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Tuesday, May 14, 2024

MARICO MARIWALA GROUP

MARICO MARIWALA GROUP

Marico Products Success Story; Parachute Coconut Oil | Saffola - Livon |

मेगा एंपायर-पैराशूट ऑयल बनाने वाली 9 हजार करोड़ की मैरिको: तेल-मसाला बेचकर खड़ा किया एंपायर, काली मिर्च के नाम पर रखा मारीवाला सरनेम


पैराशूट, सफोला, लिवोन और सेट वेट... ये सारे वह ब्रांड हैं, जिन्हें हम सब ने कभी न कभी जरूर इस्तेमाल किया होगा। इन सबको बनाने वाली कंपनी का नाम है- मैरिको। मैरिको फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स यानी FMCG सेक्टर की कंपनी है।

हाल ही में कंपनी ने वित्त वर्ष-2024 के मार्च तिमाही के नतीजे जारी किए। इसमें मैरिको का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 4.9 प्रतिशत बढ़कर 320 करोड़ रुपए पर पहुंच गया।

बिजनेस के नफा-नुकसान से जुड़ी यह बातें टेक्निकल हैं। बहुत सारे लोगों के पल्ले नहीं पड़ी होंगी, लेकिन यह ख्याल तो आया ही होगा कि मैरिको कंपनी के फाउंडर कौन हैं? उन्होंने इसकी नींव कब रखी थी।


मैरिको कोकोनट ऑयल बनाने के साथ-साथ पर्सनल केयर और फूड प्रोडक्टस भी बनाती है।आज कोकोनट ऑयल में मैरिको का देश में लगभग 62% का मार्केट शेयर है।

आज मेगा एंपायर में 9,764 करोड़ रुपए रेवेन्यू वाली मैरिको की बात करते हैं-

मैरिको कंपनी के फांउडर है हर्ष मारीवाला। जब वह 38 साल के थे तब उन्हें कंपनी बनाने का आइडिया आया। इसके बाद 13 अक्टूबर 1988 में मैरिको कंपनी अस्तित्व में आई।

पूरी कहानी समझने के लिए इसकी स्थापना से 126 साल पीछे जाना होगा।

बात 1862 की है। गुजरात के कच्छ के रहने वाले कांजी मोरारजी तेल और मसालों का एक छोटा-सा बिजनेस शुरू करने मुंबई आते हैं। काम ठीक-ठाक चल पड़ता है, बिजनेस को विस्तार की जरूरत पड़ती है। इसलिए उन्होंने अपने भतीजे वल्लभदास को भी मसालों के बिजनेस में शामिल कर लिया।


मोरारजी और वल्लभदास ने सबसे पहले केरल में एंट्री ली। वह काली मिर्च, हल्दी, अदरक और सूखे नारियल इम्पोर्ट कर दिल्ली, अमृतसर और कोलकाता के बाजार में बेचने लगे।

चाचा-भतीजे की इस जोड़ी ने केरल के आलेप्पी में काली मिर्च की प्रोसेसिंग यूनिट शुरू की। इसके बाद से ही उन्हें ‘मारीवाला’ सरनेम रखने का आइडिया आया।

दरअसल गुजराती में काली मिर्च को ‘मारी’ कहा जाता है। वल्लभदास ने सोचा कि अगर बिजनेस को बढ़ाना है, गुजरात में कंपनी को पॉपुलर करना है तो इस शब्द को अपने नाम से जोड़ना सही होगा। इसके बाद उनके परिवार के सभी सदस्य मारीवाला सरनेम लगाने लगे।

बॉम्बे ऑयल इंडस्ट्री शुरू की

समय के साथ कंपनी और परिवार दोनों का विस्तार होता गया। 1948 में, हर्ष मारीवाला के पिता चरणदास और उनके तीन भाइयों ने बॉम्बे ऑयल इंडस्ट्रीज लिमिटेड की स्थापना की। कंपनी ने अगले 25 साल में मुंबई में तीन प्लांट्स शुरू किए। यहां मुख्य तौर पर नारियल का तेल और वेजिटेबल ऑयल बनता था।

बॉम्बे ऑयल इंडस्ट्री ने पैराशूट हेयर ऑयल बनाना शुरू किया, जो उस समय मार्केट में हिट रहा। 1975 आते-आते चरणदास ने सफोला रिफाइंड तेल जैसे कंपनी के उत्पादों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।

अलग रास्ता चुनना चाहते थे हर्ष

मिडिल क्लास में पैदा हुए हर्ष मारीवाला का करियर फैमिली बिजनेस में ठीक-ठाक चल रहा था। इसके बावजूद उनके अंदर कुछ अलग करने की छटपटाहट थी। वह चाहते थे कि कोई ऐसा बिजनेस शुरू किया जाए, जो फैमिली बिजनेस से अलग हो। इस वजह से वह अपना रास्ता खुद बनाने के लिए निकल पड़े।

13 अक्टूबर 1988 को हर्ष मारीवाला ने मैरिको फूड्स लिमिटेड नाम से कंपनी की शुरुआत की। 31 अक्टूबर को कंपनी का नाम बदलकर मैरिको इंडस्ट्रीज लिमिटेड कर दिया गया।


ब्रांडेड नारियल तेल में उनके शुरुआती उद्यम को पहले से स्थापित कंपनियों से कड़ी टक्कर मिली, लेकिन हर्ष मारीवाला ने हार नहीं मानी।

मैरिको की मार्केटिंग स्ट्रैटजी काम कर गई

2 अप्रैल 1990 को बॉम्बे ऑयल लिमिटेड ने अखबार में एक विज्ञापन छपवाया। इसमें लिखा था- बॉम्बे ऑयल कंपनी ने 200 कर्मचारियों को निकाला। इस विज्ञापन को मास्टरस्ट्रोक की तरह देखा गया। दरअसल, कंपनी ने अपने 200 कर्मचारियों को बॉम्बे ऑयल से निकालकर मैरिको कंपनी में नौकरी दी थी।

इस विज्ञापन की वजह से बहुत से लोगों का ध्यान ‘मैरिको’ नाम पर पड़ा। दूसरा लोगों के बीच यह कॉन्सेप्ट क्लियर हो गया कि बॉम्बे ऑयल लिमिटेड के लोगों ने ही मैरिको कंपनी शुरू की है। इसके साथ मैरिको ने पैराशूट और सफोला जैसे प्रोडक्टस को बॉम्बे ऑयल इंडस्ट्रीज लिमिटेड से अलग कर खुद में शामिल कर लिया।


कंपनी ने इसके साथ दो ऐड और लॉन्च किए। एक में पैराशूट ऑयल को कोकोनट ऑयल का पर्याय बताया गया। दूसरे ऐड में सफोला के बदले दूसरे तेल को कोलेस्ट्रॉल की वजह से हो रही मौत का कारण बताया गया।

प्लास्टिक के डिब्बे में तेल बेचना शुरू किया

वल्लभ दास के पोते हर्ष मारीवाला ने जब बिजनेस में कदम रखा तब नारियल तेल टिन के डिब्बे में बिकता था। हर्ष को यह देखकर महसूस हुआ कि अगर नारियल का तेल प्लास्टिक के डिब्बे में बेचा जाएगा तो इससे कंपनी और कस्टमर दोनों को फायदा होगा। दरअसल प्लास्टिक टिन से सस्ता था और इसे घर पर रखना भी अधिक सुविधाजनक था। हालांकि इस काम में कंपनी को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ी।

कंपनी ने नारियल तेल बनाने वाली कंपनियों पर रिसर्च शुरू किया। उन्हें पता चला कि 10 साल पहले भी एक कंपनी नारियल तेल को प्लास्टिक के डिब्बे में लेकर आई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो पाई। दरअसल प्लास्टिक के डिब्बे को चूहे कुतर जाते थे, इस वजह से उन्हें नुकसान हो रहा था।

यह सारी बातें मैरिको कंपनी ने याद रखीं। उन्होंने पैराशूट नारियल तेल का प्लास्टिक का डिब्बा गोल आकार का कर दिया। आकार बदलने की वजह से चूहे कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाए। इस तरह की तरकीब से पैकेजिंग का खर्च आधा हो गया। बचाए गए पैसों को कंपनी ने विज्ञापन में लगाया।


पैराशूट को टिन के डिब्बे से प्लास्टिक के डिब्बे में शिफ्ट होने में लगभग 10 साल लग गए। इस दौरान कंपनी ने कई तरह के एक्सपेरिमेंट जारी रखे।

पैराशूट नाम के पीछे की कहानी

पैराशूट के नाम के पीछे की कहानी दूसरे वर्ल्ड वॉर से जुड़ी हुई है। हर्ष मारीवाला ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सेना के जवानों ने पैराशूट का इस्तेमाल किया था। भारतीयों ने पहली बार बड़े स्तर पर पैराशूट देखे थे। उन्हें एहसास हुआ कि यह सुरक्षा और विश्वसनीयता की चीज है। यहीं से कंपनी ने ‘पैराशूट’ को ब्रांड नाम बनाने का फैसला किया।

मारीवाला ने उस इंटरव्यू में यह भी कहा था कि मेरे अंकल और बहुत सारे दोस्तों ने कहा था कि ब्रांड का नाम बदल दो, लेकिन पता नहीं क्यों मैंने ब्रांड का नाम जारी रखने का फैसला किया और मुझे लगता है कि निर्णय सही था।


मैरिको और हिंदुस्तान यूनिलीवर की टक्कर

90 के दशक तक मैरिको ने बाजार में अपनी पकड़ बना ली थी। इसी समय हिंदुस्तान यूनिलीवर नाम की कंपनी भी अपना विस्तार कर रही थी। एचयूएल ने टाटा के प्रोडक्ट निहार को खरीदकर नारियल तेल बाजार में एंट्री की। इसके बाद कंपनी की नजर पैराशूट पर थी। एचयूएल के तत्कालीन चेयरमैन केकी दादिसेठ ने पैराशूट खरीदने के लिए हर्ष से संपर्क किया।

एक शाम हर्ष को टेलीफोन आया। सामने से आवाज आई 'मैं केकी दादिसेठ बोल रहा हूं।' केकी ने पैराशूट ऑयल खरीदने का प्रस्ताव रखा।

जवाब में हर्ष ने कहा 'आप जानते हैं कि हम नारियल तेल बाजार में हैं। हम इसके बारे में बहुत गंभीर है। इसलिए हम आपको अपनी कंपनी बेचने का अवसर देते हैं।'

केकी ने जवाब दिया 'मैरिको इतिहास बन जाएगा'

इसके बाद मैरिको ने अपनी मार्केटिंग और तेज कर दी। पैराशूट का मार्केट शेयर बढ़ता गया। नतीजा यह हुआ कि एचयूअल ने 2006 में 'निहार कोकोनट ऑयल' मैरिको को बेच दिया। इस तरह मैरिको ने इस बैटल को जीत लिया।

आज मैरिको 25 से भी ज्यादा देशों में उपलब्ध है। कंपनी का दावा है कि हर तीन में से एक व्यक्ति ने कभी न कभी मैरिको का प्रोडक्ट जरूर इस्तेमाल किया है। कंपनी का 25% रेवेन्यू विदेशों से आता है। आज भारत में इस कंपनी की 7 से ज्यादा फैक्ट्रीज हैं।

VAISHYA MAHAN - वैश्य महान (लाला जी की दुकान)

#VAISHYA MAHAN - वैश्य महान (लाला जी की दूकान) 

 हमारा वैश्य समाज, जी हां हमारा वैश्य समाज, जो कि देश और धर्म के लिए निस्वार्थ सेवा में लगा रहता हैं. लाला जी की दूकान गाँव, कसबे या नगर में एक ऐसा स्थान होता हैं जंहा से आप सामान आदि खरीदते हो लेकिन   इस के अलावा उस दूकान से देश, धर्म, नगर आदि में क्या चल रहा हैं और अड़ोसियो  पड़ोसियों के दुःख दर्द के बारे में पता चल जाता हैं. लाला जी की दूकान लोकल का न्यूज़ चेंनेल होता हैं. 

देश और धर्म और दान करने के लिए लाला जी सबसे आगे रहते हैं. जिसे भी धार्मिक या फिर सामाजिक कार्य के लिए चन्दा लेना होता हैं लाला जी हर समय सज्ज रहते हैं. अंग्रेजो के समय में कोई भी क्रांतिकारी, कांग्रेसी, संघी कोई भी होता था वह सबसे पहले लालाजी के यंहा आता था. लाला जी उसके रहने खाने और सुरक्षा का प्रबंध  रखते थे. और यथोचित धन धान्य से भी संहायता करते थे. कोई भी क्रांतिकारी आता था तो लाला जी उसके छुपने का प्रबंध करते थे. अंग्रेजो से बचाकर रखते थे और अंग्रेजो को बरगला कर रखते थे. उसी समय वैश्य समाज ने समाज को उद्वेलित करने के लिए समाचार पत्रों का प्रकाशन आरम्भ  किया. धर्म की अलख जगाने के लिए गीता प्रेस जैसी संस्थाओं की स्थापना की. 

आज़ादी के बाद यही काम लालाजी RSS के स्वयंसेवको के लिए करते थे. अपनी दूकान के ऊपर संघ का कार्यालय स्थापित करते थे. उसका कोई भी किराया आदि नहीं लेते थे. कोई भी संघ का कार्यावाह आता था तो उसके रहने खाने की व्यवस्था लाला जी ही करते थे. स्वयं प्रातः ही संघ की शाखाए लगाते थे. और लोगो को संघ से जोड़ते थे. ये लोग कभी कोई पद भी नहीं लेते थे नाही अपने परिवार के लोगो को पद लेने देते थे. ऐसा ही निस्वार्थ सेवा वैश्य सेठ लोगो की होती थी. चाहे  गौरक्षा आन्दोलन हो, चाहे रामजन्म भूमि आन्दोलन हो ऐसे ही लोगो ने दिन रात मेहनत और प्रचार  करके लोगो को जोड़ा. और आन्दोलन को आगे बढाया.  आज भाजपा जो भी हैं ऐसे ही व्यक्तियों के त्याग और बलिदान से हैं. 

वैश्य समाज हमेशा से ही दान धर्म और शिक्षा के लिए अलख जगाये हुए हैं. गाँव गाँव नगर नगर  इन लोगो ने  शिक्षण  संस्थान बनाए. धर्मशालाए बनवाई, मंदिर बनवाये और इनका जीर्णोउद्धार  किया. पुरे देश  में हर गाँव कसबे नगर तीर्थ स्थानों में वैश्य समाज की बनाए धर्मशालाए, प्याऊ, तालाब, बावड़ी, मंदिर, स्कूल, कालेज मिल जायेगे. 

हमें गर्व हैं ऐसे समाज पर जिसने हमेशा निस्वार्थ भाव से  देश की सवा तन मन धन से की हैं. जय वैश्य, वन्देमातरम, जय श्री  राम 


Monday, May 13, 2024

तेली वैश्य जाति के प्रमुख स्थल

तेली विषय जाति के प्रमुख स्थल--

1.काठमांडू में चेम्बर्स आफ कामर्स,
2.नालंदा में प्रवेश द्बार,
3.झांसी में कर्मा माता की जन्म भूमि,
4.मथुरा में रंगनाथ मंदिर,
5.राजस्थान में दानवीर भामाशाह की कर्मभूमि,
6.परना में तेलियां भंडार,
7.गोरखपुर में गोरखनाथ की मंदिर,
8.गवालियर में प्राचीन तेली मंदिर
9.कल्याण में संता जी का मंदिर,
10.कनन्ड में ताई तेलिन की मंदिर,
11.मदुराई में सती कण्णगी की मंदिर,
12.राजिम मे माता राजिम का भक्ति क्षेत्र,
13.केशकाल में सती तेलिन घाटी मंदिर,
14.पुरी में माता जी का कर्मभूमि।
15. बिहार के तेल्हारा में "तेल्हारा विश्वविद्यालय" वहां के तेली व्यापारियों ने बनवाया था

इस तरह तेली समाज के इतिहास के बारे में अच्छी जानकारी के साथ धार्मिक ज्ञान की अनोखी बातें लिखी जाती है।इन सभी बातों को सभी लोग शेयर अवश्य करे ताकि तेली समाज के इतिहास को अधिक से अधिक लोगों को जानकारी हो।

Sunday, May 12, 2024

HIMANGSHU VAISH - IIT GOLDMEDALIST

HIMANGSHU VAISH - IIT GOLDMEDALIST

IIT के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट की कहानी, पढ़ाई के बाद नहीं की नौकरी, जुनून में कर दिया ये काम नहीं चुनी.


ये कहानी है आईआईटी दिल्ली (Indian Institute Of Technology Delhi, IIT Delhi) से पढ़ाई करने वाले हिमांग्शु वैश (Himangshu Vaish) की. उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आईआईटी में भी हिमांग्‍शु गोल्ड मेडलिस्ट रहे. हिमांग्शु ने आईआईटी दिल्‍ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से बीटेक किया. आम स्‍टूडेंट की तरह हिमांग्शु पर भी नौकरी करने का दबाव था. उनके परिवार में उनके पिताजी सरकारी नौकरी में थे. वह भी पेशे से इंजीनियर थे. हिमांग्शु के दादाजी डॉक्‍टर थे. ऐसे में परिवार भी चाहता था कि हिमांग्‍शु भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी करें, लेकिन हिमांग्‍शु थे कि उनको नौकरी की बजाय कुछ अपना करने का मन था.

खोला डाटा प्रोसेसिंग सेंटर

वर्ष 1976 का वह दौर था जब हिमांग्‍शु ने आईआईटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद लाखों के पैकेज की नौकरी की परवाह छोड़कर अपना काम शुरू किया. आईआईटी करने के बाद कई नौकरियों के ऑफर को छोड़ना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन हिमांग्शु चाहते थे कि उन्‍हें नौकरी लेने वाला नहीं, नौकरी देने वाला बनना है. इसी जज्बे ने हिमांग्शु को हौसला दिया. हिमांग्शु ने इंटरनेशनल डाटा प्रोसेसिंग सेंटर खोला, हालांकि यह तो बस एक शुरुआत थी, क्योंकि हिमांग्शु की अनोखी सोच कुछ इससे भी बड़ा करने वाली थी.

दूसरी कंपनी शुरू की

हिमांग्शु अक्सर बिजली की कमी से होने वाली समस्याओं से परेशान रहते थे, क्योंकि उस समय बिजली की अच्छी सुविधाएं नहीं थीं. हिमांग्‍शु कहते हैं कि बार-बार बिजली कटौती के कारण अक्‍सर काम प्रभावित होता था. ऐसे में वह इन्‍वर्टर के बिजनेस में उतरे. हिमांगशु ने 1986 में इंस्टापॉवर के नाम से कंपनी बनाई. इस कंपनी ने छोटे कंप्यूटर, ऑफिस और घरों में इस्तेमाल के लिए इनवर्टर और अनइंटरप्टिबल पावर सप्लाई सिस्टम (यूपीएस) के क्षेत्र में काम शुरू किया, जिसमें उन्‍हें काफी सफलता मिली. बाद में उन्‍होंने लाइटिंग प्रॉडक्ट्स सीएफएल बल्ब और लाइट्स भी मार्केट में लॉन्‍च किए. हिमांग्‍शु के साथ उनके बेटे अभिजीत और सत्‍यजीत भी बिजनेस में जुट गए. अभिजीत ने अमेरिका की पर्डयू यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया है, वहीं दूसरा बेटा सत्यजीत बिजनेस मैनेजमेंट में ग्रेजुएट है.

रोशनी के बिजनेस में छा गए

हिमांगशु की कंपनी के पास 70 पेटेंट्स हैं. उनकी एलईडी लाइटें केवल रोशनी ही नहीं बिखेरती, बल्कि लोगों की जरूरत, मूड और माहौल के अनुसार रंग बदलती हैं. हिमांग्‍शु कहते हैं कि उन्‍होंने एलईडी लाइटों ने सिग्नेचर ब्रिज और सूर्य मंदिर को तक रोशन किया. इसके अलावा अयोध्‍या एयरपोर्ट पर भी उनके कंपनी की एलईडी लाइटें ही रंग बिरंगी रोशनी बिखेर रही हैं.

क्‍यों नहीं की नौकरी

हिमांग्‍शु करियर को लेकर कहते हैं कि इंसान की जिस चीज में रूचि हो, वही करना चाहिए. दबाव में आकर आपको करियर के फैसले नहीं लेने चाहिए. सभी पढ़ने लिखने वाले बच्‍चों को उनकी सलाह है कि करियर का मतलब पढ़ लिखकर सिर्फ नौकरी करना नहीं होता है, बल्कि आप कुछ अपना करके दूसरों को नौकरी भी दे सकते हैं. हिमांग्‍शु बताते हैं कि पढ़ाई के बाद उन्‍होंने कुछ नया करने की कोशिश की जिससे बहुतों का जीवन रोशन हो रहा है. उनकी कंपनी के प्रॉडक्ट्स को ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अलावा अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और दक्षिण अमेरिका के 30 से अधिक देशों में निर्यात किए जा रहे हैं, जिससे भारत का नाम भी रौशन हो रहा है.

Tuesday, May 7, 2024

PANSARI VAISHYA - पंसारी वैश्य

#PANSARI VAISHYA

प्राचीनकाल से ही भारत की दुनियाभर में शोहरत मसालों की वजह से रही। मिस्र,अरब, ग्रीस और रोमन साम्राज्यों में भारतीय मसालों की धूम थी। मूलतः वृहत्तर भारत में जो जड़ीबूटियां और वनौषधियां है


उन सबको विदेशी लोग मसालों में ही गिनते थे। इन्ही की वजह से पश्चिमी दुनिया के साथ भारत का व्यापार व्यवसाय खूब फलाफूला था। आज के पंसारी और मुंबई महानगरी के पनवेल उपनगर के नामकरण के पीछे ये तमाम कारण है। जानते हैं कैसे।

प्राचीनकाल में व्यापार व्यवसाय के लिए पण् शब्द का चलन था। पण् का मतलब था। लेन-देन, क्रय-विक्रय, मोल लेना, सौदा करना, आदि । शर्त लगाना जैसे भाव भी इसमें शामिल थे। इसी से बना एक अन्य शब्द पणः जिसका मतलब हुआ पांसों दांव लगाकर या शर्त लगाकर जुआ खेलना। चूंकि व्यापार व्यवसाय में शर्त, संविदा अथवा वादा बहुत आम बात है इसलिए इस शब्द में ये तमाम अर्थ भी शामिल हो गए। पण् से ही पणः नाम की एक मुद्रा भी चली जो अस्सी कौड़ियों के मूल्य का सिक्का था। इसी वजह से धनदौलत या संपत्ति के अर्थ में भी यह शब्द चल पड़ा। मकान, मंडी, दुकान या पेठ जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हो गए। पण्य शब्द का एक अर्थ वस्तु, सौदा या शर्त के बदले दी जाने वाली वस्तु भी हुआ। इससे बना पण्य जिसका मतलब हुआ बिकाऊ या बेचने योग्य।
व्यापार व्यवसाय के स्थान के लिए इससे ही बना एक अन्य शब्द पण्यशाला अर्थात् जहां व्यापार किया जाए। जाहिर है यह स्थान दुकान का पर्याय ही हुआ। कालांतर में पण्यशाला बनी पण्यसार। इसका स्वामी कहलाया पण्यसारिन्। हिन्दी में इसका रूप बना पंसारी या पंसार। मूलतः चूंकि प्राचीनकाल से ही इन स्थानों पर , जड़ी-बूटियां आदिबेचे जाते रहे इसलिए पंसारी की दुकान को उस अर्थ में भी लिया जाता था जिस अर्थ में आज कैमिस्ट और ड्रगिस्ट को लिया जाता है।

पंसारी से ही बना पंसारहट्टा अर्थात् जहां ओषधियों मसालों का व्यापार होता है। गौरतलब है कि किसी जमाने में भारत के मुख्य कारोबार से संबंध रखने वाला यह शब्द पंसारी आज गली मुहल्ले के एक छोटे से दुकानदार या परचूनवाले से ज्यादा महत्व नहीं रखता है।

पनवेल - मुंबई के उपनगर पनवेल के पीछे भी यही पण्य छुपा है । पण्य अर्थात् बिक्री योग्य और वेल् का अर्थ हुआ किनारा यानी बेचने योग्य किनारा। जाहिर सी बात है यहां बंदरगाह से मतलब है । पश्चिमीतट के एक कस्बे का किनारा अगर व्यापार के काबिल है तो उसे पण्यवेला नाम दिया जा सकता है । यही घिसते घिसते अब पनवेल हो गया है।

अब बनिया की बात । उत्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणि जैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ । पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है। पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का 'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, और पणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था। पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है । आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है । हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है । वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है । इससे ही बना है “वाणिज्य” और “वणिक” जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है ।


पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा- वणिक > बणिक > बनिअ > बनिया ।

वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि , पणम , फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर को पणिक्कर भी लिखा जाता है।

Monday, May 6, 2024

KANSA BANIK - कंसबानिक वैश्य या कंसारी वैश्य

#KANSA BANIK - कंसबानिक वैश्य या कंसारी वैश्य 

कंसबानिक या कंसारी (Kansabanik or Kansari) जाति का इतिहास, कंसबानिक की उत्पति कैसे हुई?
धातु और पीतल के बर्तन बनाने में कंसबानिको की महारत हासिल थी. घरेलू बर्तनों जैसे पानी के जार प्लेट इत्यादि इन्हीं के द्वारा बनाया जाता था. ये जहाजों के लिए पीतल के उपकरणों को बनाते थे. धीरे-धीरे दूसरे जातियों के लोगों ने भी कंसबानिको का काम सीख कर इस पेशा को अपनाया. कंसबानिको को मुश्किलों का सामना तब करना पड़ा जब बाजार में सस्ते चीनी के मिट्टी और एल्युमीनियम के बर्तन चलन में आने लगा. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनके काम के लिए आवश्यक कच्चा माल मिलना बंद हो गया. मजबूरी में वे गाँवों मे चले गए और जैसे- तैसे अपना गुजारा करते रहे. कुछ कंसारी आभूषण बनाने और कीमती पत्थरों को जड़ने के काम करने लगे हैं कुछ विद्युत मशीनरी और सर्जिकल उपकरणों के हिस्सों का निर्माण शुरू कर दिया है. कंसबानिक या कंसारी (Kansabanik or Kansari) भारत में पाई जाने वाली एक जाति है. यह परंपरागत रूप से ब्रेज़ियर (brazier) और ताम्रकार (coppersmith) के रूप में काम करते हैं. बंगाल में यह ‘नबासख’ (Nabasakh) समूह का हिस्सा हैं, जिसमें कुल 14 जातियां शामिल है.कंसारी घण्टा धातु (Bell metals), पीतल (Brass) और कांसे (bronze) का भी काम करते हैं. बता दें कि घण्टा धातु (Bell metals) एक कठोर मिश्रातु (alloy) है जिससे घण्टे,‌ घंटियाँ और अन्य उपकरण जैसे झांझ (cymbals) आदि का निर्माण किया जाता है. यह बर्तन और कई प्रकार के उपकरण बनाते हैं और अपने उत्पादों को स्थानीय और बाहरी बाजारों में बेचकर जीवन यापन करते हैं. आरक्षण प्रणाली के अंतर्गत पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा कंसबानिकों को अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class, OBC) के रूप में मान्यता दी गई है. आइए जानते हैं कंसबानिक जाति का इतिहास, कंसबानिक की उत्पति कैसे हुई?

कंसबानिक जाति एक परिचय

भारत में यह मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम में पाए जाते हैं. उड़ीसा में यह मुख्य रूप से खोर्धा जिले में पाए जाते हैं. यह हिंदू धर्म का पालन करते हैं. देवी लक्ष्मी और भगवान विश्वकर्मा में इनकी विशेष आस्था है. बता दें कि लक्ष्मी माता इनकी कुलदेवी हैं, जबकि भगवान विश्वकर्मा इनके कुलदेवता हैं. यह बंगाली, उड़िया, असमिया और हिंदी बोलते हैं.

कंसबानिक जाति की उत्पति कैसे हुई?

संभवत: कांसे का काम करने के कारण इनका नाम कंसबानिक या कंसारी पड़ा.पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इनकी उत्पत्ति भगवान विश्वकर्मा के पुत्र से हुई है. हिंदुओं के एक प्रमुख धार्मिक ग्रंथ बृहद्धर्म पुराण (Brihaddharma Purana) में कंसाबनिकों को जाति पदानुक्रम में उच्च मिश्रित जातियों की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है. एक प्रचलित किवदंती के अनुसार, स्वर्ग की एक अप्सरा को श्राप दिया गया था और उसने पृथ्वी लोक पर मानव के रूप में जन्म लिया. निर्माण और सृजन के देवता भगवान विश्वकर्मा ने धरती पर एक ब्राह्मण के रूप में अवतार लिया. फिर उस श्रापित अप्सरा और भगवान विश्वकर्मा का विवाह हुआ, जिससे उनके 9 पुत्र हुए. सभी पुत्र बड़े होकर कुशल कलाकार और दक्ष शिल्पकार बने. उन्हीं पुत्रों में से एक ब्रेज़ियर और ताम्रकार के रूप में काम करने लगा. कंसबानिक उन्हीं के वंशज होने का दावा करते हैं.

TELI VAISHYA COMMUNITY SURNAME - तेली वैश्य समाज उपनाम

#TELI VAISHYA COMMUNITY SURNAME - तेली वैश्य समाज  उपनाम

हमें जगनाडे, गुप्ता, चौधरी, लुटे, साव, ताड़स, साहू, घाटे, दलवी, खोंड, महाले, राऊत, राठौड़, पवार, शेजवाल, उचित, वाघ, अंबिके, भिसे, ढोले, जादाहव जैसे 2064 तेली समाज उपनाम मिलते हैं। तेली समाज उपनाम की पूरी सूची।

A.  

1) आगरकर 2) आगे 3) आसरवा 4) आसरवा 5) अबोले 6) आचरेकर 7) अचिरणेकर 8) आदरकर 9) अडासूल 10) अड़चुले 11) अढ़ाओ 12) अढाव 13) अदिवारेकर 14) अड़किने 15) अदिमाने 16) अड़सुले 17) अगाशे 18) अगाडे 19) अगाले 20) अगरकर 21) अग्रवाल 22) अगाशे 23) अगेशे 24) अगलावे 25) अगवाल 26) अहेर 27) अहिरे 28) अहिरराव 29) अजगांवकर 30) अजमेरा 31) अजमेरे 32) अजमीरे 33) अजविलकर 34 ) अकारे 35) अखारे 36) अकोटकर 37) अकरे 38) अलाने 39) अल्लोली 40) अमाले 41) अमानगी 42) अंबाडेकर 43) अंबाडकर 44) अंबागाडे 45) अंबार्टे 46) अंबात्कर 47) अंबेकर 48) अंबेराकर 49) अंबरकर 50) अंबिके 51) अंबिल्डुके 52) अंबिल्डुके 53) अंबिलकर 54) अंबोरकर 55) अंब्रे 56) अंबुलकर 57) अंबुसे 58) अमिंगद 59) अमले 60) अमृते 61) अमृतकर 62) अनेकर 63) अंगारकर 64) अंजले 65) अंकाईपगार 66) अन्नपूर्णे 67) अनसापुरे 68) अनवणे 69) अरोलकर 70) अरोन्देकर 71) अरोटे 72) अरुल्कर 73) असलमोल 74) असतकर 75) असेवाड 76) अष्टनकर 77) असोले 78) अस्तानकर 79) अताकरे 80) ​​अतकर 81) अतकरे 82) औतकर 83) अवसररे 84 ) अविनाशे 85) अवसारे 86) अवचार 87) अवचट 88) अवले 89) अवते

बी

90) बाभुलकर 91) बाबुलकर 92) बदगी 93) बड़ेकर 94) बादीहवेली 95) बादीहवेली 96) बडवाइक 97) बागडे 98) बागले 99) बागाली 100) बागड़े 101) बागले 102) बागुल 103) बागुलकर 104) बागवे 105) बागवे 106) बहादुरपुरे 107) बहिरमल 108) बाजैत 109) बाकलकर 110) बखाड़े 111) बाकुड़े 112) बलबुधे 113) बालेकरमरकर 114) बालिंगे 115) बलखंडे 116) बालोदिया 117) बालपांडे 118) बलसोरा 119) बनारसे 120) बनैत 121) बनारसे 122) बनारसे 123 ) बाणसुरे 124) बाणछोड़ 125) बाणदरे 126) बांदरकर 127) बांदेकर 128) बांदरे 129) बंडसोडे 130) बांगडे 131) बांगड़कर 132) बांगडे 133) बाणकर 134) बंसोड़ 135) बंसोड़ 136) बापूसाहेब 137) बराई 138) बराकसे 139 ) बारामुखा 140) बरबाइल 141) बरदे 142) बरके 143) बरगाजे 144) बरकासे 145) बरमुख 146) बारसागड़े 147) बरवा 148) बत्रा 149) बत्तासे 150) बत्तीसे 151) बावनकर 152) बाविस्कर 153) बावनकुले 154) बावरे 155) अवस्कर 156) बावणे 157) बावनकर 158) बावनकुडे 159) बावनकुले 160) बावनकुरे 161) बावस्कर 162) बावस्कर 163) बेदाके 164) बेड़ाके 165) बेगमपुरे 166) बेहेरा 167) बेले 168) बेलगांवकर 169) बेलखड़े 170) बेलखेड़े 171) डी 172) बेल्कोनिकर 173 ) बेलोकर 174) बेलूरकर 175) बेंद्रे 176) बेरुलकर 177) भदादमकर 178) भडेकर 179) भडगरे 180) भद्रशेट्टे 181) भद्रे 182) भगत 183) भागवत 184) भगदे 185) भागवत 186) भगवंत 187) भागवत 188) भाहिमल 18 9) भजनकार 190) भजभुजे 191) भाजीपाले 192) भालेराव 193) भालमे 194) भामरे 195) भानारे 196) भंडारे 197) भांडे 198) भांडेकर 199) भांगे 200) भारदाकर 201) भाराडकर 202) भरतकर 203) भारदाम 204) भस्मे 205) भट 206) भटसंगावे 207) भावर 208) भावलकर 209) भेलावे 211) भेलावे 212) भेंडे 213) भेरणे 214) भिलावे 215) भीलपावर 216) भिओगाडे 217) भिराड 218) भिसे 219) भिवगाडे 220) भिवगाडे 22 1) भिवसेन 222) भिवसेन 223 ) भिवगड़े 224) भिवगड़े 225) भोगड़े 226) भोगे 227) भोज 228) भोजने 229) भोजे 230) भोलाणे 231) भोले 232) भोम्बले 233) भोम्बे 234) भोम्बले 235) भोंडले 236) भोंगड़े 237) भोपत 238) भोरे 23 9)भोरसे 240) भोट 241) भोटा 242) भौरे 243) भुजबल 244) भुजड़े 245) भुजबल 246) भुजबले 247) भुजबुले 248) भुजड़े 249) भूरे 250) भुरले 251) भुरसे 252) भुसारी 253) भुसाटे 254) भुसरी 255 ) भूते 256) बिड़कर 257) बिहौत 258) बिजवे 259) बिराजवे 260) बिज्जर्गी 261) बिजुलकर 262) बिजवे 263) बिलोचन 266) बिलोने 267) बिंदवाल 268) बिराडे 269) बिराजदार 270) बिरार 271) बिरारी 272) आरकेलवार 273 ) बिस्ने 274) बोबडे 275) बोबलाडे 276) बोबडे 277) बोडके 278) बोडके 280) बोडके 281) बोडंकर 282) बोडंकर 283) बोडंकर 284) बोडंकर 285) बोधनकर 286) बोडंकर 287) बोडंकर 288) दे 289) बोकडे 290) बोके 291) बोकेफोड 292) बोल्डहेन 293) बोल्के 294) बोंदर 295) बोंडगे 296) बोंद्रे 297) बोरागेव 298) बोराखड़े 299) बोराखेड़े 300) बोराले 301) बोरासे 302) बोरास्ते303) बोरगेव 304) बोरगेव 305) बोरघारे 306) बोरकर 307) बोरखडे 308) बोरपे 309) बोरसे 310) बोटारे 311) बोटे 312) बोतवे 313) ब्रम्हे 314) बुधबावरे 315) बुजाडे 316) बुरांडे 317) बुराने 318) बुरासे 3 19) बर्डे 320) ब्यूरेले 321) बुर्ले 322) बुर्ले 323) बुटेले 324) बुटेले 325) बयाकुडे


सी

326) चंदनाखेड़े 327) चाबुक्स्वर 328) चाफले 329) चाफले 330) चाहजगुने 331) चकधारे 332) चाकोले 333) चाकुले 334) चालक 335) चालख 336) चलेकर 337) चामट 338) चांभरे 339) चंदनखेड़े 340) 341) चंदेवार 342) चांदीवाले 343) चंदसरे 344) चंदवाडकर 345) चन्ने 346) चपड़े 347) चपले 348) चरणकर 349) चारदे 350) चारपे 351) छत्रे 352) चतुर 353) चौधरी 354) चौधरी 355) चौधरी 356) चौधरी (गांगुर्डे) 357) चौधरी ( पवार) 358) चौधरी (बागुल 359) चौधरी (बागुल) 360) चौधरी (भाग्यवंत) 361) चौधरी (बोरासे) 362) चौधरी (करनकल) 363) चौधरी (रावेर) 364) चौधरी (सोनावणे) 365) चौधरी (सोनावणे) 366 ) चौधरी 367) चौधरी 368) चौधरी 369) चौधरी 370) चौधरी 371) चौकड़े 372) चौरे 373) चौथे 374) चव्हाण 375) चावदारी 376) चावके 377) चावरे 378) चेक्कलार 379) चेट्टी 380) चेट्टियार 381) चिचघरे 38 2)चिचकर्ण 383) चिखले 384) चिलबुले 385) चिलेकर 386) चिल्हारे 387) चिलार्ज 388) चिमकर 389) चिंचकर 390) चिंचकर 391) चिंदे 392) चिन्धलोर 393) चिपाडे 394) चितकुलवार 395) चितकुलवार 396) चिट्टे 397) चोपड़े 398) सी होपकर 399) चोथावे 400) चोथे 401) चौधरी 402) चौधरी(ठाकरे) 403) चौधरी 404) चौधरी 405) चौगुले 406) चौहान 407) चौकड़े 408) चौंडे 409) चौरे 410) चौदरापु 411) चुनाडे 412) चूड़ाधारी

डी

413) दाबडे 414) दाबले 415) दाबेकर 416) दाभाड़े 417) दाभोले 418) दाभोली 419) दाभोलकर 420) दाबले 421) डाबरे 422) डाबुरकर 423) दादासाहेब 424) दाधे 425) दफा 426) दफार 427) दफे 428) दहाके 4 29) दहले 430) दहापुते 431) दहितुले 432) दाइगवने 433) दाइतुले 434) दाइव 435) डकारे 436) डक 437) दलवे 438) दलवी 439) दलवे 440) दलवी 441) दमणे 442) दंभे 443) डकारे 444) डंडारे 445) एंडवे 446 ) दांडेकर 447) दांडगे 448) दांधारे 449) डांगट 450) डांकारी 451) दांखड़े 452) दारुणकर 453) दारुणकर 454) दास 455) दासारे 456) दसरे 457) दावले 458) दावारे 459) दावलबाजे 460) दावले 461) दावरे 462 ) डावरे 463) देहाद्रय 464) देहानकर 465) देहरे 466) डेंडाओ 467) डेंडावे 468) देवकर 469) देवलेकर 470) देवराय 471) देवराये 472) देओतले 473) देओलकर 474) डेरे 475) देसी 476) देशमाने 477) देशमुख 4 78) देथे 479) देउलकर 480) देउर्मल्ले 481) देवडे 482) देवकर 483) देवराय 484) देवरगांवकर 485) देवरागांवकर 486) देवड़े 487) देवहरे 488) देवकर 489) देवलेकर 490) देवमाने 491) देवपुजे 492) देवराय 493) देवराय 494) देवतरे 4 95) देवहारे 496 ) देवतारे 497) धाबले 498) धड़ाके 499) धाडवे 500) धागे 501) धाकरे 502) धाकरे 503) ढाकरिया 504) ढाले 505) धमणे 506) धमेले 507) धमणे 508) धनभर 509) धांडे 510) धांगे 511) धनजोड़े 512) धनके 513) धनलोभे 514) धानोकर 515) धनुरकर 516) धारकर 517) धरमशहरे 518) धारकर 519) धर्माचारे 520) धर्मे 521) धारवतकर 522) धारवतका 523) धसकाटे 524) धतूरे 525) धावले 526) धावड़े 527) धावले 528) हेंगले 529) धोबले 530) ढोबले 531) धोदरे 532) धोकड़े 533) ढोले 534) ढोमबले 535) ढोमकर 536) ढोंगड़ी 537) ढोंग 538) धोपटे 539) धोतरे 542) धुपे 543) धुर्वे 544) दिचावलकर 545) इचोलकर 546 ) दिचवलकर 547) दिग्रास्कर 548) दिलिव 549) दिंगनकर 550) दिंगनकर (राउत) 551) दिंगोकर 552) दिपाके 553) दिपाटे 554) दिपाटे 555) दिपके 556) दिवाते 557) दिवाटे 558) दिवाने 559) दिवारे 560) दिवाते 561) दिक्षीवंत 562) डोडामनी 563) डोइबाले 564) डोइजोड 565) डोइफोड 566) डोकाडे 567) डोक्रिमारे 568) डोलसे 569) डोलसे 570) डोमले 571) डोंबले 572) डोमले 573) डोनेकर 574) डोंगरे 575) डोंगरे 576) डोंगरे 5 77) डोरले 578) दुधाबावरे 579) दुधबावरे 580) दुधबाडे 581) दुधबाले 582) दुधे 583) दुहीजोड़ 584) डुकारे 585) डुकरे 586) दुरबुडे 587) दुर्गाडे 588) दुर्गुडे 589) दुतोंडे 590) दुटूंडे

इ

591) एकसिंगे 592) एकखंडे 593) एकार 594) एकसिंगे 595) एंडोले

एफ

596) फ़ॉले 597) फ़ॉले 598) फ़ैनडैट 599) फ़ैंडे 600) फ़ैनसे 601) फ़ैटक्कर 602) फ़ेट 603) फ़ैटिंग 604) फ़ुलकर 605) फ़ुलमोगारे 606) फ़ुलज़ेले 607) फ़ंडे 608) फ़ुटेक

जी

609) गभाणे 610) गडखे 611) गडखे 612) गडबेल 613) गडकर 614) गडगे 615) गडगिल 616) गडगीले 617) गडहवाले 618) गदिगोन 619) गडखे 620) गडवले 621) गडहने 622) गडढी 623) गडहले 624) इकवाब 625) गायकवाड 626) गजरे 627) गजमल 628) गजमोल 629) गजरे 630) गेल 631) गलवाडे 632) गेम 633) गंडाते 634) गंधाले 635) गंधारे 636) गांधी 637) गंडला 638) गंगबोइर 639) गांगुर्डे 640) गनीगा 641) गांजरे 642 ) गनजूड 643) गनोर 644) गरी 645) गरीब 646) गरिबे (करपे) 647) गरुड़ 648) गेस 649) गेटडे 650) गौरर 651) गावली 652 658) गावत्रे 659) गावले 660) गावहरे 661) गायकवाड 662) गायदाहने 663) गायधाने 664) गायगावे 665) गीते 666) गेहलोत 667) घांची 668) गांधी 669) घरपांडे 670) घाटगे 671) घटककर 672) घटकारा 6 73) घाटे 674) घाटकर 675) घाटोड 676) घाटोड 677) घाटोले 678) घवघावे 679) घवाडे 680) घघारे 681) घेंघारे 682) घिनमीमे 683) घिनमाइन 684) घिव 685) घोडाके 686) घोडे 687) घोडेकर 688) घोढके 689) घोडके 6 90)घोड़खंडे 691 ) घोड़मारे 692) घोंगरे 693) घोंगटे 694) घोंगड़े 695) घोंगे 696) घोरपड़े 697) घोसले 698) घुघुस्कर 699) घुले 700) घुमड़े 701) घुमरे 702) घुमड़े 703) घुसे 704) घुसे 705) घुटे 70 6) गिदे 707) गिधे 708) गिलोरकर 709) गिलोरकर 710) गिरडकर 711) गिरम 712) गिरदे 713) गिरदकर 714) गिरहेपुजे 715) गिरहेपुंजे 716) गिरिपुंजे 717) गिरके 718) गिरमे 719) गिरनाले 720) गिरोलकर 721) गिरपुंजे 722) गिरुलकर 723) गोबडे 724) गोबरे 725) गोचिडे 726) गोडे 727) गोधनकर 728) गोल्हानी 729) गोल्हर 730) गोलवस्कर 731) गोमसे 732) गोमशे 733) गोंगटे 734) गोराई 735) गोरखनाथ 736) गोरे 737) गोठाणे 738) गोटमारे 739) गौरकर 74 0)गुबाडे 741 ) गुड़ी 742) गुडले 743) गुजरकर 744) गुलाने 745) गुलानिया 746) गुलहाने 747) गुल्हाण 748) गुल्हाने 749) गुलवाड़े 750) गुंजलकर 751) गुंजकर 752) गुप्त 753) गुप्ता 754) गुरमुले 755) गुरुलिंग 756) गुटुशंता

एच

757) हैडके 758) हडके 759) हजरे 760) हैमने 761) हंड 762) हनवेट 763) हरचिरकर 764) हरगोड 765) हरिसा 766) हरकुलकर 767) हर्नाल 769) हर्ना 770) हंटार 770) हैटवार 770) हैटार 770 हिंडलेकाड 774) हिंडलेकर 775) हिंडोले 776) हिंगनघाटे 777) हिंगणकर 778) हिंगसपुरे 779) हिंज 780) हिराटकर 781) हायर 782) हिरुदकर 783) हिवरेकर 784) हिवरेकर 785) हिवरे 786) हिवासे 787) होगले 78 8) होंडाड 789) होनकलसे 790 ) हुलावाले 791) हल्के 792) हल्के 793) हमरास्कर

मैं

794) इचे 795) इखंकर 796) इखर 797) इंदीवार 798) इंदौरा 799) इंगले 800) इंगवाले 801) इंगवाले 802) इंगले 803) इप्टे 804) इरुटकर 805) इसोकर 806) इटानकर

जे

807) जाधव 808) जादम 809) जाधव 810) जाधव 811) जगनाडे 812) जगताप 813) जगताप (धवले) 814) जयपुरकर 815) जैस 816) जैश 817) जयसिंगपुरे 818) जैसवाल 819) जैतपकर 820) जांभे 821) जांभुलकर 8 22) जामखंडी 823) जामोद 824) जामसंदेकर 825) जामुनिये 826) जांगड़े 827) जसुतकर 828) जाटल 829) जठर 830) जठर 831) जौंजलकर 832) जावलकर 833) जावरे 834) जावलकर 835) जावरे 836) जयश्री 837) जयसिंगकर 8 38) जयसिंगपुरे 839 ) जिभकाटे 840) जिभकाटे 841) जिंतुरकर 842) जिरापुरे 843) जितपुरे 844) जोगे 845) जोगिन्द्र 846) जुडे 847) जुमदे 848) जुमदे 849) जुमले 850) जुनानकर 851) जुनघारे 852) जुनिवाल 853) जुपल्ली 854) बर्तन

क

855) कचौरे 856) कचौरे 857) कचौरे 858) कचोले 859) कचौरे 860) कचौरे 861) कदम 862) कदमधड़ 863) कदमलबे 864) कड़ासने 865) कड़ाव 866) कढ़ाणे 867) कागले 868) काहने 869) कैकाड़े 870) कैटाडे 871) काजले 872) काकड़े 873) काकड़े 874) कलांबे 875) कलांबे 876) कलमधाड 877) कलाशेट्टी 878) कलास्कर 879) कालबंदे 880) काले 881) कल्हाणे 882) कल्सेट्टी 883) कल्ने 884) कलोदे 885) कलशेट्टी 886) कलशेट्टी 88 7) कल्याणकर 888 ) कमलाकर 889) कांबले 890) कांबले 891) कामदे 892) कामडी 893) कामटेकर 894) कनाडे 895) कांदलगांवकर 896) कांदलकर 897) कनकत्रे 898) कनोजे 899) कपाड़िया 900) कपाले 901) कापसे 902) कापड़े 903) कपिले 904 ) कपल 905) कापसे 906) कराडिले 907) करंबे 908) करमोरे 909) करांडे 910) करंजेकर 911) करंजकर 912) करनकल 913) करंकर 914) करस्कर 915) करतकरा 916) करतकर 917) करावंडे 918) कर्डिला 919) कर्डिले 920) करमोरे 921) करिमुंगी 922) करकड़े 923) कार्लेकर 924) करमोरे 925) कर्णकल 926) करपे 927) करुलमार 928) कारवंडे 929) कारवंडे 930) करवटकर 931) कसाब 932) कसाबे 933) कसाबी 934) कसबे 935) कसबेकर 936) 937) कस्तुर 938 ) कटके 939) कटेकर 940) कटेखाये 941) कठाने 942) कठोके 943) कटके 944) कटकर 945) कटके 946) कटोले 947) कटोरे 948) कटरे 951) कौंडन्यापुरे 952) कवड़कर 953) कवड़े 954) डे 955) कवाडकर 956) कवले 957) कवलकर 958) कवारे 959) क्यारकर 960) केदार 961) केदारे 962) केदारी 963) केकड़े 964) केकापुरे 965) केसलकर 966) केवटे 967) खबूले 968) खबुतरे 969) खडके 970) डी 971) खडके 972) खडकेर 973) खैरे 974) खैरनार 975) खलादे 976) खलाडकर 977) खलदे 978) खलदकर 979) खंडाडे 980) खंडागले 982) खंडागले 983) खंडाईत 984) खंडालकर 985) खंडापुरे 986) खांजे 987) खानके 988 ) खांकुरे 989) खांटे 990) खानविलकर 991) खापरे 992) खरात 993) खराटे 994) खरे 995) खड़गे 996) खड़शिकर 997) खरवाड़े 998) खवने 999) खवेकर 1000) खवने 1001) खेडकर 1002) खडसकर 1003) खे डेकर 1004) खेडगी 1005) खेडकर 1006) खेलकर 1007) खेतड़ी 1008) खेवलकर 1009) खेवालकर 1010) खिलारे 1011) खिरसागर 1012) खोबे 1013) खोबरागड़े 1014) खोडनकर 1015) खोड़े 1016) खोड़के 1017) खोजे 1018) खो दूसरा 1019) खोपले 1020) खोरगाडे 1021) खोत 1022) खुबलकर 1023) खुले 1024) खुमसे 1025) खुने 1026) खुर्द 1027) खुरसांडे 1029) किम्मतकर 1030) किन्हीकर 1031) किंजवाडेकर 1032) किंकर 1033) किरापाणे 1034) किरावे 1035) मुझे 1036) किरपान 1037) किरवे 1038 ) कोचरेकर 1039) कोचे 1040) कोहले 1041) कोकाले 1042) कोकर 1043) कोकाटे 1044) कोखाने 1045) कोलाखारे 1046) कोल्हे 1047) कोलटे 1048) कोल्टे 1049) कोंगे 1050) कोराडे 1051) कोराट 1052) दे 1053) कोरे 1054) कोरी 1055) कोरटी 1056) कोसुरकर 1057) कोटामकर 1058) कोटावाडेकर 1059) कोटे 1060) कोठाडेकर 1061) कोठारे 1062) कोठेकर1063) कोटुलकर 1064) कोतुलकर 1065) क्रंकल 1066) कृपाल 1067) क्षीरसागर 1068) क्षीरसागर 1069) क्षीरसागर 1070) कुबड़े 1071) कुबड़े 1072) कुच्चनवार 1073) कुगने 1074) कुकड़े 1075) कुकड़ कर 1076) कुकड़े 1077) कुकुनुरी 1078) कुलरकर 1079) कुल्लरकर 1080) कुलुरकर 1081) कुलवाडे 1082) कुमार 1083) कुम्भलकर 1084) कुमठेकर 1085) कुमुस्गी 1086) कुन्घाडकर 1087) कुन्घटकर 1088) कुंजरकर 1089) कुन्जेकर 1090) कुराल्कर 1091) कुरांजेकर 1092) कुर्हाडकर 10 93) कुरहे 1094) कुरहेकर 1095) कुरजेकर 1096 ) कुर्ले 1097) कुर्लिए 1098) कुर्रेकर 1099) कुरुले 1100) कुरुपकर 1101) कुर्वाडे 1102) कुर्जेकर 1103) कुवेस्कर 1104) कुवरदाद्र

एल

1105) लाचुरिये 1106) लाड 1107) लाडेकर 1108) लागाड 1109) लागाडे 1110) लाहरपुरे 1111) लाहिवाल 1112) लाहौर 1113) लाजुरकर 1114) लाकाडे 1115) लाडेकर 1116) लाकाडे 1117) लाखापते 1118) लाखे 111 9) लक्षतवार 1120) लम्बाट 1121) लैमटुरे 1122) लांडे 1123) लैंडगे 1124) लांजेकर 1125) लांजेकरा 1126) लांजेवार 1127) लांके 1128) लेसे 1129) लासिंकर 1130) लतारे 1131) लेट 1132) लांजे 1133) लेंडे 1134) लेंधे 1135) चाडे 1136) लिडबे 1137) लिम्भारे 1138 ) लोड 1139) लोहाबरे 1140) लोहाकरे 1141) लोहबरे 1142) लोखंडे 1143) लोखंडे 1144) लोमटे 1145) लोंढे 1146) लोनी 1147) लोनकर 1148) लोर 1149) लोरकर 1150) लुटे

एम

1151) माबथलकर 1152) माचले 1153) मदनकर 1154) मदनकर 1155) माडेकर 1156) मगर 1157) महादिक 1158) महादिका 1159) महाजन 1160) महाकाल 1161) महाकाले 1162) महाकालकर 1163) महाकुलकर 1164) महाले 1165) महापुरे 1166) महिन्द्रे 1167) महितोले 1168) माहोर 1169) माहोरे 1170) महतो 1171) महत्रे 1172) माहुलकर 1173) माहुरे 1174) माकडे 1175) माकडे 1176) मखमाले 1177) मकोड़े 1178) मकुडे 1179) मलागे 1180) मालंगवे 1181) मालेवार 1182) मालगे 1183) मलकापुरे 1184 ) मालकर 1185) मालोद 1186) मालवे 1187) मालवार 1188) मालवे 1189) मनापुरे 1190) मांचेकर 1191) मंडल 1192) मांडवड़े 1193) मांडवले 1194) मांडवे 1195) माने 1196) मांगटे 1197) मांगलेकर 1198) मांगरुले 1 199) मंगरूलकर 1200) माणिकराव 1201) मांजलवार 1202) मांजरेकर 1203) मांजरेकर 1204) मानकर 1205) मनसुते 1206) मंतलकर 1207) मंथलकर 1208) मनवाडे 1209) मराठे (वेंगुरलेकर) 1210) मार्गडे 1211) मार्गडे 1212) मार्गडे 1213) मारोटकर 1214) मार्तण्डे 1215) मस्के 1216) मास्के 1217) मसूरे 1218) मसूरकर 1219) मथकर 1220) मथुरे 1221) मथूरकर 1222) मथकर 1223) मवले 1224) मयेकर 1225) मेढेकर 1226) मेडकर 1227) मेघारे 1228) मेहर 1229) मेहर 1230) मेहरकर 12 31) मेहरक्र 1232) मेहरकुरे 1233 ) मेहसारे 1234) मेहसाटे 1235) मेहत्तर 1236) मेहेर 1237) मेहेरा 1238) मेहेसारे 1239) मेहेत्रे 1241) मेंडुले 1242) मेंगाले 1243) मेंघारे 1244) मेरुकर 1245) मेरुकारा 1246) मेहेरे 1247 ) म्हालकर 1248) म्हस्के 1249) म्हात्रे 1250) म्हेसारे 1251) म्हेत्रे 1252) मिरकाले 1253) मिसाल 1254) मिसुरकर 1255) मितकर 1256) मोदी 1257) मोगारे 1258) मोगरेकर 1259) मोघे 1260) मोगरे 1261) मोहकारे 1262) मोहाले 1263) मोहरकर 1 264) मोहिते 1265) मोहोद 1266) मोहोकर 1267) मोहोपादकर 1268) मोहोरकर 1269) मोहपाडकर 1270) मोकादम 1271) मोनफकर 1272) मोरे 1273) मोर्गनकर 1274) मोर्गनकर 1275) मोर्गाडे 1276) मोरवास्कर 1277) मोसामके 1278) मोटाघरे 1279) मोटेर्ज कर 1280) मोटघरे 1281) मोथारकर 1282) मोज़ारे 1283 ) मुडे 1284) मुगलिकर 1285) मुलवकर 1286) मुलदेकर 1287) मुले 1288) मुलिक 1289) मुंडेले 1290) मुंडेले 1291) मुंदवेक 1292) मुर्तेली 1293) म्यूट

एन

1294) नाचने 1295) नाचनकर 1296) नाडवाडेकर 1297) नाडकर 1298) नागले 1299) नागमाला 1300) नागमले 1301) नागारे 1302) नागरमोते 1303) नागभिड़कर 1304) नागिन 1305) नागले 1306) नागमल 1307) नागनाथराव 1308) नागोसे 1309) नागोशे 1310) नागपुरे 1311) नागशेट्टी 1312) नागुलकर 1313) नागवासे 1314) नागजरकर 1315) नायडू 1316) नाइक 1317) नाइक (नेरकर) 1318) नैनाव 1319) नैतम 1320) नकाडे 1321) नखाटे 1322) नालस्कर 1323) नालस्कर 1324) नालत 1325) नालेगांवकर 1326 ) नलिन्दे 1327) नालसे 1328) नानापुरे 1329) नंदलास्कर 1330) नंदलास्कर 1331) नंदलास्कर 1332) नंदुरकर 1334) नन्नजकर 1335) नारद 1336) नराले 1337) नरखेडकर 1338) नरतम 1339) नरवईये 1340) नसरे 1341) नसरे 1342) नाटेकर 1343) नथिले 1344) नटकर 1345) नौकरकर 1346) नवगिरे 1347) नवपुते 1348) नवथले 1349) नवगिरे 1350) नवखरे 1351) नवथले 1352) नवाखरे 1353) नवकरकर 1354) नवाखरे 1355) नवाथले 135 6) नायक 1357) नयासे 1358) नये 1359) नायसे 1360) नेराले 1361) नेरकर 1362) नेरकेर 1363) नेवेगे 1364) नेवारेकर 1365) निगाडे 1366) निगाडकर 1367) निगाडे 1368) निकम 1369) निखाडे 1370) निखाते 1371) निकुले 1372) निकुरे 1373 ) नील 1374) निम्बेकर 1375) निमेष 1376 ) निमकर 1377) निरखेड़े 1378) निर्मले 1379) निर्वाण 1380) निवाणे 1381) नौकरकर 1382) नुक्काने

हे

1383) ओटुरकर

पी

1384) पाबलकर 1385) पचगड़े 1386) पचोड़ 1387) पचपोर 1388) पचरे 1389) पडगाला 1390) पडगे 1391) पडस्वान 1392) पडावर 1393) पडगल 1394) पडकंटवार 1395) पडकर 1396) पडोल 1397) पडोलकर 139 8) पदसवने 1399) पदसवने 1400) पाडुरंग 1401) पडवल्कर 1402) पगार 1403) पाहुने 1404) पैठणे 1405) पैठणकर 1406) पैठनपगारे 1407) पजगाडे 1408) पाखरे 1409) पाखरे 1410) पाल 1411) पलाखे 1412) पलांगे 1413) पलनवार 1414) पलंगे 1415) पलशीकर 1416) पलटेन 1417 ) पनाहले 1418) पंचागड़े 1419) पंचभाई 1420) पंचगंगा 1421) पंचोली 1422) पांडो 1423) पांडव 1424) पांडव 1425) पांडे 1426) पंधारे 1427) पंडित 1428) पंगारकर 1429) पन्हाले 1430) पन्हालेर 1431) पारधी 1 432) परतकर 1433) पारावी 1434) पर्वत 1435) परदेशी 1436) पारे 1437) परगेवार 1438) परकंठे 1439) परोधी 1440) परसदे 1441) पटाके 1442) पाटले 1443) पाटस्कर 1444) पथे 1445) पाटिल 1446) पाटिंगे 1447) पाटकर 1448 ) पटके 1449) पटसावणे 1450) पाटसावने 1451) पाटसावने (पडासवन) 1452) पटवे 1453) पॉलजागड़े 1454) पौंकर 1455) पावस्कर 1456) पावड़े 1457) पवार 1458) पावस्कर 1459) पेडणेकर 1460) पेंडभाजे 1461) पेंडबाजे 1462) पेंडसावे 1463) पेंढारे 1464) पेंढारकर 1465) पेंढारे 1466 ) पेरुरी 1467) पेशवे 1468) पेटकर 1469) फाले 1470) फाल्ले 1471) फाल्टनकर 1472) फाल्टनकट 1473) फाटे 1474) फिराके 1475) फिरके 1476) पिम्पलामुले 1477) पिम्पला 1478) पिम्पलाकर 1479) पिम्पले 1480) पिम्प्रामुले 1481) पिनालवार 1482) पिंगले 1483) पिंगले 1484) पिंगुलकर 1485) पिन्नालारव 1486) पिन्नालवार 1487) पिपारे 1488) पिपरिये 1489) पिसे 1490) पिसेकर 1491) पोधाडे 1492) पोहाणे 1493) पोलाडे 1494) पोलाखाडे 1495) पोलाखारे 1496) 1497) पोंगाने 1498) पोटभारे 1499) पोटदुखे 1500) पोटे 1501) पोथाबारे 1502) प्रसाद 1503) प्रेमभारे 1504) प्रस्टी 1505) पुण्ड 1506) पुंडे 1507) पुणेकर 1508) पुन्नलवार 1509) पुरजवार 1510) पुरालकर 1511) शुद्ध 1512) शुद्ध-तेली

आर

1513) राडे 1514) राघटे 1515) राघुते 1516) राेगिट 1517) रहाटेकर 1519) राहुत 1520) रायजादे 1521) रायकर 1522) रायमल 1523) रायमुले 1524) राजमाने 1525) राजनकर 1526) राजपकर 15 27) राजापुरकर 1528) राजबिन्दे 1529) राजगिरे 1530) राजगुरे 1531) राजमाने 1532) राजुरकर 1533) राखड़े 1534) रक्षक 1535) रामेकर 1536) रामपुरे 1537) रणबावरे 1538) रणबावरे 1539) राणे 1540) रणखाम्ब 1541) रणशिंगे 1542) रसाल 1543 ) रासमल्लेवार 1544) राठौड़ 1545) राठौड़ 1546 ) राठौड़ (हरसुले 1547) राठौड़ (हरसुले) 1548) राठौड़ 1549) राठौड़ 1550) राठौड़ 1551) रत्नाकर 1552) रत्नपारखी 1553) रत्नपारखी 1554) रत्नपारखी 1555) राउत 1556) रावटे 1557) रावटे 1558) रावले 1559) राया कारा 1560) रायते 1561 ) रायजादे 1562) रायके 1563) रेनपुरे 1564) रेंगे 1565) रेंगे 1566) रेवतका 1567) रेवाले 1568) रेवतकर 1569) रीठे 1570) रीठी 1571) रोडे 1572) रोहाणे 1573) रोकड़े 1574) रोकड़े 1575 ) रोथ

एस

1576) साबले 1577) साबले 1578) साबने 1579) साबले 1580) साबने 1581) सागोटे 1582) सहारे 1583) सहारे 1584) सहारे 1585) सहांद्रे 1586) साहु 1587) साहु 1588) साेंदाने 1589) साेंदरे 1590) साेंदरे 1 591) सज्जन 1592) सज्जनशेट्टी 1593) साकरकर 1594) साखारे 1595) साखरकर 1596) साखरवड़े 1597) साखरवाड़े 1598) साखरे 1599) साकोरे 1600) सकपाल 1601) साकुले 1602) साकुरे 1603) सलामोते 1604) सालंकर 1605) सालास्कर 1 606) सालावेन 1607) साल्हंखे 1608) सालमोते 1609 ) सालोदकर 1610) सालुंके 1611) सालुंखे 1612) साल्वे 1613) सामगोंड 1614) समरित 1615) सामरीता 1616) समर्थ 1617) सांभरे 1618) सांभरे 1619) संपाल 1620) समरित 1621) समुद्रे 1622) संदलसे 1623) केपीएएल 1624) सैंटान्से 1625) साओ 1626) सपधारे 1627) सपकाल 1628) सरतकर 1629) सरदे 1630) सरजे 1631) सरकले 1632) सरमालकर 1633) सरोदे 1634) सरोधे 1635) सरतले 1636) सरवये 1637) सरवरिया 1638) सासणे 1639) 1640) सासवडकर 1641) सतारदेकर 1642) सातवणे 1643) सातवणे 1644) सातवणे 1645) सातपैसे 1647) सातपुये 1648) सातपुते 1649) सौंदाने 1650) साव 1651) सावरदेकर 1652) सावरकर 1653) सावरकर 1654) सावलाखे 1656 ) सावंत 1657) सावरबंधे 1658) सावरकर 1659 ) सयाकारा 1660) सयांकर 1661) सयारे 1662) सयाकर 1663) सेजोले 1664) सेल्कर 1665) सेलोकर 1666) सेलुकर 1667) शाह 1668) शहादे 1669) शहाले 1670) शहापुर 1671) शहारा 1672) शहारे 1673) साहू 16 74) शैलिंग 1675) शंखपाल 1676) शारंगधर 1677) शास्त्री 1678) शॉ 1679) शेडगे 1680) शेजावल 1681) शेजुल 1682) शेजवाल 1684) शेजवलकर 1685) शेलार 1686) शेलगांवकर 1687) शेलगांवकर 1688) शेलके 1689) वह लोकर 1690) शेलोरकर 1691) शेम्बडे 1692) शेंडारकर 1693) शेंडे 1694) शेंडगे 1695) शेंड्रे 1696) शेंडुरकर 1697) शेनफाडु 1698) शेनकुडे 1699) शेरे 1700) शेटे 1701) शेट्टी 1702) शेट्टी 1703) शेट्टी 1704) शेट्टी 1705) शेवड़े 1706) शेवंते 1707) शेवंती 1708) शेवलकर 1709 ) शेवंते 1710) शेवतकर 1711) शिखरे 1712) शिखरे 1713) शिले 1714) शिंदे 1715) शिंदुरकर 1716) शिंगणे 1717) शिंगारे 1718) शिरभाटे 1719) शिरसागर 1720) शिरसाट 1721) शिर्सथ 1722) शिर्साट 17 23) शिरसोले 1724) शिरसुद्धे 1725) शिवदेकर 1726) शिवलाड 1727) श्रवणजी 1728) श्रवणकर 1729) श्रीनिवास 1730) श्रीराव 1731) श्रीसागर 1732) सिदालंबे 1733) सिंगारे 1734) सिंहे 1735) सिंके 1736) सिरसोले 1737) स्कन्तुले 1738) स्नेही 1739) सोहनी 17 40) सोलंकी 1741) सोलंकी 1742) सोलुंके 1743) सोमनकर 1744) सोमवंशी 1745) सोमनाथे 1746) सोमवते 1747) सोनालकर 1748) सोनावने 1749) सोनावने 1750) सोनावड़ेकर 1751) सोनावड़े 1752) सोनावड़ेकर 1753) सोनावने 1754) सोनावने 1755) सोनकुले 1756) सोनोन 1757) सोनसेल 1758) सोनटैक 1759 ) सोनटके 1760) सोनटके 1761) सोनकले 1762) सोनुने 1763) सोनवाने 1764) सोनवल 1765) सोनवाने 1766) सोनवानी 1767) सुदके 1768) सुद्रिक 1769) सुद्रुक 1770) सुकेंकर 1771) सुखचैन1772) सुखसोहले 1773) सुलताने 1774) सुमनगला 1775) सुपारे 1776) सुपेकर 1777) सुराडकर 1778) सुराले 1779) सुरालकर 1780) सुरान्जे 1781) सुरांजे 1782) सुराडकर 1783) सुरागड़े 1784) सुराडकर 1785) सुरले 1786) सुरोशे 1787) सुरसे 1788) सुरूले 1789) सर्वे 1790) सर्वे 1791) सूर्यवंशी 1792) सूर्यवंशी 1793) सूर्यवंशी 1794) सूर्यवंशी

टी

1795) ताड़स 1796) ताड़के 1797) ताड़स्कर 1798) ताड़वलकर 1799) टेक 1800) टेकी 1801) तलनाकर 1802) तलनकर 1803) तलवडेकर 1804) तलवड़ेकर 1805) तलेकर 1806) तलेले 1807) तलमाले 1808) तलमाले 1809) तलवेकर 1810) तलवेकर 1811) तांबेखे 1812) तांबे 1813) तांबुलकर 1814) ताम्हणकर 1815) तांडले 1816) तपारे 1817) तपासे 1818) तपकिरे 1819) ताराडगांवकर 1820) ताराले 1821) तारारे 1822) तारहेकर 1823) तारलेकर 1824) तावाडे 1825) दे 1826) तायदे 1827) तायदे 1828 ) टेकाडे 1829) टेकाले 1830) टेकावाडे 1831) तेली 1832) तेली (कसाबे) 1833) तेलमसरे 1834) तेलरांडे 1835) ठाकरे 1836) ठाकरे 1837) थलंगे 1838) थमके 1839) थेले 1840) देयर थोक एले 1842) थोम्बरे 1843) थोम्बरे 1844) थोराट 1845) थोसारे 1846) थोतांगे 1847) थोटे 1848) गला 1849) टिबुडे 1850) तिघरे 1851) तिजारे 1852) टिकले 1853) तिखले 1854) तिखिले 1855) टिकले 1856) तिलगुले 1857) तिमांडे 1858) टिपले 1859) टिपले 1860) तीरथकर 1861) तीरथकर 1862) शीर्षक 1863) तिवरेकर 1864) टोडरमल 1865) टोम्पे 1866) टोंडे 1867) त्रिमाले 1868) तुले 1869) तुलसीकर 1870) तुपकर 1871) तुरास्कर

यू

1872) उबले 1873) उबारे 1874) उचित 1875) उदाणे 1876) उदयकर 1877) उदगिरे 1878) उगरेकर 1879) उगले 1880) उगेमुगे 1881) उगरान 1882) उग्रान 1883) उकारे 1884) उखरे 1885) उमाक 1886) उमाले 1887) उमारानी 1888) उमाटे 1889) उमाठे 1890) उमरीकर 1891) उनबेग 1892) उनमेघ 1893) उनमेक 1894) उपाध्ये 1895) उपारकर 1896) उपासे 1897) उराडे 1898) उरकुडकर 1899) उतागे

वी

1900) वदिभस्मे 1901) वाघमारे 1902) वैध्य 1903) वैद्य 1904) वैरागडे 1905) वैरागी 1906) वाल्काम्बे 1907) वालुंजकर 1908) वाम्भिरे 1909) वनखडे 1910) वणस्कर 1911) वांचेवाड 1912) वानिया 1913) वणियार 1914) वंजारी 1915) वणकर 1916) वर्भे 1917) वरगाणे 1918) वरपे 1919) वरशिकर 1920) वरुलकर 1921) वासामाले 1922) वासरचेतला 1923) वाशामाले 1924) वाथारकर 1925) वाव्हाल 1926) वावल 1927) वाव्हाल 1928) वीरिसेट्टी 1929) वीरकर 1 930) वेलंजकर 1931) वेंगुरलेकर 1932) वेताल 1933 ) वेताल 1934) व्हालकर 1935) व्हातले 1936) व्हावल 1937) विभुते 1938) विभूते 1939) विखंकर 1941) विलंकर 1942) विल्पुरा 1943) विरकर 1944) विश्वनाथे 1945) वितांकर 1946) विटेकर 1947 ) व्यवहारे 1948) व्यवहारे 1949) व्यवहारे 1950) व्यवहारे 1951) व्यवहारे 1952) व्यवहारे

डब्ल्यू

1953) वाचकवडे 1954) वाचकवडे 1955) वाचकवडे 1956) वाचकवडे 1957) वाचकवडे 1958) वाचकवडे 1960) वेड 1961) वाडेकर 1962) वडगांवकर 1963) वधाई 1964) वाचकवडे 1965) वाढेकर 1966) वाडीभास्मे 1967) वाडकर 1968) वाडंकर 1969) वागरे 1970) वाघचौरे 1971) वाघचौरे 1972) वाघाडे 1973) वाघले 1974) वाघचौड़े 1976) वाघचौड़े 1977) वाघचौड़े 1978) वाघचौरे 1979) वाघे 1980) वाघलाव्हेले 1981) वाघमारे 198 2) वाघमारे 1983) वाघोलिकर 1984) वाघमारे 1985) वाहवल 1986 ) वैद्य 1987) वाइकर 1988) वेंगांकर 1989) वाइरागाडे 1990) वाकले 1991) वाकचौरे 1992) वाकले 1993) वालावलकर 1994) वालावलकर 1995) वालेकर 1996) वाल्हेकर 1997) वालझाडे 1998) वाके 199 9) वालखडे 2000) वालसे 2001) वालुंजकर 2002) वालवेकर 2003) वालज़ादे 2004) वांभुरे 2005) वानास्कर 2006) वांडिले 2007) वांगीकर 2008) वानजारे 2009) वानजाडे 2011) वानखेड़े 2012) वानोड 2013) वारदे 2014) वारंभे 2015) वारभे 2016) वारघाने 2017) वारहेड 2018) वारकरी 2019) वरुडकर 2020) वरुले 2021) वासनकर 2022) वासेकर 2023) वाथ 2024) वाथरकर 2025) वॉटमोड 2026) वाव्हल 2027) वायंगंकर 2028) वेनगावडेकर 2029) वेंडोले 2030) व्हावल 2031) व्याव्हारे

वाई

2032) यदाओ 2033) यैंडोले 2034) यशवन्तकर 2035) येलने 2036) येलुरे 2037) येलने 2038) येलने 2039) येनदोले 2040 येनकर 2041 येनोरकर 2042 येनुरकर 2043 येलने 2044 येरने 2045) येर्न 2046) यशवन्तकर 2047) येवले 2048) येवले

जेड

2049) ज़ादे 2050) ज़ादे 2051) ज़ागादे 2052) ज़ाले 2053) ज़ाल्टे 2054) ज़ाल्वार 2055) ज़ांज़ात 2056) ज़ापर्डे 2057) ज़ारे 2058) ज़िंगारे 2059) ज़ोआद 2060) ज़ोड 2061) ज़ोड 2062) ज़ोलेज 2 063) ज़ोपेट 2064) ज़ोर

DON BAILLI TELI VAISHYA SAMAJ

DON BAILLI TELI VAISHYA SAMAJ

ये लोग दो बैलों (बेल) के साथ तेल मिलों में काम करते थे और यह समृद्धि का प्रतीक था। यह तेली समाज अधिकतर महाराष्ट्र विदर्भ में पाया जाता है। वे मराठी भाषा बोलते हैं जो पूर्व में ज़दी बोली है।

महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में क्रे, चकोले। वे अमरावती, अकोला, यवतमाल, चंद्रपुर, भंडारा, गोंदिया, वर्धा, वाशिम, गढ़चिरौली और नागपुर, पांडुर्ना (एमपी), औसर (एमपी) और भोपाल (एमपी), बालाघाट और बैतूल, राजनांदगांव, रायपुर और दुर्ग में व्यापक रूप से फैले हुए हैं।

उनके उपनाम इस प्रकार हैं

तेली समाज के उपनाम

अंबेकर,
अंबिके,
अंबरे,
अवसारे,
अवसरे,
बडेकर,
बनसोडे
बराकसे,
बारामुखा
बत्तासे,
भगत,
भागवत,
भजनकर,
भांडेकर,
भिसे,
,
भोटा,
भुसारी,
बिजवे,
बिरार,
चलेकर,
चांदेवार,
चन्ने,
चतुर ,
चौदारे,
चौधरी,
चौधरी,
चव्हाण,
चिलेकर,
चिंचकर,
चोथावे,
चोथे,
चौधरी, दाभोली
,
दाभोलकर, दहितुले, दैतुले, दलवी, दारुनाकर, देहाद्रय, देशमाने , , देवारागावकर, धवले , ढेंगले, धोत्रे, दिलिव, दिवाते , दिवटे , दिवटे , डोलसे , डोलसे , डोंगारे , दुर्गुडे , डुटूंडे , गायकवाड , गवली , घाटकर , घाटकर , घोडाके घोडके , हदके , हाडके , हजारे , हिवरेकर , होनकलसे , इंगले , इप्टे , जाधव , जगनाडे , जामखंडी , जथार , जठहार, कदम, कहाने, कलमधड, काले, कपाड़िया, कपासे, कराडिले, करतकरा , , कार्डिले, करपे, कसाबे कटके, कटेकर, कथूरे , कटके, कवाडे , कवाडे, केदारी, खड़े खलादे, खलादकर, खेतड़ी, खोंड , खोत, किर्वे, कोर्डे कोटे, क्षीरसागर, लांडे, लांजेकरा , लोखंडे, लुटे, मगर, महादिक, महाकलेकर, महाले, मकुडे, माने, मंथलकर, मावले, मेहर, मेरुकारा, म्हास्के , म्हात्रे, मोगारे, मोहोपडकर, मोहपडकर, मोर्गनकर , नाचनकर, नागले, नागमाला, नागमाले, नागिन, नागपुरे,

नाइक (नेरकर),
नसरे,
नेरकर,
पाबलकर,
पैठनपगारे,
पनहाले,
पारे,
पाटस्कर,
पाटिल,
पावस्कर,
पवार,
पावस्कर,
पेंडबाजे,
फाल्ले,
फलटणकर,
पिंगले
, पिन्नालारव,
रहाटे ,
रंखंब,
रत्नापारखी,
रत्नापारखी,
राऊत,
रायकारा,
रोकाडे ,
साहू,
सैंद्रे,
सकपाल ,
साकुरे, सालावने,
सालुंके,
समरिता
,
सपकाल
, सरजे,
सासाने ,
सासवडकर , सावरकर, सयाकारा
, शास्त्री , शेडगे, शेजावल, शेजवाल , शेलार, शेमबडे, शेंदुरकर, शेवंती, शिंदे, शिरसथ, सोनवणे, सोनटक्के , सुरले, सूर्यवंसी, तलमले, तांबे, तम्हनकर, तावड़े, टेकाले , टेकावाडे, तेली, तेली (कसाबे), थोकले, थोम्ब्रे, थोरात, तिलगुले, टोंडे, उबले, उचित , उग्रान, वैरागी, वाम्भिरे, वीरकर , वेताल, विभुते, विडे, व्यवहारे , व्यवहारे , वाडेकर, वाघ , वाघाचौरे, वाघमारे , वाल्हेकर, वालुंजकर, वालजादे , वरुडकर, वाव्हाल, येवले, भरदाम, वाघोलिकर, पोटे, दिवारे, गजरे, अवले, रघाटटे, पगार, मोहकारे, परतकर, गरुड़, शिखरे, बावस्कर, घोरपड़े, ठाकरे, कनाडे, कटोरे, मोदी, गुलवाड़े, सातोने, इटानकर, रेवतकर, तलवेकर , तडस , दोदामणि, चिंचकर , अडासुल , कलाशेट्टी, उगले, मोहोकर, भिवगड़े, गलवाडे, कल्लासेट्टी, कस्तुरे, घोरपड़े, चौगुले, मार्तंडे, बिज्जरगी, अल्लोली, खेडगी, करीमुंगी, खुर्द, सज्जनशेट्टी,

मंतलकर,
परदेशी,
माडेकर,
मंगरुले,
पलंगे,
डिचोलकर,
कोरे,
नुक्काने,
कुगने,,

अन्य तेली समाज उपजाति भारत में पाई गई

मराठा तेली, राठौड़ तेली, क्षत्रिय तेली, जयरत तेली, तिलवान तेली, राठौड़ तेली, राठौड़ तेली, सवजी तेली, तिरमल तेली, एक बेली, एरंडेल तेली, डॉन बेली तेली, साहू तेली, वद्धार तेली, तरहान तेली, मूडी तेली, कोंकणी तेली, लिंगायत तेली, वीरशैव लिंगायत तेली, बाथरी तेली, राजपूत तेली, साहू तेली समाज, उनाई साहू तेली समाज, गनिगा, गंडला, घांची तेली समाज, वानिया चेट्टियार, चेट्टियार, गनिगा शेट्टी, ज्योतिपना गनिगा, ओंटेट्टू गनिगा, सोमक्षत्रिय गनिगा, जोडेटु गनिगा, वीरशैव गनिगा और अन्य नारंगी तेली, राठौड़ तेली, क्षत्रिय तेली, जीर तेली, तिळवण तेली, सावजी तेली, तिरतल तेली, एक बैल तेली, एरंडेल तेली, दोन तेली, साहू तेली, मोदी तेली, कोकणी तेली या कोकण तेली, लिंगायत तेली, विरशैव लिंगायत तेली, राजपूत तेली, उनाई चंद्र तेली, सेकेन्डर तेली, साव तेली.

Sunday, May 5, 2024

ORIGIN & HISTORY OF TELI SAHU VAISHYA

ORIGIN & HISTORY OF #TELI SAHU VAISHYA 


महाभारत में तुलाधर नामक वैश्य तत्वादर्शी का उल्लेख लिता है जो तेल व्यवसायी थे किन्तु इन्हें तेली न कहकर वैश्य  कहा गया, अर्थात तब तक (ईसा पूर्व 3 री - 4 थी सदी) तेली जाति नहीं बनी थी इन्हें केवल वैश्य ही कहा जाता था. वाल्मिकी के रमकथा में भी तेली जाति का कोई उल्लेख नहीं है तथा अन्य वैदिक साहित्यों में भी तेल पेरने वाली तेली जाति का प्रय्तक्ष प्रसंग हीं मिलता है । पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में विष्णु गुप्त नामक वैश्य  तेल व्यपारी की विद्धता का उल्लेख है ।

आर्य सभ्यता के चतुर्वर्णीय व्यवस्था में ब्राम्हण, और क्षत्रिय के बीच श्रेष्ठता के लिये स्पर्धा थी । वैश्य के उपर कृषि, पशुपालन एवं व्यपार अर्थात उत्पाद का वितरण का दायित्व था, इन पर यज्ञ एवं दान की अनिवार्यता भी दी गई । जिससे समाज मैं अशांति थी। तब भगवान महावीर आर्य, जो क्षत्रिय थे, जिन्होंने यज्ञों में होने वाले असंख्य पशुयों की हत्या का विरोध किया, साथ ही जबरदस्ती दान की व्यवस्था का विरोध कर अपरिगृह ि सिद्धांत प्रतिपादित किया । इसके बाद शक्य मुनि गौतम बुद्ध हुये, जिन्होंने भगवान महावीरके सिद्धांतो को आगे बढाते हुए, वर्णगत/जातिगत/लिंगगत भेदभाव का विरोध किया । गौतम बुद्ध भी क्षत्रिय थे और उन्हे, क्षकत्रय, वैश्य एवं शुद्र वर्ण का सहज समर्थन मिला । इसी दौरान सिंधु क्षेत्र में ग्रिक आक्रमण हुआ और अतं में चंद्रगुप्त मौर्य मगध के शासक बने। इनके वंशज आशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया , जिसमें एक लाख मनुष्य मारे गये तथा डेढ लाख मनुष्य घायल हुए । युद्ध के विभत्स दृश्य को देखकर सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ और वे बुद्ध धर्म के अनुयायी हो गये थे । महावीर एवं गौतम बुध के कारण प्रचलित चतुर्वर्णीय व्यवस्था की श्रेणी बद्धता में परिवर्तन हुआ । नवीन व्यवस्था में ब्राह्मण के स्थान पर क्षत्रिय श्रैष्ठतम हो गये और ब्राम्हण, वैश्य एवं शुद्र समान स्थरपर आ गये । फलस्वरूप वर्ण मे परिवर्तन तीव्र हो गया । ईसा के 175 वर्ष पूर्व मग के अंतिम सम्राट मौर्य राजा वृहदरथ को मारकर, उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुंग राजा बने जो ब्राह्मण थै । माना जाता है पुष्पमित्र शुंग के काल में ही किसी पंउीत ने मनुस्मृति की रचना की थी । शुंग वंश का 150 वर्षै में ही पतन हो जाने से मनुस्मृति का प्रभाव मगध तक ही रहा ।

ईसा के प्रथम सदी के प्राप्त शिला लेखों में तेलि वैश्यों के श्रेणियों / संघों (गिल्ड्स) का उल्लेख मिलता है । ईसा पश्चात महान गुप्त वंश का उदय हुआ। जिसने लगभग 500 वर्ष तक संपुर्ण भारत को अधिपत्य में रखा । इतिहास कारों ने गुप्त वंश को वैश्य वर्ण का माना है । राजा समुद्रगुप्त एवं हर्षवर्धन के काल को साहित्य एवं कला के विकास के लिए स्वर्णिम युग कहा जाता है , गुप्त काल में पुराणों एवं स्मृतियों रचना हुई । गुप्त वंश के राजा बालादित्य गुप्त के काल में नालंदस विश्वविद्यालय के प्रवेश वार पर भव्य स्तूप का निर्माण हुआ, चीनी यात्री व्हेनसांग ने स्तूप के निर्माता बालादित्य को तेलाधक वैश्य  वंश का बताया है । इतिहासकार ओमेली एवं जेम्स ने गुप्त वंश को तेली वैश्य होने का संकेत किया है । इसी के आधार पर उत्तर भारत का तेली समाज गुप्त वंश मानते हुये अपने ध्ज में गुप्तों के राज चिन्ह गरूढ को स्थापित कर लिया । गुप्त काल में सनातन, बौद्ध एवं जैन धर्मालोंबियो समान दर्जा प्राप्त था । इसी काल में 05 वी सदी में अहिंसा पर अधिक जोर देते हुए, हल चलान तथा तेल पेरने को हिंसक कार्यवाही माना जाने लगा, गुजरात - महाराष्ट्र-राजस्थान का क्षेत्र जहां सर्वाधिक तेल उत्पादन होता था, घांची वैश्य  के नामसे जाना जाता था । जैन मुनियों के चतुर्मास काल में घानी उद्योग को बंद रखने का दबाव बनाय गया फलस्वरूप तेलियों एवं शासकों के मध्य संघर्ष हुआ । जिन तेलियों ने घानी उद्योग को बचाने शस्त्र उछाया वे घांची क्षत्रिय कहलाये गये । ये लोग राजस्थान में है. जिन्होंने केवल तेल व्यवसाय किया वे तेली वैश्य, तथा जिन्होंने सुगंधित तल का व्यापार किया वे मोढ बनिया कहलाये । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और नरेन्द्र मोदी के पूर्वज मोढ बनिया थे । जिन्होंने हल चलाकर तिलहन उत्पादन किया । तेली जाती की उत्पत्ति का वर्णन विष्णुधर्म सूत्र, वैखानस स्मार्तसूत्र, शंख एवं सुमंतू मै है ।

ORIGIN & HISTORY OF SUVARN BANIK VAISHYA

ORIGIN & HISTORY OF #SUVARN BANIK VAISHYA

सुवर्णा बनिक्स द्वारा आदि-सप्तग्राम का इतिहास और कलकत्ता का गठन

प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता चार वर्गों में विभाजित थी। ये थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। सुवर्ण बनिक सम्प्रदाय वैश्य समुदाय से था। हमारी चर्चा का विषय है 10 वीं से 18 वीं शताब्दी के दौरान कलकत्ता के सुवर्ण बनिक संप्रदाय की उत्पत्ति, विकास और विभाजन। सुवर्ण बनिक सम्प्रदाय का कलकत्ता में बसना और सबसे बढ़कर बंगाल और देश की समृद्धि में उनका महत्वपूर्ण योगदान इस चर्चा में शामिल है। आर्यों ने कर्म और गुणों के वर्गीकरण के अनुसार अपने समाज को क्रम में बाँटा - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। आर्य समाज इन चार वर्गों में विभाजित था। इन चार गुणों के साथ-साथ मोची, सुनार, कुम्हार, बढ़ई आदि विभिन्न व्यवसायों के अनुसार नई उपजातियों की उत्पत्ति हुई। चार मुख्य वर्गों में से वैश्य समुदाय का पेशा व्यवसाय था। पुराने समय में वैश्यों में जो करोड़पति होते थे उन्हें राजा 'श्रेष्ठ' कहकर सम्मानित करते थे।

मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के समय वैश्य व्यापार में बहुत अग्रणी थे। चंद्र और सूर्य वंश से संबंधित वैश्यों में से जो 'कनक' या 'कनखल' (वर्तमान में उत्तर प्रदेश में) के क्षेत्र में निवास करते थे, उन्हें 'कनक खेत्री' के नाम से जाना जाता था। 915 शताब्दी के आसपास अयोध्या से पांच कनक क्षेत्री व्यापारी व्यापार के लिए बंगाल आए और बहुत पुरानी राजधानी गौरनगर में बस गए। ये पांच कनक केत्री व्यवसायी हैं शंकरनाथ, बाराणसी चंद्र, नरहरि बोराल, कर्ण दास और निरानंद धर।

हम जानते हैं कि बंगाल मुख्यतः कृषि आधारित क्षेत्र है। लेकिन यहां विभिन्न प्रकार की औद्योगिक संबंधित चीजों का भी उत्पादन किया जाता है। प्राचीन काल से ही बंगाल व्यापार के उद्देश्य से भूमि और नदी के माध्यम से भारत के अन्य हिस्सों से जुड़ा हुआ था और चीन, अराकान, सिंघल, अरब जैसे अन्य देशों के साथ भी व्यापार विकसित करना चाहता था। बंगाल के व्यापारी सूती कपड़े, चावल, सोना, मोती और जवाहरात आदि जैसी सामग्री का निर्यात करते थे। दसवीं शताब्दी से पहले बुद्ध धर्म बंगाल में फैल गया था और अच्छी तरह से स्थापित हो गया था। लेकिन जब आदि सूर पूर्वी बंगाल के राजा के रूप में सिंहासन पर बैठे तो उन्होंने फिर से ब्राह्मण धर्म लागू किया क्योंकि वह एक वैदिक धार्मिक राजा थे जो बुद्ध धर्म का विरोध कर रहे थे। उनके शासनकाल के दौरान रामगढ़ (जो अयोध्या के पास है) के समर्पित हिंदू व्यापारी कुशल अड्डा के बड़े बेटे सनक अड्डा ने हमेशा के लिए अपना जन्मस्थान छोड़ दिया और अपने धर्म की रक्षा के लिए पूर्वी बंगाल की राजधानी विक्रमपुर आ गए। सनक के साथ मुख्य व्यापारियों के सोलह परिवार और गौण व्यापारियों के तीस परिवार आए। विक्रमपुर में सनक अड्डा के आगमन का समय विद्वानों की गणना के अनुसार दसवीं शताब्दी के लगभग 30 से 40 के मध्य का है। सोलह प्रमुख व्यवसायी थे जयपति चंद्रा, संदीप डे, शोलोपानी दत्ता, श्री धर अद्य, मेघ शी, राजाराम सिंघा, श्रीपति धर, कमलाकांत बोराल, गुणाकर पाल, गणेश्वर नाथ, हरिपुर नंदी, बनेश्वर मल्लिक, हिरण्य बर्धन, दिबाकर दास, मोहनानंद लाहा और पुरंदर सेन.

सनक अद्य्या और उनके साथ आए व्यापारियों ने राजा आदि सूर की अनुमति से मेघना और ब्रह्मपुत्र नदी के बीच के रहने योग्य क्षेत्र में व्यापार शुरू किया। सनक अद्यया चीन, अराकान, ब्रह्मादेश आदि के व्यापारियों के साथ व्यापार करता था। अपने व्यवसाय के माध्यम से वह बहुत सारा सोना और चाँदी आयात करता था। इस तरह उन्होंने इस क्षेत्र को एक बहुत समृद्ध शहर में बदल दिया। राजा आदि सूर ने प्रसन्न होकर सनक का मान बढ़ाना चाहा। इस प्रकार उन्होंने उन्हें "सुबर्ण बानिक" की उपाधि से सम्मानित किया और उनके निवास स्थान को "सुबर्ण ग्राम" या 'सोने का गांव' नाम दिया गया। विद्वानों के अनुसार यह घटना 945 ई. के आसपास की है। 150 वर्षों तक निवास करते हुए सुब्रना बनिक समृद्ध हो गए।

1158 शताब्दी में बल्लाल सेन बंगाल के राजा बने। 'सुबर्ण बानिक तत्व' पुस्तक से हमें पता चलता है कि बल्लाल सेन ने मणिपुर की राजधानी को जीतने के लिए बल्लावनदा अद्य से 1 करोड़ सोने के सिक्कों का ऋण लिया था, जो सुबरना ग्राम का सबसे अमीर व्यापारी था। कई बार पराजित होने के कारण उसका खजाना भी कम होने लगा। तब उन्होंने अपने राजदूत के माध्यम से बल्लवानंद से 1.5 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का एक और ऋण मांगा, लेकिन बल्लवानंद ने इसे अस्वीकार कर दिया। इस घटना से बल्लाल सेन बहुत क्रोधित हुए। इस प्रकार उन्होंने सुबर्ण बनिक पर झूठा दोष लगाया और बलपूर्वक उन्हें सभा में प्रताड़ित किया। राजा बल्लाल सेन की यातनाओं से तंग आकर कई बनिक गौड़ के निकट स्थित लक्षणाबाटी की ओर प्रस्थान कर गये। कुछ सप्तग्राम की ओर चले गये, कुछ बर्द्धमान के निकट खरसूरी नदी के तट पर कर्जना नगरी की ओर चले गये। 300- 400 वर्षों के भीतर उनका व्यवसाय फल-फूल गया। 1414 SHAK या 1490 (अंग्रेज़ी) में 'कर्जना' नाम से एक सोसायटी की स्थापना हुई। हमें जानकारी मिलती है कि करजना में 16 वीं शताब्दी के आरंभ में सुबर्ण बनिकों के 792 परिवार रहते थे।

पहले यह बताया जाता है कि बल्लाल सेन के उत्पीड़न से मुक्त होने के लिए कुछ सुवर्ण बनिक सप्तग्राम में रहने लगे। कहा जाता है कि 14 वीं शताब्दी से पहले सप्तग्राम ही एक प्रसिद्ध व्यापारिक स्थल के रूप में उभरा था। रोम के व्यापारी अपनी रानियों के लिए बढ़िया 'मस्लिन' आयात करने के लिए यहाँ आते थे। ऐसा कहा जाता है कि 1350 में इबोन बतूता नाम का एक मोरक्को यात्री सप्तग्राम आया था। अपने कथन में उन्होंने बंगाल की 14 वीं शताब्दी में उत्पादों की कीमत के बारे में लिखा । इसके अलावा वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा लिखित श्री चैतन्य भागवत में हमें सप्तग्राम के बारे में जानकारी मिलती है। उन्होंने लिखा है,

“कता-दिने थाकि' नित्यानंद खादाधे सप्तग्राम अइलेन सर्व-गण-सहे;

सेई सप्तग्रामे आचे-सप्त-अनि-स्थान जगते विदिता से 'त्रिवे-घाओ' नाम;''

(खाडादाह में कुछ दिन बिताने के बाद, नित्यानंद अपने सहयोगियों के साथ सप्तग्राम चले गए। सप्तग्राम के इस गांव में सात ऋषियों से जुड़ा एक स्थान है जिसे दुनिया भर में त्रिवेई-घाओ के नाम से जाना जाता है।)

सप्तग्राम बनाने वाले सात गाँव बशबेरिया, कृष्णापुर, बालाघाट, बासुदेवपुर, शिवपुर, नित्यानंदपुर और शंकनापुर हैं।

लक्ष्मण सेन (बलाल सेन के पुत्र) की सभा के श्री कृष्ण दत्त, जो बंगाल के अंतिम राजा थे, सप्तग्राम में बस गए। वह रामगढ़ के भावेश दत्ता, सुबर्ण बनिक के पुत्र थे। श्रीकृष्ण दत्त के अधीन श्रीकर दत्त थे जिनके पुत्र उद्धरन दत्त थे। उनकी मुलाकात चैतन्य महाप्रभु के घनिष्ठ सहयोगी नित्यानंद प्रभु से हुई और उन्हें नित्यानंद प्रभु की सेवा करने का अवसर मिला। श्री चैतन्य भागवत में भी इसका उल्लेख है।

“काया-मनो-वाक्ये नित्यानंदेर कैरेण भजिलेन अकैतवे दत्त-उद्धरणे;

नित्यानंद-स्वरूपे सेवा-अधिकार पाइलेन उद्धारे, किबा भाग्य टायरा;”

(उद्धरायण दत्त ने अपने शरीर, मन और वाणी से नित्यानंद के चरणों की ईमानदारी से पूजा की। उद्धरायण कितने भाग्यशाली थे, जिन्हें नित्यानंद स्वरूप की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ!)

श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने से पहले 1481 में उद्धारन दत्त का जन्म हुआ था। उद्धारन दत्त के कारण ही सुवर्ण बनिक समाज के एकमात्र समाज ने नित्यानंद प्रभु से शिष्यत्व ग्रहण किया। जिससे सुवर्ण बनिक समाज में वैष्णव धर्म की प्रेममयी भक्ति का प्रसार हुआ।

पहले केवल यह कहा गया है कि कर्जना में सुबर्ण बनिक समाज की स्थापना हुई थी। 1514 में देश की क्रांति तथा कुछ अन्य कारणों से यह समाज अलग हो गया। 'सुबर्ण बानिक कुल्ची' में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है। 1436 में शक कर्ज़ना का पतन हो गया और राजसी व्यवस्था में दुर्घटना के कारण सभी लोग पीड़ित हुए। वहां के प्रमुख व्यापारी बहुत खुश थे लेकिन इस पतन के कारण सभी लोग अलग-अलग प्रांतों में स्थानांतरित होने लगे। संदीप भद्र, सुलापानी दत्ता और पुरंधर सेन के उत्तराधिकारियों जैसे सुबर्ण बनिकों ने कर्जना छोड़ दिया और सरस्वती नदी के पास सप्तग्राम में रहने लगे। करजाना में रहने वाले सुबर्ण बनिक सदस्यों में से एक महत्वपूर्ण व्यापारी अजर चंद्र खा था। 1537 में उनका निधन हो गया। उनके मृत्यु समारोह के दौरान अन्य सुबरना व्यापारियों को कबीराज डे, नीलांबर दत्ता भट्ट (अजर चंद्र खा के भतीजे) द्वारा आमंत्रित किया गया था।

लेकिन खराब परिवहन सुविधाओं के कारण 792 में से 502 परिवार इस समारोह में उपस्थित थे। तब से उन्हें 'राडी' और बाकी 290 सुबर्ण व्यापारियों को 'सप्तग्रामी' के नाम से जाना जाने लगा।

गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के संगम पर स्थित सप्तग्राम था जहाँ विभिन्न देशों के व्यापारी जहाज यात्रा करते थे। इसलिए, यह समृद्ध था और व्यापार और व्यवसाय का मुख्य स्थान बन गया। लेकिन पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी, ब्रिटिश व्यापारियों के आगमन और समुद्री डाकुओं के हमलों के कारण बंगाल के व्यापारियों के लिए समुद्री व्यापार बंद हो गया। कवि कंकन मुकुदरम की चंडी मंगल की कविताओं में इसका थोड़ा वर्णन किया गया है। बहुत से धनी व्यापारी यहाँ व्यापार करने आते थे लेकिन सप्तग्राम के व्यापारी कहीं और यात्रा नहीं करते थे बल्कि यहीं स्थित रहकर ही खूब धन कमाते थे। उपर्युक्त आयतों में यह स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि वे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में नहीं थे।

1563 में जब सरस्वती नदी का जल स्तर कम हो गया तो सप्तग्राम के व्यापारियों का घाटा बढ़ गया। सप्तग्राम के व्यापारी जहाज बेटोर से होकर नहीं जा सकते थे और इस प्रकार वे सरस्वती नदी से होकर नहीं जा सकते थे। बेटोर वर्तमान खिदिरपुर के गंगा और सरस्वती के विपरीत तट पर स्थित था। तब सप्तग्राम के व्यापारी यह स्थान छोड़कर अलग-अलग प्रांतों में चले गये।

1594 में पठान शासकों के आक्रमण के कारण सप्तग्राम की समृद्धि और अधिक धूमिल हो गई। व्यापारी विशेष रूप से सुबरन बनिक धीरे-धीरे अंबिका कलना, बांसबाटी, हुगली, बाली, चुचुडा, पाराशडांगा, श्रीरामपुर, नैहाटी आदि में आकर बस गए। 1632 के आसपास मुगलों ने हुगली पर विजय प्राप्त करने के बाद अपने कर कार्यालय को सतगांव से हुगली में स्थानांतरित कर दिया। इस घटना ने सप्तग्राम के व्यापारिक केंद्र के पतन का संकेत दिया।

1690 में प्रसिद्ध व्यापारी जॉब चार्नोक को सुतानुति में ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार अड्डा स्थापित करने की अनुमति मिली। 1698 में अंग्रेजी कंपनी को औरंगजेब के पोते अजीम उल शाहम से भगवती नदी के पूर्वी तट पर स्थित सुतानती, कोलकाता और गोविंदपुर के तीन गांवों को खरीदने की अनुमति मिल गई। चितपुर, बागबाजार, शोभाबाजार के वर्तमान क्षेत्र हटखोला-सुतानुति के नाम से जाने जाते थे और धर्मतला, बहुबाजार, मिर्ज़ापुर, शिमला, जामबाजार आदि कलकत्ता का हिस्सा थे। जॉब चार्नोक हुगली से सुतानुति आये। उनके साथ नोपू (?) धर या लक्ष्मीकांत धर भी आए, जो पोस्टार राजा के आदेश के संस्थापक थे। सुबर्ण बनिक्स के वंशज लक्ष्मीकांत धर उस काल के एक प्रसिद्ध धनी व्यक्ति थे। हम कृष्ण दास के 'नारदपुराण' से जान सकते हैं कि जॉब चार्नोक के आगमन से पहले भी यहां सुबर्ण बनिकों का निवास था और यहां बउबाजार का एक क्षेत्र था। यह पुराण जॉब चार्नोक के आगमन से 3 वर्ष पूर्व लिखा गया था। अन्त में कवि ने अपना परिचय इस प्रकार दिया है।

“सुबर्ण बनिक कुले उत्पत्ति अमर, अपनि कनिष्ठ भ्राता मोर रामकृष्ण नाम;

साकिम कोलकाता बोबाज़ारेते ग्राम, दासा दासा सता निरनब्बोइ साल, महा जैष्ठ्या मासे ई पुस्तक रोचिबे;”

(मेरा जन्म सुबरना बनिक परिवार में हुआ है। मेरा नाम रामकृष्ण है। बोबाज़ार ग्राम कोलकाता का हिस्सा है।)

नवाब अलीमुद्दीन खान के शासनकाल के दौरान मराठाओ ने बंगाल पर आक्रमण किया। इस प्रकार बंगाल के निवासी परेशान हो गये। इस अवधि के दौरान हुगली, हावड़ा, उत्तर 24 परगना के तटों पर रहने वाले सुबर्ण बनिक कलकत्ता में स्थानांतरित हो गए क्योंकि अंग्रेजों ने सुरक्षा के लिए एक किले की स्थापना की थी। सुबर्णा बानिक सुरक्षित निवास के लिए वहां पहुंचे।

ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय व्यापारियों ने कोलकाता, हुगली, चुचुरा, चंदन नगर, कलकत्ता आदि में उपनिवेश स्थापित किए। इसके बाद सुबर्ण बानिक इस प्रमुख व्यापारिक स्थानों में रहने लगे। आरंभिक काल से ही अंग्रेजों के व्यवसाय की जिम्मेदारियां सुबर्णा बानिक संभालती थीं। धीरे-धीरे वे अलग-अलग पदों पर उनके अधीन काम करने लगे। इनमें मदन दत्ता, मोती लाल सील, प्राणकृष्ण लाहा, सागरलाल दत्ता जैसे लोग बहुत प्रमुख थे। दरअसल कलकत्ता शहर के विकास के पीछे सुबर्णा बानिकों का व्यापारिक कौशल एक कारण है।

1773 में, कलकत्ता ब्रिटिश भारत की राजधानी बन गया। अंग्रेजों के सहयोग से एक नये समाज का विकास हुआ जो ग्रामीण समाज से बिल्कुल अलग था। इसे 'बाबू समाज' के नाम से जाना गया। व्यवसाय की दृष्टि से बाबू या तो कलेक्टर थे, दलाल थे, जमीन के मालिक थे, जमींदार थे। ख़ाली समय के दौरान उनके आनंद की सामग्री पेशेवर नर्तक, फैंसी नाटक, पक्षियों की लड़ाई आदि थे। हमें जानकारी मिलती है कि 1834 में मुलिक के बेटे हरनाथ की चाटुबाबू के साथ पक्षियों की लड़ाई हुई थी। इस प्रकार बहुत सारा धन बर्बाद हुआ। वस्तुतः मूल्यों और इन्द्रिय भोग में शिथिलता ही 'बाबू समाज' की विशेषता थी। रात्रि के समय वेश्या के यहाँ रुकना उस समय के धनवानों का लक्षण था। सुबर्ण बनिक समाज भी इस संस्कृति में शामिल हो गया। लेकिन बाद में 'बाबू समाज' के सुसंस्कृत लोग अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर, बैरिस्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर बने। 1857 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के गठन से उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार हुआ। सुबर्णा बानिक भी उच्च शिक्षा में थे। इस समाज के कई लोग बहुत विद्वान हुए और उन्होंने कलकत्ता के साथ-साथ देश के विकास में भी मदद की। बैंक ऑफ बंगाल की स्थापना के पीछे सुबर्ण बानिक सुखमय रॉय का एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व था। सुबर्ना बनिक्स कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की चैरिटी से आरजी कर मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। इस संबंध में मोती लाल सील, देवेन्द्र नाथ मलिक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।

FIGHTRIGHT Technologies - NITIN JAIN & VISHAL MANGAL

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कैसे न्याय को सभी के लिए हक़ीक़त बनाने में मदद करता है स्टार्टअप FightRight

FightRight न्याय को सभी के लिए हक़ीक़त बनाने में विश्वास रखता है.

FightRight भारत का अपनी तरह का पहला स्टार्ट-अप है जो मुकदमेबाजी के लिए पैसे मुहैया कराता है
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कंपनी ने अपने पहले साल में 30 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया है.


आज के जमाने में चारों ओर टेक्नोलॉजी का दबदबा है. बिजनेस वर्ल्ड में शायद ही कोई सेक्टर इससे अछुता हो. अब ऐसे में भला लीगल टेक कैसे टेक्नोलॉजी की पहुंच से दूर रह सकता है. वकील, जज, अदालत और न्याय — ये सभी अब टेक्नोलॉजी के सहारे चल रहे हैं. साल 2021 में, लीगल टेक मार्केट ने दुनिया भर में 27.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का रेवेन्यू हासिल किया. बाजार पूर्वानुमान के साथ 2027 की अवधि के लिए चार प्रतिशत से अधिक की CAGR (compound annual growth rate) से बढ़ने का अनुमान है. इसके साथ ही 2027 तक इस सेक्टर का रेवेन्यू 35.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को छू सकता है. ये डेटा मार्केट रिसर्च फर्म Statista से जुटाया गया है.

भारत में भी लीगल टेक सेक्टर में स्टार्टअप्स खूब फल-फूल रहे हैं. अपने नए-नए इनोवेटिव कॉन्सेप्ट्स के जरिए इस सेक्टर में आने वाली हर समस्या का समाधान लेकर आ रहे हैं. ऐसा ही एक स्टार्टअप है — FIGHTRIGHT Technologies

FightRight न्याय को सभी के लिए हक़ीक़त बनाने में विश्वास रखता है. कंपनी सरल, समरूप, मानकीकृत, व्यवस्थित और अनुकूलित तरीके से वकीलों की सहायता करने और वादियों को उनके अधिकारों के लिए लड़ने में मदद करने के लिए इंटेलीजेंट टूल्स के साथ एक अद्वितीय और इंडस्ट्री-फर्स्ट AI (Artificial intelligence) और ML (Machine learning) संचालित मंच का निर्माण कर रही है.

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FightRight की शुरुआत

FightRight की शुरुआत नितिन जैन (Nitin Jain) और विशाल मंगल (Vishal Mangal) ने मिलकर की थी. नितिन जैन, फाउंडर और सीईओ होने के साथ-साथ एक पेशेवर चार्टर्ड एकाउंटेंट (CA) और एलएलबी (जनरल) हैं. उन्होंने टैक्स लॉ चैंबर (TLC), मुंबई में बतौर इनडायरेक्ट टैक्स कंसल्टेंट अपना करियर शुरू किया था. उसके बाद उन्होंने रियल एस्टेट की ओर रुख किया, जो भारत में हमेशा किसी न किसी मुकदमेबाजी में फंसा रहता है.

वहीं, विशाल मंगल, को-फाउंडर और सीओओ को रियल एस्टेट इंडस्ट्री में अच्छा-खासा अनुभव हैं. वे रुकी हुई श्रीराम प्रॉपर्टीज, कोलकाता परियोजना को पटरी पर लाने के लिए जिम्मेदार प्रमुख व्यक्ति थे. उन्हें भूमि और संपत्तियों के सभी नियामक और अनुपालन पहलुओं की गहरी समझ है. उन्होंने Ahluwalia Contracts, Shriram Properties और Indospace जैसी कंपनियों में काम किया है.

क्या करता है FightRight?

भारत की कानूनी प्रणाली में, सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता शक्ति और धन के असंतुलन का कारण बनती है, जिससे जटिल मुकदमेबाजी प्रक्रियाएँ होती हैं जो कई व्यक्तियों और संगठनों के लिए नेविगेट करना मुश्किल होता है.

बहुत से लोग कानूनी प्रक्रिया की अत्यधिक जटिलताओं के कारण अपने सही दावों को आगे बढ़ाने में हिचकिचाते हैं, जिसमें दावों की पहचान करने में कठिनाई, सही मंच, सही रणनीति और उपयुक्त वकील खोजने में कठिनाई शामिल है. इसके अलावा, मुकदमा लड़ने का खर्चा और समय निवेश निवारक के रूप में कार्य करते हैं.

सबसे बड़ी समस्या मंच/न्यायालय-विशिष्ट लोगों और देश के अतिव्यापी/विरोधी कानूनों से परस्पर विरोधी सलाह है.

साथ ही, कई संभावित वादकारियों के पास प्रभावी ढंग से दावा करने के लिए वित्तीय साधन नहीं होते हैं और उन्हें उधार लेने के लिए मजबूर किया जाता है.

यहां तक कि जब मुकदमेबाजी का निर्णय लिया जाता है और पैसा सुरक्षित हो जाता है, वकीलों के साथ नियमित बैठकों, दस्तावेज़ प्रबंधन और मामले से जुड़ी हर बारिकी से वाकिफ़ रहने के लिए आवश्यक समय और प्रयास भारी हो सकता है.

यह एक दोहरा बोझ पैदा करता है, क्योंकि दावेदारों ने पहले ही अपना अधिकार खो दिया है और अब इसे आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त संसाधनों (समय, धन और प्रयास) का निवेश करना होगा ताकि आगे कोई परिभाषित रास्ता न हो.

इन सभी समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करता है FightRight. कंपनी की टैगलाइन है — JUSTICE A REALITY FOR ALL.


बिजनेस, रेवेन्यू मॉडल और फंडिंग

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लिटिगेशन फंडिंग (Litigation Funding) के तहत, कंपनी वाणिज्यिक प्रकृति के कानूनी विवाद में एक पक्ष को गैर-सहायता के आधार पर फाइनेंस देती है. यदि मामला जीत जाता है या सुलझा लिया जाता है, तो आय के एक हिस्से के बदले में, आप केवल तभी भुगतान करते हैं जब आप जीत जाते हैं. यह सीमित वित्तीय संसाधनों वाले पक्षों को कानूनी कार्रवाई करने में मदद करता है जिसे वे अन्यथा वहन करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं और अक्सर, या तो दावा छोड़ देते हैं या पात्रता के एक अंश के लिए समझौता कर लेते हैं. यानि की कंपनी मुकदमेबाजी के सफल परिणाम पर दावे का पूर्व-निर्धारित प्रतिशत लेती है.

कंपनी का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML) समर्थित प्लेटफॉर्म कई मापदंडों पर जज और वकील के प्रदर्शन संकेतक देकर भावना विश्लेषण करने में सक्षम है. यह पैटर्न की पहचान करने और मुकदमेबाजी के प्रकार के आधार पर भविष्य कहनेवाला/निवारक विश्लेषण करने में मदद करता है. पूरी तरह से प्रशिक्षित, यह मिसालों का विश्लेषण करने और समय और लागत के साथ मार्ग विश्लेषण देने में सक्षम होगा. यह सब्सक्रिप्शन आधारित होगा और इसमें पे-पर-बेस रेवेन्यू मॉडल भी होगा.

कंपनी की कानूनी सहायता सेवाएं टेक प्लेटफॉर्म का एक हिस्सा होंगी, जिससे यह उचित परिश्रम, जोखिम, निवारक और भविष्य कहनेवाला विश्लेषण पेश करेगी. और कंपनी एग्रीगेटर मॉडल पर आधारित अन्य सेवाओं की भी पेशकश करेगी जैसे कि कोर्ट फाइलिंग, साक्ष्य एकत्र करना, प्रमाणित प्रतियां, मध्यस्थता समर्थन सेवाएं आदि, वकीलों और वादियों के लिए मुकदमेबाजी के समय और लागत में कटौती करने के लिए. यह एक एग्रीगेटर वेंडर मॉडल पर आधारित होगा जहां कंपनी केवल वेंडर और ग्राहक दोनों से प्लेटफॉर्म उपयोग शुल्क लेगी.

फंडिंग के बारे में पूछे जाने पर को-फाउंडर बताते हैं, "FightRight ने अक्टूबर 2021 में USD 300K (2.25 करोड़) की फंडिंग जुटाई थी."

चुनौतियां

इस बिजनेस/प्लेटफॉर्म को खड़ा करने में आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करते हुए को-फाउंडर बताते हैं, "पहला सवाल जो हमसे पूछा जाता है, वह यह है कि क्या लिटिगेशन फंडिंग कानूनी है. हां, यह पूरी तरह से कानूनी है और बार-बार इस काउंटी के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे दोहराया है. केवल अपवाद यह है कि प्रैक्टिस कर रहे वकीलों को सक्सेस फी-बेस्ड फंडिंग मॉडल पर काम करने की अनुमति नहीं है."

वे आगे बताते हैं, "सभी अदालतों से डेटा और डेटा को डिक्रिप्ट करना बड़ी चुनौती है. आज तक सभी अदालतों का डेटा प्राप्त करने के लिए कोई एपीआई या आसान तरीके उपलब्ध नहीं हैं और जिस प्रारूप में डेटा उपलब्ध है, उसे अभ्यास करने वाले वकीलों के लिए भी समझना बहुत मुश्किल है, तो कल्पना कीजिए कि एक आम वादी को कितनी कठिनाई होती है. हमारी टेक टीम बड़ी मुश्किल से इसे हल करने में सक्षम रही है और हमारे AI/ML मॉडल इस विशाल मात्रा में उपलब्ध डेटा से समझ बनाने और अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में सक्षम हैं."

को-फाउंडर बताते हैं, "सिस्टम में लंबित मामलों की भारी संख्या को देखते हुए निवेशक लिटिगेशन फंडिंग स्पेस में निवेश करने से सावधान हैं."

भविष्य की योजनाएं

FightRight के फाउंडर को रवैया आशान्वित है. वे कहते हैं, "बस कुछ समय की बात है कि लोग यह महसूस करना शुरू कर देंगे कि पूरी लिटिगेशन इंडस्ट्री बड़ा मुकाम हासिल करेगी. यह 200 अरब डॉलर का अवसर है."

कंपनी ने पिछले साल 30 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया. यह इसके कारोबार का का पहला वर्ष था. इसके साथ ही कंपनी अगले 18 महीनों में 18+ करोड़ रुपये का रेवेन्यू हासिल करने का लक्ष्य बना रही है. FightRight के फाउंडर 400+ ग्राहक होने का दावा करते हैं.

FightRight भारत का अपनी तरह का पहला स्टार्ट-अप है जो मुकदमेबाजी के लिए पैसे मुहैया कराता है और इसे समर्थन देने के लिए AI-पावर्ड एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म प्रदान करता है. प्लेटफॉर्म को कानूनी दावे के जोखिमों का मूल्यांकन करने और सफल परिणाम के लिए सबसे प्रभावी रणनीति की सिफारिश करने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है. यह एक साथ कई दावों को संभालेगा और निर्णय लेने के लिए क्विक रिकमेंडेशन प्रदान करेगा. इससे दोनों को लाभ होता है, वे निवेशक जो अपने पैसे की सुरक्षा करके एसेट क्लास के रूप में लिटिगेशन फंडिंग में निवेश करने में रुचि रखते हैं, और दावेदार जो परिणाम-उन्मुख मुकदमेबाजी का पीछा कर सकते हैं.

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