SETH DULICHAND KAKRANIYA
पूर्व जन्म के गंधर्व सेठ दुलीचंद ककरानिया सेठ हरसुखदास ककरानिया के एकमात्र पुत्र थे इनका जन्म १९१७ में चिड़ावा में हुआ हरसुखदास कलकत्ता में जुट पाट और चांदी का कारोबार करते थे वह कलकत्ता में प्रथम मारवाड़ी थे जिन्होंने 1929 में जुट प्रेस की स्थापना की जब दुलीचंद कारोबार में हाथ बटाने लगे तब हरसुखदास ने हुगली जुट मिल भी अंग्रेजों से खरीद ली दुलीचंद ने अपना काम तो संभालना ही शुरू किया था वे अंग्रेज कंपनियों का भी काम संभालने लगे जिसे उन्होंने बहुत धन कमाया वह बहुत उदार प्रवर्ति के थे वह जैसे धन कमाने में तेज थे वैसे ही धन खर्च करने में भी तेज थे चंदा लिखवाने में वह सबसे पहले आगे की पंक्ति में रहते थे यह सदा व्रत चलते तथा संस्कृत पाठशाला और धर्मार्थ औषधालय भी चलाते थे इन्होंने धर्मशाला एवं मंदिरों का भी निर्माण करवाया दुलीचंद से खेतड़ी के राजा अजीत सिंह की घनिष्ठ मित्रता थी राजा जी बहुदा इनके घर आते थे सेठ दुलीचंद से जयपुर बीकानेर जोधपुर आदि के बड़े छोटे अनेक राजाओं की मित्रता थी कलकत्ता में जाने के बाद इन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल से मित्रता स्थापित की तथा काउंसिल के सदस्य मनोनीत हुए राजपूताने के अनेक राजाओं का तत्कालीन शासको से काम निकालने में दुलीचंद ने गवर्नर जनरल के यहां अपने प्रभाव का उपयोग किया एक बार की बात है दुलीचंद के यहाँ अंग्रेज अफसर मिलने के लिए आये नौकर से उन्होंने चाय बनाने के लिए कहा परन्तु नौकर ने आकर बताया के सेठ जी अंगीठी में कोयला नहीं है मै लेकर आता हु उन्होंने नौकर को वही रुकने के लिए कहा सेठ दुलीचंद ने मुनीम को कहा तिजोरी में से रुपए निकाल कर लाये और अंगीठी में रुपियो को जलाकर जब चाय बनवाई तब उनका ऐसा रवैया देखकर अंग्रेज अफसर चकित रह गए कोलकाता में दुलीचंद का बंगला और उनका विलास उद्यान दमदम रोड पर स्थित था बंगले का नाम आर की सील था जो भी विदेशी यात्री कोलकाता आते वह उनका बंगला और उद्यान देखना नहीं भूलते कहते हैं कि दुलीचंद के कपड़े विलायत से सीलकर आते थे दुलीचंद की धोती का जैसा किनारा होता था उसे दुलीचंद पाड़ कहा जाता था वह इत्तर के बहुत शौकीन थे विलायत से उनके साबुन और इतर आया करते थे जब भी वह ऊंट पर चढ़ते थे उसे पर प्रतिदिन सैकड़ो रुपए का इत्र लगाया जाता था दुलीचंद की हस्त लिपि बहुत सुंदर थी वह संगीत के बहुत शौकीन थे अच्छा सवारी करना व्यायाम करना त्रिकाल संध्या करना और पूजा पाठ करना उनके नित्य कर्म थे उन्होंने विष्णु सहस्त्रनाम और गीता को अपने हाथ से लिखा था जिसे सोने में लिखा था बाद में उसे काशी विश्वविद्यालय में रखा गया है कर्मकांड आदि के श्लोक उन्हें शुद्ध रूप से याद थे जब चिड़ावा आते तब रास्ते में जो गांव पढ़ते उनके लोगों को खिला-खिला कर ही आगे बढ़ते थे चिड़ावा में उनके भोज चलते ही रहते थे आज भी उनकी हवेली में ऐसे टॉप पड़े हैं जिनमें 25-25 मण हलवा एक साथ बन सकता है उन्होंने काशी जाकर विधिवत यज्ञ पवित्र धारण किया उन्होंने एक गरीब लड़की को गोद लेकर बड़ी धूमधाम से काशी में ही उसकी शादी की चिड़ावा में जगत उठाने के बदले में उन्होंने खेतड़ी नरेश को दो बार चार-चार लाख रुपए दिए जब वह कलकत्ता से चिड़ावा आते तब नारनौल रेलवे स्टेशन पर खेतड़ी के सरकारी लवाजमा उनका स्वागत करने जाते जीवन के उत्तरार्ध में सेठ दुलीचंद आर्थिक संकट में रहे लेकिन उनकी दानशीलता सदा बनी रही हैदराबाद के नवाब ने एक हिंदू लड़की को भगा लिया था जिसे मुसलमान बनने से बचने के लिए दुलीचंद ने अपने बंगले में उसे शरण दी थी जिसका नाम गोरी था उन्होंने एक लड़के को गोद लिया था पर वह निकम्मा निकल गया उनकी सेठानी पहले ही मर चुकी थी अंतिम दिनों में गोरी ने ही उनकी बहुत सेवा की दुलीचंद की शोकिनिया आज भी चिड़ावा नागरिकों की जुबान पर रहती है 1986 में निर्जला एकादशी के दिन उन्होंने काशी में शरीर त्याग दिया लोग कहते हैं कि पूर्व जन्म के गंधर्व थे
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