DALMIA FAMILY - MAMRAJ RAM BAGAT
चिड़ावा का डालमिया कुटुम्भ बहुत बड़ा है उनकी एक शाखा मामराज राम भक्त भी थी
चिड़ावा की ऐतिहासिक फर्म मामराज राम भगत
चिड़ावा की सबसे ऐतिहासिक फर्म मामराज राम भगत की स्थापना सन 1906 में हुई थी उसे सेठ मामराज ने स्थापित किया था आरंभ में इस फर्म में मालवा से आने वाली अफीम का कारोबार किया जाता था जिससे उन्हें काफी मुनाफा हुआ कालांतर में सेठ मामराज के चचेरे भाई राम भगत एवं शिव मुख राय इस फर्म में सम्मिलित हुए आगे चलकर इस फर्म में सेठ मामराज और सेठ बालकिशन के वंशज ही रह गए सेठ शिवमुख राय के वंशज भागीदारी से अलग हो गए अंततः इस फर्म के मालिक हरकिशन दास मंगल चंद दुलीचंद बेणी प्रसाद जुहारमल फूलचंद और केशर देव रह गए इन सब में सेठ हरिकिशन दास सबसे उदार दानी ईश्वर भगत और व्यवसाय में कुशल व्यक्ति थे चिड़ावा की जनता पर इनकी गहरी छाप थी और आज भी यह सम्मान के साथ याद किए जाते हैं सेठ दुलीचंद ने इस फर्म की बहुत उनति की सेठ बेणी प्रसाद विद्वान और नए विचारों वाले सामाजिक कार्यकर्ता थे यह सेंट्रल बैंक के डायरेक्टर भी रहे सभी भाइयों के सहयोग से चिड़ावा की यह फर्म 52 वर्षों तक बहुत ठीक चलती रही लेकिन भाइयों के बीच मनमुटाव होने के कारण एवं कुछ जलने वाले प्रतिद्वंदियों की चाल से यह फर्म 1987 में फेल हो गई इस फार्म के फेल होने के बाद भी इसके भागीदार ने बाजार की करोड़ो रुपए की देनदारी थी वह भीचूका दी इस फर्म का यह निश्चय था की नौकरी में सबसे पहले चिड़ावा के लोगों को ही जगह दी जाए इस फर्म के मालिक सुवसड़ा हरियाणा से चिड़ावा आकर बसे थे यह लोग गर्ग गोत्र के अग्रवाल थे उनके मूल पुरुष कनीराम थे उनके तीन पुत्रों में से एक की संतान मामराज एवं राम भक्त थे
और दूसरे की संतान रामकिशन डालमिया और गया के लक्ष्मी नारायण गौरी शंकर डालमिया थे इस फर्म के मैनेजर प्रह्लाद राय बगड़िया थे यह बहुत उदार और साहसी व्यक्ति थे सेठ लोग उनकी राय से काम करते थे अगर सेठो से कोई पूछता की सेठ कहां है तो वे लोग उसे बगड़िया जी के पास भेज देते थे उस समय सूरजमल शिव प्रसाद फर्म के मैनेजर गोविंद राम भगेरिया का भी ऐसा ही सम्मान था बगड़िया और भगेरिया सेठ ही माने जाते थे एवं दान में लाखों का चंदा लिख सकते थे मामराज राम भगत फर्म ने चिड़ावा तथा देश के अन्य भागों में बहुत ही धार्मिक संस्थान खोले चिड़ावा में इस फर्म का एक धर्मार्थ अस्पताल चलता था जो 25000 की आबादी वाले शहर में एक ही अस्पताल था इसमें रोगियों को दवा के अलावा भोजन और ठहरने का स्थान निशुल्क मिलता था इसके अतिरिक्त कन्या पाठशाला संस्कृत पाठशाला और हिंदी प्राथमिक शाला चलती थी बागर एवं डालमिया छतरी के नाम से उनकी धर्मशाला थी और हवेली पर नित्य सदा व्रत चलता था बद्रीनारायण के रास्ते में लक्ष्मण झूले के पास इस फर्म ने स्वर्ग आश्रम नाम का एक बड़ा रमणीय स्थान बनवाया था इसमें वृद्ध लोगो के ठहरने की जगह और भोजन निशुल्क मिलता था इस फर्म की बनारस हिंगोली और नारनौल में भी धर्मशालाएं बनी हुई थी इन्होंने चिड़ावा में कई कुए तथा मंदिर बनवाए थे कई बड़ी-बड़ी संस्थाओं को इस फर्म से बड़ी-बड़ी रकम में चंदे में मिली थी इस फर्म का व्यवसाय देश के अनेक भागों में फैला हुआ था इनका इनका हेड ऑफिस बम्बई में था
जहां से प्रधान व्यवसाय कॉटन और गले का काम होता था इसके अलावा बैंकिंग और कमीशन एजेंसी का भी काम चलता था फर्म का नाम मामराज राम भक्त था हुकुमचंद राम भक्त नाम से भी कॉटन और कमीशन एजेंसी का काम होता था बम्बई में उनकी कई शाखाएं थी खामगांव में दो जिनिंग मिल और चंदा में एक प्रेसिंग फैक्ट्री थी इनकी एक शाखा जापान के कोसी बंदर में भी थी जहां से जापान तथा यूरोप को कॉटन का निर्यात होता था इस व्यापार में इंदौर के सेठ सर हुकुमचंद का सांझा था बम्बई के एक फर्म मामराज बसंत लाल के नाम से काम करती थी यह फर्म शक्कर एवं चीनी का कारोबार करती थी इस फर्म के अंतर्गत तीन चीनी मिले आती थी और चीन के प्रसिद्ध व्यापारी यान वान की बम्बई में एकमात्र गारेंटर थी इसके अलावा कोलकाता कानपुर कराची आदि मुख्य मुख्य व्यापारिक केन्द्रो में भी फर्म की शाखाएं खुली हुई थी इन चार फर्मो की यूपी पंजाब और हैदराबाद के विभिन्न स्थानों में 40 शाखाएं थी अहमदाबाद न्यू स्वदेशी मिल्स लिमिटेड में इनका शिवनारायण जी नेमानी के साथ साझेदारी थी अकोला में इनका अकोला कॉटन मिल्स लिमिटेड था जिसके साथ एक जिनिंग और एक प्रेसिंग फैक्ट्री भी थी हुकुमचंद राम भगत के नाम से जो कारखाने थे उनके अतिरिक्त हिंगोली रतलाम निजाम पानीपत पंजाब कानपुर मऊरानीपुर और कुलपहाड़ में भी इनकी जिनिंग मिले चल रही थी हरपालपुर में इनका एक तेल मिल था इंदौर के सेठ सर हुकुमचंद और बम्बई के सेठ ताराचंद घनश्याम दास से इस फर्म का बहुत पुराना संबंध था हुकम चंद राम भक्त नाम से जितना काम चलता था उसमें सेठ हुकुमचंद का भी हिस्सा था इनका कराची में बर्मा ऑयल कंपनी का जो काम होता था उसमें ताराचंद घनश्याम दास का भी हिस्सा था
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