AGRAWAL A STUDY - अग्रवाल शब्द का अध्ययन
महाराजा अग्रसेन की संतति अग्रवालों के बारे में विभिन्न विद्दानों ने अपने मत दिये है। सबसे पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सन १८७१ में भविष्य पुराण से ली गई महालक्ष्मी व्रत कथा के आधार पर अग्रवाल जाति कि उत्पत्ति नाम की पुस्तिका प्रकाशित की थी। इस छोटी सी पुस्तिका में उन्होनें अग्रवाल शब्द की विवेचना करते हुए ये विचार व्यक्त किए कि अग्रवाल शब्द संभवत अग्रवाल शब्द की रुपांतर है, इसका विवेचन करते हुए उन्होनें बताया कि यह शब्द अग्रबाल है जिसका सीधा अर्थ है अग्रसेन के बालक अर्थात अग्रसेन के वशंज
दूसरी धारणा जग्गनाथ प्रसाद रत्नाकर द्वारा प्रस्तुत की गई है उनके अनुसार अग्रवाल शब्द अग्रपाल शब्द से बिगड़कर बना है। उनके अनुसार अग्रवाल क्षत्रिय थे तथा सेना के अग्रभाग में रहते थे जिसकी वजह से वे अग्रपाल कहलाए तथा यही शब्द बाद में अग्रवाल कहलाया। लेकिन अग्रभागवत के अनुसार अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। अठारहवें यज्ञ में पशु बलि से उन्हें घृणा हो गई इसलिए उन्होने क्षत्रिय धर्म छोड़कर वैश्य धर्म अपना लिया।
डॉ परमेश्वर लाल गुप्ता एवं कुछ अन्य विद्दानों ने मत व्यक्त किया है कि व्यवसाय में लगे समुदाय को वाल प्रत्यय लगाकर व्यक्त करने के उदाहरण है जैसे पत्थर वाले, गोटे वाले, टोपी वाले आदि इसी प्रकार सुंगधित लकड़ियों के व्यापार करने वाले या यज्ञ सामग्री का व्यापार करने वाले अगरवाल कहलाये। उस समय यज्ञ का बहुत अधिक महत्व था। इसलिए अगर का व्यवसाय बहुत उन्नति पर होगा तो इन्होनें अपनी अलग श्रेणी बना ली होगी।
डॉ राय गोविंद चंद तथा अन्य विद्वानों के अनुसार स्थान विशेष पर रहने वालों में से कुछ उपजातियां बनी, जैसे चुरु जनपद से चुरुवाल, पोरबंदर से पोरवाल, खंडेला जनपद से खंडेलवाल, वरन के रहने वाले वरनवाल, मथुरा के माधुर कहलाये, उसी प्रकार अग्रोहा के रहने वाले अगरवाल कहलाये, जो बाद में अग्रवाल शब्द में परिवर्तित हो गया। डॉ सत्यकेतु विद्यालंकार तथा हिंदी के सुप्रिसद्द व्याकरणाचार्य पं अंबिका प्रसाद वाजपेयी भी इसी मत के हैं। उसके अनुसार बूढा आपा-बुढापा हो जाता है, उसी प्रकार अगरवाल से अग्रवाल हो जाता है। अगरवाल, अईरवाल, अयरवाल, सब एक ही विश्लेषण के विभिन्न रुप है। मूल शब्द अग्र है तथा वाल इसमें प्रत्यय लगाकर शुद्द शब्द अग्रवाल बना हैं
अग्रवालों के अठारह गोत्र
महाराजा अग्रसेन ने तत्कालीन 18 कबीलों को अर्थात 18 उपजातियों को अर्थात 18 श्रेणियों को एक सूत्र में आबद्द कर सुसंगठित वैश्य अग्रवाल जाति का निर्माण किया तथा उनके रक्त की शुद्धा और पवित्रता के लिए उन्हें गोत्र प्रदान किया। एक गोत्र का व्यक्ति अपने गोत्र में वैवाहिक संबंध स्थापित नही कर सकता था। रक्त शुद्दि और संस्कारों की पवित्रता के लिए वैश्य अग्रवालों को दूसरी जाति में वैवाहिक संबंध स्थापित करना भी निषिद्द था।
गोत्र धारण करने का तरीका-अठारह श्रेणियों को एक सूत्र में आबद्द करने हेतु एक वैज्ञानिक तरीका अपनाया गया जिसके अनुसार अठारह यज्ञ किये गए। पहले दिन गर्ग ऋषि के द्वारा यज्ञ कराया गया तथा गर्ग गोत्र प्रदान किया गया। दूसरे दिन गोभिल ऋषि द्वारा यज्ञ कराया, तथा गोयल गोत्र प्रदान किया गया, तीसरे दिन गौतम ऋषि द्वारा यज्ञ से गोयन गोत्र, चौथे दिन वातसल्य ऋषि से बंसल गोत्र प्रदान किया गया। पांचवे दिन कौशिक ऋषि ने कंसल गोत्र दिया, छठवें दिन शांडिल्य रिषि दारा सिंहल गोत्र, सातवें दिन माण्डलिक ऋषि द्वारा मंगल गोत्र, आठवें दिन जैमिनि ऋषि ने जिंदल गोत्र, नौवें दिन तांडय ऋषि द्वारा तिंगल गोत्र, दसवें दिन औरण ऋषि द्वारा ऐरण गोत्र, ग्यारहवें दिन घौम्य ऋषि द्वारा धारण गोत्र, बारहवें दिन मुदगल ऋषि द्वारा मधुकुल गोत्र तेरहवें दिन वशिष्ठ ऋषि द्वारा बिंदल गोत्र, चौदहवें दिन मैत्रेय ऋषि द्वारा मित्तल गोत्र प्रदान किया गया। पंद्रहवें दिन तेतिरय ऋषि द्वारा तायल गोत्र प्रदान किया गया, सोलहवें दिन भारद्वाज ऋषि ने भंदल गोत्र प्रदान किया, सतरहवें दिन नगेंद्र ऋषि ने नागल गोत्र प्रदान किया, अठारहवें दिन कश्यप ऋषि द्वारा कुच्छल गोत्र प्रदान किया गया। यद्यपि पशु बलि ना देने के कारण यज्ञ अधूरा छोड़ दिया गया था तथापि गोत्र प्रदान की कार्यवाही पूरी हो चुकी थी।
गोत्र
प्रस्तावित ऋषि
गोत्र
प्रस्तावित ऋषि
1 गर्ग गर्ग
10 ऐरण औरण
2 गोयल
गोभिल
11 धारण धौम्य
3-गोयन गौतम
12 मधुकुल मुदगल
4-बंसल वात्सलय
13 बिंदल वशिष्ठ
5 कंसल
कौशिक
14 मित्तल मैत्रेय
6 सिंहल शांडिल्य
15 तायल तैत्तिरय
7 मंगल माण्डक
16 भंदल भारदाज
8 जिंदल जैमिनि
17 नागल नागेंद्र
9 तिंगल तांडय
18 कुच्छल कश्यप
SABHAR : वैश्य भारती || अगस्त-सितम्बर 2017 13
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