TELI A PROMINENT VAISHYA VANIK MAHAJAN CASTE - तेली एक वैश्य जाति
तेली एक पारंपरिक भारतीय वैश्य (व्यापारी) समुदाय है, जो सदियों से तेल निकालने और व्यापार (घांची) के व्यवसाय से जुड़ा रहा है। इन्हें मुख्य रूप से हिंदू धर्म में वैश्य वर्ण के अंतर्गत माना जाता है और कई क्षेत्रों में ये साहू, राठौर, मोदी या गुप्ता उपनामों का उपयोग करते हैं। भारत में यह जाति अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची में शामिल है।
तेली जाति के बारे में मुख्य विवरण:मूल और व्यवसाय: "तेली" शब्द 'तेल' से बना है, क्योंकि इनका मुख्य कार्य पारंपरिक रूप से तेल पेरना (निकालना) और बेचना था।
वर्ण और वर्गीकरण: इन्हें परंपरागत रूप से वैश्य माना जाता है, हालांकि आधुनिक वर्गीकरण में इन्हें OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) के अंतर्गत रखा गया है।
उपनाम और उपजातियां: तेली समुदाय में साहू, तेली, साहू वैश्य, राठौर, घांची, तैलिक, तेलकर, चौरसिया (कुछ क्षेत्रों में), और मोदी जैसे विभिन्न उपनाम प्रचलित हैं।
भौगोलिक फैलाव: ये मुख्य रूप से उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत (गनिगा के रूप में) में निवास करते हैं।
धार्मिक मान्यताएं: तेली हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में हो सकते हैं। हिंदू तेली साहू/राठौर कहलाते हैं, जबकि मुस्लिम तेली को 'रोशनदार' या 'तेली मलिक' (शेख मंसूरी) कहा जाता है।
ऐतिहासिक संबंध: कुछ मान्यताएं इन्हें गुप्त साम्राज्य से भी जोड़ती हैं।
तेली परंपरागत रूप से भारत, पाकिस्तान और नेपाल में तेल उत्पाद करने और बेचने वाले तेल व्यापारी लोग है। ये वैश्य कि सबसे प्रभुत्व जाती है जिस कारण ये खुद को गुप्ता भी कहते है । जिन्हे वर्तमान में तेली समाज के नाम से जाना जाता है। तेली शब्द को संस्कृत में तैलिक कहते है। तेली समाज के लोग हिंदू, मुस्लिम,जैन, बौद्ध और पारसी इन सभी धर्मो में पाए जाते हैं।
हिंदू तेली समाज के सरनेम– साव,साहू,तैल्याकार,सहुवान,साह,साहूकार है। तेली समाज को गुजरात में घांची तेली के नाम से जाना जाता है। घांची तेली समाज के सरनेम– मोदी, चौधरी और गांधी है। दक्षिण भारत में तेली समाज को वनियार, चेट्टियार, चेट्टी, गनिगा के नाम से जाना जाता हैं। मुस्लिम तेली समाज को मलिक के नाम से जाना जाता है। देश में तेली समाज की जनसंख्या 14% है। महाराष्ट्र के यहूदी समुदाय (जिसे बैन इज़राइल कहा जाता है) शीलवीर तेली नामक तेली जाति में एक उप-समूह के रूप में भी जाना जाता था, अर्थात् शबात पर काम करने से उनके यहूदी परंपरा के विरूद्ध अर्थात् शनिवार के तेल प्रदाताओं। साहू के अधिकांश लोग व्यापारी हैं और महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में उच्चतम पेशे के हैं|तेली जाति का इतिहास अंग्रेजों के आगमन से पहले यह समाज आर्थिक दृष्टि से समृद्ध और प्रभावशाली रहा है. इस समाज के लोग बड़े जमींदार और साहूकार कारोबारी रहे हैं. जहां भी यह प्रभावशाली रहे इन्होंने मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया और रचनात्मक कार्यों में सक्रिय सक्रिय योगदान दिया है. स्वतंत्रता संग्राम में तेली समाज के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है. इस समाज में अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है. तेली समाज वीर शिरोमणी महाराणा प्रतापसिंह को अपना महापुरुष के तोर पे देखते हे. तेली समाज के प्रमुखतम राजाओं में भामाशाह थे।दानवीर भामाशाह का जन्म राजस्थान के मेवाड़ राज्य में वर्तमान पाली जिले के सादड़ी गांव में 29 अप्रैल 1547 को सम्पन्न तेली जैन परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम भारमल था जो रणथम्भौर के किलेदार थे।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक साहू परिवार में करमा बाई नामक एक पवित्र आत्मा का जन्म हुआ था। एक दिन नरवरगढ़ के राजा के एक हाथी की त्वचा में संक्रमण हो गया और रजवेद्य ने सुझाव दिया कि उसके जीवन को केवल तेल के एक तालाब में स्नान करके बचाया जा सकता है। राजा ने अपने लोगों को निर्देश दिया कि वे 3 दिनों में तालाब को तेल से भर दें अन्यथा वह व्यापारियों को मार देगा। लेकिन यह एक असम्भव कार्य था। कर्मा बाई ने प्रार्थना की और सिर्फ एक जार के साथ पूरे तालाब को तेल से भर दिया। जब राजा ने यह देखा तो वह बहुत दोषी महसूस किया। उसी दिन से साहू परिवार मा कर्मा बाई की पूजा करते हैं।
तेली जाति की उत्पत्ति के के बारे में अनेक मान्यताएं हैं. जिसमें से प्रमुख मान्यताओं का विस्तार से नीचे वर्णन किया गया है.
भगवान शिव ने किया तेली जाति की उत्पत्ति तेली जाति की उत्पत्ति के के बारे में अनेक मान्यताएं हैं. जिसमें से प्रमुख मान्यताओं का विस्तार से नीचे वर्णन किया गया है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव की अनुपस्थिति में माता पार्वती को घबराहट महसूस हुई क्योंकि उनके महल में कोई द्वारपाल नहीं था. इसीलिए उन्होंने अपने शरीर के मैल- पसीने से भगवान गणेश को उत्पन्न किया और उन्हें दक्षिणी द्वार की रक्षा के लिए तैनात कर दिया. जब भगवान शिव वापस लौटे तो गणेश जी उन्हें नहीं पहचान पाए और महल में प्रवेश करने से रोक दिया. इससे भगवान शिव इतना क्रोधित हुए कि उन्होंने अपनी तलवार से गणेश जी का सिर काट दिया और मस्तक को भस्म कर दिया. जब भगवान शिव ने महल में प्रवेश किया तो माता पार्वती ने तलवार पर रक्त लगा देखकर उनसे पूछा कि क्या हुआ. पुत्र की हत्या की बात जानकर माता दुखी हो गई और विलाप करने लगी. माता पार्वती ने भगवान शिव से गणेश जी को फिर से जीवित करने का आग्रह किया. लेकिन मस्तक भस्म कर देने के कारण उन्होंने गणेश जी को फिर से जीवित करने में असमर्थता जताई. लेकिन उन्होंने कहा यदि कोई जानवर दक्षिण की ओर मुंह किया हुआ मिले तो गणेश जी को फिर से जीवित किया जा सकता है. फिर ऐसा हुआ कि एक व्यापारी महल के बाहर आराम कर रहा था. उसके पास एक हाथी था जो दक्षिण की ओर मुंह करके बैठा था. भगवान शिव ने अपने तलवार के प्रहार से उसका सर काट दिया और हाथी के सिर को गणेश जी के धड़ से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया. लेकिन हाथी की मौत से हुए नुकसान के कारण व्यापारी जोर-जोर से विलाप करने लगा. व्यापारी को शांत करने के लिए भगवान शिव ने ओखली और मुसल की मदद से, जो तब तक अज्ञात यंत्र था, कोल्लू बनाया और तिलहन को पेरकर तेल निकालने की विधि बतलाई. व्यापारी कोल्लू के मदद से तेल पेरने लगा और तेली जाति का संस्थापक यानी की पहला तेली कहलाया
तेली जाति का इतिहास, तेली शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
तेली भारत, पाकिस्तान और नेपाल में पाई जाने वाली एक वैश्य वनिक महाजन जाति या समुदाय है. इन्हें तेली, तेलीकर और तैल्याकर आदि के रूप में संदर्भित किया जाता है. खाद्य तेल निकालना और बेचना इनका पारंपरिक काम रहा है. हालांकि आधुनिक समय में यह अपने पारंपरिक काम को छोड़कर अन्य कृषि तथा नौकरी-व्यवसाय भी अपनाने लगे हैं. अधिकांश तेली हिंदू हैं, लेकिन यह मुस्लिम और पारसी भी हो सकते हैं. हिंदू तेली को राठौर, साहू, घांची, गुप्ता कहते हैं. मुस्लिम तेली को रोशनदार या तेली मलिक कहा जाता है. पारसी तेली को शनिवार तेली कहा जाता है. तेली को हिंदू समाज में वैश्य माना जाता है. आइये जानते हैं तेली जाति का इतिहास, तेली शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
तेली किस कैटेगरी में आते हैं?
तेली जाति को बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बंगाल आदि राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
हिमाचल प्रदेश में इन्हें अनुसूचित जाति (SC) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.
तेली जाति की जनसंख्या
अधिकांश तेली भारत में निवास करते हैं. यह बांग्लादेश ,नेपाल और पाकिस्तान में भी पाए जाते हैं, हालांकि इन सभी जगहों पर इनकी आबादी कम है. यह भारत के तकरीबन सभी राज्यों में अलग अलग नाम से पाए जाते हैं. भारत में मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में इनकी अच्छी खासी आबादी है. तेली समाज के नेता छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार में क्रमशः 20-22%, 12% और 7% आबादी होने का दावा करते हैं.
तेली किस धर्म को मानते हैं।
अधिकांश तेली हिंदू धर्म के अनुयायी हैं. कुछ तेली इस्लाम और पारसी धर्म को भी मानते हैं, हालांकि इनकी संख्या बहुत कम है. मुस्लिम तेली को रोशनदार या तेली मलिक कहा जाता है. महाराष्ट्र के कुछ स्थानों पर निवास करने वाले बेने इसराइल समुदाय (यहूदी) को शनिवार तेली कहा जाता है. तेल व्यापार से जुड़े होने के कारण इन्हें तेली समुदाय का उप समूह माना जाता है.
तेली जाति के सरनेम
उत्तर भारत में इनके प्रमुख सरनेम हैं: साहु, साहू,
साव, राठौर, गुप्ता, तैलिक,शाह, साहा, गुप्त प्रसाद और विेषकर दक्षिण भारत में इन्हें घानीगार, चेटिटयार, चेट्टी, गंडला, गनियाशा हां जी उठ नामों से जाना जाता है.
तेली जाति का इतिहास
अंग्रेजों के आगमन से पहले यह समाज आर्थिक दृष्टि से समृद्ध और प्रभावशाली रहा है. इस समाज के लोग बड़े जमींदार और साहूकार कारोबारी रहे हैं. जहां भी यह प्रभावशाली रहे इन्होंने मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया और रचनात्मक कार्यों में सक्रिय सक्रिय योगदान दिया है. स्वतंत्रता संग्राम में तेली समाज के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है. इस समाज में अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है. तेल का व्यापार करने वाले तेली वैश्य कहलाए. जिन्होंने सुगंधित तेलों का व्यापार किया वह मोढ बनिया कहलाए. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इसी समुदाय से आते हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घांची वैश्य मोढ वनिक तेली समाज से आते हैं.
तेली शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
तेली शब्द की उत्पत्ति ‘तेल’ या “तैल” से संबंधित है. संस्कृत के शब्द तलीका या तैल का अर्थ होता है- तिलहन. तिलहन (तिल, सरसों आदि) को पेरकर तेल निकालने के पारंपरिक व्यवसाय के कारण इस समुदाय का नाम तेली पड़ा.
तेली जाति की उत्पत्ति कैसे हुई?
तेली जाति की उत्पत्ति के के बारे में अनेक मान्यताएं हैं. जिसमें से प्रमुख मान्यताओं का विस्तार से नीचे वर्णन किया गया है.
भगवान शिव ने किया तेली जाति की उत्पत्ति
तेली जाति की उत्पत्ति के के बारे में अनेक मान्यताएं हैं. जिसमें से प्रमुख मान्यताओं का विस्तार से नीचे वर्णन किया गया है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव की अनुपस्थिति में माता पार्वती को घबराहट महसूस हुई क्योंकि उनके महल में कोई द्वारपाल नहीं था. इसीलिए उन्होंने अपने शरीर के मैल-पसीने से भगवान गणेश को उत्पन्न किया और उन्हें दक्षिणी द्वार की रक्षा के लिए तैनात कर दिया. जब भगवान शिव वापस लौटे तो गणेश जी उन्हें नहीं पहचान पाए और महल में प्रवेश करने से रोक दिया. इससे भगवान शिव इतना क्रोधित हुए कि उन्होंने अपनी तलवार से गणेश जी का सिर काट दिया और मस्तक को भस्म कर दिया. जब भगवान शिव ने महल में प्रवेश किया तो माता पार्वती ने तलवार पर रक्त लगा देखकर उनसे पूछा कि क्या हुआ. पुत्र की हत्या की बात जानकर माता दुखी हो गई और विलाप करने लगी. माता पार्वती ने भगवान शिव से गणेश जी को फिर से जीवित करने का आग्रह किया. लेकिन मस्तक भस्म कर देने के कारण उन्होंने गणेश जी को फिर से जीवित करने में असमर्थता जताई. लेकिन उन्होंने कहा यदि कोई जानवर दक्षिण की ओर मुंह किया हुआ मिले तो गणेश जी को फिर से जीवित किया जा सकता है. फिर ऐसा हुआ कि एक व्यापारी महल के बाहर आराम कर रहा था. उसके पास एक हाथी था जो दक्षिण की ओर मुंह करके बैठा था. भगवान शिव ने अपने तलवार के प्रहार से उसका सर काट दिया और हाथी के सिर को गणेश जी के धड़ से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया. लेकिन हाथी की मौत से हुए नुकसान के कारण व्यापारी जोर-जोर से विलाप करने लगा. व्यापारी को शांत करने के लिए भगवान शिव ने ओखली और मुसल की मदद से, जो तब तक अज्ञात यंत्र था, कोल्लू बनाया और तिलहन को पेरकर तेल निकालने की विधि बतलाई. व्यापारी कोल्लू के मदद से तेल पेरने लगा और तेली जाति का संस्थापक यानी की पहला तेली कहलाया.
तेली की उत्पत्ति अंग्रेज इतिहासकार क्रूक के अनुसार
अंग्रेजी इतिहासकार क्रूक ने मिर्जापुर में प्रचलित कथा का उल्लेख किया है. एक व्यक्ति था, उसके तीन बेटे थे और उसके पास 52 महुआ के पेड़ थे. जब वह बूढ़ा और कमजोर हो गया तो उसने अपने बेटों से महुआ के पेड़ों का बंटवारा कर लेने को कहा. लेकिन आपस में चर्चा करने के बाद बेटों ने महुआ के वृक्षों को नहीं बल्कि उसकी उपज को बांटने का फैसला किया. जिसे पत्ती मिला वह पत्तियों से भट्टी जला कर अनाज भुनने का काम करने लगा और भारभुजा कहलाया. जिसके हिस्से में फूल मिला वह फूलों का रस निकाल कर शराब बनाने लगा और कलार कहलाया. तीसरे के हिस्से में गुठली और फल आया, जिसे पेरकर वह तेल निकालने लगा और वही तेली जाति का संस्थापक था.
क्षत्रिय तेली
मंडला के राठौर तेली राठौर राजपूत होने का दावा करते हैं. उनका कहना है कि मुसलमान आक्रमणकारियों से पराजित होने के बाद उन्हें तलवार और जनेऊ त्याग कर तेल व्यवसाय को अपनाना पड़ा. निमाड़ के तेली, जिनमें से कई धनी व्यापारी भी हैं, बताते हैं कि उनके पूर्वज गुजरात के मोढ बनिया थे. उन्हें मुस्लिम शासन के दौरान आजीविका के लिए तेल पेरना पड़ा. 1911 में तेली समुदाय ने राठौर उपनाम अपनाया, और खुद को राठौर तेली कहने लगे. 1931 में उन्होंने खुद को राठौर वैश्य होने का दावा किया. फर्रुखाबाद के आर्यसमाजी सत्य भरत शर्मा द्विवेदी ने तेली जाति को वैश्य वर्ण साबित करने के लिए “तेलीवर्ण प्रकाश” नामक पत्रिका प्रकाशित किया
दक्षिण भारत के समृद्ध तेली
तेली समाज के लोग आरंभिक मध्य काल में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में मंदिरों को आपूर्ति करने के लिए तेल का उत्पादन किया करते थे. दक्षिण भारत के विभिन्न भागों में मंदिर नगरों के उदय और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति से जुड़े होने के कारण कुछ समुदायों की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ और वह सामाजिक सीढ़ी में ऊपर जाने लगे. माली और तेली समुदायों का काम शहरों के लिए महत्वपूर्ण हो गया और वह इतने समृद्ध हो गए कि मंदिरों को दान देने लगे जिससे उनकी सामाजिक स्थिति और मजबूत हो गई.
तेली का मंदिर
ग्वालियर दुर्ग परिसर में स्थित एक प्राचीन मंदिर है. इस मंदिर का निर्माण आठवीं और नौवीं सदी में किया गया था. स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु, शिव और अन्य देवताओं को समर्पित इस मंदिर का निर्माण राजाओं और पुरोहित वर्ग के बजाय तेल व्यापारी जाति द्वारा कराया गया था.(मगैय्या तेली समाज)
तेली शब्द तेल से आया है, जिसका अर्थ मराठी, हिंदी और उड़िया भाषाओं में तेल होता है। तेली नाम इन्हें इनके पेशे "खाद्य तेल बनाने" के कारण दिया गया है। पुराने समय में, इन लोगों के पास छोटी तेल मिलें होती थीं जिन्हें कोलहू या घना कहा जाता था। ये मिलें बैलों द्वारा चलाई जाती थीं और सरसों और तिल जैसे तेल बीजों से खाद्य तेल निकालने का काम करती थीं।
तेली सोसाइटी के सचिव द्वारा लिखित तेलियों के इतिहास में वैश्य मूल का दावा किया गया है
बंगाल में, तेली समुदाय को सुवर्णबनिक, गंधबनिक, साहा जैसे अन्य व्यापारियों और बैंकरों के साथ वैश्य माना जाता है
राजस्थान में, तेली लोग क्षत्रिय (योद्धा) होने का दावा करते हैं, हालांकि उनके पड़ोसी उन्हें वैश्य (व्यापारी) के रूप में पहचानते हैं
तेली लोग स्वयं को साहू वैश्य भी कहते हैं। तेली पूरे भारत में पाए जाते हैं। हिंदू तेली को तेली साहू और मुस्लिम तेली को तेली मलिक कहा जाता है।
उत्तरी महाराष्ट्र में, उनमें से अधिकांश अपने पारिवारिक नाम और चौधरी प्रत्यय को अपने उपनाम के रूप में छिपाते हैं।
दक्षिण भारत में, तेलुगु भाषी तेलियों को तेली या गंडला कहा जाता है। आंध्र प्रदेश में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन्हें देवा गंडला, सेट्टी गंडला, सज्जना गंडला के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनमें छह गोत्र हैं। वे अपने ही गोत्र में विवाह नहीं करते हैं। कुछ तेली क्षत्रिय होने का दावा करते हैं और स्वयं को रेड्डी गंगला कहते हैं।
कर्नाटक में, कन्नड़ भाषी तेलियों को गनिगा या गौड़ कहा जाता है। सोमक्षत्रिय गणिगा और कुछ लिंगायत गणिगा (जो शिव की पूजा करते हैं) भी वहां पाए जाते हैं।
तमिलनाडु में तेलियों को वानिया चेट्टियार, गंडला चेट्टियार, गणिगा चेट्टियार, चेक्कलर कहा जाता है। चेक्कू का अर्थ तमिल में "तेल निकालने की मशीन" होता है।
केरल में तेलियों को वानिया चेट्टियार कहा जाता है, और केरल में उनकी आबादी बहुत अधिक है।
तेली भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और नेपाल में भी फैले हुए हैं।
इस जाति को भी कई तेली उपजातियों में विभाजित किया गया है जैसे:
तिलवान तेली
शेनवार तेली
राठौड़ तेली
सावजी तेली (अर्थात शिरभाते, गुल्हणे, आदि)
मलिक
तिर्मल तेली
एक बेली/एरंडेल तेली
डॉन बेली तेली
साहू तेली
वद्धार तेली
ताहीमे तेली
जयरत तेली
मूडी
कोकणी तेली
मलिक शाहू तेली
तेली सावजी
ये अधिकतर महाराष्ट्र विदर्भ में पाए जाते हैं। उनके उपनाम इस प्रकार हैं: शिरभाटे, जीरापुरे, मोगरकर, अजमीरे, बिजवे, कटकर, ताके भूराने, काले, गुल्हाने, शहादे, शिंदे, जयसिंगपुरे, देहंकर, गवली, किर्वे, तपकिरे, पोटे, शेलार, दलवी, कार्डिले, महेंद्रे-पाटिल, क्षीरसागर, वड्डेतिवार, पोटदुखे, जैसे। वे व्यापक रूप से फैले हुए हैं। यवतमाल, अमरावती, वर्धा और नागपुर में भी महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर।
तेली चौहान
तेली चौहान भिवानी, हिसार (हिसार) और हरियाणा, राजस्थान के अन्य जिलों और 1947 के पाकिस्तानी पूर्वी दक्षिणी पंजाब में भव्य प्रवास के बाद देखे जाते हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि तेली वंशानुगत जाति या वंश जैसा कुछ नहीं है। यह किसी भी परिवार या जाति का एक पेशेवर संगठन था जिसने तेल निकालने के पेशे को अपनाया था, विशेष रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी के समय और 1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जब तेल निकालना एक लाभदायक पेशा और व्यवसाय बन गया था।
तेली चौहान हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, साहिवाल, कश्मीर और पश्चिमी पंजाब के सियालकोट, गुजरांवाल और लाहौर जिलों में पाए जाते हैं।
डॉन बैली तेली:
ये लोग दो बैलों (बैल) के साथ तेल मिलों में काम करते थे और बैलों को धन का प्रतीक माना जाता था। यह तेली समाज मुख्य रूप से महाराष्ट्र और विदर्भ में पाया जाता है। वे मराठी भाषा बोलते हैं, जिसे पूर्व में ज़ादी बोली कहा जाता है। उनके उपनाम इस प्रकार हैं: भूरे, मुडे, म्यूट, कामदी, बेले, गभाने, जिभकाटे, येनुर्कर, लोहबरे, मोहरकर, अंबुलकर, लांजेवार, पारधी, उपारकर, वाडीभस्मे, गुलहाणे, लिचाडे, जोहारी, पोटभारे, धुर्वे, बोरकर, तलवेकर, वंजारी, बोंद्रे, बावनकुले, भिलावे, सातपुते, जयसिंगपुरे, महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले में भोंगाड़े, पाटिल, देशमुख, वाडकर, सरोदे, गोलहर, घाटोड़े, रोडे, फांडे, राजनकर, कामडी, धाडवे, घंधारे, दांडारे, गैधाने, गैधनी, भिसे, वाघे, दिवटे, घुघुस्कर, बलबुद्धे, कावले, पडोले, ढगे, कारेमोरे, सथवणे, बिसने, गिराडकर, शेंडे, इटानकर, चार्डे, डोंगरे, सखारकर, पिसे, वाघमारे, कलांबे, ढोबले, माकड़े, चोपकर, निमकर, ब्रम्हे, हटवार, मनपुरे, भिओगाडे, मेहर, सखुरे, सखारकर, तिघरे, धनजोडे, मोहरकर, गिरिपुंजे, बडवाइक, सावरबंधे, कुंभलकर, वैद्य, टिबुले, नवखरे, ज़ादे, चामत, तंबुलकर, हजारे, किरपान, तेलमासरे, इखर, दरवटे, भाजीपाले, समृत, मस्के, बावनकुले, दिवटे, मालेवार, कटेखये, चिंदालोर, कटोरे, धोबरे, तुरस्कर, मदनकर, बोधनकर, हगवाने, थोम्बारे, रोकाडे, बागवाइक, लेंडे, आकरे, बावनकर, सेलोकर, भोले, बावणे, शिंदे, तिलगुले, मोटघरे, येनुरकर, सावरकर, डोकरिमारे, कुलकर महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में मसूरकर, फटिंग, वाघुलकर, उबले, चकोले जैसे। वे अमरावती, अकोला, यवतमाल, चंद्रपुर, भंडारा, गोंदिया, वर्धा, वाशिम, गढ़चिरौली और नागपुर, पांडुर्ना (एमपी), औसर (एमपी) और भोपाल (एमपी), बालाघाट और बैतूल, राजनांदगांव में व्यापक रूप से फैले हुए हैं।
और राजस्थान के जिला अजमेर, भीलवाड़ा, कोटा, झालावाड़, जोधपुर, पाली, सवाई माधोपुर, जयपुर से एमपी, यूपी, गुजरात, पंजाब और अन्य राज्यों में चले गए। वे मध्य प्रदेश में इंदौर, नीमच, मंदसौर, धार, उज्जैन, रतलाम, झाबुआ, अलीराजपुर, ग्वालियर, देवास, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र में अकोला, यवतमाल, अमरावती, नागपुर और उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक कन्नौज क्षेत्र (यानी, कन्नौज, कानपुर, मैनपुरी, इटावा) में व्यापक रूप से फैले हुए हैं। उनके उपनाम हैं धवले, कुरहेकर, राठौड़, गोटमारे, नालत, इसोकर, खोदके, धोरे, लेंधे, मकोडे, चोपडे, गोमसे, इचे, तिखिले, जापर्डे, वानखड़े, भिराड, बोरे, मिसुरकर, आदि...
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