VAISHYA VANIK HISTORY AND ORIGIN - वैश्य समाज का इतिहास और वैश्य शब्द की उत्पत्ति
वैश्य शब्द विश् धातु में क्विप् प्रत्यय लगने से बना हैं। विश् धातु का अर्थ है विशति, प्रविश्ति, प्रान्तरादावित घूमने वाले लोग। पाणिनी ने पाणि को ही वैश्य की संज्ञा दी।' पाणिनी ने वैश्य के लिए अर्यः शब्द का भी प्रयोग किया हैं। अर्यः स्वामि वैश्ययोंः (3/1/103)²
आर्यो के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में विश् शब्द का उल्लेख मिलता हैं। इस का प्रारम्भिक प्रयोग समूचे जन-समुदाय के अर्थ में किया जाता था। आर्य सभ्यता का विकास उन विश नामक कबीलों से प्रारम्भ हुआ, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे। अन्त में वे जहां बस गये, उसी का नाम जनपद पड़ गया। जन का अर्थ है- कबीला और पद का अर्थ है स्थान। विश का नाम बड़ा ही महत्त्वपूर्ण था क्योंकि सम्पूर्ण समाज इस के अर्न्तगत आता था। जब आर्य भारत वर्ष में विस्तृत रूप से फैल गये और खेती-बाड़ी करते हुए जीवन यापन करने लगे, तो वे विश कहलाने लगे। डा० परमेश्वरी लाल गुप्त का मत है कि वैदिक काल के आरम्भ में सारी जनता विश नाम से जानी जाती थी उनके अनुसार विश का अर्थ है- बैठना। घुमने फिरने के बाद जब आर्य लोग एक स्थान पर बैठ कर स्थायी रूप से व्यवसाय करने लगे तो उन की बस्ती बिश कहलाने लगी और धीरे-धीरे वहां बसने वालों का नाम विश या श्य हो गया। सस्कृत भाषा में यह अर्थ अभी तक चलता है।
विशत्याशु विशमवशय कृष्णादाय रुचिशुची।
वेदाध्ययनापन्नः स वैश्य अति संज्ञित: ।। (बदन पुराण)
इस विश में कुछ लोग ऐसे थे, जो शस्त्र क्रिया में दक्ष थें, उन्हें क्षत्रिय तथा मंत्रादि रचने की क्षमता रखते थे, उन्हें विश में 'ब्राह्मण' की संज्ञा से सम्बोधित किया गया।
कुछ समय उपरान्त ऐसा लगता है- इस विश समुदाय से ब्राह्मण और क्षत्रिय अलग हो गये, जो बचे वे विश कहलाते रहें। यही शब्द बाद में विश्य और वैश्य हो गया।'
किन्तु बाद में जब मनुष्य ने वर्ण-व्यवस्था में एक निश्चित रूप प्राप्त कर लिया, तो विश शब्द का उपयोग समाज के उस वर्ग को व्यक्त करने के लिए किया जाने लगा, जो कृषि, गोपालन तथा व्यापार में संलग्न था।
भारतीय परिकल्पना के अनुसार ब्रहम् ही सृष्टि के आदि कर्त्ता है। उन्हें विराट पुरूष की संज्ञा दी गई है। ब्रहम् ने एक से बहुत होने की कामना (एकोऽहं बहुस्यामः) से सृष्टि का विस्तार किया। ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में उसकी सुन्दर व्याख्या मिलती है। वैश्य शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य ऋग्वेद में सब से पहले पुरूष सूक्त अथार्त दशम मण्डल में आता है, जो अपेक्षाकृत आधुनिक है।
ब्राह्मणोऽस मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः
उरू तदस्य यद्वैश्यःपद्भ्यां शूद्रो अजायत् ।। (1.0/90/12)*
सम्पूर्ण सृष्टि को उस विराट पुरूष का अंग मानते हुए. उसकी कल्पना शरीर के चार अंगों के सन्दर्भ में की गई है। उस के अनुसार ब्रह्म के मुख से ब्राह्मणों की, भुजाओं से क्षत्रियों की, जंघाओं से वैश्यों की और पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। इस परिकल्पना के मूल में समाज को सुचारू रूप से चलाने की भावना ही थी। यह व्यवस्था गुण-कर्म के आधार पर थी जिनकी परम्पराएं आपस में मिलती-जुलती थी। जब वे पूर्ण रूप से उनमें घुल मिल गये तो उनकी सतत पर्यटनशील वृत्ति के कारण उनका नाम वैश्य पड़ गया।'
भारत के सामाजिक इतिहास में वर्ण व्यवस्था का महत्त्पूर्ण स्थान है, जो सामाजिक विभाजन के रूप में वैदिक काल से आज तक उत्तर से दक्षिण तक निरन्तर प्रवहमान है। इस व्यवस्था के अर्न्तगत भारतीय समाज का वणों में विभाजन किया गया था।
भारतीय साहित्य में वर्ण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ है। मनु ने वेद के आधार पर वर्ण व्यवस्था का विकास किया है। यजुर्वेद (31/10-11) में जो
यत्पुरुषैव्यदधुः कतिधाव्यकल्पयन् ।
मुख किमस्पासीत्किम् बाहूकिमरू पादा उच्चते ।।
(यजुर्वेद 31/10-11)3
ब्राह्मणोऽस मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः ।
उरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यों शूद्रो अजायत् ।।
(यजुर्वेद 31/11)
वर्ण व्यवस्था प्रदर्शित की है, मनु ने उसी को यथावत् प्रस्तुत किया है यह व्यवस्था जन्मना न हो कर कर्मणा है। इस श्लोक में ओर
लोकानान्तु विवृद्धियर्थ मुख बाहूरूपायादातः ।
ब्राह्मणं क्षत्रिय वैश्यै शूद्र च निवर्तमत् ।। (1/31)5
मनुस्मृति में भी यह स्पष्ट किया गया है कि समाज में चार वर्णों का निर्माण मुख, बाहु, उरू और पैर की तुलना के अनुसार हुआ है और तदानुसार ही कर्मों का निधारर्ण किया है।
नाविशेषीऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्।
ब्राह्मणा पूर्व सृष्टा हि कर्माभिर्वर्णताऽव्गतम् ।। 88
वर्ण व्यवस्था कर्मो के आधार पर थी और उसमे समाज के कार्यों का चार वणों में इस तरह विभाजन कर दिया गया था, जिससे सृष्टि का क्रम ठीक ढ़ग से चलता रहे।'
अर्थवेद में उरू के स्थान पर मध्यतदस्थयद् वैश्य इस प्रकार की उक्ति है।
तैत्तिरीय संहिता (7/1/4/1/9) में कहा गया है कि प्रजापति ने वैश्य वर्ण अन्नाकार से उत्पन्न किया है।
सर्वईदं ब्राह्मण सृष्टं ऋगम्यों जातं वैश्यवर्णभाहुः
यजुर्वेदं क्षत्रियस्याहु योनिम सामवेदों ब्राह्मणनाम प्रसूतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण3/12/93)²
तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया है कि समस्त विश्व की सृष्टि ब्रह्मा द्वारा हुई है। ऋग्वेद से वैश्य वर्ण उत्पन्न हुआ, यजुर्वेद से क्षत्रियों और सामवेद से ब्राह्मण उत्पन्न हुए।
इसमें वैश्य वर्ग का निर्धारण, कर्म के आधार पर, एक ऐसे समुदाय के लिए किया गया, जिसका मुख्य कार्य कृषि, गोपालन और व्यापार माना गया। श्री वामन पुराण में कहा गया कि वैश्य गण यज्ञाध्यययन से सम्पन्न, दाता, कृषि कर्त्ता तथा वाणिज्य जीवी हो तथा पशुपालन का कर्म करें।
ऋग्वेद में वैश्यों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। इन्हें विश, पाणि आदि संज्ञाएं प्रादन की गई हैं। यास्काचार्य ने पाणियो को ही व्यापारी कहा है - पाणिर्वणिग मवति (2/17)
प्राचीन समय में जब मुद्रा का प्रचलन तथा वस्तुओं का आदान-प्रदान ही वस्तु प्राप्ति का साधन था, तो वस्तुओं का आदान-प्रदान करने वालों को पाणि की संज्ञा दी गई। बाद में आर्यों के प्रसार के कारण समाज का विभाजन जब आर्य और अनार्य में होने लगा, तो आर्यों ने पाणि लोगों को अपने में मिला लिया, क्योंकि कृषि, गोपालन, शाकाहार आदि की कार्य वैश्य वर्ण का मुख्य कर्म था
कामभोगीप्रियास्तीक्ष्णः क्रोधिना प्रियसाहसाः ।
त्यक्त स्वधर्मारक्ताडव्ग्रास्त द्विजाः क्षत्रतांगता ।।
गोभ्यो वृतिमास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः ।
स्वधर्मान्नानुतिष्ठन्ति ते द्विजाः वैश्यतां गताः ।।
हिंसानृत, प्रिय लुब्धा, सर्वकर्मोपजीविनः ।
कृष्णाः शौच परिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रांता गताः ।। 91 (महा० भा० शा० पूर्व० अ० 188)' (मनुस्मृति 1/88-91)
जो व्यक्ति इन कर्मों का पालन करेगा, वह उस उस वर्ण का अधिकारी होगा।
वर्ण शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'वृञ वरणे' अथवा वरी धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'चुनना या वरण करना। 'वर्ण और वरण' शब्दों मे साम्य भी है। संभवतः 'वर्ण' से तात्पर्य वृत्ति से है, किसी विशेष व्यवसाय के चुनने से। समाज शास्त्रीय भाषा में 'वर्ण' का अर्थ 'वर्ग' से है, जो अपने चुने विशिष्ट व्यवसाय से आबद्ध है। वास्तव में वर्ण उस सामाजिक वर्ग की ओर इंगित करता है जिसका समाज में विशिष्ट कार्य और स्थान है, जो अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण समाज के अन्य वर्गों अथवा समूहों से सर्वथा अलग होता है तथा अपने हितों की स्थितियों के विषय में जागरूक होता है।
स्वयं वर्ण शब्द इस व्यवस्था को कर्माधारित व्यवस्था सिद्ध करता है। निरूक्त में वर्ण शब्द की व्युत्पत्ति दी है वर्णो वृणोतेः (2/1/4) अर्थात कर्मानुसार जिस का वरन् किया जाये वह वर्ण है। इस प्रकार प्रकाश डालते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं -
वर्णों वृणोतेरिति निरूक्त प्रामाण्याद् वर्णिया वरीतुमर्हाः गुणकर्माणि च दृष्टवा यथायोग्य त्रियन्ते ये ते वर्णाः ।।
(ऋ० भा० भू० वर्णाश्रम कर्म विषय)"
दैवी सिद्धान्त के रूप में वर्ण व्यवस्था के उद्भव का वर्णन महाभारत में भी किया गया हैं, अन्तर केवल इतना है कि विराट पुरूष के स्थान पर ब्रह्मा का उल्लेख किया गया है।
ब्राह्माणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम ।
बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्ट उरूभ्यां वैश्य एवं च ।।
वर्णानां परिचार्यार्थ त्रयाणां भरतर्षभ ।
वर्णश्चतूर्थः संभूत पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ।। (महाभारत शान्तिदवे 122.4-5)'
गीता में भी भगवान श्री कृष्ण का कथन है कि चारों वर्णों के सृष्टि मैने गुण और कर्म के आधार पर की है तथा मैं ही उन कर्त्ता और विनाशक हूँ ।
चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः ।
तस्य कर्तारमयि यां विद्धयकर्तारमव्ययम् ।। (गीता 4.13)2
रामायण (3.14.29-30) के अनुसार
मुखतो ब्राह्मणा जाता उरसः क्षत्रियास्तथा ।
उरूभ्यां जज्ञिरे वैश्या पद्मां शूद्रा
पुराणो में भी वर्णों का उद्भव ईश्वरीय माना गया है तथा वर्ण-व्यवस्था के महत्त्व को तद्वत् स्वीकार किया गया है।
त्वन्मुखात् ब्राह्मणास्त्वर्त्ता बाहोंः क्षत्रमजायत ।
वैश्यास्तवों रूजाः शूद्रास्तव पद्भ्यां समुद्गताः ।। (विष्णु पुराण 1.12.63-64)
वामदेवस्तु भगवान सृजन्मुखतो द्विजान् ।
राजन्यान् सृजद्दाहोर्वित् शूद्रानुरूपादयोः ।। (मत्स्य पुराण 4.28)
वक्त्रादस्य ब्राह्मणः सम्प्रसूता यद्वक्षतः क्षत्रिया पूर्वभागे।
वैश्याश्चारोर्यस्य पदभ्यांच शूद्राः सवै गात्रतः संप्रसूता। (वायु पुराण 9.113)
ग्बारहवी सदी के लेखक अरब यात्री अलबेरूनी ने भी वर्षों की उत्पत्ति के विषय में उद्धत कथनों से मिलता जुलता ही विवरण दिया है।'
वर्ण व्यवस्था -
किसी भी संगठित समुदाय के लिए कार्य-विभाजन की प्रणाली आवश्यक हो जाती है। प्रत्येक संगठित समाज के कुछ नियम होते हैं, जिन का उद्देश्य संगठन का स्थायित्व बनाए रखना और समुदाय के समस्त व्यक्तियों के पारस्परिक संबंध को सुव्यवस्थित बनाना तथा उसकी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने की व्यवस्था करना रहता है। ये नियम वैचारिक पृष्ठ भूमि में बनाए जाते है और समुदाय के कुछ व्यक्ति इसी चिन्तन के कार्य में लग जाते हैं। समुदाय के इस वर्ग को भारत में बाह्मण की संज्ञा दी गई। समुदाय की बाह्य और आन्तरिक सुरक्षा के लिए उपयुक्त विचारकों के द्वारा बनाए गए सामाजिक नियमों का पालन कराने के लिए समाज को एक प्रशासक वर्ग की भी आवश्यकता होती है, जिसे भारत में क्षत्रिय की संज्ञा दी गई। इन दोनों बगों के अतिरिक्त तीसरा वर्ग, जो सभ्यता के प्रारम्भ में खेती-बाड़ी, गोपालन तथा वस्तुओं के आदान-प्रदान में लगा, वह वैश्य कहलाया। प्रत्येक संगठित समाज में एक ऐसे वर्ग की आवश्यकता षड़ेगी, जो उपर्युक्त तीनों वर्गों अर्थात क्षत्रिय, बाह्मण, वैश्य की उन के कार्यों में सहायता करे। यह वर्ग स्वयं खेती-बाड़ी, गोपालन आदि सम्बन्धित सम्पत्ति के स्वामी के रूप में कार्य न कर सके अर्थात् वे स्वामियों के साहयक के रूप में कार्य करेगा। भारत में बही वर्ग शूद्र कहलाया।
बैश्य समाज वाणिज्य व्यवस्था द्वारा सभ्यता के प्रारम्भ काल से ही अपनी विशिष्ट छाप अंकित करता आया है। प्रारम्भ में वर्षों के सस्तरण में वैश्यों को तीसरा स्थान प्राप्त था और ब्राहमण क्षत्र्य वैश्य ऊपर के तीन वर्ण माने जाते थे। इन को अध्ययन करने, यग्य करने और दान करने का अधिकार था वैश्यस्थाध्यमनं भजन दान कृषि पशु पालन वनिज्या च. किनती कालान्तर में वैश्य वर्ण दान करने में तो अग्रणी रहा परन्तु बज्ञ और अध्ययन आदि में अन्य द्विज वर्षों में पिछड़ गया। इस का मुख्य कारण यह लगता है कि वैश्यों की जो श्रेणियां विशेष शिल्प या व्यापार पर आधारित की, उन के लिए शिक्षा का प्रबन्ध या तो पैतृक होता था अथवा श्रेणी द्वारा ही व्यवस्थित किया जाता था। उस के लिए किसी आचार्य के पास शिक्षा लेने के लिए जाना आवश्यक नहीं था।'
वर्ण और जाति-
भाषा कोश के अनुसार जाति शब्द जात (सं०) शब्द से व्युत्पन्न है। जात का अर्थ है - जन्म, पुत्र आदि। जाति भी एक तत्सम शब्द है जिसका मूल अभिप्राय पंक्ति से है, जो जाति-बिरादरी के अर्थ में प्रयुक्त होता है। भाव यह है कि जो एक पंक्ति अर्थात् एक वर्ग विशेष में उत्पन्न हुए हैं वे एक जाति हैं। अरबी में यह शब्द जात है जिसका अर्थ है - शरीर, देह, जाति आदि अर्थात् जिनमें पूर्वजों का समरक्त है, वह मानव समूह एक जाति है।
जाति शब्द से ही ध्वनित होता है कि इसमें मर्यादा की भावना अन्तर्निहित है। मर्यादा से तात्पर्य है कि कुछ विशिष्ट मान्यताएँ, क्रियाएँ, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाएँ उससे सम्बन्धित होती हैं, जिनमें कुछ ऐसे रीति-रिवाज भी होते हैं जिन्हें अन्धविश्वास के नाम से जानते हैं।
भारत में जाति प्रथा पीढ़ी दर पीढी अनेक शताब्दियों से चली आ रही है। हमारे देश में जाति अपरिवर्तनीय है, अर्थात् मनुष्य अपना धर्म बदल सकता है, किंतु अपनी जाति नहीं बदल सकता। हमारे पारिवारिक जीवन की आधारशिला जन्म से लेकर वैवाहिक व्यबस्था व मृत्युपर्यंत इसी जातिय तत्व पर अवलम्बित रहती है। पश्चिमी विद्वान टायलर ने जाति व्यवस्था की आवश्यकता का प्रतिपादन निम्न शब्दों में किया है "भारत में जाति समूह एक मौलिक सांस्कृतिक आवश्यकता है, किसी भी जाति की आदि परम्पराएँ, ज्ञान, बिशिष्ट संस्कार कला, नैतिक आचार-विचार, विश्वास, रूढ़ियाँ, रीति-रिवाज, आदतें एवं क्षमताएँ उस सांस्कृतिक धरातल में समाहित होते हैं जिनका प्रत्येक जातिय सदस्य कुछ परिवर्तन और कुछ संशोधन के साथ उन्हें वंशानुक्रम से आत्मसात और ग्रहण करता चलता
डॉ० वी०ए० स्मिथ ने बताया है कि जाति परिवारों के उन समूहों को कहते हैं जो आपस में संस्कार, वंश तथा कई विशेष कार्यों के लिए विशेष नियमों से बंधे हुए हैं।
वैदिक युग में 'जाति' जैसे किसी शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। उस समय केवल वर्ण व्यवस्था थी और कार्यानुरूप व्यक्ति को किसी वर्ण विशेष से जुड़ा मानते थे। उत्तर वैदिक युग के प्रारम्भ में विभिन्न वर्णों में पृथकता की भावना आरम्भ हो गई और तीनों वर्ण शुद्र वर्ण को अपने से अलग और त्याज्य मानने लगे।
भारत के प्राचीन शास्त्रकारों ने समाज को चार वर्षों में विभक्त किया है। ये चार वर्ण है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। पर भारत में जिन सैंकड़ों जातियो की सत्ता है, उन सब को किसी वर्ण के अर्न्तगत कर सकना सम्भव नहीं है। जाट और कायस्थ सदृश कितनी ही ऐसी जातियां हैं, वर्ण विभाजन की दृष्टि से जिन्हें किस वर्ण का माना जाए, यह निर्धारित नहीं किया जा सकता। शास्त्रों के अनुसार कृषि और पशुपालन वैश्यों के कार्य माने गये हैं और जाट जाति के लोग प्रायः कृषक और पशुपालक ही होते हैं। परन्तु वे स्वयं को वैश्य नहीं मानते। उन्हें न ब्राह्मणों के अर्न्तगत रखा जा सकता है न क्षत्रियों के और न शूद्रों के। कायस्थ जाति के लोग प्रायः मुंशी गिरी से अपना निवार्ह करते रहे हैं और उनमें शिक्षा का भी बहुत प्रचार रहा है, परन्तु उन्हें ब्राह्मण नहीं माना जाता। खत्री, अरोड़े प्रायः व्यापार और दुकानदारी के धन्धे करते है, परन्तु वे स्वयं को वैश्य नहीं समझते। गूजर, अहीर गडरिया आदि जातियों को किस वर्ण के अर्न्तगत रखा जाए, यह भी निर्विवाद नहीं है। नाई और बढ़ई सदृश जातियों के लोग स्वयं को ब्राह्मण कहने लगे है। अधिक ब्राह्मण उनके इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। वस्तुतः जातियों की वर्षों से पृथक व स्वतन्त्र सत्ता है और जातियों की उत्पत्ति तथा विकास का वर्ण-भेद के विकास के साथ कोई सुनिश्चित संबंध नहीं है।'
अष्टाध्यायी में वर्ण, जाति और बन्धु में तीन शब्द आये है। वर्ण प्राचीन शब्द था। उसके स्थान पर जाति शब्द चलने लगा था, जो इस अर्थ में अपेक्षाकृत नवीन था। कात्यायान और श्रोतसूत्र में जाति का अर्थ केवल परिवार है। एक वर्षा में उत्पन्न हुए व्यक्ति परस्पर स्वर्ण होते थें (6/3/85, समान वर्ण) जाति का एक एक व्यक्ति बन्धु कहलाता था। जात्यंताच्छ बेधुनि (5/4/9) सूत्र का अभिप्रायः यह है कि जातिवादी शब्द से द्दः प्रत्यय लगाकर उस जाति के एक व्यक्ति का बोध किया जाता है, जैसे ब्राह्मण जातीयः, क्षत्रिय जातीय वैश्य जातीयः।
गोत्र का सामान्य अर्थ है एक कुल, एक वंश, एक परिवार, एक खानदान अथवा एक कुनबा, जो कि एक मूल पुरूष से अपना सम्बन्ध मानता है। गोत्र का निर्माण एक वंशसमूह से होता है, दूसरे शब्दों में एक ही पूर्वज की सभी संतानें सम्मिलित की जाएं तो वे एक गोत्र का रूप धारण कर लेती हैं।
गोत्र अष्टाध्यायी का महत्वपर्ण शब्द है। पाणि के अनुसार अपत्यं पौत्र प्रभृति गोत्रम् (4/11/162) यह गोत्र की परिभाषा थी। इस का अर्थ था पौत्र, प्रभृति यद पत्यं तद् गोत्र संज्ञ भवति, अर्थात् एक पुरखा के पोते, पड़पोते आदि जितनी संतान होगी वह गोत्र कही जायेगी। गोत्र-प्रवर्तक मूल पुरुष को वृद्ध, स्थविर या वैश्य भी कहते है।
दिगम्बर जैनाचार्य श्री भद्रवीर सेन स्वामी ने ध्वला टीका में इस प्रकार गोत्र की परिभाषा की है गोत्रं, कुलं वंशः, सन्तानम्, भित्येको अर्थः ।
श्री माल पुराण के अनुसार -
कुल देवी प्रवक्ष्यामि गोत्रे गोत्रे पृथक-पृथक ।
वितृ स्थानादि कर्मादि शाखा सर्व प्रवर्तते ।।
डा० ए०एल० बाशम ने गोत्र का अर्थ गौ समूह बताया है।
पाणिनि व्याकरण के अनुसर गोत्रों और चरणों की भी पृथक जातियां होने लगी थी। भाष्यकार ने जाति की परिभाषा के अर्न्तगत गोत्रों और चरणों को भी गिना है-गोत्रंञच चरणैः सह (4/1/69)
भारतीय सामाजिक जीवन प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था पर आधारित किया गया, किन्तु कालान्तर में वर्ण का स्थान जाति ने ले लिया। आज लोगों के व्यवसाय, उद्योग धन्धो, खान-पान, रहन-सहन, पहनावा, वैवाहिक संबंध, धार्मिक संस्कार रीतिरिवाज आदि सब जाति से ही निश्चित होते जा रहे है। वर्ण और जाति कालान्तर में बिल्कुल अलग-अलग संस्थाएं हो गई है। इस विकास प्रक्रिया में सामाजिक नियन्त्रण को शक्ति के रूप में वर्ण का महत्त्व घटता चला गया तथा जाति का महत्त्व बढ़ता चला गया।
वैश्यों के कर्त्तव्य-
वैश्यों के मुख्य कार्यों के संबन्ध में विभिन्न युगों में स्मृतिकारों ने भिन्न-भिन्न निर्देश दिए है।
गौतम धर्म सूत्र के अनुसार कृषि, वाणिज्य, पशुपालन और कुसीन्द वैश्यों के मुख्य कार्य थे। मनुस्मृति के अनुसार कृषि, पशुपालन रक्षा, दान देना, अध्ययन करना और कुसीन्द वैश्यो के कार्य हैं।
पशुनाम रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च
वनिक पथं कुशीदम च वैश्यश्च कृषिमेव च
श्री बामन पुराण, अध्याय 75, श्लोक 46 में भी बताया गया है -
बज्ञाध्ययन-सम्बन्ना दातारः कृषिकारिणः।
पाशुषाल्यं प्रकुर्वन्तु वैश्या विपणिजीविनः ।।
वैश्य-गण यज्ञाध्ययन से सम्पन्न दाता, कृषिकर्ता तथा वाणिज्य-जीवी हों तथा पशु पालन का कर्म करें।'
महाभारत में कहा गया है कि कृषि, गौरक्षा और वाणिज्य वैश्यों के स्वाभिवक कर्म थे। वैश्यों का मुख्य कार्य था धनोपार्जन करना। वैश्यों धनार्जम कुयार्त।
महाभारत में उल्लेख आया है कि सर्वाधिक धनाढ्य होने के कारण राज्य को सर्वाधिक कर देने वाला वैश्य वर्ग ही था। उपातिष्ठनत कौनतेयं वैश्या इव कर प्रदाः
(2.47.28) 1
कौटिल्य ने भी अध्ययन, भजन, दान, कृषि, पशुपालन और वाणिज्य वैश्यों का कर्म बताया है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार :-
वैश्यस्य अध्ययनं यजनं दानं कृषिपाशुपालाये वाणिज्या च
मनुस्मृति के अनुसार -
यो यत्र तत्र व्यवहारविधासु प्रविशति सः 'वैश्य'
व्यवहार विधाकुशलः जनो वा।
अर्थात जो विविध व्यवहारिक व्यापारों में प्रवष्टि रहता है या विविध व्यवहारिक विधाओं मे
कुशल जन वैश्य होता है।
ब्राह्मण ग्रंथो के अनुसार
एतद् वै वैश्यस्य समृद्धं यत् पशवः (ता० 18/4/6)
तस्मादु बहुषशवैश्व देवो हि जागतो (वैश्यः) (ला० 16/1/10)
पशुषालन से ही वैश्य की समृद्धि होती है। यह वैश्य का कर्त्तव्य है।
तैत्तिरीय संहिता (7/1/4/9) में कहा गया है कि प्रजापति ने वैश्य वर्ण अन्नाकार से उत्पन्न किया है।'
तैत्तिरीय संहिता (7.11.7) के अनुसार इस वर्ग का मुख्य कार्य पशुपालन और अन्नोत्पादन था।
वैश्य वर्ग का तीसरा स्थान था। बंजारा एवं पशुपालन की अवस्था का पार करने के पश्चात् आर्यों ने व्यवस्थित ढंग से कृषि काम अपना लिया। कृषि आर्यों की एक नई विशेषता हो गई। इस व्यवस्था में खेती, पशुपालन एवं व्यापार करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से वैश्य के कंधों पर आ गई। वैश्यों ने अनेक बस्तियों के बीच आर्थिक सम्बन्ध स्थापित किये। धीरे-2 वैश्यों का एक वर्ग किसान हो गया। इस वर्ग का मुख्य काम खेती हो गया। दूसरा वर्ग व्यापारियों का हो गया।
'वैश्य' का प्रधान कर्त्तव्य था पशुपालन कृषि और वाणिज्य। अध्ययन, भजन और दान तो वह करता था। किन्तु बाद में व्यस्तता के कारण अध्ययन का कर्म उस से छूट गया और उसनें अपना पूरा समय कृषि और वाणिज्य में लगाया। इस संबंध में बौधायन का कथन है कि कृषि और वेदाध्ययन परस्पर विरोधी हैं।
वेदकृषि विनाशाय कृषिर्वेद विनाशिनी।
(बौद्ध धर्म सूत्र 1.5.93-94)
प्रायः वैश्य व्यक्ति इन दोनो कर्मों को एक साथ अनुपालित नहीं कर पाता था इस लिए वैश्य वर्ण से अध्ययन छूट गया। उसने अपना पूरा समय अर्थ लाभ के निमित कृषि, पशुपालन वाणिज्य और कुसीद में लगाया।
वैश्यास्याधिकं कृषिवणिक्यालुपात्यंकुसीदम्
(गौतम धर्म सूत्र 10.1.3)'
इस काल के ग्रन्थों में हमें वाणिज्य शब्द मिलता है जिससे पता चलता है कि इस काल में व्यापार बड़े पैमाने पर होने लगा था। व्यापारी व्यापार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाया करते थे। महाजनी प्रथा की चर्चा हमें शतपथ ब्राह्मण में देखने को मिलती है जिसमें सूद पर रूपया देने की बात है। सूदखोर को कुसुदिन कहा गया है।
जैसे जैसे सामाजिक व्यवस्था सुदृढ होती गई, वैसे-वैसे धन-संग्रह का समाज में एक विशेष महत्त्व हो गया और ब्याज के लिए ऋण देना भी एक प्रमुख उधम हो गया। स्वाभावतः यह कार्य भी समाज के इसी वर्ण ने अपनाया, जिस के कारण आगे चलकर समृद्ध वैश्य सेठ या महाजन कहलाने लगे। यही वैश्य समुदाय राजा या जनपद को कर देता था। आपत्तिकाल में जन सामान्य की रक्षा करता था और युद्ध आदि के समय आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन में भी एक प्रमुख स्थान प्राप्त करता था। विभिन्न स्त्रोतों से देश के आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर वैश्य समुदाय के प्रभाव एवं महत्व के प्रमाण मिलते है।
प्राचीन काल में वैश्य वर्ग एक सुसंगठित वर्ग बन गया था, जो कृषि, गोपालन, उधोग एवं वाणिज्य में लगा हुआ था। यही वे व्यवसायी हैं, जो समाज की मूल आवश्यकताओं को पूरा करते हैं तथा उस को समृद्ध और शक्ति प्रदान करते हैं। वैश्य वर्ग अपनी सुरक्षा की आवश्यकता के कारण एक संगठित वर्ग था। इसके सदस्यों को अपने व्यापार के सम्बन्ध में दूर-दूर तक यात्रा करना आवश्यक रहता था। क्षेमेन्द्र ने कथा मंजरी में धन गुप्त नामक वर्णिक का उल्लेख किया है जो ताम्रज्ञिप्ति से समीपवर्ती द्वीपों में जाकर व्यापार किया करता था।' इसलिए वे अपनी सुरक्षा के लिए समुचित व्यवस्था स्वंय करते थे।
जैसा कि स्वाभाविक था धनोपार्जन के कार्य में लगे रहने के कारण यह वर्ग समाज का सबसे समृद्ध वर्ग बनता गया।
वैश्य वर्ण के लिए बौद्ध साहित्य में 'वेस्स' 'गृहपति', 'सेट्टि', 'कुटुम्बिक' आदि शब्द मिलते हैं। बौद्ध युग में वैश्य गृहपति भी कहे जाते थे। 'सेट्टि' अथवा सेठ (बड़े व्यापारी) के साथ-साथ वह बैंकपति और सार्थवाह भी था। सार्थवाह दूरस्थ प्रदेशों की यात्रा करते हुए व्यापार करते थे। काफिलों के साथ वे पश्चिम से पूर्व और पूर्व से पश्चिम की ओर सामग्री के आदान-प्रदान के लिए जाते थे। श्रावस्ती निवासी अनाथर्पिडक नामक श्रेष्ठि अपनी व्यापारिक सामग्री के साथ राजगृह आता जाता था। अमरकोश 378 में पान्थानं वहति सार्थवाह; उल्लेखित है।
बौद्ध युग में ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं, जिससे ज्ञात होता है कि उस काल में इस वर्ग ने अपनी समृद्धि और दान प्रियता के कारण समाज में अपना विशेष महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था।
महा वग्ग में एक श्रेष्ठी का वर्णन आया है जिसने अपने धन से राजा और व्यापारी निगमों का भला किया था। (8.1.16) जातक में अनेक ऐसे व्यापारियों का वर्णन आया है जिन्होने भिक्षु संघ को, राज्य को, समाज को करोड़ों रूपये का दान प्रदान किया था। मगध निवासी के एक सेठ ने भिक्षु संघ को अस्सी करोड़ कार्षापण का दान दिया था। भृंगार श्रेष्ठी की कन्या विशाखा ने श्रावस्ती में नौ करोड की लागत से बुद्ध के लिए चैत्यालय स्थापित किया था।'
गुप्त युग में स्थान-स्थान पर इन के दान देने की प्रवृति का उल्लेख हुआ है। गुप्त अभिलेखों के अनुसार वैश्य सदा से दानी, सदाव्रती, कर्म निष्ठ रहे। गुप्त राज्यों की रहन सहन अत्यन्त सीधी एवं सात्विक थी। फाह्यान ने लिखा है कि सारे देश में कोई अधिवासी हिंसा नहीं करता था। सम्पूर्ण भारतवासी साधारण जीवन में दाल, चावल, रोटी, दूध, घी, शक्कर आदि का प्रयोग करते थे। इनकी प्रवृति परलोकोन्मुखी अधिक थी। राज्य के निवासी भ्रष्टाचार, पाप-पुण्य से डरते थे। यह आख्यान वैश्यों की उस प्राचीन परम्परा की ओर संकेत करता है, जहां वे कर्म काण्डी होते हुए भी अहिंसा की ओर झुके थे। उसने आगे लिखा है कि 'जनपद के वैश्यों के मुखिया ने नगर में सदावर्त तथा औषधालय स्थापित किया था। फाह्यान ने सेठ सुदत्त द्वारा निर्मित विहार देखा था।"
नए नए व्यापारियों ने सुविधा एवं सुरक्षा दृष्टि से संगठित होकर रहना पसंद किया। इन लोगों का संगठन लगता है श्रेष्ठी अर्थात् प्रधान या मुख्य शब्द श्रेष्ठी से बना है। बाद के वैदिक ग्रंथ ऐतेरेय ब्राह्मण में श्रेष्ठी शब्द की चर्चा की गई है। यह शब्द शायद किसी व्यापारियों के संघ के प्रधान या श्रेष्ठ के लिए किया गया है।
गुप्त युग में उन्हें श्रेष्ठि, वाणिक सार्थवाह आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता था।
कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेख में कोटि वर्ष (उत्तरी बंगाल) के सार्थवाह बंधुमित्र का नाम मिलता है। तथा बंधुगुप्त के दामोदर पुर ताम्रपत्र में सार्थवाह बसुमित्र का नामोल्लेख है।
चाहमान लेखों में इन्हें वाणजारक बनजारा कहा गया है। समस्त वण्जारेषु वृषभभरित जतु पाइलाल गमने, (ए० इ० भाग 11 पृ० 43) अपनी समृद्धि और सामाजिक उपयोगिता के कारण जहां भौतिक दृष्टि से इस समुदाय ने बहुत उन्नति की, वहां एक दृष्टि से इस को क्षति भी उठानी पड़ी।
गुप्त सम्राट और स्वयं सम्राट हर्ष वैश्य था, उसने दान देने की अनोखी परम्परा कायम की। प्रति बारह वर्ष पर प्रयाग में एक धार्मिक मेला लगता था जहां सम्प्रट अपना सब कुछ दान कर खाली हाथों राजधानी वापस लौटता था। उनके व्यवसाय से राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती थी। अतः समाज में उनका आदर अधिक था। हवेनसांग ने भी लिखा है कि तीसरा वर्ण वैश्यों या व्यापारियों का था जो पदार्थों का विनियमन कर लाभान्वित होते रहे। (वाटर हवेनसांग भाग-1 पृ०68) वैश्य पूर्णतः एक ठोस जाति थी, जिस ने अपने व्यावसायिक कार्यों के कारण अपनी बिरादरी का नाम ऊँचा उठा लिया था। आचार्य भगवान देव ने अपनी पुस्तक हरयाणे के वीर यौधये में वैश्य वर्ण का धर्म बताया है।'
तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः ।
अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्ष फलदा हिते ।।
यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवे मुस्तथापरे।
वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा ।
अग्नि होत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ।। 54
वाणिज्यं सत्यथस्थानमातिच्यं प्रशमो दभः।
विप्राणं स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः 55
वैश्य जाति में उप जातियों का विकास
धर्म शास्त्र युग में जाति व्यवस्था का रूप और स्पष्ट कर दिया। इसका प्रारम्भ तीसरी शताब्दी से हुआ और धर्म का महत्व अधिक बढ़ जाने से ब्राह्मण ईश्वर और मनुष्य के बीच प्रतिनिधि माने जाने लगे। जाति के नियम कठोर बनाए गए तथा उनका तनिक भी उल्लंघन व्यक्ति को जाति-च्युत बना देता था। फलस्वरूप उपजातियों का निर्माण होना प्रारम्भ हो गया।
विभिन्न वर्ण धीरे-धीरे उपसमुदायों में विभक्त होने लगे। आरम्भ के चार वर्णों में से एक प्रकार के श्रम-विभाजन की व्यवस्था की गई थी। अब प्रत्येक वर्ण में श्रम-विभाजन की प्रक्रिया और आगे बढ़ी तथा एक वर्ण के अन्तर्गत आने वाले छोटे-छोटे समुदाय पृथक-पृथक उधमों में स्थायी रूप से लग गए। यह स्वाभाविक था कि जब कोई परिवार या समुदाय किसी विशेष उधोग में निपुणता प्राप्त कर ले और उस व्यापार या उधोग को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने की सारी व्यवस्था संगठित कर ले तो उस परिवार की आने वाली पीढ़ी भी उसी विशेष उधम में लगे। इस प्रकार विभिन्न उधम पुश्तैनी बन गए और जाति का आधार कर्म न होकर जन्म बन गया, जो कालान्तर में विभिन्न उपजातियों में पुनः विभाजित हो गया।'
जिन तत्वों ने वर्णों को विभिन्न जातियों में विभाजित कर दिया था, उन्हीं तत्वों ने आगे चलकर जातियों को उपजातियों में भी बांट दिया और वैवाहिक सम्बन्धों, खान-पान, छुआछूत आदि के सम्बन्ध में जो कट्टरता तथा निषेधात्मक प्रतिबन्ध जाति में थे, वही उपजातियों में भी आ गए। जातियों का उपजातियों में विभिक्त होते रहने का क्रम अत्यन्त प्राचीन है, किन्तु विद्वानों का यह मत है कि दसवीं शताब्दी के बाद से भारतीय समाज में जो राजनैतिक परिवर्तन हुए, और जिनके फलस्वरूप भारतीय धर्म और संस्कृति के लिए एक महान संकट उत्पन्न हो गया, उस का सामना करने के लिए और भारतीय धर्म और संस्कृ ति की रक्षा करने के लिए जातियां और भी सुदृढ़ बनती चली गई तथा इनको धार्मिक आधार प्रदान करके भारत ने अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा की।
उप जातियों का उद्भव मूलतः व्यावसायिक कारणों से हुआ किन्तु कालान्तर में इन उपजातियों का निर्माण दूसरे तत्वों ने भी किया। यही कारण है कि आज भारत में असंख्य जातियां पाई जाती हैं। उपजातियां कुछ तो कौटुम्बिक नामों से, कुछ व्यापारिक नामों से, कुछ शहर के नामों से, कुछ पेशों के नाम से और कुछ पदों के नाम के अनुसार बनती गई।'
व्यापारियों के लिए वणिक (3/3/52) और वाणिज (6/2/13) ये दोनो शब्द प्रयुक्त होते थे। व्यापारियों के नाम कई कारणों से पडते थे, उनके व्यापार की विशेषता से, व्यापार की वस्तुओं से, पूंजी के आधार पर अथवा वे जिन देशों में वाणिज्य करते हो उनके नाम से।
पणिनी ने एक विशेष प्रकार के व्यापारी को सांस्थानिक कहा है। (4/4/72 संस्थाने व्यवहरीत) संस्थान का अर्थ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। प्राचीन भारत में आर्थिक जीवन की तीन मुख्य संस्थाएं थी। शिल्पियों के संगठन को श्रेणी, व्यापारियों के संगठन को निगम (3/3/119, निगच्छन्तीति निगमः) और एक साथ माल लाद कर वाणिज्य करने वाले व्यापारियों को सार्थवाह कहते थे। व्यापारी वस्तुओं के नाम से भी प्रसिद्ध हो जाते थे, जैसे अश्ववणिजः, गोवणिजः (6/2/13) इसी प्रकार उन देशों के नाम से जिनके साथ वे प्रायः व्यापार करते थे, व्यापारियों का नाम पड़ा (गन्तव्य पव्यं वाणिजे 6/2/13) जैसे काश्मीर वाणिज, मद्र वाणिज, गान्धरि वाणिज (मद्रादिषु गत्वा व्यवहरान्तीत्यर्थः)
भारत के उत्तरी भाग में विदेशियों का दबाब जब अधिक होने लगा तब वहां से लोगों ने हटना प्रारम्भ किया, और यही जन यत्र-तत्र जा कर बसे, वहीं अपने देश व जनपद का नाम लेते गए। कालान्तर में जिनके नाम पर वे उप जातियों के रूप में प्रसिद्ध हुए, आचार-विचार में उनकी संस्कृति देश काल के अनुसार बदलती गईं, पर मूल देश का नाम वही रहा, यहीं से उपजातियों का इतिहास प्रारम्भ हुआ।
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