Pages

Tuesday, May 4, 2021

AZAD JAIN - PIPAL BABA

AZAD JAIN - PIPAL BABA

आज की पॉजिटिव स्टोरी:नानी की बात का ऐसा असर कि 40 साल से लगा रहे पेड़, 'पीपल बाबा' अब तक 2 करोड़ से ज्यादा पौधे लगा चुके हैं
 



आज ऑक्सीजन की कमी के चलते लोगों की जान जा रही है। उत्तराखंड में ग्लेशियर टूट रहे हैं, दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषित हवा में कई बार सांस लेना कठिन होने लगा है। लेकिन अब जाकर हमने ऑक्सीजन, प्रकृति और पेड़ों के बारे में सोचना शुरू किया है। वर्ना सालों से ग्लोबल वार्मिंग जैसी विकराल समस्या हमें धीरे-धीरे हमें मौत के मुंह में ढकेल रही है। ये कहना है 40 साल से ज्यादा समय से पेड़ लगाने की मुहिम चला रहे, आजाद जैन उर्फ पीपल बाबा का। वह अपने स्वयंसेवियों के साथ अब तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 2 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगा चुके हैं। इनमें सवा करोड़ से ज्यादा केवल पीपल के पेड़ हैं, क्योंकि इसे ऑक्सीजन का स्रोत माना जाता है।

वह कहते हैं, 'बचपन में नानी-दादी और मेरी क्लास टीचर मिसेज विलियम्स कहती थीं कि जब भी दुख में हो तो पेड़ों के नीचे बैठ जाओ। ऐसा करते हुए मुझे एक चीज समझ आ गई कि पेड़ हमारे परिवार हैं। फिर मेरी नानी ने एक दिन कहा कि कोई ऐसा काम करो जिसका असर हजार साल तक रहे। इस बात ने मेरे मन में गहरा असर किया। इसके बाद मैंने पेड़ लगाने को ही अपना जीवन बना लिया।'

राजस्‍थान के एक गांव में पेड़ लगाने गए थे, किसी ने अचानक पीपल बाबा कहकर पुकारा
साल 1966 में चंडीगढ़ में जन्में आजाद जैन के पिता फौज में डॉक्टर थे। पिता की नौकरी के साथ आजाद को भी देश के कई हिस्सों में घूमने का मौका मिला। उन्होंने अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पुणे से किया। पढ़ाई के दौरान ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे और बचे वक्त में योगा कराते। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में आगे बढ़ने कोशिश की। लेकिन उन्हें कोई ऐसी नौकरी नहीं मिली। 26 जनवरी 1977 से उन्होंने स्वतः पेड़ लगाने की मुहिम छेड़ दी। तब उन्हें लगा कि मुहिम की शुरुआत राजस्‍थान से करनी चाहिए क्योंकि वहां का ट्री-कवर कम है।

जब उन्होंने पेड़ लगाना शुरू किया तो पाया कि पेड़ बिना देखरेख के सूख जा रहे हैं, या कोई यों ही उन्हें उखाड़ दे रहा है। कुछ पेड़ बड़े हुए फिर लोगों ने काट दिए। तब वे अकेले अपने मिशन पर थे। तभी उन्होंने पीपल का सहारा लिया। पीपल भारतीय संस्कृति और धर्म से जुड़ा हुआ है। पीपल लगाने के बाद लोग खुद ही इसका ध्यान रखते थे। इसके बाद उन्होंने तेजी से पीपल लगाने शुरू कर दिए। उसी दौर में एक कार्यक्रम में वो बोलने गए थे तो किसी ने उन्हें पीपल बाबा कहकर पुकारा और यही उनका नाम पड़ गया।

शहरी वन का कॉन्सेप्ट प्रशासनिक अधिकारियों को भी पसंद आया, तब अभियान तेजी से बढ़ा
पीपल बाबा बताते हैं, 'अभियान के शुरुआती दिनों में हम किसी शहर या गांव में पेड़ लगाने जाते थे तो लोग मेरा मजाक उड़ाते कि पढ़-लिखकर ये कैसा काम कर रहे हैं। कभी-कभी विचलित भी हो जाता था, लेकिन जो पेड़ लगाए थे, उनको बड़ा होते देखता था तो फिर आगे बढ़ने का मन होता था। बाद में मेरी मुलाकात माइक पाण्डेय से हुई। हमने एक गांव में ट्रीज ट्रस्ट बनाया। इसमें लोगों को लाइफ टाइम मेंबर बनाने लगे। इससे स्वयंसेवियों का एक बड़ा ग्रुप तैयार हो गया।

इसके बाद हमने शहर में जंगल लगाने का अभियान शुरू किया। ये प्रशासनिक अधिकारियों को पसंद आया और कई जिलों में जंगल विकसित करने के लिए जमीन मिलने लगीं। बाद में कॉर्पोरेट हाउसेज की ओर से भी हमें बुलाकर प्लांटेशन के काम सौंपे जाने लगे। बताते हैं कि अब तक उन्होंने 100 से ज्यादा प्लांटेशन साइट डेवलप कर ली है। दिल्ली में अरण्या वन प्रोजेक्टस में 16,000 पेड़, नोएडा में अटल उदय उपवन के नाम से 62200 पौधों का वन, ग्रेटर नोएडा में 2 लाख पौधों के वन और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहीमबाद में 3.5 लाख पौधों के वन तैयार किए जा रहे हैं। धौलाधर की पहाड़ियों में पेड़ लगाने की मुहिम जारी है।

पीपल बाबा और उनकी टीम का दावा है कि अब तक उनकी ओर से करीब 43 सालों में 2 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं। इनमें 1 करोड़ 27 लाख पीपल और 40 लाख 4 हजार नीम के पेड़ और 30 लाख से ज्यादा अन्य पेड़ लगा चुके हैं। उनके अनुसार फिलहाल वे सेना, अर्धसैनिक बलों, सैन्य स्टेशनों, स्कूलों कालेजों, विश्वविद्यालयों के परिसरों में पेड़ लगाते हैं। इसके अलावा सामाजिक और धार्मिक संगठनों, आश्रमों, मंदिरों, गुरुद्वारों आदि के साथ मिलकर पेड़ लगाने का काम करते हैं। कोरोना काल में भी उनका पेड़ लगाने का काम जारी रहा। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए, गौतम बुद्ध नगर के तत्कालीन जिलाधिकारी बीएन सिंह की अनुमति से 15 एकड़ जमीन को जंगल बनाया जाता रहा।

जन्मदिन को हरियाली दिवस के तौर पर मनाने का कॉन्सेप्ट लोगों को आया पसंद
पीपल बाबा बताते हैं कि जन्मदिन को हरियाली दिवस के रूप में मनाकर पेड़ लगाने के कॉन्सेप्ट को टीवी का लोकप्रिय चेहरा ऋ‌चा अनिरुद्ध, फिल्म अभ‌िनेता जॉन अब्राहम, अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष आतिफ रसीद, वन्य कर्मी माइक पाण्डेय और लखनऊ के मेयर संयुक्ता भाटिया का समर्थन मिला।

अंग्रेजी की एक चर्चित कहावत है, Each one plant one, यानी इंसान को अपने जीवनकाल में कम से कम एक पेड़ जरूर लगाना चाहिए। अगर सभी लोग पेड़ लगाएंगे और हमारी धरती पर उतने पेड़ हो जाएंगे जितने लोग हैं तो इससे पर्यावरण में स्थायित्व आएगा। प्रदूषण, ओजोन समस्या और ग्लोबल वार्मिंग से अपने आप निजात मिल जाएगी। केवल भारत में हर साल 1 अरब 35 करोड़ पेड़ बढ़ जाएंगे।

पेड़ लगाने के लिए लगाते हैं ट्रेनिंग कैंप, ट्रेनिंग लेने विदेशी भी आते हैं
आजाद जैन के अनुसार अब तक 63 देशों के छात्रों और स्वयंसेवकों को वे पीपल के पेड़ का न केवल महत्व बता चुके हैं, बल्कि बकायदे पेड़ लगाने की ट्रेनिंग भी दी है। इसमें 6 सप्ताह रहकर ट्रेनिंग ली जा सकती है। इन ट्रेनिंग कैंप्स में वह पर्यावरण विज्ञान, वानिकी, बागवानी और कृषि सुधार की तकनीकी सिखाते हैं। साथ ही उनके कई स्वयंसेवक देश में घूम-घूमकर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक कर रहे हैं। इनके स्वयंसेवक विनय कुमार साहू 2015 से ही साइकिल यात्रा के जरिए लोगों को जागरूक कर रहे हैं। अब पूरी रणनीति के साथ ट्रस्ट देशभर में पेड़ लगाने जा रहा है, रणनीति बनाने में बद्री सिंह अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

हरियाणा में सबसे कम है ट्री-कवर, अगले चार महीने चलाएंगे 40 हजार पेड़ लगाने का अभियान
5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। अबकी पीपल बाबा इस अवसर पर हरियाली क्रांति का नारा देंगे। और अगले चार महीने तक देश के सबसे कम ट्री-कवर वाले राज्य हरियाणा में 40 हजार पेड़ लगाने और हर पेड़ के लिए एक स्वयंसेवक तय करने का अभियान चलाएंगे। उनके अनुसार देश की फाइलों में 20% तक ट्री-कवर बताया जाता है, लेकिन गूगल के सेटेलाइट व्यू से पता चलता है कि यह 8% तक गिर गया है। अगर हमने इसे 50% तक नहीं पहुंचाया तो महामारियों से घिरते रहेंगे।

इस बात को उनके एक वाक्य से खत्म करते हैं, 'पीपल का पेड़ बहुत विशाल होता है और उसकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। इसकी उम्र भी ज्यादा होती है। यह 22 घंटे से अधिक समय तक ऑक्सीजन देता है। पीपल के पेड़ में जल्दी कीड़े नहीं लगते। इसके पौधे आसानी से मिल जाते हैं। इसमें अधिक पानी भी नहीं लगता। ये जल्दी से नष्ट नहीं होता। पर्यावरण के लिहाज से ये संकट की घड़ी है। इससे मौजूदा ऑक्सीजन की समस्या तो सीधे तौर पर दूर नहीं होगी, लेकिन इसका स्‍थाई उपाय यही है।

साभार: दैनिक भास्कर 
 

No comments:

Post a Comment

हमारा वैश्य समाज के पाठक और टिप्पणीकार के रुप में आपका स्वागत है! आपके सुझावों से हमें प्रोत्साहन मिलता है कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का प्रयॊग न करें।