Pages

Wednesday, April 29, 2026

THE GREAT VAISHYA EMPIRE OF INDIA

THE GREAT VAISHYA EMPIRE OF INDIA

वैसे तो भारतीय वैश्यों ने देश देशांतर में अपने व्यवसाय एवं उद्योग की धाक जमा कर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की, किन्तु उनकी महत्वकांशा केवल व्यवसाय तक सीमित न रही अपितु उन्होने राजनैतिक क्षेत्र में भी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया और अनेक राज्यों की स्थापना कर अपना बल, वैभव और पराक्रम प्रदर्शित किया।

नन्द राय जी की मां वैश्य थी और राधा जी यशोदा के सगे भाई वृषभानु वैश्य की पुत्री थी, इसी प्रकार कृष्ण द्वारा इन्द्र को पराजित किये जाने की गाथा वैश्यों द्वारा क्षत्रियों को परास्त करने की गाथा से जुड़ी है। महाराजा अग्रसेन पर भी इन्द्र ने आक्रमण किया था और जब युद्ध में इन्द्र अग्रसेन को परास्त न कर सका, तो उसने उनसे समझौता कर लिया था।

मौर्य साम्राज्य

मौर्य साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त था। चन्द्रगुप्त के पिटा का नाम सूर्य गुप्त  था यह चन्द्रगुप्त कौन था? इसको लेकर इतिहासकारों ने विभिन्न मतों की कल्पना की है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की माँ मुरा नामक दासी थी मुरा से ही मौर्य बना। इतिहासकार नगेन्द्र नाथ वसु ने अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मौर्य साम्प्रज्य के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त न शुद्र थे, न क्षत्रिय, अपितु वे वैश्य कुलोत्पन्न थे। उनका मत है कि पारस्कर गृह्य सूत्रों के अनुसार नाम के अन्त में गुप्त उपाधि केवल वैश्य ही धारण करते थे। 'गुप्तेति वैश्यस्ये' पारस्कर गृहसूत्र (1. 17. 4) चन्द्रगुप्त के नाम में गुप्त उपाधि का होना उसके वैश्य होने का परिचायक है। मौर्य चन्द्रगुप्त ने गिरनार के प्रदेश में शासक के रूप में जिस राष्ट्रीय प्रान्तीय शासक की नियुक्ति की थी, उसका नाम वैश्य पुष्यगुप्त था। गिरनार पर्वत से मिले एक प्राचीन शिलालेख से पता चलात है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का विवाह एक वैश्य कन्या से हुआ था और उसके वर्षे का नाम पुष्यगुप्त था, जो वैश्य वंशी था।

मौर्यस्य राज्ञः चन्द्रगुप्तस्य राष्ट्रियेण वैश्यन
पुष्पगुप्तेन करितम शोकस्य मौर्यस्य।' (प्रथम रूद्रदमन का जूनागढ़ लेख) 8वीं लाईन

रोमिला थापर ने सुझाव रखा है कि मौर्य नरेश वैश्य जातीय थे 150 ई०पूर्व रूद्रदमन के जूनागढ़ शिलालेख में मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रान्तीय गवर्नर वैश्य पुष्यगुप्त का उल्लेख है।

जूनागढ़ अभिलेख के उक्त स्थल की व्याख्या करते हुए कीलहार्न पुष्यगुप्त को चन्द्रगुप्त का बहनोई स्वीकार करते हैं। इन विद्वानों का विचार है कि चन्द्रगुप्त द्वारा अपने साम्राज्य के पश्चिमी भाग में अपने बहनोई को अधिकारी के रूप में नियुक्त करना अस्वाभाविक नहीं है।

इसी प्रकार अनेक तर्क देकर डा० नगेन्द्र नाथ वसु ने प्रमाणित किया है कि भारत वर्ष में सबसे प्रथम एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने वाला, भारतीय इतिहास का प्रथम प्रतापी सम्राट वैश्याकुलोत्पन्न ही था।

इसी वंश में बिम्बसार, सम्राट अशोक जैसे महान राजा उत्पन्न हुए, जिन्होने अपने श्रेष्ठ शासन एवं प्रजावत्सलता द्वारा भारतीय शासन में विशेष स्थान प्राप्त किया। अशोक ने स्वंय अपना विवाह विदिशा की एक वैश्य श्रेष्ठि कन्या से किया था। महावंश के अनुसार जब अशोक अविन्तराष्ट्र का भोग कर रहा था तो विदिशा में उसका प्रेम वैश्य श्रेष्ठि श्रीदत्त की पुत्री श्रीदेवी से हुआ था, जिससे महेन्द्र और संघमित्र का जन्म हुआ।

कनेन वेदिसगिरिं नगरं मातु देविया।
सम्पत्तो मातरं पस्सि, देवी दिस्वा पियं सुतम् । 16
अवन्तिरट्ट्ठ भुञ्जन्तोपितरा दिन्नमत्तनो ।
सो असोक कुमारो हि उज्जैनीगमना पुरा । 18
वेदिसे नगरे वासं उपगन्त्वा तहिं सुभं।
देविं नाम लभित्वान कुमारि सेट्ठिधीतरम् । 19
संवासं ताय कप्पेसि गव्यं गण्हिय तेन सा।
उज्जेनियं कुमारं तं महिन्दं जनयी सुभं ।। 10
वस्तद्वयमतिक्कम्म संघामित्तञ्च धीतरं ।। 11 महावंसो-13-6-111

गुप्तवंश - भारत के इतिहास में स्वर्णिम युग अंकित करने वाला गुप्त वंश भी अग्रोहा के राजवंश से है। गुप्तकाल भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है। वैसे तो इस काल के राजाओं की जाति को लेकर अनेक मतभेद हैं, किन्तु ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि गुप्तवंशी शासक वैश्य सम्राट ही थे, जैसा कि उनकी गुप्त उपाधि से ही स्पष्ट है, क्योंकि मनुस्मृति, बौधयान गृह सूत्र तथा पारस्कर संहिता में उल्लेख मिलता है वैश्यान्त ! गुप्तेति ! इस वंश के सभी राजाओं ने गुप्त उपाधि का प्रयोग कर अपना वैश्य होना प्रकट किया है।

गुप्तकुल भारत के प्राचीन राजकुलों में से एक था। शंगुकाल के प्रसिद्ध बरहुत स्तम्भके लेख में एक राजा विशदेव का उल्लेख है, जो गोप्ति पुत्र (गुप्त कुल की स्त्री का पुत्र) था। अन्य अनेक शिलालेखों में भी गोप्ति पुत्र व्यक्तियों का उल्लेख है, जो राज्य में विविध उच्च पदों पर नियुक्त थे। इसी गुप्त कुल के एक वीर पुरूष श्रीगुप्त ने उस वंश का आरम्भकिया था।

एलेन, एस के आयंगर, अल्तेकर, रोमिला थापर, राम शरण शर्मा, डी.एन.झा आदि इतिहास कारो के अनुसार वर्षो तक क्षत्रियो के संपर्क में रहने के कारण वैश्य समुदाय क्षत्रिय कृत्य करने लगे।


स्मृतियों के अनुसार ब्राह्मण की उपाधि शर्मा, क्षत्रिय की वर्मा, वैश्य की गुप्त या भूमि और शुद्र की दास होनी चाहिए।

शर्मा देवश्च विप्रस्य वर्मा त्राता च भूभजः ।
भूतिर्गुप्तश्च वैश्यस्य दासः शुद्रस्य कारयेत् ।।
(विष्णुपुराण 3/10/9)'

मंजु श्री कल्प नामक ग्रंथ में उसके वैश्य होने तथा पूना से प्राप्त ताम्रपत्र में प्रभावती गुप्त का धारण गोत्र का उल्लेख इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि वे धारण गोत्रीय अग्रवाल ही थे, क्योंकि धारण गोत्र अग्रवालों में ही मिलता है। प्रभावती के पूनाताम्रपट्ट अभिलेख में निम्नांकित उल्लेख पाया जाता है।

"पृथ्थ्यिाम्प्रतिरथः सर्वराजोच्छेता चतुरूदधिसलिलास्वादितयशा अनेक-गो-हिरण्य-कोटि - सहस्रपदः परमभागवतः महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त तस्यदुहिता धारणसगोत्रा नागकुल संभूतायां श्री महादेव्यां कुबेरनागायामुत्पन्ना उभयकुलांकारभूता अत्यन्त भगवद्भक्ता वाकाटकानां महाराज श्री रूद्रसेनस्य अग्रमहिषी....। एपि०इण्डिया जिल्द 15, पृ041

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने नागवंश की राजकुमारियों से विवाह किया। महाराजा अग्रसेन ने भी नागवंश की राजकुमारियों के साथ विवाह किया था।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की पुत्री गुप्तदुहिता प्रभावती गुप्त का विवाह वल्लभी नरेश से हुआ था। तेन गुप्तः प्रभावती का अर्थ 1/5 गुप्त इसी के अनुरूप है।

इसके अतिरिक्त गुप्त शासकों के वैवाहिक सम्बन्ध वर्द्धन और नागवंश की कन्याओं से होना, वहां के खुदाई से प्राप्त मुद्राओं पर अग्रवालों में पूज्यनीय लक्ष्मी, विष्णु, कुबेर, गरूड़ आदि के चित्र अंकित होना, उनकी दान प्रियता, उदार दृष्टिकोण, धर्म के प्रति रुचि, शुद्ध-सात्विक पवित्र जीवन, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति रूचि, लोक कल्याणकारी प्रशासन, महाराजा अग्रसेन के समान ही इस वंश के राजाओं के नागवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध, उदार वादी समाजवादी परम्परा आदि से स्पष्ट होता है कि गुप्त वंशी सम्राट निश्चित रूप से वैश्य अग्रवाल ही रहे होंगे।'

गुप्तकालीन एक लेख में वर्णन आता है कि साम्राज्य में कोई भी अति दरिद्र तथा दुखी न था -

तस्मिन्नये शासति नैव कश्चिद्धम्मदिपेतां मनुजप्रजासु ।
आतों दरिद्रो व्यसनी कदमो दण्ड न वाचो भृश पीडितः स्यात (स्कन्द गुप्त का जूनागढ़ लेख लाईन नं० 6)2

गुप्तकाल में समुन्द्रगुप्त की सत्ता का प्रभाव सिंहल (श्रीलंका) तक माना जाता था। हरिषेण रचित प्रयाग प्रशस्ति में सैंहलकों का गुप्त सम्राटों के लिए भेंट आदि लेकर उपस्थित होना वर्णित है।


देवपुत्र शाहीशाहानुशाहीशकमुरण्डैः सैंहलक आदिभिः ।

इस वंश में सम्राट चन्द्रगुप्त प्रथम समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमार गुप्त, स्कन्द गुप्त, नृसिंह गुप्त, बुद्धगुप्त, भानुगुप्त, तथागत गुप्त, कृष्ण गुप्त, हर्ष गुप्त, जीवित गुप्त. कुमार गुप्त द्वितीय आदि अनेक गुप्त शासकों ने भारत पर शासन किया तथा विदेशी शक्तियों से लोहा लिया। धीरे-धीरे गुप्त शक्ति कमजोर पड़ती गई। और गुप्त वंश के शासन का अन्त हो गया।

इस युग में विज्ञान, साहित्य कला, संस्कृति, अर्थ, धर्म, ज्योतिष आदि सभी क्षेत्रों में पर्याप्त प्रगति हुई। इसी कारण गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता

वर्द्धन वंश - गुप्तकाल के बाद भी अग्र / वैश्य कुल द्वारा राज्य की यह परम्परा अनवरत रूप से किसी ने किसी रूप में चलती रही। गुप्त काल के पतन के बाद 569 ई० में वर्द्धन वंश का उल्लेख मिलता है। हृवेनसांग ने हर्ष को फी-शे या वैश्य जाति का बताया हैं।' वाटर्स का भी कहना है कि उसके कथनका कुछ आधार अवश्य रहा होगा। बौद्ध ग्रंथ मंजु श्री मूल कल्प के अनुसार श्री कंठ के पुण्यभूति वंश के राजा वैश्य जाति के थे।

सप्त्यष्ठौ तथा त्रीणि श्रीकण्ठावासिनस्तदा ।
आदित्यनामा वैश्यास्तु स्थानमीश्वरवासिनः।। 617
भविष्यति न सन्देहो अन्ते सर्वत्र भूपतिः
हकाराख्यो नामतः प्रोक्तो सर्वभूमिनराधिपः। 618 मंजुश्रीमूलकल्प पृष्ठ45

मंजु श्री कल्प एवं अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वर्द्धन वंशीय सम्राट गुप्त वंश के दौहित्र थे और उनका संबंध वैश्य समुदाय से था। राज गोबिन्द चन्द्र ने उन्हें धारणी गोत्रीय बताया है, जो अग्रवालों का एक गोत्र है। हर्ष चरित्र में भी बाणभट्ट ने हर्ष को वैश्य कुलोत्पन बताया है।

इस काल में आदित्य वर्धन, प्रभाकर वर्द्धन, राज्य वर्द्धन, हर्ष वर्द्धन जैसे अनेक यशस्वी सम्राट हुए। इनका राज्य थानेसर में (कुरूक्षेत्र) था, जो अग्रोहा के बिलकुल समीप है। वर्द्धन राजाओं का काल 700 ई0 तक रहा।

इसका विस्तार पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली राज्य के कुछ भाग में था। हर्षचरित्र तृतीय उच्छ्वास, में इस जनपद की समृद्धि तथा वैभव का कथात्मक वर्णन किया गया है। बाणने इस देश में ईख, धान तथा गेहूं की खेती का भी उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त तरह-2 के द्राक्षा तथा दाड़िम के उद्यान यहां की शोभा बढ़ाते थे। वहां की धरती केलों के निकुंजों से श्यामल दिखती थी। पद-पद पर ऊँटों के झुंड थे। सहस्रो कृष्ण-मृगों से वह देश चित्र-विचित्र लगता था।

अन्ततः अधिकांश वैश्यों ने कृषि और पशुपालन को त्याग कर उद्योग-व्यापार को अपना लिया।' आर्थिक जीवन पर उनके इस एकाधिपत्य से राजनीति में भी वैश्यों का प्रभाव बढ़ गया था। स्वंय हर्ष का वैश्य होना भी उनके प्रभाव वृद्धि का एक कारण माना जा सकता है।

मुगलकाल एवं अंग्रेज काल

मध्यकालीन सुल्तानों, बादशाहों और राजाओं के दरबार में वैश्य समाज के लोग सेनाओं के संचालन में भी पीछे नहीं रहे। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, बीकानेर आदि रियासतों में न जाने कितने ही अग्र / वैश्य मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि बनते रहे।

शेरशाह सूरी के साम्राज्य में एक छोटे से राजस्व अधिकारी के रूप में काम शुरू करके वीर हेमू ने (जिसे हेमू वक्काल भी कहा जाता है) सैन्य संचालन और नगर प्रशासन में अभूतपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया और शेरशाह के उत्तराधिकारी आदिल शाह सूरी के प्रधान सेनापति बन गए। इसी वीर वैश्य सेनापति के नेतृत्व में अफगान सेनाओं ने बीस लड़ाईयां जीती। उन्हें अपने बल पराक्रम और पौरूष के कारण वीर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त हुई तथा उन्हें सेनापति के साथ प्रधानमंत्री भी बनाया गया।

यह वही वीर हेमूशाह थे, जिनके नाम से मुगल सेनाएं कांपने लगती थी और जिन्हें मुगल सेना का काल समझा जाता था किन्तु पानीपत की दूसरी लड़ाई में आंख में तीर लगने से पासा ही पलट गया।

मुगल काल में अग्रवाल वैश्य महत्वपूर्ण पदों पर थे। राज्य के अधिकांश मोदी खानों का उत्तरदायित्व उन्होने सम्भाला हुआ था। युद्ध के समय वे ही सेना को अस्त्र-शस्त्र और रसद-सामग्री पहुंचाने का कार्य करते थे। उन्हें सेना और प्रशासन दोनों में उच्च पद प्राप्त किया

No comments:

Post a Comment

हमारा वैश्य समाज के पाठक और टिप्पणीकार के रुप में आपका स्वागत है! आपके सुझावों से हमें प्रोत्साहन मिलता है कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का प्रयॊग न करें।