तैलिक वैश्य वनिक जाति का योगदान
भारतीय संस्कृति एवं धर्म के प्रसार-प्रसार में तैल्लिक वैश्य वनिक महाजन समाज की अहम भूमिका रही है। ऐतिहासिक व सामाजिक भूमिका के परिपेक्ष्य में तैल्लिक वैश्य वनिक महाजन जाति के लोगों का इतिहास था उनकी रचनात्मक भूमिका निम्नवत है-
१. बौद्धधर्म का व्यापक प्रचार तेलिक वनिक वंशजों के द्वारा किया गया।
2 नालन्दा विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार की स्थापना सन् 515 में वैश्य वनिक गुप्त वंश के सम्राट बालादित्य ने किया था जो (बिहार शरीफ का निवासी था।
3 नालन्दा में तैलिक दानवीर द्वारा भगवान बुद्ध की आदमकद प्रतिमा की स्थापना की थी जिसे तेलिया भण्डार कहा जाता है।
इसा के जन्म से 3000 वर्ष पहले चेतीयार वनिक तेली वैश्य समुद्री जहाज से चलते थे जिनका व्यापर विश्वव्यापी था
5 काटी के चुलाधार तैलिक ने जाजलि ब्राह्वान को आनषिदेश दिया। तुलाधार ब्रड ज्ञानी व ईमानदार थे इसीलिए इनकी ईमानदारी पर ही तराजू का नाम तुला' रखा गया है।
6. जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में भी तैलिको का महत्वपूर्ण पागदान है। तेलिक कुल शिरामणि दानवीर भामाशाह जनके भाई ताराचंद शाह जैन धर्मावलम्बी तैल्लिक वैश्य वनिक थे।
7. सोमैय्या सम्प्रदाय के प्रवर्तक जैन वनिक संत तरण तारण साह महाराज ने चौदह ग्रन्थों की रचना की। इनकी गुना में समाधि बनी है।
8. इतिहासकार डा० आल्टेयर के अनुसार हिन्दुओं के चारो धामों में निरन्तर दीपक जलाये जाने की व्यवस्था तेलिक वैश्य वनिक पंचायते किया करती थी।
9. वर्तमान सनातन धर्म में मूर्ति पूजा वनिक तैलिकों द्वारा आरम्भ की गई। टेलघानी यन्त्र (कोल्हू महादेव) की
पूजा महादेव शकर भगवान् के रूप में की जाती है। जय तेलिधानी शकर बरदानी का जयघोष तैलिक वनिक व्यवसायी करते थे।
10 चालुक्य महाराजा सोमेश्वर प्रथम द्वारा सन् 1040 के लगभग में बनवाया गया ग्वालियर की 'तेलांगन तेली मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है।
11 तेली जाति की मक्त मां कर्माबाई का भव्य मन्दिर दतिया. झांसी, सागर इत्यादि स्थानो पर आज भी है।
12 रायपुर ने "राजिम माता का मन्दिर है। इस मन्दिर में राजिम माता तेल पेरने वाले कोल्हू पर भगवान विष्णु की पूजा करती हुई विराजमान है।
13 नाथ सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध सिद्धि प्राप्त गोगी बाबा गोरखनाथ जी ने जाती मोरो तेली कहकर स्वयं अपना परिचय दिया है।
14. आल्हा में वर्णित प्रधान सेना नायक धनुआ' का नाम रणबीर में गिना जाता है जो तेली वनिक समुदाय का था।
15 साहित्य के क्षेत्र में मराठी के संत सन्ता जी महाराज जगनाडे और उड़िया के गोविन्द साह तथा कवयत्री खगनियों का नाम उल्लेखनीय है।
16. दक्षिण भारत के तमिलनाडु का प्रसिद्ध ग्रन्थ कुरल के रचनाकार तैलिक जाति के तिरुवल्लुवर है जिनके नाम पर ग्रंथ का नाम तिरुक्कुरल है। यह ग्रन्थ जनमानस में लोकप्रिय है।
17 पिछड़े वर्ग आन्दोलन के शहीद चुल्हाई साहू जी छपरा के रहने वाले से इन्होंने स्वतंत्रता संग्रान के दिनों में शोषित और दलित जातियों के उत्थान और जागृति हेतु मुहिम चलाया।
18. भारत के प्रथम वित्तमन्त्री पष्ठाम चेट्टी साहू समाज के रत्न थे।
19 बस्तर के तेलधार घाटी में टेकन की लाट, नल कच्छ तेलन की टेकरी, उदयपुर में तैलिक सराय, नूरा बाद में तैलिक पुल तथा कलकत्ता में तैलिक कॉटा प्रसिद्ध धरोहर हैं।
20 लखनऊ का तेली बाग, इलाहाबाद का तेलियरगंज, रायबरेली व बनारस का तेलियाना, दिल्ली का तेलीबाड़ा व अन्य शहर में तेली जाति पर रखे मुहल्लों के नाम तेली वनिक समुदाय की बाहुल्यता व सम्पन्नता का प्रतीक है।
21. मोहनदास करमचन्द गांधी भी तेली वनिक समुदाय से है। इस सम्बन्ध में उल्लेख है कि वाराणसी कांग्रेस के राष्ट्ररत्न शिव प्रसाद गुप्त ने प्रख्यात कर्मकाण्डी महामहोपाध्याय पं० विद्याधर से कराया। अनुष्ठान का समापन महात्मा गांधी से करने का आग्रह किया तो पं० विद्याधर व अन्य पण्डितों ने यह आपत्ति की कि तेली जाति के गांधी अधिष्ठान के यजमान नहीं हो सकते। परन्तु शिव प्रसाद गुप्त का तर्क था कि गाधी जी हिन्दू धार्मिक विचार के महापुरुष है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन जैसे महान पुनीत कार्य में अपना जीयन अर्पित किए हुए हैं। इनसे उपयुक्त व्यक्ति और कौन हो सकता है? उन्होंने समापन अनुष्ठान का यजमान गांधी जी को ही बनाया।
साभार :
जैनेन्द्र कुमार गुप्त लखन
No comments:
Post a Comment
हमारा वैश्य समाज के पाठक और टिप्पणीकार के रुप में आपका स्वागत है! आपके सुझावों से हमें प्रोत्साहन मिलता है कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का प्रयॊग न करें।