MAHARAJA AGRASEN LIFE CYCLE AND HISTORY
महाराजा अग्रसेन का संक्षिप्त प्रमाणिक जीवन चरित्र
जेमिनी ऋषि ने कहा हरियाणा प्रांत में सरस्वती, इषदवती और घग्घर नदी के संगम पर एक छोटा सा प्रताप नगर का राज्य था जिसके राजा का नाम बल्लभसेन था। बल्लभ सेन की महारानी का नाम भगवती देवी था। बल्लभसेन के पिता का नाम वृहतसेन था जिनका उल्लेख महाभारत में आया है। प्रताप नगर 20 गांवों का एक छोटा सा राज्य था। बल्लभसेन के छोटे भाई का नाम कुंदसेन था। केशी उनके सेनापति का नाम था। दुर्भाग्य से बल्लभसेन के कोई पुत्र न था। छोटे भाई कुंदसेन का पुत्र एक वर्ष का हो चुका था। प्रजा ने श्री वल्लभ से दूसरा विवाह करने का आग्रह किया किंतु सूर्यवंशी क्षत्रिय एक पत्नीधारी होते हैं। ऐसा निश्चय सुनाते हुए राजा वल्लभ ने दूसरे विवाह से इन्कार कर दिया। कुंदसेन को भाई के इस विचार से बड़ी खुशी हुई कि निकट भविष्य में उसका ही पुत्र राजा बनेगा। परंतु विधाता को कुछ और मंजूर था। राजा वल्लभ और विदर्भ की कन्या भगवती देवी ने मिलकर शिवजी की आराधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम्हारे दो पुत्र होंगे। कालांतर में अग्रसेन जी का जन्म हुआ।
मासेसश्वयुजेमाघे शुक्ले मध्य दिवसे शुभम्।
आदित्यवासरे महेन्द्रसमये उत्पन्नो बहु भाग्यवान ।।
नक्षत्रेऽश्वनी मेषति लग्ने गुरू पुष्ययागे परम् ।।
वुधानुराधा शनिरोहणीश्च कुजरेवतिश्च ।।
श्रुतस्य शस्त्र शास्त्रे च परेषम जीवं चेतिस।
धाता गमनार्थ विच्चकार नाम्ना अग्र सम्भवम् ।। (अग्रसेन उपाख्यान)
अर्थात - आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि के दिन बारह बजे महेन्द्रकाल में राजा वल्लभ के घर महाराजा अग्रसेन का जन्म हुआ। महेन्द्रकाल के विषय में कहा जाता है कि इस काल में जन्मा बालक बहुत भाग्यवान शस्त्र शास्त्र में निपुण, धन धान्य, दैविक शक्ति से आपूर रहता है। अग्रसेन जी के जन्म पर प्रताप नगर में अपार खुशियां मनाई गई। प्रजा खुशी से उन्मुक्त हो नाचने, गाने, धूम मचा-मचा कर अपनी खुशियां प्रकट करने लगी। लेकिन अग्रसेन जी के चाचा कुंदसेन और उनके पुत्रों को यह खुशियां जरा भी रास न आई। उनके राज्यारोहण का सपना धराशायी हो चुका था। अग्रसेन जी धीरे-धीरे बड़े होने लगे। बाल सुलभ लीला से आगे बढ़कर गुरू के आश्रम जाने की तैयारी होने लगी। उनकी शिक्षा उज्जैन में आगर नगर में संदीपन ऋषि के आश्रम के पास तांडव्य ऋषि के आश्रम में सम्पन्न हुई। चौदह वर्ष की अल्पायु में वह गुरु के गृह से शस्त्र-अस्त्र में दीक्षित होकर वापस आ गए। वह तांडव्य ऋषि के आश्रम में थे तभी छोटे भाई शूरसेन का जन्म हुआ। कुंदसेन व उसका बेटा महात्वाकांक्षी और ऐय्याश प्रकृति के थे। किंतु अग्रसेन जी के शील और सद्आचरण की सभी प्रशंसा करते थे।
एक दिन राज दरबार लगा हुआ था कि पांडवों की तरफ से युद्ध का निमंत्रण लेकर एक दूत का आगमन हुआ। राजा बल्लभ ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया और पांडवों की तरफ से युद्ध में लड़ने के लिए गए। पिता की रक्षा के लिए अग्रसेन जी भी उनके साथ गए। प्रतापनगर का राज्य कुंदसेन और उनके पुत्र को समर्पित कर गए।
युद्ध में नौ दिन के बाद वल्लभसेन शहीद हो गए। अग्रसेन व्याकुल होकर पागलों की तरह विलाप करने लगे तभी श्रीकृष्ण ने उन्हें सांत्वना देते हुए संसार की असारता का पाठ पढ़ाया। अग्रसेन जी ने महाभारत में पूरे अठारह दिन तक पांडवों का साथ दिया। अंत में युद्ध समाप्ती पर पांडवों ने उन्हें आशीर्वाद, धन धान्य देकर विदा किया।
प्रतापपुर में वापस आते ही अग्रसेन को माँ के करुणा विलाप तथा चाचा कुंदसेन के षडयंत्रो का सामना करना पड़ा। केशी सेनापति की सहायता से वह अपने ही महल में बंदी बना लिए गए। असहाय दुःखी परिस्थितियों से भ्रमित अग्रसेन जी अपने ही महल में फूट-फूट कर रो पड़े और ईश्वर से सहायता मांगने लगे। राजा वल्लभ का प्राचीन पदाधिकारी सुमंत अग्रसेन जी के प्रति बहुत ही वफादार था। उसने अपनी जान पर खेलकर अग्रसेन की रक्षा की और उन्हें कैद से छुटकारा दिलाते हुए स्वंय को उनके ऊपर न्यौछावर कर दिया।
अग्रसेन जी. भागकर इष्दवती नदी के इस पार महर्षि गर्ग मुनि के आश्रम में आए। यही उनकी शरण स्थली बनी। गर्ग मुनि ने उन्हें बहुत सांत्वना प्रदान की और महालक्ष्मी की आराधना करने का उपदेश दिया। अग्रसेन जी ने महालक्ष्मी की आराधना की। दीपावली के दिन ही महालक्ष्मी प्रकट हुई और उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारे कुल में मैं सदा प्रतिष्ठित रहूंगी। साथ ही महालक्ष्मी ने आदेश दिया कि जिस भूमि पर तुमने तपस्या की है उसी धरती के अंदर अपार धन छिपा है। राजा मरूत ने सौ अश्वमेघ यज्ञ किए थे। उससे बचा हुआ सोना सब धरती पर गाड़ दिया है। धरती के धन का अधिकारी राजा ही होता है अतः तुम संकोच न करो इस धन को स्वीकार करो और इसी बीहड़ में एक नए राज्य की स्थापना करो।
गर्ग मुनि के शिष्यों की सहायता से अग्रसेन ने अग्रोहा की धरती से अपार धन शक्ति प्राप्त की वहां के बीहड़ काटे और एक नए नगर की स्थापना की। इस नवीन नगर का नाम अग्र नगर रखा गया। यह नगर सब भांति सम्पन्न था। वहां बड़े-बड़े महलों की पंक्तियां खड़ी की गई। टेढ़ी-मेढ़ी गलियां, चौबारों सड़कों, चौराहों से उसे समृद्ध किया गया। मंदिर, तालाब बावड़ी आदि बनवाई गई तरह-तरह के पक्षी, शुक, मयूर, हंस, कोकिल आदि आकर उस नगरी में आनंद की ध्वनि बिखरने लगे।
महालक्ष्मी का वरदान
तब वंशे मही सर्वा पूरिता च भविष्यति,
तव वंशे जातिपर्णे कुल नेता भविष्यति ।
अद्यारम्य कुले तव नाम्नां प्रसिद्धयति,
अग्रवंशियां हि प्रजाः प्रसिद्धाः भुवनत्रये ।
भुजा प्रसादं तव वसेत् नान्यस्में प्रतिदापयेत,
येन सा सफला सिद्धिभूर्यात् तव युगे युगे।
मम पूजा कुले यस्य सोग्रवंशो भविष्यति ।। (अग्रवंश वैश्यानुकीर्तनम् ).
फल फूल वाले वृक्षों से नगर की शोभा इंद्रपुरी को भी मात करने लगी। नगर स्थापना से फुर्सत पाकर अग्रसेन ने अपनी राज्य शक्ति बढ़ाने की ओर ध्यान दिया। तभी गर्ग मुनि ने उन्हें नागकन्या के स्वयंवर की बात बताई और कहा कि तुम जाकर महीधर की कन्या से विवाह करो। नागराजा से संबंध करके तम्हारी शक्ति अपार हो जाएगी।
गर्ग मुनि से आदेश पाकर अग्रसेन असम की तरफ बढ़े। मार्ग में अनेक कठिनाइयां आई पर सबका समाधान करते हुए अंत में मणिपुर पहुंच गए। यहां बहुत वाद-विवाद, कशमकश के बाद उनका विवाह नागराजा की कन्या माधवी से निर्विन्ध सम्पन्न हो गया। आर्य सभ्यता और शैव सभ्यता का मिलाप हुआ। महीधर ने विवाह की खुशी में अग्रसेन के नाम का एक नगर बसाया जिसका नाम 'अगरतला' रखा वह आज भी असम की राजधानी है।
माधवी से विवाह होने के पश्चात अग्रसेन ने अपनी राज्य शक्ति का विस्तार किया। अठारह गणराज्यों में अपने राज्य का विस्तार किया। उनके नाम क्रमशः हिसार, हॉसी, तोसाम, सिरसा, नारनौल, रोहतक, पानीपत, दिल्ली, जींद, कैथल, मेरठ, सहारनपुर, जगाधरी नाभा, अमृतसर, अलवर, उदयपुर आदि थे। आज भी इन राज्यों में अग्रवाल अधिकाधिक संख्या में पाए जाते हैं। उन्होंने राज्य के नागरिकों में परस्पर समन्वय वाद की भावना का विकास किया। अपनी अलौकिक सूझ-बूझ से ही उन्होंने आग्रेय गणराज्य को एक ऐसे शक्तिशाली राज्य के रूप में प्रतिष्ठित किया जिसे सम्पूर्ण देश में क्षत्रियों जैसी प्रतिष्ठा मिली तथा सभी देश राजाओं ने अग्रसेन की कर्मठता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें अपने समकक्ष आदर सम्मान दिया।
विवाह एवं वंशबेलि
अग्रवंश वैश्यानुकीर्तनम के अनुसार महाराजा अग्रसेन के अठारह विवाह हुए वहां उनकी रानियों के नाम भी दिए गए हैं। किंतु अग्रसेन उपाख्यान में केवल एक ही रानी माधवी का वर्णन हैं और उनके अठारह पुत्र हुए ऐसा उल्लेख है। अग्रसेन उपाख्यान के अनुसार राजा अग्र के अठारह पुत्रों के विवाह भी नागवंशों में ही हुए हैं। इन सभी पुत्रों के वंश सोलह पीढ़ी तक अग्रोहा पर राज्य करते रहे। उसके बाद भी ग्यारहवीं सदी तक अग्रवाल लोग अपनी भूमि पर बने रहे। मोहम्मद गोरी के आक्रमण के बाद यह राज्य सदा-सदा के लिए अतीत के गर्भ में विलीन हो गया।
महाराजा अग्रसेन ने 108 वर्ष तक राज्य किया, तत्पश्चात अपने पुत्र विभू को राज्य सौंप वन में चले गये।
अग्रसेन जी की अठारह रानियों के नाम जो अग्रवंश वैश्यानुकीर्तनम् में है वह इस प्रकार हैं- माधवी, सुंदरावती, मित्रा, चित्रा, शुभा, शीला, शिखा, शांता, रजा, चरा, शची, सखी, रंभा, भवानी, सरसा, रती, रूची और समा थे।
अन्य पुत्रों के नाम विभू, विरोचन, वाणी, पावक, अनिल, केशव, विशाल, रत्न, धन्वी, धामा, पामा, पयोनिधि, कुमार, पवन, माली, मंदोकत, कुंडल, कुश, विकास, विरण, विनोद, वपुन, वली, वीश, हर, रव, दंती, दाड़ियोदंत, सुंदर कर, खार, गर, शुभ, फ्लश, अनिल, सुंदर, घर प्रखर, मल्लीनाथ, नंद, कुंद, कुलुम्बक, कांति, शांति, क्षमाशाली, पसयामाली और विलासद तथ अन्य दो कुमार थे।
उनकी पुत्रियों के नाम दया, शांति, कला, कांति, नितिक्षा, अधरा, अमला, शिका, मही, रमा, रामा, पायिनी, जलदा, शिवा, अमृता और आर्जिका आदि प्रसिद्ध हैं। ये सारी संताने राजा अग्र की संताने कही गई। अग्रसेन ने गौड़ को अपना पुरोहित बनाया। उनका पुरोहित वेद विद्या और बुद्धि में पारंगत था। उसने अपनी शक्ति से राजा अग्रसेन के राज्य में वृद्धि और कीर्ति की पताका फहराई। आज भी अग्रवाल गौड़ को ही अपना पुरोहित मानते हैं।
क्षत्रिय से वैश्य वर्ण स्वीकार करना
राज्य को सुगठित करने के बाद अग्रसेन ने प्रजा के विकास के लिए अठारह प्रकार के यज्ञ करने का संकल्प लिया। उनके समय में यज्ञ ही राज्य की प्रतिष्ठा का मापदंड माना जाता था। उस समय अठारह प्रकार के यज्ञों का चलन था। उन्होंने अठारह यज्ञ कर संपूर्ण देश में अपनी ख्याति एवं कर्मठता का अद्भुत उद्धरण प्रस्तुत किया। लेकिन इन यज्ञों में होने वाली पशु बलि तथा हिंसा से उनके हृदय में करुणा अत्पन्न हुई और अठारहवां यज्ञ उन्होंने हिंसा रहित किया। ब्राह्मणों ने इसका घोर विरोध किया और कहा कि यदि आप यज्ञों में पशु बलि बंद कर देंगे तो आपको क्षत्रिय वर्ण से वैश्य वर्ण स्वीकार करना पड़ेगा। राज अग्रसेन ने कहा - हे ब्राह्मण देव आपका हर दंड मुझे शिरोधार्य है पर निरीह पशुओं की बलि देकर अपनी प्रतिष्ठा की स्थापना मुझे स्वीकार नहीं है। दूसरों की जान लेकर बनाई गई कीर्ति अधिक टिकाऊ नहीं होती। यज्ञ भले ही अच्छे हो पर इनमें दी जाने वाली निरीह पशुओं की बलि ठीक नहीं हो सकती। राजा के इस परिवर्तन को लक्ष्यकर ब्राह्मणों ने उन्हें दंड स्वरूप क्षत्रिय से वैश्य वर्ण घोषित कर दिया और अठारहवां यज्ञ बिना किसी बलि के पूर्ण किया गया। इस अंतिम यज्ञ के साथ ही अग्रसेन के स्वभाव में एक अद्भुत परिवर्तन का समावेश हो गया। उन्होंने संपूर्ण राज्य में शाकाहारी भोजन एवम् नियम से रहन-सहन का कानून बनाया। इस तरह संपूर्ण अग्रवाल जाति में अहिंसा, शाकाहारी सादे भोजन का प्रचार, प्रसार कर अग्रसेन ने प्रजा में सदाचार की भावना का बीजारोपण किया।
गोत्र स्थापना
राज्य स्थापना यज्ञ आदि से निवृत्त होकर अग्रसेन जी ने वैश्यवंश की उत्कृष्टता कायम करने के लिए गोत्रों की स्थापना पर बल दिया। राजा के अठारह गणराज्यों के प्रतिनिधियों को एक-एक गोत्र देकर उन्होंने राज्य के मुखिया को अपने वंश का गौरव प्रदान किया। परंपरा से चले आए विवाहित नियमों को उन्होंने अनुशासन में बांधकर वैश्य वर्ण को अठारह गोत्रों में ही विवाह करने का नियम बनाया
इसके अतिरिक्त अन्य जातियों में होने वाले शादी-विवाह के संबंधों को वर्जित कर दिया। उन्होंने कहा प्रत्येक गोत्रधारी अपना गोत्र छोड़कर अन्य सत्रह गोत्रों में ही विवाह करेगा। इससे अन्यत्र नहीं। उस समय विवाह में बंधन नहीं था। परस्पर निकट के संबंधों में भी विवाह हो जाते थे जो कालान्तर में आपसी फूट का कारण बनते थे। अग्रसेन जी ने गोत्र द्वारा विवाह की नई परंपरा स्थापित कर समाज में वंशोत्पति का ऐसा सशक्त सूत्र दिया जिससे अग्रवाल जाति आज भी बुद्धि, बल, कौशल से आपूर चहुंमुखी समृद्धि का प्रतीक बनी हुई है। यह गोत्र परंपरा का ही प्रभाव था कि राज्य में अच्छी बुद्धिवादी प्रवृत्तियों की वृद्धि हुई और 5000 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी अग्रवाल जाति सारे देश में अपने उदार वृत्ति, समन्वयवाद, धार्मिक परंपरावादी संस्कृति की रक्षक बनी हुई है। अठारह गोत्र अठारह यज्ञों के पुरोहित ऋषियों के नाम पर दिए गए। उनके नाम हैं-गर्ग, गोभिल, गवाल, वात्सल, कांसल, सिंहल, मंगल, महल, तिंगल, ऐरन, टेरन, टिंगल, वित्तल, मित्तल, तन्दुल, तॉयल, गोईल और गवन उपर्युक्त गोत्र नाम अग्रवालों की उत्पत्ति से उद्वत हैं। अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने 1974-75 में गोत्रों के नामों में सुधार करके प्रामणिक रूप से 18 गोत्रों के नाम इस प्रकार दिये हैं-
गर्ग, गोयल, गोयन, बंसल, कंसल, सिंहल, मंगल, जिंदल, तिंगल, ऐरण, धारण, मधुकुल, बिन्दल, मित्तल, तॉयल, मंदल, नागल, कुच्छल ।
समतावादी शासन तंत्र
अग्रसेन जी ने अपनी सूझ-बूझ, अपने बल कौशल से एक ऐसे साम्राज्य का निर्माण किया, जिसका आधार समाजवाद, मानवता तथा अहिंसा पर निर्भर था। उनके साम्राज्य का विस्तार राजनीति धर्म और समाजवाद के समन्वय से पूर्ण इतना व्यवहारिक था कि तत्कालीन, प्राचीन, अर्वाचीन, दार्शनिक तथा बड़े-बड़े समाजवाद के व्याख्याता भी उस तरह का दर्शन आज तक नहीं दे पाए हैं।
उन्होंने अपने राज्य के नागरिकों में परस्पर समता व ममता का आधार स्थायी तौर पर स्थापित करने के लिए अत्यंत सरल सा नियम बनाया, जिसके व्यवहारिक पक्ष की सफलता ने ही उन्हें महान तथा आदर्श राजाओं की श्रेणी में विद्यमान किया। उनके राज्य का नियम था कि राज्य में कोई भी परिवार चाहे किसी वर्ण, किसी कुल का हो, यदि वह राज्य में बसना चाहता है तो राज्य में बसने वाले अन्य परिवार उसको एक रुपया, एक ईंट भेंट करेंगे। इस तरह यदि एक लाख परिवार उस राज्य में बसते थे तो आंगतुक परिवार 24 घंटे में ही उन परिवारों के समकक्ष बन जाता था। उसका मकान तथा व्यापार स्थापित होने में केवल 24 घंटे का समय पर्याप्त होता था। समाजवाद और मानवता का इससे बड़ा सिद्धान्त व्यवहार में कुछ हो ही नहीं सकता था।
उनके राज्य के ये नियम केवल कागजों तक सीमित नहीं थे, वह अत्यंत सरल एवं व्यावहारिक होने के कारण जन-सामान्य के लिये जीवन का एक अंग ही बन गए थे। क्योंकि देना और लेना दोनों ही राज्य का नियम था अतः देने वाले के मन में न अंह का भाव आता था और न लेने वाले के मन में कृतज्ञता का भाव आता था। परोपकार की भावना, परस्पर भाईचारे की भावना ही इस नियम का द्वढ़ आधार थी। भ्रष्टचार तथा स्वार्थ का उनके शासन में नामर्मोनिशान नहीं था, कृषि गोरक्षा, व्यवसाय पर ही सम्पूर्ण जन-जीवन आधारित था।
धार्मिक उत्थान
महांराजा अग्रसेन ने अपने शासन काल में अद्भुत क्रांतिकारी परिवर्तन किए। धर्म के क्षेत्र में उन्होंने यज्ञों को तो मान्यता दी, किन्तु बलि की प्रथा का उन्होंने समूल उच्छेद कर दिया। इसके लिए उन्हें तत्कालीन ब्राह्मण वर्ण का कठिन विरोध झेलना पड़ा किन्तु वह अपने निश्चय पर अडिग रहे। अंत में उनकी ही जीत हुई। कालांतर में सभी यज्ञ हिंसा रहित हो गए। धर्म में अहिंसा का पालन करवा कर सम्पूर्ण जाति को उन्होंने सात्विक वृत्ति से आपूर कर एक नया मानवतावादी पाठ पढ़ाया जहां मांसाहार, अनाचार का निषेध था। जहां पशु, पक्षियों तक को राजकीय सुरक्षा प्राप्त थी।
राजकीय उत्थान
राज्य की सुरक्षा के लिए उन्होंने अति-प्राचीन परम्परागत नियमों की अवहेलना कर एक नया नियम बनाया। प्रत्येक गृहपति, बालक, वृद्ध युवती शस्त्र धारण करें और अपनी रक्षा स्वयं करें। प्राचीन नियमों के अनुसार तो केवल क्षत्रिय ही शस्त्र धारण करते थे, वहीं युद्ध में जाने के अधिकारी थे। इस नियम से देश की तीन चौथाई जनता एकदम अकर्मण्य हो गई थी। यदि कोई शत्रु आक्रमण करता तो केवल क्षत्रिय लड़ाई पर जाते थे बाकी प्रजा हाथ पर हाथ धरे बैठी रह जाती थी। राजा की जय-पराजय पर ही उसका भविष्य निर्भर रहता था। महाराजा अग्रसेन ने इस कुलघातक नियम का घोर विरोध किया। उनके राज्य में शस्त्र चलाना अनिवार्य हो गया। प्रत्येक नागरिक को शस्त्र धारण करना आवश्यक था, अधिकार था, चाहे वे किसी भी वर्ण का हो। यही कारण था कि अग्रवाल जाति विदेशी शत्रुओं से अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ रही और ग्यारहवीं शताब्दी तक वह अग्रोहा में अपना अस्तित्व बनाए रखने में समक्ष रही।
उनका राज्य समता के सिद्धान्त पर आधारित था। विभिन्न जाति, वर्ण, कुल के सभी लोग राजा को ही अपना पिता मानते थे, अपने राज्य को ही वह अपना देश मानते थे। चाहे वे कहीं से आए हो, कहीं के वासी हों, किन्तु अग्रसेन के राज्य में वह उन्हीं को अपना मालिक और राज्य को ही अपनी मातृभूमि समझते थे। ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। सभी लोग राज्य की समृद्धि के लिए ही प्रयासरत थे। इसलिए ही अग्रसेन के राज्य में अल्पकाल में ही राज्य की चहुंमुखी उन्नति हुई। उन्होंने राजा का अधिकार सभी को दिया। विवाह के दिन घुड़चढ़ी के अवसर पर दुल्हा छत्र चंवर धारण कर एक दिन के लिए अपने को राजा के समान अनुभव कर कसता था। यह एक क्रांतिकारी नियम था जाहां राजा प्रजा सभी में एकत्व की भावना समुचित विकास हुआ। अग्रवाल जाति में आज भी यह नियम चला आ रहा है।
शैक्षणिक उन्नति
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अभूतपूर्व क्रांतिकारी कदम उठाए। सभी वर्ण, सभी वर्ग के लिए शिक्षा अनिवार्य थी। शिक्षा के साथ-साथ कला, साहित्य, औद्योगिकी विकास की ओर भी उन्होंने पूरा-पूरा ध्यान दिया। उनके राज्य में धर्म और संस्कृति को जीवन का अनिवार्य तत्व माना गया। सभी अपने अपने धर्म का पालन करते हुए, समान रूप से शासन के सहयोगी बनें, यह उनके दैनिक जीवन का मूल मंत्र था। हजारों वर्ष बाद आज भी अग्रवाल समाज में यही धर्म और संस्कृति, दान-पुण्य, परस्पर मिल बांट खाने की प्रथा अग्रसेन जी की विरासत के रूप में विद्यमान है। यही कारण है कि आज भी इस जाति ने अपने देश को बढ़ाने, विकास करने में हर क्षेत्र में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। शासकीय सेवाएं, शिक्षा,, कला, विज्ञान, साहित्य अभियांत्रिकी, मिलिट्री, राजनीति के क्षेत्र में हर जगह अग्रवाल सपूत अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सामाजिक सेवा तथा धार्मिक अनुष्ठानों के क्षेत्र में तो अग्रवाल समाज सदा अग्रणी रहा है। इस जाति ने कभी शासन से कोई अपेक्षा नहीं की है। यह तो केवल सेवा में लगी रही है, सेवा ही इसका जीवनोद्देश्य बन गया है।
अन्य उपलब्धियाँ
अग्रसेन जी के इस तरह प्रतिष्ठापित होने से चारों ओर उसके यश का डंका बजने लगा। देवताओं का राजा इंद्र को उसके वैभव से ईर्ष्या होने लगी। उसने अग्रसेन जी के राज्य में वर्षा बंद कर दी। चारों ओर अकाल, भूखमरी का तांडव गूंजने लगा। अग्रसेन ने अपना सारा खजाना प्रजा के सुख के लिये खोल दिया। कुंए बावड़ी, तालाब से राज्य में पानी की कमी को दूर किया। अंत में गर्ग मुनि के निर्देशानुसार पुनः एक बार महालक्ष्मी की तपस्या की। महालक्ष्मी प्रकट हुई। उन्होंने कहा-वर मांग। राजा ने कहा 'इन्द्र मेरे राज्य में अशांति पैदा करता है इसे बंद करें' महालक्ष्मी ने कहा 'इन्द्र तेरे राज्य में अशांति पैदा नहीं करेगा। और पुनः वरदान दिया कि आज से यह पृथ्वी तेरे वंश से पूरित होगी, सब जाति और वंशों के कुल नेता तेरे वंश में उत्पन्न होंगे। आज से यह कुल तेरे नाम से जाना जाएगा तथा अग्रवंशी पूजा तीनों लोकों में अग्र होगी। जब तक अग्रकुल में महालक्ष्मी की पूजा होती रहेगी यह कुल सदा धन वैभव से आपूर रहेगा। महालक्ष्मी से वरदान पाकर राजा प्रसन्न हो गया। उसके राज्य का विस्तार उत्तर में हिमालय पर्वत, पर्वत की नदियों तथा पूर्व और दक्षिण की सीमा गंगा जी व पश्चिम की सीमा यमुनाजी से लेकर मारवाड़ देश के पास के देश थे।
एक रुपया, एक ईंट
अग्रसेन जी के राज्य में एक लाख परिवार बसते थे। उनमें से कोई भी यदि देवी विपत्ति का शिकार हो जाता था तो समस्त राज्य के परिवार उसको एक रुपयां, एक ईंट स्वेच्छा से देते थे और वह परिवार पुनः अपनी स्थिति को प्राप्त कर लेता था। समाजवाद का ऐसा अद्भूत उदाहरण अन्य किसी राज्य में न देखा गया न सुना गया। बाहर से आए हुए नए परिवार भी इसी प्रकार की सुरक्षा प्राप्त करने के अधिकारी थे।
अग्रसेन का काल
'अग्रसेन उपाख्यान' तथा महालक्ष्मी व्रत कथा के आधार पर अग्रसेन जी का जीवन चरित्र प्रामाणिक रूप से यही माना जाता है। उनका काल महाभारत युद्ध के समय का ही माना जाएगा। क्योंकि 'महालक्ष्मीव्रत कथा' तथा अग्रसेन उपाख्यान दोनों में ही उनका काल का प्रवेश हो चुका था। 'अग्रसेन उपाख्यान' के अनुसार अग्रसेन जी राजा परीक्षित से 14 या पंद्रह वर्ष बड़े थे।
निष्कर्ष
1. प्रताप नगर हरियाणा प्रांत का ही एक राज्य था जो तीन नदियों के संगम पर बसा था, वे तीन नदियां हरियाणा में ही थी। इषद्वती, घग्घर और सरस्वती। सरस्वती नदी अब विलोप हो गई है।
2. अग्रोक नगर आग्रेयगण की स्थापना-जिसे आज 'अग्रोहा' कहा जाता है महाराजा अग्रसेन ने ही की थी इसके पूर्व वह गणराज्य नहीं था। महाभारत में कर्णविजय के प्रसंग में श्लोक आया है-
भदान रोहितकांचैव आग्रेयान मालवानपि ।
गणान् सर्वान विनिर्जित्य नीतिकृत प्रहसन्निव ।। महाभारत वन पर्व 25520 । इसमें 'आग्रेयान' पाठ न होकर आग्नेयान् पाठ ही सही है जो कि आग्रेय दिशा की ओर संकेत देता है। अग्रसेन, अग्रोहा अग्रवाल ग्रंथ में पहले भी या मत प्रतिस्थापित किया गया है।
3. महाराजा अग्रसेन का जन्म परीक्षित के जन्म से पंद्रह वर्ष पूर्व का था और कलि के प्रांरभ में उन्होंने अपने नवीन गणराज्य की स्थापना की तथा एक सौ आठ वर्ष तक राज्य करने के बाद स्वयं तपस्या करने वन में चले गए।
अग्रसेन जी की शासन व्यवस्था
युद्ध की विभीषिका तथा साम्राज्यवाद के विस्तार की महात्वाकांक्षा के दुष्परिणामों से अवगत राजा अग्रसेन ने अपने शासन का आधार लोकतंत्र की परम्परा पर रखा। इन शासन तंत्र के दो मुख्य नियम थे।
राजा जनता की इच्छा से चुना जाता था। जनता की इच्छा ही सर्वोपरि थी। राजा बनने के बाद भी राजा केवल अपनी ही इच्छा से कोई कार्य नहीं कर सकता था। उसका प्रत्येक कार्य मंत्री परिषद की सलाह से ही हुआ करता था। राजा बनने के पूर्व वह समस्त प्रजा के सामने शपथ लेता था कि 'यदि मैं प्रजा से द्रोह करूं तो मेरी संतुलित, धन, आयु, और यश सब नष्ट हो जाऐं। मैं मंत्री परिषद के आदेशों का पालन करूंगा।'
शासन प्रबंध के लिए उन्होंने प्रत्येक नगर का, ग्राम का एक अधिपति बनाया। इन शासकों को ग्रमिक कहते थे। दस ग्राम के शासकों को दशिक, 20 ग्रामों के शासकों को विशाधिप कहते थे, 900 ग्रामों के शासकों को सतपाल कहते थे। 1000 ग्रामों के शासकों को सहस्त्रपति कहते थे। जनपद या राष्ट्र के अंतर्गत जो नगर थे उनके एक-एक सर्वार्थ चिंतक शासक की नियुक्ति की जाती थी ये सब राज्य के पदाधिकारी राज्य की सभा में सभासदों के रूप में भी सम्मिलित होते थे।
इन सभी पदाधिकारीयों के कार्य अलग-अलग थे। ग्रमिक का कार्य ग्राम संबंधी सब कार्यों को सम्पन्न करना था। यदि वह उसमें कोई दोष देखता था तो उसे दशिक के पास पहुंचा देता था, दशिक विशाधिप को, विशाधिप शतूपाल को, शतपाल सहस्त्रपति को और सहस्त्रपति सम्पूर्ण राज्य के राजा को पहुँचा देता था। इस प्रकार राज्य की छोटी से छोटी कमी से भी राज्य सरकार अवगत रहती थी तथा उसे दूर करने का प्रयत्न करती थी। अग्रसेन के राज्य में उन्होंने सीधे जनता से सम्पर्क बनाए रखने का एक और नियम बनाया था। गणों के शासन में उन्होंने कुलों को महत्व दिया। ये कुल, बुद्धि, रूप व धन में समान नहीं हुए होते भी जाति की दृष्टि से अपने को एक समान समझते थे। इनके कुल वृद्ध ही इनके मुखिया होते थे। इनका कर्तव्य था कि वे अपने कुलों को नियंत्रण में रखें ताकि उनमें फूट न पड़ने पावे। कुलों को महत्व देने के कारण ही राज्य में फूट पड़ने की आशंका समाप्त हो गई थी।
राज्य में फूट नहीं पड़े लोगों के मन स्वच्छ रहें, इस विचार से उन्होंने राज्य का यह नियम बनाया कि राज्य में आकर जो भी बसना चाहे, उसे सारी प्रजा एक मोहर, एक ईट प्रदान करें ताकि नवीन परिवार पुराने परिवार के समकक्ष बन जाये। प्रजा में ऊंच-नीच के भेद मिटाने वाला या अद्भूत नियम था। इसमें राजा से लेकर सेवक तक सभी शामिल थे। अग्रसेन के इस नियम का ही यह फल निकला कि दूर दराजों में, जंगल में बसे लोग वापस आकर अग्रसेन के राज्य में बसने लगे। राज्य धन-जन से पूर्ण हो गया।
अहिंसा
अहिंसा को उन्होंने राज्य धर्म का आधार बनाया। पूर्व के राजाओं में यज्ञ में पशु बलि का प्रचलन जोरों पर था। अग्रसेन ने धर्म की आड़ में की जा रही इस हिंसा से पशुओं को मुक्ति दिलाई। उन्होंने लोगों को तलवार तो पकड़ाई किन्तु अपनी रक्षा के लिए। धर्म और राजनीति के संदर्भ में उन्होंने प्रजा को स्वयं निर्णय लेने का अधिकार दिया।
उनके शासन की यही सब खुबियां थी जिनके कारण आज भी अग्रवाल जाति अनगिनत संख्या में पूरे विश्व में फैली हुई अपनी दान, दया, धर्म का डंका बजा रही है। जिस जाति के पूर्वज ऐसे महान पुरुष हो क्यों न उनसे सारा राष्ट्र ही गौरवान्वित हो।
उपसंहार
महाराजा अग्रसेन का काल चारों ओर शांति तथा अमन चैन का काल रहा है। महाभारत युद्ध की विभीषिका से त्रस्त लोग शांति की खोज में जहां जिसे स्थान मिला वहीं एक समूह बनकर जीवन यापन कर रहे थे। इसी समय अग्रसेन जी का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने चारों ओर घूम-फिर कर बिखरे हुये लोगों को एकत्र किया, उन्हें संगठित किया और एक चहुंमुखी शांतिपूर्ण धार्मिक, अहिंसावादी राजनीति की छत्र-छाया में प्रजा का पालन पोषण कर उन्हें सुख चैन दिया। यही कारण है कि आज भी वे सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रेरक बने हुए हैं।
अग्रसेन जी के युग की सम्पूर्ण धार्मिक स्थिति पर यदि एक विहंगम दृष्टि डाली जाए तो यह निष्कर्ष सरलता से निकलता है कि राजा और प्रजा सभी धार्मिक सहिष्णुता में न केवल विश्वास करते थे वरन् उसका पालन भी करते थे। स्वयं अग्रसेन जी भी. वैदिक धर्मावलंबी होते हुए भी विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रति विद्वेष का लेशमात्र भी आभास नहीं होने देते थे। राजा स्वयं चाहे किसी धर्म का अनुयायी हो तथापि प्रजा के ऊपर धार्मिक कट्टरता का कोई बंधन नहीं था। धर्म को सदैव ही व्यक्तिगत हित की बात माना गया। कालान्तर में इसी धार्मिक सहिष्णुता के अनुयायी भारतवर्ष के अन्य शासक भी बने।
महाराजा अग्रसेन ने स्वयं तो छत्र और चंवर धारण किया उन्होंने अपनी प्रजा को भी यह अधिकार दिया कि विवाह के समय दूल्हा छत्र और चंवर धारण कर अपने को अग्रवंशीय परम्परा का पोषक मानते हुए गौरव अनुभव करे। राजा और प्रजा में समानता लाने का यह एक अद्भुत दृष्टिकोण था। समता और ममता का ऐसा उदाहरण विश्व के किसी भी शासक में अब तक नहीं पाया गया है।
उनके काल में धर्म के अधिष्ठातागण भी बौद्विक विकास में किसी प्रकार से शिथिलता नहीं आने देते थे। राजा और प्रजा सभी प्रकार के दार्शनिक विचारों को सुनने और समझने के लिए तत्पर रहते थे। यहां मस्तिष्क की मस्तिष्क से और सिद्धान्त से सिद्धान्त की टक्कर होती थी। यही कारण था कि धर्म अपने सिद्धांत पर नवीन वातावरण में भी अडिग बना रहा।
श्री लक्ष्मी, विष्णु, शिव, कार्तिकेय आदि देवी-देवताओं की पूजा होती। प्रकृति में सूर्य, नदी, वृक्ष, आकाश आदि की पूजा भी प्रचलित थी। हल, बैल, चक्र, वेदी आदि राजा के राज चिन्हों के रूप में प्रतिष्ठित होते थे। खेती के लिए सिंचाई इत्यादि का प्रबन्ध करना शासन का मुख्य कर्तव्य था। नदी, तालाब, कुंओं, झील आदि का निर्माण कर पानी की कमी को दूर करने का प्रयास शासन द्वारा ही किया जाता था। भूमि चाहे किसकी हो उसके उपज के - लिए प्रबंध शासन ही करता था। भूमि का मालिक राजा को अन्न के रूप में कर देता था। कृषि करने की प्राचीन प्रणाली हल-बैल ही थी इसीलिए धर्मशास्त्रों में हल को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। ऋग्वेद में तो हल और इसे चलाने वाले के लिए बहुत से मंत्र कहे गये है - स्त्री-पुरूष, बच्चे सभी खुशहाल थे। कृषकों को ऐसी सुविधा अन्य किसी राज्य में नहीं प्राप्त हुई थी।
स्त्रियों की दशा बहुत ही उन्नत अवस्था में थी, वे शिक्षित तथा स्वतंत्र होती थी। राजकाज में परामर्श भी देती थी। आभूषणों का विशेष प्रचलन था। कम उम्र में विवाह नहीं होते थे। विवाह में उनकी इच्छा सर्वोपरि रहती थी, विभिन्न वंशों से विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी। राजा तो बहु-विवाह कर सकता था पर स्त्रियों के लिए बहु-विवाह वर्जित थे। विधवाओं को विशेष संरक्षण प्राप्त था। संयुक्त परिवार की प्रणाली ही परम्परा का निर्वाह करती थी। सम्पूर्ण समाज अहिंसा और शाकाहारी पद्धति से जीवन निर्वाह करता था। अहिंसा उनका दैनिक जीवन था, लेकिन युद्ध में हिंसा ही उनका परमों धर्म था। इनके वंश के लोग सदा इन्हीं देशों में बसे तथा पंजाब से मेरठ, आगरा तक इनकी बस्तियां प्रमुख रूप से विद्यमान रहीं। महाराजा अग्रसेन के राज्य में कोई गरीब अमीर नहीं था। सभी एक से थे। यहां समाजवाद ही प्रजा का आधार था। लोकतंत्रात्मक पद्धति में राजा-प्रजा सभी समान थे, यही कारण था कि उनके वंशजों ने बारह पीढ़ी तक निर्विघ्न शासन किया।
यह उनके ही पुण्य प्रताप का फल है कि अग्रवालों में आज भी वही सहिष्णुता, उदारता, धार्मिकता कूट-कूट कर भरी हुई है। अहिंसा और शाकाहारी शुद्ध सात्विक जीवन ही अग्रवालों के जीवन की आधारशिला बनी है। इसीलिए वे आज भी लक्ष्मीपुत्र हैं। लक्ष्मी उनके आंगन में नृत्य करती रहती है। इसीलिए किसी ने कहा है 'महाराजा अग्रसेन पांच हजार वर्ष बाद भी पूज्यनीय हैं, वे इसलिए नहीं कि वह एक प्रतापी राजा थे, किंतु इसलिए कि क्षमता, ममता और समता की त्रिविध मूर्ति थे वह।'
- लेखिका स्व. डॉ. स्वराज्यमणि अग्रवाल




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