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Sunday, September 5, 2021

AGRAWAL REVOLUTIONARY - स्वतंत्रता संग्राम में अग्रवाल सेठों का योगदान

 AGRAWAL REVOLUTIONARY - स्वतंत्रता संग्राम में अग्रवाल सेठों का योगदान


"तलवारों पर जिस्म वार दिए, अंगारों पर जिस्म जलाया है..

तब जाकर कहीं हमने, अग्रवंश का ध्वज फैराया है.."

सेठ रामजीदास गुड़वाला - 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भामाशाह... इन्होंने अपनी अरबों की दौलत 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के खिलाफ लगा दी थी.. 1857 की क्रांति में अंग्रेजों ने भारतीयों को परास्त करने के बाद सेठ जी को जंगली कुत्तों के आगे छुड़वा दिया था और अंत मे उसी घायल अवस्था मे फांसी पर लटका दिया..

सेठ हुकुमचंद अग्रवाल जैन - सेठ हुकुमचंद हिसार के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। जिन्होंने हरयाणा में 1857 में क्रांति का बिगुल बजाया था। अंग्रेजों ने 1857 के दमन के पश्च्यात इन्हें इन्ही के घर के आगे इनके भाई फकीर चंद के साथ फांसी पर लटका दिया था और इनकी अकूत संपत्ति लूट ली थी.

लाला झंकुमल सिंघल - 1857 की क्रांति में जब गौहत्या को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ बजे बिगुल की आग मेरठ के धौलाना ग्राम में पहुंची तब धौलाना के लाला झनकूमल सिंघल ने एप 13 राजपूत साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। जिसके बाद इन 14 वीरों को फांसी पर लटका दिया गया। आज उनकी स्मृति में उनके गांव धौलाना में विजय स्मारक बना है

मास्टर अमीर चंद - इनका जन्म दिल्ली के प्रसिद्ध अग्रवल परिवार में हुआ था। ये अंग्रेजों के खिलाफ "आकाश" पत्रिका निकाला था। 23 सितंबर 1912 को दिल्ली के चांदनीचौक पर इनके दल ने ब्रिटिश अफसर वाइसराय की शोभायात्रा पर बम विस्फोट किया। बम विस्फोट के बाद मास्टर जी ने 'लिबर्टी नाम का इश्तिहार निकाला। इसमें उन्होंने लिखा कि - "हम भारतीय अंग्रेजों के मुकाबले बड़ी संख्या में हैं हम इनसे डरने के बजाए इनकी तोपखाने और बंदूके सब छीन सकते हैं। केवल क्रांति ही उपाय है भारत को स्वतंत्र करवाने का।" 19 फरवरी 1914, में मास्टर जी को गिरफ्तार कर लिया गया और मास्टर जी हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।

लाला लाजपत राय - अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बुलंद स्वर में आंदोलन चलाने वाली तिकड़ी लाल-बाल-पाल के लाल लाला लाजपत जी ने साइमन कमीशन के खिलाफ आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया और राष्ट्र पर अपने प्राणों का उत्सर्ग किया

दिनेश-बादल-विनय - बंगाल के लाल-बाल-पाल के नाम से मशहूर दिनेश-बादल-विनय की तिगड़ी ने अंग्रेजों पर अत्याचार करने वाले सिम्पसन को गोली से उड़ा दिया था जिसके बाद तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

जमनालाल बजाज - आजादी के दीवानों में अग्रवाल समाज के सेठ जमनालाल बजाज का नाम अग्रणी रूप में लिया जाना चाहिए !!
यह रहते महात्मागांधी के साथ थे, लेकिन मदद गरमदल वालो की करते थे ! जिससे हथियार आदि खरीदने में कोई परेशानी नही हो !!
इनसे किसी ने एक बार पूछा था, की आप इतना दान कैसे कर पाते है ?
तो सेठजी का जवाब था ---मैं अपना धन अपने बच्चो को देकर जाऊं, इससे अच्छा है इसे में समाज और राष्ट्र के लिए खर्च कर देवऋण चुकाऊं ।

ये कुछ नाम थे इसके अलावा कई अग्रवीरों ने जिसे नृसिंह अग्रवाल, लाला मटोलचंद अग्रवाल, हनुमान प्रसाद पोद्दार, रामप्रकाश अग्रवाल, लोहिया आदि अनेकअग्रवीरों ने तन-मन-धन तीनों से स्वनातंत्रता के महासमर में भाग लिया..

लेखक - प्रखर अग्रवाल 

VAISHYA HERITAGE - दिगंबर जैन लाल मंदिर और राजा हरसुख राय

VAISHYA HERITAGE - दिगंबर जैन लाल मंदिर और राजा हरसुख राय

ये नीचे जो मंदिर दिख रहा है ये राजा हरसुख राय निर्मित दिगंबर जैन लाल मंदिर है। इसका बहुत ही रोचक इतिहास है।


राजा हरसुख राय दिल्ली के अग्रवालों में अग्रगण्य थे जिन्होंने दिल्ली के आसपास कई भव्य जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था। 17वीं शताब्दी में जब शाहजहां ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाई थी तब उसने कुछ अग्रवाल वणिकों को दिल्ली में बुलाया और बसाया था। उन्हीं में से एक हिसार के अग्रवाल वणिक साह दीपचंद थे जिन्होंने चांदनी चौक में अपने 16 बेटों के लिए 16 हवेलियां बनवाईं थीं।

राजा हरसुख राय उन्हीं के वंशज थे और दिल्ली के मुगल बादशाह शाह आलम के खजांची भी। उन्हीं दिनों दिल्ली के कुछ प्रतिष्ठित जैनों ने राजा साहब से मिलकर चर्चा की कि- "अपनी अतुलनीय संपत्ति से कुछ धर्म-यश के कार्य भी करिये" तब सन् 1807 में राजा हरसुख राय ने लाल किले के पास ही एक भव्य जैन मंदिर के निर्माण करवाना शुरू किया। वो मंदिर मुग़ल काल मे निर्मित प्रथम शिखरधारी जैन मंदिर था। इस मंदिर को बनाने में उस समय 8 लाख की लागत आयी थी जो इस समय करोड़ों में होगी। जब मंदिर बन रहा था और 7 लाख करीब का खर्चा हो चुका था तभी अचानक से राजा हरसुख राय ने मंदिर का निर्माण रुकवा दिया। नगर के जैनों में चर्चा होने लगी कि -"अचानक से ऐसा क्यों किया गया?" लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। एक बोला -"हमें तो पहले ही पता था कि मुग़ल राज में मंदिर कैसे बन पाएगा? दूसरे ने कहा- "मुसलमानों को मंदिर का शिखर कहाँ से बर्दाश्त होगा? शिखर बनने ही वाला था कि तामीर रुकवा दी" तब कुछ समझदार लोगो ने कहा कि -"राजा साहब ने वादा किया था तो वो शिखर वाला मंदिर जरूर बनवाएंगे"
 
नगर के प्रतिष्ठित अग्रवाल राजा हरसुख राय से मिले और पूछा -"आपने मंदिर का निर्माण क्यों बंद करवा दिया।" राजा साहब बोले -"धन की कमी पड़ गयी है। अब मुझे किसी से कर्ज मांगना अच्छा नहीं लगा" नगर के वणिकों ने कहा - "अरे राजा साहब! आप क्या बात करते हैं। हमारे रहते आपकी जूतियां जाएं चंदा मांगने। फिर तो लानत है हमारी जिंदगी पर"
 
राजा साहब ने कहा कि - "लेकिन मैं चंदा लूंगा तो पूरी बिरादरी से लूंगा वरना एक से भी नहीं। तब हर जैन और अग्रवाल परिवार से नाम मात्र का चंदा लिया गया।" मंदिर बना समाज ने राजा साहब से कलशरोहण करने की मिन्नतें की लेकिन राजा साहब बोले- "मंदिर सर्व समाज के सहयोग से बना है अब पंचायत ही इसका कलश रोहन करे और वही इसका प्रबंध संभाले।" अब सबको पता चला कि राजा साहब के सहयोग लेने के पीछे क्या मंशा थी।
ऐसे वीतरागी और महान थे हमारे पूर्वज जो सब कुछ कर के भी किसी सम्मान की लालसा नहीं रखते थे।

लेखक - प्रखर अग्रवाल
सोर्स - जैन जागृति के अग्रदूत पुस्तक (अयोध्या प्रसाद गोयलिय)

VAISHYA HERITAGE - श्री मुरली मनोहर मंदिर (डाकणियों का मंदिर), लक्ष्मणगढ़

VAISHYA  HERITAGE - श्री मुरली मनोहर मंदिर (डाकणियों का मंदिर), लक्ष्मणगढ़


इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण सेठ गिरधारीलाल रामजीलाल गनेड़ीवाला ने वर्ष 1845 में करवाया था। गनेड़ीवाल परिवार मूल रूप से सिंघल गोत्रीय मारवाड़ी अग्रवाल परिवार है। उसके बाद वर्ष 2016 में इसका जीर्णोद्धार हुआ। लेकिन सोचने की बात ये है कि इसको डाकणियों का मंदिर क्यों कहते हैं । स्थानीय बुजुर्ग लोगों के अनुसार मन्दिर की उत्तरी दीवार पर राक्षस हिरण्यकश्यप का वध कर रहे भगवान नृसिंह का भित्ति-चित्र बना हुआ है। मन्दिर के पास बस स्टैण्ड पर आने वाली ग्रामीण महिलाएं अपने बच्चों को डांटने के लिए उक्त चित्र का सहारा लेती। भगवान नृसिंह के आक्रामक स्वरूप वाले चित्र को डायन (डाकण) बताकर बच्चों को चुप रखने का प्रयास करती। इसी कारण उक्त मन्दिर को धीरे-धीरे डाकणियों का मन्दिर कहा जाने लगा।

SAMRAT SKANDGUPTA - स्कंदगुप्त

SAMRAT SKANDGUPTA - स्कंदगुप्त

अभी जो तालिबानी अफ़ग़ानिस्तान में हमला कर रहे हैं वो तो कुछ नहीं हैं उनसे 1000 गुणा अधिक संख्या और बर्बर हूणों जिन्होंने पूरे विश्व को थर्रा दिया था उन्हें मिट्टी में मिला दिया था धारण गोत्रीय अग्रकुल के वीर स्कन्दगुप्त ने..
 
‘’मध्य एशिया से चींटियों की तरह असंख्य दल बांधकर जंगली और बर्बर हूण चीन से फ्रांस और यूनान तक समस्त भूभाग में फैल गए थे। डैन्यूब से वोल्गा तक तथा थ्यूरिंजिया और रोमन साम्राज्य तक इनकी लपलपाती हुई तलवारों ने अनगिनत मनुष्यों को चाट लिया था। हूणों के कंधे बड़े बड़े और नाक बैठी हुई थी, माथे का हिस्सा छोटा था और जैसे उनकी आंखें काली-काली उनके उठे सिरों में ही घुसी रहती थीं, क्रोध के समय पुतलियां इधर से उधर डोलने और नाचने लगती थीं, होठों के दोनों किनारों से पतली मूंछें खड़ी फड़कती थीं और मृत्यु को गेंद की तरह ठुकराते हुए ये बलशाली वेग से सम्पन्न घोड़ों पर सवार होकर समस्त जन-धन, नगर और देशों को रौंदते हुए ऐसे चलते थे जैसे कि खेतों को नष्टकर झुंड में चलने वाला असंख्य टिड्डी दलों का झनझन सुर में उड़ता समूह। इन हूणों के अत्याचारों से यूरोप कांप उठा, इनकी लगातार टक्कर और ठोकर से यूनान-मिस्र और रोम धरती के धूल में मिल गए। ऐसे विश्व को कंपा देने वाले प्रलयंकारी हूणों से समरांगण में लोहा लेने जब स्कन्दगुप्त अपने सैन्यबल के साथ दो दो हाथ करने उतर पड़ा तो जैसे बाजी ही पलट गई। उस विकट कालखंड (453 ईस्वी से 467 ईस्वी) में #भारत को जैसे सेनानी की आवश्यकता थी, वैसा ही नायक #स्कन्दगुप्त के रूप में देश को मिल गया। वह अकेला न होता तो आज यह भारत ही ​कहां होता। रोम आदि साम्राज्यों की तरह भारत भी हूणों की बाढ़ में बह गया होता। हूणों को हम न पचा पाते, #हूण ही हमें समाप्त कर जाते।" - आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल. #हूणों की भयानक दुर्भेद्य शक्ति से टक्कर लेने और भारत को बचाने के लिये उस महायोद्धा युवक #स्कंदगुप्त_विक्रमादित्य ने अपना जीवन ही दांव पर लगा दिया। महलों का सुख त्याग दिया, सैनिकों के साथ जमीन पर जीवन व्यतीत करने लगा।
 
आज से 1600 साल पहले औड़िहार (हौणिहार या हुणा-अरि) से #गुजरात और #कश्मीर तक उसने भारत भूमि को हूणों से मुक्त करा डाला। #रीवां का #सुपिय_अभिलेख प्रमाण है कि भारत ने स्कन्दगुप्त को इस कार्य के लिए इतना जनसमर्थन दिया कि उसे धर्मपालन में #श्री_राम के तुल्य और सदाचार और सुनीति में #सम्राट_युधिष्ठिर के तुल्य बताया।

स्कन्दगुप्त के रणकौशल, बाहुबल और पराक्रम को देखकर हूणों की सेनाएं थर्रा उठीं, उसकी अद्वितीय वीरता देखकर जन-मन के भीतर पसरा डर जाता रहा, ऐसे महान सेनानी स्कन्दगुप्त को भारत का महान रक्षक या महात्राता अर्थात The Saviour of India नहीं कहें तो फिर कौन है इतिहास में जिसे भारत-रक्षा-केसरी की उपाधि से नवाजा जाए।

हिन्द की ढाल था धारण गोत्रीय अग्रवाल गुप्तसाम्राज्य लेकिन उन्हें सेक्युलर भारत का इतिहास भूल गया.. यही हमारे पतन का कारण है..

BRAVE VAISHYA COMMUNITY - वीर वैश्य

BRAVE VAISHYA COMMUNITY - वीर वैश्य 

अफ़ग़ानिस्तान के हिंदुकुश पर्वत पर हिन्दू बनियों का नरसंघार करने के लिए पाकिस्तान के जोकर ज़ैद हामिद का मन मचल रहा है. वो बात अलग है कि ये अभी खुद ही जेल में मचल रहा है. लेकिन ये सोच लगभग हर पाकिस्तानी/अफगानी यहां तक कि हिंदुस्तानी मुसलमानों की भी है.. इनकी हिंदुओं विशेष कर बनियों से नफरत का कारण क्या है?

क्योंकि जब इस्लाम की खून से लपलपाती तलवारें आयी थी तो जो जाती इनकी तलवारों के आगे झुक कर मुसलमान नहीं बनी वो थे कुलीन वैश्य.. जिन्होंने मुग़लों और यहां तक कि अंग्रेजों के शासन काल मे रहकर भी भव्य मंदिर बनवाये, गौरक्षा के लिए संघर्ष किया. हिंदू अपना धर्म त्याग कर मुसलमान बन जाएं इसलिए कई गुना जजिया कर उनपर लगता था लेकिन बनियों ने अरबों खरबों के व्यापार के बावजूद भारी मात्रा में जजिया भर कर भी अपना धर्म नहीं छोड़ा। यहां तक कि इतिहास में प्रसंग है कि मुसलमान काल मे जब गांव के गरीब लोग जजिया नहीं भर पाते थे तब गांव के नगरसेठ पूरे गांव का जजिया भर देते थे।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद में जब भारतीयों के संस्करों पर और उनके संस्थानों पर पश्चिम की छाप पड़ रही थी उस समय अग्रकुल रत्न जयदयाल गोयनका जी और हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने ऐसा संस्थान (गीताप्रेस) बनाया जो विशुद्ध रूप से परंपरावादी भारतीय संस्कारों में रंगा था। जिस पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जरा भी छाप नहीं पड़ी। जिसने भारत की संस्कृति, देव-अवतारों, गौमाता, गीता, गंगा, गायत्री का देश की विभिन्न भाषायों में प्रचार किया..

ये वही बनिया जाती है जो आज भी पूरे गौरव से सनातन का झंडा गाड़े हुए है... हिन्दू धर्म के मंदिरों के निर्माण, भारतीय ग्रंथ की छपाई से लेकर गौशालाओं, धर्मशालाओं, सनातन संस्थाओं का निर्माण आदि वैश्यों द्वारा ही संभाला जा रहा है..

बनिये ही हैं जो विशुद्ध शाकाहारी हैं जिन्हें आजभी मुसलमानों और ईसाइयों के घर के पानी तक से भी परहेज है और उन्हें गौभक्षक मल्लेछ मानती है। जिनका ईसाई और मुसलमान पंथ में मतान्तरण नहीं हुआ गौरक्षा और गौहत्या बंदी के लिए सेठ रामकृष्ण डालमिया ने तो आमरण अनशन लाया था जिसे उन्होंने मरते समय तक निभाया और गौमाता के लिए शहीद हो गए.

वही बनिये (अशोक सिंघल) जिन्होंने रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन चलाकर आज सैकड़ों सालों से भारत भूमि के माथे पर लगा बाबरी मस्जिद का कलंक धो दिया। वही बनिये (बिड़ला-डालमिया-पोद्दार) जिन्होंने कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का निर्माण करवाया। ये उनकी धर्मनिष्ठा ही थी। वही बनिये (टोडरमल) जिन्होंने रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास जी की रक्षा की और काशी विश्वनाथ का पुनरूत्थान किया। जिन बनिया उद्योगपतियों ने पूरे भारत मे भव्य सनातन धर्म के मंदिर बनाये।

वैश्य जाती ही है जो वर्तमान समय मे पूरी निष्ठा और परंपरा से सनातन धर्म का पालन कर रही है। तो सनातन धर्म प्रिय ऐसी जाती से विधर्मियो को नफरत होना तो स्वाभविक ही है..

SABHAR - प्रखर अग्रवाल

VAISHYA IPS OFFICERS ON SENIOR MOST POST IN INDIA

VAISHYA IPS OFFICERS ON SENIOR MOST POST IN INDIA

वैश्य  समाज के 10 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी देश के 7 राज्यों में पुलिस चीफ हैं और 2 केंद्र के महत्वपूर्ण पुलिस महकमे  एनआईए व रौ जैसी महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख है। 

इसके इलावा समाज के अनेंक अधिकारी देश भर में दूसरे नम्बर पर हैं इन अधिकारियों की अधिकांश की पृष्ठभूमि हरियाणा से है। समाज ने देश भर में निस्वार्थ सेवा, राष्ट्र के प्रति समर्पण भावना, निष्ठा, कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी के साथ देश सेवा में अग्रणी भूमिका अदा की है। ऐसे अधिकारियों पर हमें गर्व है।

1. पंजाब        दिनकर गुप्ता
2  हरियाणा ‌   प्रशांत कुमार अग्रवाल
3. उत्तर प्रदेश  मुकुल गोयल 
4. बिहार        एस.के. सिंघल
5. उत्तराखंड  अशोक कुमार गुप्ता
6. मध्य प्रदेश  विवेक जौहरी
7. अंडमान     सत्येंद्र गर्ग 
8. RAW       सामंत गोयल
9. NIA         योगेश मोदी 
१०. सीबीआई  - सुबोध जायसवाल 

प्रशासनिक क्षेत्र के साथ साथ वैश्य समाज अपनी मेहनत से सेना व इंजीनियर जैसे महत्वपूर्ण विभागों में ऊंचे-ऊंचे पदों पर कार्य कर रहे हैं। समाज व देश का नाम ऊंचा कर रहे है।

#जय_महाराजा_अग्रसेन_जी 🚩
#जय_अग्रोहा_शक्तिपीठ 🚩
#जय_अग्रवाल_सदैव_अग्रणी_अग्रवाल🚩
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SHREEMAL VAISHYA SAMAJ - श्रीमाली वैश्य समाज का इतिहास वर्णन

SHREEMAL VAISHYA SAMAJ - श्रीमाली वैश्य समाज का इतिहास वर्णन

स्कन्द पुराण के अनुसार उध्र्वरेता ऋषियों महात्माओं की सेवा के लिए कामधेनु के द्वारा 36000 शिखा सूत्र घारी मनुष्य प्रकट किये गये वे सभी महा बली वैश्य थे उन वैश्यों के लिए श्री लक्ष्मी जी द्वारा श्रीमाल नगर का निर्माण करा कर ब्राह्मणों और वैश्यों को वहाँ बसा दिया गया । वैश्य अपने कर्तव्य, कर्म, वाणिज्य, कृषि, पशु पालन कर ब्राह्मणों की सेवा करते हुए अपने जीवन निर्वाह करने लगे। जो वैश्य दक्षिण भाग बसे वे श्रीमाली कहलाए । श्रीमाल नगर वर्तमान में भिन्नमाल के नाम से सुख्यात है। यह नगर उस समय काफी समृद्धिशाली व व्यापार का केन्द्र था प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्नेन सांग ने ई.स. 641 में इस शहर की समृद्धि का वर्णन यात्रा वृतांतों में किया । काल क्रम से कुदरती आफत, अकाल आदि कई कारणों से धीरे धीरे लोगों ने अन्य जगह पलायन शुरू किया और इस तरह विभिन्न क्षेत्रों में जीवन यापन हेतु अलग अलग स्थानों मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट,ª राजस्थान तथा अन्य स्थानों पर बस गये । यथा उन स्थानों पर जाकर अपने जीवन यापन के लिए विभिन्न क्रिया कलापों – व्यापार आदि में संलग्न हो गयेे और श्रीमाली महाजन के नाम से जाने जाने लगे ।

भारत में गोत्र पद्धति के जरिये गोत्र को पता चलता है । इससे मूलपिता और मूल परिवार जिससे संबंध रखते हैं का पता चलता है। सभी जातियों में गोत्र समान रूप से पाये जाते हंै । वैसे गोत्र का अर्थ गौ, गौ रक्षा और गौ रक्षक से भी संबंध रखता है । शायद जब इसकी शुरूआत हुई होगी तो सभी वे ऋषि जिनके लिए गाय का महत्व विशेष रहा होगा, उनकी रक्षा करते होगे इस कारण उनके साथ गोत्र से जोड़ कर खास पहचान देने की कोशिश की गई होगी ।

गोत्र पहले आया और फिर कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था तय हुई जिसमें गुण-कर्म-योग्यता के आधार पर वर्ण चयन किया गया और विभिन्न कारणों के आधार पर उनका ऊंचा नीचा वर्ण बदलता रहा किसी क्षेत्र में किसी गोत्र विशेष का व्यक्ति ब्राह्मण वर्ग में रह गया, तो कही ंक्षत्रिय, कहीं वैश्य, कहीं शुद्र कहलाया । बाद में जन्म के आधार पर जाति स्थिर हो गई । यही वजह है कौशिक ब्राह्मण भी हंै और क्षत्रिय भी । कश्यप गोत्रिय ब्राह्मण भी हैं, राजपूत भी हं,ै वैश्य भी हैं ।

गोत्र मूल रूप से ब्राह्मणों के उन सात वंशो से संबंधित होता है जो अपनी उत्पत्ति सात ऋषियों से मानते हंै। ये सात ऋषि हैं – 1 अत्रि, 2 भारद्वाज, 3 भृगु, 4 गौतम, 5 कश्यप, 6 वशिष्ठ, 7 विश्वामित्र । बाद में इसमें आठवां गोत्र अगस्त्य भी जोड़ा गया । गोत्रों की संख्या बढ़ती गई है । जैन गं्रथों में सात गोत्रों का उल्लेख है कश्यप, गौतम, वत्स्य, कुत्स, कौशिक, मण्डव्य और वशिष्ठ । लेकिन छोटे स्तर पर साधुओं को जोड़ कर हमारे देश में 115 गोत्र हंै । गैर ब्राह्मण समुदायों ने भी इसी प्रथा को अपनाया। क्षत्रिय, वैश्यों ने भी इसे अपनाया । इसके लिए उन्होंने अपने निकट के ब्राह्मणों या गुरूओं के गोत्रों को अपना गोत्र बना लिया । प्रयाग राज के धार्मिक विद्वान राम नरेश त्रिपाठी कहते हंै कि हिन्दू परम्पराओं और मान्यताओं के अनुसार पिता का गोत्र ही पुत्र को मिलता है । अगर किसी ने किसी को दत्तक पुत्र के रूप मंे स्वीकार किया हो तो उसे उसका गोत्र मिल जाता है ।

ब्राह्मणों के अलावा अन्य जातियों में भी गोत्र सुनिश्चित किये जाते हंै । इनकी प्रवर व अटकंे होती हैं और गोत्र भी जिन ऋषियों के भी साथ ब्राह्मणों का संबंध था उनके अनुसार तथा सभ्य समाज का हिस्सा बनने पर वंशानुगत पहचान के लिए गोत्र अंगीकार कर लिये गये । कई परिवारांे द्वारा जैन धर्म अंगीकार कर लिया गया और इस तरह अपने पूरे वंश के गोत्र सूचक नाम उस अनुसार अंगीकार कर लिये गये ।

कुम्भलगढ़ के व्यास डिबलिया मेहरखजी की पत्नी ललिता की वर्षी पर इकट्ठे श्रीमाली ब्राह्मणों ने कन्या विक्रम बन्द करने का प्रस्ताव किया । प्रस्तावक पुंजाजी सहित चार व्यक्ति जो समर्थन में थे उनमें से एक संशय में रहा । इसलिए वे साढे तीन पुड़ तथा संशय वाला आधा पुड़ कहलाया और जो नौ व्यक्ति इस प्रस्ताव के
विरोध में थे वे नौ पु़ड़ी कहलाए। पुड़ की तरह ही कुछ अन्य घटनाओं को लेकर श्रीमाली ब्राह्मणों में दशा बिसा इत्यादि छोटे छोटे घटक बनते गए जो जातीय एकरूपता में बाधक सिद्ध हुए । नवीन घटकों के उदय एवं उनकी रूढ़ तथा संकीर्ण मनोवृत्ति के परिपेक्ष्य में इस जातीय समुदाय की पहचान ’श्रीमाली शब्द’ के व्यापक बोध में ही सुरक्षित बनी हुई है। चूृृंकि वैश्य बाह्मणों के ही अनुचर थे अतः ये भी इन्ही घटक के रूप में जाने जाने लगे ।

श्रीमाली वैश्य :

जब लक्ष्मीजी ने श्रीमालनगर का निर्माण कराके वहाँ श्रीमाली ब्राह्मणों तथा त्रागड सोनियों को बसा दिया तब व्यापार कर्म के लिए भगवान् विष्णु ने वैश्यों को उत्पन्न किया और श्रीमाल क्षेत्र में वाणिज्य पशुपालन तथा खेती करने का आदेश दिया –

ततो मनोगतं ज्ञात्वा देव्या देवो जनार्दनः |

उरु विलोकयामास सर्गकृत्ये कृतादरः ||

यज्ञोपवीतिनः सर्वे वणिज्योऽथ विनिर्ययुः |

ते प्रणम्य चतुर्बाहुमिदमूचुरतन्द्रिताः ||

अस्मानादिश गोविन्द कर्मकाण्डे यथोचिते |

तत् श्रुत्वा प्रणतान् विष्णुर्वनिजः प्राह तानिदं |

पाशुपाल्यं कृषि र्वार्ता वाणिज्यं चेति वः क्रियाः ||

प्राग्वाटादिशि पूर्वस्यां दक्षिणस्यां धनोत्कटाः |

तथा श्रीमालिनो याम्यांमूत्तरस्या मथो विशः ||

वैश्यों के बिना श्रीमाल वासियों का जीवननिर्वाह कैसे होगा ? इस चिंता से चिन्तित लक्ष्मीजी का मनोभाव भगवान् विष्णु जान गए। उन्होंने सृष्टि रचना के प्रयोजन से अपनी जंघाओं पर दृष्टिपात किया। वहाँ यज्ञोपवीत धारी वैश्य प्रकट हो गए। उन्होंने भगवान् विष्णु को प्रणाम करके अपने लिए कर्तव्य कर्म की अभिलाषा प्रकट की। भगवान् विष्णु बोले, तुम वाणिज्य कृषि और पशुपालन का काम करो।

वे वैश्य श्रीमाल नगरी में बस गए। जो श्रीमाल शहर के पूर्विभाग में रहे वे पोरवाल कहलाए। दक्षिणी भाग में बसने वाले श्रीमाली और उत्तर वाले उवला कहलाए।

एवमेते स्वर्णकाराः श्रीमालिवणिजस्तथा |

प्राग्वडा गुर्जराश्चैव पट्टवासास्तथापरे ||

इस प्रकार श्रीमाल क्षेत्र में सोनी, श्रीमाली वैश्य, पोरवाल, गूजर पटेल पटवा आदि वैश्य हुए।
श्रीमाली वैश्य कुलदेवी –

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्य स्वर्णकार क्रियास्तथा |

तेषां व्याघ्रेश्वरी देवी योगक्षेमस्यकारिणी |

वे सब खेती, पशुपालन, वाणिज्य और सुनारकर्म करने वाले वैश्य हुए। उनकी कुलदेवी व्याघ्रेश्वरी है।

dswsf.in/श्रीमाली-वैश्य-समाज-का-इत

HEMANT MUNDHDA - हेमंत मुंधडा

 

HEMANT MUNDHDA - हेमंत मुंधडा


AKSHYA GUPTA - A YOUNG ENERPRENEURE

AKSHYA GUPTA - A YOUNG ENERPRENEURE

कानपुर के अक्षय ने 2 साल पहले सब्सक्रिप्शन मॉडल पर ऑर्गेनिक फार्मिंक का स्टार्टअप शुरू किया, अब सालाना 8 लाख रु. कमाई

पिछले कुछ सालों में ऑर्गेनिक सब्जियों और फूड्स की डिमांड बढ़ी है। कई लोग ऑर्गेनिक फूड्स अपना रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत इसकी उपलब्धता को लेकर है। मार्केट में मिलने वाले ज्यादातर प्रोडक्ट्स में केमिकल मिले होते हैं। बहुत कम प्लेटफॉर्म ही ऐसे हैं, जहां ऑर्गेनिक प्रोडक्ट मिलते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्म की पहचान करना और उन तक पहुंचना मुश्किल होता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए कानपुर के अक्षय गुप्ता ने एक अनोखी पहल की है।

उन्होंने ऑर्गेनिक फार्मिंग का एक ऐसा स्टार्टअप लॉन्च किया है, जहां कस्टमर सब्सक्रिप्शन मॉडल पर अपनी पसंद की सब्जियां सालभर खा सकते हैं। इतना ही नहीं, कस्टमर यह भी मॉनिटर कर सकते हैं कि उनकी पसंद की सब्जियां कैसे उगाई जा रही हैं और उनमें क्या-क्या मिलाया जा रहा है। फिलहाल अक्षय के साथ ऐसे 90 कस्टमर जुड़े हैं।

अच्छी नौकरी छोड़ फार्मिंग सेक्टर में उतरे

30 साल के अक्षय गुप्ता कानपुर में रहते हैं। उन्होंने कम्प्यूटर साइंस से बीटेक किया है। कुछ साल तक उन्होंने जॉब भी की। दैनिक भास्कर से बातचीत में अक्षय बताते हैं कि एक बार काम के सिलसिले में मुझे यूपी इन्वेस्टर्स समिट में जाने का मौका मिला। वहां मुझे एग्रीकल्चर सेक्टर से जुड़े लोग मिले। उनसे बातचीत के बाद खेती को लेकर मेरी दिलचस्पी बढ़ी। तब मुझे पता चला कि जिन सब्जियों का इस्तेमाल हम लोग अपने खाने के रूप में करते हैं, उनमें कितने केमिकल मिले होते हैं, उसका कितना निगेटिव इफेक्ट हमारी हेल्थ पर पड़ता है।


30 साल के अक्षय गुप्ता ने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। कुछ साल तक उन्होंने नौकरी भी की है। अब लोग उनके नए काम की तारीफ भी कर रहे हैं।

इसके बाद अक्षय के मन में अक्सर ये बात आने लगी कि उन्हें कुछ ऐसा काम करना चाहिए जिससे वे खुद भी ऑर्गेनिक प्रोडक्ट खा सकें और दूसरों को भी प्रोवाइड करा सकें। कुछ साल इधर-उधर जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने तय किया कि वे फार्मिंग सेक्टर में जाएंगे और अपनी नौकरी छोड़ दी।

पहले से खेती का कोई बैकग्राउंड नहीं था

अक्षय बताते हैं कि खेती से उनका दूर-दूर तक लगाव नहीं रहा है। उनके पिता बिजनेस बैकग्राउंड से रहे हैं। जबकि अक्षय शुरुआत से ही अपनी स्टडी पर फोकस्ड रहे, इसलिए जब वे फार्मिंग सेक्टर में उतरे तो उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उन्हें न तो जमीन की समझ थी और न ही फसलों के बारे में कोई जानकारी। शुरुआत में उन्होंने एक एकड़ जमीन लीज पर ली और ऑर्गेनिक सब्जियों की खेती की। हालांकि कुछ खास उनके हाथ नहीं लगा। ज्यादातर सब्जियां उग ही नहीं पाईं या बहुत कम प्रोडक्शन रहा।

इसके बाद भी उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। उन्होंने खेती के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। इस काम में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने उनकी काफी मदद की। संस्थान के डायरेक्टर डॉक्टर एचजी प्रकाश और डॉ. खलील खान ने उनको खेती की बारीकियां समझाईं। इससे उन्हें फायदा भी हुआ और अगली बार बढ़िया प्रोडक्शन हुआ।


अक्षय कहते हैं कि हम पूरी तरह से ऑर्गेनिक खेती करते हैं। इसमें किसी भी तरह का केमिकल नहीं मिलाते हैं। कस्टमर चाहे तो फार्म में आकर देख भी सकता है।

अक्षय कहते हैं कि शुरुआत में मैंने खुद के इस्तेमाल के लिए सब्जियां उगाईं, जब प्रोडक्शन अच्छा हुआ तो आसपास के लोगों को भी उपलब्ध कराईं। लोगों को हमारी सब्जियां काफी पसंद आईं। इसके बाद मुझे लगा कि इस काम को प्रोफेशनल लेवल पर आगे बढ़ाया जा सकता है और साल 2019 में 'माय फार्म' नाम से एग्री स्टार्टअप शुरू किया। शुरुआत में वे अपना प्रोडक्ट मार्केट में भेजते थे, लेकिन लागत के मुकाबले उन्हें कमाई नहीं हो रही थी। कई बार बहुत कम कीमत पर भी उन्हें अपना प्रोडक्ट बेचना पड़ता था।

एक साल बाद नया बिजनेस मॉडल शुरू किया, लेकिन सफलता नहीं मिली

अक्षय बताते हैं कि जब मार्केट से बढ़िया रिस्पॉन्स नहीं मिला तो मैंने सीधे कस्टमर्स तक पहुंचने का टारगेट सेट किया। मैंने एक बिजनेस मॉडल तैयार किया, जिसमें हम लोगों को मंथली वनटाइम पेमेंट के बाद उनके घर सब्जियां पहुंचाते थे। हम एक फिक्स रेशियो में उनके पास सब्जियां पहुंचाते थे। इसके लिए हम हर महीने 2500 रुपए चार्ज करते थे। कुछ दिनों तक हमारा यह मॉडल चला, लेकिन बाद में दिक्कत होने लगी क्योंकि कई बार उतना प्रोडक्शन नहीं होता था, जितना उन्हें कस्टमर्स को देना होता था, इससे कस्टमर्स की नाराजगी झेलनी पड़ती थी। फिर हमनें यह मॉडल बंद कर दिया और नए आइडिया को लेकर प्लानिंग करने लगे।


हफ्ते में दो दिन कस्टमर्स के घर सब्जियों की होम डिलीवरी की जाती है। इसके लिए अक्षय ने कुछ लड़कों को हायर कर रखा है।

वे कहते हैं कि शहरों में ज्यादातर लोग अपने घर के आगे या पीछे खाली पड़ी जमीन या छत पर ही खुद का किचन गार्डन लगाते हैं। जिसमें वे अपनी पसंद की सब्जियां उगाते हैं और अमूमन उनकी जरूरत के मुताबिक प्रोडक्शन भी हो जाता है। फिर हमनें सोचा कि क्या हम ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार कर सकते हैं जहां कस्टमर का खुद का एक किचन गार्डन हो, उसमें सब्जियां भी उसके पसंद की हो और जो कुछ हफ्ते में या महीने में प्रोडक्शन हो, वह उसका हो।

सब्सक्रिप्शन मॉडल यानी हर कस्टमर का खुद का किचन गार्डन

साल 2020 की शुरुआत में अक्षय ने इस मॉडल पर काम करना शुरू किया। उन्होंने अपने आसपास के लोगों से बात की और मंथली सब्सक्रिप्शन बेस्ड एक मॉडल डेवलप किया। जिसमें एक फिक्स एरिया में हर कस्टमर का खुद का किचन गार्डन होता है। जहां उनके पसंद की सब्जियां उगाई जाती हैं। हफ्ते में दो दिन कस्टमर के घर प्रोडक्शन के हिसाब से सब्जियां पहुंचाई जाती हैं। इसके बदले एक कस्टमर को 1100 रुपए मंथली पेमेंट करना होता है। इसमें कोई अमाउंट फिक्स नहीं है कि हर हफ्ते या महीने इतना प्रोडक्ट कस्टमर को देना है। सीधा सा कॉन्सेप्ट है कि उस जमीन पर जितना भी प्रोडक्शन होगा, वह उस कस्टमर का होगा।

अक्षय कहते हैं कि कस्टमर्स को वनटाइम मंथली पेमेंट और अपनी पसंद की सब्जियों की लिस्ट प्रोवाइड करानी है। इसके बाद उनका कोई रोल नहीं होता है। यानी फार्मिंग से लेकर प्रोडक्शन, मॉनिटरिंग और फिर कस्टमर्स के घर तक सब्जियों की डिलीवरी का काम अक्षय की टीम करती है।


अक्षय बताते हैं कि सीजन के हिसाब से कस्टमर्स अपनी पसंद की सब्जियों की लिस्ट हमें प्रोवाइड करते हैं, उसके मुताबिक हम उन सब्जियों की फार्मिंग करते हैं।

हर कस्टमर अपने किचन गार्डन को मॉनिटर कर सकता है

अक्षय कहते हैं कि कोई भी कस्टमर फार्म पर आकर अपने किचन गार्डन की मॉनिटरिंग कर सकता है। वह यह भी देख सकता है कि उसके गार्डन में कौन-कौन सी सब्जियां हैं और किस हाल में हैं। उनकी देखरेख कैसे की जा रही है और किस तरह उन्हें उगाया जा रहा है। इसके साथ ही जल्द ही वे लोग एक ऐप भी लॉन्च करने वाले हैं, जिसकी मदद से कस्टमर घर बैठे ही अपने गार्डन को मॉनिटर कर सकेंगे। वे बताते हैं कि हमने इस मॉडल का पायलट प्रोजेक्ट पूरा कर लिया है। अपने लैंड पर सीसीटीवी भी लगा दी है ताकि कस्टमर्स अपने घर से ही लाइव अपने गार्डन को देख सकें। आने वाले कुछ महीनों में हमारा यह प्लेटफॉर्म शुरू हो जाएगा।

कैसे करते हैं मार्केटिंग, सब्सक्रिप्शन का क्या है तरीका?

अक्षय कहते हैं कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन मार्केटिंग पर ही हम पूरी तरह से फोकस कर रहे हैं। हमने खुद की वेबसाइट भी डेवलप की है। जिसके जरिए हम अपना प्रमोशन भी करते हैं और कस्टमर्स को भी जोड़ते हैं। अगर कोई कस्टमर हमारी सर्विस लेना चाहता है तो उसे वेबसाइट पर जाकर इन्क्वायरी करनी होगी। वह चाहे तो हमें फोन भी कर सकता है। उसके बाद हमारी टीम पूरी बातचीत कर लेगी और सब्सक्रिप्शन का प्रोसेस समझा देगी।


सब्जियों के साथ ही अक्षय की टीम कस्टमर्स की डिमांड पर मशरूम की फार्मिंग भी करती है। उन्होंने इसके लिए सेटअप लगा रखा है।

अक्षय अभी 20 बीघे जमीन पर खेती कर रहे हैं। यह जमीन उन्होंने लीज पर ले रखी है। उनके साथ कानपुर और लखनऊ से 90 कस्टमर जुड़े हैं। जल्द ही इस प्रोजेक्ट को वे दूसरे शहरों में भी शुरू करने वाले हैं। इसको लेकर उनकी टीम प्लानिंग कर रही है। उनके साथ 3-4 लोग कोर टीम में हैं। जबकि काम के मुताबिक वे मजदूर हायर करते रहते हैं। कमाई को लेकर वे कहते हैं कि इस मॉडल से उन्हें अच्छा मुनाफा हो रहा है। अभी वे 7 से 8 लाख रुपए सालाना कमाई कर रहे हैं।

PODWAL VAISHYA HISTORY - पोरवाल समाज का इतिहास

पोरवाल समाज का इतिहास


जांगडा पोरवाल समाज की उत्पत्ति

गौरी शंकर हीराचंद ओझा (इण्डियन एक्टीक्वेरी, जिल्द 40 पृष्ठ क्र.28) के अनुसार आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था।

जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। समय-समय पर उन्होंने अपने शौर्य गुण के आधार पर जंग में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था और मरते दम तक भी युद्ध भूमि में डटे रहते थे। अपने इसी गुण के कारण ये जांगडा पोरवाल (जंग में डटे रहने वाले पोरवाल) कहलाये। नौवीं और दसवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर हुए विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिये एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये। दिल्ली में रहनेवाले पोरवाल “पुरवाल”कहलाये जबकि अयोध्या के आस-पास रहने वाले “पुरवार”कहलाये। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गये। यहां ये पोरवाल व्यवसाय /व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा। और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाये। वर्तमान में इनकी कुल जनसंख्या 3 लाख 46 हजार (लगभग) है।

आमद पोरवाल कहलाने का कारण

इतिहासग्रंथो से ज्ञात होता है कि रामपुरा के आसपास का क्षेत्र और पठार आमदकहलाता था। 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में आमदगढ़ पर चन्द्रावतों का अधिकारथा। बाद में रामपुरा चन्द्रावतों का प्रमुखगढ़ बन गया। धीरे-धीरे न केवलचन्द्रावतों का राज्य ही समाप्त हो गया अपितु आमदगढ़ भी अपना वैभव खो बैठा।इसी आमदगढ़ किले में जांगडा पोरवालों के पूर्वज काफी अधिक संख्या में रहतेथे। जो आमदगढ़ का महत्व नष्ट होने के साथ ही दशपुर क्षेत्र के विभिन्नसुविधापूर्ण स्थानों में जाकर बसते रहे। कभी श्रेष्ठीवर्ग में प्रमुख मानाजाने वाला सुख सम्पन्न पोरवाल समाज कालांतर में पराभव (दरिद्रता) कीनिम्नतम् सीमा तक जा पहुंचा, अशिक्षा, धर्मभीरुता और प्राचीन रुढ़ियों कीइसके पराभव में प्रमुख भूमिका रही। कृषि और सामान्य व्यापार व्यवसाय केमाध्यम से इस समाज ने परिश्रमपूर्वक अपनी विशिष्ठ पहचान पुन: कायम की।किन्तु आमदगढ़ में रहने के कारण इस क्षेत्र के पोरवाल आज भी आमद पोरवालकहलाते है ।

गौत्रों का निर्माण

श्रीजांगडा पोरवाल समाज में उपनाम के रुप में लगायी जाने वाली 24 गोत्रें किसीन किसी कारण विशेष के द्वारा उत्पन्न हुई और प्रचलन में आ गई। जांगलप्रदेश छोड़ने के पश्चात् पोरवाल वैश्य अपने- अपने समूहों में अपनी मानमर्यादा और कुल परम्परा की पहचान को बनाये रखने के लिये इन्होंने अपनेउपनाम (अटके) रख लिये जो आगे चलकर गोत्र कहलाए। किसी समूह विशेष में जोपोरवाल लोग अगवानी करने लगे वे चौधरी नाम से सम्बोधित होने लगे। पोरवालसमाज के जो लोग हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, आदि व्यावसायिक कार्यों में दक्षथे वे मेहता कहलाने लगे। यात्रा आदि सामूहिक भ्रमण, कार्यक्रमों के अवसर परजो लोग अगुवाई (नेतृत्व) करते और अपने संघ-साथियों की सुख-सुविधा कापूरा-पूरा ध्यान रखते वे संघवी कहे जाने लगे। मुक्त हस्त से दान देने वालेपरिवार दानगढ़ कहलाये। असामियों से लेन-देन करनेवाले, वाणिज्य व्यवसाय मेंचतुर, धन उपार्जन और संचय में दक्ष परिवार सेठिया और धनवाले धनोतिया पुकारेजाने लगे। कलाकार्य में निपुण परिवार काला कहलाए, राजा पुरु के वंशज्पोरवाल और अर्थ व्यवस्थाओं को गोपनीय रखने वाले गुप्त या गुप्ता कहलाए। कुछगौत्रें अपने निवास स्थान (मूल) के आधार पर बनी जैसे उदिया-अंतरवेदउदिया(यमुना तट पर), भैसरोड़गढ़(भैसोदामण्डी) में रुकने वाले भैसोटा, मंडावलमें मण्डवारिया, मजावद में मुजावदिया, मांदल में मांदलिया, नभेपुर केनभेपुरिया, आदि।

श्री जांगडा पोरवाल समाज की 24 गोत्र

सेठिया, काला, मुजावदिया, चौधरी, मेहता, धनोतिया, संघवी, दानगढ़, मांदलिया, घाटिया, मुन्या, घरिया, रत्नावत, फरक्या, वेद, खरडिया, मण्डवारिया, उदिया, कामरिया, डबकरा, भैसोटा, भूत, नभेपुरिया, श्रीखंडिया

भेरुजी

प्रत्येकगोत्र के अलग- अलग भेरुजी होते हैं। जिनकी स्थापना उनके पूर्वजों द्वाराकभी किसी सुविधाजनक स्थान पर की गयी थी। स्थान का चयन पवित्र स्थान के रुपमें अधिकांश नदी के किनारे, बावड़ी में, कुआं किनारे, टेकरी या पहाड़ी परकिया गया। प्रत्येक परिवार अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित भेरुजी की वर्षमें कम से कम एक बार वैशाख मास की पूर्णिमा को सपरिवार पूजा करता है।मांगलिक अवसरों पर भी भेरुजी को बुलावा परिणय पाती के रुप में भेजा जाताहै, उनकी पूजा अर्चना करना आवश्यक समझा जाता है। भेरुजी के पूजन पर मालवाकी खास प्रसादी दाल-बाफले, लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।भेरुजी को भगवान शंकर का अंशावतार माना जाता है यह शंकरजी का रुद्रावतारहै इन्हें कुलदेवता भी कहा जाता है। जांगडा पोरवाल समाज की कुलदेवीअम्बिकाजी (महाशक्ति दुर्गा) को माना जाता है।

श्री जांगडा पोरवाल समाज के 24 गोत्रों के भेरुजी स्थान

श्री जांगडा पोरवाल समाज के 24 गोत्रों के भेरुजी स्थान

मांदलिया- अचारिया – कचारिया (आलोट-ताल के पास),कराड़िया (तहसील आलोट),रुनिजा,पीपल बाग, मेलखेड़ा

बरसी-करसी, मंडावल

सेठिया- आवर – पगारिया (झालावाड़),नाहरगढ़,घसोई जंगल में,विक्रमपुर (विक्रमगढ़ आलोट),चारभुजा मंदिर दलावदा (सीतामऊ लदूना रोड)

काला- रतनजी बाग नाहरगढ़,पचांयत भवन, खड़ावदा,बड़ावदा (खाचरौद)

मुजावदिया- जमुनियाशंकर (गुंदी आलोट),कराड़िया (आलोट),मेलखेड़ा,रामपुरा,अचारिया, कचारिया, मंडावल

चौधरी - खड़ावदा, गरोठ,रामपुरा, ताल के पास,डराड़े-बराड़े (खात्याखेड़ी),आवर पगारिया (झालावाड़)

मेहता- गरोठ बावड़ी में, रुनिजा

धनोतिया- घसोई जंगल में,कबीर बाड़ी रामपुरा,ताल बसई,खेजड़िया, मेलखेडा

संघवी- खड़ावदा (पंचायत भवन)

दानगढ़- आवरा (चंदवासा के पास),बुच बेचला (रामपुरा)

घाटिया- लदूना रोड़ सीतामऊ

मुन्या- गरोठ बावड़ी में

घरिया- बरसी-करसी (महिदपुर रोड़),मंडावल (आलोट)

रत्नावत - पंचपहाड़, भैसोदामंडी,सावन (भादवामाता रोड),बरखेड़ा पंथ

फ़रक्या- पड़दा (मनासा रोड),बरखेड़ा गंगासा (खड़ावदा रोड),घसोई जंगल में,बड़ागांव (नागदा)

वेद- जन्नोद (रामपुरा के पास),साठखेड़ा

खर्ड़िया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

मण्डवारिया- कबीर बाड़ी रामपुरा.तालाब के किनारे पावटी,दोवरे-पैवर (संजीत)

उदिया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

कामरिया- मंडावल (तह. आलोट),जन्नोद (रामपुरा के पास)

डबकरा- अराडे-बराडे (खात्याखेड़ी, सुवासरा रोड),सावन, चंदवासा, रुनिजा

भैसोटा- बरसी-करती (महिदपुर रोड के पास),मंडावल (तह. आलोट)

भूत- गरोठ बावड़ी में

रुनिजा – घसोई

नभेपुरिया - वानियाखेड़ी, (खड़ावदा के पास)

श्रीखंडिया- इन्दौर सेठजी का बाग

श्री जांगडा पोरवाल समाज में प्रचलित उपाधियाँ (पदवियाँ)

पदवी - वास्तविक गोत्र

चौधरी - मांदलिया, काला, धनोतिया, डबकरा, सेठिया, चौधरी या अन्य

मोदी - काला, धनोतिया, डबकरा, दानगढ़

मरच्या - उदिया

कोठारी - मांदलिया, सेठिया या अन्य

संघवी - काला, संघवी

बटवाल - वेद

मिठा - मांदलिया


पोरवाल समाज के महापुरुष

राजा टोडरमल पोरवाल (सन् 1601 से 1666 ई.)

टोडरमल का जन्म चैत्र सुदी नवमी बुधवार संवत् 1658 वि. (सन् 1601, मार्च 18) को बूँदी के एक पोरवाल वैश्य परिवार मे हुआ था। बाल्यकाल से वह हष्टपुष्ट, गौरवर्ण युक्त बालक अत्यन्त प्रतिभाशाली प्रतीत होता था। धर्म के प्रती उसका अनुराग प्रारंभ से ही था। मस्तक पर वह वैष्णव तिलक लगया करता था।

युवावस्था में टोडरमल ने अपने पिता के लेन-देन के कार्य एवं व्यवसाय में सहयोग देते हुए अपने बुद्धि चातुर्य एवं व्यावसायिक कुशलता का परिचय दिया । प्रतिभा सम्पन्न पुत्र को पिता ने बूँदी राज्य की सेवा में लगा दिया । अपनी योग्यता और परिश्रम से थोड़े ही दिनों में टोडरमल ने बूँदी राज्य के एक ईमानदार , परिश्रमी और कुशल कर्मचारी के रुप में तरक्की करते हुए अच्छा यश अर्जित कर लिया।

उस समय मुगल सम्राट जहाँगीर शासन कर रहा था। टोडरमल की योग्यता और प्रतिभा को देखकर मुगल शासन के अधिकारियों ने उसे पटवारी के पद पर नियुक्त कर दिया। थोड़े ही काल में टोडरमल की बुद्धिमत्ता , कार्यकुशलता, पराक्रम और ईमानदारी की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वह तेजी से उन्नति करने लगा।

सम्राट जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शाहजहाँ मुगल साम्राज्य का स्वामी बना। 1639 ई. में शाहजहाँ ने टोडरमल के श्रेष्ठ गुणों और उसकी स्वामी भक्ति से प्रभावित होकर उसे राय की उपाधि प्रदान की तथा सरकार सरहिंद की दीवानी, अमीरी और फौजदारी के कार्य पर उसे नियुक्त कर दिया। टोडरमल ने सरहिंद में अपनी प्रशासनिक कुशलता का अच्छा परिचय दिया जिसके कारण अगले ही वर्ष उसे लखी जंगल की फौजदारी भी प्रदान कर दी गई । अपने शासन के पन्द्रहवें वर्ष में शाहजहाँ ने राय टोडरमल पोरवाल को पुन: पुरस्कृत किया तथा खिलअत, घोड़ा और हाथी सहर्ष प्रदान किये । 16 वें वर्ष में राय टोडरमल एक हजारी का मनसबदार बन गया। मनसब के अनुरुप से जागीर भी प्राप्त हुई। 19वें वर्ष में उसके मनसब में पाँच सदी 200 सवारों की वृद्धि कर दी गई । 20वें वर्ष में उसके मनसब में पुन: वृद्धि हुई तथा उसे ताल्लुका सरकार दिपालपुर परगना जालन्धर और सुल्तानपुर का क्षेत्र मनसब की जागीर में प्राप्त हुए । उसने अपने मनसब के जागीरी क्षेत्र का अच्छा प्रबन्ध किया जिससे राजस्व प्राप्ति में काफी अभिवृद्धि हो गई ।

राय टोडरमल निरन्तर उन्नति करते हुए बादशाह शाहजहाँ का योग्य अधिकारी तथा अतिविश्वस्त मनसबदार बन चुका था । 21वें वर्ष में उसे राजा की उपाधि और 2 हजारी 2हजार सवार दो अस्पा, तीन अस्पा की मनसब में वृद्धि प्रदान की गई । राजा की पदवी और उच्च मनसब प्राप्त होने से राजा टोडरमल पोरवाल अब मुगल सेवा में प्रथम श्रेणी का अधिकारी बन गया था। 23वें वर्ष में राजा टोडरमल को डंका प्राप्त हुआ।

सन् 1655 में राजा टोडरमल गया। जहाँ उसका एक परममित्र बालसखा धन्नाशाह पोरवाल रहता था। धन्नाशाह एक प्रतिष्ठित व्यापारी था। आतिथ्य सेवा में वह सदैव अग्रणी रहता था। बूँदी पधारने वाले राजा एवं मुगल साम्राज्य के उच्च अधिकारी उसका आतिथ्य अवश्य ग्रहण करते थे। बूँदी नरेश धन्नाशाह की हवेली पधारते थे इससे उसके मानसम्मान में काफी वृद्धि हो चुकी थी। उसकी रत्ना नामक एक अत्यन्त रुपवती, गुणसम्पन्न सुशील कन्या थी। यही उसकी इकलौती संतान थी। विवाह योग्य हो जाने से धन्नाशाह ने अपने समान ही एक धनाढ्य पोरवाल श्रेष्ठि के पुत्र से उसकी सगाई कर दी।

भाग्य ने पलटा खाया और सगाई के थोड़े ही दिन पश्चात् धन्नाशाह की अकाल मृत्यु हो गई । दुर्भाग्य से धन्नाशाह की मृत्यु के बाद लक्ष्मी उसके घर से रुठ गई जिससे एक सुसम्पन्न, धनाढ्य प्रतिष्ठित परिवार विपन्नावस्था को प्राप्त हो गया। धन्नाशाह की विधवा के लिए यह अत्यन्त दु:खमय था। गरीबी की स्थिति और युवा पुत्री के विवाह की चिन्ता उसे रात दिन सताया करती थी । ऐसे ही समय अपने पति के बालसखा राजा टोडरमल पोरवाल के बूँदी आगमन का समाचार पाकर उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ।

एक व्यक्ति के साथ धन्नाशाह की विधवा ने एक थाली मे पानी का कलश रखकर राजा टोडरमल के स्वागत हेतू भिजवाया। अपने धनाढ्य मित्र की ओर से इस प्रकार के स्वागत से वह आश्चर्यचकित रह गया। पूछताछ करने पर टोडरमल को अपने मित्र धन्नाशाह की मृत्यु उसके परिवार के दुर्भाग्य और विपन्नता की बात ज्ञात हुई, इससे उसे अत्यन्त दु:ख हुआ । वह धन्नाशाह की हवेली गया और मित्र की विधवा से मिला। धन्नाशाह की विधवा ने अपनी करुण गाथा और पुत्री रत्ना के विवाह की चिन्ता से राजा टोडरमल को अवगत कराया।

अपने परममित्र सम्मानित धनाढ्य श्रेष्ठि धन्नाशाह की विधवा से सारी बातें सुनकर उसे अत्यन्त दु:ख हुआ। उसने उसी समय धन्नाशाह की पुत्री रत्ना का विवाह काफी धूमधाम से करने का निश्चय व्यक्त किया तथा तत्काल समुचित प्रबन्ध कर रत्ना के ससुराल शादी की तैयारी करने की सूचना भिजवा दी। मुगल साम्राज्य के उच्च सम्मानित मनसबदार राजा टोडरमल द्वारा अपने मित्र धन्नाशाह की पुत्री का विवाह करने की सूचना पाकर रत्ना के ससुराल वाले अत्यन्त प्रसन्न हुए ।

राजा टोडरमल ने एक माह पूर्व शान शौकत के साथ गणपतिपूजन करवा कर (चाक बंधवाकर) रत्ना के विवाहोत्सव का शुभारंभ कर दिया। निश्चित तिथि को रत्ना का विवाह शाही ठाटबाट से सम्पन्न हुआ। इस घटना से राजा टोडरमल की उदारता, सहृदयता और मित्रस्नेह की सारी पोरवाल जाति में प्रशंसा की गई और उसकी कीर्ति इतनी फैली की पोरवाल समाज की स्त्रियाँ आज भी उनकी प्रशंसा के गीत गाती है और पोरवाल समाज का एक वर्ग उन्हें अपना प्रातः स्मरणीय पूर्वज मानकर मांगलिक अवसरों पर सम्मान सहित उनका स्मरण करता है तथा उन्हें पूजता है। इस प्रकार राजा टोडरमल का यश अजर-अमर हो गया। हाड़ौती (कोटा-बूँदी क्षेत्र) तथा मालवा क्षेत्र में जहाँ भी पोरवाल वास करते है, वहाँ टोडरमल की कीर्ति के गीत गाये जाते हैं तथा उनका आदरसहित स्मरण किया जाता है। उनके प्रति श्रद्धा इतनी अधिक रही है कि पोरवाल व्यापारी की रोकड़ न मिलने पर टोडरमल का नाम लिखा पर्चा रोकड़ में रख देने से प्रातःकाल रोकड़ मिल जाने की मान्यता प्रचलित हो गई है।

सम्राट शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दाराशिकोह वेदान्त दर्शन से अत्यन्त प्रभावित उदार विचारों का व्यक्ति था। सन् 1658 से बादशाह शाहजहाँ के गम्भीर रुप से अस्वस्थ हो जाने की अफवाह सुनकर उसके बेटे मुराद और शुजा ने विद्रोह कर दिया। 16 अप्रैल 1658 ई. शुक्रवार को धरमाट (फतियाबाद) के मैदान में औरंगज़ेब की सेनाओं ने शाही सेना को करारी शिकस्त दी। सामूगढ़ के मैदान में पुनः दाराशिकोह के नेतृत्व में शाही सेना को औरंगज़ेब और मुराद की संयुक्त सेना से पराजय का सामना करना पड़ा। दारा युद्ध में पराजित होकर भागा। औरंगज़ेब ने आगरा पर अधिकार कर पिता को किले में कैद किया और फिर आगे बढ़ा। रास्ते में मुराद को समाप्त कर औरंगज़ेब ने पंजाब की ओर भागे दाराशिकोह का पीछा किया।

राजा टोडरमल की प्रारम्भ से ही दाराशिकोह के प्रति सहानुभूति थी। पराजित दारा के प्रति उसकी सहानुभूति में कोई अन्तर नहीं आया। अतः जब दारा लखी जंगल से गुजरा तो राजा टोडरमल ने जो लखी जंगल का फौजदार था, अपने कई मौजें में गड़े धन से 20 लाख रुपये गुप्त रुप से सहायतार्थ प्रदान किये थे।

इसी कारण पंजाब की ओर दारा का पीछा करने के बाद लाहौर से दिल्ली की तरफ लौटते हुए औरंगज़ेब ने अनेक सरदारों और मनसबदारों को खिलअते प्रदान की थी। तब लखी जंगल के फौजदार राजा टोडरमल को भी खिलअत प्राप्त हुई थी।

इटावा का फौजदार रहते हुए राजा टोडरमल ने अपनी पोरवाल जाति को उस क्षेत्र में बसाने तथा उन्हें व्यापार- व्यवसाय की अभिवृद्धि के लिये समुचित सुविधाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था। सम्भवतः इस कारण भी जांगड़ा पोरवाल समाज में इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के उद्देश्य से एक श्रद्धेय पूर्वज के रुप में राजा टोडरमल की पूजा की जाती है ।

राजा टोडरमल अपने अंतिम समय में अपने जन्मस्थल बूँदी में अपना शेष जीवन परोपकार और ईश्वर पूजन में व्यतीत करने लगे तथा समाज के सैकड़ों परिवार इटावा क्षेत्र त्यागकर बून्दी कोटा क्षेत्र में आ बसे। यहीं से ये परिवार बाद में धीरे-धीरे मालवा क्षेत्र में चले आए।

राजा टोडरमल की मृत्यु कहाँ और किस तिथि को हुई थी इस सम्बन्ध में निश्चित कुछ भी ज्ञात नहीं है । किन्तु अनुमान होता है कि सन् 1666 ई. में पोरवाल समाज के इस परोपकारी प्रातः स्मरणीय महापुरूष की मृत्यु बूँदी में ही हुई होगी । कोटा बूँदी क्षेत्र में आज भी न केवल पोरवाल समाज अपितु अन्य समाजों मे भी राजा टोडरमलजी के गीत बड़ी श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ – पोरवाल समाज का इतिहास.
porwal-chopal.blogspot.com/2011/09/blog-post.html

AGRAWAL GENOLOGY - अग्रवाल वंश वृक्ष

 AGRAWAL GENOLOGY - अग्रवाल वंश वृक्ष 


Wednesday, September 1, 2021

TANUSHREE JAIN - A YOUNG ACHIEVER

TANUSHREE JAIN - A YOUNG ACHIEVER

जयपुर की तनुश्री ने 3 साल पहले मोमबत्ती बनाने का स्टार्टअप शुरू किया, अब 12 लाख रु. टर्नओवर, 250 महिलाओं को नौकरी भी दी

कैंडल यानी मोमबत्ती की डिमांड अमूमन हर इवेंट में होती है। चाहे बर्थडे पार्टी हो, क्रिसमस पार्टी हो, कोई सेलिब्रेशन हो या फिर कोई त्योहार, हर इवेंट में कैंडल जलाने का ट्रेंड है। हम रोशनी और घरों की खूबसूरती के लिए कैंडल जलाते हैं। अब तो मार्केट में डिमांड के मुताबिक कलर और साइज से लेकर हर तरह की खुशबू वाले कैंडल उपलब्ध हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि ये कैंडल जितनी अधिक खूबसूरती बिखेरते हैं, उससे कहीं ज्यादा हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक भी हैं?

दरअसल, कैंडल से पैराफिन वैक्स निकलता है, जो टॉक्सिक नेचर का होता है। यह हमारी सेहत को बहुत हद तक प्रभावित करता है। इससे सांस लेने में दिक्कत, सिर दर्द, अस्थमा जैसी बीमारियां हो सकती हैं। कई बार तो यह ट्यूमर और कैंसर का भी कारण बनता है। इससे बचने का सबसे कारगर तरीका है, इको फ्रेंडली कैंडल का इस्तेमाल करना। जयपुर में रहने वाली तनुश्री जैन ने ऐसी ही पहल की है। वे करीब 3 साल से लोकल कारीगरों के साथ मिलकर नेचुरल वैक्स की मदद से ऑर्गेनिक कैंडल तैयार कर रही हैं। भारत के साथ-साथ विदेशों में भी उनके प्रोडक्ट की अच्छी डिमांड है। पिछले साल उनकी कंपनी का टर्नओवर 12 लाख रुपए रहा।

जॉब का ऑफर मिला, लेकिन नौकरी जॉइन नहीं की


25 साल की तनुश्री का शुरू से ही सोशल सेक्टर से लगाव रहा है। वे पढ़ाई के दौरान ही लोकल कारीगरों के साथ जुड़ गई थीं।

तनुश्री मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखती हैं। उनके पापा आर्मी में रहे जबकि मां टीचर हैं। साल 2017 में कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग करने के बाद तनुश्री को कई अच्छी कंपनियों से जॉब का ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं की। वे कहती हैं कि मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई भले की है, लेकिन कभी इस सेक्टर में मेरी खास दिलचस्पी नहीं रही। मैं हमेशा से ग्राउंड लेवल पर, स्थानीय लोगों के साथ काम करना चाहती थी। मैंने पढ़ाई के दौरान ही स्थानीय कारीगरों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया था।

तनुश्री बताती हैं कि हमारे एरिया में हर तरह के स्थानीय कलाकार और कारीगर रहते हैं। जब मैं उनसे मिलीं और उनके काम को समझा तो रियलाइज हुआ कि इन कारीगरों को मार्केटिंग को लेकर खासी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ये लोग बढ़िया से बढ़िया प्रोडक्ट बनाने के बाद सही तरह से उसकी मार्केटिंग नहीं कर पाते हैं। इसके बाद मैंने अपनी टेक्निकल स्किल का इस्तेमाल इनकी मार्केटिंग के लिए करना शुरू कर दिया। मैं अलग-अलग ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर स्थानीय कारीगरों के प्रोडक्ट की मार्केटिंग करने लगी। इससे मुझे भी मार्केटिंग की अच्छी-खासी समझ हो गई।

हेल्थ बिगड़ने लगी तो रिसर्च पर फोकस किया


तनुश्री स्थानीय महिलाओं को अपने स्टार्टअप के जरिए रोजगार दे रही हैं। वे ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं।

तनुश्री ने 2017 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंडियन स्कूल ऑफ डेवलपमेंट मैनेजमेंट (ISDM) से मास्टर्स किया। इस दौरान उन्हें एक साल तक दिल्ली में रहना पड़ा। वहां की हवा उनकी सेहत के लिए सही नहीं रही और जल्द ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी। शुरुआत में तो उन्होंने कुछ खास ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में उन्होंने इस पर रिसर्च करना शुरू किया। कुछ दिन बाद तनुश्री ने रियलाइज किया कि खराब स्वास्थ्य के पीछे केमिकल वाले कैंडल जलाना भी एक बड़ी वजह है। इसके बाद उन्होंने कैंडल बनाने की प्रोसेस को समझना शुरू किया।

1.5 लाख रुपए की लागत से शुरू किया स्टार्टअप

तनुश्री बताती हैं कि लगातार स्टडी और रिसर्च के बाद मुझे पता चला कि ज्यादातर लोग कैंडल बनाने में केमिकल का इस्तेमाल करते हैं। इससे पॉल्यूशन क्रिएट होता है। हम बंद कमरे में ऐसे कैंडल जलाते हैं तो उसका निगेटिव असर हमारी हेल्थ पर पड़ता है। इसकी जगह अगर कैंडल बनाने में नेचुरल वैक्स और एरोमेटिक हर्ब से बने ऑयल का इस्तेमाल किया जाए, तो सेहत को नुकसान नहीं होगा। इसके बाद 2018 के अंत में तनुश्री ने अपने आसपास के कारीगरों से बात की।


तनुश्री मार्केटिंग के लिए कोरोना से पहले अलग-अलग जगहों पर स्टॉल भी लगाती थीं। हालांकि अब वे ऑनलाइन मार्केटिंग पर ज्यादा फोकस कर रही हैं।

10 महिलाएं उनके साथ काम करने के लिए राजी हो गईं। इसके बाद उन्होंने इन महिलाओं को मोमबत्ती बनाने की ट्रेनिंग दी। फिर उन्होंने कैंडल बनाने के लिए रॉ मटेरियल्स इकट्ठा किए और घर से ही काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने स्टार्टअप का नाम Nushaura रखा। शुरुआत में सेटअप जमाने और काम शुरू करने में तनुश्री के करीब 1.5 लाख रुपए खर्च हुए।

तनुश्री कहती हैं कि हमारे प्रोडक्ट की क्वालिटी मार्केट में मिलने वाले कैंडल से अलग है। यही वजह है कि शुरुआत में ही हमें लोगों से अच्छा रिस्पॉन्स मिलने लगा। धीरे-धीरे हमारे कस्टमर्स भी बढ़ते गए और हमारे साथ काम करने वाली महिलाएं भी। फिलहाल हमारे पास 60 ग्राम से लेकर 1 किलोग्राम तक के 20 से ज्यादा वैराइटी के कैंडल्स हैं। जिनकी प्राइस 99 रुपए से लेकर 1999 रुपए तक है।

कैसे बनाती हैं कैंडल्स, क्या है बिजनेस मॉडल?

तनुश्री के साथ फिलहाल राजस्थान और मध्य प्रदेश से 250 महिलाएं जुड़ी हैं। ये अपने-अपने घरों में काम करती हैं और प्रोडक्ट तैयार हो जाने के बाद तनुश्री को हैंडओवर कर देती हैं। प्रोडक्ट बिकने के बाद जितनी कमाई होती है, वह सभी कारीगरों में बराबर-बराबर बांट दी जाती है। कैंडल बनाने की प्रोसेस को लेकर तनुश्री बताती हैं कि मोटे तौर पर इसके लिए तीन चीजों- नेचुरल वैक्स, इसेंशियल ऑयल और कॉटन की बत्ती की जरूरत होती है।


स्थानीय महिलाओं को तनुश्री ने मोमबत्ती बनाने की ट्रेनिंग दी है। ये महिलाएं घर से ही मोमबत्ती तैयार करके तनुश्री को हैंडओवर कर देती हैं।

कैंडल तैयार करने के लिए सबसे पहले वैक्स को किसी बर्तन में रखकर गैस पर या चूल्हे पर गर्म किया जाता है। इसके बाद उसमें इसेंशियल ऑयल मिलाया जाता है। उसके बाद दोनों के मिक्सर को कैंडल बनाने वाले डमी कंटेनर में भरा जाता है। उसमें बत्ती पहले से लगी हुई होती है। कुछ वक्त बाद वैक्स जम जाता है और कैंडल तैयार हो जाता है। उसके बाद डमी को उससे अलग कर लिया जाता है। जिस साइज का हमें कैंडल चाहिए, वैसे डमी या सांचे का हम इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह अलग-अलग तरह के कैंडल के लिए अलग-अलग तरह के इसेंशियल ऑयल और कलर का इस्तेमाल किया जाता है।

नेचुरल वैक्स के लिए तनुश्री ने बरेली और गुजरात में मधुमक्खी पालन करने वाले किसानों से टाइअप किया है। वे लोग उन्हें नेचुरल वैक्स प्रोवाइड कराते हैं। जबकि इसेंशियल ऑयल वह ऑर्गेनिक फार्म हाउस और प्रोड्यूसर से कलेक्ट करती हैं।


कैसे करती हैं मार्केटिंग, क्या रही स्ट्रैटजी?

तनुश्री बताती हैं कि हम लोग ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों ही लेवल पर मार्केटिंग कर रहे हैं। इसके तहत ब्रांड टू कस्टमर यानी B2C और ब्रांड टू बिजनेस यानी B2B मार्केटिंग कर रहे हैं। कई बड़ी कंपनियों से हमारा टाइअप है। इसके साथ ही हम लोग सोशल मीडिया के जरिए देशभर में मार्केटिंग कर रहे हैं। हाल ही में हमने अमेजन और इंडिया मार्ट से भी अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करनी शुरू की है। इससे काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। अब तो हमनें इंडिया के बाहर भी कनाडा, अमेरिका सहित कई देशों में अपना प्रोडक्ट भेजना शुरू कर दिया है।

मार्केटिंग स्ट्रैटजी को लेकर तनुश्री कहती हैं कि हम सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटीज को कैंडल गिफ्ट करते हैं। इसके बदले वे लोग अपने अकाउंट से हमारे प्रोडक्ट की फोटो या वीडियो पोस्ट करते हैं। इससे मार्केटिंग में काफी फायदा मिलता है और कम वक्त में अधिक लोगों तक हमारा प्रोडक्ट पहुंच जाता है।

Friday, August 27, 2021

रामजन्मभूमि आंदोलन की वैश्य विभूतियां

रामजन्मभूमि आंदोलन की वैश्य विभूतियां

"रघुबर की छबि समान रघुबर छबि बनिया"


लोग आज वैश्य वर्ग या व्यापारिक जातियों(अग्रवाल, खत्री, सिंधी, जैन,बनिया, माहेश्वरी, आदि) के खिलाफ नफरत फैलाते हैं। पूछते हैं इन्होंने किया ही क्या है देश और धर्म के लिये। लेकिन अगर हम और सब चीजों को छोड़ भी दे सिर्फ राम जन्मभूमि आंदोलन को ही लें तो उसमें सबसे बड़ा हाथ निसंदेह इसी वर्ग का था..

हिंदुत्व पुरोधा श्रद्धेय श्री अशोक सिंहल -माननीय अशोक सिंहल जी ने विश्व के सबसे बड़े आंदोलन राम जन्मभूमि आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। अशोक सिंहल जी आगरा, उत्तरप्रदेश के सम्पन्न अग्रवाल परिवार से थे। उन्होंने राम जन्म भूमि न्यास के नाम से ट्रस्ट की स्थापना की थी। क्या आप जानते हैं की वो कोई बाबा या साधु नहीं बल्कि IIT BHU से पासआउट इंजीनियर थे। उन्होंने सर्व प्रथम 1989 में एक ईंट अपने सर पर रखकर राम जन्मभूमि आंदोलन का शिलान्यास किया और उसी के ठीक 30 वर्ष पश्च्यात सुप्रीम कोर्ट से राम जन्मभूमि आंदोलन के पक्ष में फैसला आया। अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में विहिप ने पूरे देश में बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित की जिसमें अशोक जी की तेजस्वी वाणी से लोगों में जोश भरा। अशोक सिंघल जी ने अपना पूरा जीवन राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया था। ये रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान कई बार पुलिस की लाठियों से घायल हुए लेकिन उन्होंने अपनी राम जन्मभूमि के प्रति लगन कम नहीं होने दी। उन्होंने बीजेपी की सरकार में भी, जिस समय माननीय श्री अटल बिहारी जी प्रधान मंत्री थे, रामलला के मंदिर निर्माण के लिए अनशन पर बैठे। सुब्रमनियम स्वामी ने राम मन्दिर का फैसला आने के बाद श्री अशोक सिंघल जी के लिए भारत रत्न की मांग की है।

कोठारी बंधु - राम कोठारी और शरद कोठारी इन दो युवा भाइयों को कोठारी बंधुओं के नाम से जाना जाता है। कोठारी बंधु कोलकाता के सफल व्यापारिक मारवाड़ी वैश्य घराने से थे। ये 1990 की कारसेवा में कोलकाता से पैदल चलकर अयोध्या पहुँचे थे। इन्होंने 30 अक्टूबर 1990 को बाबरी मस्जिद पर भगवा लहरा दिया था। 2 अक्टूबर को पुलिस की यूपी गोली से इनकी मृत्यु हुई।

देवकी नंदन अग्रवाल - देवकीनंदन अग्रवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने रामलला (नाबालिग) के मित्र के नाते अदालत में मुकदमा दायर कर कहा कि मुकदमे में रामलला को पार्टी बनाया जाय; क्योंकि इमारत में तो रामलला विराजमान हैं। मौके पर उनका कब्जा है। इसी के बाद हाईकोर्ट ने रामलला (मूर्ति) को पार्टी बनाया। अयोध्या विवाद से संबं‍धित 5 मुकदमे दायर किए गए थे। जिसमें से अंतिम व पाँचवाँ मुकदमा (संख्या 236/1989) भगवान रामलला विराजमान की ओर से 1 जुलाई, 1989 को देवकीनंदन अग्रवाल ने दायर किया था। कानून के जानकार देवकीनंदन अग्रवाल ने भगवान राम के निकट मित्र के रूप में अपने को पेश किया था। हिंदू मान्यताओं के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति एक जीवित इकाई है और अपना मुकदमा लड़ सकती है। लेकिन प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति नाबालिग मानी जाती है, इसलिए उनका मुकदमा लड़ने के लिए किसी एक व्यक्ति को माध्यम बनाया जाता है। न्यायालय ने रामलला का मुकदमा लड़ने के लिए देवकीनंदन अग्रवाल को रामलला के अभिन्न सखा के रूप में अधिकृत किया। न्याय प्रक्रिया संहिता की धारा 32 मानती है कि विराजमान ईश्वर (मूर्ति) को एक व्यक्ति माना जाता है। उसे एक व्यक्ति मानकर पक्षकार बनाया जा सकता है। इस आधार पर अदालत ने उनकी याचिका मंजूर कर ली। देवकीनंदन अग्रवाल द्वारा दायर मुकदमे में अदालत से माँग की गई थी कि राम जन्मभूमि अयोध्या का पूरा परिसर वादी (देव-विग्रह) का है, अत: राम जन्मभूमि पर नया मंदिर बनाने का विरोध करने वाले या इसमें किसी प्रकार की आपत्ति या बाधा खड़ी करने वाले प्रतिवादियों को उन्हें कब्जे से हटाने से रोका जाए।

बीजेपी के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी और नरेंद्र भाई मोदी की राम रथ यात्रा - लाल कृष्ण आडवाणी जी का जन्म कराची के एक सिंधी परिवार में हुआ था। रामजन्मभूमि आंदोलन को खड़ा करने में आडवाणी जी का बहुत बड़ा हाथ था। इन्होंने पूरे देश में रामरथ यात्रा निकाल कर अपनी ओजस्वी वाणी से रामलला मंदिर निर्माण के लिए लोगों में जोश भरा। उनके सारथी थे वर्तमान प्रधानमंत्री "नरेंद्र भाई दामोदरदास मोदी"

जय भगवान गोयल - अग्रवंशी जय भगवान गोयल वो शेरदिल शख्शियत जिसने सबसे पहले नेशनल टेलीविजन पर स्वीकारा की हाँ हमने तोड़ी थी बाबरी मस्जिद जो प्रतीक थी गुलामी की। इन्होंने कोर्ट में ये कहा था कि वह ढांचा मैंने ढहाया जो सजा देनी है मुझे दो।

सीताराम गोयल - सीताराम गोयल जी का मंदिर आंदोलन में अद्वितीय योगदान था। सीताराम गोयल जी ने भारत भर में आक्रान्ताओं द्वारा तोड़े गए मंदिरों की पूरी सूची, तथ्यों और तस्वीरों के साथ संकलित की थी, व इसमें सप्रमाण सभी तोड़े गए मंदिरों की पूरी डिटेल हिन्दू समाज के सामने रखी थी, जिसमें अयोध्या का श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर भी था।

रामानंद सागर की रामायण, अरुण गोविल का किरदार और रविन्द्र जैन जी के भजन - रामानंद सागर जी का जन्म पंजाब के खत्री परिवार में हुआ था। अगर हम ये कहें रम जन्मभूमि आंदोलन का ज्वार रामानंद सागर जी की रामायण की वजह से खड़ा हुआ था तो उसमें भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ये प्रसारण ऐसा दौर लेकर आया कि न केवल सड़कें सुनसान हो जाती थीं, बल्कि रेलवे स्टेशनों पर पर रुकने वाली ट्रेन का चालक दल भी "रामायण" देखने चले जाते थे.और ट्रेन अपने तय समय से चूक जाती थी! लगभग 65 करोड़ लोग इस धारावाहिक को नियमित रूप से देखते थे। रविन्द्र जैन जी इस रामायण की आवाज़ थे। उनके गाये और लिखे हुए गानों को सुनकर लोग रो पड़ते थे।

कहते हैं की राम जन्मभूमि आंदोलन में सबसे ज्यादा वैश्य बंधु ही गिरफ्तार हुए थे। ये था उनका राम प्रेम।

जय श्री राम

Sunday, August 15, 2021

PRASHANT AGRAWAL - HARYANA NEW DGP

सीनियर IPS प्रशांत कुमार अग्रवाल हरियाणा के नए DGP:मनोज यादव की रिटायरमेंट के बाद से चल रही थी जिम्मेदार चेहरा तलाशने की कवायद, 3 अफसरों के पैनल में सबसे ऊपर रहा PK का नाम


हरियाणा के पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार अग्रवाल। -फाइल फोटो

1988 बैच के सीनियर IPS अधिकारी प्रशांत कुमार अग्रवाल को हरियाणा के पुलिस महानिदेशक (DGP) बनाया गया है। प्रशांत राज्य के डीजीपी के तौर पर मनोज यादव की जगह लेंगे। इससे पहले प्रदेश सरकार की तरफ से भेजे गए 7 नामों में से UPSC ने तीन नामों का एक पैनल बनाया था। इसमें पीके अग्रवाल सबसे ऊपर था।

बता दें कि यूटी कैडर के आईपीएस अधिकारी मनोज यादव इस जिम्मेदारी पर थे। उन्हें बीते दिनों 4 महीने का एक्सटेंशन भी मिला था, जो पूरा हो गया। उनकी रिटायरमेंट के बाद प्रदेश में इस जिम्मेदारी के लिए नया चेहरा ढूंढने की कवायद चल रही थी। इसको लेकर यूपीएससी ने एक बैठक भी की थी, जिसमें हरियाणा के मुख्य सचिव और यूपीएससी के सदस्य मौजूद थे। बैठक में हरियाणा के डीजीपी के लिए तीन नामों का एक पैनल बनाया गया था। इन तीन नामों में प्रशांत कुमार अग्रवाल, आरसी मिश्रा और अकील मोहम्मद शामिल थे।

सरकार की तरफ से जारी पत्र।

चयन में वरिष्ठता का ध्यान रखा गया और अब सरकार ने सीनियर IPS अधिकारी प्रशांत कुमार अग्रवाल को हरियाणा के पुलिस महानिदेशक (DGP) बनाया है। वरिष्ठता सूची में 1988 बैच के पीके अग्रवाल सबसे ऊपर, दूसरे नंबर पर आरसी मिश्रा और तीसरे नंबर पर मोहम्मद अकील आते हैं। इसके बाद वरिष्ठता सूची में चौथे स्‍थान पर शत्रुजीत कपूर और पांचवें स्‍थान पर देशराज सिंह हैं।

Friday, August 13, 2021

Wednesday, August 4, 2021

MUSKAN SANCHETI - RAGHAV JHAVAR - NEW STARTUP

MUSKAN SANCHETI - RAGHAV JHAVAR - NEW STARTUP

आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। देश में लगातार बढ़ते स्टार्टअप इसका बेहतरीन नमूना पेश कर रहे हैं। सालों से चली आ रही छोटी-छोटी परेशानियों का इन स्टार्टअप के पास शानदार सॉल्यूशन है। इतना ही नहीं, अब ये स्टार्टअप छोटे बिजनेस को अपने साथ लेकर भी चल रहे हैं। ऐसी ही एक परेशानी का सॉल्यूशन निकाल अपना स्टार्टअप खड़ा किया है दो दोस्तों ने।

बेंगलुरु से ताल्लुक रखने वाली मुस्कान संचेती और कोलकाता से ताल्लुक रखने वाले राघव झंवर की दोस्ती श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में पढ़ाई के दौरान दिल्ली में हुई। दोनों ने कई बार सोशल एंटरप्रेन्योरशिप से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया। दोनों का इस फील्ड में इंटरेस्ट बढ़ा, कई बार डिस्कशन भी हुआ, लेकिन दोनों ने पढ़ाई के बाद 2-3 साल जॉब करने के बारे में सोचा। 3rd ईयर के दौरान दोनों की प्लेसमेंट हो गई और अगस्त की जॉइनिंग डेट मिली।

इसी बीच मार्च 2020 में कोरोना ने दस्तक दे दी। जिसकी वजह से जॉइनिंग को डिले कर दिया गया। राघव ने दिसंबर में कंपनी जॉइन की, तीन महीने काम किया, लेकिन मन नहीं लगा। दूसरी ओर लॉकडाउन के चलते मुस्कान घर से ही अलग-अलग चीजों पर रिसर्च कर रही थीं।

लॉकडाउन के बीच आया आइडिया


राघव झंवर कोलकाता के रहने वाले हैं जबकि मुस्कान संचेती बेंगलुरु से ताल्लुक रखती हैं।

लॉकडाउन के चलते छोटे-बड़े सभी धंधों पर ताला लग चुका था। मार्केट में चीजों का मिलना बहुत मुश्किल हो गया था। मुस्कान के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। उनके घर में राजस्थानी पापड़ खत्म हो चुका था। मार्केट से लेकर सप्लायर तक कई जगहों पर खोजने के बाद भी उन्हें राजस्थान के ऑथेंटिक टेस्ट वाले पापड़ नहीं मिले। मुस्कान और राघव के बीच इस बात को लेकर चर्चा हुई और यहीं से स्टार्टअप का ख्याल आया।

ग्राउंड रिसर्च करने पर पता चला कि ऐसी कई चीजें हैं, जो हर राज्य में लोगों के बीच एक विशेष जगह बनाए हुए हैं, लेकिन एक राज्य से दूसरे राज्य में रहने वाले लोगों तक इनकी पहुंच नहीं है। ऐसी स्थिति में या तो लोग अपने रिश्तेदार की मदद से दूसरे राज्य से प्रोडक्ट मंगवाते हैं या फिर खुद ही जाकर स्टॉक से लेते हैं। दूसरी ओर इन लोकल ब्रांड्स को भी कोरोना काल में बहुत नुकसान हुआ है।

राघव बताते हैं- हमने बेंगलुरु में रह रहे कई गुजराती, मराठी, राजस्थानी लोगों से इस बारे में बात की। हमें पता चला कि कई लोग दूसरे शहर में रह कर अपने प्रदेश के रीजनल टेस्ट को मिस कर रहे हैं। इसलिए हमने एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाने के बारे में सोचा, जो हर राज्य के ओरिजिनल प्रोडक्ट को एक जगह सर्व कर सके और यही से शुरुआत हुई ‘द स्टेट प्लेट’ की।

200 प्रोडक्ट से की शुरुआत


फिलहाल दोनों के पास 10 राज्यों के मसाले, मिठाई, स्टेपल फूड, अचार, चटनी जैसे 500 प्रोडक्ट मौजूद हैं।

अपने स्टार्टअप के शुरुआती स्टेज के बारे में राघव बताते हैं- हमने बेंगलुरु में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में वेबसाइट की शुरुआत की। इस दौरान सामान भी मुस्कान के घर पर रखा। जब प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ी तो राघव ने एक बड़ा रिस्क लिया और नौकरी छोड़ दी। वे बेंगलुरु शिफ्ट होकर अपना पूरा ध्यान स्टार्टअप में लगाना चाहते थे।

आस-पास की सोर्सिंग के जरिए बडे़ से लेकर छोटे 200+ प्रोडक्ट इकट्ठे कर लिए थे। हमें 3 महीने में 1000 से ज्यादा ऑर्डर मिले। लोगों को एक-दूसरे से हमारी सर्विस के बारे में पता चल रहा था और हमारे कस्टमर बढ़ते जा रहे थे। लॉकडाउन की वजह से अब धीरे-धीरे हमें देश के अलग-अलग राज्यों से भी ऑर्डर मिलने लगे।

‘द स्टेट प्लेट’ के जरिए राघव और मुस्कान की टीम अब तक भारत के 350 शहरों के 17 हजार से ज्यादा लोगों को अपनी सर्विस दे चुकी है। अब उनके पास 10 राज्यों के मसाले, मिठाई, स्टेपल फूड, अचार, चटनी जैसे 500 प्रोडक्ट मौजूद हैं। इनमें न सिर्फ बड़े, लोकल ब्रांड्स शामिल हैं बल्कि होम शेफ भी शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा प्रोडक्ट राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और केरल के हैं।

प्रोडक्ट अप्रूव करने की अनोखी प्रोसेस


मुस्कान ने राघव के साथ ही दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से पढ़ाई की है।

राघव बताते हैं कि हमारे पास महाराष्ट्र के चिकली रनदूर, लक्ष्मी नारायण, ओडिशा का बिसलंदा कर्च जैसे बड़े ब्रांड भी हैं। वहीं जमशेदपुर का फकिरा चना चिवड़ा, मुंबई का हिन्दुस्तान पिस्ता- बादाम बिस्किट जैसे लोकल ब्रांड भी शामिल हैं। इसलिए हमने क्वालिटी चेक करने की एक अनोखी तरकीब निकाली है।

हमने बेंगलुरु के 10 लोगों की एक क्वालिटी चेक टीम बनाई है। ये लोग अलग-अलग राज्यों से हैं। कोई भी सैंपल अप्रूव करने से पहले इन लोगों को भेजा जाता है। अपने-अपने रीजनल टेस्ट के हिसाब से ये लोग सैंपल को परखते हैं। इसमें ऑयल से लेकर स्नैक्स में नमी तक कई पैमानों का ध्यान रखा जाता है। इन लोगों के अप्रूव करने के बाद ही प्रोडक्ट को हमारी लिस्ट में शामिल किया जाता है। द स्टेट प्लेट ने न सिर्फ लोकल फूड ब्रांड को एक नेशनल प्लेटफॉर्म दिया बल्कि 20 लोगों को रोजगार भी दिया है।

मार्केटिंग के लिए अपनाया सोशल मीडिया का रास्ता


राघव बताते हैं कि क्वालिटी टेस्ट के लिए हमने बेंगलुरु के 10 लोगों की एक टीम बनाई है।

राघव बताते हैं कि हम मैन्युफैक्चर से उनके प्रोडक्ट स्टॉक में मंगवाते हैं। हमारे पास 2 महीने का स्टॉक अवेलबल रहता है जिससे आसानी से ऑर्डर आते ही डिलीवरी की जा सके। हमने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए अपने प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग की।

30 लाख रुपए के इन्वेस्टमेंट के साथ शुरू किए गए इस बिजनेस का सालाना टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए है। राघव बताते हैं कि हर साल काम और बिजनेस के सिलसिले में कई भारतीय विदेश जाकर बसते हैं। अब उनकी टीम जल्द ही NRI लोगों के लिए भारत से स्नैक्स प्रोडक्ट डिलीवर करने की तैयारी में है।