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Thursday, February 15, 2024

JAIN SAMRAT SAMPRATI

#JAIN SAMRAT SAMPRATI



वो महान जैन राजा जिन्होंने सवा लाख जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था एवं सवा करोड़ जैन प्रतिमाएं भरवाई थी !

जैन राजा जिसने बचने के लिए बनाई - The Great Wall Of China

सम्राट अशोक के पौत्र सम्राट संप्रति विश्व के सर्वकालीन महान राजाओं में गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं । सम्राट अशोक एवं उनके पौत्र संप्रति ने भारतीय संस्कृति को विश्वसंस्कृति बनाने का भगीरथ प्रयत्न किया ।
एक समय संप्रति राजा अपने राजमहल के झरोखे में बैठे थे । राजमार्ग से जाते हुए आचार्य सुहस्तिसूरि को देखकर संप्रति महाराज को ऐसा अनुभव हुआ कि मानों वे इस साधुपुरुष के साथ वर्षो से परिचित हैं ।धीरे -धीरे पूर्वजन्म के स्मरण संप्रति महाराज के मन में उमड़ने लगे । उन्होंने गुरु महाराज को महल में पधारने की बिनती की । तत्पश्चात् महाराज संप्रति ने प्रश्न किया कि आप को देखकर मुझे ऐसा क्यों लगा कि मानो आपके साथ मेरा वर्षो से गहरा परिचय न हो ! ऐसा क्यों होता होगा ?

आचार्य सुहस्तिसूरि ने उसका रहस्य बताते हुए कहा कि तुम पूर्व जन्म में मेरे शिष्य थे । एक समय कौशाम्बी नगरी में भीषण दुर्भिक्ष या अकाल पड़ा था , फिर भी श्रावक उत्साह से साधुओं की वैयावृत्ति करते थे । इस समय में गरीब भिखारी की दशा में रहते संप्रति को रोटी का एक टुकड़ा भी प्राप्त न होता था । उसने साधुओं से भिक्षा माँगी , तब ख्याल आया कि यदि वह दीक्षा ले तभी ये साधु इसे अपना भोजन दे सकें । संप्रति ने दीक्षा ली । खूब भोजन किया । उसके बाद अंतिम समय में साधु संप्रति का समाधिमरण हुआ , तब गुरुदेव ने उन्हें णमोकार मंत्र सुनाया था ।

यह सुनकर महाराजा संप्रति ने अपना राज्य आचार्य सुहस्तिसूरि के चरणों में रख दिया , परंतू अकिंचन वैरागी मुनि भला राज्य का क्या करें ? आचार्यश्री ने उसे जैन धर्म का उपदेश दिया । राजा संप्रति धर्म के सच्चे आराधक एवं महान प्रभावक बनें । सरहदों के पार धर्म का प्रसार किया । गुरुदेव के पूर्वजन्म के और इस जन्म के उपकारों को संप्रति ने शिरोधार्य किया ।उन्होंने अनार्य देशों में जैन साधुओं को धर्मप्रचार के लिए भेजा । गरीबों को मुफ्त भोजन देती हुई दानशालाएँ खुलवाई । जैन विहारों का निर्माण किया ।

महाराजा संप्रति युद्ध में विजयी होकर वापस लौटे । चारों ओर विजय का उल्लास लहरा रहा था , परंतु महाराज संप्रति की माता के चेहरें पर घोर विषाद एवं निराशा छाई हुई थी । महाराज संप्रति ने माता से ऐसी व्यथा का कारण पूछा तब माता ने कहा कि साम्राज्य विस्तार के लोभ में तूनें कितना सारा मानवसंहार किया ! ऐसे घोर संहार की अपेक्षा चित्त को पावन करते हुए जिनमंदिरों का निर्माण किया होता या उनका जीर्णोद्धार करवाया होता तो मेरा हृदय असीम प्रसन्नता का अनुभव करता । इसलिए सम्राट संप्रति ने अपने जीवनकाल में सवा लाख जिनमंदिर बनवाये और सवा करोड़ जिनबिंब प्रतिष्टित कर माता की भावना को यथार्थ या सार्थक किया ।
महाराजा संप्रति ने दूर के ईरान और अरब देशों में जैन संस्कृति के केन्द्रों की स्थापना की थी ।

SHREE PAWAPURI JAIN TEERTH - श्री पावापुरी तीर्थ (बिहार )

SHREE #PAWAPURI JAIN TEERTH - श्री पावापुरी तीर्थ (बिहार )


जहाँ भगवान महावीर का पदार्पण हुवा और वहा के राजा हस्तिपाल ने अपने राज्य में भगवान को स्थान उपलब्ध कराया था।

भगवान के दर्शनार्थ अनेकों राजागण, श्रेष्ठीगण आदि भक्त आते रहते थे प्रभु ने अपने प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी को निकट गाव में देवशर्मा ब्राह्मण के यहाँ उपदेश देने के लिए भेजा।
 
कार्तिक कृष्णा १४ के प्रात: काल प्रभु की अन्तिम देशना प्रारम्भ हुई उस समय मलवंश के ९ राजा, लिच्छवींवशं के ९ राजा आदि भक्तगणों से पूरी सभा भरी हुई थी। सारे श्रोता प्रभु की अमृतमयि वाणी को अत्यन्त भाव पूर्वक और श्रद्धा पूर्वक सुन रहे थे।

प्रभु ने निर्वाण का समय नजदीक जानकर अंतिम उपदेश की अखंड धारा चालू रखी इस प्रकार प्रभु १६ प्रहर उत्तराध्ययन सूत्र' का निरूपण करते हुवे अमावस्या की रात्रि के अन्तिम प्रहर, स्वाति नक्षत्र में निर्वाण को प्राप्त हए।
इन्द्रादि देवों ने निर्वाण मनाया और उपस्थित राजाओं व् अन्य भक्तोजनों ने प्रभु के वियोग से ज्ञान का दीपक बुझ जाने के कारण उस रात्रि में घी के प्रकाशमय रत्नादीप जलाए। उन असंख्य दीपकों से अमावस्या की घोर रात्रि में प्रज्ज्वलित किया गया। तब से दीपावली का पर्व प्रारंभ हुवा। आज भी उस दिन की यादगार में दीपावली के दिन सारे शहर व् गांव सहस्त्रों दीपको की ज्योति से जगमगा उठते हैं।

प्रभु के निर्वाण के समाचार चारों तरफ फ़ॆल चुके,लाखों देव और मानवों की भीड़ प्रभु के अन्तिम दर्शनार्थ उमड़ पड़ी।

इन्द्रादि देवों व जन समुदाय ने विराट जुलुस के साथ प्रभु की देह का विधान पूर्वक अन्तिम संस्कार किया ।
देवी-देवतागण व अगणित मानव समुदाय ने प्रभु देह की कल्याणकारी भस्म को ले जाकर अपने अपने पूजा गृह में रखा, भस्म ना मिलने पर उस भस्म में मिश्रित यहाँ की पवित्र मिटटी को भी ले गए जिस से वहा बहुत बड़ा गड्ढा हो गया ।

भगवान के ज्येष्ठभ्राता नन्धिवर्धन ने अन्तिम देशना स्थल पर एव अन्तिम संस्कार स्थल पर चौतरे बनाकर प्रभु के चरण स्थापित किये जो आज के गांव मंदिर और जल मंदिर माने जाते हैं। कहते हैं वहा पर आज जो जल मंदिर है उसकी खुदाई उस समय वहा जनता ने प्रभु की भस्म पाने के लिए जो गड्ढा खोदा था वो ही है, उसी गड्ढे में पावापुरी जल मंदिर बना हुवा है। जल मंदिर में प्रवेश करते ही मनुष्य सारे बाह्य वातारण को भूल कर प्रभु भक्ति में अपने आप को खो देता हे। ऎसे शुद्ध व पवित्र वातावरण है यहाँ का ।

त्रिशला नन्दन त्रेलोकीनाथ चरम तीर्थंकर श्री महावीर की निर्वाण भूमि का प्रत्येक कण पूजनीय है प्रभु वीर की अन्तिम देशना इस पावन भूमि में हुई थी अत: यहाँ का शुद्ध वातावरण आत्मा को परम शांति प्रदान करता है ।
दीपावली त्यौहार मनाने की प्रथा भगवान महावीर के निर्वाण दिवस से पावापुरी से प्रारम्भ हुई।

भगवान महावीर की प्रथम देशना भी यहीं पर हुई ऐसा भी माना जाता है उस स्थान पर नवीन सुन्दर समवसरण के मंदिर का निर्माण हुआ है। यह भी मान्यता है कि इंद्रभूति गौतम का प्रभु से यही मिलाप हुवा था जिस से प्रभावित होकर प्रभु के पास दीक्षा ली और प्रथम गणधर बने ।

वीर प्रभु तो साक्षात करुणा के अवतार थे वो शासन के हित में ही सब कुच्छ सोचते थे और १६ प्रहार तक देशना देना और अपना अन्तिम समय नजदीक जानकर अपने प्रिय शिष्य गौतम को उसकी भलाई के लिए अपने से दूर भेजना और अपने हर कष्ट को बिना किसी बाधा के सहन करते करते वीर प्रभु अपने २६ भवों तक त्याग, राज काज, त्याग तप आदि करते-करते अपने २७ वे भव में मोक्ष को पधारे।

आज २६०० से भी ज्यादा वर्ष बीतने पर भी आपके अनुयायी आपकी वाणी को अपने दिल में उतारने को बेताब हैं ।
ऐसे थे मेरे प्रभु करुणा के अवतार।

आपके कुल ११ गणधर थे।
आपके कुल साधू १४०००, साध्वी ३६०००, श्रावक् १५९००० और श्राविकाए ३१८००० थी ।
वीर प्रभु ने अपने २७ भव में कुल ३ बड़ी पदविया प्राप्त की।
१. श्रेयांस नाथ भगवान के शासन काल में १८ वे भव में त्रिपृष्ठ वासुदेव।
२. २३ वे भव में महाविदेह क्षेत्र में प्रियमित्र नामक चक्रवती बने।
३. और अन्तिम २७ वे भव में साक्षात् महावीर स्वामी नाम के तीर्थंकर हुवे और मोक्ष पधारे ।

SABHAR : वास्तु महेन्द्र जैन (कासलीवाल)

JAIN VAISHYA TEERTH STHAN - जैन दर्शन तीर्थ स्थल

#JAIN VAISHYA TEERTH STHAN - जैन दर्शन तीर्थ स्थल, MAHARASHTRA 


नासिक रूट

1. मांगी तुंगी - नासिको के पास
2. गजपंथ - नासिको के पास
3. देव लाली - नासिको के पास
4. अंजनेरी दिगंबर जैन मंदिर (गजपंथा से 16 किमी)
5. श्री धर्मचक्र प्रभाव तीर्थ

औरंगाबाद - अहमदनगर - जालना - बीड रूट

1. कचनर जी
2. पैठन जी
3. नंदीश्वर-पंचलेश्वर, पैठण के पास, जिला बीड
4. जेठवाड़ा पार्श्वनाथ मंदिर
5. एलोरा की गुफाएं पार्श्ववथ मंदिर
6. कुंथल गिरि सिद्ध क्षेत्र (कुल भूषण, देश भूषण जी)
7. नेमगिरी, जिंतूर (जालना के पास) (यहां से 100 किमी लोनार क्रेटर झील है - मैं नहीं गया)
8. श्री 1008 मल्लीनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, शिराद शाहपुर, महाराष्ट्र
9. नवागढ़, उखलाद, परभणी
10. श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, केसापुरी, तालुका मजलगांव, जिला बीड

सोलापुर - उस्मानाबाद रूट

1. श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, सावरगांव, उस्मानाबाद जिला।
2. श्री 1008 महावीर दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, टेर। नं. सूरतगांव, उस्मानाबाद जिला।
3. कुंथलगिरी सिद्ध क्षेत्र (कुल भूषण देश भूषण जी) - अहमदनगर से भी पहुंचा जा सकता है।
4. दहीगांव महावीर स्वामी अतिशय क्षेत्र, ग्राम दहीगांव, उप जिला मालशीरस, जिला सोलापुर

सतारा - कोल्हापुर रूट

1. कुंडल - कराड के पास, सतारा
2. नंदगिरी किला - श्री 1008 पार्श्वनाथ जैन गुफा मंदिर रोड, धूमलवाड़ी (सतारा के पास)
3. कुंभोज बाहुबली
4. कुंथु गिरी (कुंथु सागर जी महाराज)
5. स्थानिधि जी, निपानी, ट्वंडी घाट
6. ऐनापुर और इब्राहिमपुर - तालुका - गढ़िंगलाज, जिला - कोल्हापुर
7. उदगाँव
8. बोरेगांव (नमिनाथ मंदिर)
9. सजनी (पार्श्वनाथ मंदिर)
10. धर्म नगर
11. नादनी
12. सदालगा
13. कोथली (शांतिगिरी)
14. भोज
15. सांगली
16. मिराजो
17. इचलकरंजी
18. कागवाड़ (शांति नाथ गुफा)
19. शेरबल (शांति सागर जी प्लेस - अनाथ आश्रम)

अकोला - अमरावती रूट

1. मुक्ता गिरी - अमरावती के पास
2. भटकुली - अमरावती के पास
3. श्री अंतरीक्ष पार्श्वनाथ, शिरपुर ग्राम - अकोला के पास
4. श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, असेगांव, जिला-बासमतनगर, जिला-हिंगोली (महाराष्ट्र)
5. करंजा जी / करंजा लडकी
6. श्री पार्श्वदय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र, नागथाना (अमरावती मोर्शी रोड पर)

अन्य:
1. आसगांव
2. आष्ट (कसार)
3. धरणगांव
4. कौदनायपुर
5. मंडल
6. नाइचाकुरी
7. हिंगोली
8. पोदनपुर (बोरीवली, मुंबई)
9. रामटेक
10. विजय गोपाल
11. दिगरा (आदिनाथ भगवान अतिशय क्षेत्र)
12. वधोना
जैनम जयति शासनम
 
SABHAR: वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)

ASATI VAISHYA CASTE

#ASATI VAISHYA CASTE

असाटी समाज की आदिता के सम्बन्ध में इतिहास बताता है कि असाटी वैश्य उन्हीं वैष्णव में से हैं जब से ब्राम्हण, क्षत्रिय, शूद्र ये चार वर्ण बने हैं। हीरापुर निवासी स्वर्गीय चैधरी श्री दमरूलाल ने असाटी समाज की उत्पत्ति की जानकारी के लिये जाति भास्कर ग्रन्थ का अवलोकन किया है और उसमें 84 प्रकार के वैश्यों के नामों का उल्लेख बताया है जिसमें अयोध्यावासी वैश्य भी लिखे हैं।

अयोध्या राजधानी के निवासी होने के कारण प्रारंभ काल से लेकर आज भी अपने असाटी समाज की चिट्ठी पत्रियों में राम-राम, जय सियाराम, जय श्री सीताराम अथवा जय राम जी को ही लिखा जाता है। जैसे कि आग्रा के निवासी होने से अग्रवाल कहलाते हैं और उनकी चिट्ठी पत्रियों में अधिकतर जय गोपाल जय राधेश्याम लिखा जाता है।

झांसी जिले के कुमेड़ी ग्राम में स्वर्गीय दुर्जन सरकनया असाटी समाज में बड़े विद्वान और भक्त पुरूष हो गये हैं। इनका स्वाभाव भी ऐसा ही था कि देश में घूमना, विद्वानों की संगत करना और समाज सुधार के कार्य करना। एक समय इन्होंने तिरोड़ा ग्राम में 17 दिन तक एक पंचायत करके समाज की एकता की थी। श्री दुर्जन सरकनया ने अपनी एक रचियता पुस्तक में अपने को असाटी न लिखकर पूर्व अयोध्यावासी लिखा है। अब अपना समाज अयोध्यावासी से असाटी कैसे कहलाया उसका कारण यह है कि अयोध्या के निकट असाटी नाम एक ग्राम है। अपने पूर्वज, मुगलों के या किसी और के आतंक से या अकाल के कारण लगभग तीन चार सौ वर्ष पूर्व असाटी ग्राम से टीकमगढ़, छतरपुर आदि रियासतों के ग्रामों में आकर रहने लगे थे, अयोध्या की राजधानी का होने से अयोध्यावासी और असाटी ग्राम का होने से असाटी कहा जाना सन्देहरहित और स्वाभाविक है। इसलिए अयोध्यावासी-असाटी वैश्य ये तीनों नाम डंके की चोट पर निर्बिवाद हैं निवास-स्थान, देश और कर्तव्य पर ही तो सब जातियाँ बनी हुई हैं।

अपने पूर्वज असाटी ग्राम से रियासतों में जब आये थे तब लगभग सौ डेढ़ सौ से अधिक न रहे होंगे। कारण कि सन् 1944 से सन् 1973 के दरम्यान इस तीस वर्ष के अर्से में 5228 की 9445 असाटी संख्या के अर्थात दूनी के लगभग हो गई है। यदि 300 वर्ष के पूर्व का अनुभव लगाया जाये तो सौ-डेढ़ सौ से अधिक नहीं आंकी जा सकती है। हर पीढ़ी में एक-एक के तीन-तीन व्यक्ति भी हों तो चक्रवृद्धि के अनुसार 1 के 3, 3 के 9, 9$9 के 27, $27 के 81, $81 के 243, $243 के 729 अर्थात् सात पीढ़ी में एक के 729 हो जाते हैं। इससे पूर्णरूप से सिद्ध होता है कि अपने पूर्वज असाटी ग्राम से उपर्युक्त रियासतों में अल्प संख्या में ही आये थे।

तीन-चार सौ वर्ष पूर्व असाटी ग्राम से रियासतों में आने के प्रमाण इस प्रकार से सिद्ध होते हैं कि अपने असाटी समाज के जो मंदिर बने हैं वह संवत् 1700 से ही बने हैं इसके उपरान्त असाटी समाज के लोगों को समाज और नरेशों द्वारा साव, नायक, चैधरी, सवाई आदि की जो उपाधियाँ मिलीं हैं उनका कार्य-काल भी सौ दो सौ वर्ष से अधिक का नहीं है जो डायरेक्ट्री के पृष्ठों में आप पढ़ेंगे।

गोत्रों की आदिता के संबंध में इतिहास बताता है कि ‘‘भारतखण्डे आर्यावर्ते …………………., अर्थात भारतवर्ष के निवासी आर्य कहलाते थे। जिनके गुण, कर्म, स्वभाव में चार प्रकार की भिन्नता थी इसलिए ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के चार भाग बने, जैसा कि भगवान ने कहा है ‘‘चार्तुवर्ण मया सृष्टि, कर्म, विभागशः’’। इस चारों वर्णों का एक ही सनातन धर्म था जिसका धर्म संस्कार, संस्कृति द्वारा सप्त ऋषियों के नाम से कश्यप, कौशल, वाशिष्ठ, गोयल, वासल्य, बांदल्य, चारल्य यह सात गोत्र हैं जो असाटी समाज में भी हैं। शेष चार जन गोत्र, माडल्य, फांदल्य, खोड़ल उपर्युक्त गोत्रों के उपनाम ही समझ में आते हैं, कारण कि इन चार गोत्रों के सिर्फ दस-दस ही घर हैं।

वंशों के नाम स्थान और व्यवसाय पर ही रखे गये हैं आजीविका के लिए जैसे कि कठरयाई के धन्धे से कटारिया, गुलाब से गुललहा, लोहे के धन्धे से लोहिया, अरस्या, पटवारी आदि हैं। इसी प्रकार निवास स्थान के कारण ग्रामों के नाम से भी वंशों के नाम हैं तिगोड़ा के तिगड़ैया, मातौल के मातोल्या, हीरापुर के हीरापुरिया, देवदा के देवदइया व देवरा, समर्रा के समरया, दलीपुर के दलीपुरिया और कुछ वंशों के नाम पदवी पर भी चलने लगे हैं जैसा कि नायक, चैधरी आदि हैं। स्थानों के नाम से अन्य वर्णों में भी वंशों के नाम हैं अयोध्या के अयोध्यावासी, गंगातट के गंगापारी, सरयूतट के सरयूपारी, कन्नौज के कन्नौजिया, मालवा के मालवीय बुन्देलखंड के बुन्देला, महोबा के महोबिया, राजपूताने के राजपूत इससे पूर्ण सिद्ध होता है कि वर्तमान युग में निवास स्थान और आजीविका के धन्धों से और कुछ पदवी के नाम पर भी वंश बने हैं। जबकि पिछले युगों में जिनके वंश में जो पुरूषार्थी पुरूष होते थे उनके नाम से वंश चलते थे जैसा कि राजा रघु से रघुवंशी आदि हैं। निमि से निमिवंशी, कुरू से कौरव, पाण्डु से पाण्डव, यदु से यदुवंशी आदि और कुछ वंशों के नाम सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी जैसे प्राकृतियों पर भी हैं।

असाटी समाज में वंशों की संख्या 84 भी बताई है जो सन् 1944 की जनगणना में 62 थे और अब सन् 73 की गणना में 59। रियासतों में असाटी समाज जब 84 ग्रामों में थी तब समाज की व्यवस्था के लिए बारह-बारह गांव के सात चैंतरे बनाये गये थे समाज का अधिक विस्तार हो जाने के कारण डायरेक्ट्री में अब प्रमुख ग्रामों के अन्तर्गत संपर्क के ग्रामों का नाम दर्शाया गया है।

वंश, गोत्र और समाज की (उत्पत्ति) अर्थात आदिता का परिचय बड़ी खोजबीन और प्रमाणों के साथ लिखा गया है।

समाज के क्षेत्र एवं उनमें सम्मिलित नगर/ग्राम

1-जबलपुर क्षेत्र –
जबलपुर नगर, निरंदपुर, टिकारी, गनयारी, पौड़ी, चैदहमील, कटंगी, बम्होनदी, सरा, पनागर, कालाडूमर, इंद्राना, सिंगलद्वीप, बुढ़ागर, हृदय नगर, गोसलपुर, सिहोरा, घनगंवा, मंडला, मेहदवानी।

2-कटनी क्षेत्र –
कटनी नगर, तेवरी, स्लीमनाबाद, दशरमन, शनकुई, देवरी, ढीमरखेड़ा, बम्हनी, सिमरिया, पान उमरिया, पौड़ीकला, अधेलीबाग, पचपेढ़ी, घुघरी, भजिया, बड़वारा, रोहनिया, बनहरा, नन्हवारा (सेक्षा), भगनवारा, विलायतकला, नन्हवारा (बागरी), कांटी, देवराकला, कटंगी (खुर्द), भरोला, अखरार, सतना, रीवा, सीधी, शहडोल।

3-गोंदिया (महाराष्ट्र क्षेत्र) –
गोंदिया नगर, कांटी, कट्टीपार, आमगांव, सालेकसा, तिरोड़ा, मुण्डीकोटा, कबलेवाड़ा, बरठी, धामनगांव, देवरी, सरकारटोला, भागी, डोंगरगांव, सकरीटोला, कालीमाटी, बारेकंहार, कोड़ेलुहारा, भजेपार, सर्रा, बड़ेगांव, नवेगांव, मंहगांव, खेरलानी, इंदौरा, बेरडीदार, गांगला, खेढ़ेपार, सितेपार, करडी, सिल्ली, खड़की, नवेदन, सुकड़ी, विरसी, कैसलेवाड़ा, तुमसर, ऐलोरा, भंडारा, गढ़चिरौली, कापसी, हिगना, बाजारगांव, शिवा, वर्धा, पुसद, राजारामपुर, नागपुर, बम्बई, पूना।

4-बालाघाट क्षेत्र –
बालाघाट नगर, लामटा, बारासिवनी, बैहर, हिर्री, नैनपुर, भोरगढ़, कटंगी, कोहका, बिरसा, खारा, देवगांव, परसवाड़ा, रिनापुर, विनोरा, सेवती, चागोंटोला, सिवनी, बरघाट, लखनादौन।

5-दमोह क्षेत्र –
दमोह नगर, तेजगढ़, नोहटा, तेंदूखेड़ा, नरसिंहगढ़, इमलिया, गंज तवेरी, मौसीपुरा, बांदकपुर, जुझार, बिसनाखेड़ी, टौरी, गुंजी, हटरी, राजापटना, ममरखा।

6-हटा-फुटेरा-अमानगंज क्षेत्र –
हटा नगर, लुहारी, बंधा, पटेरा, खमरिया, हिनौता, अमानगंज, हुसैना, पन्ना, बकायन, रियाना, कैथोरा, आलमपुर, बटियागढ़, फुटेरा, बक्सवाहा, रनेह, चिरौला।

7-सागर क्षेत्र –
सागर नगर, खुरई, बीना, बंडा, गढ़ाकोटा, जैसीनगर, तिगोढ़ा, अमरमउ, देवरीकला, ईसरवारा।

8-टीकमगढ़ क्षेत्र –
टीकमगढ़ नगर, नन्हीटेरी, कुण्डेश्वर, गनियारी, डूंडा, पठा, कैनवारा, दरगुंमा, डिकोली, मड़ावरा, महरोनी, गिदवाहा, साडूमल, मैनवार, कुम्हेड़ी, ललितपुर, मउरानीपुर।

9-बल्देवगढ़-खरगापुर क्षेत्र –
खरगापुर, बल्देवगढ़, देरी, भानपुरा, चिनगंवा, सिजोरा, ददगीय, दोह, गैती, पथरगंवा, धरमपुरा, बनयानी, गरोला, मतोल, जोरा, कोटरा, चंदेरी, पलेरा, फुटेर, इम्लाना, डारगंवा, देवरदा, तालमउ, नयागांव, सुजारा, वनपुरा, पुताई, हटा, निवसाई, खुरिला, इमलिया,
सूरजपुरा, बुढ़ेरा, भैसाय, सूड़ाखेड़ा, रानीपुरा, नैनवारी, मउकड़वा, लड़वाड़ी, कछियाखेड़ा, कमलनगर, मोनेमातेकाखेड़ा।

10-छतरपुर क्षेत्र –
छतरपुर, नौगांव, चंद्रनगर, बमीटा, बमरीह]

11-हीरापुर-घुवारा-बड़ागांव क्षेत्र –
हीरापुर, शाहगढ़, नरवा, रामपुरा, घुवारा, अंतोरा, बड़ागांव

12-बड़ा मलहरा क्षेत्र –
बड़ा मलहरा क्षेत्र, सड़वा, गरगुंवा, सेधपा, भगवा, धरमपुरा, रमपुरा, पुतरी, खेरा, बिसवा, बमनोरा, सोरखी, बूदोर, सिवारा, बंधा, भोपरा, बहादुरपुर, मबई, मासनखेड़ा।

13-बिजावर-सटई क्षेत्र –
बिजावर, जखरौंद, रजपुरा, किशनगढ़, सटई, झुमटुली, कुपिया, अमरोनिया, रामनगर, मातगुंवा, हिम्मतपुरा, छिरावल, ईसानगर, बिहेटा, कुड़रा, रामटोरिया, मढि़यावुजग, बम्होरी, गुगवारा।

14-भोपाल क्षेत्र –
भोपाल नगर, सुहागपुर, विदिशा, रायसेन, होशंगाबाद।

15-इंदौर क्षेत्र –
इंदौर नगर, उज्जैन, देवास, रतलाम, खंडवा, झाबुआ, सोनकछ, शाजापुर, शिवपुरी।

16-छत्तीसगढ़ क्षेत्र –
रायपुर, बिलासपुर, धमतरी, जांजगीर, कटघोरा, चांपा, रायगढ़, अम्बिकापुर, दुर्ग, कोरिया, मनेंद्रगढ़, विश्रामपुर, चनबारीडाट, भिलाई।

17- अन्य क्षेत्र –
दिल्ली, गाजियाबाद, नोयडा, बैंगलोर, हैदराबाद, लखनऊ, ग्वालियर, अंगुल, बांदा, अहमदाबाद, मेरठ, फिरोजपुर, हरपालपुर, मोहाली एवं अन्य नगर।

SABHAR : asativaishyaparichay.in

Wednesday, February 14, 2024

SUMIT SHAH DUKAN APP

#SUMIT SHAH DUKAN APP

एक आइडिया से सबसे खराब दौर में खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी, ऐसे बदली हजारों कारोबारियों की जिंदगी 


मुश्किलों के दौर में जहां बहुत से लोग हिम्मत हार जाते हैं। वहीं कुछ लोग इसी दौरान सफलता के नए रास्ते खोज लेते हैं। दुकान (Dukaan) ऐप के को-फाउंडर और सीईओ सुमित शाह ने ऐसा ही कुछ कर दिखाया है। जब कोरोना काल के दौर में सबकी दुकानें बंद हो रही थीं। इस दौरान उन्होंने एक आइडिया से करोड़ों की कंपनी खड़ी कर दी। 2020 में लॉकडाउन के कारण लोग घरों में कैद हो गए। छोटे खुदरा विक्रेताओं के कारोबार बंद होने लगे। यह वह समय था जब सुमित को एक रेडियो जॉकी से संदेश मिला। इसमें कहा गया था, 'अब हम व्हाट्सएप पर ऑर्डर स्वीकार करते हैं।' सुमित इस टेक्स्ट मैसेज को पाकर हैरान रह गए थे। यहीं से उन्हें आइडिया मिला और 48 घंटों के भीतर उन्होंने अपने दोस्त के साथ 'दुकान' एंड्रॉइड ऐप बनाया। इसने जबर्दस्‍त रफ्तार पकड़ ली। सालभर में यह कंपनी 500 करोड़ रुपये से ज्‍यादा की हो गई थी।

मध्यवर्गीय परिवार में हुआ जन्म

सुमित शाह का जन्म मुंबई के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 25 दिसंबर 1990 को हुआ था। उन्होंने सांगली से इंजीनियरिंग की। कॉलेज में रूममेट्स से सुमित ने डिजिटल मार्केटिंग, वेब डिजाइनिंग और डेवलपमेंट कोर्स सीख लिए। मैकडॉनल्ड्स, क्रेड समेत कई अन्य बड़ी-छोटी कंपनियों में नौकरी की। इसके बाद सुमित ने अपने दोस्त और कॉलेज ड्रॉपआउट सुभाष चौधरी के साथ 2014 में रिसमेट्रिक नाम से अपना खुद का कारोबार शुरू किया। सुभाष टेक एक्‍सपर्ट हैं। सुमित की 2014 में फेसबुक के जरिये सुभाष चौधरी से मुलाकात हुई थी।

साल 2020 में लॉन्च किया ऐप

सुमित शाह ने जून 2020 में कंपनी के सह-संस्थापक और सीटीओ सुभाष चौधरी के साथ 'दुकान' ऐप को लॉन्च किया था। यह ऐप व्यापारियों, खुदरा विक्रेताओं और तकनीकी तौर से कम जानकार लोगों को मोबाइल के जरिये अपना ई-कॉमर्स स्टोर बनाने में सक्षम बनाता है। ऐप व्यापारियों को 30 सेकंड के भीतर अपना कारोबार स्थापित करने में मदद देता है। लॉन्च के 20 दिनों के अंदर ऐप पर 1.5 लाख से ज्‍यादा ऑनलाइन स्टोर बनाए गए थे। ऐप ने पूरे भारत में छोटे और मध्यम आकार के बिजनस को इंटरनेट पर अपना कारोबार शुरू और विकसित करने का मौका दिया है।

MAHESHWARI GOTRA & SURNAME

#MAHESHWARI GOTRA & SURNAME

The following is a list of those 82 original last names (Surnames). There have been several additions to and derivatives from these names due to the family's place of business and/or the trade engaged in.

1. Ajmera
2. Asava 43. Pallod
3. Attal 44. Partani
4. Agiwal 45. Porwar
5. Aagsuad 46. Baldua
6. Innani 47. Baaldi
7. Karva 48. Boob
8. Kankani 49. Bangad
9. Kahalia 50. Bihani
10. Kalantri 51. Bidada
11. Kasat 52. Baheti
12. Kacholiya 53. Bajaj
13. Kalani 54. Birla
14. Kabra 55. Bang
15. Kalia 56. Bhandari :- Lathi
16. Khawad 57. Bhattad
17. Gagrani 58. Bhutada
18. Gattani 59. Bhuradia
19. Gadiya 60. Bhansaali
20. Gilada 61. Malooda:- Saboo
21. Daad 62. Malpani
22. Daga 63. Mandhania
23. Chandak 64. Mundhada
24. Chowkhda 65. Mandowara
25. Chachani 66. Maniyar
26. Chhaparwal 67. Modani
27. Jajoo 68. Mantri
28. Jakhetia :- Holani 69. Randad
29. Jhanwar 70. Ladha
30. Tavari 71. Lahoti
31. Toshniwal 72. Lakhotia
32. Totla 73. Soni
33. Tapadia 74. Somani
34. Darak 75. Sodhani
35. Dargad 76. Sarda
36. Devpura 77. Sikchi
37. Dhoot 78. Hurkat
38. Dhupad 79. Heda
39. Navaal 80. Rathi
40. Novlakha 81. Lohia
41. Nyati 82. Parwal
42. Navandhar

Khanp UpKhanp

Birla Birla, Dhuraya, Gathya, Dhubarya, Garuraya, Gauraya, Badaliya.

Darak Darak, Haldha, Marchunya, Kothari, Chaudhari.

Tosniwal Tosniwal, Nagauri, Mijyali, Modi, Munji, Dama, Nevar, Damdi, Lambu, Singi, Das, Daga,

Jhalriya, Jenariya, Bhakrogha, Kothari.

Ajmera Ajmera, Kodyakulthya, Kukdaya, Rai, Randita, Dhaul, Dhaulesiya, Bhagat, Bhagutya,

Dabkodya, Doda, Mankya, Vinyayakya, Nausarya, Posraya, Kharad, Khuchya, Padhava.

Bhandari Bhandari, Bhakava, Bhukya, Kala, Gora, Gokanya, Gulchak, Manya, Lathi, Rai, Mirchya, Naresanaya, Nensar.

Chhapparwal Chhapparwal, Dujara, Jusaaj.
Bhattad Bhattad, Sandha, Latad, Halad, Kela, Kahara, Bisani, Bisa, Balwani, Bichhu, Ramani, Jeta, Gandhi, Pithani, Puglia, Bhallad, Muhandasot, Mahara.

Bhutada Bhutada, Chachya, Devgatani, Deodatani, Chaudhari.

Bang Bang,Chhitarka, Sanvalaka, Sobhavat,Tharavat,Patwari,Motawat.

Atal Atal, Gothniwal, Marauthia.
Inani Idani, Nagwadya.

Bhuradia Bhuradia, Kothari, Bambu, Bhugdya.

Bhansali Bhansali
Ladha Ladha, Mody, Munji, Athasnya, Bhakrodha, Hingya, Dagda, Dagadya, Dharani, Jola, Chaudhari.

Malpani Malpani, Mutha, Mody, Junhari, Lulani, Laulan, Bhura.

Sikahi Sikahi, Silar, Silani.

Lahoti Lahoti, Bishar, Kuya, Kaha.

Gadayiya Gadayiya, Chadhari, Higrad.

Gagrani Gagrani, Gagad, Vavechya, Dodaya, Kala, Gaheya.

Khatwad (Khataud) Khatwad, Malani, Maulasaraya, Toda, Muchhal, Duwani, Loya, Khad, Kalya, Lausalya, Gandhi, Gahlada, Naresanya, Saraf, Pahadka, Bhutia, Bhuria, Bhala.

Lakhotia Lakhotia, Jugrama, Bhayiya, Mothadya, Maunana, Parasram, Rice.

Asava Asava, Vyapati, Nag, Mandovara.
Chechani Chechani, Dudani, Kachaulya, Kalkya, Rai, Khad.

Mandhania Manudhaniya, Manudhana, Chaudhari, Syahar, Dhardolya, Sum, Singi, Hira.

Mundhada Mundhada, Morani, Mody, Mahlana, Sesani, Sambharaya, Sakrani, Bharani, Bhaurani, Rajmahuta, Gaurani, Ulani, Dodaya, Dheyaya, Chaudhari, Chamadya, Chavakya, Adernya, Prahaladani, Pansari, Chhota, Kothari, Varifa, Bawari, Baldia, Dammalaka, Athani, Gavlani, Aldia.

Chaukhada Chaukhada
Chandak Chandak, Gorani, Multani, Muknani, Mumani, Madhani, Pragani, Prahaladani, Pungalia, Patwa, Bizani, Bhishani, Bhaia, Sagara, Sanval, Sukhani, Sundarani, Jogad.

Baldua Baldua, Padwar, Pediwal, Radhwani, Kalani, Vediwal.

Baldi Baldi
Bub Bub, Bauradha.

Bangad Bangad, Tapdia Bangad.

Mandovara Mandovara, Matesaraya, Dhaulesaraya, Kesaria.

Totla Totla, Badahaka, Nagla, Patwari, Tela.

Aagiwal Agiwal

Aagsud Aagsud
Partani Partani, Pundpalya, Dagdya, Panpaliya.

Navndhar Navndhar, Dharani, Dhirani, Mimani, Dhanani, Panani, Syahara, Rai, Gandhi.

Naval Naval, Khuval, Maliwal.

Palod Palod, Chitlangia, Ravtya, Lislya, Jujesaraya, Gahlada, Pachisya, Chavdya, Kakraya, Bhakad, Kela, Sethi, Chavta, Maunda, Fogiwal, Jaithalya, Vapdota, Dodya, Mujiwal, Maru, Fausalya.

Taparia Taparia, Chhachhya, Mungrad, Maiya, Kharnalya, Mankya.

Dhoot Dhoot

Dhpad Dhpad

Modani Modani, Bumb, Mody, Mahdana, Mahnan.

Porva Porvar, Parwal, Dagadya.

Devpura Devpura, Kasumbibal.

Mantri Mantri
Naulakha Naulakha, Naugaja.

Davari Gorani, Bhakrice, Bhojani, Gurkani, Khetani, Mohata.
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GOMTESHWAR - JAIN VAISHYA HERITAGE

#GOMTESHWAR - JAIN VAISHYA HERITAGE 

57-फुट (17 मीटर) मोनोलिथ (चट्टान के एक टुकड़े से नक्काशी की गई मूर्ति) का अविश्वसनीय एरियल दृश्य, यह दुनिया की सबसे ऊंची मोनोलिथिक मूर्ति में से एक है।


गोमटेश्वर की मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची एकाध मूर्ति है, जिसे ग्रेनाइट के एक ही ब्लॉक से बनाया गया है। यह 57 फुट (17 मीटर) ऊँचा एकालाप है और गंगा वंश द्वारा 981 ईस्वी में निर्मित भारतीय राज्य कर्नाटक में श्रवणबेलागोला (जिला: हसन) में विन्द्यागिरी पर स्थित है। यह इतना लंबा है कि 30 किमी से देखा जा सकता है

यह शांति, अहिंसा, त्याग सांसारिक मामलों, और जैन धर्म के बाद सरल जीवन का प्रतीक है।

विन्द्यागिरी पहाड़ी श्रवणबेलागोला की दो पहाड़ियों में से एक है; दूसरा चंद्रगिरी है, जो कई प्राचीन जैन केंद्रों की सीट भी है, जो गोमतेश्वर से काफी पुरानी है। पड़ोसियों के क्षेत्रों में जैन मंदिर हैं जिन्हें बसदी के रूप में जाना जाता है और तीर्थंकरों की कई तस्वीरें हैं। चंद्रगिरी जैन आकृति भरत, बाहुबली के भाई और प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) के पुत्र को समर्पित है।

पहाड़ी की चोटी से आसपास के क्षेत्रों का सुंदर दृश्य हो सकता है। महामस्तकाभीषेक नामक एक घटना दुनिया भर के भक्तों को आकर्षित करती है। महामस्तकाभीषेक पर्व 12 वर्ष में एक बार होता है, जब गोम्मटेश्वर की मूर्ति पर दूध, केसर, घी, गन्ने के रस (इशूक्रसा) आदि से अभिषेक किया जाता है। मूर्ति के शीर्ष से हेनरिक जिमर ने इस अभिषेक को मूर्ति की ताजगी का कारण बताया। अंतिम अभिषेक 2018 में हुआ था। अगला अभिषेक 2030 में होगा।

2007 में, टाइम्स ऑफ इंडिया के एक सर्वेक्षण में मूर्ति को भारत के सात आश्चर्यों में से पहले वोट दिया गया था; कुल वोटों का 49% इसके पक्ष में गया था।

Tuesday, February 13, 2024

IPSHIT MITTAL AND MADHAV BANSAL - JEE MAIN TOPPER 2024

IPSHIT MITTAL AND MADHAV BANSAL - JEE MAIN TOPPER 2024

जेईई मेन एग्जाम का रिजल्ट जारी हो गया है। इस बार जेईई मेन में दिल्ली के दो लड़कों ने टॉप किया है। जो द्वारका के माधव और दिलशाद गार्डन के इप्सित मित्तल हैं। अब दोनों की ही नजर IIT की सीट पर है। दिल्ली के दोनों लड़के अपने सपने को पूरा करने की नई उड़ान भरने वाले हैं।


जेईई मेन एग्जामिनेशन में दिल्ली के दो स्टूडेंट्स ने 100 पर्सेंटाइल हासिल की है। माधव बंसल और इप्सित मित्तल ने परफेक्ट स्कोर के साथ इंजीनियरिंग एग्जामिनेशन की इस पहली कड़ी को पार किया है। अब दोनों की नजरें जेईई एडवांस एग्जामिनेशन पर है, ताकि अपने ड्रीम आईआईटी में दाखिला ले सकें।

दिलशाद गार्डन के इप्सित मित्तल


दिलशाद गार्डन के रहने वाले इप्सित मित्तल को मंगलवार को जेईई मेन के रिजल्ट ने सरप्राइज दिया। इप्सित कहते हैं, पेपर काफी अच्छा हुआ था मगर 100 पर्सेंटाइल नहीं सोचा था। लिस्ट में अपना देखकर सरप्राइज भी हुआ और खुशी भी हुई। 12वीं के बोर्ड एग्जामिनेशन की भी तैयारी कर रहे इप्सित कहते हैं, अभी बोर्ड एग्जाम पर फोकस है और साथ-साथ जेईई एडवांस एग्जाम की तैयारी कर रहा हूं ताकि किसी आईआईटी से अपनी पसंदीदा ब्रांच कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकूं। जेईई के इस रिजल्ट से कॉन्फिडेंस बढ़ा है।

इप्सित ने इंजीनियरिंग की तैयारी क्लास 10 से शुरू की। वह कहते हैं, पहले से मेरी दिलचस्पी मैथ्स में रही है। मेरी मां भी मैथ्स की किताबें लिखती हैं। क्लास 10 से ही फिटजी से कोचिंग भी ली। हालांकि, सीरियस होकर मैंने पढ़ाई क्लास 11-12 में की। वह कहते हैं, सेल्फ स्टडी बहुत मायने रखती है। और कोचिंग से ज्यादा जरूरी है अच्छा टीचर मिलना और कड़ी मेहनत। करीब 14-15 घंटा रोज पढ़ना होता है। पढ़ाई प्रेशर ना बने, इसके लिए माइंड को फ्रेश रखना भी जरूरी है। मैं फिजिकली एक्टिव रहता हूं, खेलकूद कर और फिक्शन पढ़कर। 12वीं में यह कम जरूर हुआ है। साथ ही, मैं यह नहीं सोचना कि अगर आईआईटी में नहीं हुआ, तो क्या होगा? अगर मेहनत है, तो ऑप्शन बहुत हैं।
द्वारका के माधव बंसल


द्वारका के रहने वाले माधव बंसल के लिए 100 पर्सेंटाइल बड़ा सरप्राइज नहीं था। वह कहते हैं, तैयारी अच्छी थी तो एग्जाम से पहले भी और बाद में भी मुझे लग भी रहा था कि मैं 100 पर्सेंटाइल ला सकता हूं। तो रिजल्ट ने खुशी बहुत दी। माधव क्लास 7 से ही आईआईटी में इंजीनियरिंग सीट के लिए तैयारी कर रहे हैं। वह कहते हैं, तब ही से मुझे साफ था कि इंजीनियरिंग करनी है। मैंने फिटजी में कोर्स भी जॉइन कर लिया क्योंकि जेईई के लिए स्कूल से ज्यादा तैयारी की जरूरत है। माधव पढ़ाई के बीच संगीत, बास्केटबॉल और टेबल टेनिस से कूल रहते हैं। वह कहते हैं, मैं ज्यादा सोचता नहीं, बस पढ़ता हूं, खेलता हूं और गाता हूं। मैंने शास्त्रीय गायन में 4 साल की ट्रेनिंग भी ली है। हालांकि, दो साल से रोज रियाज नहीं कर पाता पर कभी-कभी गाता जरूर हूं। मगर टीटी रोज खेलता हूं, माइंड फ्रेश रहता है। मैं एक टाइमटेबल में नहीं पढ़ता, जब मन होता है तब पढ़ता हूं और इसे एंजॉय करता हूं। मेरे पैरंट्स का भी सपोर्ट रहता है।वह कहते हैं, बोर्ड एग्जाम आ रहे हैं मगर अभी फोकस सिर्फ जेईई एडवांस है। मेरा ड्रीम इंस्टिट्यूट आईआईटी बॉम्बे हैं, और कंप्यूटर साइंस में बीटेक मेरी पहली पसंद है।

Monday, February 12, 2024

KANYKUBJ BHURJI BHOJWAL VAISHYA

#KANYKUBJ BHURJI BHOJWAL VAISHYA

भुर्जी शब्द की उत्त्पति कहाँ से और कैसे हुई

हिन्दू धार्मिक ग्रंथों – शास्त्रों से ज्ञात होता है कि गुण एवं कर्म के अनुसार वर्ण-व्यवस्था स्थापित की गयी. इस वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र आते हैं, जिससे अनेक जातियों का विकाश हुआ तथा उनकी कई उपजातियां उत्पन्न हुईं. सभी के अपने-अपने गोत्र हैं, जो ऋषियों-महर्षियों-गौतम, अत्रि, जमदग्नि, भरद्वाज, वशिष्ठ, विश्वामित्र, कश्यप आदि के नाम पर आधारित हैं. कालांतर में गोत्रों की संख्या बढ़ गयी. धार्मिक-ग्रंथों के अनुसार ब्राह्मण एवं क्षत्रिय वर्ण की जातियों का सम्बन्ध गौतम, वशिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज, शाण्डिल्य, गर्ग, अगस्त्य आदि ऋषियों से है. शेष सभी जातिओं को महर्षि कश्यप ने स्वीकार कर लिया.

वैश्य :- कृषिवाणिज्यगोरक्षम वैश्यकर्म स्वभावाकम . अर्थात खेती, व्यापार-धंधा तथा गोपालन वैश्य का कर्म है. इसलिए इन्हें वैश्य कहा जाता है. वैश्य में कई वर्ग हैं जैसे- कान्यकुब्ज, अयोध्यावासी, चंद्रवंशी, मध्यदेशीय, ओमरवैश्य, धोसरवैश्य, गाँधीवैश्य, अग्रहरिवैश्य आदि. इनकी भी अनके उपजातियां हैं.

प्राचीन इतिहास में कोल, भील, गोंड़ और द्रविण जातियों का उल्लेख आता हैं. इन्हें आदिवासी या जनजाति कहा गया हैं. उत्तरप्रदेश के कहार जाति को ही प्रचलित भाषा में गोंड़ कहा जाता है. ये विवाह आदि शुभ-प्रसंगों एवं अन्य संस्कारों में डोली ले जाने,पानी भरने और बर्तन साफ़ करने का काम अभी से लगभग चालीस-पैतालिस वर्ष पीछे के समय तक करते थे, किन्तु अभी भी इनका कुछ काम ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया है. ये लोग दाना भी भूनते हैं. ये समाज में कभी अछूत नहीं रहे हैं. इसप्रकार के कामों से जुड़े रहने के कारण ही समाज में इन्हें पिछड़ा माना गया तथा पिछड़े वर्ग में सम्मिलित किया गया. कुछ समय पश्चात् अनुसूचीत जाति (S.C.) तथा अनुसूचीत जनजाति (S.T.) की तरह आरक्षण की इनकी मांग तेज हो गई. सन २००१ तक की जन-गणना में इस जाति को अनुसूचीत जाति (S.C.) सूची में तथा सन २००२ में अनुसूचीत जनजाति (S.T.) सूची में दर्ज कर लिया गया. दाना भूनने के कारण गोंड अर्थात कहार को कुछ अनभिज्ञ लोग भुर्जी, भडभूजा, भुंज, भुजवा समज लेते हैं. इसी भूल के कारण गोंड जाति के लोग कहीं - कहीं “गुप्ता” लिखकर या बताकर वैवाहिक सम्बन्ध भी बना लेते हैं. याद रखिये हम लोग कान्यकुब्ज वैश्य हैं. गोंड अर्थात कहार वैश्य नहीं हैं.

बंधुओं हमारे समाज के अधिकतर स्त्री-पुरुष नाम के आगे टाइटल में ‘गुप्ता’ लिखते हैं, जबकि स्त्रीलिंग के लिए ‘गुप्ता’ तथा पुल्लिंग के लिए ‘गुप्त’ होना चाहिए. जैसे पुल्लिंग में चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, मैथिलीशरणगुप्त आदि तथा स्त्रीलिंग में – शोभना गुप्ता, निहारिका गुप्ता, श्रेया गुप्ता आदि. हमारे समाज के लोगों के अतिरिक्त तेली, कलवार, ओमर, कसौधन, अग्रहरि अदि भी गुप्ता लिखते हैं. परिचय के समय असमंजस उत्पन्न हो जाता है और तब पूछना पड़ता है कि आप कौन गुप्ता हैं ? इस गंभीर समस्या के निवारणार्थ जैसे कलवार – जायसवाल, अग्रहरि – अग्रवाल, हलवाई – मोदनवाल लिखने लगे, उसी प्रकार हमारे समाज के कुछ वरिष्ठ एवं विद्वान बंधुओं ने सन १९९२ में उत्तर प्रदेश के मछलीशहर जिला जौनपुर में कान्यकुब्ज वैश्य के दो-दिवसीय सम्मलेन में भुर्जी, भडभूजा, भुंज, भुजवा जाति का टाइटल ‘गुप्ता’ के स्थान पर ‘भोज्यवाल’ सुनिश्चित किया तथा राष्ट्रिय स्तर पर इसका प्रचार-प्रसार करने का सुझाव भी दिया. भोज्य का अर्थ है – खाने योग्य. इसमें वाल प्रत्यय है और सम्बन्ध सूचक है. इस प्रकार भोज्यवाल का अर्थ हुआ – खाने योग्य पदार्थ, चीज-वस्तुएं बनाने वाला. हमारे समाज के लोग भोज्य अर्थात खाने योग्य चीजें- चरवन – दाना-चना, मुरमुरा (लाई), पोहा (चिउरा), पाकवस्तु – हलवा, पूरी, मिठाई आदि बनाते हैं. जिसे सभी वर्ग एवं सभी जाति के लोग बड़े चाव से खाते हैं. इसीलिए उन्हें भोज्यवाल कहा जाता है. अभी तो लोग साधारण बोलचाल की भाषा में सीधे भोजवाल लिखने लगे हैं. शायद उन्हें भोज्यवाल लिखने, पढने तथा बोलने में असहज लगता हो अथवा कुछ लोग संभवतः राजाभोज से सम्बन्ध जोड़ते हों. ज्ञात रहे की भारतवर्ष में ‘भोज’ नाम के कई राजा हुए हैं. उनका कई ग्रथों में उल्लेख मिलता है. उनके नाम, स्थान व वंश का विस्तार से उल्लेख करना आवश्यक नहीं है. इन राजवंशों से भुर्जी, भडभूजा, भुंज जाति का कोई सम्बन्ध नहीं है. संस्कृत में ‘भुज’ परस्मै और उभयपदी धातु है. संस्कृत शब्दकोष में इस धातु के जितने भी अर्थ हैं, उनसे ‘भोज’ रूप की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती है.

कान्यकुब्ज वैश्य के अंतर्गत – भुर्जी,भडभूजा, भुंज, भुजवा, कान्दू, कंदोई, क्रोंच, कौशल, कान्दव, कन्नौजिया, मध्यदेशीय (मधेसिया), हलवाई, यज्ञसेनी, साव, परदेसी आदि आते हैं. पश्चिमी उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों में सक्सेना तथा श्रीवास्तव के नाम से भी जाने जाते हैं. भुर्जी शब्द की उत्पत्ति कहाँ से और कैसे हुई ? इसके सम्बन्ध में सम्पूर्ण वृतांत विष्णुपुराण एवं हरिवंशपुराण के २९वें अध्याय से विदित हो जाता है. यदि किसी बंधु को विस्तार से जानने की इक्षा हो तो वे उपरोक्त दोनों ग्रंथों का अध्ययन कर सकते हैं. पुनः विदित हो कि संस्कृत भाषा में एक ‘भुज’ धातु है. भुज का अर्थ है – भोजन बनाना, अन्न भुजना, पालन करना. यथा नाम: तथा गुण: के आधार पर भोजन बनाकर, मिट्टी के भाड़ में अन्न भूजकर पालन करने वाले लोगों को भुर्जी, भडभूजा, भुंज, भुजवा की संज्ञा दी गयी. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भुर्जी, भडभूजा, भुंज, भुजवा शब्द की उत्पत्ति कान्यकुब्ज अर्थात कन्नौज से हुई है. कान्यकुब्ज नाम कैसे पड़ा ? – इसका सम्पूर्ण वृतांत वाल्मिकी रामायण के बालकाण्ड में वर्णित है. हम सब कश्यप ऋषि की संताने हैं. हमारा गोत्र ‘काश्यप’ है.

सक्सेना वैश्य की उत्पत्ति सांकसा जिला फर्रुखाबाद बताई जाती है. सांकसा का वर्णन वाल्मिकी रामायण, महाभारत, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में मिलता है. कायस्थ, सक्सेना, श्रीवास्तव के पूज्य इष्ट चित्रगुप्त, शाकंभरीदेवी एवं लक्ष्मीजी हैं. आप सब से अनुरोध हैं कि आप लोग जिस ऋषि – महर्षि, देवी – देवता को इष्ट मानते हों तथा उनके प्रति आस्था एवं श्रद्धा रखते हों, उन्हें मानते रहिये तथा उनके प्रति श्रद्धावान बने रहिये. इसमें किसी को भी किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए. अतः गोत्र एवं इष्ट के विवाद में उलझने के बजाय समाज की भलाई के लिए एकजुट हो कर एक मंच पर आने की आवश्यकता है.

बंधुओं बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि कान्यकुब्ज वैश्य के उपरोक्त सभी घटकों में अभी भी एकता का अभाव है. हमारा समाज अभी भी कई क्षेत्रों में पिछड़ा है. एकता एवं संगठन के अभाव के कारण ही हमारा समाज किसी भी राजनीतिक दल या राजनेता का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करने में असफल रहा है. सरकार में भागीदारी तो बहुत दूर की बात है. अतः संगठित हो कर समाज को शक्तिशाली बनाकर अपनी संख्याबल एवं उपस्तिथि प्रदर्शित करने का प्रयास करें, न की अनावश्यक विवादों में उलझे रहें.

इतिहास से प्राप्त इसकी जानकारी विस्तृत रूप से नहीं वरन संक्षेप में प्रस्तुत है .-

1- कान्यकुब्ज:-प्राचीनकाल में कन्नौज को कान्यकुब्ज कहा जाता था. कान्यकुब्ज नाम कैसे पड़ा ? इसका उल्लेख बाल्मीकि रामायण में पाया जाता है . कुशनाभ राजा की सौ कन्याओं ने वायुदेवता के विवाह –प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था . वायुदेवता के प्रचंड कोप से वे कुबड़ी हो गयीं . संस्कृत भाषा में कुबड़ी को कुब्जा कहते है. कन्यायें कुब्जा हो गयीं, यह घटना जिस क्षेत्र /राज्य में हुई थी उसे “कान्यकुब्ज” कहा जाने लगा . वर्तमान समय में कान्यकुब्ज को कन्नौज कहा जाता है.

2- कान्यकुब्ज वैश्य:- हिन्दू धर्मग्रंथो में ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र चार वर्णों का उल्लेख आता है. धंधा-व्यापार,कृषि एवं गोपालन करने वालों को वैश्यवर्ग में रखा गया है. कृषिवाणिज्यगोरक्षम वैश्यकर्म स्वभावकम. हमारे पूर्वज मूलतः कान्यकुब्ज अर्थात कन्नौज के निवासी थे और व्यापार-धंधा करते थे. इसलिए उन्हें कान्यकुब्ज वैश्य कहा जाता है. ध्यान रहे कान्यकुब्ज ब्राह्मण भी होते हैं.

3- गोत्र:- धार्मिक एवं शुभ-मांगलिक प्रसंगों में गोत्र पूछा जाता है . हमलोग “कश्यप” ऋषि की संतानें हैं. हमारा गोत्र “कश्यप” है.

कान्यकुब्ज अर्थात कन्नौज बौध्दकाल में एक वैभवशाली राज्य था. यहाँ वैश्य जाति के राजा ग्रहवर्मन थे. इनकी मृत्यु के बाद मालवा नरेश देवगुप्त तथा गौड़ देश के राजा शशांकगुप्त नामक वैश्य राजाओं ने बारी-बारी से कान्यकुब्ज अर्थात कन्नौज पर आक्रमण कर दिया,जिससे वहां की सुरक्षा,अर्थव्यवस्था तथा व्यापार-धंधा सब अस्त-व्यस्त हो गया. सम्पूर्ण कान्यकुब्ज राज्य में भगदड़ मच गयी. हमारे पूर्वज जीविकोपार्जन हेतु कान्यकुब्ज राज्य से बाहर निकलकर भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों में जाकर धंधा-व्यापार करने लगे. व्यापार-धंधे में सफल होने के बाद वे वहीँ स्थायी हो गए. वे अपने – अपने धंधे के अनुसार अपनी जाति का नाम रख लिए. जो लोग दाना भूनने अथवा चरवन का काम करते थे, वे भुर्जी ,भडभूजा, भुजवा,भूज आदि लिखने लगे तथा जो लोग पाकवस्तु-हलवा, मिठाई आदि बनाते थे, वे हलवाई लिखने लगे. इसीप्रकार अन्य लोग भी अपने-अपने धंधे के अनुसार अपनी जाति लिखने लगे.कुछ लोग कन्नौज से सम्बन्ध होने के कारण कन्नौजिया लिखते हैं. कुछ लोग परदेशी लिखते है. ध्यान रहे उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में धोबी जाति के लोग भी कन्नौजिया लिखते है. अधिकतर स्वजातीय बंधु गुप्त या गुप्ता लिखते है. इसका सम्बन्ध गुप्तकाल के शासकों से भी जोड़ा जाता है. .

साभार : bhojwalsamaj.blogspot.com

VAISHYA DOMINATION FROM SAMVAT 300 TO NINE HUNDRED - संवत तीन सौ से संवत नो सो तक वैश्य आधिपत्य

#VAISHYA DOMINATION FROM SAMVAT 300 TO NINE HUNDRED - संवत तीन सौ से संवत नो सो तक वैश्य आधिपत्य

संवत तीन सो से संवत नो सो तक वैश्य जाति का आर्याव्रत में आधिपत्य रहा हैं. गुप्त वंश, परवर्ती गुप्त वंश, मालव का गुप्त वंश, वर्धन वंश, बंगाल का पाल और सेन वंश ने इस समय में देश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया.

विक्रम संवत की तीसरी चौथी पांचवी शताब्दी में वैश्य जाति परम उन्नति पर थी. उस समय जैन और बोद्ध धर्म का प्रभाव चमक रहा था. वैशाली, श्रावस्ती, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, उज्जयनी, सौराष्ट्र, पौन्द्वर्धन आदि व्यापारिक नगरो में ताम्रपत्र पाए गए हैं. उनसे वैश्य समाज की उन्नति का पता चलता हैं. उस समय इस शक्ति ने क्षत्रिय शक्ति का गर्व समाप्त करने की इच्छा की थी.जिस अमे बोध, जैन क्षत्रिय राजाओं ने वेद धर्म त्याग की इच्छा की थी उस समय ब्राह्मण शक्ति ने वैश्य शक्ति में सम्मिलित होकर एक वैश्य गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त से अश्वमेध यज्ञ कराया था. और वह अश्वमेध यज्ञ बोद्ध राजधानी पाटलिपुत्र में हुआ था. यद्यपि अश्वमेध यज्ञ क्षत्रियो का अधिकार था. परन्तु उस समय घोषणा की गयी थी की प्रथ्वी क्षत्रिय विहीन हैं. इस कारण यह यज्ञ एक वैश्य सम्राट द्वारा अनुष्ठित होता हैं. यह गुप्त वंश के सम्राटो का वैश्य होना सबसे बड़ा प्रमाण हैं. गुप्तेती वैश्यस्य. यह पारस्कर सूत्र का पिछला भाग हैं. वैश्य जाति के नाम के बाद गुप्त लगा होता हैं. यदि वह क्षत्रिय होते तो गुप्त नाम किसी भी रूप में धारण नहीं करता. गुप्त वैश्य सम्राटो ने उस समय पृथ्वी क समस्त क्षत्रिय सम्राटो को पराजित करके अपने अधीन किया था. उनके दरबार में सनातन, जैन और बोध तीनो ही प्रतिष्ठित थे.


विक्रम संवत सातवी शतब्दी में पूर्व भारत के अधीश्वर वैश्य सम्राट चन्द्रगुप्त( शशांक नरेन्द्र गुप्त) ने सनातन की पराकाष्टा ज्वलंत उदाहरण प्रश्तुत किया था. उसे कन्नौज अधिपति वैश्य सम्राट हर्षवर्धन ने पराजित किया था.

यह वर्धन वंश भी वैश्य वंश था. वर्धन उपाधि भी वैश्यों की ही रही हैं. यह शक्ति वैश्यों ने थोड़े ही काल में संचय नहीं की हैं. अवश्य ही इसमें बहुत समय लगा होगा. जैसे अंग्रेज वैश्य जाति ने जिस उपाय से पृथ्वी के कोने कोने में जाकर शक्ति संपन्न हुए. इसी तरह से वैश्य वनिक समुदाय ने शक्ति का संचय किया.

वैश्य सम्राट हर्षवर्धन के यत्न से आर्यव्रत में बोद्ध सम्प्रदाय का कई उत्थान हुआ. हर्षवर्धन की मृत्यु के उपरान्त भी वैश्य समुदाय अत्यंत प्रबल था. इनमे बोद्धो की संख्या अधिक थी. पाटलिपुत्र की वैश्य जाति की चेष्टा से महाराजा गोपाल अधीश्वर हुए . यह उनके पुत्र धर्मपाल के शिला लेख से विदित होता हैं. उनकी मृत्यु के उपरान्त उनके पुत्र धर्मपाल राजा बने और उन्होंने उस समय के गौड़ देश पर अधिकार कर लिया. पाल वंश की जाति भी वैश्य ही थी. और ये महाराजा अग्रसेन के वंश से थे. इसका प्रमाण गौडीय सुवर्ण वनिक कुल के इतिहास का लेख हैं. प्रायः चार सौ वर्ष तक पाल वंश ने गौड़ मंडल पर अपना आधिपत्य बनाए रखा. गौड़ मंडल उस समय आज के बंगाल को कहा जाता था.

PAL AND SEN VAISHYA DYNESTY - बंगाल का पाल एवं सेन वंशीय वैश्य राजा

#PAL AND #SEN VAISHYA DYNESTY - बंगाल का पाल एवं सेन वंशीय वैश्य राजा

विक्रम संवत की आठवी शताब्दी तक तो सभी अग्रवाल अग्रवंशी मिल जुल कर रहते थे. पर ईर्ष्यालु लोगो ने अवसर पाकर के अग्रवंशियो में फूट डलवादी . शैव अग्रवाल गन जो की अपने जैन और वैश्य बंधुओ से संख्या में कम थे इसी कारण से उन्हें राज्य प्रबंध सम्बन्धित ऊँचे अधिकार बहुत कम मिलते थे. इसी कारण से सभी अग्रवालो में आपस में लड़ाई आगे बढ़ने लगे. इस का प्रतिफल यह हुआ की इस आग ने चिंगारी का रूप ले लिए. विक्रम अम्वत ७५८ में शैव अग्रवालो के दो मुखिया पुरुष शिवानन्द और धर्मसेन, धरा नगर के तोमर वंशी रजा से जाकर मिले. उनका नाम समरजीत था. और उनसे मिलकर अग्रोहा पर चढ़ाई कर दी. घोर युद्ध हुआ. और दुर्भाग्य वश अग्रोहा राज्य समरजीत के हाथ में आ गया. दस बारह सहत्र से अधिक अग्रवंशी योद्ध्या वीर गति को प्राप्त हुए. सारा बंग देश यानी की बंगाल उस समय समरजीत के हाथ में था. यह देश समरजीत के अधिकार से वैश्य सम्राट हर्षवर्धन के पास आ गए था. विक्रमी अम्वत ७५९ में इसका पश्चिमी भाग समरजीत ने शिवानन्द को और पूर्वी भाग धर्मसेन को दे दिया था. शिवानन्द की संतान पाल वंश के नाम से और धर्म सेन की संतान सेन वंश के नाम से प्रसिद्द हुई. और उन्होंने विक्रम संवत १२६० तक ५०० वर्ष राज्य किया.

जब अग्रवंशी शिवानन्द बंगाल का शासन भली भांति नहीं कर सका तो प्रजा ने अम्वत ७८८ में उसके पुत्र गोपाल को अपना राज चुन लिया. जिसन शीघ्र ही अपनी बुद्धिमत्ता से और सगुनो से अपना इतना बल बढ़ा लिया था की थोड़े ही काल में दक्षिणी बिहार, और उसके आसपास के स्थानों को भी अपने राज्य में मिला लिया. इसका राज्य इसी के नाम से पाल वंशी राज्य के नाम से प्रसिद्ध हो गया. और यह पाल वंश का पहले राजा कहलाया. इसके पश्चात, धर्मपाल, फिर वेदपाल हुए. इन्होने इतनी प्रसिद्धि पाए की ये ह राज्य भारत के वैभवशाली राज्यों में गिना जाने लगा. विक्रम संवत ८६० में धर्मपाल द्वितीय ने अपने बल और प्रक्रम से कन्नौज के राजा को हटा कर दुसरे राजा को वंहा बिठा दिया. इनके बाद महिपाल और नेपाल बहुत प्रसिद्ध हुए इस वंश में सबसे अंतिम प्रसिद्द रजा रामपाल हुए. जसने ११८७ संवत तक राज्य किया. पाल वंशी राजाओ की राजधानी कुछ दिन राजगृह, फिर मुंगेर, फिर कूचविहार रही.

धर्म सेन और उसके संतानों ने पूर्वी बंगाल पर सेन वंश के नाम से संवत ७५९ से १२६० तक ५०१ वर्ष राज्य किया. संवत १२०० में जब यह राज्य विजयसेन के अधिउकार में था तो उसने इसे उन्नत अवस्था पर पहुंचा दिया. इसी राजा के समय में सेन वंश ने पाल वंश के राजाओ की प्रतिष्ठा को बहुत घटा दिया था. संवत १२६० तक सेन वंश का शासन रहा. सेन वंशी राजा हमेशा शैव मत का पालन करते रहे. सेन वंशीय राजाओं की राजधानी नवद्वीप अर्थात नादिया नगरी रही.

VAISHYA NAGA VANSH - वैश्य नागवंश का इतिहास

#VAISHYA NAGA VANSH - वैश्य नागवंश का इतिहास


कुषाणों के पतन के पश्चात् और गुप्तों के उदय से पूर्व तक का प्राचीन भारतीय इतिहास राजनैतिक दृष्टि से विकेन्द्रीकरण तथा विभाजन का काल माना गया है। इस समय देश में कोई शक्तिशाली सार्वभौम शक्ति नहीं थी। रामपूर्ण देश टूटकर छोटे-बड़े राज्यों में विभाजित हो गया था। चारों तरफ आरजकता व्याप्त थी। अव्यवस्था का बोलबाला था। भारत में इस समय दो प्रकार के राज्य थे —राजतन्त्र तथा गणतंत्र। इनके अतिरिक्त कुछ विदेशी शक्तियां भी थीं। आज इस ब्लॉग में हम दक्षिण भारत में राज्य करने वाले ‘नागवंश का इतिहास’ जानेंगे।

नागवंश –

गुप्तों के उदय से पूर्व उत्तर तथा दक्षिण में अनेक शक्तिशाली राजतंत्रों का उदय हुआ था। इन्हीं राजतंत्रों में एक राज्य था ‘नागवंश’

नागवंश का इतिहास —

शक्तिशाली कुषाणों के पतन के पश्चात् मध्यभारत तथा उत्तर प्रदेश के भूक्षेत्र पर शक्तिशाली नागवंशों का उदय हुआ। यह नागवंशी ही थे जिन्होंने गंगाघाटी से कुषाणों के साम्राज्य का विनाश किया था। पुराणों के विवरणों से ज्ञात होता है कि पद्मावती, मथुरा तथा कांतिपुर में नागवंशी कुलों का शासन था। पुराणों से जानकारी मिलती है कि मथुरा में सात तथा पद्मावती तथा मथुरा के नागवंशी शासक काफी शक्तिशाली थे। इनमें भी पद्मावती का नाग कुल सबसे अधिक महत्वपूर्ण था।

पद्मावती की पहचान मध्यप्रदेश के ग्वालियर के समीप स्थित आधुनिक ‘पद्मपवैया’ नामक स्थान से की जाती है। पद्मावती के के नाग लोग ‘भारशिव’ कहलाते थे। वे अपने कंधों पर शिवलिंग वहन करते थे, अतः भारशिव कहलाये। भारशिवों का वाकाटकों के साथ वैवाहिक संबंध था। भारशिव कुल के शासक भवनाग ( 305-40 ) की पुत्री का विवाह वाकाटक नरेश प्रवरसेन प्रथम के पुत्र के साथ हुआ था। समुद्रगुप्त के समय पद्मावती के भारशिव नागवंश का शासक नागसेन था। प्रयाग प्रशस्ति में उसका उल्लेख मिलता है।

मथुरा में समुद्रगुप्त के समय गणपतिनाग का शासन था। तीसरी शताब्दी के अंत में पद्मावती तथा मथुरा के नाग लोग मथुरा, धौलपुर, आगरा, ग्वालियर, कानपुर, झाँसी तथा बाँदा के भूभागों तक फ़ैल गए।

नागवंश का शासनकाल 150 से 250 विक्रम संवत के मध्य तक माना गया है।

नागवंश की प्रामाणिकता

प्राचीन काल में नागवंशियों का राज्य भारत के कई स्थानों में तथा सिंहल में भी था। पुराणों में उल्लेख आया है कि सात नागवंशी राजा मथुरा भोग करेंगे, उसके पीछे गुप्त राजाओं का राज्य होगा।

नौ नागवंशी राजाओं के जो पुराने सिक्के मिले हैं, उन पर ‘बृहस्पति नाग’, ‘देवनाग’, ‘गणपति नाग’ इत्यादि नाम खुदे मिलते हैं। ये नागगण विक्रम संवत 150 और 250 के बीच राज्य करते थे।

इन नव नागों की राजधानी कहाँ थी, इसका ठीक पता नहीं है, पर अधिकांश विद्वानों का मत यही है कि उनकी राजधानी ‘नरवर’ थी। मथुरा और भरतपुर से लेकर ग्वालियर और उज्जैन तक का भू-भाग नागवंशियों के अधिकार में था।

KALWAR VAISHYA FREEDOM FIGHTER - क्रांतिकारी कलाल शहीदो के नाम

#KALWAR VAISHYA FREEDOM FIGHTER - क्रांतिकारी कलाल शहीदो के नाम

भुर्या कलाल:– भूर्या कलाल का जन्म 1910 में नागपुर महाराष्ट्र में मैनत्य कलाल के यहां हुआ.... भूरिया कलाल ने अपनी बालिक अवस्था से ही आजादी की क्रांति में भाग लेना शुरू कर दिया था और 1942 के गांधी जी के "भारत छोड़ो आंदोलन" की भाग लेना नागपुर पहुंचे....जहा आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करते हुए मात्र 32 वर्ष की आयु में 14 अगस्त 1942 को यह बलिदान हो गए
 
गणपति कलाल:– गणपति का जन्म सन 1920 में नागपुर महाराष्ट्र में हुआ एक आम कलाल परिवार में हुआ और लोगो की तरह इनकी जिंदगी भी अच्छी चल रही थी परंतु अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों ने क्रांतिकारी बनने पर मजबूर कर दिया और मात्र 22 वर्ष की आयु में गांधी जी के 1942 के आंदोलन में "भारत छोड़ो आंदोलन" में जोरो शोरो से हिस्सा लिया और जिसके कारण यह अंग्रेजी हुकूमत की नजरो में आ गए और अंग्रजी पुलिस वालो ने इनका पीछा किया तो यह पकड़ में ना आ सके और जिसके बाद इनको भगोड़ा घोषित कर दिया गया परंतु 2 साल के लगातार प्रयास के उपरांत भी अंग्रजी हुकूमत इनको पकड़ नही पाईं.....1944 में एक दिन पुलिस को सूचना लगती है जब पुलिस इनको पकड़ने के लिए जाती है तब पुलिस के सत्य झड़प में यह शहीद हो जाते है....बालिक अवस्था में आजादी की लड़ाई लड़ने लगे, मात्र 22 वर्ष की आयु में भारत छोड़ो आंदोलन में आ गए और 24 वर्ष की आयु में शहीद हो गए।

हिरलाल कलाल:– हिरलाल का जन्म 1914 में खड़की, वर्धा महाराष्ट्र में बिहारीलाल कलार जी के यहां हुआ.. हिरलाल जी ने 4थी तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी और कम उम्र में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए...जब गांधी जी ने 1942 में "भारत छोड़ो आंदोलन" में हिस्सा लिया तो हिरलाला जी ने भी उसमें जोरो शोरो से हिस्सा लिया और अंग्रजी हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की जिसके कारण अष्टि नाम की जगह पर पुलिस द्वारा गोलियां चलाई गई जहा यह शहीद हो गए।
 
नारायण कलाल:–नारायण जी का जन्म 1920 में नागपुर महाराष्ट्र में कलाल जाति में हुआ। इनके पिता जी का नाम बालकृष्ण कलार था...इतनी कम उम्र में भी आजादी के आंदोलन में बड़े जोरो शोरो से हिस्सा लिया....जब गांधी जी ने "भारत छोड़ो आंदोलन" 1942 में चलाया तो मात्र 22 वर्ष की बाल अवस्था में यह आंदोलन में भाग लेने के लिए चले गए और अंग्रेजी हुकूमत का जोरो शोरो से विरोध किया परंतु नागपुर रेलवे स्टेशन के पुल के पास पहुंचते ही अंग्रजी सरकार द्वारा गोली चलाने का आदेश दे दिया गया जिसमें यह 13 अगस्त 1942 को वही पर तुरत शहीद हो गए।

BHATIA MAHAJAN VAISHYA GOTRA - भाटिया महाजन वैश्य की की गोत्र

#BHATIA MAHAJAN VAISHYA GOTRA - भाटिया महाजन वैश्य की की गोत्र

पंडित हरिदत के अनुसार भाटिया महाजन के 7 गोत्र जो अनेक उपसखाये रही जो निमं प्रकार है

1 परासर गोत्र

1 राय गाजरिया 2 राय पञ्चलोडिया 3 राय पलिजा 4 राय गगला 5 राय सराकी 6 राय सोनी 7 राय सुफला 8 राय जीया 9 राय मोगला 10 राय घघा 11 राय रीका 12 राय जयधन 13 राय कोढ़िया 14 राय कोवा 15 राय रडिया 16 राय कजराया 17 राय सीजवाला 18 राय जियाला 19 राय मलन 20 राय धवा 21 राय धिरण 22 राय जगता 23 राय निशात

2 साणस गोत्र

राय दुत्या 2 राय जब्बा 3 राय बबला 4 राय सुअडा 5 राय धावन 6 राय डंडा 7 राय ठगा 8 राय कंधिया 9 राय उदेसी 10 राय बधुच 11 राय बलाए

3 भारद्वाज गोत्र

राय हरिया 2 राय पदमसी 3 राय मेद्या 4 राय चान्दन 5 राय खियारा 6 राय थुल 7 राय सोढिया 8 राय बोडा 9 राय मोछा 10 राय तम्बोल 11 राय लाख्वंता 12 राय ढककर 13 राय भुद्रिया 14 राय मोटा 15 राय अनगढ़ 16 राय ढ़ढाल 17 राय देग्चंदा 18 राय आसर

4 सुधर वंश गोत्र

1 राय सपटा 2 राय छाछेया 3 राय नगड़ 4 राय बावला 5 राय परमला 6 राय पोथा 7 राय पोणढग्गा 8 राय मथुरा

5 मधुवाधास गोत्र

1 राय वैद 2 राय सुरया 3 राय गूगल गाँधी 4 राय नए गाँधी 5 राय पंचाल 6 राय फुरास गाँधी 7 राय परे गाँधी 8 राय जुजर गाँधी 9 राय प्रेमा 10 राय बीबल 11 राय पोवर

6 देवदास गोत्र

1 राय रमैया 2 राय पवार 3 राय राजा 4 राय परिजिया 5 राय कपूर 6 राय गुरु गुलाब 7 राय ढाढार 8 राय करतारी 9 राय कुकण

7 ऋषी वंशी

1 राय मुल्तानी 2 राय चमुजा 3 राय करण गोना 4 राय देप्पा

भाटिया वैश्य साहूकारी के लिए जहा प्रसिद्ध रहे है वही धर्मात्मा के रूप में प्रख्यात होने का गौरव उन्हें प्राप्त है । वे जिस क्षत्र में रहे उन्होंने धर्मशालाये , पाठशालाये , मंदिर , ज लाशय आदि का निर्माण करवाकर जनहित का परिचय दिया । ये भाटी वंश से उत्पन होने के कारण गौरव को अभी तक संजोये हुए है । भाटिया व्यापारी भारत तक ही नहीं सीमित रहे बल्कि समुन्द्र पार कर अरब और अफ्रीका देशो में भी गए । और वहा अपना नाम कमाया । ये जब समुन्द्र पार करते तब माल असबाब की सुरक्षा के लिए जहाजो पर 18 से 24 टोपे लगाते । 300 वर्ष पूर्व इन्होने बसरेमें गोविन्द्रय का मंदिर बनवाया । सत्रु जब उसको ध्वस्त करने लगे तो गोविन्द्रय की मूर्ती मस्कट में लाकर स्थापित की । मुख्यतः ये हाथी दांत , महिदान , कोड़ा , कोड़ी , गेंडे का चमड़ा , और सीप आदी वस्तुओ का का व्यापार करते थे । अनेक भाटिया वल्लभाचार्य सम्प्रदाई के अनुयायी है । मांडवी के मानजी जीवा ( कच्छ के दीवान ) सेठ मुरारजी गोकुलदास ( मुंबई की कोंसिल के सदस्य )सेठ मुलजि ( द्वारका के मंदिर बनवाया ) सेठ विसरा माउजी , सेठ मानजी , सेठ तेजपाल , सेठ जीवराज , बालुके आदि भाटिया के नाम उलेखनीय है ।

PRAN SAHAB A GREAT ACTOR

PRAN SAHAB A GREAT ACTOR

Pran Struggle Story; India Pakistan Partition Violence, Interesting Facts | 
हीरो से ज्यादा फीस लेते थे विलेन प्राण: बहन की मौत हुई लेकिन शूटिंग करते रहे, बेटी ने कहा- निगेटिव रोल छोड़ो तो कैरेक्टर आर्टिस्ट बने


आज बॉलीवुड के सबसे खूंखार विलेन प्राण की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी है। 7 दशक के एक्टिंग करियर में उन्होंने ऐसे यादगार किरदार निभाए हैं कि लोग उन्हें रियल लाइफ में भी विलेन समझने लगे थे। 362 फिल्मों का हिस्सा रहे प्राण को पद्म भूषण और दादा साहेब फाल्के जैसे सम्मान से नवाजा गया था।

प्राण साहब का जन्म एक कलवार वैश्य परिवार में हुआ था. उन्होंने लाहौर सिनेमा से एक्टिंग की शुरुआत की थी। खूंखार विलेन के रोल में उन्होंने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था। वो जब करियर के टाॅप पर थे, तभी विभाजन के दंगों ने उनके करियर पर विराम लगा दिया। इसके बाद उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जीरो से शुरुआत करनी पड़ी।

आज प्राण साहब के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी अदाकारी और निजी जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने किस्से...

किस्सा 1- पान की गुमटी पर पहली फिल्म का ऑफर मिला. 

प्राण सिगरेट के बेहद शौकीन थे। वो 12 साल की उम्र से ही सिगरेट पीने लगे थे। एक दिन लाहौर में जब वो सिगरेट पीने पान की दुकान पर गए तो वहां उन्हें स्क्रिप्ट राइटर वली मोहम्मद वली मिले। वली मोहम्मद उनको घूरने लगे। उन्होंने प्राण से कहा- मैं एक फिल्म बना रहा हूं, उसका एक किरदार बिल्कुल तुम्हारे जैसा ही है।

इसके बाद उन्होंने कागज पर अपना पता लिखकर प्राण को दिया और अगले दिन ऑफिस आकर मिलने को कहा, मगर प्राण ने वली मोहम्मद और उस कागज को जरा भी तवज्जो नहीं दी। कुछ दिनों बाद जब वो वली मोहम्मद से फिर टकराए तो उन्होंने प्राण को मिलने वाली बात याद दिलाई।

आखिर प्राण ने अनमने मन से पूछ ही लिया कि वो क्यों उनसे मिलना चाहते हैं। जवाब में वली मोहम्मद ने फिल्म वाली बात बतलाई। दिलचस्प बात यह है कि तब भी प्राण ने उनकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, मगर मिलने को तैयार हो गए।

आखिरकार जब मुलाकात हुई तो वली मोहम्मद ने प्राण को राजी कर लिया। इस तरह प्राण पंजाबी में बनी अपने करियर की पहली फिल्म यमला जट में नजर आए। इसी कारण प्राण वली को अपना गुरु मानते रहे।

किस्सा-2- विभाजन के दंगे ने करियर पर विराम लगा दिया था

विभाजन से पहले प्राण ने 1947 तक लाहौर में रहकर ही फिल्में कीं। 1940 से 1947 के बीच प्राण ने 22 फिल्मों में काम किया, जो लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री में बनीं। ये वो दौर था जब खूंखार विलेन के रोल में प्राण सिकंद सबका ध्यान अपनी तरफ खींच रहे थे।

तभी 1947 में देश की आजादी के साथ दंगे शुरू हो गए। दंगे शुरू हुए तो दिल्ली से लाहौर तक एक जैसा ही मंजर था। लाहौर में काम कर रहे प्राण ने अपनी पत्नी शुक्ला अहलूवालिया और एक साल के बेटे अरविंद को मध्य प्रदेश के इंदौर में अपनी भाभी के यहां भेज दिया। उन्हें डर था कि दंगे में परिवार को कुछ हो ना जाए।

11 अगस्त 1947 को प्राण अपने बेटे का जन्मदिन मनाने लाहौर से इंदौर आए। यहां आकर रेडियो पर समाचार सुना तो पता चला लाहौर दंगों की आग में बुरी तरह झुलस गया है और हिंदुओं को वहां चुन-चुन कर मारा जा रहा है। ऐसे में प्राण यहीं रह गए।

1945 के आसपास कोलकाता फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह से मुंबई शिफ्ट हो चुकी थी। उन्होंने सोचा, काम तो ये ही आता है, क्यों ना मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाई जाए। लाहौर में तो नाम चलता ही था, तो यहां भी काम मिलने में दिक्कत नहीं आएगी। ये सोचकर वो परिवार को लेकर मुंबई आ गए, मगर जैसा सोचा था, वैसा हुआ नहीं। मुंबई आने पर काम के सिलसिले में उन्होंने कई प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के ऑफिस के चक्कर लगाए, लेकिन बात नहीं बनी।

किस्सा 3- हीरो से ज्यादा फीस चार्ज करते थे

फिल्म जिद्दी हिट रही, जिसके बाद प्राण को 3 और फिल्मों के ऑफर आए। साथ ही ये बात भी फैल गई कि वो हर फिल्म के लिए 500 रुपए फीस चार्ज करते हैं। इतनी ही फीस हीरो भी लिया करते थे। इस तरह वो ऐसे विलेन बने जिनकी फीस हीरो या बाकी विलेन से ज्यादा होती थी।

एक बार उनके पास एक फिल्म का ऑफर आया। उन्होंने काम करने के लिए हामी भर दी, लेकिन प्रोड्यूसर ने कहा कि 500 रुपए फीस नहीं देंगे, क्योंकि फिल्म के हीरो की ही फीस उतनी है। प्राण ने फिल्म करने से मना कर दिया। बाद में उस प्रोड्यूसर को 100 रुपए ज्यादा फीस दे कर उन्हें कास्ट करना पड़ा। इस तरह उन्हें हीरो से ज्यादा 600 रुपए प्रति महीना उस फिल्म के लिए मिले।

इसके बाद तो उन्होंने अधिकतर फिल्मों में हीरो से ज्यादा फीस चार्ज की। फिल्म गृहस्थी 1948 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म के लिए प्राण को एक हजार रुपए महीना फीस मिलती थी।

किस्सा 4- फिल्मी पर्दे पर रियल लाइफ कैरेक्टर के गेटअप को कॉपी करते थे

प्राण अपने मेकअप को लेकर बहुत सजग रहते थे। अखबार में छपी हुई किसी नेता की फोटो उनको पसंद आती थी तो वो उसे काटकर रख लेते थे। वो ऐसा इसलिए करते थे, क्योंकि जब किसी फिल्म में वो खुद को उसी के जैसे पर्दे पर उतारें तो कोई कमी ना हो।

प्राण अपने घर पर भी मेकअप का सामान रखते थे। फिल्म खानदान में उन्होंने हिटलर के लुक को कॉपी किया था। जुगनू में उन्होंने बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान का गेटअप कॉपी किया था, जिसमें वो प्रोफेसर के रोल में नजर आए थे। फिल्म अमर अकबर एंथनी में उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का गेटअप चुना था।


किस्सा 5- असल में विलेन मान बैठी थीं अरुणा ईरानी
एक बार प्राण हॉन्गकॉन्ग में फिल्म ‘जौहर महमूद इन हॉन्गकॉन्ग’ की शूटिंग कर रहे थे। फिल्म में उनके साथ अरुणा ईरानी भी थीं। दोनों के सीन्स की शूटिंग जल्दी खत्म हो गई, जिसके बाद प्रोड्यूसर ने प्राण से कहा कि वो अरुणा ईरानी के साथ मुंबई चले जाएं।

दोनों की हॉन्गकॉन्ग से कोलकाता, फिर मुंबई की फ्लाइट थी, लेकिन जब वो कोलकाता पहुंचे तब तक मुंबई की फ्लाइट जा चुकी थी। जिस वजह से अगले दिन की फ्लाइट के लिए अरुणा के साथ उन्हें एक होटल में रुकना पड़ा।

इस बात से अरुणा ईरानी डर गईं कि कहीं प्राण उनके साथ कुछ गलत ना कर दें जैसा कि वो फिल्मों में करते हैं। जब दोनों होटल पहुंचे तो प्राण ने उनके कमरे में जा कर कहा- दरवाजा अच्छे से बंद कर लेना, कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। देर रात किसी चीज की जरूरत पड़ी तो मुझे बताना, मैं बगल वाले कमरे में हूं। उनकी इस बात से अरुणा बहुत भावुक हो गईं, क्योंकि वो उनको रियल लाइफ में भी विलेन मान बैठी थीं।

किस्सा 6- लोगों ने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था

प्राण द्वारा निभाए गए खलनायकों के किरदार के चलते लोग उन्हें सड़कों पर गालियां देते थे। एक समय में लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना तक बंद कर दिया था। प्राण ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था- 'उपकार' से पहले सड़क पर मुझे देखकर लोग बदमाश, लफंगा और गुंडा कहा करते थे। उन दिनों जब मैं परदे पर आता था तो बच्चे अपनी मां की गोद में दुबक जाया करते थे और मां की साड़ी में मुंह छुपा लेते। रुआंसे होकर पूछते- मम्मी वो चला गया क्या, क्या अब हम अपनी आंखें खोल लें।


किस्सा 7- गुंडा समझ कर दोस्त की बहन प्राण से मिली ही नहीं

फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में प्राण ने डाकू राका का रोल निभाया था। जब इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली में चल रही थी तो वो एक दिन अपने दोस्त के घर चाय पर गए। दोस्त ने उनकी मुलाकात करवाने के लिए अपनी बहन को बुलाया। बहन प्राण को देखते ही अपने कमरे में भाग गई।

कुछ देर बाद प्राण भी लौट गए। रात को उनके दोस्त ने कॉल किया और बताया- बहन उन्हें देखते ही डर गई थी इसलिए कमरे में भाग गई। उसने मुझसे कहा कि ऐसे गुंडे को घर क्यों बुलाते हो? ये बात सुनकर प्राण खूब हंसे।

किस्सा 8- बहन की मौत के बाद भी शूटिंग अधूरी नहीं छोड़ी

प्राण हमेशा से मिलनसार थे। सेट पर आते ही वो सबका हाल-चाल जरूर पूछते थे। फिल्म उपकार की शूटिंग के दौरान एक दिन ऐसा था कि उन्होंने शाम तक किसी से बात नहीं की। हुआ कुछ यूं था कि एक दिन फिल्म का फाइट सीन फिल्माया जाना था। जब प्राण सेट पर पहुंचे तो उन्होंने किसी से बात नहीं की। फिल्म के हीरो मनोज कुमार को यह बात अटपटी लगी, मगर उन्होंने सोचा कि शायद प्राण साहब डायलॉग प्रैक्टिस में बिजी होंगे।

सुबह से दोपहर हो गई, उन्होंने किसी से बात नहीं की, सिर्फ उदास बैठे रहे। ये देख मनोज कुमार सोचे कि शायद वो थक गए हैं, मगर जब पैकअप के बाद भी उन्होंने किसी से बात नहीं की, तब मनोज कुमार खुद को रोक नहीं पाए और प्राण से इस उदासी का कारण पूछने चले गए।

उदासी का कारण पूछने पर प्राण ने कहा- मैं कल रात जब शूटिंग करके पहुंचा तो कोलकाता से फोन आया। पता चला कि बहन का निधन हो गया है। ये कहते हुए वो रोने लगे। ये सुन मनोज कुमार ने उनसे कहा कि क्यों वो बहन के अंतिम दर्शन में शामिल होने नहीं गए।

जवाब में प्राण ने कहा- मुझे पता है कि आप सभी मुझे जरूर जाने को कहते, मगर कुछ दिन तक शूटिंग रोकने में बहुत ज्यादा खर्च आ जाता। वैसे भी फिल्म मेकिंग में बहुत पैसे लगे हैं। मैं नहीं चाहता हूं कि नुकसान हो। द शो मस्ट गो ऑन। उनकी यह बात सुन मनोज कुमार भावुक हो गए थे।


किस्सा 9- बेटी ने कहा था- अच्छे रोल क्यों नहीं करते, मलंग चाचा से बदली इमेज

फिल्म उपकार से जुड़ा एक किस्सा और भी है। इस फिल्म के पहले रियल लाइफ में लोग प्राण को बदमाश समझते थे। यह बात उनकी बेटी को अच्छी नहीं लगती थी। बेटी ने उनसे कहा- आप हीरो जैसे अच्छे रोल क्यों नहीं करते। बेटी की इस बात से वो सोच में पड़ गए और एक डीसेंट रोल करने का मन बना लिया।

इसी बीच मनोज कुमार उनके पास फिल्म उपकार की स्क्रिप्ट लेकर पहुंच गए। इसकी कहानी मनोज कुमार ने खुद लिखी थी। कहानी लिखते वक्त उन्होंने मलंग चाचा का किरदार प्राण को ध्यान में रखकर लिखा था। कहानी सुन प्राण ने काम करने के लिए हामी भर दी थी।

इस फिल्म का फेमस गाना कसमे वादे प्राण पर फिल्माया गया था। जब म्यूजिक कंपोजर कल्याणजी-आनंदजी को पता चला कि यह गाना प्राण पर फिल्माना है, तो वे चिल्लाते हुए कहने लगे- वो हमारा गाना बर्बाद कर देगा। वहीं किशोर कुमार ने गाने से ही मना कर दिया था।

मगर जब गाने का पहला प्रिंट सभी लोगों ने देखा तो वो प्राण की एक्टिंग से हैरान रह गए। सबको विश्वास हो गया कि वो हर किरदार में ढल सकते हैं।

उपकार की रिलीज के तुरंत बाद प्राण ओम प्रकाश की बेटी की शादी के लिए दिल्ली चले गए। उन्हें अपनी कार लगभग 400 गज दूर पार्क करनी पड़ी और मंडप तक पैदल जाना पड़ा। वो जैसे ही अपनी कार से निकले, वहां मौजूद फैंस कहने लगे- मलंग चाचा आ रहे हैं। उनके लिए रास्ता बनाओ।

ये सुन प्राण भावुक हो गए और कहने लगे- मेरे बारे में लोगों की सोच में रातों-रात हुए बदलाव से सरप्राइज हूं।

किस्सा 10- राजेश खन्ना के साथ प्राण को कास्ट करने में कतराते थे प्रोड्यूसर्स

60 के दशक में हीरो में राजेश खन्ना और विलेन में प्राण का बोलबाला था। हर फिल्ममेकर दोनों को अपनी फिल्म में कास्ट करना चाहते थे। हालांकि, कोई भी दोनों को साथ में कास्ट नहीं करना चाहता था।

उस वक्त राजेश खन्ना एक फिल्म के लिए लगभग 8 लाख रुपए चार्ज करते थे, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी। वहीं, प्राण हर फिल्म में हीरो से ज्यादा फीस ही लेते थे। ऐसे में फिल्ममेकर को डर रहता था कि फिल्म की कास्टिंग इन दोनों की फीस से ही बहुत ज्यादा हो जाएगी। ऐसे में लोग उन्हें अलग-अलग ही अपनी फिल्म का हिस्सा बनाते थे।

हालांकि बेवफाई, मर्यादा, दुर्गा, हत्यारा जैसी फिल्मों में काका और प्राण की जोड़ी देखने को मिली।

1998 में 78 साल की उम्र में प्राण को दिल का दौरा पड़ा था। इसके बाद उन्होंने फिल्म में काम नहीं करने का फैसला किया था। मगर, बिग बी की गुजारिश पर उन्होंने तेरे मेरे सपने (1996) और मृत्युदाता (1997) में काम किया था।

2000 से लेकर 2007 तक, उन्हें कुछ और फिल्मों में भी देखा गया था। 12 जुलाई 2013 को 93 साल की उम्र में मुंबई के लीलावती अस्पताल में लंबी बीमारी की वजह से प्राण का निधन हो गया था।