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Wednesday, April 29, 2026

HISTORY OF SONWAL SIHARE VAISHYA - सोनवाल वैश्यों का इतिहास

HISTORY OF SONWAL SIHARE VAISHYA - सोनवाल वैश्यों का इतिहास

सोनवाल वैश्यों के सम्पूर्ण भारतवर्ष में मात्र 40000 से 50000 परिवार ही है। यह एक विलुप्त होती दुर्लभ वैश्य जाति है। जिसके कारण लोगों को इस जाति के संबंध में ज्ञान नहीं है।

सोनवाल वैश्य मूलतः सोमनाथ से आये गुजराती वैश्य है। सोमनाथ से आने के कारण सोनवाल वैश्य कहलाते है। जैसे कि अग्रोहा से निकलने एवं महाराजा अग्रसेन के वंशज होने से अग्रवाल, खण्डेला से निकलने के कारण खण्डेलवाल, ओसा से निकलने के कारण ओसवाल, मथुरा से निकलने के कारण माथुर, अयोध्या से निकलने के कारण अयोध्यावाशी, मारवाड़ से निकलने के कारण मारवाड़ी आदि। बुन्देलखण्ड में पटिया (जगा) ब्राह्मण जो कि गहोई एवं सोनवाल वैश्यों के द्विज है उनसे समाज के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त की गई। पटिया (जगा) ब्राह्मण श्री हरिओम शरण निवासी हिण्डोन सिटी, राजस्थान (मोबाईल नम्बर 08058902753) द्वारा उनके पास उपलब्ध ग्रन्थों के आधार पर सोनवाल वैश्यों का इतिहास निम्नानुसार है:-

सृष्टि के आदिक्रम में सर्व प्रथम जल की उत्पत्ति हुई। जल में भगवान विष्णु ने अपनी शक्ति का आधान किया। इससे सुवर्णमय अंड का प्रादुर्भाव हुआ। इसी अंड से ब्रह्मा जी प्रकट हुये। ब्रह्मा जी द्वारा हजार वर्ष तक तप किया गया तब उन्हें सृष्टि रचना की शक्ति प्राप्त हुई। ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम मन से सृष्टि रचना की लेकिन उससे प्रजा का विस्तार नहीं हुआ। तब उन्होंने अपने शरीर के दो भाग कर डाले एक भाग से पुरूष और दूसरे भाग से नारी की सृष्टि हुई। जिससे अनेक प्रकार की मैथुनी सृष्टि होने लगी। यही पुरूष मनु और स्त्री शतरूपा कहलाई। मनु के नौ पुत्र हुये इक्ष्वाकु, नाभाग, घृष्णु, शर्याति, नरिष्यंत, प्रांशु, नाभागारिष्ट, करूष, और पृषथ। मनु की पुत्री इला के पुत्र पुरूरवा के सात पुत्र हुये। आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, घढायु, वनायु और शतायु। आयु के पांच पुत्र हुये नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, राजि तथा अनेना। इसमें से क्षत्रवृद्ध का एक पुत्र सुनहोत्र हुआ। सुनहोत्र के तीन पुत्र, काश, शल तथा गृत्समद थे। गृत्समद के एक पुत्र हुआ जिसका नाम शुनक (शौनक) रखा गया जो कि शौनक ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुए है।

शौनक ऋषि ने अपने तपोबल से 84 (चौरासी) पुत्र उत्पन्न किये। इन सभी पुत्रों को वैष्णव मत धारण कराया। शौनक ऋषि के वंश में उत्पन्न हुये पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि थे। इनके जिन पुत्रों ने कृषि व व्यापार कर्म अपनाया वे सोनवाल वैश्य के नाम से प्रसिद्ध हुये। इन्होंने सोनखेरा नाम का ग्राम बसाया। यह स्थान राजस्थान की सीमा पर सौराष्ट्र में है। वर्तमान में पियाना शौनकपुर नाम से जाना जाता है। शौनक ऋषि के शिष्य शौनकादि ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुये और प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषाराण्य में आश्रम बनाकर रहे। श्री मद्भागवत पुराण में भी यह उल्लेख मिलता है कि नेमिषारण्य में 88 हजार शौनकादि ऋषियों ने सूत जी महाराज से भागवत कथा सुनी थी।

सोनवाल वैश्य बहुत अधिक धनी थे तथा गुजरात के सोमनाथ (सौराष्ट्र) में निवास तथा व्यापार करते थे जहां भगवान सोमनाथ जी का विशाल मंदिर था इस मंदिर की व्यवस्था में सोनवाल वैश्यों का बहुत अधिक योगदान था। सन् 1026 में जब महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर का विध्वंस कर दिया तब सोनवाल वैश्यों ने वहां से पलायन कर राजस्थान में आकर बस गये एवं व्यापार करने लगे तथा अपनी पहचान को गुप्त रखा। कालान्तर में राजस्थान से निकलकर बुन्देलखंड में आकर निवास एवं व्यापार करने लगे। शुनक (शौनक) ऋषि के पुत्र होने तथा सोमनाथ से आने के कारण सोनवाल वैश्य कहलाते है। अपनी पहचान को गुप्त रखने के कारण गुप्ता कहलाते है। सोनवाल वैश्यों के कुछ परिवारों द्वारा बुन्देलखंड में आकर बसने के समय, गरीबी एवं विपत्तिवश अपनी आजीविका हेतु कपड़ों पर छपाई का कार्य कर लिया था जिसके कारण लोग इन्हें छीपा समझते हैं जबकि यह विशुद्ध सोनवाल वैश्य है। गुजरात में बनियों को शाह भी कहा जाता था। अतः लोग इन्हें शाह भी कहते थे। इसी कारण शाह-हारे कहलाये, जो कि कालान्तर में बिगड़ते-बिगड़ते सिहारे हो गया। सिहारे शब्द सुनते ही अधिकांश व्यक्ति, जातियों के संबंध में ज्ञान नहीं होने से, इन्हें शिवहरे, सिहोरे (कलार), सहारे (अनुसूचित जाति) सहारिया, सहारिआ, सेहारिआ, सेहरिआ (अनुसूचित जनजाति) समझने लगते है। यदि हम अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति होते, तो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का लाभ उठाकर आज उच्च पदों पर नौकरी पा जाते एवं प्रमोशन भी मिलता।

यह विशेष उल्लेखनीय है कि भारत विभाजन के समय सिंध प्रान्त से हिन्दु आये थे, तत्समय उनकी भाषा, वेशभूषा को देखकर स्थानीय निवासियों ने इन्हें मुस्लिम समझा, परन्तु इनके आचार विचार रहन-सहन आदि को समझकर इन्हें हिन्दु माना। ठीक इसी प्रकार सोमनाथ से आए गुजराती वैश्यों को प्रारंभ में वैश्य नहीं माना। कालान्तर में इनके रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज आदि को देखते हुए सोनवाल वैश्य मानते है।

सोनवाल वैश्यों के गोत्र/अल्ल/आंकने निम्नानुसार है :-

1. राऊ (राहू, रहू) 2. अजमेरिया 3. माहुर (माहोरे) 4. कांकर (कंकर) 5. बरदिया 6. पहारिया 7. निहोनियां 8. सिंहोनिया (सिंघानिया) 9. मोहनिया 10. बिसौरिया 11. बुधिया 12. गौंड्या 13. पलैया 14. सोंजेले 15. मोहपतेले 16. खड़ेरे 17. गुरेले 18. सिंघल 19 नरवरिया 20. मुखरिया 21. बकेवरिया 22. अलापुरिया 23. सिघरिया 24. पवैया 25. विलवार 26. रठा 27. जिकसोल्या 28. चिनोनियां 29 जिगनिया 30. बडेतनिया 31. मांदेले 32. अत्रि 33. चनपुरिया 34. बरसैंया 35. गठेले 36. झुडेले 37. छिरौल्या 38. जिकसारिया 39. चखरिया 40. लाठ 41. बोखदा 42. बरसानिया।

उक्त गोत्रों/अल्लों में कुछ स्थान परक है, जैसे अजमेरिया, बकेवरिया, अलापुरिया, नरवरिया आदि। सौराष्ट्र से निकलकर प्रथमतः जिस स्थान पर निवास किया उस स्थान से बुंदेलखण्ड में आकर बसे जिससे उस स्थान के नाम से गोत्र बन गया जैसे अजमेर से आने के कारण अजमेरिया, नरबर से आने के कारण नरबरिया, बकेवर से आने के कारण बकेवरिया, अलापुर से आने के कारण अलापुरिया आदि।

उल्लेखनीय है कि बरदिया, पहारिया, बरसैंया, छिरौल्या, झुडेले आंकने गहोई वैश्यों में भी है। गुरेले, मोहपतेले, सिघरिया गहोई वैश्यों के आंकने कुरेले, महतेले, सिजरिया के अपभ्रंश हैं। राऊ गोत्र खण्डेलवाल वैश्यों में भी है। कांकर, अजमेरिया, मुखरिया एवं गोवरेले गोत्र ब्राह्मणों में भी है। अलापुरिया एवं मोहनियां गोत्र माथुर वैश्यों में भी है। सिंघल गोत्र अग्रवाल वैश्यों में भी है। पवैया गोत्र जैनों में भी है।

जिस प्रकार कोई भी गहोई वैश्य स्वयं को गहोई न लिखते हुए गुप्ता या अपना गौत्र/आंकने लिखते है। ठीक इसी प्रकार कोई भी सोनवाल वैश्य स्वयं को सोनवाल न लिखते हुए गुप्ता या अपना गौत्र / आंकने लिखते है।

सोनवाल वैश्य मूल गुजराती वैश्य एवं शौनक ऋषि के पुत्र होने के कारण पूर्णतः शुद्ध शाकाहारी है, भोजन में सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, प्याज एवं लहसुन का सेवन भी नहीं करते थे। समय के परिवर्तन के अनुसार वर्तमान में प्याज एवं लहसुन का प्रयोग करने लगे हैं। सोमनाथ के उपासक होने के कारण भगवान शिव कुलदेवता है। कुलदेवी महालक्ष्मी जी है। कुछ परिवार बीजासेन माता को भी कुलदेवी मानते है।

सोनवाल वैश्य समाज में पूजा, पाठ, ध्यान, जप, यज्ञ का बडा महत्व है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन के साथ सभी त्यौहार उत्साह के साथ मनाये जाते है। "बाबू की दोज" की पूजा ब्राह्मणाों के साथ ही सोनवाल वैश्य समाज में भी होती हैं महिलायें गणगौर, महालक्ष्मी, करवाचौथ, तीजा, हलषष्ठी, ऋषिपंचमी आदि सभी त्यौहार पारंपरिक रीति-रिवाज से मनाती है।

आज (सन 2015) से लगभग 50-60 वर्ष पूर्व तक सोनवाल वैश्य अन्य वैश्य समाज में संबंध नहीं करते थे। समाज से भिन्न जाति में संबंध करने से उन्हें समाज से बाहर कर दिया जाता था। जिस परिवार को समाज से बाहर कर दिया जाता था, वह मजबूरन अन्य समाजों में विवाह संबंध करने को बाध्य हो जाता था। इसका यह अभिप्राय नहीं हो सकता कि उसकी मूल जाति बदल जायेगी।

समाज के बहुत कम परिवार होने के कारण विवाह संबंध स्थापित करने में परेशानी होने लगी थी। एक ही व्यक्ति से अनेकानेक संबंध स्थापित न करना पड़े, इसे दृष्टिगत रखते हुए व वृहद मानसिकता होने से, पूर्वजों ने 50-60 वर्ष पूर्व सोनवाल वैश्यों के अतिरिक्त अन्य वैश्य समाजों जैसे माहोर, महावर, गुलहरे, माथुर, गहोई, ओमर, माहेश्वरी, अग्रवाल आदि में भी संबंध करना प्रारंभ कर दिये थे। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि सोनवाल वैश्यों का वर्ग बदलकर अग्रवाल, माहेश्वरी, माथुर, ओमर, माहोर, गुलहरे हो जायेगा। वरन् शादी-विवाह होने से उनका मूल वर्ग परिवर्तित नहीं होगा। सोनवाल, माहोर, गुलहरे, ओमर, दोसर, माथुर, अग्रवाल, गहोई, माहेश्वरी आदि अलग-अलग वैश्य हैं। इसी कारण हजारों वर्षो से अलग-अलग लिखे जाते है। कुछ संबंध शिवहरे वैश्यों में इस कारण हुये, क्योंकि वह भी सोमनाथ से आए मूलतः चन्द्रवंशी क्षत्रिय थे एवं सोमनाथ मंदिर का विध्वंस हो जाने से वहां से पलायन कर, क्षत्रिय धर्म त्यागकर व्यापार करने से वैश्य कहलाते हैं। ग्वालियर, आगरा साईड के कुछ शिवहरे वैश्यों द्वारा शराब का व्यापार करने से इन्हें कलार समझते हैं, जबकि कलार एक अलग जाति है।

कुछ परिवार जो बुन्देलखण्ड से दूर स्थानों पर जाकर बस गये एवं उन स्थानों पर सोनवाल वैश्यों की संख्या नहीं होने से, उन स्थानों पर उपलब्ध अन्य वैश्यों में संबंध स्थापित किये एवं उसी समाज में अपने आपको शामिल कर दिया। कुछ परिवार विदेशों / महानगरों में जाकर बस रहे है एवं उन स्थान पर निवासरत अन्य वैश्यों / समाजों में संबंध कर रहे हैं। जिन परिवारों को समाज से बाहर किया गया वह अन्य वैश्यों / समाजों में भी शामिल हो गये। इसी कारण सोनवाल वैश्यों की संख्या लगातार घटती गई एवं वर्तमान में भी घटती जा रही हैं। जिसके कारण सभी वैश्यों जैसे अग्रवाल, माहेश्वरी, नेमा, गहोई, गुलहरे, माहोर, महावर, माथुर, ओमर, पोरवाल आदि में संबंध करना मजबूरी हो गया है। वर्तमान में हमारे समाज में लड़कियों की संख्या अपेक्षाकृत रूप से अत्यंत ही कम हो गई है। इस कारण से कुछ परिवार अपने बच्चों को कुंवारा रहने से बचाने एवं वंशवृद्धि के लिए अन्य समाजों में भी विवाह संबंध कर रहे है। जिन्हें कि सामाजिक रूप से मान्य भी किया जाने लगा है। वर्तमान में अन्य समाजों में संबंध करने से किसी को समाज से बाहर नहीं किया जा रहा है।

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