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Friday, February 14, 2025

दानेदार दुश्मन : गुजरात की लोक-कथा

दानेदार दुश्मन : गुजरात की लोक-कथा

अलबेले अहमदाबाद जैसा एक नया नगर। उसमें लखधीर सेठ नामक एक व्यवहार-कुशल बनिया। जन्म से ही खूब समृद्ध। अपनी विशिष्ट बुद्धि और साहस से लक्ष्मी को सहेज रखा है। कमाई के कुछ रास्ते खोज लिए हैं। द्वार खुल गया है। लक्ष्मी निरंतर आ रही है और खजाना भरता जा रहा है।

लखधीर सेठ का हीराचंद नामक इकलौता बेटा है। बेहद लाड़-प्यार में पला, इसलिए कुलदीपक बिगड़े साँड़ जैसा हो गया था। पूरा दिन आवारागर्दी में व्यतीत करता। काम-काज में जरा भी ध्यान नहीं देता। बुरे मित्रों का अंधानुकरण करता, जैसी संगत वैसा असर और जैसा संग वैसा रंग। गधे के साथ घोड़ा बाँधे तो डीलडौल भले ही नहीं, पर शान तो आएगी। बोलना नहीं तो पीठ रगड़ना सीखेगा। धीरेधीरे हीराचंद में कुलक्षण आ गए। भाई-बंधु और मित्रों के साथ नाश्ता-पानी में पानी की तरह पैसा खर्च करना, जुआ खेलना, चोरी करना, वेश्यागृह जाना, एक से बढ़कर एक अवगुण!

किसी ने कहा है-

आवत अवगुण टालिए, वह टालने जोग।
नहीं फिरै व्यापी गयो, रगरग में जो रोग॥

लखधीर सेठ को लगने लगा कि लड़का हाथ से गया। उस वेला, क्षण, घड़ी या चौघड़िया ने कुछ ऐसा कर दिया कि किसी को मुँह दिखाने लायक रहा?

बेटे की चिंता में लखधीर सेठ कमजोर होते गए। चिंता रूपी कीड़ा उन्हें धीरे-धीरे खाने लगा। कुछ समय पश्चात् उन्होंने खाट पकड़ ली। उन्हें लगा कि मैं ज्यादा दिन का मेहमान नहीं हूँ। उन्होंने हीराचंद को पास बुलाकर कहा, 'बेटा! कुछ समय बाद मैं न रहूँ तो कोई चिंता की बात नहीं है। तुम्हारे लिए हरा-भरा परिवार छोड़कर जाऊँगा।

'लेकिन तुममें दो-चार कुलक्षण हैं, जिनसे तुम बरबाद हो जाओगे। काम-काज कुछ न करो और उड़ाते ही रहें तो कुबेर का भरा भंडार भी तीन दिन में साफ हो जाए। पसीना बहाकर कमाया हो, उसी को पता चलता है कि सौ में कितने बीस होते हैं?'

माथे पर हाथ का छज्जा बनाकर मानो भविष्यवाणी कर रहे हों, इस तरह सेठ कहने लगे कि 'मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल नहीं है। कल को तुम अगर किसी मुश्किल में फँस जाओ तो एक उपाय करना।'

'क्या बापू?' हीराचंद ने कहा।

'तुम रोज सुबह उठकर सबसे पहले लखमीचंद सेठ का मुंह देखना, फिर जो कुछ भी काम करना हो उसे करना।'

"...लेकिन बापू! अपनी तो लखमीचंद के साथ वर्षों से दुश्मनी चली आ रही है, उसका क्या?'

लखमीचंद मेरा दुश्मन तो सही पर दानेदार दुश्मन है। दोनों लोग व्यापार कर रहे हैं तो प्रतियोगिता तो रहने ही वाली है। कुंद हथियार को जिस तरह सान पर चढ़ाने से चिनगारी निकलती है, उसी तरह दुश्मनी की चिनगारी तो निकलती ही रहती है। कभी-कभार टेढ़ी लकड़ी पर टेढ़ी आरी जैसी स्थिति बन जाए तो बल भी मिलता रहता है। कोई मुसीबत आ जाए और उपाय न सूझे तो तुम प्रण कर लेना कि सुबह में उनका दर्शन करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करूँगा। तू ऐसा वचन दे तो मेरी आत्मा को शांति मिले।'

हीराचंद ने कहा, 'बापू! तुम्हें जिस बात का डर है, वह सही है। मित्रों ने जो खराब आदतें दी हैं, वे छूट नहीं रही हैं। मुझे भी अच्छी नहीं लगती हैं, लेकिन क्या करूँ, तुम्हारा कहना मानकर मैं लखमीचंद सेठ का मुँह देखने का प्रण लेता हूँ।'

अंदर से टूट चुके लखधीर सेठ कुलदीपक की शिकायत लेकर स्वर्ग सिधार गए। रोना-धोना हो गया। रिश्तेदार आए। घर की संपत्ति अनुसार शुद्ध-तेरहीं की, दान-पुण्य किया और गाँववालों को खिलाया। गाँव का कोई भी खाने में बाकी न रहा।

घर की पूरी जिम्मेदारी हीराचंद ने उठा ली। अब कहने या रोकने-टोकनेवाला कौन रहा? हीराचंद को खुला दौर मिल गया। वह बे-लगाम घोड़ा जैसा बन गया। खर्च के नए-नए मार्ग तो थे ही। अनर्थ की राह पर लक्ष्मी लुटने लगी।

कहने वालों ने सच कहा है कि संचित कर्मों की पूँजी घट जाए तो हर तीसरी पीढ़ी में कुछ-न-कुछ नया पुराना होता है। लक्ष्मी चकमा देकर चली गई! आओ भाई और जाओ भाई! लखपति लखधीर सेठ का बेटा हीराचंद रास्ते का भटकता भिखारी बन गया। उसकी ऐसी खराब दशा हो गई कि गाँव में उसे कोई दो सेर नमक भी उधार नहीं देता था। दीपक तले अँधेरा! कुलदीपक ने बाप की इज्जत मिट्टी में मिला दी।

घर में समझदार और चतुर सुजान सेठानी उसे खूब उपदेश देती। एक-एक बात समझाती, लेकिन वह समझे तो न, इस कान से सुनता और उस कान से निकाल देता। ऐसा सब तो उसके मन में ही नहीं!

हीराचंद ने चारों तरफ नजर दौड़ाई, परंतु भिक्षापात्र में डालनेवाला कोई नहीं रहा। कहीं कुछ नहीं सूझ रहा था। दिन में तारे दिखाई देने लगे। उसे अपने पिता की आवाज सुनाई दी। डूबते को तिनके का सहारा, ऐसा सोचकर हीराचंद ने मन-ही-मन कहा, 'चलो, बापू कह गए हैं तो वैसा ही करूँ।'

बड़ा बाजार है। नए नगर के माणेकचौक में लखमीचंद सेठ की दुकान लगी है। रेशम और किनखाब के गद्दी-तकिए के सहारे लखमीचंद सेठ बैठे हैं। दाहिने हाथ में भाग्य रेखा झलक रही है। मुनीमजी बहीखाता लिख रहे हैं। ऐसी सुंदर प्रभात में चीथरेहाल, ऐरा-गैरा जैसा हीराचंद पीढ़ी के आगे से निकला। लखमीचंद सेठ के दर्शन करके, राम-राम करके अपने रास्ते चला गया।

नियम यानी नियम। हीराचंद का यह रोज का नियम हो गया। रोज सुबह उठना। नहा-धोकर लखमीचंद सेठ की दुकान के आगे से निकलना। उन्हें राम-राम करना, फिर कोई काम-काज करना।

शुरुआत में तो किसी को पता ही नहीं चला। पंद्रह-बीस दिन हुए तो लखमीचंद सेठ का ध्यान गया। उन्हें लगा, 'मेरा बेटा रोज सुबह-सुबह दुकान के आगे से निकलता है। कुछ बोलता-चालता नहीं है। मेरे मुँह की तरफ देख राम-राम करके चला जाता है।'

सेठ ने मुनीम से कहा, 'उसे कल मेरे पास ले आओ।' दूसरे दिन सुबह के पहर हीराचंद आया। सेठ का मुँह देखकर राम-राम किया और जैसे ही जाने लगता है तो मुनीम ने उसे बुलाया, 'हीराचंद इधर आओ। तुम्हें सेठ बुला रहे हैं।'

सेठ ने हीराचंद को पास में बैठाया और पूछताछ करने लगे, 'भाई, तुम किसके बेटे हो?'

'लखधीर सेठ का।'

'अरे! तू लखधीर सेठ का बेटा है ? तेरी ऐसी दशा! तेरे पिता की तो खूब जाहोजलाली थी।'

'था तब खूब था। जीवन में धूप-छाँव आता रहता है। मरते समय मेरे पिता ने कहा था कि तुम्हारे बुरे दिन आएँ तो प्रतिदिन उठकर लखमीचंद सेठ का मुँह देखकर राम-राम करना।'

'.. लेकिन भाई, तुम्हारा उद्देश्य क्या है ? तुझे रुपए-पैसे की जरूरत है ? व्यापार-धंधा करना हो तो मैं तुम्हारा सहयोग करूँ?'

'न रे! ऐसे किसी उद्देश्य से मैं नहीं आता, बल्कि मेरे पिता ने कहा था कि बुरे दिन आएँ तो सुबह के समय उठकर पहले सेठ का मुँह देखकर राम-राम करना, इसलिए आता हूँ।'

'अच्छा, कोई बात नहीं पर जरा हृदय की खिड़की तो खोल। शुरुआत से बात तो कर कि तेरी ऐसी दशा क्यों हो गई?'

'सेठ, मेरे अंदर कुछ बुरी आदतें आ गई हैं। उन्हीं में मैं डूबा रहता हूँ।'

'ऐसी वे कौन सी आदतें हैं?'

'मित्रों के साथ नाश्ता-पानी करना, जुआ खेलना, चोरी करना, गणिकागृह जाना।' बात सुनकर लखमीचंद सेठ घर के अंदर एकांत में चले गए।

थोड़ी देर बाद लखमीचंद सेठ के हृदय में एकदम से उजाला हुआ। उनका अंतर-वैभव खिल उठा। ओ-हो-हो! लखधीर सेठ को मुझ पर इतना भरोसा कि बिगड़े बेटे की देखभाल मुझे सौंप गए। बिगड़ी बाजी सुधारकर गाड़ी पटरी पर चढ़ाऊँ तो ही मेरा लखमीचंद, कोरे कागज पर तो बच्चा चित्रकारी करता है, लेकिन जो बिगड़ा हुआ सुधारे, वही मर्द होता है।

लखमीचंद सेठ ने मुनीम को हुक्म दिया, 'प्रतिदिन सुबह हीराचंद को नकद सौ रुपया दे देना।'

रोज उठते ही हीराचंद को सौ रुपए मिलने लगे, फिर बाकी ही क्या रहा?

ऊँट था कि घूरे पर चढ़ा और बौना था कि गड्ढे में गिरा!

एक तो नटखट बंदर और वह भी शराब पिया।

हीराचंद तो मित्रों के साथ मिलकर नाश्ता-पानी उड़ाने लगा। दाँत टूटे तो कुत्ते का और चमड़ा फटे तो गधे का! मुफ्त में मिल रहा हो तो मित्रगण भी पीछे क्यों रहें? वे तो दूसरों के पैसों पर महफिल करने लगे।

हीराचंद ने कहा, 'चलो, बहुत दिनों से जुआ नहीं खेला तो आज दिल खोलकर खेलें।'

ऐसा करते-करते एक सप्ताह बीत गया। एक दिन लखमीचंद सेठ ने हीराचंद से पूछा, 'क्या हालचाल है?'

हीराचंद ने कहा, 'मैं तो आनंद में हूँ। आपकी तरफ से रोज सौ रुपया मिल जाता है, फिर किस बात की चिंता-फिक्र?'

लखमीचंद सेठ को लगा कि 'अच्छा, यह तो आसमान में उड़ रहा है, इसको तो कोई फर्क ही नहीं पड़ा!'

फिर बोले, 'तू मेरी एक बात सुनेगा, मेरा कहा करेगा?'

'आप जो कुछ भी कहोगे, उसे करना मेरा कर्तव्य है।'

'तुम सब दोस्त मिलकर जुआ खेलते हो। तुम उन सबसे पूछो कि तुम कितने समय से जुआ खेलते हो? अब तक तुम कितना जीते, इतना पूछकर कल मुझे बताना।'

'ठीक है। पूछ लूँगा। इसमें क्या है ?'

उस दिन हीराचंद ने दोस्तों से पूछा, 'अरे, वो सारी बात छोड़ो। मैं पूछ रहा हूँ, उसका उत्तर दो कि तुम कितने समय से खलते हो?'

दोस्तों ने उत्तर दिया, 'इसमें ही तो हमारा पूरा जीवन गया। सुबह से शाम तक हमारा काम ही यही है। बोलो, अब तुम्हें कुछ कहना है?'

'अच्छा, सालभर चल जाए उतना मिलता है ?'

'बचाने की तो बात ही क्या? जिस रास्ते आता है, उसी रास्ते चला जाता है ! हो तो हो, न हो तो एक कौड़ी भी न हो। ऐसा भी दिन आता है कि बीड़ी पीने के लिए जेब में चार पैसे भी नहीं होते हैं!'

दूसरे ने कहा, 'हमसे पूछता है तू। तेरे पास कितना बचा है, उसकी तो बात कर भाई!'

'मैं तो बरबाद हो गया। पिता की दसेक लाख की पूँजी थी, वह भी गँवा दी।'

'यह तो होता रहता है। बहुत चिंता मत करना, भाई। नहीं तो दिमाग शून्य हो जाएगा।'

हीराचंद ने मन में विचार आया कि कुल मिलाकर इसमें किसी को कुछ लाभ नहीं हुआ। मैंने पिता की संपत्ति गँवा दी। उसके बदले कहीं धंधे में रुपया लगाया होता तो मेरी यह दशा हुई नहीं होती?

उसने मन-ही-मन हिसाब लगाया। उसे बड़ी पीड़ा हुई। उसने मन में गाँठ बाँध ली कि आज से कभी जुआ नहीं खेलेगा।

लेकिन उसे जब यह बात समझ में आई तब बहुत देर हो गई थी।

दूसरे दिन सुबह उठकर वह लखमीचंद सेठ का दर्शन करने गया। सेठ के आदेश अनुसार मुनीम उसे सौ रुपया देने लगा, तब उसने कहा, 'आज तो पचास रुपया ही दो।'

लखमीचंद सेठ ने कहा, 'क्यों भाई! आधी कटौती?'

'काका, मैंने प्रतिज्ञा ली है कि अब जुआ नहीं खेलूँगा। जिस राह पर लुटा हूँ, उस राह पर कभी कदम नहीं रखूँगा। आपने जो प्रश्न पूछा था, वह प्रश्न मैंने सबसे पूछा। इस राह पर चलनेवालों का हालचाल मेरे जैसा ही है। किसी ने कुछ बना नहीं लिया। आज तक मैंने पिता और पत्नी की बात नहीं मानी, लेकिन अब मेरी आँख खुल गई है। जुआ में तो पांडवों ने आगे-पीछे कुछ सोचे बिना सबकुछ गँवा दिया और वनवास में दिन बिताने पड़े। काका, भला हो आपका कि आपने मुझे सोचने के लिए प्रेरित किया।'

लखमीचंद सेठ के मन में हुआ कि 'पैसा खर्च करना व्यर्थ नहीं गया। वसूल हो गया। सौ में से एक पाया तो कहते हैं निन्यानबे की भूल! एक अवगुण तो टल गया न !'

ऐसा करते-करते एक सप्ताह बीत गया। लखमीचंद तो रोज रात को बन-ठनकर वेश्यागृह जाता। नाच-गान और मुजरा की मजा लेता। रंगीन रात शांत हो जाती। हीराचंद को मुफ्त का बकरा समझकर वेश्या जेब खाली कर देती।

एक दिन लखमीचंद सेठ ने हीराचंद से कहा, 'भाई! तुम रात में वेश्यागृह जाते हो, उसके बदले सुबह के समय जाओ।'

हीराचंद तो एकदम सुबह लखमीचंद सेठ का मुँह देखकर, राम-राम करके सीधे वेश्यागृह चल पड़ा।

हीराचंद ने वेश्या को देखा तो मानो जीवित डायन ! गाल में गड्ढे। आँखें एकदम धंसी हुई। साही के काँटे जैसे सूखे केश। अस्त-व्यस्त वेश! हीराचंद तो उसे देखकर दो कदम पीछे हट गया।

उसे लगा, 'यह वेश्या का रूप! इसके पीछे मैं लटू बन गया हूँ, यह तो रात की रंगीन रोशनी मोहित कर देती है। शृंगार करने पर तो बबूल का ठूठ भी खिल उठता है ! आज तक मैंने केशर छोड़कर पलाश का आनंद लिया है, इसकी अपेक्षा तो देवांगना जैसी, प्राण न्योछावर करने वाली मेरी घरवाली में क्या कमी है?'

उसकी आँख पर पड़ा परदा तुरंत हट गया। उलटे पाँव वह लौट पड़ा। वेश्या उसके सामने गिड़गिड़ाने लगी-

'ऐ सेठ! आओ न आते ही क्यों लौट जा रहे हो? मेरे गले की कसम। मुझसे मिलते रहना। मेरी चाहत में क्या कोई कमी आ गई है?'

हीराचंद ने तो पीछे मुड़कर देखा ही नहीं। आज की घड़ी और कल का दिन। काटे कान आवे शान!

वेश्या से उसे सख्त नफरत हो गई। उसके हृदय में रेशम की गाँठ बँध गई और ऊपर से तेल के दो-चार बूंद गिर गए। जो टूट भले जाए पर खुलेगी नहीं। उसने निश्चय कर लिया कि 'आज से वेश्या मेरी माँ-बहन।'

दूसरे दिन सुबह-सुबह हीराचंद ने लखमीचंद का मुँह देखा और राम-राम किया। नित उठकर पचास रुपया देनेवाले मुनीम से उसने कहा, 'बस, आज तो पच्चीस रुपया ही दो।'

लखमीचंद सेठ ने कहा, 'क्यों बेटा?'

हीराचंद ने कहा, 'काका, बस साब, आज से वेश्यागृह नहीं जाऊँगा। मेरा भ्रम टूट गया है।'

'अच्छी बात है भाई!'

ऐसा करते-करते एक सप्ताह बीत गया।

एक दिन लखमीचंद सेठ ने हीराचंद से कहा, 'भाई! तुम सुबह-शाम होटल में नाश्ता-पानी करने जाते हो, इसके बदले एकदम दोपहर में जाओ और अंदर जाकर जरा देखना तो सही! भई, वहाँ किस तरह का खेल होता है।'

हीराचंद ने कहा, 'ठीक है। इसमें क्या, आज दोपहर में जाऊँगा।'

हीराचंद तो रोज कंदोई के यहाँ जाता और बाहर की बेंच पर बैठकर पूरी, चाट-पकौड़ी वगैरह खाता। कभी अंदर की ओर नहीं गया था। सेठ का कहना मानकर आज उस ओर गया। गरमी की दहकती दोपहर। गरमी भी ऐसी कि रहा न जाए। कामगार आटा गूंथ रहे हैं। खुले बदन से पसीना टपक रहा है। जो उसके अंदर भी गिर रहा है। मुँह से लार भी गिर जाए! तो वह आटे के साथ गूंथ जाए। ये सब उसने अपनी आँखों से देखा। कभी-कभी तो उसमें नाक का पानी भी गिरे! भन भन करती मक्खियाँ उसमें दब जाती थीं, जिन्हें वे निकाल देते थे। हीराचंद को यह देखकर घिन चढ़ गई। उसे लगा कि 'आज तक मैं ऐसा गंदा और मटमैला ही खाता रहा हूँ! इसकी अपेक्षा घर का भोजन क्या खराब है?'

उसने होटल का भोजन त्याग दिया। मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि 'आज के बाद कभी भी होटल की सीढ़ियों पर पैर नहीं रखूँगा।'

प्रभात वेला में हीराचंद ने लखमीचंद सेठ का मुँह देखकर राम-राम किया।

मुनीम पच्चीस रुपया देने लगे तब उसने कहा कि 'रहने दो। अब पैसा नहीं चाहिए।'

लखमीचंद सेठ ने कहा, 'क्यों बेटा?'

'बस, होटल के नाश्ता-पानी पर से अब मन उठ गया है।'

'लो, ठीक हुआ! अब?'

'अब, एक चोरी करने की बुरी आदत है।'

'तो तुम ऐसा करो। राजमहल में जाओ और राजा के पलंग के नीचे पायों के नीचे लगे जेडरत्न निकालकर ले आओ। तभी तुम्हारी चोरी और चतुराई की परीक्षा होगी।'

'अच्छा काका! आप जैसा कहो, मेरी तरफ से कहाँ न है। चोरी करना तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है।'

घनघोर अँधेरी रात है। समूचा नगर निश्चिंत होकर नींद की गोद में खो गया है। कमजोर मनुष्य का कलेजा काँप उठे, ऐसी सरसराती हुई हवा चल रही है। उसी समय वणिक पुत्र हीराचंद राजमहल में सेंध लगाने के लिए तैयार हुआ। मुँह पर गमछा बाँध रखा है। हाथ में सेंध लगाने का औजार है। काँख में चंदनगोह दबाए हुए है। इस तरह वह राजमहल की तरफ चला जा रहा है।

ठीक उसी समय नगर के राजा अंधारपछेड़ा ओढ़कर नगरचर्चा करने निकले थे। राजा ने आवाज दी कि 'अरे! कौन हो तुम?'

'ये तो मैं चोर...लेकिन तुम?'

'मैं भी तेरे जैसा ही! हम दोनों एक पंथ के पंथी।'

'चलो, अच्छा हुआ। एक से भले दो। मुझे जरा बल मिलेगा। बोलो, कहाँ चोरी करेंगे?'

'तू जहाँ कहे।'

'मारो तो मीर मारो। बेचारे फकीर को क्यों हैरान करें? चलो, आज तो राजमहल में चोरी करें।'

'चलो फिर।'

पिछली सीमा से होते हुए वे दोनों राजमहल की तरफ चल दिए।

गढ़ के दरवाजे पर देखा तो ठंड में चौकीदार टाँग बोरकर नाक के नगारे बजा रहे थे! दोनों दीवार कूदकर उस तरफ गए।

हीराचंद ने राजा से कहा कि 'तुम बाहर ध्यान रखना, मैं राजमहल में घुस रहा हूँ।' ऐसा कहकर उसने गढ़ की दीवार पर चंदनगोह डाल दिया, फिर तो देखते ही देखते किले के ऊपरी भाग पर पहुँच गया। राजमहल में पहुँचकर जगमगाते झुम्मर के उजाले में देखा तो पलंग एकदम खाली! उसे लगा कि 'चलो, अच्छा हुआ, जिसका डर था, वह टल गया।'

पलंग के पाए के पास जाकर, धरती पर कान लगाकर टकोरा किया तो वहाँ से लक्ष्मी की पुकार सुनाई दी, 'मुझे बाहर निकाल, मुझे बाहर निकाल!' तुरंत औजार की मदद से चारों पायों से चार जेडरत्न निकाल लिये। जेडरत्न में से चमकदार प्रकाश फैलने लगा। चारों जेडरत्नों को कमर में बाँधकर तेज गति से नीचे उतर गया ! मानो कहीं गया ही न हो।

राजा ने कहा, 'लाया?'

हीराचंद ने कहा, 'हाँ।' ऐसा कहकर चारों जेडरत्नों को कमर में से बाहर निकाला। राजा के हाथ में जेडरत्न रखते हुए बोला, 'लो, अपने हिस्से के दो रत्न।'

हीराचंद के कंधे पर हाथ रखते हुए राजा ने कहा, 'शाबाश! रंग है जवान, तेरी विद्या का! हिम्मत की कोई कीमत नहीं होती। सच बोलने के कारण मेरे मन में तुम्हारे लिए सम्मान का भाव उत्पन्न हो रहा है।'

फिर दोनों अपनी-अपनी राह चले गए।

प्रभात की वेला में हीराचंद ने लखमीचंद सेठ का मुँह देखकर, राम-राम करके उनके हाथ में दोनों जेडरत्न रख दिए।

लखमीचंद सेठ ने कहा, 'चार जेडरत्न के बदले दो ही क्यों?'

'रास्ते में दूसरा एक हिस्सेदार मिल गया था, उसे दे दिया।'

'ठीक!' ऐसा कहकर दोनों जेडरत्न ठीक से रख दिए।

अब इस घटना से राजमहल में हो-हल्ला मच गया। वायुवेग से नगर में बात फैल गई कि राजमहल में चोरी हो गई। चोरी की आड़ में मंत्री ने पिछले दरवाजे से तिजोरी खाली करके सारी दौलत अपने घर पहुँचा दी, फिर घोषणा कर दी कि 'चोर ने तो पूरी तिजोरी साफ कर दी है।'

राजा तो शांत मन से सुनते रहे और अंदर-ही-अंदर आगबबूला होते रहे।

चौकीदार और सिपाही-सबने चोरी का माल पकड़ने के लिए खूब प्रयास किया। राज्य के श्रेष्ठ गुप्तचर भी हार मान गए, लेकिन पानी मटमैला ही हुआ।

और चोरी की बात पर गाँव के लोग आपस में तरह-तरह की खट्टी-मीठी बातें करने लगे-

'अरे! गजब का जानकार था ! जब राजा के पलंग के पायों के नीचे से जेडरत्न निकाल ले जाए तो यह बहुत बड़ी बात कहलाएगी!'

'लेकिन चौकीदार कहाँ बैठे रहे होंगे?'

'चौकीदार बैंगन तौल रहे होंगे।'

और फिर तो खट्टी-मीठी बहुत सी बातें हुईं। उस बात को यदि चौकीदारों ने सुना तो खड़े-खड़े जल गए होते।

राजा ने सोचा कि 'चोर सच्चा है। मेरे हिस्से के दो रत्न मुझे देकर गया है। हिम्मतवाला और बहादुर है। ढिंढोरा पिटवाऊँ तो शायद हाजिर हो जाए, ना नहीं कहा जा सकता।'

राजा ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवाया कि 'जेडरत्न का चोर हाजिर होगा तो राजा द्वारा उसे अभयदान है।'

लखमीचंद सेठ दो जेडरत्न और हीराचंद को लेकर दरबार में हाजिर हुए।

राजा ने कहा, 'बनिया का बेटा ऐसे काम में लग गया है ?'

लखमीचंद ने जड़ से लेकर चोटी तक की सारी बात की। बात सुनकर राजा आश्चर्यचकित हो गया !

फिर राजा ने अपने मंत्री को बुलाया। राजमहल में से कितने की चोरी हुई, सारे सच-झूठ की परख हीराचंद के सामने हुई। हीराचंद ने तो चार जेडरत्न ही चुराए थे तो तिजोरी एकदम कैसे खाली हो गई?

राजा ने मंत्री के घर की तलाशी करवाकर चोरी का सारा माल पकड़वा लिया। राजा ने मंत्री से कहा,

'समूचा निगल जाना अच्छा लगा था ! क्यों?'

फिर मंत्री का मुंडन करवाकर, चूना पोतवाकर, गधे पर उलटा बैठाकर भगा दिया।

राजा ने हीराचंद से कहा कि 'बनिया बिना तो लंका के राजा रावण का राज चला गया। मुझे तो तुम्हें मंत्री बनाना है।'

हीराचंद की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने कहा कि 'सारे यश के भागी लखमीचंद सेठ हैं। मेरी बिगड़ी बाजी इन्होंने सुधारी है। ऐसा कहकर सेठ के पैरों में झुक गया।

-जोरावर सिंह जादव

"जो किस्मत का धनी वो #बनिया"

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गरम दल के लाला लाजपत राय से लेकर इसरो के जनक विक्रम साराभाई तक सभी बनिए ही हैं।

पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इस जाति का ही कारोबारी एकाधिकार रहा है। लगभग सभी बड़े अखबारों के मालिक बनिए ही हैं। इनमें हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण, भास्कर, पत्रिका, इंडियन एक्सप्रेस, द प्रिंट, प्रभात खबर से लेकर हाल ही में बिक जाने वाला नई दुनिया तक शामिल है। टेलीकॉम के क्षेत्र में अम्बानी की जिओ, मित्तल की एयरटेल और बिरला की आईडिया सभी बनियों की हैं।









अखबारों में आ रहे तमाम परीक्षा परिणामों के नतीजों पर नजर डालें तो इस कालम में बनियों यानी वैश्य व्यापारी वर्ग पर लिखने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। हाई स्कूल से लेकर आईआईटी, पीएमटी यहां तक की सिविल सेवा तक के नतीजों में सफलता पाने वालों की सूची चौंकाती है। जिधर नजर डालें तो उसमें आधे से ज्यादा नामों के आगे अग्रवाल, गुप्ता, गोयल, जैन, सिंघल, बसंल, कंसल आदि सरनेम देखने को मिलेंगे। जो बनिए कभी केवल दुकान और व्यापार तक सीमित रहते थे, आज हर क्षेत्र में अव्वल आ रहे हैं। शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो, जहां उन्होंने सफलता हासिल नहीं की हो। कुशाग्रता तो उनके खून में पाई जाती है और मानो गणित पर उनका एकाधिकार सा है। शायद ही इस वर्ग का कोई छात्र ऐसा हो, जो गणित में कमजोर हो। चंद वर्ष पहले तक सीपीडब्ल्यूडी में ही बनिया इंजीनियरों की भरमार दिखती थी, पर अब यह अतीत की बात हो चुकी है।

मनु स्मृति में भी वैश्यों को व्यापार का काम सौंपा गया था और अपना देश आजाद हुआ तो उससे पहले से ही वे सभी क्षेत्रों में सफलता हासिल करने लगे थे। बिड़लाजी महात्मा गांधी के फाइनेंसर माने जाते थे। यह अलग बात है कि इस देश को आजादी दिलावाने में अहम भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी खुद भी गुजरात के बनिया ही थे। जमना लाल बजाज, डालमिया सभी ने स्वतंत्रता संग्राम में जितना संभव हो सका, उतनी उनकी मदद की। महान क्रांतिकारी पंजाब केसरी कहलाने वाले लाला लाजपत राय भी अग्रवाल वैश्य समुदाय से थे। साहित्य के क्षेत्र में भी मैथलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि कहलाए। भारतेंदु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहलाए। काका हाथरसी तो जाने माने हास्य कवि थे। उपन्यास सम्राट जयशंकर प्रसाद जी स्वयं काशी के प्रसिद्ध सुंघनी साहू परिवार से थे।

पत्रकार के रूप में बनियों ने विशेष ख्याति हासिल की। समकालीन पत्रकारिता में शेखर गुप्ता इसका जीता जागता उदाहरण है। एक समय तो ऐसा था जब कि मजाक में यह कहा जाने लगा था कि इंडियन एक्सप्रेस में ‘गुप्त काल’ रहा है। क्योंकि तब शेखर गुप्ता के अलावा वहां नीरजा (गुप्ता), हरीश गुप्ता, शरद गुप्ता, शिशिर गुप्ता भी पत्रकारिता कर रहे थे।

अगर हम ऑनलाइन स्टार्टअप्स की बात करें तो उसमे अग्रवाल बनियों ने विशेष झंडे गाड़ रखें हैं । फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, जोमाटो से लेके विदेशी जुबेर को टक्कर देने वाली ओला और और दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन होटल चैन ओयो रूम्स तक सबके फाउंडर अग्रवाल ही हैं।

जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो पत्रकार निर्मल पाठक ने उनसे चुटकी लेते हुए कहा था, चचा, भाजपा के लिए तो समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि अब बनियों को सोचना पड़ेगा कि वे आपको वोट दें या भाजपा को। केसरीजी ने पूछा वह कैसे तो उसने शरारती अंदाज में कहा कि आपने जगह-जगह दीवारों पर लिखा यह नारा तो पढ़ा ही होगा कि ‘भाजपा के सदस्य बनिए’।
बनियों का भाजपा से विशेष लगाव रहा हैं। एक समय था, जब हर शहर में पार्टी का स्थानीय दफ्तर किसी बाजार में होता था। नीचे दुकान होती थी व पहली मंजिल पर कार्यालय हुआ करता था। जब राजग सत्ता में थी तो दैनिक जागरण के मालिक नरेंद्र मोहन भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा में आ गए थे। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वैश्य समाज का एक भी मंत्री नहीं था। विजय गोयल भी सरकार के अंतिम महिनों में कैबिनेट में लिए गए थे। नरेंद्र मोहन अपने अखबार में अक्सर यह खबर छपवाते रहते थे कि राजग में बनियों की उपेक्षा हो रही है। उनका एक भी मंत्री नहीं हैं। इस पर एक बार प्रमोद महाजन ने किसी कार्यक्रम में उनसे कटाक्ष करते हुए कहा कि हम पर तो बनियों की सरकार होने का आरोप लगाया जा रहा है और आप का अखबार लिख रहा है कि सरकार में बनियों की उपेक्षा हो रही है।
रुपए पैसे के हिसाब-किताब रखने की उनकी योग्यता गजब की होती है। इसी योग्यता के कारण सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने तक पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे थे। उनके बारे में यह कहावत प्रचलित थी कि ‘‘न खाता न बही, जो कहें केसरी वही सही’’। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के कोषाध्यक्ष भी बनिया ही हैं। पहले पार्टी के कोष को वेदप्रकाश गोयल संभालते थे। अब अध्यक्ष बदलने के बाजवूद भाजपा का खजाना उत्तराधिकारी के रुप में उनके बेटे पीयूष गोयल को सौंप दिया गया है।
बनिए बहुत धार्मिक होते हैं। हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी धार्मिक प्रेस गीता प्रेस गोरखपुर देने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार और जय दयाल गोयनका भी वैश्य समुदाय से थे। राम लला के लिए सबसे पहले बलिदानी कोठारी बंधु माहेश्वरी मारवाड़ी समुदाय से थे। दीवाली पर सबसे लंबी पूजा वही करवाते हैं। वे ही सबसे ज्यादा मथुरा और वृंदावन जाते हैं।

लक्ष्मी को भी उनके यहां ही रहना पसंद आता है। इस बारे में हरियाणा में किसी जाट मित्र ने एक किस्सा सुनाया कि एक जाट ने अपने घर में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित कर ली। एक दिन शाम को खूंटा नजर नहीं आया तो उसने भैंस की जंजीर हनुमानजी की टेढ़ी वाली टांग में बांध दी। कुछ देर बाद भैंस का घूमने का मन हुआ, उसने कुछ झटके मारकर मूर्ति उखाड़ डाली व बाहर चल पड़ी। मूर्ति उसके साथ घिसटती चली जा रही थी। रास्ते में एक मंदिर था, जहां लक्ष्मी की मूर्ति लगी थी। वे हनुमानजी की हालत देखकर हंस पड़ी। इस पर हनुमानजी नाराज होकर कहा, ज्यादा न हंस। वह तो तेरी किस्मत अच्छी है कि बनिया के यहां रहती है। अगर किसी जाट के पल्ले पड़ी होती तो कब की यह हंसी निकल गई होती।

Wednesday, February 12, 2025

AGRAWAL HISTORY - अग्रवाल इतिहास राजपूत लेखक एवम पुस्तक की नज़र में

AGRAWAL HISTORY - अग्रवाल इतिहास राजपूत लेखक एवम पुस्तक की नज़र में 















इस पुस्तक के लेखन में अग्रवाल और तोमर राजपूतो की उत्पत्ति सामान है दोनों भाई भाई है वैश्यों में ओसवाल, माहेश्वरी, खंडेलवाल, सरावगी, अग्रवाल  आदि जातियों की उत्पत्ति राजपूत जातियों में से हुई हैं. 

VAISHYA SENAPATI BEECHAN

VAISHYA SENAPATI BEECHAN 

न केवल उत्तर भारत अपितु दक्षिण भारत में भी हम कुछ वैश्य जातीय मंत्रियों एवं सेनापतियों का उल्लेख पाते हैं। यादव राजवंश के प्रसिद्ध शासक सिंहण (1210 ई०) का सेनापति बीचण वैश्य जाति का ही था। यह उसके सर्वाधिक प्रसिद्ध सेनापतियों में एक था। इसे विध्वंस में यम और राजनीतिक बुद्धिमत्ता में नवीन चाणक्य अथवा विष्णु गुप्त के रूप में वर्णित किया गया है। इसका स्वामी इस पर उतना ही विश्वास करता था जितना स्वयं अपने हृदय पर। सेनापति बीचण ने होयसलों के विरुद्ध युद्धों में महत्वपूर्ण भाग लिया था। इसके एक अभिलेख में कहा गया है कि इसने कावेरी नदी के तट पर एक विजय स्तम्भ स्थापित किया था। उसकी महत्वपूर्ण सेवाओं को मान्यता प्रदान करने के लिये उसे कर्णाटक का उपराजा नियुक्त किया गया तथा वहां पर उसने सामन्तों को दबाने और शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने में अपने अधिस्वामी की बड़ी सहायता की थी।

VAISHYA AMATYA LAVANPRASAD AND VEERDHAWAL

VAISHYA AMATYA LAVANPRASAD AND VEERDHAWAL
 
चालुक्य नरेश भीम द्वितीय (1178-1241 ई०) के लवण प्रसाद और वीरधवल मंत्री थे। ये वैश्य जाति के ऐसे मंत्री थे जो राज्य में बार-बार उठने वाले विद्रोहों को शान्त करने में सफल रहे। भीम द्वितीय को सत्ता का वास्तविक नियंत्रण इन्हीं दोनों मंत्रियों पिता-पुत्र लवण प्रसाद तथा वीर धवल के हाथों में था। गुजरात पर मुसलमानों के आक्रमण के समय भीम द्वितीय मालवा पर अपने अधिकार की रक्षा न कर सके। परमार शासक विन्ध्य वर्मा के पुत्र सुमटवर्मा (1194-1209 ई०) चे अण्हिलवाड पर आक्रमण किया लेकिन शक्तिशाली सामन्त लवणप्रसाद ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इसकी पुष्टि साहित्यिक तथा पुरातात्विक साक्ष्यों से भी होती है। 173अ देवगिरि के यादव शासक पंचम भिल्लम ने भी भीम की आन्तरिक कमजोरियों का लाभ उठाते हुये दक्षिण गुजरात और लाट क्षेत्रों पर चढ़ाई कर दी, उस समय भी भीम की ओर से लवण प्रसाद जैसे योग्य मंत्री तथा सेनापति ने गुप्तचरों के प्रयोग से उसे संधि के लिये विवश किया 174 कालान्तर में चालुक्य शासक भीम की निर्भरता इन पिता पुत्रों पर इतनी बढ़ गई कि प्रशासन और सैन्य की वास्तविक सत्ता धीरे-धीरे उनके हाथों में चली गई। महामण्डलेश्वर लवणप्रसाद की बढ़ती हुई शक्ति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1231 ई० में सिंहण से जो संधि हुई, उसमें चालुक्य पक्ष की ओर से वास्तविक राजा भीम का नाम न होकर लवण प्रसाद का नाम अंकित किया गया है। 175 महामण्डलेश्वर लवण प्रसाद और राणक वीरधवल नाममात्र की चालुक्य अधिसत्ता स्वीकार करते हुये धवलक अथवा घोलक में प्रायः पूर्ण स्वतंत्र थे। भीम ने अनेक युद्धों में विजय का श्रेय लवण प्रसाद को ही दिया गया है। सम्भवतः जयन्तसिंह के विद्रोह को शान्त करके चालुक्य राज्याधिकार द्वितीय भीम के लिये पुनः प्राप्त करने में उन्होंने जो सहायता की थी उससे अभिभूत और विवश होकर भीम ने उन्हें प्रशासन में पूरी छूट दे दी थी।। 76 धीरे-धीरे उनका अधिकार 'राज्य के भीतर राज्य' जैसा हो गया और भीम की मृत्यु के बाद वीरधवल का पुत्र वीसलदेव अण्हिलवाड़ का पूर्ण स्वतंत्र शासक हो गया। 177 कतिपय अभिलेखों में लवणप्रसाद और वीरधवल को महाराजाधिराज की सम्प्रभुतासूचक उपाधियों से अलंकृत किया गया है। 178 वीरधवल के पुत्र वीसलदेव ने होयसल राजकुमारी का हाथ भी प्राप्त किया था। 179 अर्थात विवाह किया था।

VAISHYA SENAPATI TEJPAL AND VASTUPAL

VAISHYA SENAPATI TEJPAL AND VASTUPAL
 
ये दोनों भाई वीर योद्धा तथा कुशल सेनापति होने के साथ चालुक्यों के सामन्नत थे। आबू देलवाड़ा प्रशस्ति से पता चलता है कि तेजपाल भीमदेव द्वितीय का सामन्त था। 173 रणभूमि में शत्रु पक्ष की ओर से वस्तुपाल की यह कह कर हंसी उड़ाई गई कि युद्ध तो केवल क्षत्रियों के लिये है वणिकों के लिये नहीं, उनका कार्य तो केवल वस्तुओं को तौलना अथवा व्यापार करना है। इस आरोप को वस्तुपाल ने मिथ्या कहते हुये जिस प्रकार का उत्तर दिया वह काफी रोचक है। वस्तुपाल चालुक्य नरेश वीरधवल का महामात्य था। रणभूमि में शत्रु शंख के दूत से वस्तुपाल के वार्तालाप तथा युद्ध का रोचक विवरण बसन्त विलास महाकाव्य से प्राप्त होता है। शंख के दूत द्वारा यह कहे जाने पर कि शंख के आने से पूर्व तुम भाग जाओ, क्योंकि एक वणिक के भागने पर कोई लोक निन्दा नहीं होगी, वस्तुपाल स्वजातीय गौरव को व्यक्त करते हुये क्रोधपूर्वक कहता है-


क्षत्रियाः समरकेलिरहस्यं जानन्ते न वणिजो भ्रम एषः


अम्बडो वणिगपिप्रछने कि मल्लिकार्जुन नृपं न जघान।


दूत ! रेवणिगहं रणहट्टे विभूतोऽसितुलया कलयामि।


मौलिभाण्ड पटलानि रिपुणां स्वर्गवेतन मथो वितरामि ॥


- बसन्तविलास, 5/32


अर्थात क्षत्रिय ही युद्धक्रीड़ा के रहस्य को जानते हैं वणिक नहीं भ्रम है, यह सत्य नहीं है। क्या अम्बड नामक वणिक ने युद्ध में मल्लिकार्जुन का वध नहीं किया था? हे दूत ! मैं ऐसा वणिक हूं जो युद्ध रूपी बाजार में तलवार रूपी तुला को तौलने के लिये प्रसिद्ध हूं। शत्रुओं के मस्तक रूपी बर्तनों के परिणाम में मैं स्वर्ग में वेतन वितरित करता हूं। वस्तुतः इस काल में हमें अनेक वैश्य सेनापतियों का उल्लेख प्राप्त होता है जिन्होंने रणभूमि में अपूर्व वीरता का परिचय देते हुये इस धारणा को निर्मूल सिद्ध किया कि युद्ध क्रीड़ा केवल क्षत्रियों के लिये ही है। बसन्तविलास में प्राप्त विवरण से भी इसी बात की पुष्टि होती है।

VAISHYA SENAPATI AMBAD

VAISHYA SENAPATI AMBAD

अम्बड भी वैश्य जाति का परमवीर सेनापति था। अप्रतिम शौर्य के कारण कुमारपाल ने इसे राज्य की सबसे सम्मानीय उपाधि 'पितामह' से अलंकृत किया था। इस वैश्य सेनापति ने दक्षिण कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन तथा चालुक्य कुमारपाल के बीच हुये युद्ध में सेनापति के रूप में अप्रतिम शौर्य का परिचय दिया था। इस योद्धा ने रणभूमि में अपनी लपलपाती तलवार से मल्लिकार्जुन के मस्तक को कमल पुष्प की भांति काट दिया था। इसके पश्चात उसने राजसभा में बहत्तर राजाओं की उपस्थिति में सुवर्णराशि में मल्लिकार्जुन का सिर अभिवादन सहित कुमार पाल के सम्मुख उपस्थित किया। मल्लिकार्जुन के कोषागार से प्राप्त विशाल धनराशि भी उसने भेंट की। इस पर प्रसन्न होकर कुमार पाल ने 'राजपितामह' की उपाधि अम्बड को प्रदान करते हुये उसे सम्मानित किया।

VAISHYA SAMANT VIMALSHAH

VAISHYA SAMANT VIMALSHAH
 
चालुक्य नरेश भीम द्वितीय ने विमलशाह को आबू का दण्डपति (सामन्त) नियुक्त किया था। इसने आबू में एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था। आबू का दिलवाड़ा मन्दिर वास्तुसम्बंधी सबसे बड़ी कीर्ति है जिसे विमल शाह ने ऋषभनाथ की स्मृति में 1031 ई० में बनवाया था।

VAISHYA SENAPATI CHAHAD

VAISHYA SENAPATI CHAHAD

यह बहड़ का छोटा भाई था। कुमार पाल ने इसकी योग्यता के कारण इसे अपना सेनापति नियुक्त किया था। प्रबन्ध चिन्तामणि में मेरुतुंग ने कुमारपाल के एक ऐसे आक्रमण का उल्लेख किया है जो चहड़ के नेतृत्व में किया गया था। इस अभियान में चहड़ विजयी होकर लौटा। इस सफलता के कारण कुमारपाल सेनापति चहड़ से बहुत प्रसन्न हुआ और उसे 'राजघटत्ता' की उपाधि से विभूषित किया।

VAISHYA SENAPATI BAHAD - सेनापति बहड़

VAISHYA SENAPATI BAHAD - सेनापति बहड़

यह प्रधानमंत्री उदयन का पुत्र तथा एक प्रसिद्ध सेनापति एवं परम शूरवीर योद्धा था। इसकी शूरता का एक विशिष्ट अंग यह था कि इसकी दहाड़ से हाथी विचलित हो जाते थे। यहां तक कि चालुक्य नरेश कुमार पाल का निजी हाथी 'कलहपंचानन' भी इसकी दहाड़ से विचलित हो उठता था। द्वाश्रय काव्य से पता चलता है कि बहड़ ने कुमारपाल के अधीनत्व और आदेशों पर कार्य करना अस्वीकार कर दिया था और कुमारपाल की सेवा में न रहकर नागोर के राजा 'अण' या 'अणक' (अरुणो राज) के यहां चला गया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वहड़ एक परम शूरवीर योद्धा था। इसकी वीरता का अनुमान हम इसी बात से लगा सकते हैं कि कुमारपाल तथा अरुणोराज के बीच होने वाले युद्ध में अरुणोराज की सेना में सेनापति बहड़ भी हाथी पर स्वार था, जिसकी दहाड़ से हाथी भी आतंकित हो जाते थे। फलतः कुमार पाल ने बहड़ की दहाड़ के भय से अपने वस्त्रों से अपने हाथी के दोनों कानों को बांधने के उपरान्त ही रणभूमि में अणक के विरुद्ध अग्रसर हुआ।

VAISHYA SAMANT UDAYAN

VAISHYA SAMANT UDAYAN
 
यह पहले ही कहा जा चुका है कि चालुक्यों के शासन काल में राज्य के उच्चतम अधिकारियों में प्रमुख वणिक वर्ग के हो लोग थे। जाम्ब, मुंजाल, उदयन आदि सभी अधिकारी वैश्य जाति के ही थे। उदयन चालुक्य नरेश जयसिंह (1094- 1142 ई०) के महामात्य थे। जयसिंह के कोई पुत्र न था लेकिन कुमारपाल को राजा बनाना जयसिंह को सहा न था। उसने इसी लिये कुमारपाल के पिता त्रिभुवन पाल का वध करा डाला और कुमार पाल को भी मार डालने की इच्छा से पकड़ने की आज्ञा दे दी। उदयन जयसिंह के मंत्री थे फिर भी उन्होंने कुमारपाल की रक्षा तथा उसे राजपद दिलाने में विशेष भूमिका निभाई। जिस समय कुमार, पाल आश्रय विहीन हो अज्ञातवास तथा असहायावस्था में इधर-उधर भ्रमण कर रहा था उस समय मंत्री उदयन ने अपने यहां इन्हें न केवल शरण दी अपितु धनादि की भी सहायता की थी। कुमारपाल ने राजसिंहासन प्राप्त करने के पश्चात उदयन का आभार मानते हुये उसे न केवल अपना प्रधानमंत्री बनाया अपितु उसके पुत्रों को भी राज्य के शासन में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया।

VAISHYA YASH - PURPRADHAN

VAISHYA YASH - PURPRADHAN

कलचुरि अभिलेखों में यश नामक वैश्य का उल्लेख रत्नपुर के 'पुरप्रधान' (नगराध्यक्ष) के रूप में अनेक बार आया है। 171 पुरप्रधान का तादात्मय हम गुप्तकाल के नगर प्रमुख से कर सकते हैं। स्थानीय प्रशासन में यह एक महत्त्वपूर्ण पद होता था। गुप्त काल में वैश्य चक्रपालित इसी पद पर नियुक्त था।

VAISHYA SAMANT SARVDUTT

VAISHYA SAMANT SARVDUTT

493-94 ईसवी के एक गुप्तकालीन अभिलेख में शर्वदत्त नामक दीक्षित गृहस्थ का उल्लेख आया है। यह उपरिक (प्रान्तीय शासक) और दूतक (अनुदान निष्पादक) का कार्य करता था। 165 रामशरण शर्मा का विचार है कि यह गुप्त राजाओ के सामन्त थे। रत्नदेव के राज्यकाल में गंग नृपति चोडगंग द्वारा कलचुरि राज्य पर आक्रमण किया गया। चोडगंग के राज्य की तुलना में रत्नदेव का राज्य बहुत ही छोटा पड़ता था। इसके अतिरिक्त चोडगंग महाप्रतापी के रूप में विख्यात था। ऐसे बलशाली राजा का सामना करना टेढ़ी खीर थी। लेकिन वैश्य सामन्त वल्लभराज के पराक्रम के कारण चोडगंग जैसे प्रतापी राजा को पराजय का मुंह देखना पड़ा। चोडगंग को बड़ी बदनामी के साथ भागना पड़ा। 168 कलचुरियों के वैश्य सामन्त वल्लभराज के अनेक लेखों में उसे गौड़ देश में मिलो विजय का वर्णन आया है। 169 उसके शौर्य व पराक्रम के कारण कलचुरि रानी लाच्छल्लदेवी उसे अपने पुत्र के समान मानती थीं। 170 अभिलेखों में यह भी उल्लिखित है कि वल्लभराजदेव ने अनेक देवालय का निर्माण करवाया। उसके द्वारा दिये गये दान का भी उल्लेख अभिलेखों में हुआ है।

VAISHYA VARRIOR CHAKRAPALIT - चक्रपालित

VAISHYA VARRIOR CHAKRAPALIT - चक्रपालित

यह वैश्य पर्णदत्त का पुत्र था। पर्णदत्त को हम जहां दत्त नामान्तक वैश्य उपाधि का प्रयोग करते हुये पाते हैं वहीं उसके पुत्र के नाम के अन्त में हम 'पालित' शब्द पाते हैं। पंतजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि कुछ वैश्य अपने नाम के अन्त में 'पालित' उपाधि जोड़ते थे। 158 इससे प्रतीत होता है कि पिता-पुत्र दोनों वैश्यों की भिन्न-भिन्न उपाधियों का प्रयोग करते थे। गुप्त शासन व्यवस्था में क्योंकि प्रान्तपति को प्रान्तीय कर्मचारियों को नियुक्ति का पूर्ण अधिकार था। अतः पर्णदत्त ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुये अपने पुत्र चक्रपालित को सौराष्ट्रपुर गिरिनगर (आधुनिक गिरिनार) का प्रमुख अधिकारी नियुक्त किया। नगर प्रमुख की नियुक्ति की परम्परा हमारे देश में मौर्य काल से ही चली आ रही थी। नगर-प्रमुख को कौटिल्य ने 'नागरक' कहा है। इसकी पहचान अशोक कालीन कलिंग लेख के 'नगलक' से की जा सकती है। मनुस्मृति में नगर के प्रमुख अधिकारी को 'नगरसर्वार्थ चिन्तक' अर्थात पुर में होने वाली प्रत्येक घटना की देख-रेख करने वाला कहा गया है। 1.59 जूनागंढ़ अभिलेख के अनुसार उसके दो प्रधान कर्त्तव्य थे- (1) नगर की रक्षा 160 (2) दुष्टों का दमन । 161 इस पदाधिकारी से आशा की जाती थी कि उसका व्यवहार पुरवासियों के साथ सहानुभूति एवं आत्मीयता से परिपूर्ण हो। गिरिनगर का प्रधान अधिकारी चक्रपालित यहां के नागरिकों को पुत्र के समान मानता था तथा उनके दोषों को दूर करने की चेष्टा करता था। 162 इस अधिकारी से सार्वजनिक कार्यों की आशा की जाती थी। इस पद पर प्रायः बहुत सुयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की जाती थी। जूनागढ़ लेख के अनुसार चक्रपालित सब प्रकार से श्रेष्ठ था तथा उसमें सम्पूर्ण वांछनीय गुण विद्यमान थे। वह क्षमा, प्रभुत्व, विनय, नय, शौर्य, दान तथा दाक्षिण्य आदि सद्गुणों का केन्द्र बिन्दु था। 16.3 अभिलेख में कहा गया है कि इस सम्पूर्ण विश्व में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जो कि गुणों के द्वारा उसकी तुलना में आ सके। वह गुणवान व्यक्तियों के लिये सम्पूर्ण रूप से उपमा का विषय हो गया था। चक्रपालित ने पुरवासियों के हित के लिये सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया था। 164

VAISHYA PARNDUTT - पर्णदत्त

 VAISHYA PARNDUTT - पर्णदत्त

यह भी वैश्य सम्राट स्कन्दगुप्त के काल में सौराष्ट्र प्रान्त का राज्यपाल था। स्कन्दगुप्त के कर्मचारियों में यह सर्वाधिक योग्य था। इस प्रान्त की रक्षा के निमित्त सबसे उपयुक्त कर्मचारी यही समझा गया था। पारसीक लेखों में इसे फर्नदत्त कहा गया है। 157 स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ लेख में इसकी योग्यता के सम्बन्ध में कहा गया है कि जिस प्रकार देवता वरुण को पश्चिमी दिशा का अधीश्वर नियुक्त कर स्वस्थ मन हो गये थे, उसी प्रकार वह राजा (स्कन्दगुप्त) पर्णदत्त को पश्चिमी दिशा का गोप्ता (रक्षक) नियुक्त कर विश्वास युक्त हो गया था।

VAISHYA CHIRAGDUTT - चिराग दत्त

VAISHYA CHIRAGDUTT - चिराग दत्त 

पुराणों में तथा पारस्पकर गृहसूत्र में जहां हमें वैश्यों के लिये गुप्त नामान्त उपाधि जोड़ने का उल्लेख प्राप्त होता है, 155 वहीं गुप्तकाल में हम वैश्यों की 'दत्त' नामान्त उपाधि भी पाते हैं। पउमचरिउ में वैश्यों के नाम के अन्त में 'दत्त' नाम जोड़ने को मान्यता दी गई है। 156 गुप्तकालीन अभिलेखों में हम अनेक दत्त तामान्त व्यापारियों को नगर शासन की समिति में पाते हैं। 543 ई० के दामोदर पुर लेख में सार्थवाह स्थाणुदत्त का उल्लेख प्राप्त होता है, जो सार्थवाह था तथा नगर शासन की समिति में था। दामोदर पुर के लेखों में बालादित्य के काल में कोटिवर्ष के विषयपति की सहायता के लिये जो समिति थी उसमें प्रथम कुलिक के नाम के लिये वरदत्त एवं मतिदत्त का नाम प्राप्त होता है। इन साक्ष्यों से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि वैश्य लोग दत्त नामान्त उपाधि का भी प्रयोग करते थे। इस ओर पहले ही संकेत किया जा चुका है कि गुप्त साम्राज्य प्रान्तों अथवा भुक्तियों में विभक्त था। बंगाल से प्राप्त कुमारगुप्त के लेखों में पुण्डवर्द्धनभुक्ति (उत्तरी बंगाल) का उल्लेख बहुधा मिलता है। 443 ई० से 447 ई० तक इस प्रान्त का राज्यपाल चिराग दत्त था। इसकी उपाधि उपरिक महाराज थी। (पुण्ड्रवर्द्धन-भुक्तातुपरिक चिरातदत्तस्य)। दामोदरपुर से दो अन्य अभिलेख भी प्राप्त हुये हैं उसमें भी दत्त नामधारी दो राज्यपाल ब्रह्मदत्त तथा जयदत्त का नाम प्राप्त होता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि बंगाल में कोई दत्त नामान्त वैश्य परिवार था, जिसके सदस्य परम्परागत आधार पर उत्तरीबंगाल (पुण्डवर्द्धन) के राज्यपाल क्रमशः नियुक्त किये गये थे।

VAISHYA GOVIND GUPT - गोविन्द गुप्त

VAISHYA GOVIND GUPT - गोविन्द गुप्त

गुप्त साम्राज्य में भी शासन की सुविधा के लिये साम्राज्य का विभाजन प्रान्तों में किया गया था। प्रान्त को देश अथवा भुक्ति कहा जाता था। राज्यपाल को 'उपरिक' अथवा 'उपरिक महाराज' कहा जाता था। ये राज्यपाल उप नरेश की भांति अपने- अपने क्षेत्रों में ठाट-बाट के वातावरण में राज्य करते थे। उन्हें प्रान्तीय कर्मचारियों की नियुक्ति का पूर्ण अधिकार प्राप्त था। गुप्तवंशीय अभिलेखों के साक्ष्यों से प्रमाणित हो जाता है कि राजकुमारों के अतिरिक्त विश्वस्त एवं सुयोग्य कर्मचारी भी प्रान्तपति के पद पर नियुक्त किये जाते थे। गुप्त राजवंश के शासकों का उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं। अभिलेखों से पता चलता है कि गुप्त वंश के कुछ राजकुमार भी प्रान्तपति जैसे महत्वपूर्ण प्रशासकीय पदों पर नियुक्त थे। गोविन्दगुप्त सम्भवतः कुमारगुप्त का छोटा भाई था। वैशाली मुद्रा के ऊपर उसका नाम उत्कीर्ण मिलता है। वह चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय वहां का राज्यपाल था। कुमारगुप्त के समय वह पश्चिमी मालवा का राज्यपाल था। गुप्त राजवंश वैश्य जाति से सम्बंधित था, इस सम्बन्ध में पहले ही विस्तार पूर्वक चर्चा की जा चुकी है। अतः इस राजपरिवार के राजकुमारों की जाति आदि के सम्बन्ध में पुनरावृत्ति करना पिष्टपेषण मात्र होगा।

VANIK PRABHAVATI GUPT - प्रभावती गुप्ता

VANIK PRABHAVATI GUPT -  प्रभावती गुप्ता

प्रभावती गुप्ता महान वैश्य गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त 'विक्रमादित्य' की पुत्री थीं। ये भारत की उन महिलाओं में से एक हैं, जिन्होंने अपने पुत्र के अल्पवयस्कता के कारन राज्य के शासनकार्य को सफलता पूर्वक चलाया। इनका विवाह वाकाटक राजवंश के रुद्रसेन द्वितीय के साथ हुआ था। गुप्त राजकुल में उत्पन्न इस कन्या के भाग्य में सम्भवतः सुख नहीं बदा था। विवाह के कुछ वर्षों के उपरान्त इसके पति की मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के समय (390 ई०) इसकी आयु 25 वर्ष थी तथा इसके प्रथम पुत्र दिवाकर सेन की आयु 5 वर्ष और द्वितीय पुत्र की आयु 2 वर्ष थी। प्रभावती गुप्ता के दुःखों का अभी अन्त नहीं हुआ था। प्रकृति को शायद यह स्वीकार न था कि उसे हंसता देख सके। शासन के तेरहवें वर्ष में दिवाकर की मृत्यु हो गयी। अतः उसने अपने द्वितीय पुत्र दामोदर को सिंहासन पर बैठाया और सम्भवतः 'पांच-छः वर्ष तक उसकी संरक्षिका के रूप में कार्य किया। इस प्रकार प्रभावती गुप्ता भारतीय महिलाओं की प्रथम पंक्ति में खड़ी होने की अधिकारी हैं, जिन्होंने पति के न रहने पर भी राज्यकार्य का योग्यता व कुशलता पूर्वक संचालन किया था।

VAISHYA SHIVGUPT AND PARIGUPT - शिवगुप्त एवं परिगुप्त

VAISHYA SHIVGUPT AND PARIGUPT -  शिवगुप्त एवं परिगुप्त

सातवाहन कालीन अभिलेखों से पता चलता है कि प्रशासन की दृष्टि से राज्य अनेक 'आहारों' अथवा "राष्ट्रों" में विभक्त था। आहारों के शासक अमात्य कहलाते थे। सातवाहन राजा बड़े-बड़े पदों पर शायद व्यापारियों को रखते थे। उनके अमात्यों में शिवगुप्त एवं परिगुप्त का उल्लेख प्राप्त होता है। रामशरण शर्मा के अनुसार ये वैश्य थे।  परिगुप्त गौतमीपुत्र सातकर्णि के अधीन अमात्य पद पर था। अमात्य सातवाहन राजव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग थे। इन्हें वही स्थान प्राप्त था जो अशोक की शासन व्यवस्था में महामात्रों को और गुप्तों की राजव्यवस्था में कुमारामात्य को था। शिवगुप्त और परिगुप्त एक ही परिवार के थे अथवा अलग अलग परिवार के थे, इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि सातवाहन काल में पद वंशानुगत नहीं था। 

VAISHYA PUSHYA GUPT - पुष्यगुप्त

 VAISHYA PUSHYA GUPT - पुष्यगुप्त

बौद्ध साहित्य एवं अशोक के अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि मौर्य साम्राज्य अनेक प्रान्तों में विभक्त था और राजकुल के ही कुमार प्रायः उनके राज्यपाल या गवर्नर हुआ करते थे। रुद्रदामन (150 ई०) के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता हैं कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र (गुजरात) को अपने साम्राज्य का एक प्रान्त बनाया था और वहां एक प्रान्तपति नियुक्त किया था जो वैश्य वंश का था, जिसका नाम पुष्यगुप्त था। पुष्यगुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का बहनोई था. उसने वहां जनता के हित के लिये विशाल सुदर्शन झील का निर्माण कराया था (मौर्यस्य राज्ञः चन्द्रगुप्तस्य राष्ट्रियेण वैश्येन पुष्यगुप्तेन कारितः ॥) 150अ

अतः स्पष्ट है कि पुष्यगुप्त मौर्य साम्राज्य के सौराष्ट्र प्रान्त का राज्यपाल था।

Tuesday, February 11, 2025

BARNWAL VAISHYA - बरनवाल वैश्य जाति की उत्पत्ति, इतिहास एवं परिचय

BARNWAL VAISHYA - बरनवाल वैश्य जाति की उत्पत्ति, इतिहास एवं परिचय

बरनवाल (बर्नवाल, वर्णवाल) एक वैश्य समुदाय है, जिनकी उत्त्पत्ति महाराजा अहिबरन से है। बरनवाल अथवा बर्नवाल समाज के पितामह अहिबरन बुलंदशहर के राजा थे। बरनवाल अधिकतर उत्तर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल तथा पडोसी देश नेपाल में पाए जाते हैं।

बरनवाल जाति का इतिहास
 
श्री महालक्ष्मी व्रत कथानुसार अयोध्या के सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा मान्धाता के दो पुत्र थे- एक का नाम गुनाधि तथा दुसरे का नाम मोहन था। मोहन के वंशज वल्लभ और उनके पुत्र अग्रसेन हुए। महाराजा अग्रसेन अग्रवाल व अग्रहरि वैश्य वंश की शुरुआत की। वही दुसरे पुत्र गुनाधि के पुत्र परामल और उनके पौत्र अहिबरन हुए। जिन्होंने बरनवाल समुदाय की नींव रखी।

बरनवाल समाज के पितामह महाराजा अहिबरन
 
बर्नवाल समुदाय का इतिहास उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से शुरू होता है। बुलंदशहर के राजा थे अहिबरन जिन्होंने 'बरन' नाम के एक किले का निर्माण किया, जो उस वक्त बुलंदशहर की राजधानी बनी। वर्तमान में भी बुलंदशहर में बलाईकोट या ऊपरकोट नामक एक स्थान है, जिसे महाराजा अहिबरन का किला बताया जाता है। बरन-साम्राज्य सैकड़ों वर्षो तक व्यापार तथा कला को संयोजित किया। इन्हीं कारणों से राजा अहिबरन ने व्यापार को प्रोत्साहित करने और अपनी प्रजा की भलाई के लिए वैश्य-धर्म को धारण किया।

सन 1192 ई० में मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबद्दीन (कुछ मतानुसार तुगलक) ने बरन शहर (आज का बुलंदशहर) पर आक्रमण कर बरन किले को अपने कब्जे में ले लिया।

वर्तमान में बुलंदशहर के वीरपुर, भटोरा, ग़ालिबपुर गाँव में हुए उत्खनन के दौरान बरन-साम्राज्य के कुछ मूर्तियाँ व सिक्के प्राप्त हुए है जो लखनऊ के राजकीय संग्रहालय में संरखित है।
बरन साम्राज्य के पतन के बाद बरनवाल समाज देश के भिन्न-भिन्न स्थानों में विभिन्न उपनामों यथा गोयल, शाह, मोदी, जायसवाल आदि से बसने लगे।

अहिबरन जयंती मनाता बरनवाल समाज

एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के जर्नल के वॉल्यूम 52 भाग -1-2 के मुताबित बरन साम्राज्य अपने समय में काफी समृद्ध व संपन्न राज्य हुआ करता था। उन्नीसवीं सदी के दस्तावेजों के मुताबित इस साम्राज्य ने पाली में लिखे तांबे और चाँदी के मुद्राओ को प्रचलन में थे।
 
अंग्रेज शासनकाल में कुछ बरनवाल राय बहादुर के उप नाम से देश के कई हिस्से में जमींदारी का काम देखा करते थे।

बरनवाल जाति के गोत्र एवं उपनाम
 
बरनवाल में 36 गोत्र हैं। ये गर्ग, वत्सील, गोयल, गोहिल, क्रॉ, देवल, कश्यप, वत्स, अत्री, वामदेव, कपिल, गल्ब, सिंहल, अरन्या, काशील, उपमैनु, यामिनी, पराशर, कौशिक, मौना, कट्यापन, कौंडियाल, पुलिश, भृगु, सरव, अंगिरा, कृष्णाभी, उध्लालक, ऐश्वरान, भारद्वाज, संक्रित, मुदगल, यमदग्रि, छ्यवन, वेदप्रामिटी और सांस्कृत्यायन आदि गोत्र है।

ठाकुरों की गढ़ी बड़वा में हैं सेठो बनियों की हवेलिया

ठाकुरों की गढ़ी बड़वा में हैं सेठो बनियों की हवेलिया


दक्षिण-पश्चिम हरियाणा में शुष्क ग्रामीण इलाकों का विशाल विस्तार है, जो उत्तरी राजस्थान के रेतीले क्षेत्रों से सटे हुए है, यहाँ बड़वा नामक एक समृद्ध गांव स्थित है। यह राजगढ़-बीकानेर राज्य राजमार्ग पर हिसार से 25 किमी दक्षिण में है। गढ़ से बड़वा का दौरा शुरू करना स्वाभाविक था, जिसे गाँव में ठाकुरों की गढ़ी (एक किला) कहा जाता है। 65 वर्षीय ठाकुर बृजभूषण सिंह, गढ़ी के मालिकों की एक जागीर है। ठाकुर बाग सिंह तंवर के पूर्वज, जो कि बृजभूषण सिंह के दादा थे, ने 600 साल पहले राजपुताना के जीतपुरा गाँव से आकर अपने और अपने संबंधों के लिए इस गाँव की संपत्ति की नक्काशी की थी। संयोग से, राजपूतों की तंवर शाखा ने भिवानी शहर के आसपास के कई गाँवों में खुद को मजबूती से स्थापित किया था। नतीजतन, भिवानी तंवर खाप का प्रधान बन गया यानी गाँवों का एक समूह। मध्ययुगीन काल में, तंवर राजपूतों ने उस समय की राजनीतिक उथल-पुथल से उखाड़ फेंका जब मुस्लिम आक्रमणकारी इस भूमि पर कब्जा करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने की प्रक्रिया में थे, हरियाणा और पहाड़ी क्षेत्रों से हिमाचल प्रदेश में चले गए। हालांकि, मुगल काल में, तंवर राजपूत शांतिपूर्वक भिवानी के आसपास अपने गाँव में व्यापार करते थे। लगभग 15,000 की आबादी वाला बड़वा का गाँव, अब भिवानी जिले का एक हिस्सा है।

बाग सिंह तंवर के पूर्वजों, जिन्होंने बारिश के पानी से भरे एक बड़े प्राकृतिक तालाब के आसपास झोपड़ियों में बसे थे, ने गाँव में 14,000 बीघा जमीन पर कब्जा कर लिया था। नतीजतन, जैसा कि भाग्य के पास होगा, बहुत सारी जमीन गांव में उनके वंशजों और अन्य समुदायों को हस्तांतरित कर दी गई थी। मौजूदा गढ़ी, एक मध्ययुगीन शैली का एक विशाल स्मारक, जिसे ब्रांसा भवन भी कहा जाता है, रामसर नामक एक बड़े तालाब के किनारे गाँव के उत्तर-पश्चिम में स्थित है, जिसे 1938 में बनाया गया था, जो गाँव के पुराने लोगों के अनुसार था एक साल मानसून की विफलता के कारण, फसलों को उस वर्ष नहीं उगाया नहीं जा सका। इसलिए, बाग सिंह ने गढ़ी के निर्माण में अपने रिश्तेदारों को शामिल करने के बारे में सोचा और उपयोगी रोजगार पाया। रेतीले टीले पर पारंपरिक स्थापत्य शैली में निर्मित गढ़ी में आज भी लोहे की प्लेट और प्रवक्ता के साथ लकड़ी का एक बड़ा और मजबूत गेट है। आवास और सार्वजनिक उपस्थिति के लिए कई विशाल कमरे, पुआल और अनाज के भंडारण के लिए कई तिमाहियों की एक पंक्ति के अलावा, बिल्डरों द्वारा प्रदान किए गए थे।

गगनचुंबी हवेलियां, मनमोहक चित्रकारी, सूक्ष्म नमूनों से सजे कपाट, कुंड रुपी जलाश्य, हाथीखाने, खजाना गृह की मजबूत दीवार, कवच रुपी मुख्य ठोस द्वार और न जाने क्या क्या। मन में गहरी जिज्ञासा पैदा करती हैं, ये हवेलियां। इन्हें बनाने वालों ने उम्र ही यहां बिता दी। इनकी कब्रें मृत्युपरांत यहीं बनाई गईं। हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित उपमंडल का गांव बड़वा की।

पनघट पर आई थी ‘चंद्रो’
दक्षिण में स्थित कुएं का निर्माण यहां के दूसरे सेठों ताराचंद तथा हनुमान ने करवाया था। सेठ हनुमान व ताराचंद के पुत्रों ने गांव के रूसहड़ा जोहड़ पर चार स्तंभों वाला आकर्षक कुआं बनवाया। इसी के इर्द-गिर्द प्रसिद्ध हरियाणवी फिल्म चंद्रावल और बैरी के कुछ दृश्यों को फिल्माया गया। अंग्रेजों के जमाने की गाड़ी और रथ आज भी हवेलियों में मौजूद हैं। यहां विद्यमान ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक-धरोहरें गांव के अतीत के इतिहास को बयां कर रही है। हवेलियों की आयु का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है लेकिन यह सच है कि ये द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व की है।

अंग्रेजों के जमाने की गाड़ी और रथ
बड़वा में एक दर्जन हवेलियां हैं। इनमें सेठ परशुराम की हवेलियां खासी प्रसिद्ध हैं। इन्हें बनवाने के लिए पिलानी से कारीगर बुलाए थे। अंग्रेजों के जमाने की गाड़ी और रथ आज भी हवेलियों में मौजूद है। हवेलियों से भी बढ़कर रोचक इतिहास यहां के कुओं तथा तालाबों का भी है। प्राचीन समय में इस स्थान पर एक छोटा सा कच्चा तालाब था। अक्सर सेठ परशुराम की बहन केसर यहां गोबर चुगती थी जो उनके लिए अशोभनीय था। लोगों के ताने सुनकर उन्होंने कच्चे तालाब की जगह एक ऐतिहासिक तालाब का निर्माण करवाया जिसकी पहचान अब केसर जोहड़ के रूप में होती है। इसी के इर्द-गिर्द प्रसिद्ध हरियाणवी फिल्म चंद्रावल और बैरी के कुछ दृश्यों को फिल्माया गया। प्राचीन समय में इस स्थान पर एक छोटा सा कच्चा तालाब था। अक्सर सेठ परशुराम की बहन केसर यहां गोबर चुगती थी जो उनके लिए अशोभनीय था। भिवानी जिले के बड़वा गांव की सेठो की बड़ी-बड़ी हवेलियों के अलावा, तालाब, कुँवें, हवेलियां, नोहरा, धर्म शालाएं, छतरियां आदि में, अनेकों ऐसे चित्रण मिले हैं। इन चित्रों में राजस्थान के चित्रों जैसी विशेषताएं पाई गई।

सेठ परशुराम द्वारा निर्मित केसर तालाब
यह तालाब सेठ परशुराम ने अपनी बहन की यादगार में बनवाया, कहा जाता है कि सेठ परशुराम ने यहाँ पर केसर तालाब का निर्माण करवाया जोकि यात्रियो का प्रमुख आकर्षण केंद्र रहा है। ऐसा कहा जाता है परशुराम की बहन गोबर चुगती थी। यह सेठ परिवार के लिए शर्म की बात थी और लोग अक्सर ऐसा छोटे कार्य के प्रति ताने मारते थे तब सेठ ने यहां पर मौजूद तालाब को पक्का करवाया और उसका नाम केसर तालाब रखा। इस तालाब का प्रयोग दैनिक क्रियाकलापों के लिए इस्तेमाल होता था। इसके पास एक गहरा जल कुंड है जिसमें दुखी महिलाऐं कूदकर अपनी जान दे ती थी, इसलिए इसको मुक्ति धाम भी कहा जाता है। यहां के लोग इसे आगौर भी कहते हैं। इस तालाब के किनारे के ऊपर की छत पर गुंबद/छतरियां बने हुए हैं जिनमें राधा कृष्ण की रासलीला को चित्रों के माध्यम से प्रमुखता से दर्शाया गया है । इनमें राधा कृष्ण एक दूसरे का हाथ पकड़े घेरे में नृत्य कर रहे हैं और इनके पीछे वाद्य-यंत्रों की आकृतियां चित्रित की गई है जैसे ढोलक, नगाड़े, बाँसुरी, हारमोनियम, शहनाई आदि। और यह शायद किसी समारोह को चित्रित कर रहा है । चित्रों में गतिशीलता और लय है। लाल भूरे रंग उपयोग किया गया है।

श्रीकृष्ण को नीले रंग में दिखाया गया है जबकि राधा का रंग गोरा दिखाया गया है। इन आकृतियों के पीछे पशु पक्षियो को दिखाया गया है, जिनमें मोर, तोता, चिड़ियां आदि है। इसमें लाल, पीले, नीले रंग का इस्तेमाल किया गया है। गुंबद के केंद्र में वृत्ताकार ज्यामितिय अलंकरण किया गया है । गुंबंदों की आकृतियों को गतिशील और समान अनुपात में दिखाया गया है। इनका छोटा कद व चेहरा गोल है। समय के अनुसार आज इनके रंग धूमिल पड़ गए हैं परन्तु केंद्र में फूल आज भी अपने अतीत को समाए हुए हैं।

सेठ हुकुम चंद लाला सोहन लाल की हवेली-
यह हवेली लगभग आज से डेढ़ सौ साल पुरानी है, जिसके प्रमुख द्वार पर एक हष्ट-पुष्ट हाथी को सुसज्जित एवं गतिशील अवस्था में दिखाया गया है। इस हाथी की पीठ एक चतुर्भज ज्यामीतिय डिजाइन का कपड़ा एवं उस पर लकड़ी की काठी को सुसज्जित किया गया है, जिसमें राजा-रानी आमने-सामने और सेवक पीछे चंवर ढूला रहा है। इसमें राजा रानी को फूल देता हुआ अपने प्यार का इजहार कर रहा है। हाथी केसर पर भी चकोर ज्यमीतिय आकार की टोपी रखी गई है जो उसकी शोभा बढ़ा रही है । इसके अलावा यहां दीवार पर धार्मिक चित्र मौजूद है जैसे विष्णु जी लक्ष्मी के साथ अपनी सवारी पर विराजित हैं तथा दूसरे चित्र में शेरावाली माता अपनी सवारी पर विराजित है। इसके अलावा चित्र यहाँ राधा रानी के प्रेम मिलाप को दर्शा रहा है। हाथी का चित्रण कोटा शैली में अधिक किया गया है ।

सेठ लक्ष्मीचंद का कटहरा-
बड़वा में लक्ष्मी चंद के कटहरा के अंदर छत पर राजाओं-महाराजाओं व देवी-देवताओं को एक साथ चित्रित किया गया है । इस चित्र में बाएं ओर से राधा रानी की सवारी को दिखाया गया है जो रथ पर सवार है तथा कुछ महिलाएं रथ के पीछे चल रही है जोकि उनकी सेविकाएं प्रतीत होती हैं । एक घुड़सवार एक हाथ में राज्य का निशान लिए चल रहा है तथा अन्य घुड़सवार पीछे पीछे चल रहे हैजो कि महाराज के अंगरक्षक हैं और सुरक्षा को सुनिश्चित कर रहे हैं। कृष्ण राधा की चोटी बनाते हुए -इस चित्र में श्री कृष्ण जी कुर्सी पर विराजे हैं और राधा मुड्ढे पर बैठी हैं। श्री कृष्णजी राधा की चोटी गूंथ रहे हैं और राधिका हाथ में शीशा पकड़े बैठी हैं। शीशे में राधा का चेहरा स्पष्ट दिर्खाइ दे रहा है। इस चित्र में दिखाए गए कुर्सी व मुड्ढे से इस चित्र पर स्थानीय प्रभाव नजर आता है तथा पहनावे से राजस्थानी प्रभाव नजर आता है।

इस प्रकार चित्रकार के चित्र में तत्कालीन प्रभाव नजर आते हैजो उस समय उसने देखा और चित्रित किया। इस चित्र में आंखें मछली के आकार जैसी , कंलगी व मुकुट से चित्रण में मुग़ल प्रभाव नजर आता है। पृष्ठभूमि हल्के पीले रंग की है तथा शरीर को पतला एवं लंबा दिखाया गया है जबकि बालों की लंबाई शरीर का अनुपात में कम है। दूसरी ओर दाएं से बाएं की ओर देवी देवताओं की सवारी आ रही है जिसमे सभी देवता अपने -अपने वाहन पर बैठे हैं तथा ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसा कि राजा रानी अपने रथ पर सवार होकर देवी देवताओं के स्वागत के लिए पधार रहे हैं। इन चित्रों में हाथी घोड़े आदि को बहुत अच्छे से सुसज्जित किया गया है। इनकी पृष्ठभूमि पीले रंग की है तथा चित्रों में नीला, पीला, हरा, भूरा, आदि रंगो का प्रयोग किया गया है। चित्रो के वस्त्र व आभूषणों को देख इन पर मुगली तथा राजस्थानी प्रभाव प्रतीत होता है।

लाला लायकराम फूलचंद की हवेली-
यह हवेली लगभग 160 साल पुरानी है, इस हवेली की बरामदे की दीवार के ऊपरी भाग में सिपाही का चित्रण किया गया है। इसमें एक व्यक्ति घोड़े पर सवार है तथा तीन सिपाही आगे पीछे एक कतार में तथा पांच सिपाही समानांतर चल रहे हैं। इसकी पृष्ठभूमि पीली है। यह सिपाही पूरे जोश में दिर्खाइ पड़ रहे है।

तुलाराम लाला डूंगरमल की हवेली-
यह हवेली आज से लगभग 100 साल पहले की बनी हुई है। इसकी बाहरी दीवार पर रेल का इंजन डिब्बों सहित दिखाया गया है। इंजन का रंग काला एवं डिब्बों को नीले रंग से चित्रित किया गया है। रेल की खिड़की के ऊपर के भाग में जाली बनाई गई है जिसमें यात्रियों को दिखाया गया है एवं इंजन से धुआं निकल रहा है। रेलों के पीछे प्राकृतिक दृश्य भी दिखा रखा है । दूसरी ओर लक्ष्मीचंद का कटहरा में चालक रेलगाड़ी चला रहा है जोकि बहुत ही आकर्षक एवं सुंदर हैं इसमें 13 डिब्बे और एक इंजन को दर्शाया गया है। इस गाड़ी में यात्रियों को भी चित्रित किया गया है एवं

बाहर इसके सामने एक व्यक्ति हाथ में झंडी लिए खड़ा है जो गाड़ी के लिए एक संकेतक का कार्य कर रहा है। इसे देखकर यह लगता है यह चित्र हिंदुस्तान में अंग्रेजों द्वारा 19वी सदी में चलाई गई पहली रेल का चित्रित किया गया है। यह चित्र उस समय की जीवंत व्यवस्था की व्याख्या कर रहा है। डाकिये का चित्र-यहां एक दीवार पर डाकिए का चित्र चित्रित हैं प्रतीत होता है तथा अंग्रेजी भाषा में इन पर कुछ लिखा होना जोकि इस शैली के प्रभाव इसकी आंखें मीनाकृतपान के पत्ते के समान हैं जिसे देख ऐसा प्रतीत होता है कि इस पर स्थानीय कलाकार का प्रभाव रहा है। कपड़े जूतें आदि देखकर इन पर कंपनी शैली का प्रभाव को और सुदृढ़ करता है।

यशोदा कृष्ण का चित्र-
इस चित्र में यशोदा मैया ने श्री कृष्ण को गोद में उठा रखा है तथा यह मातृत्व भाव को दर्शा रहा है। इस चित्र में चेहरा छोटा जबकि शरीर हष्ट पुष्ट बना है, आँखें बादाम जैसी तथा चेहरा गोल है और भोही मोटी-मोटी है। सिर पर कंलगी लगी हुई है जोकि मुग़ल प्रभाव को दर्शाती है। अगर कपड़ों की तरफ देखें तो कपड़ों से राजस्थानी प्रभाव नजर आता है।

कृष्ण व कालिया नाग का चित्र-

चित्र में श्री कृष्ण को नाग पर अपनी लीलाएं करते हुए दिखाया गया है।
श्री कृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं तथा उनके दोनों और नाग देवियां विशेष मुद्रा में खड़ी हैं जिनका नीचे का हिस्सा सर्प अवस्था में और ऊपर से नाग देवी के रूप में दिखाया गया है । अर्थात अर्ध नागेश्वरी के रूप में उपस्थित हैं जो कि श्री कृष्ण की तरफ मुख करके हाथ जोड़कर विनती अवस्था में खड़ी है । इस चित्र में एक चश्म चेहरों की आकृति में दर्शाया गया है। आंखें मीन जैसी हैं जोकि जयपुर शैली के अंतरगत । पूरे चित्र पर नाथद्वारा शैली का प्रभाव प्रमुखता से दिखाया गया है।

सरस्वती देवी का हंस पर विराजित चित्र-
इस चित्र में सरस्वती देवी हंस पर विराजित हैं तथा हंस के मुख में माला है, यहां एक चश्म चेहरा चित्रित अवस्था में दिखाया गया हैं। सरस्वती मां के एक बाल की लटा कान के पास से चेहरे पर पड़ी है। सरस्वती माँ के एक हाथ में पुस्तक और दूसरे हाथ में फूल हैं जिन्हें हरे रंग से चित्रित किया है। इस चित्र में पीछे महिला चंवर झुला जैसे प्रतीत होती हैं। इसमें दोनों राजस्थानी व मुग़ल प्रभाव का मिश्रण प्रतीत होता है।

चित्रकार ने अपनी अपनी समझ के अनुसार छवियों के अंदर भेद किया है । हिंदू मिथक के अनुसार देवी सरस्वती को विद्या और संस्कृति की देवी माना गया है। ऋग्वेद में सरस्वती की ख्याति एक पवित्र सरिता के रूप में है। सरस्वती को हंस रूप दिखाया गया है। हरियाणा के अनेक हिंदू आस्था स्थलों पर बनाए गए भवनों और आवासीय भवनों में देवी सरस्वती की छवियों का अंकन हमें भित्ति चित्रों के रूप में उपलब्ध है।

हवेलियों का निर्माण
भित्ति चित्रों में कलात्मकता भिवानी जिले के अन्तरगत आने वाले गांवों में अनेक पुरानी हवेलियों पर भित्ती चित्र पाए गए, इन हवेलियों का निर्माण लगभग 100-150 वर्ष पूर्व माना गया है। इन हवेलियों का निर्माण कुम्हार जाति के राज मिस्त्रिओं के द्वारा लाखोरी ईटों से किया गया है। भित्ति अलंकरण के लिए चूने का प्रयोग किया गया। इन हवेलियों पर हजारो की संख्या में भित्ति चित्र मिले। इन चित्रो में पौराणिक विषय, महाभारत, रामायण, राधा कृष्ण लीला, पशु पक्षी, सामाजिक क्रिया कलाप एवं अन्य पौराणिक कथाओं से सम्बंधित घटनाओं को प्रमुख रूप से दर्शा या गया है। इसके अलावा उस दौर के राजा महाराजाओं के गौरव गाथाओं का सुंदर चित्रण किया गया। इनके द्वारा महत्वपूर्ण न घटनाओं, प्रसंगों , पात्रों, लीलाओ के आदि पात्रो को चित्र के माध्यम से दर्शाया गया। उन्होंने राधा कृष्ण को अधिक मात्रा में और गणेश जी को रिद्धि सिद्धि के साथ

दरवाजे के प्रवेश द्वार पर या हवेलियों के बाहर टोडो के बीच में चित्रित किया गया। पटना एवं कम्पनी शैली के प्रमुख विषयों में व्यक्ति चित्र,पशु-पक्षी एंव साधारण लोगों के व्यक्ति चित्र थे पशुओं में प्रमुखतः हाथी एंव घोंडों या उनकि सवारियों का अंकन किया गया।

शैलियों का प्रभाव
इन चित्रों में शेखावटी शैली का प्रभाव दिखाई पड़ता है और यह मुग़ल शैली से भी अछूते नहीं रहे हैं क्योंकि दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में मुग़ल शैली का प्रभाव रहा हैं , उसका विस्तार आसपास के क्षेत्रों में खूब हुआ। लेकिन इसके बावजूद यहां की परम्परागत शैली का भी बोलबाला रहा है। इन चित्रों में कहीं-कहीं दक्षता का बोलबाला और तो कहीं अभाव प्रतीत होता है। लेकिन फिर भी यह अपने भावों को प्रकट करने में सक्षम रही है। इनकी गुणवत्ता व विषय प्रभावशाली रहे है। आज देखरेख के अभाव में देखभाल के अभाव में और इनका ठीक से प्रयोग न करने पर बहुत से चित्र इन हवेलियों से नष्ट हो गए हैं या धुएँ की परत जम चुकी है और इसके कारण यह चित्र रंगों का चटकपन खो चुके हैं लेकिन भीतरी दीवारों पर मौजूद चित्र धूप और बारिश से बचे होने के कारण अपने मूल अवस्था को आज भी संजोए हुए हैं।

किन्होंने बसाया बड़वा गांव
बड़वा गांव को बसाने वाले ठाकुर बाघ सिंह तंवर राजपूत वंश से संबंध रखते थे, शायद इसलिए इस गांव की हवेलियों में चित्रांकन करने वाले चितेरे राजपूत क्षेत्र से आए हो । इन चित्रों पर राजपूताना परम्पराओं और उनकी जीवनशैली का प्रभाव दिखाई पड़ रहा है। हवेलियों के चित्रों पर राजपूत व राजसी परिधान का प्रभाव दिखाई पड़ता है। राजसी लोग पशु पक्षी जैसे तोता, हाथी, घोड़ा, ऊंट, आदि पशुओं को पालतू बनाकर रखते थे और शायद इसी कारण उन्हें ही भित्ति-चित्रों के प्रारूप में चित्रित करते थे।अजन्ता की गुफाओं में मनुष्य और महान आत्मा के अन्तर को व्यक्त करने के लिए ये नृत्य मुद्राएं अति उपयुक्त थी पैर की मुद्राओं का भी अजन्ता के चित्रों में विशेष स्थान हैं।

कई सेठ लोगों ने अपने-अपने वैभव, सामाजिक प्रतिष्ठा को दर्शाने लिए हवेलियों का निर्माण करवाया और उन हवेलियों पर चित्रण कराए गए जोकि वहां मौजूद परपरागत आकृतियों एव चित्रों से कुछ भिन्न प्रतीत होते हैं । बड़वा गांव में ठाकुर की हवेली का निर्माण (गाँव का गढ़) लगभग 1910 ईसवी के आसपास मुस्लिम कारीगरों द्वारा निर्मित की गई थी इसलिए शायद यहां के चित्रों पर मुगल शैली का प्रभाव दिखाई पड़ता है।उस दौरानलोक शैली में शरीर के विभिन्न अवयव और परिदृश्य के अनुपात आदि का ध्यान नहीं रखा जाता था चित्रों में प्रतीकात्मक भी बनाया गया है तथा चित्रों में प्राकृतिक दृश्य दिखाए गए हैं।

विरासत सहेजने के प्रयास
गाँव के युवा दोहाकार सत्यवान सौरभ ने बताया कि हवेलियों के रखरखाव के लिए वे कई बार सरकार को लिख चुके हैं। पिछले दो दशकों से वो लगातार गाँव की बहुमूल्य सांस्कृतिक विरासत पर लेख लिक रहे है अभी तक न तो सरकार ने और न ही इन हवेलियों के पुश्तैनी मालिकों ने इनके रख-रखाव के लिए कोई सकारात्मक कदम लिया है सत्यवान सौरभ ने ये भी बताया की कुरुक्षेत्र विश्विधालय के धरोहर विभाग के अधिकारी लगातार उनके संपर्क में है कि कब इनके पुश्तैनी मालिक इनको सहेजने की हामी भरे ताकि सरकारी तौर पर इनको संग्रहालय में रखवाया जा सके ताकि आने वाली पीढ़ियां इनके दीदार कर सके !

लेख साभार : ( डॉo सत्यवान सौरभ)