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए बिना ही व्यापार और व्यवसाय को बढ़ावा देने का प्रयास करते थे.

८. धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना : व्यापार शुरू करने से पहले वे मंदिर बनाते थे और शुभ - लाभ लिखते थे. शुभ यानी हर व्यक्ति का कल्याण लाभ से पहले लिखते थे ताकि हर निर्णय को सबके कल्याण के लिए ले सकें. हर निर्णय को धर्म - और अध्यात्म के आधार पर जांचा जाता था. तकनीक के देवता विश्वकर्मा की पूजा की जाती थी तो धन के देवता गणेश और लक्ष्मी को आराध्य माना जाता था. सभी निर्णय सिद्धांतों पर आधारित होते थे और सबसे बड़ा सिद्धांत ये था की जो भी निर्णय हो वो जीवन को जन-कल्याण और आत्मकल्याण की तरफ ले जाए. जीवन का मकसद था केवलयज्ञान की तरफ जाना और इसी लिए हर निर्णय को पुण्य का अवसर के रूप में देखा जाता था और पाप से बचने के प्रयास किये जाते थे. ऐसी तकनीक नहीं अपनायी जाती थी जिससे जीवों का नाश हो. शुरुआत करते समय से ही सकल भ्रमांड के कल्याण को आदर्श के रूप में रखा जाता था.

९. देवों को अर्पण : - हर व्यापारिक निर्णय श्री गणेश और रिद्धि सिद्धी की आराधना के बाद किया जाता है. श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है. आय का कुछ हिस्सा देवों को अर्पित कर दिया जाता था जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण के काम में आता था. व्यापार की आम्दानी का कुछ भाग गोशाला या ऐसी ही अन्य किसी संस्था को देने से ये माना जाता था की देवताओं का हिस्सा उनको अर्पित कर दिया गया है. प्राचीन भारत में इसी कारण मंदिरों में प्रचुर संपति दान में आती थी जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण हेतु अर्पित की जाती थी.

१०. गद्दियों की व्यवस्था: आधुनिक तड़क भड़क की जगह मारवाड़ी अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों में गद्दियों की व्यस्था रखते थे जो बहुत ही आरामदायक, आत्मीयता पूर्ण और स्वच्छता पर आधारित माहौल बनाती थी. ये मेहमानों के ढहरने के लिए भी काम आती थी. किसी मेहमान को जरुरत के समय इन्हीं गद्दियों में रुकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाती थी ताकि अनावश्यक होटल का खर्च भी नहीं होता था. आधुनिक एयर कंडीशन ऑफिसों से तुलना करके पर्यावरण के ज्यादा अनुकूल क्या है ये आप स्वयं तय कर सकते हैं.

११. बचत और उत्पादकता पर जोर : मारवाड़ी व्यवस्था में बचत और उत्पादकता पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था और इसी कारण विषम परिस्थितियों में भी मारवाड़ियों ने व्यापार कर के अपने आप को सफल बनाया. आधुनिक कंपनियों की जगह पर मारवाड़ियों ने बचत और उत्पादकता के क्षेत्र में शानदार कार्य किया और वैश्विक व्यापार स्थापित किया. रविवार की जगह पर अमावस्या की छुट्टी होती थी (यानि महीने में सिर्फ एक दिन की छुट्टी) - लेकिन सामान्य दिनों में भी कार्य के घंटे बहुत ज्यादा होते थे - लेकिन हर कर्मचारी को साल में एक महीने अपने गांव जाने की छुट्टी दी जाती थी.

१२. जरुरत पड़ने पर राज्य की मदद: - मारवाड़ी व्यवसायी उस समय के राजा की जरुरत के समय आर्थिक मदद किया करते थे और इसी कारन अनेक शहरों में मारवाड़ी व्यापारियों को नगर-शेठ की उपाधि दी जाती थी. कई बार देश हित में व्यापार और उद्यम की बलि भी चढ़ा दी जाती थी.

१३. स्थानीय लोगों की भागीदारी: मारवाड़ी जहाँ पर भी व्यापार करने के लिए जाते थे वहां के स्थानीय लोगों को अपने व्यापार और उद्योगों से लाभान्वित करने का प्रयास करते थे और इसी कारण उनको स्थानीय लोगों से पर्याप्त सहयोग और सम्मान मिलता था.

१४. शांतिपूर्ण ढंग से विरोध को सहना : मारवाड़ियों को अन्य भारतियों की तरह सत्ता पक्ष से विरोध का सामना करना पड़ा. डाकुओं, लुटेरों और अनेक अधिकारियों को मारवाड़ी सरल लक्ष्य नजर आते थे जिन पर वे अपने अत्याचार आसानी से कर लेते थे. सत्ताधारी उनसे मनमाना टैक्स वसूलते थे. ब्याज की सूक्ष्म गणना किसी को भी अच्छी नहीं लगती थी. लोग मारवाड़ियों से पैसे तो उधार लेना चाहते थे लेकिन ब्याज नहीं देना चाहते थे लेकिन मारवाड़ियों की सफलता का आधार ही उनकी सूक्ष्म गणना थी जिस के कारण वे पैसे के सही इस्तेमाल पर जोर देते थे. अंग्रेजों और उनके इतिहासकारों ने मारवाड़ियों को सूदखोर के रूप में स्थापित किया क्योंकि अंग्रेजों को मारवाड़ियों की व्यवस्था बैंकिंग व्यवस्था से बेहतर नजर आयी और वे आधुनिक बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए मारवाड़ियों को हटाना चाहते थे - जबकि मारवाड़ी खुद बैंकिंग व्यवस्था के समर्थक थे और बैंकें भी मारवाड़ियों की तरह चक्रवर्ती ब्याज लेती थी. मारवाड़ी किसानों को जरुरत के समय पर ऋण प्रदान करदेते थे और इसी कारण अनेक वर्षों से मारवाड़ियों ने किसानों के साथ मिल कर हर जगह पर कृषि को सफल बनाने में योगदान दिया था लेकिन ये आधुनिक व्यवस्था में नकारात्मकता के माहौल में तब्दील हो गया. अंग्रेजों के बाद में आधुनिक भारत में मारवाड़ियों के योगदान और उद्यमिता को पूरी तरह से विरोध का सामना करना पड़ा और उसी के कारण मारवाड़ियों ने परम्परागत व्यवस्थाओं को बदल दिया और नयी प्रोफेशनल प्रबंधन पर आधारित व्यवस्थाओं को अपना लिया ताकि उनका विरोध न हो. आधुनिक मीडिया द्वारा मारवाड़ियों का पूरी तरह से नकारात्मक चित्रण हुआ और इस प्रकार उनकी उद्यमिता को लगाम लग गयी. मारवाड़ियों की नयी पीढ़ी अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी हिचकिचाने लगी.

१५. सामाजिक उद्यमिता : मारवाड़ी उद्यमी अपनी आय में से कुछ राशि बचा कर के समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी क्रम में उन्होंने प्याऊ, गोशालाएं, मंदिर, शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल और धर्मशालाओं का निर्माण किया. उनके प्रयासों से राजस्थान में विकट परिस्थितियों में भी लोगों को रहने में दिक्कत नहीं आयी. आजादी से पहले अनेक शिक्षण संस्थाएं मारवाड़ियों ने इस प्रकार स्थापित की ताकि भारतीय संस्कृति भी सलामत रहे और युवा पीढ़ी भी शिक्षित हो सके.

१६. विपणन की व्यक्तिगत शैली: - आधुनिक विज्ञापन आधारित व्यवस्था की जगह पर मारवाड़ी व्यवसायी व्यक्तिगत संपर्क और व्यक्तिगत सेवा पर आधारित विपणन व्यवस्था अपनाते थे जिसमे एक व्यक्ति को ग्राहक बनाने के बाद पूरी जिंदगी उसकी जरूरतों के अनुसार उत्पाद उसको प्रदान करते थे. व्यापारिक रिश्तों को पूरी जिंदगी निभाया जाता था और व्यापारिक सम्बन्ध मधुर व्यवहार, वैयक्तिक संबंधों और आपसी विश्वास पर आधारित होते थे. "अच्छी नियत" के आधार पर ही सारे निर्णय लिए जाते थे ताकि पूरी जिंदगी व्यापारिक सम्बन्ध बना रहे और इसी लिए आपसे मेलजोल, जमाखर्च, लेनदेन और आपसी खातों के मिलान पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था.

१७ दीर्धजीवी उत्पाद : मारवाड़ी ऐसे उत्पाद विकसित करते थे जो दीर्ध समय तक सलामत रह सके और इस प्रकार निवेश करते थे ताकि दीर्ध काल तक कोई दिक्कत न आये. आधुनिक कम्पनियाँ ऐसे उत्पाद बनाती है जो अलप काल में ही नष्ट हो जाएं. वे पैकेजिंग और विज्ञापन पर अत्यधिक अपव्यय करती है लेकिन मारवाड़ी लोग इस प्रकार के अपव्यय को बचाते थे.

१८. साख पर बल: मारवाड़ी अपने व्यापर में साख बनाने पर सबसे अधिक जोर देते थे और साख पर किसी भी हालत में आंच नहीं आने देते थे. इसी कारण "गुडविल" शब्द के आने से बहुत पहले से साख और "नाम" जैसे शब्द मारवाड़ी व्यापारिक जगत में काम आते थे.

१९. कार्य विभाजन व युवाओं को मार्गदर्शन : मारवाड़ी व्यापर में बुजुर्ग लोग नीतिगत निर्णय लेते हैं लेकिन युवा रोज का काम देखते हैं - अतः इस प्रकार सभी लोगों में काम बंटे रहते थे और आपसी तालमेल भी बना रहता था. सबसे बड़ा पुरुष व्यक्ति कर्ता कहलाता था और वो सभी नीतिगत निर्णय लेता था. परिवार के युवा उससे मार्गदर्शन ले कर रोजमर्रा के निर्णय लेते थे और उसको एक एक पैसे का हिसाब देते थे. पूरे घर में एक ही रसोई होती थी और अन्न का एक दाना भी व्यर्थ में नहीं बहाया जाता था. अन्न का सबसे पहला टुकड़ा गाय, फिर अन्य प्रमुख जानवरों जैसे कुत्तों आदि के लिए निकला जाता था और फिर घर के लोग खाना कहते थे. भोजन सामान्य लेकिन होता था लेकिन बड़े प्यार से मिल कर खाने में अलग ही आनंद होता था. थाली में एक भी दाना व्यर्थ नहीं छोड़ा जाता था. थाली में सबसे पहले कर्ता भोजन की शुरुआत करता था और आखिर में भी वो ये ही देखता की कोई भी भूखा नहीं रह गया है और सबसे आखिरी दाना (अगर कुछ बच जाए) गृह स्वामिनी उठाती थी. आज की बड़ी कंपनियों की पांच सितारा संस्कृति की तुलना में बहुत कम भोजन व्यर्थ जाता था. भोजन के समय ही अच्छे उद्यमियों और अच्छे सामाजिक आदर्शों का वृत्तांत सुनाया जाता था जो युवाओं को श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए प्रेरित करता था. ऐसा माना जाता था की साथ में भोजन करने से आपसी प्रेम बढ़ता है. साल में कम से कम एक बार पूरा परिवार तीर्थयात्रा के लिए या सत्संग के लिए जाता था जो परिवार के लोगों को जीवन मूल्यों से जोड़ देता था. व्यवसाय का केंद्र परिवार था - परिवार का आपसी प्रेम व्यापारिक संबंधों में भी परिलक्षित होता था.

२०. प्रेम भरा संवाद : मारवाड़ी लोगों ने अनेक व्यवस्थाएं की थी जिनमे आपसी मधुर संवाद हो सके. सब पुरुष लोग एक साथ एक ही थाली में भोजन करते थे और सब महिलायें एक साथ एक ही थाली में भोजन करती थी. इस प्रकार भोजन के दौरान आपस में मधुर संवाद स्थापित हो जाता था. रात्रि में युवा वर्ग बुजुर्गों के पैर दबाता था और उसी दौरान बुजुर्ग लोग युवाओं को व्यापारिक सीख भी दिया करते थे और दिन भर के समाचार भी पूछ लेते थे. उसी समय वे उनको व्यावसायिक नीतियों और परम्पराओं की शिक्षा भी प्रदान करते थे. इसी प्रकार मारवाड़ी उद्यमी अपने कर्मचारियों से भी प्रेम से बात करते थे और इस प्रकार एक सौहार्द-पूर्ण माहौल बनाया करते थे.

२१. सुव्यवस्थित खाते और सुव्यवस्थित वार्षिक विवरण : - मारवाड़ी उद्यमी दिवाली से दिवाली अपने व्यापार के बही - खाते रखते थे. बहीखाते बहुत ही सुन्दर अक्षरों में लिखे जाते थे जिनमे कभी भी कोई त्रुटि नहीं होती थी. हर विवरण बहुत ही सहेज कर रखा जाता था. हर दिवाली को नयी पुस्तकों में खाते - बही की पूजा कर के शुरुआत की जाती थी. हर खाता पूरी तरह से व्यवस्थित होता था. उस जमाने में कम्प्यूटर नहीं था अतः सारे खाते वर्षों तक सुरक्षित रखे जाते थे.

पूरी दुनिया जानती है किस प्रकार बजाज, बिरला, सिंघानिया, पीरामल, लोहिया, दुगड़, गोलछा, संघवी, मित्तल, पोद्दार, रुइया, और बियानी आदि घराने अपने व्यापारिक कौशल से आगे बढे हैं. बिरला समूह तो इस बात के लिए जाना जाता है की वो फैक्ट्री बाद में लगाता है - पहले वहां लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनाता है, लोगों को रहने के लिए मकान देता है और फिर फैक्ट्री लगाता है. है न अद्भुत बात. भामा शाह ने राणा प्रताप को दिल खोल कर मदद की तो जमनालाल बजाज ने गाँधी जी को दिल खोल कर मदद की. इन्हीं नीतियों के कारण अंग्रेजों के आने से पहले भारत में लाखों गुरुकुल, उपासरे, पोशालाएँ, धर्मशालाएं, भोजनशलायें कार्यरत थी और उस समय की शिक्षा मूल्य परक थी. उस समय में हर घर में श्रवण कुमार जैसे पुत्र होते थे जो अपने व्यापार से ज्यादा अपने माँ - बाप और देश की सेवा को तबज्जु देते थे. मारवाड़ी व्यवस्था में कमियां निकालना बहुत आसान है लेकिन उसकी जो अच्छाइयां हैं उनको अगर आज का उद्यमी अपनाता है तो वो निश्चित रूप से पर्यावरण के अनुकूल प्रबंध व्यवस्था स्थापित कर पायेगा और इससे उसका और इस दुनिया का दोनों का भला ही होगा. लेकिन लुप्त हो रही इस व्यवस्था से सीखना और इसको आगे बचाना अब तो मुश्किल ही है. अमेरिका की आधुनिक प्रबंध शिक्षा हो सकता है अधिक आर्थिक सफलता प्रदान कर दे लेकिन जो सुकून और पर्यावरण से जो जुड़ाव भारतीय व्यवस्थाओं ने स्थापित किया था वो तो अब लुप्त ही हो गया है और इसके लिए वर्तमान पीढ़ी ही जिम्मेदार है.

साभार - त्रिलोक जैन जी