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Saturday, April 25, 2020

Golapurva Jain Vaishya - गोलापुरवा जैन वैश्य

Golapurva is an ancient Jain community from the Bundelkhand region of Madhya Pradesh.

भरत क्षेत्र में अवसर्पिणी काल के तीसरे सुखमा दुखमा काल के अंत समय में भोगभूमि का अवसान और कर्म भूमि के प्रादुर्भाव काल में चौदह कुलकरो में अंतिम कुलकर नाभिराय-मरुदेवी के प्रथम तीर्थकर ऋषभनाथ हुए । भगवान ऋषभ देव ने कर्म भूमि के प्रारम्भ में जहाँ असि, मसि, कृषि, शिल्प, विद्या और वाणिज्य आदि षट्कर्म का उपदेश दिया और कर्म के आधार पर क्षत्रिय, वैश्य और षूद्व वर्ण की स्थापना की। वही सामाजिक व्यवस्था को व्यवस्थित बनाने के लिए सोमवंश, उग्रवंश और नाथवंश आदि वंशो की स्थापना की। आप स्वयं इक्ष्वाकुवंशी कहलाये। इन्ही वंशो का आगे विस्तार होता गया और उनके वंशो का उद्भव होता गया। अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी के काल तक वंश परंपरा का बहुत विस्तार हो चुका था। इन वंशो में अनेक आचार्य, साधु आदि महापुरुषो ने जन्म लिया। भगवान महावीर 527 ईस्वी पूर्व मोक्ष गये। इसके उपरांत 62 वर्ष तक केवली, 100 वर्ष तक श्रुत केवली, दशपूर्वधारी 183 वर्ष, ग्यारह अंगधारी 123 वर्ष दशग ज्ञाता 97 वर्ष और एकागधारी 118 वर्ष तक हुए।

ईसा की प्रथम शताब्दि में आचार्य अर्हद् बली हुए। आपके समय में एक मुनि सम्मेलन हुआ। इसमें संघ भेद हो गया। अनेक संघो का अलग - अलग विहार हुआ। इसी काल में ग्राम, नगर, देश, कर्म आदि के आधार पर अनेक जातियो का उद्गम हुआ जिनमे आगे चलकर विस्तार होता चला गया। जैसे खंडेला से खंडेलवाल, अग्रोहा से अग्रवाल, और गोल्ल देश से गोलापूर्व, गोलालारे, गोल श्रंगारे आदि। 

सामाजिक एवं विवाह व्यवस्था को विशुद्ध बनाने के लिए इन जातियों में भी व्यापार, स्वभाव, ग्राम, नगर, संस्कृति, रहन सहन, एवं कर्म के आधार पर गोत्रो की स्थापना की गई। जैसे - पाटन के पाटनी, चंदेरी के चंदेरिया, भेलसी के भिलसैया, सनकूटने वाले सनकुटा, पाड़ो से व्यापार करने से पड़ेले आदि 84 जातिया। 

भगवान आदिनाथ के समय सौधर्म इंद्र ने देश, नगर और ग्रामदि की स्थापना की थी। जैसे अंग, वंग, पांचाल, कौशल, गोल्लदेश, कर्नाटक सौराष्ट्र आदि।

गोल्लदेश - यमुना और नर्मदा के बीच का भाग या दशार्ण नदी का किनारा अर्थात मथुरा से जबलपुर का स्थान या भोपाल से ओरछा का भूभाग गोल्ल देश रहा है। आज भी इन भूभाग में गोलापूर्व जाति की बहुलता पायी जाती है। गोपाचल, ग्वालियर, महोबा, आदि इनके केंद्र माने जाते रहे है।

इसी क्षेत्र में चंदेल वषीय राजा यशोवर्धन हुए जिन्होंने श्रवण बेलगोला में दीक्षा ली। गोल्ल देश के कारण गोल्लाचार्य के नाम से विख्यात हुए जिसका उल्लेख श्रवण बेलगोला के अनेक शिलालेखों से प्राप्त होता है।

ईसा की तीसरी शताब्दी में हुए नंदी संघ के देशीयगण में आचार्य गुणनंदी सवंत 353 संन 296 और आचार्य ब्रजनन्दी सावंत 364 संन 307 ई. आदि आचार्यो के नाम उल्लेख प्राप्त होता है। इसके साथ ही गोलापूर्व समाज में अनेक साधु आचार्य एवं विद्वान मनीषी हुए जिन्होंने साहित्य सृजन किया। श्री नवलशाह श्रेष्ठ विद्वान कवि हुए जिन्होंने वर्धमान पुराण ग्रन्थ की रचना की है। 

गोलापूर्व जाति स्वाभिमानी, सच्चरित्र, धार्मिक, संयमी, दानी, एवं स्वाध्यायी, निष्ठावान रही है। इसके उल्लेख अनेक स्थानों पर जिन मंदिर, मूर्तियों की स्थापना के शिलालेखों से प्राप्त होता है। 

गोलापूर्व समाज ने 9 वी - 10 वी शताब्दी से नगर - नगर में अनेक मंदिर मूर्तियों की स्थापना की जिनके अनेक अवशेष आज भी गोल्ल देश की सीमा और उसके बहार भी बहुतायत में प्राप्त होते है।

समाज के उत्थान, विकास एवं सामाजिक संगठन की दृष्टि से श्री दिगम्बर जैन गोलापूर्व महासभा की स्थापना संन 1918 में की गई। जिसने अनेक महनीय कार्य किये।

बौद्धिक, धार्मिक, साहित्‍यि‍क, विकास एवं सामाजिक संगठन को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से गोलापूर्व जैन पत्रिका का प्रकाशन 1918 में प्रारम्भ हुआ। 

गोलापूर्व समाज में परंपरा से आज तक समस्त विधाओ के प्रज्ञावान मनीषी हुए है एवं वर्तमान में भी शासन, प्रशासन, व्यापार, उद्योग, टेक्नोलॉजी, प्रतिष्ठा, विद्वता, शिक्षा, आदि के क्षेत्र में देश ही नहीं विदेशो में भी अपना वर्चस्व बनाये हुए है। 

गोलापूर्व महासभा जहाँ रचनात्मक कार्यो से समाज को प्रगति पथ पर अग्रसर किये हुए है वही सामाजिक, वैवाहिक एवं व्यक्तिगत उत्थान के आयामों की स्थापना कर रही है। 

लेख साभार: गोलापूर्व दिगम्बर जैन समाज का इतिहास
पं. सनतकुमार विनोदकुमार जैन
रजवांस सागर (म.प्र.)

Jainism had a continuous presence in the Bundelkhand region since antiquity. Jainism was flourishing during the Gupta period at Vidisha region. The Durjanpur idols installed during the rule of Ramagupta date to about 365 AD. The Udaigiri cave Parshvanathinscription mentioning the lineage of Bhadranvaya is dated to 425 AD. The great Shantinath temple at Deogarh was built before 862 CE, suggesting a prosperous Jain community in this region.

A number of Chandella-period inscriptions mentioning the Golapurva community have been found. These include Urdamau (Sam. 1149, 1171 i.e. CE 1092 and 1114), Bahuriband(1125 AD), Mau (sam 1199), Jatara (Sam 1199), Ahar (sam 1202), Chhatarpur (sam. 1202), Papaura (sam 1202), Mau (sam 1203), Navai (sam 1203), Mahoba (sam. 1219) etc. With the exception of Bahoriband, all the oldest inscriptions have been found in the vicinity of the Dhasan River (Sanskrit Dasharna).

संवत १०..फाल्गुन वदि ९ सोमे श्रीमद गयाकर्णदेव विजयराज्ये राष्ट्रकूटकुलोद्भव महासमन्ताधिपति श्रीमद् गोल्हणदेवस्य प्रवर्धमानस्य श्रीमद् गोल्लापूर्वाम्नाये वेल्लप्रभाटिकायामुरुकृताम्नाये तर्कतार्किक चूडामणि श्रीमन् माधवनन्दिनानुगृहीतः तस्साधु श्री सर्व्वधरः तस्य पुत्र महाभोज धर्म्मदानाध्ययनरतः तेनेदं कारितं रम्यम शान्तिनाथस्य मन्दिरं

The Bahuriband Inscription 1125 CE

The towns historically connected with the Golapurva community are in Chhatarpur, Tikamgarh, Sagar and Damoh districts in Madhya Pradesh and Lalitpur district in Uttar Pradesh. This region still has a large population of Golapurvas.

According to Vardhamana Purana of Navalsah Chanderia, the Golapurvas originated from a place termed Goelgarh. It is also the view of Pt. Nathuram Premi and Pt. Munnalal Randheliya that the community originated from a place termed Golla. It has been identified as Gwalior or a town Golapur in Bundelkhand region, or a region termed Golladesh mentioned in a Shravanabelagola inscription. There exist two Jain communities named Golalare (Golarade in Sanskrit) and Golsinghare in Bhind/Itawa region which may be related. There is also a Brahmin community named Golapurab who are a branch of the Sanadhya Brahmins in Agra region who are stated to have originated from Gola village in Sanadhya Samhia (गोलाग्रामगताः केचित् गोलापूर्वाः).

A legendary account of the origin in is given in Navalsah Chanderia's "Vardhamana Purana" written in 1769 AD. In this account the poet gives a history of the Golapurvas, then traces how own descent, his ancestor who lived at Chanderi in remote antiquity, gajarathapratishta by his ancestors in 1634 AD at Bhelsi, and settlement of his ancestors at Khataura, where he was born. The temple built by his ancestors at Bhelsi still exists.

Navalsah Chanderia mentions that Lord Adinath visited at a place named "Goyalgarh", where the local residents took the shravaka vratas from him.

There is a tradition that the Golapurvas are descendants of the ancient Ikshvaku clan. The inscription at Saurai of Sam. 1864 states that the builder of the temple Singhahi Mohandas belonged to Ikshvaku vamsha, gotra Padmavati of the Golapurva community and baink Chaneria. It is also mentioned in some inscriptions at Nainagir.

Notable people

Kshullaka Chidananda, founder of 30 schools in Bundelkhand (Sam. 1958-1970 AD). 
Pandit Balachandra Shastri, Early modern Jain Scholar, remembered for his work on the Satkhandāgama, Kasāyapāhuda and Jaina Laksanavali (1905–1985). 
Muni Kshamasagar, author and poet, 
Niraj Jain, Satna, Archeologist, historian, poet, author of many books related to Jain philosophy.

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