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Sunday, March 30, 2025

MAHURI VAISHYA SAMAJ HISTORY

MAHURI VAISHYA SAMAJ HISTORY 

माहुरी वैश्य समाज का इतिहास

माहुरी वैश्य समाज के लोग अपने परिवार के ज्ञान,परंपरा और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित अपनी जड़ों का पता प्राचीन और दूर के अतीत से लागते है।पुराणों की अवधि के साथ-साथ भारत के स्वर्ण युग में भी, (मौर्य और गुप्त काल) माहुरी जाति के साक्ष्य पाये जाते हैं।हमारे प्राचीन पूर्वज मथुरा,वृंदावन और गोकुल के आसपास के जंगलों की बस्तियों में रहते थे।वे इन वनों में अपने मूल के प्रति सम्मान,गहरी नैतिक मूल्यों और धार्मिक दृष्टिकोण के साथ एक निष्ठावान समुदाय के रूप में अपने सर्वोच्य देवी के रूप में माता मथुरासिनी (देवी शक्ती के एक रूप) का आदर एवं पूजनीय मानते थे।निकट अवधि में, हमारे वंशजो का उत्तर भारत में मुगल शासन (16 वीं सदी) केे समय से कम से कम 500 वर्षों तक का पता चलता हैं,जब कारवां मार्ग सुरक्षित हो गए थे और हमारे पूर्वजों ने मथुरा-वृंदावन-गोकुल क्षेत्रो से निकल कर सुबा-ए-बंगाल कि ओर आने लगे थे।सुबा-ए-बंगाल उस अवधि के सबसे समृद्ध प्रांतों में से एक था। 18 वीं शताब्दी के शुरुआती भाग में,जब मुगल साम्राज्य का विघटन हुआ और व्यापार मार्ग असुरक्षित हो गए और जब ये लोग पिंडारी लूटरो के लक्ष्य बनने लग गए,तो हमारे कई पूर्वजों ने बिहार शरीफ के आसपास के क्षेत्रों में स्थायी रूप से प्रवास करने लगे।बिहार शरीफ उस समय का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक और राजनीतिक केंद्र था और वर्तमान में भारत के बिहार राज्य में स्थित है। प्रवास के इस तरह की लहर कई दशकों तक चलती रही जिससे मथुरा से लेकर बिहार शरीफ और आसपास के इलाकों मेे बड़ी संख्या में परिवार आते रहे।उसी समय लगभग,कई परिवार पहले से ही मगध के उपजाऊ मैदानी भाग में जो गंगा के दक्षिण तथा मध्य बिहार में स्थित है,स्थायी रूप से बसने लगे और व्यापार,वाणिज्य और अन्य आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने लग गए थे। प्रवास के इस तरह की लहर कई दशकों तक जारी रही थी,और कई दशकों के उपरातं गया जो कि हिंदुओं के सात सबसे पवित्र शहरों में से एक है,महुरी वैश्य की सामाजिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में उभरी।

भारत की आजादी की पहली लड़ाई(1857-1858) से पहले,बड़ी संख्या में माहुरी वैश्य छोटानागपुर पठार के उत्तरी भाग खास करके वर्तमान के गिरीडीह जिला के आसपास के इलाको में जो भारत के झारखंड राज्य का हिस्सा हैं बसने लग गए थे। 20 वीं सदी की शुरूआत में यह देखा जाने लगा था कि बड़ी संख्या में महुरी वैश्य परिवार के लोग पूर्व में पश्चिम बंगाल और दक्षिण में उड़ीसा तक जा के बसने लगे । इस बीच,महुरी वैश्य समुदाय के कई सामाजिक नेताओं की पहल के कारण,एक सामाजिक पुनर्जागरण धीरे-धीरे आकार ले रहा था। इन पहल की वजह से उच्च जागरूकता और शिक्षा के उच्च स्तर में वृद्धि हुई। इससे व्यापार और वाणिज्य के पारंपरिक गुणों के अलावा खुद को अभिव्यक्त करने के नए तरीके तलाशने के लिए माहुरी जाती के लोगों में अग्रणी भावना और गतिशीलता बढ़ गई। उस समय,ज्ञान आधारित पेशेवरों का एक वर्ग उभर कर आया है जो कि विभीन्न प्रकार के उद्योग,सरकारी और अर्ध-सरकारी रोजगार तथा अन्य कई ज्ञान आधारित व्यवसायों में जाने लगे। यह सामाजिक पुनर्जागरण भारत के बड़े महानगरो मेंं जैसे कोलकाता, मुंबई और नई दिल्ली और कई अन्य बड़े और छोटे शहरों में बसने के लिए महुरी वैश्य के सैकड़ों परिवारों में हुई।20 वीं शताब्दी तक,समुदाय के शिक्षित कुलीन वर्ग की अग्रणी भावना उन्हें दुनिया के कई हिस्सों तक ले गई,और तीसरी सदियों की शुरुआत से,माहुरी वैश्य परिवार भले ही छोटी संख्या में,परंतु कई महाद्वीपों और दुनिया भर के लगभग सभी समय क्षेत्रों में जाने लग गये।

यद्यपि महुरी वैश्य का इतिहास करीब तीन शताब्दी या उससे भी ज्यादा समय तक का पता लगता है।माहुरी वैश्य के लोकगीतों के साथ-साथ कुछ पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों का सुझाव है कि महुरी वैश्य की जड़ें (जरूरी नहीं कि एक ही नाम “माहुरी ” हो) पहले दो सदियों से भी पहल का है,यहां तक ​​कि मौर्य और गुप्त काल से भी पहले।

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