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Tuesday, April 28, 2026

वैश्य जाति में उपजातियों का सृजन

वैश्य जाति में उपजातियों का सृजन

जैन विद्दानों ने वैश्यों की उपजातियों का वर्णन किया है। कर्नल टाड ने 84 उपजातियों का वर्णन किया है। लेकिन प्रश्न यह है कि उपजातियों का विभाजन किस प्रकार हुआ। उनके सूजन का आधार क्या था। इस विषय में हम निम्न आधारों पर विचार करते हैं:

1. कर्म के आधार पर वर्गीकरण आदिकाल में कुछ

ब्राह्मणोचित कर्म त्यागकर, आजीविका हेतु वैश्य कर्म स्वीकार करने पर ब्राह्मण वैश्य बने। इसी प्रकार क्षत्रिय लोगों ने युद्ध में हार जाने या हिंसा छोड़ देने पर आजीविका हेतु वैश्य कर्म अपनाया तथा वे क्षत्रिय वैश्य बने। इसी प्रकार कुछ शूद्रों को शूद्रोचित कर्म त्यागकर वैश्य कर्म धारण करने पर शूद्र वैश्य बने।

2. श्रेणी के आधार पर विभाजन

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल

अपने गुप्त अभिलेख में लिखते है कि गुप्त कालीन अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि वैश्य जन छोटी-छोटी समितियां बनाकर या समूह बनाकर व्यापार करते थे। कालांतर में ये समितियां या समूह ही श्रेणी के रुप में विकसित हुए। यहीं से उपजातियों के सृजन की श्रंखला प्रारंभ हो गई। इस श्रेणी परंपरा में वैश्य जाति की जो उपजातियां बनीं वे आज भी मौजूद हैं। जैसे बारहसैनी, चौसेनी, यज्ञसेनी, अग्रसेनी, महासेनी, शूरसेनी आदि।

3. जनपद के नाम पर विभाजन वैश्य जाति की कुछ

उपजातियां जनपद विशेष, स्थान विशेष तथा क्षेत्र विशेष के नाम पर विकसित हुई। निम्न उदाहरण ये स्पष्ट करते हैं:

1. अग्रोहा जनपद से अग्रवाल वैश्य

2. बुलंदशहर जनपद से बरनवाल वैश्य

3. मथुरा जनपद से माथुर वैश्य

4. माहौरगढ़ जनपद से माहौर वैश्य

5. गौलेर जनपद से गुलहरे वैश्य

6. मोरवरी जनपद से मौर्य वैश्य

7. अयोध्या जनपद से अयोध्यावासी वैश्य

8. खंडेला जनपद से खंडेलवाल वैश्य

9. चुरू जनपद से चुरूवाल वैश्य

10. मध्यदेशीय जनपद से मध्यदेशीय वैश्य

11. जायस जनपद से जायसवाल वैश्य

12. पोरवंदर जनपद से पोरवाल वैश्य

13. मारवाड़ जनपद से मारवाड़ी वैश्य

14. कन्नौज जनपद से कान्याकुब्ज वैश्य

15. धूसर जनपद से धूसर वैश्य 

16. पाली जनपद से पालीवाल वैश्य 

17. मेड़ता जनपद से मेड़तवाल वैश्य

18. टाँक जनपद से टौंकवाल वैश्य

19. खातर जनपद से खातरवाल वैश्य

20. ओसिया  जनपद से ओसवाल वैश्य 

इस प्रकार हम देखते है कि जनपद, क्षेत्र या स्थान विशेष के द्वारा अनेक वैश्य उपजातियां बनीं।

4. वस्तु विशेष का व्यापार करने पर विभाजन : जैसे गुड़ का व्यापार करने पर गुड़ियां वैश्य या गुलहरे वैश्य, लोहे का व्यापार करने पर लोहिया वैश्य, केसर का व्यापार करने पर केसरवानी वैश्य, पिस्ते का व्यापार करने पर पिसरवानी वैश्य, लवण का व्यापार करने पर लाड़वाणि या लाड़वानी वैश्य, कपड़े का व्यापार करने पर तन्तुवाय वैश्य, तेल का व्यापार करने पर तैलिक वैश्य। इस प्रकार वस्तु विशेष का व्यापार करने पर अनेकानेक उप-जातियों का निर्माण हुआ।

5. अल्ल के आधार पर उपजातियों का विभाजन : वैश्य जाति में कुछ उपजातियों का निर्माण अल्लों के आधार पर हुआ। अल्ल के आधार पर  अल्लों का निर्माण निम्न प्रकार हुआ:

1. राजपुरिया

2. विलासपुरिया

3. भरतपुरिया

4. कमलपुरिया

5. अग्निपुरिया

6. सौरोठिया

7. मारोठिया

8. मजीठिया

9. तेनगुरिया

कालांतर में इन्ही अल्लों के आधार पर भी उपजातियों का विभाजन हुआ तथा इस प्रकार अनेकानेक उपजातियों का निर्माण हुआ।

सन 1882 में वैश्य जाति का सर्वप्रथम संगठन स्थापित हुआ जो अखिल भारतीय वैश्य महासभा के रुप में प्रतिस्थापित हुआ। इसके वर्तमान अध्यक्ष प्रेमशंकर गर्ग बुलंदशहर हैं। उन्होंने बताया कि 8 जनवरी सन् 1901 में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को अखिल भारतीय वैश्य महासभा ने एक पत्र लिखा कि वैश्य जाति की उपजातियों को वणिक, बनिया या वर्वकाल ना लिखकर 'वैश्य' लिखा जाए।

(साभार : वैश्य जाति का गौरवमयी इतिहास)

Website: www.vaishbharati.com

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