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Friday, April 24, 2026

HISTORY OF SONWAL SIHARE VAISHYA - सोनवाल (सिहारे) वैश्य जाति का इतिहास

HISTORY OF SONWAL SIHARE VAISHYA - सोनवाल (सिहारे) वैश्य जाति का इतिहास

सोनवाल (सिहारे) वैश्यों के मध्य भारत, बुन्देलखण्ड में मात्र 10000-12000 परिवारों को ही जानकारी प्राप्त हो सकी है। यह अपने नाम के आगे सिहारे, गुप्ता, सोहारे या सिहारे लिखते हैं।

सीनवाल (सिहारे) वैश्य मूलतः गुजरात के सौराष्ट्र से आये हुये शाह गुजराती वैश्य हैं। सौराष्ट्र में सोमनाथ के मन्दिर पर जब मुसलमानों का आक्रमण हुआ था, तब मुसलमानों ने वहां के निवासियों को धर्मानतरण के लिये बाध्य किया. इस जाति ने धर्मान्तरण न करने के बजाय वहां से पलायन करना उचित समझा और गुजरात से कुछ लोग राजस्थान की और चले गये।

कुछ लोग राजस्थान से भी व्यापार की तलाश में मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग में आकर बस गये। गुजरात में सोमनाथ के मन्दिर को हारने के कारण यह जाति अपने आपको सोनवाल या सोमवाल लिखने लगी। शिवजी को हारने के कारण सोहारे या सिहारे कहलाये। जिस प्रकार अग्रोहा से निकास के कारण अग्रवाल, खण्डेला से निकास के कारण खण्डेलवाल और ओसा से निकास के कारण ओसवाल वैश्यों के नाम पड़े हैं, उसी प्रकार

सोमनाथ या सौराष्ट्र से निकास के कारण सोमवाल, सोनवाल, गुप्ता तथा सुहारे या सिहारे नाम से यह जाति जानी जाती है। 'कर्नल टॉड' ने अपनी खोज में राजस्थान के इतिहास में लिखा है कि यह जाति सोलंकियों के अन्तर्गत आती है और सौरा छत्रिय जाति से ही सौरहारा बना है अर्थात् इस सौर जाति के नाम से सही सौराष्ट्र देश कहलाता था, जिसको पुराणों आदि में सौराष्ट्र देश लिखा है, जिसका अर्थ होता है, सौर जाति का राज्य और सौर जाति का इतिहास।

इस जाति का सम्बंध सौराष्ट्र देश और सोमनाथ से बहुत मिलता है. उस देश में गुप्त वंश का राज्य भी बहुत काल तक रहा है और गुप्त वश के महाराजा महासेन बड़े प्रतापी राजा हुये हैं. इसी कारण यह जाति अपने नाम के आगे गुप्त भी लिखती है। पं. उदयराज लिखित सोहारे वंश दर्पण एक पुस्तक मिली है. जिसमें इस वंश को (सिहारे, सोहारे) चंद्रवंशी क्षत्रिय लिखा है और क्षत्रिय राजा महासेन को इस जाति का आदि पुरूष माना है। जिस प्रकार अग्रवालों की उत्पत्ति महाराजा अग्रसेन से हुई और कालान्तर में वे वैश्य कहलाने लगे, इसी प्रकार सोनवाल (सिहारे) जाति के लोग व्यापार एवं व्यवसाय व खेती करने के कारण वैश्य कहलाने लगे। सोनवाल (सिहारे) वैश्यों के गोत्र निम्न मिलते हैं:

1. मुनगल, 2. शाक्य, 3. भोज, 4. वत्स्य, 5. बज्रसेन, 6. सिंघी

सोनवाल (सिहारे) वैश्य जाति के अल्ल

निम्न मिलते हैं, जो निकास स्थान एवं ग्राम के आधार पर बने हैं:

1. राहू या रहु. 2. अजमेरिया, 3. माहौर, 4. मॉकर 5. बरदिया, 6. पहाड़िया, 7. निहोनिया, 8. सिहोनिया, 9. मोहनियां, 10. विसुरिया, 11. बकेवरिया, 12. बुधिया, 1.3. गोड़िया, 14. पर्वया, 15. सोंजेले. 16. बड़कुल, 17. खरे, 18. गुरेले 19. महिपतेले, 20. नरवरिया, 21. भदौरिया, 22. सरसे, 23. अलापुरिया।

समयानुसार इनके लिखने में अक्षर, मात्राओं आदि में परिवर्तन होता रहा है। उक्त गोत्रों व अल्लों में कुछ स्थान परक हैं, जैसे अलापुर से निकास के कारण अलापुरिया, नरवरिया आदि। सोनवाल (सिहारे) वैश्य पूर्णतः शुद्ध शाकाहारी हैं। शिव उपासक होने के कारण इस जाति के कुलदेव शिव एवं कुलदेवी महालक्ष्मी है।

जहां-जहां इस जाति के लोग रहे हैं. वहां-वहां इन लोगों ने शिवजी के मन्दिर बनवाये हैं। जो आज भी उपलब्ध है, जैसे क्रुतवार (मुरैना) का प्रसिद्ध शिव मन्दिर, चन्देरी, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश), कैंचोदा, सेमरी, धमनिका, सिमियार, बानपुर (उत्तर प्रदेश), चांदपुर, लॉच, जीरा, अलापुर, बाड़ी (राजस्थान) आदि। सोनवाल (सिहारे) वैश्य समाज की कम जनसंख्या होने के कारण इस जाति के वैवाहिक सम्बंध माहौर, महावर, माथुर, ओमर, माहेश्वरी, जैन, अग्रवाल आदि वैश्यों में भी होने लगे हैं।

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