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Tuesday, March 24, 2026

MAHURI VAISHYA VANIK MAHAJAN CASTE

MAHURI VAISHYA VANIK MAHAJAN CASTE

*इतिहास की खोज*
 
माहुरी समाज पर हमेशा से आछेप लगते आ रहे हैं कि माहुरी जाती के पूर्वज समाज का कोई इतिहास नहीं लिख छोड़ा है ।। लेकिन, ऐसी बात नहीं है,अठारवीं शताब्दी के पूर्व माहुरी समाज का इतिहास उपलब्ध नहीं होने के कई कारण हैं । इसे हम विस्तार से अध्ययन करें तो कई वास्तविकता सामने आ जायेगी, की क्यों ये उपलब्ध नहीं हो सका । जैसा कि विदित है 1670 ई. के लगभग हम चंद माहुरीगण करीब 700 परिवार मुगलों से अपनी धर्म और संस्कृति बचने के उपक्रम में बिहार आये, क्योंकि मुगल साम्राज्य के औरंगजेब शासक पूरे देश को अपने धर्म को जबरन परिवर्तित करने की मुहिम चला रखी थी । बिहार पहुंच कर भी माहुरी परिवार शकुन न पा सके,वहां भी मुगलों ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा,उनकी खोज बहुत समय तक जारी रही और माहुरीगण अपनी पहचान छुपाते हुए कम जनसंख्या वाली जगहों पर अपना आशियाना बसाया ।यह क्रम मुगलों के शासन तक यानी 18वीं शताब्दी के अंत तक उनके दबदबे में रहे, यानी कई सौ वर्षों तक माहुरीगण कुछ भी लिखने और संग्रह करने की स्थिति में नहीं रहे। 19वीं शताब्दी में माहुरीगण न केवल विचारों की आजादी पाई बल्कि वे काफी समर्थ और सुदृढ़ भी हुए और 1912 और 1913 ई. में देश में दो माहुरी महामंडलों की विधिवत स्थापना कर पूरे समाज को संगठित किया। माहुरी गण की कुल देवी मथुरासिनी माता है जिन्हें वे प्रत्येक वर्ष शीतलाष्टमी के दिन विधिवत बड़े धुम धाम के साथ पूजते हैं । । समाज निरंतर अपने सही इतिहास की खोज के लिए तत्यपर रहा ।इसके लिए दोनों महामंडलों ने मिल कर कोशिशें की और इतिहास की खोज और प्रकाशन के लिए समिति भी गठित की, उस समिति की एक चीठ्ठी उसे बयां करती है।

किसी भी जीवंत समाज के लिए पत्रिकाओं का होना आवश्यक माना जाता है। माहुरी जाती के पूर्व पुरुषों की जागृति को तब समझा था और 1914 ई. में "माहुरी मयंक " नामक पत्रिका के प्रकाशन का शुभारंभ किया गया। यह पत्रिका की तब से भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है, दो विभक्त समाज को जोड़ने, समाज की सम्ब्रिधि बढ़ाने और कई तरह के सामाजिक उत्थान में हमेशा एक अदम भूमिका अदा करता आया है ।

एक समय ऐसा भी आया जब हमारे छोटे से माहुरी समाज अपना दायरा बढ़ाने के लिए अपने बिछुड़े मथुरा व उत्तर प्रदेश के वैश्यों से सम्बन्ध बढ़ाने हेतु महाउरुतंत्र की ओर भी अग्रसर हुए परंतु, बहुत सी असमानताएं हमें तुरंत उरुतंत्र की संगठन को नहकार देनी पड़ी ।। इसी क्रम में झरिया निवासी स्व. राम दास गुप्त ने टीम गठित कर मथुरा पहुंच कर माहुरी समाज के मथुरा से बिहार आ बसने की पूरी वास्तविकता जान कर माहुरी समाज का 400 वर्षों का ईतिहास लिख पाए जो कई बार कई जगहों पर माहुरी मयंक व सोवेनियरों में छापे गए । 2009 और 2015 में नेट पर ब्लॉग भी अब उपलब्ध हैं ।Mahuris.blogspot.in उसी पर आधारित माहुरी इतिहास यु ट्यूब पर "Mahurinama" भी उपलब्ध है।इसमें वर्णित मथुरासिनी मंदिर गया माहुरी समाज का एक ऐतिहासिक पूज्य स्थल है जिसे स्व.राम चंद राम जी और लाला गुरुशरण भदानी ने स्वामी हाँसदेव मुनि के सलाह पर मथुरासिनी माता मंदिर जिसे उन्हीं के परिवार के राम लाल भदानी ने जमीन दान स्वरूप दिया और मंदिर उनके ही भदानी परिवार ने ट्रस्ट बना कर निर्मित किया व आज तक स्व. कृश्णा भदानी, डॉ उमानाथ भदानी व श्रीराम भदानी अछे रखरखाव के साथ नवनिर्माण करते आये है।गया कॉलेज की स्थापना स्व. गुरुशरण लाल भदानी, जो बिहार चैम्बर ऑफ कॉमर्स व देश के फेडरल इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स (FICCI) के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए। इसी शताब्दी में भदानी परिवार के कृष्णा भवन श्रीराम भदानी और उनके परिवार ने कई एकड़ जमीन दान कर ट्रस्ट बना कर जहानाबाद में कॉलेज ( श्री रॉय बहादुर राम चंद राम लक्छमी नारायण आई टी आई व कन्या महाविद्यालय) भी बनाये। कोडरमा के अभ्रख सम्राट स्व. छट्ठू राम भदानी व उनके पार्टनर होरिल राम जी और उनके परिवार ने शिक्छा के मामले में अविश्सनीय सहयोग माहुरी समाज को दिया और कई स्कूल कॉलेज की स्थापना की।
स्व. शिव प्रसाद लोहानी जो 33 - 34 वर्षों तक माहुरी मयंक पत्रिका के सफलतम सम्पादक रहें हैं, अपने असीम अनुभव से उन्होंने इस शताब्दी के माहुरी इतिहास रच डाले, इनकी पुस्तक "माहुरी जाती का विवेचनात्मक इतिहास" में इस शताब्दी के माहुरी समाज के सारे उतार चढ़ाव और समाज की सारी घटनाचक्र व समाज के अधिकतम मनीषी लोगों का बाखूबी वर्णन उपलब्ध कराये गए हैं ।यह सचमुच इस शताब्दी के माहुरी समाज का आईना माना जा सकता है । संख्यां में बहुत ही कम होने के बाबजूद माहुरी अच्छे व्यापारी बनें और कई जगहों पर अपनी जमींदारी भी स्थापित कर पाए ।

अब्रख खनिज उस समय काफी उपयोगी और सारी दुनिया में काफी सीमित हुआ करती थी, उस उद्योग पर माहुरी समाज ने मानों अकाधिपत्य कायम कर ली थी और एक माहुरी संथापक स्व. छठु राम भदानी व उनकी संस्था माइका (अब्रख) किंग की उपाधि हासिल कर ली थी। वे दुनिया के सबसे अधिक अब्रख खानों के संचालक व अब्रख के निर्यातक बने ।

माहुरी उद्यमी स्व. गुरुशरण लाल भदानी कई उद्योगों की स्थापना कर उस समय उद्योग जगत के शिरमौर बन गए, एक समय देश की कोई भी व्यपारिक सभा उनकी अध्यछक्ता के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती थी । वे देश के उद्योग मंडल FICCI के अध्यक्छ बने और कई महत्वपूर्ण निर्णय, जिनकी तारीफ FICCI के Platinum jubilee जैसे अवसर पर आज भी की जाती रहीं है ।

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