KESARWANI VAISHYA SAMAJ
पथ्वी के रचनाकार ब्रह्मा और प्रजापति के रूप में महर्षि अंगिरा, उनके सुपुत्र कश्यप एवं अन्य अनेक 'ऋषि प्रवरों' के सुकृत्य का परिणाम आज के स्तर तक पहुंची भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विकास है। इन्हीं गोत्र परम्पराओं और प्रवर प्रथाओं से अभिभूत है वैश्य समुदाय का केसरवानी वैश्य समाज।
केसरवानी वैश्य समाज के अनेक सपूतों ने भारत की सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, आर्थिक पुननिर्माण एवं विकास के क्षेत्रों में अपना भरपूर योगदान इतिहास के विभिन्न कालखण्डों में दिया है। चाहे वह हड़प्पा-मोहन जोदड़ों के पणियों' के रूप में हो, वैदिक काल में वेदों की महत्वपूर्ण ऋचाओं के रचनाकार ऋषि अग्रणियों, जैसे व षय, तुग्र, शुष्ण, विप्लु, वेतसु, दशोनि, तुतुजी, इम, शरत, नववास्तु, चुमुरी, कुयव, प्रमगन्द और ब वु इत्यादि के रूप में हो।
ईसा के सैकड़ों वर्ष पूर्व से ही भारत का सम्बन्ध रोम, इटली, यूनान, बेबिलोन तथा दक्षिण एशिया के देशों से रहा है। व्यापार से ही ऐसे सम्बन्धों की जड़ें मजबूत हुई है। सांस्कृतिक परंपराओं, भारतीय उत्पादों एवं लोक कल्याणार्थ चिन्तन के आदान-प्रदान के सूत्र से भारत की पहचान सारे संसार में आज भी अति विशिष्ट है। विश, विट, पणि, बनिक, बनिया, वानी जैसे नामों से जाने गये लोग हजारों वर्षों से वैश्य परम्परा, सामाजिक धर्म और राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन करते आ रहे हैं। वैश्य धर्म का पालन करते हुए कृषि, उत्पादन, वितरण, विपणन, वाणिज्य, व्यापार और एतत्सम्बन्धी प्रबन्धन क्षेत्रों से जुड़ी सभी विशेषताएं आज तक निर्वाह करते आ रहे हैं। मौर्य, गुप्त, मौखरी (माहुरी), पुष्यमूति राजवंशों ने मध्यकाल में राजनीतिक एवं प्रशासनिक मापदण्ड स्थापित कर सामाजिक समरसता, कूटनीति और आर्थिक विकास के क्षेत्रों में ऐसे उदाहरणों की छाप छोड़े जो स्वर्णयुग एवं आदर्श बनकर आज भी इतिहास के पष्ठों में अद्वितीय हैं। श्रेष्ठी, महाश्रेष्ठी, सार्थवाह, शेट्टी आदि नामों से अपना परिचय स्थापित कर इतिहास को सुशोभित किया है।
अति प्राचीन काल से ही भारत को अनके वाह्य आक्रमण झेलने पड़े हैं, किन्तु सांस्कृतिक सहिष्णुता का उत्कृष्ठ उदाहरण इस मिट्टी में जो उपलब्ध है, उससे बढ़कर संभवतः अन्यत्र नहीं है। सांस्कृतिक विकृति और वाह्य नश्लों के सामाजिक मिश्रण के चलते भारत का रूप, जो पहले सप्त सैन्धव, सनातन, आर्यन, महाकाव्य काल जनित संरकारों, जैन, बौद्ध, शैय, स्मार्त, वैष्णव, सूफी स्वरूप था वह आज भारतीय हो गया है, इनके सभी ऐतिहासिक चरणों में वैश्यों का योगदान अन्य सभी वर्षों से बढ़चढ़ कर रहा है।
केसरवानी समाज का इतिहास लिखने का प्रयास विगत् 1891 ई. से आरम्भ हुआ है। अनेक शोधकर्ताओं ने समाज के वयोव द्ध मनीषियों द्वारा वर्णित ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन अपने निबंधों में किया है। इन निबंधनों का सम्पादन सर्वप्रथम श्री मोहनलाल गुप्त दिल्ली ने 'केसरवानी वैश्य का इतिहास नामक पुस्तक में किया है। वस्तुतः ये सभी निबंध इस पुस्तक की प ष्ठभूमि, विषय वस्तु और आगे किये जाने वाले शोष ों के आधार हैं।
केसरवानी वैश्य का उद्भव कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ। उस समय वैश्य समुदाय यह वर्ग 'केसरवानी' नहीं बल्कि 'बणिक' 'वाणी' या 'बनिया कहलाता था। कश्मीर की भूमि में केसर की खेती, जंगली जड़ी बूटियाँ, फल, मेवे इत्यादि का व्यापार और खेती इस समाज का प्रमुख पेशा था। धर्म परायण निष्ठावान और राजभक्त होने के कारण कश्मीर के राजवंशों से लगभग सभी कालों में इनकी निकटता रही।
मोहम्मद गजनी और बाद में उसके सरदारों के चलते इस समाज को बारहवीं सदी के मध्यावधि में कश्मीर छोड़ना पड़ा। कुछ परिवार धर्मान्तरण स्वीकार कर वहीं रह गये। लगभग सवा सौ परिवार जिन्होंने पठानों और अफगानों का युद्ध में प्रतिरोध किया, वे अपनी रक्षार्थ और परिवार की सुरक्षा के लिये मात भूमि को प्रणाम कर, विभिन्न दिशाओं में पलायान कर गये। कांगड़ा, पंजाब, दिल्ली होते हुए अधिकतर लोग नेपाल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कौशाम्बी, प्रयाग और इलाहाबाद तक पहुंच गये। कुछ गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र होते हुए अपने कुटुम्बों से मिलने के लिये आतुर कड़ेमानिकपुर (जिला प्रयाग) में जमा हुए। यहीं से आरम्भ होता है 'केसरवानी समाज' के इतिहास का आधुनिक चरण।
अन्र्तवैश्य सम्बन्ध, बाजार, पूंजी, ऋण, ब्याज और व्यापार-वाणिज्य की द ष्टि से इस समाज के सम्मुख एक बड़ी शून्यता के अलावा देशान्तरण के बाद कुछ भी नहीं था। इतिहास की मार, आर्थिक विपन्नता, असुरक्षा के मनोवैज्ञानिक दबाब से पस्त सन् 1134 ई. में इन्हें अपने कुटुम्बों से बिछड़कर पूरब, पश्चिम, नेपाल और भारत के विभिन्न क्षेत्र में आजीविका के लिये फैलना पड़ा।
अनुवांशिक परम्परा, सुसंस्कृति, स्वच्छ आचार विचार की प ष्ठभूमि, भौगोलिक एवं पर्यावरणजनित कारणों से कुछ हद तक विकृत हुई। कई सामाजिक, वैवाहिक और धार्मिक कमजोरियाँ, कुरीतियाँ और अंधविश्वास फैले। इन कुरीतियों के निवारण और कुटुम्बों के पुनर्मिलन की प्रक्रिया, 1890, 1918 तथा 1921 ई. से आरम्भ हुई। ऐसे प्रयासों का फल अखिल भारतीय केसरवानी वैश्य महासभा के प्रयास से सन् 1935 तथा 1938 में दिखने लगा। जब पच्छ्या और पूर्वी धड़ों का मिलन हुआ और रोटी-बेटी का सम्बन्ध पुनः शुरू हुआ।
यद्यपि इस समाज में विलक्षण प्रतिभाओं के धनी अनेक श्रेष्ठजन हुए परन्तु एक बड़ा तबका आज भी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं न्याय की द ष्टि से उपेक्षित, प्रताड़ित और पीड़ित है। समान अवसर, संविधान सम्मत सहायता संरक्षण तथा आरक्षण से वंचित है।
वर्तमान दौर में केसरवानी समाज के प्रमुख उल्लेखनीय नाम हैं सर्वश्री सीताराम केसरी, (1919-2000) राजनीतिज्ञ, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष, भारत सरकार के मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष, पद्म भूषण डा. दुखन राम (1899-1991 ई.), प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक, समाजसेवी, शिक्षाविद्ः डा. संकठा प्रसाद (1911-1986), फार्मेसी विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, यू.पी.एस.सी. के अध्यक्ष, (1971-1978); टी. आर. केसरवानी, एवियेशन विशेषज्ञ, यू.एन.ओ.; न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त, पूर्व कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय; हिन्दी के प्रखर उपासक जिन्होंने चार हजार से ज्यादा न्याय निर्णय हिन्दी में लिखा।
एस. लाल. आई.सी.एस. यू.एन.ओ. के स्थापना वर्ष 1944 में भारत के राजदूत: के.लाल. बार-एट-लों; भागलपुर, एल.सी. गुप्ता, आई.ए.एस. परीक्षा में सर्वप्रथम, ईश्वर चन्द प्रसाद केसरी (सासाराम) म.प्र. काडर, आई.ए.एस., अजीत केसरी (क्वाथ, बिहार), म.प्र. काडर, आई.ए.एस., राम किंकर गुप्ता, म.प्र. काडर, आई.ए.एस., प्रेमचन्द केसरवानी (इलाहाबाद) बिहार काडर, आई.ए.एस., अभिषेक केसरवानी, आई.ए. स., प्रतापगढ़ 2009-10, कन्हैया लाल शिवरतन (सागर-1923), प्रसिद्ध एडवोकेट, प्रसिद्ध टेनिस खिलाड़ी, प्रेमजीत लाल, मुकुन्दीलाल गुप्त, संयुक्त निदेशक-सी.बी. आई।
निरंजन लाल केसरवानी, पूर्व सांसद बिलासपुरः श्री नंदगोपाल गुप्ता, 'नन्दी जी (इलाहाबाद) होमिओपैथी मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार, रामहित गुप्ता, पूर्व वित्तमंत्री, म.प्र. रामचन्द्र केशरी, पूर्व मंत्री. झारखण्ड, जयकुमार पालित, पूर्व विधायक (बिहार), स्व. राजकिशोर केसरी, विधायक, श्रीमती किरण केसरी, विधायक (बिहार प्रदेश)
व्यापार एवं उद्योग के क्षेत्र में रामदास रईस (लखनऊ-1918) साइकिल उद्योग में अग्रगण्य, रामकृष्ण गुप्ता (मुम्बई), अन्तर्राष्ट्रीय सेवई निर्माता एवं निर्यातक इत्यादि।
आज के दौर में आई. पी. एस., महिला आई. ए. एस., स्टेट प्रशासिनक एवं पुलिस सेवा में हमारे नौनिहाल आ रहे है। डॉक्टर, इन्जीनियर, चार्टड एकाउन्टेन्ट, एम.बी.ए. संचार एवं कम्प्यूटर विशेषज्ञ (हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर), कलाकार, साहित्यकार, फिल्म कलाकार, मिडिया जरनलिस्ट एवं प्रकाशक, विभिन्न उद्योगों में उच्चस्थान प्राप्त कई महानुभावों ने केसरवानी समाज का नाम बढ़ाया है।
विभिन्न उपशाखाओं में बंटे, अपनी-अपनी विशेषज्ञता से देश सेवा में केसरवानी वैश्य कार्यरत हैं। भारत की हिन्दूजन संख्या का चौबीस प्रतिशत वैश्य, सम्पूर्ण वैश्य समाज, विभिन्न संगठनों, मंचों, सभाओं द्वारा भारत की सेवा में संलग्न है।
केसरवानी समाज का उद्भव, विकास और वर्तमान से संबंधित इस पुस्तक में प्रस्तुत विवरण बहुआयामी शोध, अध्ययन, अवलोकन और विश्लेषण का एक अकिंचन प्रयास है, जो पाठकों के समक्ष सादर समर्पित है।
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