AGRAWAL VAISHYA - A DETAILED REPORT
अग्रवाल जाति का सम्बन्ध वैश्य समुदाय से है। अग्रवाल शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं और विभिन्न विद्वानों ने अपने ढंग से इसकी व्याख्या की है। भारतेन्दु हरिशचन्द्र के अनुसार अग्रवाल शब्द अग्रवाल दो शब्दों से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है अग्र की संतान अर्थात् महाराजा अग्रसेन का बालक, जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर का मत है कि अग्रवाल सेना के अग्र भाग की रक्षा करते थे, इसलिए उस का नाम अग्रपाल पड़ा, जो अग्रवाल शब्द के रूप में परिवर्तित हो गया। एक मत के अनुसार अग्रसेन का अर्थ है सेना के अग्र भाग में रहने वाले और अग्रवाल क्योंकि सदैव सेना की अगली पंक्ति में रहते थे, इसलिए उनका नाम अग्रवाल पड़ा।'
यह भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में यज्ञ की अधिकता के कारण जो लोग अगर (एक प्रकार की सुगन्धित लकड़ी जो यज्ञ में प्रयुक्त होती थी) का व्यापार करते थे, वे अगरवाल या अग्रवाल कहलाए।
इसी प्रकार कहा जाता है कि महाराजा अग्रसेन वैश्य समुदाय में सबसे अग्रगण्य पुरूष थे, इसलिए उनकी संतान अग्रवाल कहलाई। जो सबसे अग्र रहे. वह कहलाता है अग्रवाल। इस प्रकार की व्याख्या भी अग्रवाल शब्द की करी गई है।
इस सम्बन्ध में सर्वमान्य मत यह है कि अग्रवाल आग्रेयगण या अग्रोहा के मूल निवासी थे। अग्रवाल जाति की उत्पत्ति की विवेचना करते हुए डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं - "मैं अग्रवाल जाति की उत्पत्ति आग्रेयगण से मानता हूँ।" इस आग्रेयगण का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में निम्न स्थान पर आता है -
भद्रान रोहतकांश्चैव आग्रेयान मालवान् अपि ।
गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत प्रहसन्निव ।।
(महाभारत वन पर्व 255.20)
इस श्लोक में जिस आग्रेयगण का उल्लेख किया गया है, वह निश्चित रूप से अग्रोहा ही था।
वनं पुरगामिश्रका सिधका, सारिका, कोटसग्रेभ्यः पुरगावण, मिश्र कावण, सिधकावण, सारिका कावण, कोटरावण और अग्रेवण । (अष्टाध्यायी (8/4) / 41 )^ 1
अग्रेवण निश्चित रूप से अग्रजनपद, जिसकी राजधानी अग्रोदक (अग्रोहा) थी, में स्थित वन का नाम था। (पृ० 42)
डा० वासुदेव शरण अग्रवाल, डा० परमेश्वरी लाल गुप्त एवं राधा कमल मुखर्जी ने आग्रेयगण के अस्तित्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार किया है।
काठक संहिता, आपस्तवं श्रोत-सूत्र तथा अष्टाध्यायी में भी आग्रि. आग्रेय और आग्रायण का उल्लेख आया है। (अष्टाध्यायी (4/1) / 99 )^ 2
वर्तमान अग्रोहा प्राचीन अग्रोदक या अग्रोतक है। स्थानीय किदवंती के अनुसार महाभारत काल में यह राजा अग्रसेन की राजधानी और स्थान का नाम अग्रसेन का ही अपभ्रंश है। यवन सम्राट सिकंदर के भारत आक्रमण के समय 327 ई०पूर्व) यहाँ आग्रेगण राज्य था। चीनी यात्री चेमांड (फाह्यान) ने भी आग्रोदक का उल्लेख किया है।'
अरोड़े, खत्री, सहरालिए, अग्रवाले आदि अनेक जातियों के अन्तर्गत जो बहुत सी अल्ले या उप जातियां हैं, उनके नामों में पाणिनीय नामों की पहचान मिलती है। जैसे अरोड़ा, खत्रियों में कंवर, हंस, चौपे, खेते में अल्लों या जाति उप विभागों के नाम है जो पाणिनि के कुमार नडादिगण ((4/1) / 11) हंसक नडादिगण ((4/1) / 11) चुप अश्वादिगण में चौपायन ((4/1) / 10) क्षेतयत तिकादिगण ((4/1) / 54) गोत्र नामों से सम्बन्धित है।'
अग्रोहा की खुदाई से जो मुद्राएं मिली हैं उन पर 'अगोदके अगाच्च जनपदस' शब्द अंकित मिले हैं। इन तीनों शब्दों में ही अग्रवाल जाति और उनके नामकरण का रहस्य छिपा हुआ है। आजकल जिसे हम अग्रोहा कहते हैं, उसका प्राचीन नाम ही अग्रोदक था। जो कालान्तर में अग्रोहा बन गया। यह अग्रोहा एक जनपद की राजधानी था, जिस का नाम अग्र या अग्रयेगण था। इस जनपद के मूल वैश्य निवासी, जब वहां से चारों ओर फैले, तो वे अपना परिचय अग्रोहा वाले, अग्रवा वाले के रूप में देने लगे और उसी से उनका नाम अग्रवाल पड़ गया, जो भाषा शास्त्र के अनुरूप है। आज भी सामान्य बोली में अग्रोहा को अग्रवा के नाम से पुकारा जाता है। अन्य वैश्य जातियों या समुदायों के नामों का विश्लेषण करने पर भी यह व्याख्या या मत अधिक समीचीन प्रतीत होता है। जैसे ओसवाल, खंडेलवाल, पालीवाल आदि। जातिसूचक शब्दों में प्रथम नाम किसी स्थान या जनपद विशेष का है. जिसमें मध्यकालीन 'वाल' प्रत्यय जुड़कर इनका निर्माण हुआ जैसे ओसिया में वाल प्रत्यय जुड़कर ओसवाल, खंडेला में वाल प्रत्यय जुड़कर खण्डेलवाल, ठीक उसी प्रकार अग्र में 'वाल' प्रत्यय जुड़ने से अग्रवाल बन गया है।'
आज भी जिस क्षेत्र विशेष में अग्रवालों का एक बहुत बड़ा भाग केन्द्रित है, वह अग्रोहा से कुछ सौ किलोमीटर की परिधि में ही है। कालान्तर में यही स्थान बोधक नाम जाति बोधक बन गया।
अग्रवाल शब्द की प्राचीनता
अग्रवाल शब्द का प्रचलन कैसे हुआ इस संबंध में डा० परमेश्वरी लाल गुप्त, जैन साहित्य के विद्वान अगर चन्द नाहटा, श्री परमानन्द शास्त्री आदि ने गम्भीर अध्ययन किया है और अब तक प्राप्त प्रमाणों, शिलालेखों, प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख आदि के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि अग्रवाल शब्द का प्रचलन किसी न किसी रूप में ई० सन् 1100 के आसपास हो गया था। प्राकृत भाषा के जो ग्रन्थ मिलते हैं उस से पता चलता है कि इस शब्द का प्रचलन प्रारम्भ में 'अगरवाल' या 'अयरवाल' के रूप में था। सन 1132 में तोमर वंशीय राजा अंगपाल तृतीय के शासन काल में कविवर श्रीधर द्वारा रचित 'पासणाह चरिउ' (पार्श्वनाथ चरित्र) में अयरवाल जाति का उल्लेख है।
सण वासि एयारह सएहि, परिवाडिए वरि सहं परिगएहिं।
कसणटठभीहिं आगहणमीस, रविवारि समाण्डि सिसिर भासि ।।'
इसी प्रकार (सम्वत् 1393) सन 1336 में रचित दातृ प्रशस्ति में अयरवाल और यश कीर्ति द्वारा रचित हरिवंश पुराण में अयरवाल शब्द का उल्लेख किया गया है -
सिरि अयरवाल वंशहि पराणु, तो संघ हे अच्छतु विनयपाणु (पाण्डव पुराण) 1.
2. तहि अयरवाल वसहि पहाणु, सिरि गडगनो गगेय भाण (हरिवंश पुराण)
अग्ररचन्द नाहटा ने सुधारू जैन कवि का उल्लेख किया है जिसने सन् 1354 में प्रधुम्नचरित की रचना की थी। इस कवि ने अपना परिचय स्पष्ट रूप से अग्रवाल के रूप में दिया है।
मइया मीकड़ कीयहु बखाण, तुम पानुन पासउ निखाण। अगरवाल की मेरी जाति, पुर अगरोए मोहि उत्त्पति।।
इसी प्रकार सन् 1498 में कवि छीहल ने अपना परिचय देते हुए लिखा है कि जातिगवंश सि नाथु सुतनु, अगरवाल कुल प्रगटरवि।
बावनी बसुधा विस्तरी कवि कंकण छीहल कवि बावनी ।।"
डा० परमेश्वरी लाल गुप्त ने पता लगाया है कि फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में सन् 1370 में मुल्ला दाउद ने अपने ग्रंथ में अग्रवाल जाति की चर्चा की थी। सन् 1540 में जयसी कृत 'पद्मावत' (सिंहलद्वीप खण्ड बाजार) में भी अग्रवाल जाति का उल्लेख मिलता है।
अग्रवाल चौहान चन्देले, खत्री और पंचवान बघेले।
1519 में माणिक्यचन्द्र ने अपना जीवन परिचय देते हुए लिखा था
अयरवाल सुप्रसिद्ध विभासिउ। सिंघलु गोत्रउं सुवण समासिउ ।।'
प्राचीन ग्रंथों में जहां अगरवाल, अयरवाल जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है, वहां कतिपय ग्रंथों में अग्रोतकानवय शब्द का भी उल्लेख हुआ है। प्रयाग के सुप्रसिद्ध प्राचीन नगर कौशम्बी के निकट पभोसा हाड़ा (प्रभास पर्वत) की धर्मशाला में विक्रमी सम्वत 1881 की एक प्रशस्ति लगी हुई है। उसमें निर्माता का परिचय 'अग्रोतकान्वय गोयल गोत्री कहकर दिया गया है। अग्रोतक अथवा अग्रोदक अग्रोहा का ही प्राचीन नाम है।
इन सब प्रमाणो से स्पष्ट होता है कि अयरवाल अग्रोतकान्वय, अगरवाल जैसे शब्दो का प्रचलन 11वी० शताब्दी में हो गया था।
प्राचीन वैश्य वंश - इतिहास में ऐसे अनेक कुलों का उल्लेख मिलता है, जो वैश्य थे और जिन्होने व्यापार-व्यवसाय के साथ उच्च कोटि की राज्य एवं प्राशासनिक प्रतिभा का परिचय दिया।
महाराजा अग्रसेन और अग्रवाल जाति-
महाभारत युद्ध से 51 वर्ष पूर्व अग्रोहा में अग्र जनपद की स्थापना हो चुकी थी। महाराजा अग्रसेन वहां के प्रतापी राजा थे। उनके राज्य में एक लाख आबादी थी और उनका राज्य दूर दूर तक फेला था। उन्ही महाराजा अग्रसेन से आगे जाकर अग्रकुल परम्परा चली और अग्रवाल समाज के रूप में एक नये गौरवपूर्ण समाज का आविर्भाव हुआ।'
महाजनपदों का उदय और विकास -
कालान्तर में भारत के राजनीतिक मानचित्र पर सोलह महाजन पदों का उदय और उत्कर्ष हुआ। यह काल बुद्ध काल से भी 150-120 वर्ष पूर्व था। इस काल में अहिच्छत्र (पांचाल), अयोध्या (कौशल), कौशाम्बी और मथुरा जनपदों में अनेक वैश्य राजाओं के राजवंशों ने शासन किया। इस सम्बन्ध में मूलदेव, वायुदेव, विशाखा देव, घनदेव, बृहस्पति मित्रा, वरूण मित्रा, अश्वकोष, ब्रहममित्र, उत्तम दत्त, रमा दत्त, शिव दत्त, भावदत्त आदि अनेक राजाओं का उल्लेख मिलता है।
अनेक जनपदों में वैश्य राज्य या गणराज्य के प्रधान तो नहीं थे किन्तु राज्य के मंत्रीमण्डल में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। धन और साधन सम्पन्नता के कारण वे राज्य को आवश्यकता पड़ने पर सहायता भी करने लगे थे।
मोहनजोदड़ो तथा हडप्पा सभ्यता
भारत की प्राचीन सभ्यता के अवशेष मोहन जोदडो तथा हडप्पा सभ्यता में मिले हैं। इस सभ्यता से प्राप्त अवशेषों से उस समय के वैश्य समुदाय (वणिको) की आश्चर्यजनक प्रतिभा का परिचय मिलता है। उस समय वैश्यों ने जिन नगरों का निर्माण कराया वैसे वैज्ञानिक ढंग से बने नगर विश्व में अन्यत्र नहीं मिलते। उनमें जल-निकास, सफाई आदि की व्यवस्था कहीं अधिक स्वच्छ और वैज्ञानिक थी। ललित कला, शिल्प कला और निर्यात व्यापार पराकाष्ठा पर थे तथा मानव निर्मित बन्दरगाहों से पूरे विश्व को सोने-चांदी के गहनों से लेकर पीतल के बर्तनों तक अनेक वस्तुओं का निर्यात किया जाता था उनकी नाप-तोल तथा दशमलव प्रणाली अत्यन्त विकसित थी।'
उल्लेख के अनुसार 2000 ई० पूर्व यहूदी नरेश सुलेमान ने चन्दन तथा हाथी दांत के सामान तथा बहुमूल्य वस्त्रों का भारतीय वणिकों से पर्याप्त मात्रा में आयात किया था। मेसोपटामिया, वेबीलोन तथा सीरिया आदि देशों में भारतीय व्यापारियों के कार्यालय खुले हुए थे, जहां भारी मात्रा में उद्योग-व्यवसाय का संचालन होता था।
जैन तथा बौद्ध धर्म काल 700 ई० पूर्व तक भारत के वणिक वैदिक धर्म का ही पालन करते आए थे, किन्तु 600 ई० पूर्व भारत में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म का उदय हुआ। इन धर्मों के काल में भी वैश्य समाज की परम्पराएं अक्षुक्ष्ण्य बनी रहीं।
उस समय के साहित्य से पता चलाता है कि तत्कालीन युग में अनेक वैभवशाली वैश्य विद्यमान थे। उनके पास अपार सम्पति तथा वैभव था। उपासुक दशासूत्र नामक एक जैन ग्रंथ में आनन्द नामक एक वैश्य का उल्लेख मिलता है, जिसमें उस समय के वैश्यों की प्रतिष्ठा का अनुमान लगता है। इस आनन्द नामक वैश्य का 4 करोड़ रूपये का सोना ऋण रूप में बंटा हुआ था और 4 करोड़ का सोना भूमि आदि में लगा हुआ था। उसके पास 40 हजार गाएं और भैंसे थी। 500 गाड़ियां विदेश में तथा उतनी ही स्वदेश में व्यापार के लिए चलती थी। उसके चार जलयान विदेशों में तथा 4 ही जलयान स्वदेशी व्यापार में लगे थे।
जातककथा की निदान कथा में हम देखते हैं कि श्रावास्ती का प्रसिद्ध व्यापारी अनाथपिण्डिक राजगृह अपने किसी व्यापारिक कार्य से 500 गाड़ियों को साथ लेकर गया था और इसी समय प्रथम बार उसने भगवान बुद्ध के दर्शन किए थे।*
जातक में अनेक ऐसे श्रेष्ठियों (अनाथपिणिडक) (सेरिवा) का उल्लेख मिलता है जिन्होने भिक्षु संघ, राज्य तथा समाज को करोड़ों रूपयों का दान दिया था। मगध निवासी एक वैश्य द्वारा भिक्षु-संघ को अस्सी करोड़ कार्यापण दान का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार भृंगार श्रेष्ठि की कथा तथा विशाखा द्वारा श्रावस्ती में 9 करोड़ की लागत से बुद्ध के लिए चैत्यालय स्थापित करने का विवरण मिलता है।'
बौद्धकाल में वैश्यों का आर्थिक जीवन समृद्ध था। बौद्धकालीन अनेक सौदागरों की अपार सम्पत्ति का वर्णन पाली स्त्रोतों में मिलता है। चाम्पा निवासी श्रेष्ठी पुत्र सोण कोटिविशं बीस करोड़ का धनी था। उसके पास अस्सी गाड़ी स्वर्णमुदाएँ थीं। साकेत के सेठ धनंजय ने, अंगुत्तरनिकाय की अट्टकथा के अनुसार अपनी पुत्री विशाखा के लिए 9 करोड़ मूल्य से महालता नामक आभूषण को बनवाया था। श्रावास्ती के प्रसिद्ध व्यापारी अनाथपिण्डिक ने जेतवन की सारी भूमि को सोने की मोहरों से किनारे से किनारा मिलाकर रोक कर जेत कुमार से उसे खरीदा था और इसमें उसकी 18 करोड़ मोहर लगी थी।
बौद्ध तथा जैन काल में इन्ही 'वणिको' ने विदेशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार प्रसार में बहुमूल्य योगदान दिया था। उन्होने भारतीय धर्म, दर्शन और विज्ञान से सम्बन्धित हजारों ग्रन्थों का अनुवाद कराया, जो आज भी वहां उपलब्ध है। इस काल में वैश्यों का प्रभाव इतना अधिक बढ़ा हुआ था कि राजाओं का चुनाव भी वैश्यों द्वारा किया जाता था।
सम्पन्न वैश्यों का सत्कार राजाओं के द्वारा किया जाता था तथा वे उनकी कृपा और विश्वासपात्र होने का आनन्दोपभोग करते थे।'
इस काल में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के उत्थान में वैश्यों का महान योगदान रहा। वैश्यों और शिल्पियों के विशाल संघ बने और वैश्यों ने भिक्षु बनकर देश विदेश में धर्म का प्रचार किया। बुद्ध के प्रथम 500 अनुयायियों में से 400 से अधिक वैश्य थे और वैश्यों ने भारी संख्या में तीर्थों, स्पूतों तथा मंदिरों का निर्माण कराकर अपनी दानवीरता तथा उदारता का परिचय दिया था।'
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