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Saturday, June 13, 2026

VANIK VANIYA MAHAJAN VERSES MUGAL

VANIK VANIYA MAHAJAN VERSES MUGAL बनिया बनाम मुग़ल

बनिया समुदाय को अक्सर लोग भीरु और शांतिप्रिय , कंजूस समझते है। किंतु इतिहास में ऐसे कई उदाहरण है जो इसके विपरीत है। आज आपको इतिहास से ऐसा जुड़ा किस्सा सुनायेंगे जिसे पढ़कर बनियों के प्रति आपकी ये धारणा कदाचित बदल जाएँ।


भारत में प्रिंटिंग प्रेस पुर्तगाली लाए थे और सोलहवीं सदी तक भारत में केवल एक प्रेस थी जिसमें बाइबिल छपती थी। ये देख सूरत के मशहूर सेठ और महाजन श्री भीमजी पारेख ने एक अहम कदम उठाया।

भीमजी सूरत के सबसे बड़े सेठ थे और उनकी हुंडी ईस्ट इंडिया कंपनी , डच कंपनी, मुगलों में खूब चलती थी। इन तीनो पार्टी को सेठ साहब उधार भी खूब देते थे। सेठ साहब ने ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा प्रिंटिंग प्रेस मंगवाई ताकि देवनागरी में हिंदी गुजराती में धार्मिक पुस्तकें छापी जा सकें। यही नहीं सेठ जी ने पचास पाउंड की तनखा पे अंग्रेज़ को छापे बनाने की नौकरी भी दी। आज सेठ जी को इंडिया में प्रिंटिंग प्रेस का जनक माना जाता है हालाँकि ये जानकारी आसानी से नहीं मिलती।

किंतु पोस्ट का उद्देश सेठ जी के धार्मिक और व्यापारिक कारनामों का बखान करना नहीं है।
1669 में जब औरंगज़ेब ने फ़रमान जारी किए और मथुरा, काशी आदि में मंदिरों का विध्वंस शुरू हुआ तो ऐसा एक फ़रमान सूरत में भी पहुँचा। सूरत के शहर क़ाज़ी ने मंदिर तुड़वाने का काम शुरू किया और अनेकों का धर्म मज़हब में बदलने का भी काम शुरू किया।

इसी क्रम में क़ाज़ी ने सेठ भीमजी पारेख के भतीजे का जबरन ख़तना कर उसे दीनी बना दिया। इस घटना से सेठ भीमजी पारेख ने कुछ ऐसा किया जिस से मुग़ल बादशाह का तख़्त डोल गया।

सेठ जी ने सूरत से आठ हज़ार महाजन व्यापारी आदि को सपरिवार लेके पलायन किया और बंबई जा पहुँचे जो अंग्रेज़ों द्वारा संचालित था। बंबई में कारोबार जमाने के बाद सेठजी समस्त महिलाओं और बच्चों को गुजरात के भरूच में छोड़ आए। सूरत जैसे बड़े शहर में जिधर अंग्रेज़, डच मुग़ल आदि सब व्यापार करते थे- सब का धंधा ठंडा पड़ गया।

बाज़ार ठप्प होने की सूचना जब आगरे पहुँची तो औरंगज़ेब ने फ़रमान जारी कर सेठ भीमजी पारेख से क्षमा माँगी और आश्वासन दिया- वे सूरत लौट जाएँ। सूरत में किसी भी बनिये का धर्म नहीं बदला जाएगा और ना मंदिर तोड़े जाएँगे।

इतिहास में मुग़ल बादशाह को घुटने पे लाने वाले सेठ जी को शायद कोई याद रखें किंतु ये घटना स्पष्ट बताती है- मध्यकाल में यदि किसी जाति का लगभग ना के बराबर धर्म परिवर्तन हुआ तो वो बनिया समुदाय था। पेट पे मारी लात अच्छे अच्छे बादशाह आदि की सनक जल्दी उतार देती है!

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